भारत में अवसंरचना वित्तपोषण | 20 Mar 2026
प्रिलिम्स के लिये: सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP), सिटी इकोनॉमिक रीजन (CER), विकास वित्तीय संस्थान (DFI), आंशिक क्रेडिट संवर्द्धन (PCE), केंद्रीय बजट 2026-27, राष्ट्रीय निवेश और अवसंरचना कोष, राष्ट्रीय अवसंरचना वित्तपोषण और विकास बैंक, UDAN योजना, अंतर्देशीय जलमार्ग, प्रगति प्लेटफॉर्म, InvITs, Reits, शहरी स्थानीय निकाय (ULB), राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन, ग्रीन हाइड्रोजन, अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र (IFSC), प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI)
मेन्स के लिये: अवसंरचना वित्तपोषण में परिवर्तन के प्रमुख स्तंभ, भारत में अवसंरचना विकास की स्थिति, भारत में अवसंरचना वित्तपोषण से संबंधित चुनौतियाँ और आगे की राह।
चर्चा में क्यों?
भारत में अवसंरचना क्षेत्र के विकास में एक अभूतपूर्व रूपांतरण दृष्टिगत हुआ है, इस क्षेत्र ने बजट पर निर्भर मॉडल के स्थान पर सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) और नवोन्मेषी वित्तीय साधनों के एक परिष्कृत पारितंत्र को अपनाया है।
सारांश
- भारत में अवसंरचना वित्तपोषण अब सीधे बजट पर निर्भर रहने से हटकर PPP-आधारित मॉडलों की ओर बढ़ गया है, जिसमें नेशनल इन्वेस्टमेंट एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड और नेशनल बैंक फॉर फाइनेंसिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर एंड डेवलपमेंट जैसी संस्थाएँ शामिल हैं।
- उच्च पूंजीगत व्यय (Capex) वृद्धि के बावजूद, भूमि से संबंधित विलंबन और निजी निवेश की कमी जैसी समस्याएँ बनी हुई हैं।
- भविष्य में ध्यान परिसंपत्ति मुद्रीकरण, जोखिम शमन और ग्रीन फाइनेंस पर रहेगा, ताकि USD 7 ट्रिलियन GDP लक्ष्य प्राप्त किया जा सके।
अवसंरचना वित्तपोषण में रूपांतरण के प्रमुख स्तंभ क्या हैं?
- पूंजीगत व्यय वृद्धि: सार्वजनिक पूंजीगत व्यय वित्त वर्ष 2014–15 में ₹2 लाख करोड़ से बढ़कर वित्त वर्ष 2026–27 में ₹12.2 लाख करोड़ (बजट अनुमान) हो गया है, जिससे आर्थिक मांग एवं रोज़गार सृजन पर व्यापक गुणक प्रभाव उत्पन्न हुआ है।
- शहरी विकास के इंजन: सिटी इकोनॉमिक रीजन (CER) की शुरुआत, जिनमें प्रत्येक हेतु ₹5,000 करोड़ का प्रावधान है, का उद्देश्य सुधार-आधारित ‘चैलेंज मोड’ के माध्यम से टियर-II एवं टियर-III शहरों (जनसंख्या 5 लाख से अधिक) का विकास करना है।
- संस्थागत आधार:
- NIIF (नेशनल इन्वेस्टमेंट एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड): यह 4.9 बिलियन USD की 'एसेट्स अंडर मैनेजमेंट' (AUM) का प्रबंधन करता है और ग्रीनफील्ड तथा ब्राउनफील्ड परियोजनाओं को वित्तपोषित करने के लिये वैश्विक सॉवरेन वेल्थ फंड्स (जैसे- टेमासेक) के साथ साझेदारी करता है।
- NaBFID (नेशनल बैंक फॉर फाइनेंसिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर एंड डेवलपमेंट): यह एक प्रमुख विकास वित्तीय संस्थान (DFI) के रूप में कार्य करता है, जो 'लॉन्ग-टर्म नॉन-रिकोर्स' वित्त प्रदान करता है और बॉण्ड रेटिंग में सुधार के लिये आंशिक क्रेडिट संवर्द्धन (PCE) की सुविधा देता है।
- IRFC (इंडियन रेलवे फाइनेंस कॉर्पोरेशन): यह रेलवे के एक समर्पित 'बाज़ार ऋण निकाय' के रूप में कार्य करता है, जो भारतीय रेलवे के लगभग 75% 'रोलिंग स्टॉक' का वित्तपोषण करता है।
- परिसंपत्ति मुद्रीकरण मॉडल:
- इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (InvITs) ने डेवलपर्स के लिये परिचालन संपत्तियों को एकत्र करने और उनके माध्यम से 1.5 लाख करोड़ रुपये जुटाने का मार्ग प्रशस्त किया है। इससे खुदरा निवेशकों को भी इन्फ्रास्ट्रक्चर से होने वाले लाभों तक पहुँच प्राप्त हुई।
- REITs (रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट): सरकारी स्वामित्व वाली अचल संपत्ति के मुद्रीकरण को सुगम बनाता है; केंद्रीय बजट 2026-27 में विशेषरूप से केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (CPSEs) के लिये समर्पित REITs की शुरुआत की गई थी।
- जोखिम न्यूनीकरण: इन्फ्रास्ट्रक्चर रिस्क गारंटी फंड की स्थापना का मुख्य उद्देश्य जोखिम को कम करना है। यह फंड उधारदाताओं को आंशिक गारंटी प्रदान करता है, जिससे निर्माण के प्रारंभिक चरण में जोखिम कम हो जाता है। इस प्रकार, यह फंड निजी पूंजी को प्रभावी ढंग से आकर्षित करने में सहायक होता है।
- ऋण बाज़ार सुधार: उपायों में पारदर्शिता के लिये इलेक्ट्रॉनिक बुक प्रोवाइडर (EBP) ढाँचा और वैश्विक जलवायु लक्ष्यों के साथ संतुलन स्थापित करने हेतु ESG वित्तपोषण उपकरणों (ग्रीन एंड सस्टेनेबिलिटी बॉण्ड्स) का शुभारंभ शामिल है।
भारत में अवसंरचना विकास की स्थिति
- सड़कें और राजमार्ग: वर्ष 2014 के बाद से भारत के राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क में 60% से अधिक की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। इस विस्तार के साथ वर्ष 2025 के अंत तक देश में राष्ट्रीय राजमार्गों की कुल लंबाई 1,46,572 किलोमीटर तक पहुँच गई है।
- वर्ष 2014 में मात्र 93 किलोमीटर की तुलना में, नियंत्रित पहुँच वाले एक्सप्रेसवे का नेटवर्क आज 5,000 किलोमीटर से अधिक हो गया है। इस नेटवर्क का निर्माण औसतन 33-34 किलोमीटर प्रतिदिन की प्रभावशाली गति से जारी है।
- रेलवे आधुनिकीकरण: ब्रॉडगेज नेटवर्क 99-100% विद्युतीकृत है और वंदे भारत रेल सेवा के तहत वर्ष 2026 की शुरुआत से 160 से अधिक ट्रेनें परिचालन में है। केंद्रीय बजट 2026-27 में 7 नए हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर (जैसे- मुंबई-पुणे, दिल्ली-वाराणसी) की घोषणा की गई है, जो ‘ग्रोथ कनेक्टर’ के रूप में कार्य करेंगे।
- विमानन: परिचालन में मौजूद हवाई अड्डों की संख्या वर्ष 2014 में 74 से बढ़कर 2025 तक 164 हो गई है और UDAN योजना के तहत अगले दशक में 120 और हवाई अड्डे जोड़ने की योजना है।
- बंदरगाह: कुल बंदरगाह क्षमता वर्ष 2014 में 1,400 मिलियन मीट्रिक टन से बढ़कर वर्ष 2025 में 2,762 मिलियन मीट्रिक टन प्रतिवर्ष हो गई है, जो लगभग दोगुनी है। राष्ट्रीय जलमार्ग परियोजना के तहत, 111 जलमार्गों को राष्ट्रीय जलमार्ग (NW) घोषित किया गया है।
- सिटी इकोनॉमिक रीजन (CER) पहल: वर्ष 2026 में शुरू की गई यह एक महत्त्वपूर्ण पहल है, जिसका मुख्य उद्देश्य 5 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों पर ध्यान केंद्रित करना है। इसके तहत, समूह-आधारित विकास को प्रोत्साहित करने के लिये, 'चैलेंज मोड' का उपयोग करते हुए 5 वर्षों की अवधि में प्रत्येक क्षेत्र को 5,000 करोड़ रुपये प्रदान किये जाएँगे।
- डिजिटल और हरित परिवर्तन: डेटा सेंटर (5 मेगावाट से अधिक क्षमता वाले) और ऊर्जा भंडारण प्रणालियों को अब ‘बुनियादी ढाँचे’ का दर्जा प्राप्त है, जिससे उन्हें AI-संचालित प्रबंधन एवं जलवायु-अनुकूल विकास को बढ़ावा देने के लिये वर्ष 2047 तक कर छूट का लाभ प्राप्त होगा।
भारत में अवसंरचना वित्तपोषण से जुड़ी चुनौतियाँ क्या हैं?
- सार्वजनिक निधि पर निर्भरता: वर्ष 2030 तक भारत की GDP को USD 7 ट्रिलियन तक विस्तारित करने हेतु अवसंरचना विकास में अनुमानतः USD 2.2 ट्रिलियन निवेश आवश्यक है। भारत में अवसंरचना के विकास में निजी क्षेत्र हेतु निवेश अवसर USD 103 बिलियन से USD 324 बिलियन के मध्य है।
- हालाँकि, निजी पूंजी का पर्याप्त उपयोग नहीं हो पा रहा है, जहाँ संस्थागत निवेशक (बीमा तथा पेंशन निधि) कथित जोखिमों के कारण अवसंरचना क्षेत्र में केवल लगभग 6% ही निवेश कर रहे हैं।
- भूमि अधिग्रहण अवरोध: परियोजनाओं में विलंब का सबसे बड़ा कारण भूमि संबंधी मुद्दे हैं, जो प्रगति प्लेटफॉर्म के अंतर्गत समीक्षित लगभग 35% अपूर्ण परियोजनाओं के अवरोधों के लिये उत्तरदायी हैं तथा उच्च लागत (ग्रामीण क्षेत्रों में बाज़ार मूल्य का 4 गुना तक) एवं स्वामित्व विवाद प्रमुख बाधाएँ हैं।
- बैंकिंग क्षेत्र में परिसंपत्ति-देयता असंतुलन: बैंक मुख्य रूप से अल्पकालिक जमा पर निर्भर होते हैं, जबकि अवसंरचना परियोजनाओं के लिये 20-30 वर्षों की अवधि वाले ऋणों की आवश्यकता होती है। यह संरचनात्मक असंतुलन प्रणालीगत अस्थिरता के जोखिम के बिना नई परियोजनाओं को वित्तपोषित करने की बैंकिंग क्षेत्र की क्षमता को सीमित करता है।
- कम जोखिम वाले परिसंपत्ति मॉडल बनाम उच्च जोखिम वाले परिसंपत्ति मॉडल: निजी भागीदारी सीमित रखने वाले ‘कम जोखिम वाले’ मॉडलों की ओर एक निरंतर रुझान देखा जा रहा है। वैश्विक निवेशक प्रारंभिक निर्माण जोखिमों से बचते हुए ‘ब्राउनफील्ड’ परिसंपत्तियों (जैसे- InvITs एवं REITs) को प्राथमिकता देते हैं।
- म्युनिसिपल बॉण्ड बाज़ार की नाजुक स्थिति: केंद्रीय एवं राज्य वित्तपोषण सुदृढ़ होने के बावजूद, म्युनिसिपल बॉण्ड बाज़ार अभी भी सीमित है। शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी) के पास अक्सर स्वतंत्र पूंजी जुटाने के लिये आवश्यक क्रेडिट रेटिंग या वित्तीय पारदर्शिता की कमी होती है, जिसके कारण वे सरकारी अनुदानों पर अत्यधिक निर्भर रहते हैं।
- परियोजना की अपर्याप्त तैयारी और ऋणयोग्यता: कई परियोजनाओं में ठोस व्यवहार्यता अध्ययन, जोखिम का विस्तृत आवंटन या यथार्थवादी राजस्व मॉडल का अभाव होता है, जिसके परिणामस्वरूप परियोजनाओं में विलंब, लागत में वृद्धि और वित्तपोषण संबंधी संघर्ष उत्पन्न होता है। अपर्याप्त प्रारंभिक जोखिम निवारण उपायों से ऋणदाता और निवेशक हतोत्साहित होते हैं।
भारत में संधारणीय अवसंरचना वित्तपोषण सुनिश्चित करने हेतु कौन-से कदम आवश्यक हैं?
- परिसंपत्ति मुद्रीकरण का विस्तार: नेशनल मोनेटाइज़ेशन पाइपलाइन (NMP) के माध्यम से परिचालन में मौजूद ‘ब्राउनफील्ड’ परिसंपत्तियों से पूंजी को नवीन ‘ग्रीनफील्ड’ परियोजनाओं में पुनर्चक्रित करके एक स्व-धारणीय निवेश चक्र निर्मित किया जाए।
- संस्थागत जोखिम कम करना: आंशिक क्रेडिट संवर्द्धन (PCE) का उपयोग करके कॉर्पोरेट बॉण्ड बाज़ार को गहन बनाया जाए, जिससे अवसंरचना परियोजनाएँ अपनी क्रेडिट रेटिंग में उन्नयन कर सकें तथा बीमा एवं पेंशन निधियों से कम-लागत, दीर्घकालिक पूंजी आकर्षित कर सकें।
- अवसंरचना जोखिम गारंटी कोष को परिचालन में लाकर ऋणदाताओं को आंशिक गारंटी प्रदान करना, विशेषरूप से उच्च जोखिम वाले निर्माण चरण के जोखिम को कम करना और वर्तमान में जोखिम-निरपेक्ष निजी डेवलपर्स को निवेश हेतु प्रोत्साहित किया जाए।
- हरित एवं समेकित वित्तपोषण: ग्रीन बॉण्ड एवं ब्लू बॉण्ड को मुख्यधारा में लाकर तटीय संरक्षण एवं हरित हाइड्रोजन हब जैसी जलवायु-सहिष्णु अवसंरचना का वित्तपोषण किया जाए।
- ब्लेंडेड फाइनेंस मॉडल का उपयोग किया जाए, जहाँ सरकार द्वारा प्रदान की गई ‘प्रारंभिक पूंजी’ या अनुदान का उपयोग ग्रामीण क्षेत्रों में पाइपलाइन द्वारा जल आपूर्ति या सीवेज उपचार जैसी सामाजिक रूप से महत्त्वपूर्ण, लेकिन कम लाभ वाली परियोजनाओं के लिये निजी वाणिज्यिक ऋण की बड़ी मात्रा जुटाने के लिये किया जाता है।
- सुधार-आधारित शहरी वित्तपोषण (CERs): नगरीय आर्थिक क्षेत्रों के लिये निशुल्क अनुदान से हटकर ‘चैलेंज मोड’ अपनाया जाए। आवश्यक वित्तपोषण हेतु शहरों को संपत्ति कर सुधार और डिजिटल शासन लागू करना होगा।
- सड़कों और बिजली के अलावा, वेयरहाउसिंग, डेटा सेंटर और शहरी परिवहन जैसे नए क्षेत्रों में InvITs और REITs के उपयोग का विस्तार किया जाए, ताकि घरेलू बचत एवं वैश्विक खुदरा पूंजी का लाभ उठाया जा सके।
- गिफ्ट सिटी एक वैश्विक प्रवेश द्वार के रूप में: गुजरात स्थित अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र (IFSC) का उपयोग करते हुए विशेष निवेश तंत्रों तथा कर-तटस्थ सतत वित्तीय साधनों के माध्यम से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) आकर्षित किया जाए।
निष्कर्ष:
भारत के अवसंरचना वित्तपोषण (Infrastructure Financing) में NIIF और NaBFID जैसे संस्थागत आधारों, InvITs जैसे अभिनव उपकरणों और रिकॉर्ड पूंजीगत व्यय (Capex) वृद्धि के माध्यम से व्यापक परिवर्तन आया है। हालाँकि, वर्ष 2030 तक 7 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के GDP लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये भूमि अधिग्रहण की बाधाओं को दूर करना, नगर पालिका बॉण्ड बाज़ारों को सुदृढ़ करना और 'इन्फ्रास्ट्रक्चर रिस्क गारंटी फंड' जैसे जोखिम शमन तंत्रों को क्रियान्वित करना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
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दृष्टि मेन्स का प्रश्न: प्रश्न: भारत में अवसंरचना के लिये निजी निवेश जुटाने में प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं? सुधारों का सुझाव दीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. इन्फ्रास्ट्रक्चर रिस्क गारंटी फंड क्या है?
केंद्रीय बजट 2026-27 में घोषित यह प्रावधान, निजी पूंजी को आकर्षित करने और जोखिम को कम करने के लिये उच्च जोखिम वाले निर्माण चरण के दौरान उधारदाताओं को आंशिक गारंटी प्रदान करता है।
2. सिटी इकोनॉमिक रीजन (CER) का क्या महत्त्व है ?
शहरी विकास में सुधारों को प्रेरित करने के उद्देश्य से, CER कार्यक्रम ऐसे शहरों पर केंद्रित है, जिनकी आबादी 5 लाख से अधिक है। इस योजना के तहत, ‘चैलेंज मोड‘ वित्तपोषण का उपयोग करते हुए, पाँच वर्षों की अवधि में प्रत्येक क्षेत्र को 5,000 करोड़ रुपये आवंटित किये जाते हैं।
3. भारत में रेलवे विद्युतीकरण की वर्तमान स्थिति क्या है ?
भारत का ब्रॉड-गेज नेटवर्क 99-100% विद्युतीकृत है, जिसमें 160 से अधिक वंदे भारत ट्रेनें परिचालन में हैं और बजट 2026-27 में सात नए हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर की घोषणा की गई है।
4. आंशिक क्रेडिट संवर्द्धन (PCE) क्या है ?
PCE एक ऐसी सुविधा है, जो अवसंरचना कंपनियों द्वारा जारी किये गए बॉण्डों की क्रेडिट रेटिंग में सुधार करती है, जिससे बेहतर शर्तें संभव हो पाती हैं। NaBFID ने बीमा और पेंशन फंडों को आकर्षित करने के लिये इस उत्पाद को शुरू किया था।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न: भारत में ‘सार्वजनिक कुंजी अवसंरचना’ शब्द का प्रयोग किसके संदर्भ में किया जाता है ? (2020)
(a) डिजिटल सुरक्षा अवसंरचना
(b) खाद्य सुरक्षा अवसंरचना
(c) स्वास्थ्य देखभाल और शिक्षा का बुनियादी ढाँचा
(d) दूरसंचार और परिवहन अवसंरचना
उत्तर: (a)
प्रश्न: 'राष्ट्रीय निवेश और बुनियादी ढाँचा कोष' के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (2017)
- यह नीति आयोग का अंग है।
- वर्तमान में इसके पास 4,00,000 करोड़ रुपये का कोष है।
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (d)
मेन्स
प्रश्न. “अधिक तीव्र और समावेशी आर्थिक विकास के लिये बुनियादी ढाँचे में निवेश आवश्यक है।” भारत के अनुभव के आलोक में चर्चा कीजिये। (2021)