पवित्र नगर का दर्जा और उनका धार्मिक महत्त्व
चर्चा में क्यों?
पंजाब ने अमृतसर, आनंदपुर साहिब और तलवंडी साबो को उनके धार्मिक महत्त्व के कारण आधिकारिक रूप से पवित्र नगर घोषित किया है, क्योंकि इनमें से प्रत्येक में सिख धर्म के पाँच तख्तों में से एक स्थित है।
- इस घोषणा का उद्देश्य इन शहरों को प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्रों के रूप में विकसित करना है। इसके तहत उनकी पवित्रता बनाए रखने के लिये नगर सीमाओं के भीतर शराब, तंबाकू, सिगरेट और माँस की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया गया है।
सारांश
- पंजाब ने अमृतसर, आनंदपुर साहिब और तलवंडी साबो को उनके धार्मिक महत्त्व के कारण पवित्र नगर घोषित किया है, क्योंकि इनमें से प्रत्येक में सिख धर्म के पाँच तख्तों में से एक स्थित है।
- सिख धर्म, जिसकी स्थापना गुरु नानक देव जी ने की, एकेश्वरवाद, समानता और नैतिकता पर बल देता है। इसके आचरण और प्रशासन में गुरुद्वारे, तख्त, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (SGPC) तथा खालसा पंथ जैसी संस्थाएँ केंद्रीय भूमिका निभाती हैं।
सिख धर्म क्या है?
- मूल सिद्धांत और उत्पत्ति: सिख धर्म की स्थापना 15वीं शताब्दी में पंजाब में गुरु नानक देव जी ने की थी। यह एक एकेश्वरवादी धर्म है, जो दस गुरुओं के माध्यम से विकसित हुआ और जिस पर भक्ति तथा सूफी परंपराओं का प्रभाव रहा।
- यह एकेश्वरवाद, नैतिक जीवन (सेवा) और समानता पर विशेष बल देता है।
- सिख वर्ष 1699 में गुरु गोबिंद सिंह द्वारा स्थापित खालसा का हिस्सा हैं, जो आचार संहिता का पालन करते हैं और पाँच 'K' (केश, कंघा, कड़ा, कचेरा, कृपाण) पहनते हैं।
- पवित्र ग्रंथ एवं प्रमुख संस्थाएँ: प्राथमिक धर्मग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब (गुरुमुखी लिपि में लिखित) है, जिसे शाश्वत गुरु माना जाता है। यह दशम ग्रंथ एक पूरक ग्रंथ है।
- गुरुद्वारा सिखों का पूजा-अर्चना और सामुदायिक सेवा का स्थल है, जो सभी के लिये खुला है।
- शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (SGPC) प्रमुख गुरुद्वारों का प्रबंधन करने वाली सर्वोच्च निर्वाचित संस्था है।
- खालसा पंथ सिख समुदाय का सामूहिक संगठन है।
- पाँच तख्त (अधिकार के केंद्र): ये पाँच तख्त सिखों के धार्मिक और लौकिक मामलों का मार्गदर्शन करते हैं।
- अकाल तख्त (अमृतसर, पंजाब): गुरु हरगोबिंद सिंह द्वारा 1606 में स्थापित सर्वोच्च स्थान, जो लौकिक (मीरी) और आध्यात्मिक (पीरी) सत्ता के मिलन का प्रतीक है।
- तख्त श्री केशगढ़ साहिब (आनंदपुर साहिब, पंजाब): वह स्थान जहाँ गुरु गोबिंद सिंह ने खालसा की स्थापना की थी।
- तख्त श्री पटना साहिब (पटना, बिहार): गुरु गोविंद सिंह का जन्मस्थान।
- तख्त सचखंड हजूर साहिब (नांदेड़, महाराष्ट्र): जहाँ गुरु गोबिंद सिंह का अंतिम संस्कार किया गया था।
- तख्त श्री दमदमा साहिब (तलवंडी साबो, पंजाब): जहाँ गुरु गोबिंद सिंह ने गुरु ग्रंथ साहिब को अंतिम रूप दिया।
- ऐतिहासिक सुधार आंदोलन:
- गुरुद्वारा सुधार (अकाली) आंदोलन (1920) का उद्देश्य सिख धार्मिक स्थलों को भ्रष्ट महंतों के नियंत्रण से मुक्त कराना था।
- इसके परिणामस्वरूप शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) की स्थापना (1920) हुई तथा सिख गुरुद्वारा अधिनियम, 1925 अस्तित्व में आया, जिसने सिखों को अपने गुरुद्वारों पर कानूनी नियंत्रण प्रदान किया।
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सिख गुरु और उनके प्रमुख योगदान |
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गुरु |
अवधि |
प्रमुख योगदान |
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गुरु नानक देव |
1469-1539 |
सिख धर्म के संस्थापक; गुरु का लंगर शुरू किया (सामुदायिक रसोई); बाबर के समकालीन; 550 वीं जयंती करतारपुर गलियारे के साथ मनाई गई। |
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गुरु अंगद |
1504-1552 |
गुरु-मुखी लिपि का आविष्कार; गुरु का लंगर (सामुदायिक रसोई) की प्रथा को लोकप्रिय बनाया। |
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गुरु अमर दास |
1479-1574 |
आनंद कारज विवाह की शुरुआत की, सती प्रथा और पर्दा प्रथा को समाप्त किया, अकबर के समकालीन थे। |
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गुरु राम दास |
1534-1581 |
वर्ष 1577 में अमृतसर की स्थापना की; स्वर्ण मंदिर का निर्माण शुरू किया। |
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गुरु अर्जुन देव |
1563-1606 |
वर्ष 1604 में आदि ग्रंथ की रचना की; स्वर्ण मंदिर का निर्माण पूरा किया गया; जहाँगीर द्वारा इसका निर्माण कराया गया। |
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गुरु हरगोबिंद |
1594-1644 |
सिखों को एक सैन्य समुदाय में परिवर्तित किया; अकाल तख्त (सिख धर्म की धार्मिक सत्ता का मुख्य केंद्र) की स्थापना की; जहाँगीर और शाहजहाँ के विरुद्ध संघर्ष किया। |
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गुरु हर राय |
1630-1661 |
औरंगजेब के साथ शांति को बढ़ावा दिया; धर्मप्रचार के कार्यों पर ध्यान केंद्रित किया। |
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गुरु हरकिशन |
1656-1664 |
सबसे युवा गुरु; इस्लाम विरोधी ईशनिंदा के संबंध में औरंगजेब द्वारा इन्हें अपने समक्ष उपस्थित होने का आदेश दिया गया। |
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गुरु तेग बहादुर |
1621-1675 |
आनंदपुर साहिब की स्थापना की । |
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गुरु गोबिंद सिंह |
1666-1708 |
वर्ष 1699 में खालसा पंथ की स्थापना की; इन्होंने एक नया संस्कार "पाहुल" (Pahul) शुरू किया, ये मानव रूप में अंतिम सिख गुरु थे और इन्होंने ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ को सिखों के गुरु के रूप में नामित किया । |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. सिख धर्म में पाँच तख्तों का क्या महत्व है?
पाँचों तख्त सांसारिक और आध्यात्मिक सत्ता के पीठ हैं। अमृतसर स्थित अकाल तख्त सर्वोच्च तख्त है, जो मीरी–पीरी (सांसारिक और आध्यात्मिक एकता) का प्रतीक है, जबकि अन्य तख्त गुरु गोबिंद सिंह जी के जीवन की प्रमुख घटनाओं से जुड़े हैं।
2. सिख धर्म की स्थापना किसने और कब की?
सिख धर्म की स्थापना 15वीं शताब्दी में पंजाब में गुरु नानक देव जी ने की थी। उन्होंने एकेश्वरवाद, समानता और नैतिक जीवन पर बल दिया।
3. सिख धर्म के पाँच ककार (Five Ks) क्या हैं?
केश, कंघा, कड़ा, कच्छेरा और कृपाण—ये खालसा सिखों द्वारा आस्था, अनुशासन और पहचान के प्रतीक के रूप में धारण किये जाते हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)
प्रिलिम्स:
प्रश्न. निम्नलिखित भक्ति संतों पर विचार कीजिये: (2013)
- दादू दयाल
- गुरु नानक
- त्यागराज
इनमें से कौन उस समय उपदेश देता था/देते थे जब लोदी वंश का पतन हुआ तथा बाबर सत्तारुढ़ हुआ?
(a) केवल 1 और 3
(b) केवल 2
(c) केवल 2 और 3
(d) केवल 1 और 2
उत्तर: (b)
नरसापुरम क्रोशिया लेस
आंध्र प्रदेश के नरसापुरम की पारंपरिक क्रोशिया लेस शिल्प के निर्यात ने वर्तमान वित्तीय वर्ष में ₹150 करोड़ का आँकड़ा पार कर लिया है, जो कोविड-19 के आघातों के बाद इस शिल्प के मज़बूत पुनरुत्थान को दर्शाता है।
नरसापुरम क्रोशिया लेस
- उत्पत्ति: वर्ष 1844 में आरंभ हुई नरसापुरम की क्रोशेक्रोशिया लेस कला ने वर्ष 1899 के भारतीय अकाल और वर्ष 1929 की महामंदी जैसी कठिन परिस्थितियों का सामना किया, जो इसकी दीर्घकालिक विरासत को दर्शाता है।
- बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ तक गोदावरी क्षेत्र में 2,000 से अधिक महिलाएँ लेस निर्माण में संलग्न थीं, जो इसके सांस्कृतिक और सामाजिक महत्त्व को रेखांकित करता है।
- तकनीक: इस शिल्प में महीन सूती धागों को विभिन्न आकार की नाजुक क्रोशिया सुइयों की सहायता से जटिल लेस संरचनाओं में बदला जाता है।
- कार्यविधि: कारीगर एकल क्रोशिया हुक का उपयोग कर फंदे (लूप) और आपस में जुड़े टाँके बनाते हैं, जिनसे अत्यंत सूक्ष्म और जटिल लेस डिज़ाइन तैयार होते हैं।
- उत्पाद: हस्तनिर्मित क्रोशिया उद्योग में वस्त्र, गृह-सज्जा तथा सहायक वस्तुएँ तैयार की जाती हैं, जैसे—डोइली, तकिया कवर, बेडस्प्रेड, टेबल लिनन, पर्स, स्टोल, लैम्पशेड और वॉल हैंगिंग।
- बाज़ार: नरसापुरम क्रोशिया लेस के उत्पादों का निर्यात पूरे विश्व में किया जाता है, जिनमें यूनाइटेड किंगडम, संयुक्त राज्य अमेरिका और फ्राँस शामिल हैं।
- मान्यता: इस शिल्प को वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट (ODOP) पुरस्कार तथा भौगोलिक उपदर्शन प्रमाणन (GI) प्राप्त हुआ है। इसे इंटरनेशनल लेस ट्रेड सेंटर और हस्तशिल्प निर्यात संवर्धन परिषद (EPCH) का भी समर्थन प्राप्त है।
- EPCH, वस्त्र मंत्रालय के अंतर्गत एक वैधानिक निकाय है और अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों में भारतीय हस्तशिल्प के संवर्धन का कार्य करता है।
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दुर्लभ मृदा स्थायी चुंबक विनिर्माण योजना
भारत ने धातुमल दुर्लभ मृदा स्थायी चुंबक (REPM) के निर्माण को बढ़ावा देने के लिये ₹7,280 करोड़ की योजना को मंजूरी दी है, जिसके तहत 6,000 मीट्रिक टन प्रति वर्ष (MTPA) का एक एकीकृत घरेलू REPM पारिस्थितिकी तंत्र स्थापित किया जाएगा, जो दुर्लभ मृदा ऑक्साइड से लेकर तैयार चुंबकों तक पूरे मूल्य शृंखला को कवर करेगा।
- कार्यान्वयन: यह योजना 7 वर्षों में लागू की जाएगी (2 वर्ष की तैयारी अवधि + 5 वर्ष के प्रोत्साहन), इसमें अधिकतम पाँच लाभार्थियों (प्रत्येक 1,200 MTPA) को समर्थन मिलेगा और ₹6,450 करोड़ के विक्रय-संबंधित प्रोत्साहन तथा ₹750 करोड़ की पूंजी सब्सिडी प्रदान की जाएगी।
- संसाधन उपलब्धता: वर्तमान में भारत आयात पर काफी निर्भर है, चीन वर्ष 2022–25 के दौरान स्थायी चुंबकों का 60–90% आपूर्ति करता है, जबकि वर्ष 2030 तक REPM की मांग दोगुनी होने की उम्मीद है।
- भारत के पास 13.15 मिलियन टन मोनाज़ाइट का मज़बूत संसाधन आधार है, जिसमें 7.23 मिलियन टन दुर्लभ मृदा ऑक्साइड कई राज्यों में विस्तृत रूप से पाए जाते हैं।
- REPM के संबंध में: दुर्लभ मृदा स्थायी चुंबक (REPMs) उच्च-शक्ति वाले स्थायी चुंबक हैं, जिन्हें नेओडिमियम और समैरियम जैसे दुर्लभ मृदा तत्त्वों का उपयोग करके बनाया जाता है।
- REPMs संक्षिप्त आकार में अत्यधिक चुंबकीय शक्ति प्रदान करते हैं, जिससे ये इलेक्ट्रिक वाहन के मोटर, पवन टरबाइन, इलेक्ट्रॉनिक्स, अंतरिक्ष और रक्षा अनुप्रयोगों के लिये अत्यंत आवश्यक हो जाते हैं।
- अन्य सहायक पहलें:
- नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन (NCMM), 2025: खोज से लेकर पुनर्चक्रण तक पूरी मूल्य शृंखला को मज़बूत करके महत्त्वपूर्ण खनिजों की दीर्घकालिक आपूर्ति सुनिश्चित करता है।
- खनिज और खनन (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 (MMDR Act) – संशोधन 2023: यह निजी क्षेत्र की भागीदारी, खनिज अनुज्ञप्तियों की नीलामी और महत्त्वपूर्ण खनिजों के लिये नई खोज लाइसेंसिंग को सक्षम बनाता है
- वैश्विक खनिज सुरक्षा पहल: भारत खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड (KABIL) के माध्यम से और खनिज सुरक्षा साझेदारी (MSP), हिंद-प्रशांत आर्थिक ढाँचा (IPEF) तथा क्रिटिकल और इमर्जिंग टेक्नोलॉजीज (iCET) पहल में भागीदारी के जरिये विदेशों में खनिज पहुँच को मज़बूत करता है।
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राष्ट्रीय विज्ञान पुरस्कार
भारत के राष्ट्रपति ने राष्ट्रीय विज्ञान पुरस्कार के द्वितीय संस्करण का वितरण किया, जो भारत के सर्वोच्च राष्ट्रीय विज्ञान पुरस्कार हैं। इस अवसर पर विभिन्न वैज्ञानिक क्षेत्रों में योगदान के लिये 24 वैज्ञानिकों को सम्मानित किया गया।
- विज्ञान रत्न पुरस्कार प्रसिद्ध भारतीय खगोल-भौतिकीविद् प्रो. जयंत विष्णु नार्लीकर को मरणोपरांत प्रदान किया गया।
- वे हॉयल–नार्लीकर गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत के सह-विकास के लिये विश्व स्तर पर प्रसिद्ध हैं, जो आइंस्टीन के सामान्य सापेक्षता सिद्धांत का एक वैकल्पिक सिद्धांत है। यह सिद्धांत ब्रह्मांड के स्थिर अवस्था मॉडल (Steady State Model) का समर्थन करता है और बिग बैंग के बजाय एक वैकल्पिक ब्रह्मांडीय दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।
राष्ट्रीय विज्ञान पुरस्कार
- परिचय: यह भारत का राष्ट्रीय स्तर का विज्ञान पुरस्कार है, जिसकी स्थापना विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा की गई है। यह पद्म पुरस्कारों की तर्ज पर आधारित है तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उत्कृष्टता, नवाचार और उच्च प्रभाव वाले योगदान को सम्मानित करता है।
- क्षेत्र कवरेज: ये पुरस्कार 13 प्रमुख वैज्ञानिक क्षेत्रों को सम्मिलित करते हैं, जिनमें अंतरिक्ष विज्ञान, परमाणु ऊर्जा, अभियांत्रिकी और चिकित्सा शामिल हैं।
- श्रेणियाँ: राष्ट्रीय विज्ञान पुरस्कार चार श्रेणियों में प्रदान किये जाते हैं—
- विज्ञान रत्न (Vigyan Ratna – VR): भारत का सर्वोच्च विज्ञान पुरस्कार, जो आजीवन उपलब्धियों और असाधारण योगदान के लिये प्रदान किया जाता है।
- विज्ञान श्री (Vigyan Shri – VS): किसी विशिष्ट क्षेत्र में विशिष्ट एवं सतत योगदान के लिये दिया जाता है।
- विज्ञान युवा–शांति स्वरूप भटनागर (Vigyan Yuva–Shanti Swarup Bhatnagar – VY–SSB): 45 वर्ष से कम आयु के वैज्ञानिकों के लिये, जो युवा वैज्ञानिक प्रतिभा को मान्यता देता है।
- विज्ञान टीम (Vigyan Team – VT): उत्कृष्ट सहयोगात्मक अनुसंधान और टीमवर्क के लिये प्रदान किया जाता है।
- महत्त्व: यह पुरस्कार नवाचार और उत्कृष्टता को प्रोत्साहित कर भारत की वैज्ञानिक पारिस्थितिकी प्रणाली को सुदृढ़ करता है। साथ ही, यह सहयोगात्मक अनुसंधान को भी मान्यता देता है, जो आधुनिक वैज्ञानिक प्रथाओं का प्रतिबिंब है।
| और पढ़ें: भारत के विकास के लिये अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा |
प्रगति प्लेटफॉर्म
5वें मुख्य सचिव सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने राज्यों से आग्रह किया कि वे केंद्र के प्रगति सिस्टम की तर्ज पर अपनी प्रणाली विकसित करें, ताकि प्रौद्योगिकी-आधारित शासन को सुदृढ़, परियोजना निगरानी में सुधार और सुधारों के कार्यान्वयन को तीव्र किया जा सके।
- प्रगति: यह एक नवोन्मेषी सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (ICT)-सक्षम प्लेटफॉर्म है, जिसकी शुरुआत वर्ष 2015 में की गई थी। इसका उद्देश्य सरकारी परियोजनाओं का समय पर कार्यान्वयन सुनिश्चित करना और जन शिकायतों का निवारण करना है।
- यह केंद्र-राज्य समन्वय को सुविधाजनक बनाता है, ‘टीम इंडिया’ दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है और अंतर-राज्यीय विवादों को कुशलतापूर्वक हल करता है, जिससे लालफीताशाही को दरकिनार किया जा सके।
- विशेषताएँ: इसमें तीन-स्तरीय प्रणाली है: प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO), केंद्रीय सचिवगण और राज्यों के मुख्य सचिव, जो प्रत्यक्ष संचार की सुविधा प्रदान करती है। प्रधानमंत्री द्वारा नेतृत्व की गई निगरानी समय पर निर्णय लेने और बाधाओं के त्वरित समाधान को सुनिश्चित करती है।
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यह वीडियो काॅफ्रेंसिंग, जियो-स्थानिक मानचित्रण, ड्रोन फीड्स और केंद्रीकृत डेटा सिस्टम को संयोजित करता है।
यह केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण और निगरानी प्रणाली, पीएम गति शक्ति, PARIVESH और प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग ग्रुप पोर्टल के साथ एकीकृत है, जो रीयल-टाइम निगरानी तथा पूर्वानुमान आधारित ट्रैकिंग सक्षम करता है।
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महत्त्व: प्रौद्योगिकी को एकीकृत करके, सहयोग को बढ़ावा देकर और जवाबदेही सुनिश्चित करके, PRAGATI ने लालफीताशाही बाधाओं को दूर करने तथा राष्ट्रीय विकास को गति देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
| और पढ़ें: प्रगति |
दुलहस्ती चरण-II परियोजना
चर्चा में क्यों?
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) की विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (EAC) ने दुलहस्ती चरण-II जलविद्युत परियोजना के लिये पर्यावरणीय स्वीकृति की अनुशंसा की है।
सारांश
EAC ने चिनाब नदी पर स्थित 260 मेगावाट दुलहस्ती चरण-II जलविद्युत परियोजना को पर्यावरणीय स्वीकृति देने की अनुशंसा की है।
रणनीतिक दृष्टि से, यह परियोजना मौजूदा अवसंरचना का उपयोग करती है और निलंबित सिंधु जल संधि की पृष्ठभूमि में भारत की ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करती है।
दुलहस्ती चरण-II रन-ऑफ-द-रिवर (ROR) जलविद्युत परियोजना क्या है?
- स्थान एवं क्षमता: यह 260 मेगावाट (2×130 मेगावाट) की भूमिगत पावरहाउस परियोजना है, जो जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ ज़िले में चिनाब नदी पर स्थित है।
- डिज़ाइन एवं कार्यप्रणाली: यह एक रन-ऑफ-द-रिवर (ROR) परियोजना है। दुलहस्ती-II, दुलहस्ती चरण-I की मौजूदा अवसंरचना का उपयोग करेगी तथा मरुसुदर नदी (चिनाब की सहायक नदी) का जल पाकल दुल जलविद्युत परियोजना के माध्यम से दुलहस्ती जलाशय में लाएगी। 390 मेगावाट दुलहस्ती-I, जो एक ROR परियोजना है, वर्ष 2007 में चालू की गई थी।
- पाकल दुल जलविद्युत परियोजना मरुसुदर नदी पर निर्माणाधीन 1,000 मेगावाट की एक रन-ऑफ-द-रिवर (ROR) जलविद्युत परियोजना है। इसमें 167 मीटर ऊँचा कंक्रीट-फेस रॉकफिल बाँध शामिल है, जो भारत में सिंधु नदी प्रणाली का सबसे ऊँचा बाँध है।
- ROR परियोजना नदी के प्राकृतिक प्रवाह और ऊँचाई के अंतर का उपयोग कर विद्युत उत्पन्न करती है तथा इसमें जल संग्रहण के लिये किसी विशाल जलाशय का निर्माण नहीं किया जाता।
- रणनीतिक महत्त्व: पहलगाम आतंकी हमले के बाद वर्ष 1960 की सिंधु जल संधि (IWT) के निलंबन के पश्चात इस परियोजना को गति मिली।
- यह परियोजना चिनाब नदी पर जलविद्युत परियोजनाओं की शृंखला (कैस्केड) में वृद्धि करेगी, जिसमें पहले से संचालित परियोजनाएँ—दुलहस्ती-I (390 मेगावाट, किश्तवाड़), बागलीहार (890 मेगावाट, रामबन), सालाल (रियासी) तथा निर्माणाधीन परियोजनाएँ—रैटल (850 मेगावाट), किरू (624 मेगावाट) और क्वार (540 मेगावाट) शामिल हैं।
MoEF&CC की विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (EAC) क्या है?
- परिचय: विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (ESC) एक बहु-विषयक, क्षेत्र-विशिष्ट समिति है जिसका गठन केंद्र सरकार द्वारा पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) अधिसूचना, 2006 के तहत किया गया है।
- प्राथमिक भूमिका: यह एक सिफारिशी निकाय है जो EIA कानून के तहत पर्यावरणीय मंजूरी की आवश्यकता वाले औद्योगिक और अवसंरचना परियोजनाओं की जाँच, दायरा निर्धारण और विस्तृत मूल्यांकन के लिये ज़िम्मेदार है।
- क्षेत्रीय संरचना: केंद्रीय स्तर पर 9 EAC हैं, जिनमें से प्रत्येक विशिष्ट परियोजना श्रेणियों के मूल्यांकन के लिये समर्पित है, जैसे कि नदी घाटी और जलविद्युत परियोजनाएँ (RVHEP), थर्मल और कोयला खनन, परमाणु, रणनीतिक और रक्षा परियोजनाएँ आदि।
- संरचना एवं कार्यकाल: प्रत्येक EAC में निर्धारित योग्यताओं के आधार पर चयनित अधिकतम 15 विषय विशेषज्ञ होते हैं। समितियों का पुनर्गठन प्रत्येक तीन वर्ष में किया जाता है (एक वर्ष के विस्तार की संभावना के साथ)।
- निर्णय लेने की प्रक्रिया: EC आम सहमति और सामूहिक उत्तरदायित्व के आधार पर कार्य करता है। इसकी अंतिम सिफारिश पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) को प्रस्तुत की जाती है, जो पर्यावरण मंज़ूरी देने या अस्वीकार करने का अंतिम निर्णय लेता है।
सिंधु जल संधि
- परिचय: सिंधु जल संधि (IWT) भारत और पाकिस्तान के बीच एक द्विपक्षीय जल-साझाकरण समझौता है, जिसकी मध्यस्थता विश्व बैंक ने की थी और जिस पर वर्ष 1960 में हस्ताक्षर किये गए थे।
- यह सिंधु नदी और उसकी पाँच प्रमुख सहायक नदियों- सतलुज, ब्यास, रावी, झेलम और चिनाब- के जल के वितरण और उपयोग को नियंत्रित करता है।
- जल आवंटन: संधि के अनुसार भारत को पूर्वी तीन नदियों (रावी, ब्यास और सतलुज ) पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त है। वहीं, पाकिस्तान को पश्चिमी तीन नदियाँ ( सिंधु, झेलम और चिनाब ) आवंटित की गई हैं।
- भारत को कुछ निर्धारित शर्तों के अधीन, निर्दिष्ट घरेलू, गैर-उपभोग्य, कृषि और जलविद्युत उद्देश्यों के लिये पश्चिमी नदियों के सीमित उपयोग की अनुमति है।
- कुल मिलाकर, पाकिस्तान को सिंधु नदी प्रणाली से लगभग 80% पानी प्राप्त होता है, जबकि भारत को लगभग 20% पानी प्राप्त होता है।
- स्थायी सिंधु आयोग (PIC): संधि के तहत एक स्थायी सिंधु आयोग (PIC) की स्थापना की गई है, जिसमें दोनों देशों के आयुक्त शामिल हैं। PIC को संधि के कार्यान्वयन की निगरानी करने और नियमित मुद्दों को हल करने के लिये वर्ष में कम-से-कम एक बार बैठक करना अनिवार्य है।
- विवाद निपटान प्रक्रिया (अनुच्छेद IX):
- प्रथम चरण: व्याख्या या क्रियान्वयन से संबंधित विवादों अथवा प्रश्नों का समाधान स्थायी सिंधु आयोग (PIC) के भीतर परामर्श/चर्चा के माध्यम से किया जाएगा।
- द्वितीय चरण: यदि स्थायी सिंधु आयोग (PIC) द्वारा समाधान नहीं हो पाता, तो कोई भी आयुक्त विश्व बैंक से एक तटस्थ विशेषज्ञ नियुक्त करने का अनुरोध कर सकता है।
- तीसरा चरण: यदि किसी मुद्दे को "विवाद" माना जाता है या यह न्यूट्रल एक्सपर्ट के दायरे से बाहर आता है, तो किसी भी पक्ष द्वारा विश्व बैंक के माध्यम से मध्यस्थता (Arbitration) न्यायालय की स्थापना का अनुरोध किया जा सकता है।
चिनाब
- परिचय: चिनाब सिंधु नदी प्रणाली की एक ट्रांसबाउंड्री नदी है, जो भारत और पाकिस्तान में फैली हुई है।
- यह हिमाचल प्रदेश के उच्च हिमालयों (लाहौल में बरालाचा पास) से चंद्रभागा के रूप में निकलती है, जो चंद्रा और भागा नदियों के संगम से बनती है।
- मुख्य उपनदियाँ: प्रमुख उपनदियाँ हैं मारूसुदर (सबसे बड़ी), मियार नाला, भूट नाला, कलनाई, अंस, तावी और नीरू नदियाँ।
- प्रवाह और मार्ग: यह नदी जम्मू और कश्मीर के किश्तवाड़, डोडा, रामबन तथा रियासी ज़िलों से उत्तर-पश्चिम की ओर बहती है, गहरी घाटियों को काटते हुए, फिर पाकिस्तान के पंजाब मैदानों में प्रवेश करती है, जहाँ यह सतलज से मिलकर पंजराद (Panjnad) बनाती है, जो आगे चलकर सिंधु नदी में मिल जाती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (EAC) क्या है?
EAC एक क्षेत्र-विशेष सिफारिशी संस्था है, जो EIA अधिसूचना, 2006 के तहत पर्यावरणीय मंज़ूरी के लिये परियोजनाओं का विशेषज्ञों की सहमति के आधार पर मूल्यांकन करती है।
2. दुलहस्ती चरण-II किस तरह की परियोजना है?
यह जम्मू और कश्मीर की चेनाब नदी पर स्थित 260 मेगावाट का रन-ऑफ-दी-रिवर हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट है।
3. सिंधु जल संधि (1960) भारत और पाकिस्तान के बीच नदी के पानी का बँटवारा कैसे करती है?
IWT तीन पूर्वी नदियाँ (रावी, ब्यास, सतलुज) भारत को और तीन पश्चिमी नदियाँ (सिंधु, झेलम, चिनाब) पाकिस्तान को देता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रश्न. सिंधु नदी प्रणाली के संदर्भ में निम्नलिखित चार नदियों में से तीन नदियाँ इनमें से किसी एक नदी में मिलती हैं जो सीधे सिंधु से मिलती है। निम्नलिखित में से वह नदी कौन-सी है जो सीधे सिंधु से मिलती है? (2021)
(a) चिनाब
(b) झेलम
(c) रावी
(d) सतलुज
उत्तर: (d)
प्रश्न. निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिये (2019)
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हिमनद |
नदी |
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1. बंदरपूँछ |
यमुना |
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2. बारा शिग्री |
चेनाब |
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3. मिलाम |
मंदाकिनी |
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4. सियाचिन |
नुब्रा |
|
5. जेमू |
Manas |
उपर्युक्त में से कौन-से युग्म सही सुमेलित हैं?
(a) 1, 2 और 4
(b) 1, 3 और 4
(c) 2 और 5
(d) 3 और 5
उत्तर: (a)
