आधार वर्ष 2022-23 के साथ भारत की नई GDP शृंखला | 03 Mar 2026
प्रिलिम्स के लिये: सकल घरेलू उत्पाद (GDP), सकल स्थिर पूंजी निर्माण (GFCF), निजी अंतिम उपभोग व्यय (PFCE), राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO), राष्ट्रीय लेखा प्रणाली 2008 (SNA 2008), राजकोषीय घाटा।
मेन्स के लिये: आधार वर्ष संशोधन और राष्ट्रीय आय लेखांकन में इसका महत्त्व, राजकोषीय सुदृढ़ीकरण और मौद्रिक GDP की गतिशीलता, अनौपचारिक, गिग और डिजिटल अर्थव्यवस्था का मापन।
चर्चा में क्यों?
सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने आधार वर्ष 2022-23 के साथ वार्षिक और तिमाही राष्ट्रीय लेखा अनुमानों की नई शृंखला जारी की है, जिसने पूर्ववर्ती 2011-12 आधार वर्ष का स्थान लिया है। यह सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के मापन की पद्धति में एक महत्त्वपूर्ण अद्यतन/अपडेट को चिह्नित करता है।
सारांश
भारत ने GDP का आधार वर्ष 2022–23 कर दिया है, जिसमें उन्नत आँकड़ा स्रोतों तथा डबल डिफ्लेशन एवं SUT ढाँचा जैसी परिष्कृत पद्धतियों का समावेश किया गया है। वित्त वर्ष 2025-26 में वास्तविक GDP 7.6% रहने का अनुमान है, जो सतत संवृद्धि तथा बेहतर क्षेत्रीय कवरेज को परिलक्षित करता है।
संशोधित शृंखला के परिणामस्वरूप मौद्रिक GDP में 3–4% की कमी दर्ज हुई है, जिससे राजकोषीय घाटा एवं ऋण-से-GDP अनुपात के लक्ष्य अधिक दृढ़ हो गए हैं। साथ ही 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य अब वृद्धि दर तथा विनिमय दर के प्रति अधिक संवेदनशील हो गया है। यह परिदृश्य PPI की शुरुआत एवं WPI के पुनरीक्षण जैसे संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है।
आधार वर्ष 2022–23 वाली नई GDP शृंखला की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं?
- वास्तविक GDP वृद्धि: वित्तीय वर्ष 2025-26 में इसके 7.6% की दर से बढ़ने का अनुमान है (जो 2011-12 आधार वर्ष के अनुमानों की तुलना में ऊपर की ओर संशोधित है)।
- अर्थव्यवस्था ने वित्तीय वर्ष 2023-24 और 2024-25 में क्रमशः 7.2% और 7.1% की वृद्धि के साथ सतत प्रदर्शन प्रदर्शित किया।
- मौद्रिक GDP वृद्धि: वित्तीय वर्ष 2025-26 में 8.6% की वृद्धि दर्ज की गई।
- इससे पूर्व वित्तीय वर्ष 2023-24 और 2024-25 में मौद्रिक GDP की वृद्धि दर क्रमशः 11.0% और 9.7% रही थी।
- तिमाही प्रदर्शन के प्रेरक कारक: वित्तीय वर्ष 2025-26 में समग्र आर्थिक प्रदर्शन मुख्यतः द्वितीय तिमाही (8.4%) और तृतीय तिमाही (7.8%) में सशक्त वास्तविक वृद्धि से प्रेरित रहा।
- विनिर्माण क्षेत्र: आधार वर्ष परिवर्तन (Rebasing) के बाद लगातार तीन वित्तीय वर्षों तक आर्थिक स्थिरता का प्रमुख चालक बनकर उभरा तथा वित्तीय वर्ष 2023-24 और 2025-26 में द्वि-अंकीय वृद्धि दर प्राप्त की।
- द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्र: वित्तीय वर्ष 2025-26 में 9.0% से अधिक की वृद्धि दर दर्ज कर अर्थव्यवस्था को उल्लेखनीय प्रोत्साहन प्रदान किया।
- विशिष्ट सेवा उप-क्षेत्र: ‘व्यापार, मरम्मत, होटल, परिवहन, संचार तथा प्रसारण एवं भंडारण से संबंधित सेवाएँ’ क्षेत्र ने वित्तीय वर्ष 2025-26 में स्थिर मूल्यों पर 10.1% की उल्लेखनीय वृद्धि दर प्राप्त की।
- उपभोग और निवेश: मांग पक्ष पर, निजी अंतिम उपभोग व्यय (PFCE) तथा सकल स्थिर पूंजी निर्माण (GFCF) दोनों ने वित्तीय वर्ष 2025-26 में 7.0% से अधिक की वृद्धि दर प्रदर्शित की।
GDP का आधार वर्ष 2022-23 में क्यों संशोधित किया गया?
- कोविड-19 के बाद एक ‘सामान्य’ वर्ष को प्रतिबिंबित करना: वर्ष 2022-23 को इसलिये चुना गया क्योंकि यह कोविड-19 से उत्पन्न व्यवधानों के बाद का नवीनतम सामान्य वर्ष माना जाता है।
- वर्ष 2019-20 और 2020-21 लॉकडाउन, आपूर्ति शृंखला में व्यवधान तथा असामान्य उपभोग और उत्पादन पैटर्न के कारण अत्यधिक विकृत रहे।
- आधार वर्ष के रूप में 2022-23 का उपयोग यह सुनिश्चित करता है कि वृद्धि की तुलना एक स्थिर आर्थिक परिवेश पर आधारित हो।
- क्षेत्रीय कवरेज: पिछले एक दशक में भारत की अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय परिवर्तन हुए हैं।
- नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार हुआ है, डिजिटल एवं प्लेटफॉर्म-आधारित सेवाएँ तीव्र गति से विकसित हुई हैं, नियोजित घरेलू कामगारों की संख्या में वृद्धि हुई है तथा गिग अर्थव्यवस्था अधिक प्रमुखता से उभरी है।
- उपभोग एवं निवेश के प्रतिरूपों में भी परिवर्तन आया है, जबकि प्रौद्योगिकी के व्यापक उपयोग ने विभिन्न क्षेत्रों में उत्पादकता को बढ़ाया है।
- आधार वर्ष परिवर्तन से GDP के आकलन इन उभरते क्षेत्रों के योगदान तथा सापेक्ष मूल्यों में आए परिवर्तनों को अधिक सटीक रूप से परिलक्षित कर सकते हैं।
- सुधारित एवं नियमित आवधिक डेटा स्रोत: संशोधित शृंखला में अनेक नवीन एवं अधिक समृद्ध आँकड़ा स्रोतों को सम्मिलित किया गया है, जिससे परोक्ष संकेतकों तथा अप्रचलित मानक आधारों पर निर्भरता में कमी आई है।
- पूर्व में, घरेलू क्षेत्र के आकलन मुख्यतः परोक्ष संकेतकों एवं आधार सर्वेक्षणों के मध्य की वृद्धि दरों पर आधारित थे।
- संशोधित शृंखला में वास्तविक स्तरों का आकलन नियमित वार्षिक सर्वेक्षणों, जैसे– असंगठित क्षेत्र के उद्यमों का वार्षिक सर्वेक्षण (ASUSE) और आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) से प्राप्त आँकड़ों के आधार पर किया गया है, जिससे इस क्षेत्र के प्रदर्शन का अधिक सटीक और समयबद्ध मापन संभव हो सका है।
- विनिर्माण और सेवाओं हेतु GST डेटा/आँकड़ों का व्यापक उपयोग, जिसमें राज्य-स्तरीय आवंटन और तिमाही अनुमानों को भी शामिल किया गया है।
- सड़क परिवहन सेवाओं पर निजी अंतिम उपभोग व्यय (PFCE) का अनुमान लगाने के लिये e-वाहन पोर्टल के डेटा का उपयोग किया जाता है, जिससे घरेलू खपत के मापन में सुधार होता है।
- सार्वजनिक वित्त प्रबंधन प्रणाली (PFMS) के डेटा का उपयोग केंद्रीय सरकार के खातों को राज्यों में संकलित और वितरित करने के लिये किया जाता है, जिससे संशोधित अनुमानों पर निर्भर रहने के बजाय प्रथम संशोधित अनुमानों के चरण में वास्तविक व्यय आँकड़ों का उपयोग किया जा सके।
- जिससे संशोधित अनुमानों पर निर्भर रहने की बजाय पहले संशोधित अनुमानों (First Revised Estimates) चरण में वास्तविक व्यय आंकड़ों का उपयोग किया जा सके।
- कृषि, मत्स्य पालन, डेयरी और परिवहन क्षेत्रों में अद्यतन क्षेत्र-विशेष अध्ययन। इन परिवर्द्धनों से डेटा की विस्तारशीलता, समयानुकूलता और विश्वसनीयता बेहतर होती है।
- पूर्व में, घरेलू क्षेत्र के आकलन मुख्यतः परोक्ष संकेतकों एवं आधार सर्वेक्षणों के मध्य की वृद्धि दरों पर आधारित थे।
- पद्धति की सुदृढ़ता बढ़ाएँ: नए आधार वर्ष के साथ कई महत्त्वपूर्ण पद्धतिगत सुधार लागू किये गए हैं:
- परिष्कृत मूल्यस्फीति समायोजन तकनीक: निर्माण और कृषि में अब डबल डिफ्लेशन (उत्पादन और इनपुट की कीमतों का अलग-अलग समायोजन) लागू किया जाता है, जबकि अन्य क्षेत्रों में सिंगल एक्सट्रापोलेशन (केवल एक उत्पादन संकेतक का उपयोग कर वृद्धि का अनुमान) का उपयोग किया जाता है।
- सिंगल डिफ्लेशन को समाप्त कर दिया गया है। डिफ्लेटरों को अधिक सूक्ष्म स्तर पर लागू किया जाता है, जिसमें 260 से अधिक वस्तु-स्तरीय उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) शामिल हैं।
- सप्लाई और यूज़ टेबल (SUT) ढाँचा: राष्ट्रीय लेखा प्रणाली 2008 (SNA 2008) के दिशा-निर्देशों के अनुसार, नई GDP शृंखला में SUT ढाँचे को व्यवस्थित रूप से शामिल किया गया है और उत्पाद-संतुलन सिद्धांत (कुल आपूर्ति = कुल उपयोग) लागू किया गया है।
- इससे सांख्यिकीय विसंगतियाँ कम होती हैं और GDP के अनुमान अधिक सुसंगत तथा विश्वसनीय बनते हैं।
- बहु-गतिविधि कंपनियों का पृथक्करण: बहु-गतिविधि कंपनियों का मूल्य संवर्द्धन अब विस्तृत कॉर्पोरेट फाइलिंग का उपयोग करके विभिन्न गतिविधियों में वितरित किया जाता है।
- PFCE के बेहतर अनुमान: निजी अंतिम उपभोग व्यय (PFCE) का अनुमान अब एक मिश्रित दृष्टिकोण के माध्यम से मज़बूत किया गया है, जिसमें गृहस्थी सर्वेक्षण डेटा, प्रशासनिक रिकॉर्ड, वस्तु प्रवाह विधि और 2018 के अनुसार व्यक्तिगत खपत वर्गीकरण (COICOP) का उपयोग शामिल है।
- परिष्कृत मूल्यस्फीति समायोजन तकनीक: निर्माण और कृषि में अब डबल डिफ्लेशन (उत्पादन और इनपुट की कीमतों का अलग-अलग समायोजन) लागू किया जाता है, जबकि अन्य क्षेत्रों में सिंगल एक्सट्रापोलेशन (केवल एक उत्पादन संकेतक का उपयोग कर वृद्धि का अनुमान) का उपयोग किया जाता है।
- GSDP अनुमान को मज़बूत करना: GDP के आधार वर्ष को 2022–23 में संशोधित करने से GSDP के अनुमान को भी मज़बूत किया गया है।
- MoSPI के अंतर्गत कार्यरत राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) यह सुनिश्चित करता है कि राज्य समान राष्ट्रीय लेखांकन मानकों का पालन करें।
- नए आधार वर्ष के साथ, राज्य अधिक सीधे अनुमानों की ओर बढ़ेंगे, निश्चित अनुपात और अनुमानित संकेतकों पर निर्भरता कम करेंगे तथा राज्य-स्तरीय डेटा का बेहतर उपयोग करेंगे, जिससे राज्यों के बीच सटीकता एवं तुलना योग्य होने में सुधार होगा।
नई GDP शृंखला (आधार वर्ष 2022–23) के निहितार्थ क्या हैं?
- मौद्रिक GDP में संकुचन: नए सांख्यिकीय ढाँचे के कारण वित्तीय वर्ष 2025–26 तथा उससे पूर्व के तीन वर्षों के लिये भारत के मौद्रिक सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 3% से 4% तक की कमी दर्ज की गई है।
- राजकोषीय घाटा लक्ष्यों पर दबाव: राजकोषीय घाटा की गणना मौद्रिक GDP के प्रतिशत के रूप में की जाती है, इसलिये छोटी मौद्रिक GDP पिछले और वर्तमान वर्षों के लिये घाटा अनुपात को गणितीय रूप से बढ़ा देती है।
- वर्ष 2025–26 का राजकोषीय घाटा लक्ष्य प्रारंभ में पुरानी शृंखला के आधार पर 4.4% निर्धारित किया गया था। नई, घटाई गई मौद्रिक GDP लागू करने पर यह अनुपात बढ़कर 4.5% हो जाता है।
- 2026–27 वित्तीय वर्ष के लिये लक्षित 4.3% राजकोषीय घाटा हासिल करने हेतु अब अर्थव्यवस्था को लगभग 13% से 14% की विशाल सांकेतिक वृद्धि दर की आवश्यकता होगी।
- यह केंद्रीय बजट 2026–27 में निर्धारित 10% की अनुमानित दर से उल्लेखनीय रूप से अधिक है, जो संकेत देता है कि सरकार को अपनी उधारी रणनीतियों को तेज़ी से पुन: समायोजित करने की आवश्यकता हो सकती है।
- ऋण-से-GDP अनुपात में वृद्धि: अर्थव्यवस्था के आकार में कमी राष्ट्रीय ऋण-से-GDP अनुपात पर नकारात्मक प्रभाव डालती है।
- नई शृंखला के तहत 2025–26 के लिये केंद्र का ऋण अनुपात अनुमानित रूप से 56.2% से बढ़कर 58.1% हो जाएगा।
- वर्तमान गणनाओं के अनुसार, भले ही वर्ष 2026–27 में सांकेतिक वृद्धि सफलतापूर्वक 10% तक पहुँच जाए, यह अनुपात लगभग 57.5% के आसपास रहेगा, जो सरकार के 55.6% के लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाएगा।
- USD 4 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था के लक्ष्य के लिये चुनौतियाँ: 2025–26 में भारत की GDP लगभग 3.8 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर थी।
- वर्ष 2026–27 में USD 4 ट्रिलियन का आँकड़ा पार करना अभी भी संभव है, लेकिन इसके लिये त्रुटि की बहुत कम गुंजाइश रहती है और कम-से-कम 10% की सांकेतिक वृद्धि की आवश्यकता होगी।
- यह लक्ष्य विनिमय दर के प्रति भी अत्यंत संवेदनशील है, क्योंकि रुपये के और मूल्यह्रास से मज़बूत घरेलू वृद्धि के बावजूद इसे हासिल करना और कठिन हो जाएगा।
- क्षेत्रीय पुनर्संरेखण: कृषि क्षेत्र का अब अनुमानित आकार लगभग 5% बढ़ गया है, इसका कारण उच्च-मूल्य वाली फसलों का बेहतर समावेशन और कम इनपुट लागत है, जिसमें PM-कुसुम जैसी योजनाओं के तहत सौर ऊर्जा के बढ़ते उपयोग को भी शामिल किया गया है।
भारत के आर्थिक मापन ढाँचे को और उन्नत बनाने के लिये कौन-कौन से उपाय आवश्यक हैं?
- उत्पादक मूल्य सूचकांक (PPI) लागू करना: भारत वर्तमान में मुख्य रूप से उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) और थोक मूल्य सूचकांक (WPI) पर निर्भर करता है।
- प्रो. बी.एन. गोलदार (2014) की अध्यक्षता वाले कार्यसमूह द्वारा सिफारिश के अनुसार, PPI को लागू करने से घरेलू उत्पादकों को उनके उत्पादन के लिये प्राप्त बिक्री मूल्यों में औसत बदलाव का अधिक सटीक मापन मिलेगा और भारत को वैश्विक मानकों के साथ संरेखित किया जा सकेगा।
- WPI आधार वर्ष का पुनरीक्षण तेज़ करना: जबकि CPI और IIP के आधार वर्ष को अपडेट किया जा रहा है, WPI का आधार वर्ष पुनरीक्षण भी शीघ्र पूरा किया जाना चाहिये, ताकि सभी क्षेत्रों में प्रयुक्त डिफ्लेटर वर्तमान बाज़ार वास्तविकताओं का सही प्रतिनिधित्व करें।
- वैश्विक संरेखण: संयुक्त राष्ट्र सांख्यिकी विभाग SNA 2025 (जिसे वैश्विक स्तर पर 2029–30 तक अपनाए जाने की उम्मीद है) की ओर संक्रमण कर रहा है।
- भारत को सक्रिय रूप से डेटा अवसंरचना का निर्माण करना होगा ताकि SNA 2025 को अपनाया जा सके, जिसमें डिजिटल अर्थव्यवस्था, क्रिप्टो संपत्तियाँ और पर्यावरण/ग्रीन लेखांकन के मापन के लिये विशेष दिशा-निर्देश शामिल हैं।
- बड़ी कंपनियों के पक्षपात को कम करना: कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय के डेटा पर अत्यधिक निर्भरता बड़ी कंपनियों के प्रदर्शन को अधिक दर्शा सकती है, जबकि समय पर रिटर्न न भरने वाले MSME (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों) का प्रदर्शन कम आँका जा सकता है।
- छोटे उद्यमों द्वारा जो मूल्य संवर्द्धन किया जाता है, उसे बेहतर ढंग से मापने के लिये उन्नत विधियों की आवश्यकता है।
आर्थिक शब्दावली
- सकल घरेलू उत्पाद (GDP): यह किसी देश की सीमा के भीतर एक लेखांकन अवधि में उत्पादित अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य होता है।
- समय के साथ GDP में होने वाले परिवर्तनों का अनुश्रवण करके यह आकलन किया जा सकता है कि अर्थव्यवस्था का विस्तार हो रहा है या संकुचन तथा जीवन स्तर में सुधार के संबंध में व्यापक निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।
- भारत राष्ट्रीय लेखा प्रणाली 2008 (SNA 2008) के अनुरूप सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का संकलन करता है तथा अगले आधार वर्ष के संशोधन में इसे राष्ट्रीय लेखा प्रणाली 2025 (SNA 2025) के अनुरूप बनाने की योजना है।
- IMF के विशेष डेटा प्रसार मानक (SDDS) का ग्राहक होने के नाते भारत सांख्यिकीय गुणवत्ता एवं पारदर्शिता के वैश्विक मानकों का पालन करता है तथा संशोधित GDP शृंखला अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सुसंगत बनी हुई है।
- त्रैमासिक GDP अनुमान: राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) और MoSPI बेंचमार्क-संकेतक पद्धति का उपयोग करके त्रैमासिक GDP अनुमानों की गणना करते हैं - यह एक मानक विधि है, जो विश्व भर में राष्ट्रीय लेखा प्रणाली (SNA) 2008 और IMF के त्रैमासिक राष्ट्रीय लेखा मैनुअल 2017 के बाद उपयोग की जाती है।
- यह विधि निम्नानुसार कार्य करती है:
- वार्षिक GDP अनुमान एक संदर्भ बिंदु/बेंचमार्क के रूप में कार्य करते हैं।
- मासिक या त्रैमासिक संकेतकों, जैसे– उच्च-आवृत्ति डेटा को त्रैमासिक GDP का अनुमान लगाने के लिये इन बेंचमार्क अनुमानों पर लागू किया जाता है।
- यह विधि निम्नानुसार कार्य करती है:
- आधार वर्ष: राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकी में परिभाषित आधार वर्ष, वह संदर्भ वर्ष है जिसकी कीमतों का उपयोग वास्तविक GDP वृद्धि की गणना करने और समय के साथ आर्थिक प्रदर्शन में परिवर्तन को मापने के लिये किया जाता है।
- पुनःआधारीकरण: यह बेहतर डेटा का उपयोग करके अर्थव्यवस्था के वर्तमान ढाँचे को प्रतिबिंबित करने के लिये आधार वर्ष को अद्यतन करने की प्रक्रिया है।
- नया आधार वर्ष GDP एवं CPI और IIP जैसे प्रमुख संकेतकों का अनुमान लगाने के लिये संदर्भ बिंदु (रेफेरेंस पॉइंट) बन जाता है।
- GSDP: यह एक वर्ष के दौरान राज्य की सीमाओं के भीतर उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य है।
- MoSPI के तहत NSO, GSDP का अनुमान लगाने के लिये दिशा-निर्देश जारी करता है और तकनीकी सहायता प्रदान करता है, जबकि प्रत्येक राज्य और केंद्रशासित प्रदेश में अर्थशास्त्र और सांख्यिकी निदेशालय बड़े पैमाने पर सामान्य स्रोतों से प्राप्त राज्य-स्तरीय डेटा का उपयोग करके GSDP संकलित करते हैं।
- COICOP: यह संयुक्त राष्ट्र-समर्थित घरेलू व्यय का अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ वर्गीकरण है।
- आपूर्ति और उपयोग सारणी (SUT): SUT ढाँचा यह ट्रैक करता है कि वस्तुएँ और सेवाएँ उत्पादन या आयात के माध्यम से अर्थव्यवस्था में कैसे प्रवेश करती हैं और उनका उपयोग उपभोग, निवेश या निर्यात के लिये कैसे किया जाता है।
- प्रत्येक उत्पाद के लिये कुल आपूर्ति को कुल उपयोग से जोड़कर, SUT फ्रेमवर्क GDP के उत्पादन, आय और व्यय के दृष्टिकोण को संतुलित करता है।
निष्कर्ष
वित्त वर्ष 2025-26 में 7.6% के वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में वृद्धि विकसित भारत के विज़न की ओर सुदृढ़ आर्थिक गति को दर्शाती है। वर्ष 2022-23 के आधार वर्ष में परिवर्तन बेहतर आँकड़ों और विधियों के साथ GDP मापन को आधुनिक बनाता है। साथ में ये सुधार भारत के सांख्यिकी की सटीकता, पारदर्शिता और वैश्विक विश्वसनीयता को मज़बूत करते हैं।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के आधार वर्ष का संशोधन एक तकनीकी अभ्यास है, जिसके महत्त्वपूर्ण राजकोषीय परिणाम हैं। भारत के वर्ष 2022–23 के पुनःआधार निर्धारण के संदर्भ में इस पर चर्चा कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. GDP आधार वर्ष को संशोधित कर 2022-23 क्यों किया गया?
महामारी के बाद के एक सामान्य वर्ष (post-pandemic normal year) को प्रतिबिंबित करने, संरचनात्मक आर्थिक परिवर्तनों को बेहतर डेटा स्रोतों के रूप में एकीकृत करने और SNA 2008 के तहत वैश्विक सांख्यिकीय मानकों के साथ संरेखित करने के लिये।
2. कम सकल घरेलू उत्पाद राजकोषीय घाटे के लक्ष्यों को कैसे प्रभावित करता है?
चूँकि राजकोषीय घाटे को GDP के प्रतिशत के रूप में मापा जाता है, कम अंकित GDP यांत्रिक रूप से घाटे के अनुपात को बढ़ाती है, जिससे राजकोषीय समेकन लक्ष्य सख्त हो जाते हैं।
3. आपूर्ति और उपयोग सारणी (SUT) फ्रेमवर्क का क्या महत्त्व है?
SUT यह सुनिश्चित करता है कि कुल आपूर्ति कुल उपयोग के बराबर हो, उत्पादन और व्यय अनुमानों में सामंजस्य स्थापित करता है और GDP में सांख्यिकीय विसंगतियों को कम करता है।
4. दोहरी अपस्फीति क्या है और यह महत्त्वपूर्ण क्यों है?
दोहरी अपस्फीति निर्गत और आगत मूल्यों को अलग-अलग समायोजित करती है, विशेष रूप से विनिर्माण और कृषि में अधिक सटीक वास्तविक मूल्य वर्द्धित अनुमान प्रदान करती है।
5. नई GDP शृंखला भारत के 4 ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य को कैसे प्रभावित करती है?
वर्ष 2025-26 में 3.8 ट्रिलियन डॉलर के सकल घरेलू उत्पाद के साथ, 4 ट्रिलियन डॉलर पार करना संभव है, लेकिन यह काफी हद तक अंकित वृद्धि और विनिमय दर की स्थिरता पर निर्भर है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रिलिम्स
प्रश्न 1. भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2015)
- पिछले दशक में वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर लगातार बढ़ती रही है।
- पिछले दशक में बाज़ार कीमतों पर (रुपयों में) सकल घरेलू उत्पाद लगातार बढ़ता रहा है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (b)
प्रश्न 2. किसी देश की कर से GDP के अनुपात में कमी क्या सूचित करती है? (2015)
- आर्थिक वृद्धि दर धीमी होना
- राष्ट्रीय आय का कम साम्यिक वितरण
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग करते हुए सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (a)
मेन्स
प्रश्न 1. संभाव्य GDP को परिभाषित कीजिये तथा उसके निर्धारकों की व्याख्या कीजिये, वे कौन-से कारक हैं जो भारत को अपने संभाव्य GDP से रोकते रहे हैं? (2020)
प्रश्न 2. भारत की सकल घरेलू उत्पाद के वर्ष 2015 के पूर्व और वर्ष 2015 के पश्चात् परिकलन विधि में अंतर की व्याख्या कीजिये। (2021)
