श्रमिक प्रदर्शन और श्रम सुधार | 17 Apr 2026

प्रिलिम्स के लिये: मजदूरी संहिता, 2019, औद्योगिक संबंध संहिता, 2020, सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020, उपजीविकाजन्य सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशा संहिता(OSH), 2020, गिग वर्कर

मेन्स के लिये: भारत में श्रम सुधार—विकास, उद्देश्य और चुनौतियाँ, असंगठित क्षेत्र एवं गिग अर्थव्यवस्था पर श्रम संहिताओं का प्रभाव, व्यवसाय करने में सुगमता तथा श्रमिक अधिकारों के बीच संतुलन।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

चर्चा में क्यों? 

नोएडा (उत्तर प्रदेश) और आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों में गिग और फैक्ट्री श्रमिकों की हड़तालों की एक लहर ने कम वेतन, नौकरी की असुरक्षा और खराब कार्य स्थितियों को लेकर गहरी चिंताओं को उजागर किया है, जिससे भारत की चार श्रम संहिताओं के कार्यान्वयन के लिये एक गंभीर चुनौती उत्पन्न हुई है।

सारांश

  • भारत में श्रमिकों के विरोध प्रदर्शन बढ़ती महंगाई और स्थिर वेतन, साथ ही न्यूनतम आधार वेतन में विलंबित संशोधन और क्षेत्रीय वेतन असमानताओं से प्रेरित हैं।
  • श्रम संहिताओं के प्रावधानों में निहित अस्पष्टता और उनके कार्यान्वयन में निरंतर विलंब ने पारिश्रमिक, कार्य-अवधि और विधिक सुरक्षा के संदर्भ में एक अनिश्चितता की स्थिति उत्पन्न कर दी है।
  • बढ़ती नौकरी असुरक्षा और शोषण, जिसमें संविदा रोज़गार, गिग श्रमिकों की अस्थिरता और लंबे कार्य घंटे शामिल हैं, ने असंतोष को और बढ़ा दिया है।

भारत में श्रमिकों के विरोध प्रदर्शन के क्या कारण हैं?

  • मुद्रास्फीति-आधारित वेतन क्षरण: न्यूनतम वेतन प्रणाली एक दो-घटक संरचना का पालन करती है, जिसमें एक आधार वेतन होता है जिसे हर पाँच वर्ष में संशोधित किया जाता है और एक परिवर्तनीय घटक (महंगाई भत्ता) होता है जो मुद्रास्फीति से जुड़ा होता है तथा जिसे उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (औद्योगिक श्रमिकों के लिये CPI-IW) का उपयोग करके वर्ष में दो बार अपडेट किया जाता है।
    • वर्ष 2021 से 2026 के बीच उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (औद्योगिक श्रमिकों के लिये CPI-IW) में लगभग 25% की वृद्धि हुई।
    • हालाँकि राज्यों ने मुद्रास्फीति से जुड़े घटक में संशोधन किया है, लेकिन उन्होंने आधार वेतन को अपडेट करने में देरी की है, जिसके परिणामस्वरूप समग्र वेतन वृद्धि अपर्याप्त रही है।
    • अप्रैल 2026 में हरियाणा में न्यूनतम वेतन में 35% की वृद्धि ने पड़ोसी क्षेत्रों जैसे नोएडा के श्रमिकों की अपेक्षाएँ बढ़ा दीं, जिससे विरोध प्रदर्शन और अधिक तेज़ हो गए।
    • इसके अतिरिक्त राज्यों के भीतर विभिन्न क्षेत्रों, जैसे– नोएडा, नगरपालिकाओं और उत्तर प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में वेतन स्तरों में क्षेत्रीय असमानताओं ने श्रमिकों के असंतोष को और बढ़ा दिया है।
    • विरोध प्रदर्शनों को आंशिक रूप से इस गलत धारणा ने भी बढ़ावा दिया कि नई श्रम संहिताएँ ₹20,000 का एक समान न्यूनतम वेतन सुनिश्चित करती हैं, जो एक केंद्रीय सरकारी अधिसूचना की गलत व्याख्या से उत्पन्न हुई थी।
  • मजदूरी संहिता, 2019 सभी कर्मचारियों के लिये, संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों में, न्यूनतम वेतन का एक वैधानिक अधिकार स्थापित करती है।
    • पहले न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम, 1948 केवल अनुसूचित रोज़गारों पर लागू होता था, जो लगभग 30% श्रमिकों को कवर करता था।
    • हालाँकि भारत का 90% से अधिक कार्यबल असंगठित क्षेत्र में काम करता है। प्रभावी प्रवर्तन के अभाव में न्यूनतम वेतन का वैधानिक अधिकार केवल कागज़ पर रह जाता है और इसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है।
  • अमेरिकी टैरिफ और वर्ष 2026 के पश्चिम एशिया संघर्ष से उत्पन्न उत्पादन लागत दबावों ने कारखानों के लाभ को संकुचित कर दिया है, जिससे मज़दूरी भुगतान में विलंब और कारखाने में रोज़गार असुरक्षा में वृद्धि सीधे उत्पन्न हुई है।
    • कारखाने के श्रमिक, मुख्य रूप से प्रवासी, बढ़ते स्थानीय किराए, खाद्य कीमतों और ब्लैक-मार्केट की आवश्यकताओं (जैसे– भारी मूल्य वृद्धि वाले LPG सिलेंडर) पर निर्भरता से असमान रूप से प्रभावित होते हैं।
  • कार्य के घंटों में "लचीलापन": नवीन उपजीविकाजन्य सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशा संहिता, 2020 दैनिक हस्तांतरण विनियमों को सख्त संसदीय कानून (पुराने कारखाना अधिनियम) से कार्यकारी नियमों के रूप में स्थापित करती है।
    • हालाँकि संहिता 48-घंटे के कार्य सप्ताह निर्धारित करती है, यह दैनिक कार्य घंटे, विश्राम अंतराल या विस्तार सीमा को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं करती है, जिससे भ्रम उत्पन्न होता है।
      • इसने कुछ नियोक्ताओं को प्रारूप संबंधी प्रावधानों का फायदा उठाकर 4-दिवसीय कार्य सप्ताह की आड़ में 12-घंटे की शिफ्ट लागू करने की अनुमति दी है, जिसमें प्रायः पर्याप्त ओवरटाइम का मुआवज़ा नहीं दिया जाता है।
    • चूँकि श्रम समवर्ती सूची का एक विषय है, राज्यों द्वारा नियमों को अंतिम रूप देने में विलंब ने एक ट्रांजिशनल ग्रे एरिया का निर्माण किया है, जिससे श्रमिकों का शोषण अधिक होने लगा है और कानूनी सुरक्षा प्रदान नहीं की गई है।
  • अस्थिरता का उदय और अधिकारों का क्षरण: औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 छँटनी, निर्वासन संबंधी मामलों में पूर्व सरकारी अनुमोदन के लिये सीमा को 100 से बढ़ाकर 300 श्रमिक कर देती है, जिसे राज्य और बढ़ाने के लिये सशक्त हैं।
    • हालाँकि इसका उद्देश्य अनुपालन को सरल बनाना और औपचारिकता को प्रोत्साहित करना है, यह रोज़गार की सुरक्षा में कमी और श्रमिकों की बढ़ती भेद्यता के बारे में चिंताएँ उत्पन्न करता है।
    • संहिता हड़तालों से पहले 60-दिन की अधिसूचना अवधि भी अनिवार्य करती है और सुलह कार्यवाही के दौरान हड़तालों को प्रतिबंधित करती है, जो कानूनी औद्योगिक कार्रवाई के दायरे को महत्त्वपूर्ण रूप से सीमित करती है।
    • इसके अतिरिक्त यह प्रमुख गतिविधियों के लिये निश्चित अवधि के रोज़गार (FTE) और अनुबंध श्रम के उपयोग को बढ़ावा देती है, जो संभावित रूप से स्थायी नौकरियों को उन भूमिकाओं से बदल देती है जो बहुत कम या कोई दीर्घकालिक सुरक्षा प्रदान करती हैं।
  • कमज़ोर सामूहिक सौदेबाज़ी: ट्रेड यूनियनों की मान्यता और सौदेबाज़ी प्रक्रियाएँ राज्यों पर छोड़ दी जाती हैं, जिससे श्रम प्रतिनिधित्व खंडित हो जाता है।
  • गिग और प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था संकट: प्लेटफॉर्म श्रमिक पीस-रेट वेज में एकतरफा बदलाव (जैसे– प्रति-डिलीवरी भुगतान कम करना) के कारण विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।
    • वे "एल्गोरिद्मिक अत्याचार" का सामना करते हैं जहाँ रेटिंग और डार्क-स्टोर सॉफ्टवेयर मानव संसाधन के बगैर उनकी कमाई को निर्धारित करते हैं।
    • प्लेटफॉर्म इन श्रमिकों को कर्मचारियों के बजाय "स्वतंत्र ठेकेदारों" या "भागीदारों" के रूप में वर्गीकृत करते हैं, जानबूझकर न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम, 1948 को दरकिनार करते हैं और पारंपरिक नियोक्ता देनदारियों से बचते हैं।

हड़ताल का अधिकार

  • हड़ताल का अधिकार बेहतर मज़दूरी, काम करने की स्थिति या श्रम प्रथाओं की मांग के लिये काम करने से श्रमिकों के सामूहिक इनकार को संदर्भित करता है और आमतौर पर राजनीतिक प्रणालियों में अंतिम उपाय के रूप में मान्यता प्राप्त है।
  • भारत में, जबकि विरोध करने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत एक मौलिक अधिकार है, हड़ताल का अधिकार एक मौलिक अधिकार नहीं है, बल्कि वैधानिक प्रतिबंधों के अधीन एक कानूनी अधिकार है।
    • इसे सर्वप्रथम ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 के तहत मान्यता दी गई थी और बाद में औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 द्वारा विनियमित किया गया, जिसे अब औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 में शामिल कर लिया गया है।
  • भारत में हड़ताल का अधिकार निरपेक्ष नहीं है और यह संघ निर्माण के मौलिक अधिकार से प्राप्त होता है, जो इसे राज्य द्वारा लगाए गए उचित प्रतिबंधों के अधीन बनाता है।
  • अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हड़ताल के अधिकार को अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के सम्मेलनों के तहत मान्यता प्राप्त है, जिसका भारत एक संस्थापक सदस्य है।

भारत की चार श्रम संहिताएँ क्या हैं?

  • श्रम संहिता: यह नियोक्ता-कर्मचारी के संबंधों को विनियमित करने वाले कानूनों का एक समेकित समूह है, जिसमें मज़दूरी, सामाजिक सुरक्षा, औद्योगिक संबंध और कार्यस्थल सुरक्षा शामिल है।
    • भारत के जटिल और पुराने श्रम नियामक ढाँचे को तर्कसंगत बनाने के लिये केंद्र सरकार ने 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को चार अलग-अलग संहिताओं (2019 और 2020 में पारित) में समेकित किया।
    • इसे कारोबारी सुगमता में सुधार करते हुए श्रमिक कल्याण की रक्षा के लिये डिज़ाइन किया गया था।
  • मजदूरी संहिता, 2019: इसके अंतर्गत चार प्रमुख कानूनों (मज़दूरी संदाय अधिनियम, 1936; न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम, 1948; बोनस संदाय अधिनियम, 1965 और समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976) को एकीकृत किया गया है।
    • यह मज़दूरी नियमों में एकरूपता लाती है, उचित और समय पर भुगतान सुनिश्चित करती है, लैंगिक समानता को बढ़ावा देती है और नियोक्ताओं के लिये अनुपालन को सरल बनाते हुए श्रमिकों के अधिकारों को सुदृढ़ करती है।
  • औद्योगिक संबंध संहिता, 2020: यह ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926, औद्योगिक रोज़गार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 और औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 जैसे पहले के कानूनों के प्रावधानों को जोड़ती और सरल बनाती है।
    • यह श्रमिक अधिकारों को औद्योगिक स्थिरता के साथ संतुलित करने का प्रयास करती है, जिसमें यूनियन की मान्यता, नियोजन शर्तें तथा विवाद समाधान पर नियमों को सुगम बनाने का समावेश है।
  • सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020: यह नौ मौजूदा कानूनों, जैसे– कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923; कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 तथा कर्मचारी भविष्य निधि एवं विविध उपबंध अधिनियम, 1952 को एक एकीकृत ढाँचे में समाहित करती है तथा असंगठित, गिग और प्लेटफॉर्म क्षेत्र के श्रमिकों सहित सभी कामगारों को लाभ प्रदान करती है।
    • यह मातृत्व, स्वास्थ्य, जीवन बीमा तथा भविष्य निधि से संबंधित लाभों को शामिल करती है, साथ ही डिजिटल प्रक्रियाओं को बढ़ावा देती है और अनुपालन को अधिक सरल बनाती है।
  • उपजीविकाजन्य सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशा संहिता, 2020: यह 13 श्रम कानूनों, जैसे– कारखाना अधिनियम, 1948; प्लांटेशन श्रम अधिनियम, 1951 तथा खान अधिनियम, 1952 को एकीकृत करती है।
    • इस संहिता का उद्देश्य सुरक्षित कार्य परिस्थितियाँ सुनिश्चित करना है, साथ ही व्यवसायों के लिये अनुपालन को सरल बनाकर एक अधिक कुशल, न्यायसंगत और भविष्य-उन्मुख श्रम ढाँचा तैयार करना है।

India’s_Four_Labour_Codes

श्रम सुधारों को सुदृढ़ करने के उपाय क्या हैं?

  • गिग श्रमिकों के लिये राजस्थान मॉडल अपनाना: केंद्र सरकार को राजस्थान प्लेटफॉर्म आधारित गिग श्रमिक (पंजीकरण एवं कल्याण) अधिनियम, 2023 पर विचार करना चाहिये। इसके अंतर्गत एक कल्याण बोर्ड की स्थापना की गई है, जिसमें गिग श्रमिकों का अनिवार्य प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया गया है तथा सभी प्लेटफॉर्म लेन-देन की एल्गोरिद्मिक ट्रैकिंग के माध्यम से स्वचालित रूप से एक कल्याण उपकर (cess) की कटौती की जाती है।
  • एल्गोरिद्मिक पारदर्शिता: एग्रीगेटर कंपनियों को यह अनिवार्य किया जाना चाहिये कि वे मज़दूरी निर्धारण एल्गोरिद्म, दंडात्मक मानकों (Penalization Metrics) तथा कार्य-घंटों से संबंधित डेटा श्रम मंत्रालय के साथ साझा करें, ताकि शोषण को रोका जा सके।
    • भौतिक ‘इंस्पेक्टर राज’ से आगे बढ़ते हुए सरकार को डेटा-आधारित और जोखिम-प्रोफाइल आधारित निरीक्षण प्रणालियों में निवेश करना चाहिये। डिजिटल वेतन भुगतान और इलेक्ट्रॉनिक रोज़गार अभिलेखों को अनिवार्य करने से अनुपालन में उल्लेखनीय सुधार किया जा सकता है।
  • राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन को बाध्यकारी बनाना: राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन को सभी राज्यों पर सख्ती से लागू किया जाना चाहिये तथा इसे उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के आधार पर समय-समय पर गतिशील रूप से संशोधित किया जाना चाहिये।
    • राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन को ‘गोल्डीलॉक्स’ स्तर पर निर्धारित किया जाना चाहिये, इतना बाध्यकारी कि यह श्रमिकों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सके और साथ ही इतना संतुलित कि नियोक्ता बिना रोज़गार में कटौती का सहारा लिये इसे वहन कर सकें।
  • त्रिपक्षवाद को सुदृढ़ करना: औद्योगिक शांति की आधारशिला त्रिपक्षीय मॉडल (राज्य, नियोक्ता, कर्मचारी) है।
    • सरकार को चार श्रम संहिताओं के नियमों पर सहमति बनाने के लिये भारतीय श्रम सम्मेलन (ILC) को सक्रिय रूप से पुनरुज्जीवित करना चाहिये।

निष्कर्ष 

वर्तमान असंतोष यह दर्शाता है कि ज़मीनी स्तर पर सुरक्षा के बिना किये गए श्रम सुधार गुणवत्तापूर्ण रोज़गार सृजन करने के बजाय अस्थिरता (प्रिकैरिटी) को बढ़ा सकते हैं। जब तक नौकरी की सुरक्षा, गिग वर्कर्स के अधिकार और प्रवर्तन में कमियों जैसे मुद्दों का समाधान नहीं किया जाता, तब तक ये संहिताएँ कागज़ पर उद्योग-हितैषी तो प्रतीत होंगी, लेकिन व्यवहार में अप्रभावी बनी रहेंगी। भारत के सामने चुनौती यह है कि वह अपने कार्यबल की कीमत पर नहीं, बल्कि गरिमा के साथ विकास सुनिश्चित करे।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. भारत की चार श्रम संहिताएँ क्या हैं?
 29 श्रम कानूनों को समेकित करके चार संहिताएँ बनाई गई हैं, जो वेतन, औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा और कार्यस्थल सुरक्षा को कवर करती हैं। 

2. औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 को लेकर मुख्य चिंता क्या है? 
यह छँटनी के लिये बिना अनुमति की सीमा को 300 श्रमिकों तक बढ़ाती है, जिससे नौकरी की सुरक्षा प्रभावित होती है। 

3. सामाजिक सुरक्षा संहिता गिग वर्कर्स को कैसे संबोधित करती है?
यह गिग वर्कर्स को मान्यता देती है, लेकिन उन्हें कर्मचारी का दर्जा नहीं देती, जिससे उनकी मूल श्रम अधिकारों तक पहुँच सीमित हो जाती है। 

4. OSH संहिता की आलोचना क्यों की जाती है?
उच्च सीमा (थ्रेशहोल्ड) के कारण अनौपचारिक क्षेत्र के लाखों श्रमिक इससे बाहर रह जाते हैं, जिससे वे सुरक्षा प्रावधानों से वंचित हो जाते हैं। 

5. श्रम संहिताओं के कार्यान्वयन में मुख्य चुनौती क्या है?
समवर्ती सूची में होने के कारण राज्यों के स्तर पर नियमों में देरी होती है, जिससे कानूनी अनिश्चितता उत्पन्न होती है। 

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रिलिम्स 

प्रश्न. भारत में, निम्नलिखित में कौन एक, उन फैक्टरियों में जिनमें कामगार नियुक्त हैं, औद्योगिक विवादों, समापनों, छँटनी और कामबंदी के विषय में सूचनाओं को संकलित करता है? (2022)

(a) केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय

(b) उद्योग संवर्द्धन और आंतरिक व्यापार विभाग

(c) श्रम ब्यूरो

(d) राष्ट्रीय तकनीकी जनशक्ति सूचना प्रणाली

उत्तर: (c)


मेन्स 

प्रश्न. भारत में श्रम बाज़ार सुधारों के संदर्भ में, चार 'श्रम संहिताओं' के गुण व दोषों की विवेचना कीजिये। इस संबंध में अभी तक क्या प्रगति हुई है? (2024)