भारत में सहकारिता की उपलब्धियाँ | 20 Jan 2026

 स्रोत: पीआईबी 

चर्चा में क्यों? 

भारत के सहकारी क्षेत्र में हुए उल्लेखनीय कार्यों और उपलब्धियों को वैश्विक मान्यता प्राप्त हुई है। इसी क्रम में संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2025 को अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता वर्ष’ (International Year of Cooperatives- IYC) घोषित किया है, जिसका विषय है ‘Cooperatives Build a Better World’ अर्थात सहकारिताएँ एक बेहतर विश्व का निर्माण करती हैं।

  • भारत का सहकारी आंदोलन वसुधैव कुटुम्बकम् अर्थात संपूर्ण विश्व एक परिवार है  की भावना से प्रेरित है तथा ‘सहकार से समृद्धि’ (Prosperity Through Cooperation) के विज़न द्वारा संचालित है। इसका मुख्य उद्देश्य सामूहिक कल्याण, समावेशी विकास एवं समुदाय-केंद्रित विकास मॉडल के माध्यम से व्यापक सामाजिक-आर्थिक समृद्धि सुनिश्चित करना है।

सारांश 

  • भारत का व्यापक सहकारी नेटवर्क डिजिटल PACS, नई राष्ट्रीय सहकारी संस्थाओं (NCEL, NCOL) तथा एक समर्पित सहकारिता मंत्रालय के माध्यम से सुव्यवस्थित और आधुनिक बनाया जा रहा है।
  • यह क्षेत्र शासन, विनियामक तथा वित्तीय ढाँचे से संबंधित गहरी संरचनात्मक चुनौतियों का सामना कर रहा है, जो समावेशी विकास में बाधा उत्पन्न करती हैं।
  • ‘सहकार से समृद्धि’ के लक्ष्य की प्राप्ति तकनीकी एकीकरण, वित्तीय नवाचार तथा विनियामक विखंडन के समाधान पर निर्भर करती है।

भारत में सहकारिताओं की वर्तमान स्थिति क्या है? 

  • व्यापक विस्तार और व्यापक पहुँच: भारत में 8.5 लाख से अधिक सहकारी संस्थाएँ कार्यरत हैं, जो 30 से अधिक क्षेत्रों में लगभग 32 करोड़ सदस्यों को सेवाएँ प्रदान करती हैं तथा देश के लगभग 98% ग्रामीण क्षेत्रों को कवर करती हैं।
    • लगभग 10 करोड़ महिलाएँ स्वयं सहायता समूहों (SHG) के माध्यम से सहकारिताओं से जुड़ी हुई हैं, जो महिला-नेतृत्व वाले विकास में इस क्षेत्र की महत्त्वपूर्ण भूमिका को दर्शाता है।
  • नए क्षेत्रों में रणनीतिक विस्तार: 32,000 से अधिक नई बहु-उद्देशीय दुग्ध एवं मत्स्य सहकारी संस्थाओं का पंजीकरण पारंपरिक ऋण से आगे बढ़कर सहकारी क्षेत्र के विस्तार हेतु किये जा रहे सशक्त प्रयासों को दर्शाता है।
  • सुदृढ़ वित्तीय एवं संस्थागत समर्थन: नेशनल को-ऑपरेटिव डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (NCDC) द्वारा वार्षिक ₹95,000 करोड़ से अधिक का वितरण किया जा रहा है, जो सहकारी क्षेत्र के विस्तार हेतु आवश्यक पूंजी उपलब्ध कराता है।

भारत के सहकारी क्षेत्र में प्रमुख पहलें एवं उपलब्धियाँ क्या हैं?

रणनीतिक क्षेत्र

प्रमुख पहल

प्रमुख उपलब्धि / वर्तमान स्थिति

नीति एवं शासन

राष्ट्रीय सहकारी नीति (NCP), 2025 की शुरुआत

सहकारिताओं को पुनरुज्जीवित और आधुनिक बनाने के लिये दशकीय रणनीतिक रोडमैप प्रदान करती है।

विस्तार और विविधीकरण

श्वेत क्रांति 2.0 (दुग्ध विस्तार)

31 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में 20,070 नई दुग्ध सहकारी संस्थाएँ पंजीकृत।

मत्स्य उत्पादक किसान संगठन (FFPO) का गठन

NCDC द्वारा 1,070 किसान उत्पादक संगठन

(FFPO) का गठन सुनिश्चित किया गया।

वित्तीय सुदृढ़ता एवं समावेशन

RuPay किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) पायलट गुजरात में

22 लाख से अधिक KCC जारी, किसानों को ₹10,000 करोड़ से अधिक का ऋण वितरित।

बाज़ार कनेक्शन एवं निर्यात

नेशनल को-ऑपरेटिव ऑर्गेनिक्स लिमिटेड (NCOL)

‘भारत ऑर्गेनिक्स’ ब्रांड के तहत 28 उत्पादों का विपणन।

भारतीय बीज सहकारी समिति लिमिटेड (BBSSL)

31,605 सदस्य सहकारी समितियाँ; ‘भारत बीज’ बीज वितरित करती है।

बुनियादी ढाँचा विकास

विकेंद्रीकृत अनाज भंडारण योजना (विश्व की सबसे बड़ी)

112 PACS में गोदाम बनाए गए; 68,702 मीट्रिक टन क्षमता बनाई गई; सभी सहकारी समितियों तक विस्तार किया गया।

कृषि में आत्मनिर्भरता

दलहन और मक्का के लिये आत्मनिर्भर अभियान

54.74 लाख किसान और 56,673 PACS/FPO पंजीकृत; 9.08 लाख मीट्रिक टन दालें और 45,105 मीट्रिक टन मक्का की खरीद की गई।

संस्थागत विकास

त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय (TSU)

भारत का पहला राष्ट्रीय सहकारी विश्वविद्यालय स्थापित हुआ; शैक्षणिक कार्यक्रम शुरू किये गए।

अभिनव परियोजनाएँ

सहकार टैक्सी कोऑपरेटिव लिमिटेड

सहकारी समितियों के नेतृत्व वाला पहला मोबिलिटी प्लेटफॉर्म; परीक्षण के दौरान 1.5 लाख ड्राइवर और 2 लाख ग्राहक पंजीकृत हुए।

GeM पोर्टल पर सहकारी समितियाँ

721 सहकारी समितियों को खरीदार के रूप में शामिल किया गया; 396.77 करोड़ रुपये के ट्रांजेक्शन पूरे हुए।

सहकारी समितियाँ

  • परिचय: सहकारी समिति एक स्वैच्छिक और लोकतांत्रिक संगठन है, जो सदस्यों की साझी आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आवश्यकताओं को संयुक्त रूप से स्वामित्व वाले उद्यम के माध्यम से पूरा करता है, जो "एक सदस्य, एक वोट" के सिद्धांत पर कार्य करता है।
  • संवैधानिक मान्यता: 97वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2011 ने सहकारी समितियों को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया, जिसमें प्रमुख प्रावधान शामिल हैं:
    • अनुच्छेद 19(1)(c): नागरिकों को सहकारी समितियाँ बनाने का अधिकार प्रदान करता है।
    • अनुच्छेद 43B: राज्य को राज्य की नीति के निदेशक तत्व (DPSP) के एक भाग के रूप में सहकारी समितियों को बढ़ावा देने का निर्देश देता है।
    • भाग IXB (अनुच्छेद 243ZH–243ZT): सहकारी समितियों के लिये एक प्रशासनिक ढाँचा स्थापित करता है।
  • विधिक ढाँचा और नियामक निगरानी: भारत में सहकारी समितियाँ एक दोहरी संवैधानिक और प्रशासनिक ढाँचे के अंतर्गत विनियमित होती हैं।
    • राज्य-स्तरीय सहकारी समितियाँ राज्य सूची के अंतर्गत आती हैं और राज्य पंजीयकों की निगरानी में अलग-अलग राज्य के कानूनों द्वारा शासित होती हैं।
    • बहु-राज्य सहकारी समितियाँ संघ सूची के अंतर्गत आती हैं और केंद्रीय पंजीयक की निगरानी में केंद्रीय बहु-राज्य सहकारी समिति (MSCS) अधिनियम, 2002 द्वारा विनियमित होती हैं।
  • भौगोलिक वितरण: इसका भौगोलिक विस्तार केंद्रित है। महाराष्ट्र एकमात्र ऐसा राज्य है जहाँ सभी सहकारी समितियाँ एक-चौथाई से अधिक हैं। कुल मिलाकर, शीर्ष पाँच राज्य– महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, मध्य प्रदेश और कर्नाटक– कुल राष्ट्रीय भाग का 57% भाग हैं।
  • राष्ट्रीय सहकारिता नीति, 2025: इसने वर्ष 2002 की नीति का स्थान लिया है, जो वर्ष 2025 से 2045 तक सहकारी विकास के लिये एक दीर्घकालिक रोडमैप प्रदान करती है। प्रमुख उद्देश्यों में शामिल हैं:
  • भारत में उल्लेखनीय सहकारी समितियाँ: अमूल (आणंद मिल्क यूनियन लिमिटेड), इफको (इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइज़र कोऑपरेटिव), लिज्जत पापड़ (श्री महिला गृह उद्योग लिज्जत पापड़), आदि।

भारत में को-ऑपरेटिव सेक्टर के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?

  • नियामक विखंडन: एक प्रमुख संघर्ष उस स्थिति में मौजूद है जहाँ सहकारी समितियों का पंजीयक (राज्य प्राधिकारी) समामेलन, प्रशासन और परिसमापन का प्रबंधन करता है, जबकि भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) बैंकिंग लाइसेंस और पूंजी पर्याप्तता जैसे विवेकपूर्ण मानदंडों को नियंत्रित करता है। इससे अधिकार क्षेत्र के विवाद, असंगत पर्यवेक्षण और नियामक अंतर उत्पन्न होते हैं।
  • शासन संबंधी कमियाँ: विभिन्न सहकारी समितियों में पारदर्शिता और वास्तविक लोकतांत्रिक प्रथा की कमी के कारण अभिजात वर्ग का नियंत्रण, खराब जवाबदेही और सदस्यों के आवागमन को कम होता है। उदाहरण के लिये, वर्ष 2019 में पंजाब और महाराष्ट्र सहकारी (PMC) बैंक का पतन सीधे तौर पर वित्तीय अनियमितताओं और आंतरिक नियंत्रण की विफलताओं से जुड़ा था।
  • वित्तीय बाधाएँ और अविकसित अवसंरचना: कई संस्थान पर्याप्त पूंजी बफर बनाए रखने में विफल रहते हैं, जिससे नुकसान को कम करने, आर्थिक तनाव का सामना करने या विस्तार को निधि देने की उनकी क्षमता प्रभावित होती है। भंडारण सुविधाओं, प्रसंस्करण इकाइयों और बाज़ार संबंधों की गंभीर कमी कृषि और ग्रामीण सहकारी समितियों के विकास और प्रतिस्पर्द्धात्मकता में बाधा डालती हैं।
  • परिचालनात्मक और तकनीकी बाधाएँ: एक महत्त्वपूर्ण डिजिटल विभाजन मौज़ूद है, जहाँ कई ग्रामीण सहकारी समितियों के पास आधुनिक डिजिटल अकाउंटिंग, ERP सिस्टम और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म नहीं हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में खराब फिजिकल कनेक्टिविटी और कमज़ोर रसद सहकारी नेटवर्क की दक्षता और भौगोलिक विस्तार को सीमित करती हैं।
  • सामाजिक-सांस्कृतिक बाधाएँ: पूर्व-मौजूद सामाजिक पदानुक्रम, जाति-आधारित विभाजन और संरचनात्मक असमानताएँ सहकारी समितियों के भीतर समान भागीदारी और प्रतिनिधित्व में बाधाएँ उत्पन्न करती हैं, जो उनके समावेशी आदर्शों के विपरीत है।
  • तीव्र बाज़ार की प्रतिस्पर्द्धा: सहकारी समितियाँ वाणिज्यिक बैंकों, लघु वित्त बैंकों और फिनटेक कंपनियों के खिलाफ ग्राहकों को बनाए रखने के लिये संघर्ष करती हैं, जो अधिक परिष्कृत उत्पाद और सेवाएँ प्रदान करते हैं।

भारत में सहकारी समितियों को मज़बूत करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?

  • तकनीकी एकीकरण: मोबाइल बैंकिंग, ऑनलाइन खाता खोलना और डिजिटल भुगतान प्रणाली लागू करें ताकि टेक-प्रेमी सदस्यों को आकर्षित किया जा सके और संचालन की दक्षता बढ़ाई जा सके। सामान्य ERP सॉफ्टवेयर, डिजिटल वित्तीय रिपोर्टिंग सिस्टम और ई-कॉमर्स एकीकरण (जैसे– ONDC और GeM प्लेटफॅार्म) लागू करना ताकि संचालन सरल हो और बाज़ार में पहुँच का विस्तार हो सके।
  • वित्तीय गहनता: सहकारी वित्तीय संस्थाओं को मूलभूत बचत/ऋण से आगे बढ़कर निवेश उत्पाद, बीमा और वित्तीय साक्षरता कार्यक्रम प्रदान करने चाहिये, ताकि सदस्य समग्र वित्तीय स्वास्थ्य प्राप्त कर सकें।
    • सदस्य MSMEs को क्रेडिट फ्लो बेहतर बनाने के लिये को-ऑपरेटिव्स को MUDRA, CGTMSE और NABARD जैसी मौजूदा सरकारी योजनाओं से औपचारिक रूप से जोड़ा जाए।
  • संस्थागत सशक्तीकरण: सहकारी संस्थाओं के लिये संगठित प्रशिक्षण, कौशल विकास कार्यशालाएँ, और क्लीयर कैरियर पाथवे लागू किये जाएँ ताकि पेशेवर प्रबंधकों की एक मज़बूत टीम तैयार की जा सके।
  • मूल्य शृंखला विकास: गोदाम, शीत भंडारण और सामान्य सुविधा केंद्र जैसी अवसंरचना में सार्वजनिक तथा सहकारी निवेश को प्राथमिकता दी जाए, ताकि व्यर्थता कम हो एवं बाज़ार तक पहुँच बेहतर हो सके। इसके अलावा सदस्य-स्वामित्व वाली लॉजिस्टिक सहकारी संस्थाएँ स्थापित करने से सप्लाई चेन लागत कम होगी व दक्षता बढ़ेगी
  • ब्रांडिंग और विविधीकरण: प्रीमियम कीमतें प्राप्त करने तथा गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिये प्रमाणन के साथ मज़बूत 'अंब्रेला ब्रांड' (जैसे– "CoopMade" या "भारत ऑर्गेनिक्स") विकसित एवं प्रचारित करना। ईको-टूरिज़्म, नवीकरणीय ऊर्जा, आधुनिक कृषि (जैसे– हाइड्रोपोनिक्स) व डिजिटल सेवाओं में सहकारी मॉडलों को सक्रिय रूप से बढ़ावा देना, ताकि उन्हें नवाचार केंद्रों के रूप में पुन: स्थापित किया जा सके।

निष्कर्ष

भारत का सहकारी क्षेत्र वर्तमान में डिजिटल और रणनीतिक विस्तार के दौर से गुज़र रहा है। समावेशी समृद्धि के पूर्ण लाभ को प्राप्त करने के लिये इसे शासन, वित्त तथा प्रतिस्पर्द्धा में मौजूद लगातार चुनौतियों को तत्काल संबोधित करना चाहिये, साथ ही नीति, तकनीक एवं सदस्यों की भागीदारी का प्रभावी रूप से उपयोग करना चाहिये।

दृष्टि मेन्स प्रश्न

प्रश्न. भारत में सहकारी आंदोलन के सामने आने वाली मुख्य चुनौतियों का परीक्षण कीजिये और संस्थागत सुधारों का सुझाव दीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता वर्ष 2025 क्या है?
संयुक्त राष्ट्र ने 2025 को अंतर्राष्ट्रीय सहकारी वर्ष के रूप में घोषित किया है, ताकि सतत विकास में सहकारी संस्थाओं की भूमिका को रेखांकित किया जा सके और इसका विषय रखा गया है: “सहकारी संस्थाएँ एक बेहतर दुनिया का निर्माण करती हैं”।

2. भारत में सहकारी समितियों का संवैधानिक दर्जा क्या है?
97वें संविधान संशोधन (2011) ने सहकारी संस्थाओं को संवैधानिक पहचान दी, जिसमें अनुच्छेद 19(1)(c) और अनुच्छेद 43B जोड़े गए और Part IXB (अनुच्छेद 243ZH–243ZT) को शासन के लिये शामिल किया गया।

3. राष्ट्रीय सहयोग नीति, 2025 क्या है?
राष्ट्रीय सहकारी नीति, 2025 सहकारी विकास के लिये 2045 तक की रूपरेखा प्रदान करती है, जिसका उद्देश्य 2 लाख नए M-PACS की स्थापना और सहकारी शिक्षा एवं अवसंरचना को मज़बूत करना है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रिलिम्स

प्रश्न. भारत में ‘शहरी सहकारी बैंकों’ के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2021)

  1. राज्य सरकारों द्वारा स्थापित स्थानीय मंडलों द्वारा उनका पर्यवेक्षण एवं विनियमन किया जाता है।
  2. वे इक्विटी शेयर और अधिमान शेयर जारी कर सकते हैं।
  3. उन्हें वर्ष 1966 में एक संशोधन द्वारा बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 के कार्यक्षेत्र में लाया गया था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1                      

(b)  केवल 2 और 3

(c) केवल 1 और 3 

(d) 1, 2 और 3

उत्तर:(b)


प्रश्न. भारत में निम्नलिखित में से किसकी कृषि तथा सहबद्ध गतिविधियों में ऋण के वितरण में सबसे अधिक हिस्सेदारी है? (2011) 

(a) वाणिज्यिक बैंकों की

(b) सहकारी बैंकों की

(c) क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की

(d) सूक्ष्म-वित्त (माइक्रोफाइनेंस) संस्थाओं की

उत्तर: (a)


मेन्स

प्रश्न."भारतीय शासकीय तंत्र में गैर-राजकीय कर्त्ताओं की भूमिका सीमित ही रही है।" इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिये। (2016)

प्रश्न . "गाँवों में सहकारी समिति को छोड़कर ऋण संगठन का कोई भी ढाँचा उपयुक्त नहीं होगा।" - अखिल भारतीय ग्रामीण ऋण सर्वेक्षण। भारत में कृषि वित्त की पृष्ठभूमि में इस कथन पर चर्चा कीजिये। कृषि वित्त प्रदान करने वाली वित्त संस्थाओं को किन बाधाओं और कसौटियों का सामना करना पड़ता है? ग्रामीण सेवार्थियों तक बेहतर पहुँच और सेवा के लिये प्रौद्योगिकी का किस प्रकार उपयोग किया जा सकता है?” (2014)