स्मार्ट और सतत शहरों की ओर भारत की यात्रा | 20 Mar 2026
यह लेख 18/03/2026 को द बिजनेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित ‘Indian cities don't lack infrastructure, what they lack is civic trust’ शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख भारतीय शहरों के अवसंरचना-आधारित केंद्रों से सतत पारिस्थितिक तंत्रों में रूपांतरण की प्रक्रिया का विश्लेषण करता है। यह शहरी विकास को दीर्घकालिक जीवन योग्यता एवं जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीलापन में रूपांतरित करने हेतु नागरिक–राज्य सामाजिक अनुबंध के पुनर्संरचनात्मक सुदृढ़ीकरण की अनिवार्यता को रेखांकित करता है।
प्रिलिम्स के लिये: पीएम स्वनिधि, स्वच्छ भारत मिशन-शहरी 2.0, अमृत 2.0, नगरीय ऊष्मा द्वीप प्रभाव, पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना।
मेन्स के लिये: सतत शहरीकरण की दिशा में भारत की प्रगति, प्रमुख मुद्दे और आवश्यक उपाय।
भारत का शहरी विकास केवल भौतिक अवसंरचना की चुनौती नहीं है, बल्कि यह नागरिक सहभागिता एवं शासन व्यवस्था में निहित गहन कमियों को भी प्रतिबिंबित करता है, जैसा कि नवीनतम आर्थिक सर्वेक्षण में नागरिक–राज्य सामाजिक अनुबंध की कमज़ोरी के संदर्भ में रेखांकित किया गया है। अनुमान है कि वर्ष 2047 तक भारत की जनसंख्या लगभग 17 लाख तक पहुँच जाएगी, जिसमें से लगभग 51% लोग शहरी क्षेत्रों में निवास करेंगे। शहर सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 70% हिस्सा होंगे, जिससे सतत विकास पर दबाव और भी बढ़ जाएगा। तथापि, अनियोजित शहरीकरण, अपशिष्ट प्रबंधन की अपर्याप्तता तथा बार-बार घटित होने वाली शहरी बाढ़ जैसी समस्याएँ केवल वित्तीय संसाधनों की कमी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे संरचनात्मक एवं संस्थागत कमियों से भी उत्पन्न होती हैं। अतः भारत की शहरी समस्याओं के प्रभावी समाधान हेतु केवल वित्तीय निवेश पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि सतत विकास, सहभागी शासन, उत्तरदायित्व तथा व्यवहार परिवर्तन के माध्यम से नागरिक–राज्य सामाजिक अनुबंध के मौलिक पुनर्संरचनात्मक सुदृढ़ीकरण की आवश्यकता है।
भारत के शहरों ने सतत और समावेशी विकास करने की दिशा में क्या प्रगति की है?
- ई-मोबिलिटी संक्रमण (पर्यावरणीय स्थिरता): भारत इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की दिशा में अग्रसर होकर शहरी परिवहन को कार्बन मुक्त करने के लिये सक्रिय प्रयास कर रहा है, जिससे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी तथा शहरी वायु गुणवत्ता में सुधार संभव हो रहा है।
- यह व्यापक परिवर्तन हरित परिवहन के लोकतंत्रीकरण को सुनिश्चित करता है, जिससे सार्वजनिक परिवहन पर निर्भर निम्न-आय वर्ग के लिये सतत आवागमन आर्थिक रूप से सुलभ बना रहता है।
- उदाहरणार्थ, पीएम ई-बस सेवा पहल के अंतर्गत 169 शहरों में 10,000 इलेक्ट्रिक बसों का संचालन किया जा रहा है, जिससे क्षेत्रीय परिवहन संबंधी कमियों का निराकरण किया जा सके।
- इसके अतिरिक्त RMI-NITI EV रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2030 तक वाणिज्यिक वाहनों में 70% EV प्रवेश का लक्ष्य निर्धारित है।
- यह व्यापक परिवर्तन हरित परिवहन के लोकतंत्रीकरण को सुनिश्चित करता है, जिससे सार्वजनिक परिवहन पर निर्भर निम्न-आय वर्ग के लिये सतत आवागमन आर्थिक रूप से सुलभ बना रहता है।
- सुलभ शहरी आवास व्यवस्था (सामाजिक समावेशन): समावेशी शहरीकरण के प्रयासों ने झुग्गी-झोंपड़ी पुनर्वास की पारंपरिक अवधारणा को परिवर्तित करते हुए वंचित वर्गों को औपचारिक शहरी अर्थव्यवस्था में एकीकृत करने का मार्ग प्रशस्त किया है।
- महिलाओं के नाम पर संपत्ति स्वामित्व को अनिवार्य बनाकर, ये पहलें लिंग-आधारित आर्थिक असमानताओं को कम करने के साथ-साथ सामाजिक सुरक्षा को भी सुदृढ़ करती हैं। PMAY-U 2.0 के अंतर्गत हाल ही में 2.87 लाख अतिरिक्त आवासों की स्वीकृति के साथ कुल स्वीकृत आवासों की संख्या 13.61 लाख से अधिक हो चुकी है, जो सरकार की वहनीय आवास प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है।
- उल्लेखनीय है कि इनमें से 96% आवास महिलाओं के नाम या संयुक्त स्वामित्व में पंजीकृत हैं, जो महिला सशक्तीकरण को दर्शाता है।
- महिलाओं के नाम पर संपत्ति स्वामित्व को अनिवार्य बनाकर, ये पहलें लिंग-आधारित आर्थिक असमानताओं को कम करने के साथ-साथ सामाजिक सुरक्षा को भी सुदृढ़ करती हैं। PMAY-U 2.0 के अंतर्गत हाल ही में 2.87 लाख अतिरिक्त आवासों की स्वीकृति के साथ कुल स्वीकृत आवासों की संख्या 13.61 लाख से अधिक हो चुकी है, जो सरकार की वहनीय आवास प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है।
- चक्रीय अपशिष्ट अर्थव्यवस्था (स्वच्छता एवं स्थिरता): शहरी स्वच्छता प्रणाली अब रैखिक अपशिष्ट निस्तारण से हटकर चक्रीय अपशिष्ट अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर है, जिसमें संसाधन पुनर्प्राप्ति, लैंडफिल का जैव-उपचार तथा मशीनीकृत अपशिष्ट पृथक्करण को प्राथमिकता दी जा रही है
- यह प्रणालीगत परिवर्तन न केवल मृदा एवं भूजल प्रदूषण को कम करने में सहायक है, बल्कि अनौपचारिक कचरा बीनने वालों को अर्थव्यवस्था में समाहित कर समावेशी एवं गरिमापूर्ण आजीविका के अवसर भी सृजित करता है।
- स्वच्छ भारत मिशन–अर्बन 2.0, पहल का प्रमुख उद्देश्य शहरों को ‘कचरा मुक्त’ बनाना है, जिसके अंतर्गत दिल्ली के गाज़ीपुर जैसे विशाल कचरा स्थलों का सक्रिय रूप से उन्मूलन एवं वैज्ञानिक प्रबंधन किया जा रहा है।
- परिणामस्वरूप, वर्ष 2025 के अंत तक भारत की शहरी ठोस अपशिष्ट प्रसंस्करण क्षमता बढ़कर 80.31% से अधिक हो गई है।
- विकेंद्रीकृत सौर ऊर्जा (जलवायु अनुकूलन): भारतीय शहर रूफटॉप सोलर पैनलों को प्रोत्साहित कर अपने ऊर्जा ग्रिडों के विकेंद्रीकरण की दिशा में तीव्रता से अग्रसर हैं, जिससे घरेलू ऊर्जा आत्मनिर्भरता एवं जलवायु अनुकूलन को बढ़ावा मिल रहा है।
- यह हरित ऊर्जा का लोकतंत्रीकरण न केवल कमज़ोर शहरी वर्गों को अस्थिर विद्युत दरों से संरक्षण प्रदान करता है, बल्कि शहरी कार्बन फुटप्रिंट में भी उल्लेखनीय कमी सुनिश्चित करता है।
- विश्व की सबसे बड़ी घरेलू रूफटॉप सोलर पहल, PM सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना, मार्च 2027 तक एक करोड़ घरों को सौर ऊर्जा उपलब्ध कराने के लक्ष्य के साथ भारत के ऊर्जा परिदृश्य में संरचनात्मक परिवर्तन ला रही है।
- इस योजना के अंतर्गत प्रति माह 300 यूनिट तक निशुल्क बिजली पर प्रत्यक्ष सब्सिडी प्रदान की जाती है, साथ ही यह मेगाटन स्तर पर कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने में भी सहायक है।
- स्ट्रीट वेंडर वित्तीय समावेशन (आर्थिक समावेशन): शहरी आर्थिक नीतियों ने नवोन्मेषी रूप से स्ट्रीट वेंडरों को महत्त्वपूर्ण सूक्ष्म उद्यमियों के रूप में मान्यता दी है तथा उन्हें औपचारिक ऋण और डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र तक अभूतपूर्व पहुँच प्रदान की है।
- यह परिवर्तन संवेदनशील अनौपचारिक श्रमिकों को शोषणकारी साहूकारों से संरक्षण प्रदान करता है तथा उन्हें निर्बाध रूप से भारत की डिजिटल शहरी अर्थव्यवस्था के मुख्य प्रवाह में सम्मिलित करता है।
- पीएम स्वनिधि योजना के माध्यम से जुलाई 2025 तक 68 लाख से अधिक स्ट्रीट वेंडरों को ₹13,797 करोड़ की राशि के 96 लाख से अधिक ऋण वितरित किये जा चुके हैं।
- डेटा-आधारित शहरी शासन (प्रौद्योगिकी एवं स्थिरता): शहरी शासन केंद्रीकृत तकनीकी केंद्रों के माध्यम से पूर्णतः डेटा-आधारित हो गया है, जो नगरीय सेवाओं, आपदा प्रबंधन तथा गतिशील यातायात प्रबंधन को अनुकूलित करते हैं।
- स्मार्ट सिटीज मिशन के अंतर्गत 100 एकीकृत कमांड एवं नियंत्रण केंद्र (ICCCs) पूर्ण रूप से संचालित हो चुके हैं।
- ये केंद्र शहरों के ‘मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र’ के रूप में कार्य करते हुए यातायात सेंसर, जल SCADA प्रणाली तथा CCTV जैसे विविध स्रोतों से डेटा का केंद्रीकरण कर शहरी शासन को सुदृढ़ करते हैं।
- उदाहरणस्वरूप, चंडीगढ़ जैसे शहरों में इन प्रणालियों के माध्यम से लाखों ई-चालान जारी किये गए हैं, जिससे नियमन एवं प्रवर्तन तंत्र में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।
- शहरी जल सुरक्षा (संसाधन स्थिरता): गंभीर शहरी जल संकट का समाधान करने हेतु शहर पाइपयुक्त जल आपूर्ति नेटवर्क का तीव्र विस्तार कर रहे हैं तथा लुप्तप्राय शहरी जलभृतों (aquifers) एवं ऐतिहासिक जल निकायों का पुनरुद्धार कर रहे हैं।
- यह समग्र जल प्रबंधन मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा वहन किये जाने वाले दैनिक जल संग्रहण के बोझ को समाप्त करता है, जबकि जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील शहरों को सूखे और स्थानीय बाढ़ से बचाता है।
- अमृत 2.0 मिशन के अंतर्गत 2.77 लाख करोड़ रुपये की योजना के माध्यम से 4,378 वैधानिक नगरों में सार्वभौमिक जल आपूर्ति हेतु नल कनेक्शन प्रदान किये जा रहे हैं।
- साथ ही, मिशन अमृत सरोवर के अंतर्गत प्रत्येक ज़िले में कम-से-कम 75 जलाशयों (तालाबों) के निर्माण अथवा पुनरुद्धार का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
- तीव्र परिवहन विस्तार (स्थानिक समावेशन): भारत विश्व के सबसे बड़े तीव्र परिवहन विस्तार कार्यक्रमों में से एक को क्रियान्वित कर रहा है, जिससे शहरी भीड़भाड़ में कमी आ रही है तथा परिधीय निम्न-आय उपनगरों को केंद्रीय आर्थिक केंद्रों से जोड़ा जा रहा है।
- ये उच्च क्षमता एवं निम्न उत्सर्जन वाले रेल नेटवर्क शहरी भौगोलिक असमानताओं को कम करते हुए शहरी कार्यबल को समान एवं तीव्र गतिशीलता प्रदान करते हैं।
- भारत का परिचालन मेट्रो नेटवर्क वर्ष 2014 में 5 शहरों में 248 किमी से बढ़कर मई 2025 तक 23 शहरों में 1,013 किमी तक विस्तृत हो चुका है, जो शहरी परिवहन अवसंरचना में तीव्र प्रगति को दर्शाता है।
- उदाहरणस्वरूप, नवसंचालित दिल्ली–मेरठ RRTS कॉरिडोर में फरवरी 2026 में एक ही दिन में 1 लाख से अधिक यात्रियों की सर्वाधिक संख्या दर्ज की गई।
भारत में सतत शहरीकरण की दिशा में प्रभावी परिवर्तन को कौन-से कारक बाधित करते हैं?
- नगरपालिका वित्तीय अभाव: भारतीय नगरपालिकाएँ दीर्घकालिक वित्तीय अक्षमता से ग्रस्त हैं, जिससे सतत एवं दीर्घकालिक अवसंरचनात्मक परियोजनाओं हेतु उनकी पूंजीगत व्यय क्षमता अत्यंत सीमित हो जाती है।
- राज्य एवं केंद्र से अंतरणों पर अत्यधिक निर्भरता स्थानीय लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व को कमज़ोर करती है तथा सक्रिय शहरी नियोजन को लगभग असंभव बना देती है।
- नगरपालिका राजस्व भारत के GDP का मात्र 1% है, जो ब्राज़ील (7%) और दक्षिण अफ्रीका (6%) की तुलना में अत्यंत कम है।
- इसके अलावा, प्रमुख महानगरों में हाल ही में किये गए डिजिटलीकरण प्रयासों के बावजूद, संपत्ति कर संग्रह GDP का केवल 0.15%-0.20% ही प्राप्त कर पाता है, जो कि अत्यंत कम है।
- खंडित संस्थागत प्रशासन: शहरी प्रशासन विभिन्न एजेंसियों के बीच अधिकार क्षेत्र के अतिव्यापन तथा शक्तिशाली, गैर-निर्वाचित अर्द्ध-सरकारी निकायों के कारण बाधित है, जो प्रायः निर्वाचित नगर निकायों को दरकिनार कर देते हैं।
- यह संस्थागत विखंडन समन्वित मास्टर प्लानिंग को बाधित करता है तथा सतत विकास एवं जलवायु अनुकूलन से संबंधित आवश्यक हस्तक्षेपों में अत्यधिक विलंब उत्पन्न करता है।
- उदाहरणस्वरूप, बंगलूरू में शहरी शासन BBMP (नगरपालिका सेवाएँ), BDA (योजना), BWSSB (जल) तथा BMTC (परिवहन) जैसी विभिन्न एजेंसियों में विभाजित है, जहाँ कोई एकीकृत महानगरीय प्राधिकरण नहीं है।
- इसी प्रकार, मुंबई में भी अनेक एजेंसियों के बीच अतिव्यापी उत्तरदायित्व हैं, जिससे समन्वय में विफलता उत्पन्न होती है, जैसा कि नीति आयोग की न्यू इंडिया @75 कार्यनीति’ में उल्लेखित है।
- अनियंत्रित परिधीय शहरी विस्तार: औपचारिक शहर सीमाओं के बाहर अनियोजित क्षैतिज विस्तार से ‘जनगणना नगरों’ (Census Towns) की तीव्र वृद्धि होती है, जहाँ मूलभूत नागरिक सुविधाएँ एवं पारिस्थितिकी सुरक्षा तंत्र का अभाव होता है।
- यह क्षैतिज विस्तार उच्च-कार्बन आवागमन पैटर्न को स्थायी बना देता है तथा कृषि भूमि एवं आर्द्रभूमि बफर क्षेत्रों का तीव्र क्षरण करता है।
- राष्ट्रीय स्तर पर, गैर-कृषि उपयोग हेतु भूमि वर्ष 1991 से 2022 के बीच 18.3 मिलियन हेक्टेयर से बढ़कर 26.9 मिलियन हेक्टेयर हो गई, जबकि तीव्र जनसंख्या वृद्धि के बावजूद शुद्ध बोया गया क्षेत्र लगभग 1.8 मिलियन हेक्टेयर घट गया।
- सबसे अधिक कमी पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु तथा कर्नाटक जैसे राज्यों में देखी गई है, विशेष रूप से दिल्ली NCR, मुंबई, बंगलूरू, हैदराबाद एवं चेन्नई जैसे प्रमुख शहरों के आसपास के परिधीय क्षेत्रों में, जहाँ निर्मित क्षेत्र का विस्तार अत्यधिक तीव्र रहा है।
- जलवायु अनुकूलन की कमी: प्राकृतिक जल निकासी तंत्रों पर दशकों से हुए तीव्र कंक्रीटीकरण ने शहरी क्षेत्रों की जलवायु अनुकूलन क्षमता को गंभीर रूप से कमज़ोर कर दिया है, जिससे चरम मौसमी घटनाएँ बार-बार नागरिक आपदाओं में परिवर्तित हो रही हैं।
- पूर्वानुमानित (proactive) दृष्टिकोण के स्थान पर प्रतिक्रियात्मक (reactive) नीति-प्रणाली अपनाने से कमज़ोर वर्ग बाढ़ तथा लू जैसी आपदाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो गए हैं।
- उदाहरणस्वरूप, तमिलनाडु आर्द्रभूमि मिशन द्वारा किये गए एक हालिया मानचित्रण में पाया गया कि 21.25 वर्ग किमी आर्द्रभूमि के 40% से अधिक भाग पर अतिक्रमण हो चुका है, जिसमें 8.66 वर्ग किमी क्षेत्र पर अवैध कब्ज़ा शामिल है।
- इसी प्रकार, CEEW के अनुसार, भारत के लगभग 57% ज़िले, जहाँ देश की 76% जनसंख्या निवास करती है, वर्तमान में ‘उच्च’ से ‘अत्यधिक उच्च’ ताप जोखिम की श्रेणी में आते हैं।
- दीर्घकालिक अनौपचारिक आवास समस्या: किफायती एवं औपचारिक आवास की सतत कमी के परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में प्रवासी जनसंख्या असुरक्षित अनौपचारिक बस्तियों में निवास करने के लिये विवश होती है, जहाँ भूमि स्वामित्व की अनिश्चितता अत्यधिक बनी रहती है।
- यह स्थिति स्थानिक असमानताओं को और अधिक बढ़ा देती है, जिससे हरित ऊर्जा, पाइपयुक्त स्वच्छता तथा जलवायु-सुरक्षा उपायों का समान एवं न्यायसंगत वितरण संरचनात्मक रूप से बाधित हो जाता है।
- लगभग 6.5 करोड़ भारतीय वर्तमान में झुग्गी-झोंपड़ियों में निवास करते हैं, जो देश की कुल शहरी आबादी का 17% से अधिक है (जनगणना 2011)।
- सरकार द्वारा पर्याप्त आवंटन के बावजूद, शहरी आवास संकट बना हुआ है, जिसका एक प्रमुख कारण शहरी भूमि बाज़ारों में सट्टा प्रवृत्तियाँ हैं।
- असंतुलित गतिशीलता प्रतिमान: शहरी परिवहन नियोजन में निजी वाहन अवसंरचना को प्राथमिकता दिये जाने के कारण गैर-मोटर चालित परिवहन (NMT) तथा अंतिम-मील सार्वजनिक कनेक्टिविटी की उपेक्षा होती रही है।
- यह प्रणालीगत पूर्वाग्रह उच्च उत्सर्जन आधारित परिवहन को संस्थागत रूप देता है तथा पैदल चलने एवं साइकिल पर निर्भर आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है।
- भारत में शहरी गतिशीलता में निजी वाहनों का वर्चस्व स्पष्ट है, जहाँ वर्ष 2024-25 में पंजीकृत 25.5 मिलियन वाहनों में से 88% से अधिक निजी वाहन (मुख्यतः दोपहिया एवं कारें) हैं।
- परिवहन साधनों की हिस्सेदारी में निजी परिवहन 35-45%, सार्वजनिक परिवहन लगभग 25% तथा मध्यवर्ती सार्वजनिक परिवहन का योगदान लगभग 10% है, जो स्पष्ट रूप से असंतुलन को दर्शाता है।
- अस्थिर जल संसाधन प्रबंधन: शहरी क्षेत्र भूजल के अत्यधिक दोहन एवं सतही जल के कुप्रबंधन के दुष्चक्र में फँसे हुए हैं, जिससे स्थानीय स्तर पर तीव्र जल संकट उत्पन्न हो रहा है। खंडित शासन व्यवस्था जलभंडारों के क्षरण को तेज़ कर रही है तथा जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति शहरी क्षेत्रों की भेद्यता को बढ़ा रही है।
- उदाहरणस्वरूप, वर्ष 2024 में बंगलूरू के जल संकट ने इस समस्या की गंभीरता को उजागर किया, जहाँ भीषण गर्मी से पूर्व ही 13,900 बोरवेल में से लगभग 6,900 सूख गए थे।
- रेखीय अपशिष्ट प्रबंधन में बाधाएँ: चक्रीय अर्थव्यवस्था की दिशा में नीतिगत प्रयासों के बावजूद, शहरी अपशिष्ट प्रबंधन तंत्र स्रोत पर पृथक्करण की कमी एवं विकेंद्रीकृत प्रसंस्करण अवसंरचना के अभाव के कारण संरचनात्मक रूप से बाधित है।
- केंद्रीकृत लैंडफिलिंग पर निर्भरता न केवल पारिस्थितिकी तंत्रों को प्रदूषित करती है, बल्कि बड़े पैमाने पर मीथेन उत्सर्जन को भी बढ़ावा देती है।
- भारत में प्रतिदिन 1.5 लाख टन से अधिक नगरपालिका ठोस अपशिष्ट (MSW) उत्पन्न होता है, जिसमें से केवल 83% का संग्रहण तथा 30% से भी कम का प्रसंस्करण किया जाता है।
- दिल्ली का गाज़ीपुर लैंडफिल जैसे स्थल सैकड़ों एकड़ में फैले हुए हैं, जो गंभीर जैविक जोखिमों एवं ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के प्रमुख स्रोत के रूप में उभरते हैं।
भारत में सतत और स्मार्ट शहरी शासन से संबंधित प्रमुख केस स्टडी कौन-कौन सी हैं?
- सूरत का एकीकृत कमांड एवं नियंत्रण केंद्र (ICCC): सूरत ने जल SCADA, गतिशील यातायात निगरानी तथा आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रबंधन हेतु वास्तविक समय IoT सेंसरों को एकीकृत करते हुए एक केंद्रीकृत डिजिटल ट्विन आधारित ‘नर्वस सिस्टम’ विकसित किया है।
- इस उन्नत तकनीकी ढाँचे ने नगरपालिका सेवा वितरण एवं संसाधन आवंटन को अधिक दक्ष बनाया है, साथ ही सार्वजनिक सुरक्षा प्रतिक्रिया समय तथा यातायात उल्लंघनों में उल्लेखनीय कमी लाई है।
- इंदौर का वेस्ट-टू-वेल्थ मॉडल: इंदौर ने 100% स्रोत स्तर पर अपशिष्ट पृथक्करण को संस्थागत रूप देकर तथा ‘गोबर-धन’ जैसी विकेंद्रीकृत बायो-मीथनेशन इकाइयाँ स्थापित कर चक्रीय अर्थव्यवस्था की दिशा में महत्त्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है।
- यह मॉडल नगर के गीले अपशिष्ट को बायो-CNG में परिवर्तित करता है, जिससे पुराने लैंडफिल समाप्त हुए हैं तथा एक आत्मनिर्भर राजस्व स्रोत विकसित हुआ है। इसी कारण इंदौर लगातार कई वर्षों से भारत का सबसे स्वच्छ शहर बना हुआ है
- अहमदाबाद का ट्रांजिट-ओरिएंटेड डेवलपमेंट (TOD): अहमदाबाद की ‘जनमार्ग’ BRTS एवं मेट्रो एकीकरण परियोजना, ट्रांजिट कॉरिडोर के आसपास उच्च घनत्व एवं मिश्रित उपयोग वाले क्षेत्रीय नियोजन को प्रोत्साहित करती है।
- यह मॉडल सघन शहरीकरण को प्रोत्साहित करता है तथा शहर के केंद्रीय क्षेत्रों में निजी वाहनों पर निर्भरता को कम करता है।
- ओडिशा का लाइवेबल हैबिटेट मिशन (जगा मिशन): ‘जगा मिशन’ के नाम से प्रसिद्ध यह पहल वर्ष 2017 में ओडिशा सरकार द्वारा प्रारंभ की गई एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक आवास एवं झुग्गी उन्नयन योजना है।
- इसका उद्देश्य शहरी झुग्गीवासियों को सशक्त बनाना तथा उन्हें औपचारिक शहरी ढाँचे में समाहित करना है।
- पिंपरी-चिंचवड के ग्रीन म्युनिसिपल बॉण्ड: पिंपरी-चिंचवड ने पारंपरिक सरकारी अनुदानों पर निर्भरता कम करते हुए ग्रीन म्युनिसिपल बॉण्ड जारी कर बुनियादी ढाँचे के विकास एवं सतत सीवेज उपचार संयंत्रों के वित्तपोषण का नवाचारपूर्ण मार्ग अपनाया है।
भारत को सतत शहरीकरण की दिशा में और आगे बढ़ाने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?
- ट्रांजिट-ओरिएंटेड डेवलपमेंट (TOD) एवं सघन शहरीकरण: शहरों को जन परिवहन केंद्रों के आसपास उच्च घनत्व एवं मिश्रित भूमि उपयोग को अपनाना चाहिये, ताकि लंबी दूरी की यंत्रीकृत यात्रा तथा निजी वाहनों पर निर्भरता कम हो सके।
- ‘मेट्रो-लाइट’ या RRTS स्टेशनों के आसपास आवासीय, वाणिज्यिक तथा मनोरंजक गतिविधियों का समेकन कर भूमि उपयोग दक्षता को अधिकतम किया जा सकता है तथा प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन को कम किया जा सकता है।
- यह रणनीति शहरों को विस्तारित, वाहन-केंद्रित उपनगरों से हटाकर ‘15-मिनट में पड़ोस’ की अवधारणा की ओर ले जाती है, जहाँ मानव-केंद्रित गतिशीलता एवं सामाजिक सामंजस्य को प्राथमिकता दी जाती है।
- ब्लू-ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर का एकीकरण: शहरी नियोजन को ‘ग्रे’ (कंक्रीट-प्रधान) अवसंरचना से हटकर ‘ब्लू-ग्रीन’ मॉडल की ओर अग्रसर होना चाहिये, जिसमें प्राकृतिक जल निकायों तथा बायो-स्वेल्स को शहरी ढाँचे में समाहित किया जाए।
- पारगम्य फुटपाथ, शहरी वनों तथा पुनर्जीवित बाढ़ मैदानों पर आधारित ‘स्पंज सिटी’ अवधारणा, शहरों को वर्षा जल के प्राकृतिक अवशोषण, जलभंडार पुनर्भरण तथा शहरी ताप द्वीप प्रभाव में कमी हेतु सक्षम बनाती है।
- यह प्रकृति-आधारित समाधान द्वि-आयामी लाभ प्रदान करता है—एक ओर अचानक आने वाली बाढ़ के विरुद्ध जलवायु अनुकूलन तो दूसरी ओर घनी आबादी के लिये शीतलनकारी ‘हरित फेफड़े’ का निर्माण।
- विकेंद्रीकृत चक्रीय अपशिष्ट प्रबंधन: शहरी अपशिष्ट प्रबंधन को केंद्रीकृत लैंडफिल आधारित मॉडल से हटाकर वार्ड-स्तरीय विकेंद्रीकृत प्रसंस्करण इकाइयों की ओर रूपांतरित करना आवश्यक है, जो स्थानीय स्तर पर ‘वेस्ट-टू-वेल्थ’ रूपांतरण को प्रोत्साहित करें।
- स्रोत स्तर पर 100% अपशिष्ट पृथक्करण को संस्थागत रूप प्रदान करते हुए तथा अनौपचारिक कचरा बीनने वालों को औपचारिक चक्रीय अर्थव्यवस्था में एकीकृत करके, जैविक अपशिष्ट को बायो-मीथेन तथा पुनर्चक्रण योग्य पदार्थों को औद्योगिक कच्चे माल में परिवर्तित किया जा सकता है।
- यह दृष्टिकोण न केवल शहरों के बीच अपशिष्ट परिवहन से उत्पन्न लॉजिस्टिक उत्सर्जन को कम करता है, बल्कि पुरानी डंप-साइटों से जुड़े पर्यावरणीय जोखिमों को भी प्रभावी रूप से समाप्त करता है।
- नगरपालिका बॉण्ड बाज़ार एवं राजकोषीय स्वायत्तता: हरित अवसंरचना के वित्तपोषण हेतु शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) को पारंपरिक सरकारी अनुदानों पर निर्भरता से आगे बढ़ते हुए अपनी वित्तीय सुदृढ़ता को बढ़ाकर ग्रीन म्युनिसिपल बॉण्ड बाज़ार तक पहुँच विकसित करनी होगी।
- संपत्ति कर सुधार एवं वैल्यू-कैप्चर वित्तपोषण के माध्यम से राजकोषीय स्वायत्तता को सुदृढ़ करने से शहरों को नवीकरणीय ऊर्जा ग्रिड, EV चार्जिंग अवसंरचना जैसी जलवायु-अनुकूलित परियोजनाओं का स्वतंत्र वित्तपोषण करने की क्षमता प्राप्त होती है।
- एक सुदृढ़ एवं विश्वसनीय नगरपालिका तंत्र निजी संस्थागत पूंजी को आकर्षित कर सकता है, जिससे बजटीय सीमाओं के कारण सतत शहरी परिवर्तन बाधित न हो।
- भविष्यसूचक शासन हेतु डिजिटल ट्विन प्रौद्योगिकी: ‘डिजिटल ट्विन’ प्रौद्योगिकी, जो वास्तविक समय IoT सेंसर डेटा पर आधारित शहर की एक आभासी 3D प्रतिकृति होती है, शहरी नियोजकों को संसाधन आवंटन, यातायात प्रवाह तथा आपदा प्रतिक्रिया तंत्र का पूर्वानुमान एवं अनुकूलन करने में सक्षम बनाती है।
- यह डेटा-संचालित शहरीकरण जल पाइपलाइनों के पूर्वानुमानित रखरखाव के माध्यम से गैर-राजस्व जल हानि को कम करने तथा ऊर्जा ग्रिड के गतिशील प्रबंधन के द्वारा चरम मांग स्थितियों को संतुलित करने में सहायक होता है।
- इस प्रकार, शासन प्रणाली प्रतिक्रियात्मक के स्थान पर सक्रिय एवं पूर्वानुमान-आधारित बन जाती है, जिससे शहरी प्रणालियों की परिचालन दक्षता में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।
- समावेशी ‘यथास्थान’ झुग्गी बस्ती पुनर्विकास: सतत शहरी विकास के लिये सामाजिक समावेशिता अनिवार्य है; अतः शहरों को अनौपचारिक बस्तियों के परिधीय पुनर्वास के बजाय ‘यथास्थान (on-site) पुनर्विकास’ को प्राथमिकता देनी चाहिये।
- भूमि स्वामित्व सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए तथा ऊर्ध्वाधर सामाजिक आवास को पाइपयुक्त मूलभूत सेवाओं एवं हरित ऊर्जा के साथ एकीकृत करने से ‘शहरी मरुस्थल’ बनने की प्रवृत्ति को रोका जा सकता है तथा श्रमशक्ति को आर्थिक केंद्रों के निकट बनाए रखा जा सकता है।
- यह दृष्टिकोण शहरी गरीबों की सामाजिक पूंजी को संरक्षित रखते हुए घनी आबादी वाले क्षेत्रों में पर्यावरणीय गुणवत्ता एवं स्वच्छता मानकों में व्यापक सुधार सुनिश्चित करता है।
- माइक्रो-ग्रिड सोलरीकरण एवं ऊर्जा ‘प्रोसुमेरिज्म’: शहरी क्षेत्रों को निष्क्रिय ऊर्जा उपभोक्ताओं से सक्रिय ‘प्रोसुमेर’ (उत्पादक-उपभोक्ता) में रूपांतरित करने हेतु सभी वाणिज्यिक तथा ऊँची आवासीय इमारतों पर अनिवार्य रूफटॉप सोलर-हाइब्रिड प्रणालियों की स्थापना को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।
- स्थानीयकृत DC माइक्रो-ग्रिड का विकास, चरम मौसमी परिस्थितियों के दौरान होने वाली ग्रिड विफलताओं में ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करता है, साथ ही पारेषण एवं वितरण हानियों को भी न्यूनतम करता है।
- यह ऊर्जा उत्पादन का लोकतंत्रीकरण, जो नेट-मीटरिंग नीतियों द्वारा समर्थित है, प्रत्येक छत को एक उत्पादक हरित परिसंपत्ति में परिवर्तित कर देता है, जिससे शहरी क्षेत्रों के नवीकरणीय ऊर्जा मिश्रण में तीव्र वृद्धि संभव होती है।
- गैर-मोटर चालित परिवहन (NMT) एवं ‘संपूर्ण सड़कें’: शहरी परिवहन ढाँचे को पुनर्संरचित करते हुए प्रमुख सड़कों को ‘संपूर्ण सड़कों’ में विकसित किया जाना आवश्यक है, जहाँ सार्वजनिक परिवहन गलियारों के साथ-साथ साइकिलिंग एवं पैदल आवागमन हेतु समर्पित, सुरक्षित अवसंरचना उपलब्ध हो।
- यातायात प्रबंधन एवं सामरिक शहरीकरण के माध्यम से निजी वाहनों की तुलना में पैदल यात्रियों के ‘मार्गाधिकार’ को प्राथमिकता देना, ऐसे परिवहन प्रतिमान को बढ़ावा देता है जो जन स्वास्थ्य एवं वायु गुणवत्ता दोनों में सुधार करता है।
- सड़कों को केवल वाहनों के आवागमन का माध्यम मानने के स्थान पर साझा सार्वजनिक परिसंपत्ति के रूप में पुनर्परिभाषित करने से, शहर सामाजिक अंतःक्रिया, हरित भूदृश्य तथा समावेशी सार्वजनिक स्थानों के लिये बहुमूल्य शहरी स्थान का पुनः अधिग्रहण कर सकते हैं।
निष्कर्ष:
भारत में सतत शहरीकरण के लिये केवल भौतिक अवसंरचना निर्माण पर निर्भर रहने के स्थान पर नागरिक विश्वास पर आधारित सशक्त ‘नागरिक-राज्य समझौते’ की ओर अग्रसर होना आवश्यक है। स्थानीय निकायों को वित्तीय स्वायत्तता प्रदान करने के साथ-साथ स्पंज सिटी मॉडल जैसी जलवायु-अनुकूल रणनीतियों को अपनाकर भारत अपने जनसांख्यिकीय परिवर्तन को एक आर्थिक महाशक्ति में परिवर्तित कर सकता है। वर्ष 2047 के लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु डेटा-संचालित शासन एवं समावेशी सामाजिक आवास के माध्यम से विद्यमान संरचनात्मक बाधाओं को दूर करना आवश्यक है। अंततः भारतीय शहरों का भविष्य तीव्र तकनीकी आधुनिकीकरण तथा पारिस्थितिकी एवं संस्थागत विश्वसनीयता की पुनर्स्थापना के मध्य संतुलन स्थापित करने में निहित है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न भारतीय शहरीकरण की समस्याएँ मात्र अवसंरचनात्मक अभाव तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे नागरिक विश्वास की कमी एवं खंडित शासन व्यवस्था से भी गहराई से संबंधित हैं।" इस कथन का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. 'स्पंज सिटी' की अवधारणा क्या है?
यह एक शहरी डिज़ाइन रणनीति है, जिसमें वर्षा जल को अवशोषित और फिल्टर करने के लिये पारगम्य फुटपाथ और आर्द्रभूमि जैसे प्रकृति-आधारित समाधानों का उपयोग किया जाता है।
2. पीएम स्वनिधि वित्तीय समावेशन को कैसे बढ़ावा देती है?
यह योजना स्ट्रीट वेंडर्स को बिना किसी गारंटी के कार्यशील पूंजी ऋण प्रदान करके, डिजिटल लेनदेन के माध्यम से उन्हें औपचारिक साख निर्माण करने में सहायता करती है।
3. ‘ट्रांजिट-ओरिएंटेड डेवलपमेंट’ (TOD) क्या है?
यह एक नियोजन रणनीति है, जिसमें सार्वजनिक परिवहन केंद्रों के निकट उच्च घनत्व एवं मिश्रित उपयोग वाले क्षेत्र विकसित किये जाते हैं, जिससे निजी वाहनों पर निर्भरता कम होती है।
4. भारतीय शहरों के लिये 'गैर-राजस्व जल' (NRW) चिंता का विषय क्यों है?
यह उस जल को दर्शाता है जो रिसाव या चोरी के कारण नष्ट हो जाता है (औसतन 40–50%), जिससे शहरी जल सुरक्षा पर गंभीर दबाव पड़ता है।
5. शहरी शासन में 'डिजिटल ट्विन' क्या है?
यह किसी शहर की आभासी 3D प्रतिकृति होती है, जो रियल-टाइम डेटा के आधार पर यातायात, ऊर्जा तथा आपातकालीन प्रतिक्रिया का अनुकरण एवं अनुकूलन करती है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ)
प्रिलिम्स:
प्रश्न 1. भारत में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 के अनुसार, निम्नलिखित में से कौन-सा एक कथन सही है? (2019)
(a) अपशिष्ट उत्पादक को पाँच कोटियों में अपशिष्ट अलग-अलग करने होंगे।
(b) ये नियम केवल अधिसूचित नगरीय स्थानीय निकायों, अधिसूचित नगरों तथा सभी औद्योगिक नगरों पर ही लागू होंगे।
(c) इन नियमों में अपशिष्ट भराव स्थलों तथा अपशिष्ट प्रसंस्करण सुविधाओं के लिये सटीक और ब्यौरेवार मानदंड उपबंधित हैं।
(d) अपशिष्ट उत्पादक के लिये यह आज्ञापक होगा कि किसी एक ज़िले में उत्पादित अपशिष्ट, किसी अन्य ज़िले में न ले जाया जाए।
उत्तर: (c)
मेन्स
प्रश्न 1. क्या कमज़ोर और पिछड़े समुदायों के लिये आवश्यक सामाजिक संसाधनों को सुरक्षित करने के द्वारा, उनकी उन्नति के लिये सरकारी योजनाएँ, शहरी अर्थव्यवस्थाओं में व्यवसायों की स्थापना करने में उनको बहिष्कृत कर देती हैं? (2014)
प्रश्न 2. कई वर्षों से उच्च तीव्रता की वर्षा के कारण शहरों में बाढ़ की बारम्बारता बढ़ रही है। शहरी क्षेत्रा में बाढ़ के कारणों पर चर्चा करते हुए इस प्रकार की घटनाओं के दौरान जोखिम कम करने की तैयारियों की क्रियाविधि पर प्रकाश डालिये। (2016)