प्रिलिम्स फैक्ट्स (27 Mar, 2026)



RBI के लिये 4% मुद्रास्फीति लक्ष्य बरकरार

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों

भारत सरकार ने 1 अप्रैल, 2026 से 31 मार्च, 2031 तक की अगली 5 वर्ष की अवधि के लिये 4% खुदरा मुद्रास्फीति (महँगाई) लक्ष्य (+/- 2% बैंड के साथ) को बरकरार रखा है। यह वर्ष 2016 में अपनाए गए लचीली मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण ढाँचे (फ्लेक्सिबल इन्फ्लेशन टारगेटिंग- FIT) को और मज़बूती प्रदान करता है।

फ्लेक्सिबल इन्फ्लेशन टारगेटिंग (FIT) क्या है?

  • परिचय: लचीली मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (फ्लेक्सिबल इन्फ्लेशन टारगेटिंग- FIT) मौद्रिक नीति का वह ढाँचा है, जिसमें केंद्रीय बैंक आर्थिक विकास और रोज़गार जैसे अन्य कारकों पर विचार करते हुए, मुख्य रूप से ब्याज दरों के माध्यम से मुद्रास्फीति दर को एक विशिष्ट, सार्वजनिक रूप से घोषित लक्ष्य सीमा के भीतर बनाए रखने के लिये अपने उपकरणों का उपयोग करता है।
    • ‘कठोर’ मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण के विपरीत, जो केवल मूल्य स्थिरता पर केंद्रित होता है, वहीं ‘लचीली’ नीति केंद्रीय बैंक को वास्तविक अर्थव्यवस्था में अत्यधिक अस्थिरता (जैसे– बेरोज़गारी में तीव्र वृद्धि या सकल घरेलू उत्पाद में गिरावट) से बचने के लिये निर्धारित लक्ष्य से अल्पकालिक विचलन को सहन करने की अनुमति देती है।
  • कानूनी आधार: मौद्रिक नीति का प्राथमिक लक्ष्य विकास को ध्यान में रखते हुए मूल्य स्थिरता बनाए रखना है, जैसा कि संशोधित भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934  की धारा 45-ZA के तहत अनिवार्य किया गया है।
    • वैश्विक स्तर पर न्यूज़ीलैंड वर्ष 1990 में मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (Inflation Targeting - IT) को अपनाने वाला पहला देश था। इसके विपरीत, भारत ने उर्जित पटेल समिति की सिफारिशों के आधार पर वर्ष 2016 में औपचारिक रूप से FIT (लचीला मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण) नीति को अपनाया।
  • भारत में FIT के घटक:
    • लक्ष्य: भारत सरकार भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के परामर्श से, मुद्रास्फीति के लिये एक संख्यात्मक लक्ष्य निर्धारित करती है। वर्तमान में यह लक्ष्य 4% है, जिसमें +/- 2% की सहनशीलता सीमा दी गई है। इसका अर्थ है कि मुद्रास्फीति की स्वीकार्य सीमा 2% से 6% के बीच होनी चाहिये।
    • एंकर (Anchor): यह ढाँचा मुद्रास्फीति को मापने के लिये प्राथमिक एंकर के रूप में हेडलाइन उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) का उपयोग करता है (जिसका आधार वर्ष 2024 है)।
    • निर्णयकर्त्ता: मौद्रिक नीति समिति (MPC) मुद्रास्फीति को प्रभावित करने के लिये रेपो रेट (Repo Rate) तय करने हेतु वर्ष में कम-से-कम 4 बार बैठक करती है। रेपो रेट वह दर है जिस पर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) वाणिज्यिक बैंकों को ऋण देता है।
    • जवाबदेही: यदि भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) मुद्रास्फीति के लक्ष्य को प्राप्त करने में विफल रहता है (अर्थात महंगाई लगातार 3 तिमाहियों तक 2% से 6% की सीमा से बाहर रहती है), तो उसे सरकार को एक विस्तृत रिपोर्ट सौंपनी होगी। इस रिपोर्ट में विफलता के कारण, सुधारात्मक उपाय और लक्ष्य तक वापस पहुँचने के लिये एक अनुमानित समय-सीमा की जानकारी देनी अनिवार्य है।
  • प्रदर्शन की समीक्षा: पिछले 9 वर्षों (2016-25) के दौरान लचीली मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण का प्रदर्शन एक 'हंप-आकार' (Hump-shaped) के समान रहा है। इसमें पहले और अंतिम तीन-वर्षीय खंड 4% के लक्ष्य के अनुरूप रहे। इसके विपरीत बीच के तीन वर्षों में कोविड-19 महामारी तथा रूस-यूक्रेन संघर्ष के कारण मुद्रास्फीति 6% की ऊपरी सहनशीलता सीमा की ओर झुकी हुई देखी गई।
    • वर्ष 2016 में FIT को अपनाने के बाद से औसत मुद्रास्फीति घटकर 4.9% रह गई, जबकि FIT से पहले की अवधि में यह 6.8% थी।

मौद्रिक नीति

  • परिचय: यह वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से किसी देश का केंद्रीय बैंक (भारत में भारतीय रिज़र्व बैंक- RBI) विशिष्ट व्यापक आर्थिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये अर्थव्यवस्था में मुद्रा की आपूर्ति और ब्याज दरों का प्रबंधन करता है।
  • मुख्य उद्देश्य:
    • मूल्य स्थिरता: मुद्रास्फीति को एक निर्धारित दायरे (वर्तमान में 4% ± 2%) के भीतर बनाए रखना, ताकि नागरिकों की क्रय शक्ति सुरक्षित रह सके।
    • आर्थिक विकास: यह सुनिश्चित करना कि कृषि और उद्योग जैसे उत्पादक क्षेत्रों को सुलभ एवं किफायती ऋण उपलब्ध हो सके।
    • विनिमय दर स्थिरता: रुपये के मूल्य को डॉलर जैसी विदेशी मुद्राओं के मुकाबले संतुलित बनाए रखना, ताकि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को सुगम बनाया जा सके।

मुख्य उपकरण:

उपकरण

मुद्रास्फीति कम करने के उपाय

अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

रेपो रेट 

वृद्धि

उधार लेना महंगा हो जाता है, उपभोग और निवेश धीमा पड़ जाता है।

नकद आरक्षित अनुपात (CRR)

वृद्धि

बैंकों को भारतीय रिज़र्व बैंक के पास अधिक नकद रखना पड़ता है, जिससे ऋण देने के लिये उनके पास कम धन बचता है।

खुला बाज़ार परिचालन (OMO)

सरकारी प्रतिभूतियाँ बेचें

भारतीय रिज़र्व बैंक बैंकिंग प्रणाली से अतिरिक्त तरलता को बाहर निकालता है।

वैधानिक तरलता अनुपात (SLR)

वृद्धि

बैंकों को सुरक्षित सरकारी परिसंपत्तियों में अधिक निवेश करना पड़ता है, जिससे निजी क्षेत्र को मिलने वाला ऋण कम हो जाता है।

  • मौद्रिक नीति के प्रकार: मौद्रिक नीति को आमतौर पर इसके उद्देश्य के आधार पर दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है अर्थात क्या केंद्रीय बैंक आर्थिक गतिविधि को तेज़ करना चाहता है या धीमा करना चाहता है।
    • विस्तारवादी (डविश) मौद्रिक नीति: इस नीति का उपयोग आर्थिक मंदी के दौरान मांग को बढ़ावा देने और मुद्रा आपूर्ति को बढ़ाने के लिये किया जाता है। इसके तहत RBI आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करने के लिये नीतिगत दरों (जैसे– रेपो दर) को कम करता है।
    • संकुचनवादी (हॉकिश) मौद्रिक नीति: इस नीति का उपयोग तब किया जाता है जब अर्थव्यवस्था "ओवरहीटिंग" हो और मुद्रास्फीति की सहिष्णु सीमा से ऊपर हो। इसके तहत RBI नीतिगत दरों में वृद्धि करता है जो खर्च को कम करता है और प्रणाली से अतिरिक्त तरलता को "शक" कर लेता है।
  • भारत में मौद्रिक नीति के रुख: मौद्रिक नीति समिति (MPC) प्रायः बाज़ार को अपने भविष्य के इरादों को संप्रेषित करने के लिये विशिष्ट "रुख" का उपयोग करती है:
    • समायोजनात्मक: विकास का समर्थन करने के लिये दरों में कटौती करने या उन्हें कम रखने के लिये तैयार (विस्तारवादी)।
    • तटस्थ: दरें आगामी आँकड़ों के आधार पर किसी भी दिशा (ऊपर या नीचे) में जा सकती हैं।
    • हॉकिश: सख्ती से मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने पर केंद्रित, दरों में वृद्धि की संभावना (संकुचनवादी)।
    • समायोजन वापस लेना: यह एक संक्रमणकालीन चरण है जिसमें RBI उस अतिरिक्त धन को सिस्टम से निकालना शुरू कर देता है जिसे उसने संकट के समय (जैसे कि महामारी के बाद की अवधि) में एकत्रित किया था।

Monetary Policy Committee

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. FIT फ्रेमवर्क के तहत RBI का वर्तमान मुद्रास्फीति लक्ष्य क्या है?
यह लक्ष्य 4% है, जिसमें ±2% की सहनशीलता सीमा (अर्थात 2% से 6%) निर्धारित है। यह अवधि 1 अप्रैल, 2026 से 31 मार्च, 2031 तक के लिये लागू है।

2. भारत में मुद्रास्फीति लक्ष्य निर्धारण का वैधानिक आधार क्या है?
यह RBI अधिनियम, 1934 की धारा 45-ZA के तहत निर्धारित है, जिसके अनुसार सरकार RBI के साथ परामर्श करके प्रति पाँच वर्ष में मुद्रास्फीति लक्ष्य तय करती है।

3. यदि RBI मुद्रास्फीति को निर्धारित सीमा के भीतर बनाए रखने में विफल रहता है तो क्या होता है?
यदि मुद्रास्फीति लगातार तीन तिमाहियों तक 2%-6% की सीमा से बाहर रहती है, तो RBI को सरकार को एक रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होती है, जिसमें कारणों और सुधारात्मक उपायों का उल्लेख होता है।

4. MPC मुद्रास्फीति को कैसे प्रभावित करती है?
RBI गवर्नर की अध्यक्षता वाली छह सदस्यीय MPC रेपो दर निर्धारित करती है। इस नीतिगत दर में परिवर्तन करके MPC धन आपूर्ति और उधार लागत को नियंत्रित करती है, जिससे मुद्रास्फीति को लक्ष्य के अनुरूप रखा जा सके।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रश्न 1. भारत में, निम्नलिखित में कौन मुद्रास्फीति को नियंत्रित कर कीमत स्थिरता बनाए रखने के लिये उत्तरदायी है ? (2022)

(a) उपभोक्ता मामले विभाग

(b) व्यय प्रबंधन आयोग

(c) वित्तीय स्थिरता और विकास परिषद

(d) भारतीय रिज़र्व बैंक

उत्तर: (d)


प्रश्न 2. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2020)

  1. खाद्य वस्तुओं का ‘उपभोक्ता मूल्य सूचकांक’ (CPI) भार (Wegitage) उनके ‘थोक मूल्य सूचकांक’ (WPI) में दिये गए भार से अधिक है।
  2.  WPI सेवाओं के मूल्यों में होने वाले परिवर्तनों को शामिल नहीं करता है, जैसा कि CPI करता है।
  3.  भारतीय रिज़र्व बैंक ने अब मुद्रास्फीति के मुख्य मान तथा प्रमुख नीतिगत दरों के निर्धारण हेतु WPI को अपना लिया है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2
(c) केवल 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a)


प्रश्न 3. यदि भारतीय रिज़र्व बैंक एक विस्तारवादी मौद्रिक नीति अपनाने का निर्णय लेता है, तो वह निम्नलिखित में से क्या नहीं करेगा? (2020)

1. वैधानिक तरलता अनुपात में कटौती और अनुकूलन

2. सीमांत स्थायी सुविधा दर में बढ़ोतरी

3. बैंक रेट और रेपो रेट में कटौती

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 2

(c) केवल 1 और 3

(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)


प्रश्न 4. मौद्रिक नीति समिति (MPC) के संबंध में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (2017)

1. यह आरबीआई की बेंचमार्क ब्याज दरों को तय करती है।

2. यह आरबीआई के गवर्नर सहित 12 सदस्यीय निकाय है, जिसका प्रतिवर्ष पुनर्गठन किया जाता है।

3. यह केंद्रीय वित्त मंत्री की अध्यक्षता में कार्य करती है।

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1

(b) केवल 1 और 2

(c) केवल 3

(d) केवल 2 और 3

उत्तर: (a)


प्रश्न 5. भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा बैंक दर को कम करना _______की ओर जाता है: (2011)

(a) बाज़ार में अधिक तरलता

(b) बाज़ार में कम तरलता

(c) बाज़ार में तरलता में कोई बदलाव नहीं

(d) वाणिज्यिक बैंकों द्वारा अधिक जमा जुटाना

उत्तर: (a)


संशोधित उड़ान योजना

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों? 

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने क्षेत्रीय विमानन को सुदृढ़ करने और पिछले चरणों की व्यवहार्यता संबंधी समस्याओं के समाधान करने के उद्देश्य से, ₹28,840 करोड़ के परिव्यय के साथ वर्ष 2026-2036 के लिये क्षेत्रीय कनेक्टिविटी हेतु संशोधित उड़ान (UDAN) योजना को मंज़ूरी दे दी है।

क्षेत्रीय कनेक्टिविटी हेतु संशोधित उड़ान योजना क्या है?

  • परिचय: केंद्रीय बजट 2025-26 में पेश की गई संशोधित उड़ान योजना, उड़ान (उड़े देश का आम नागरिक) पहल का एक नया रूप है, जिसका उद्देश्य वहनीय हवाई यात्रा सुनिश्चित करना, टियर-2 और टियर-3 शहरों से कनेक्टिविटी में सुधार करना और बुनियादी ढाँचे के विकास और दीर्घकालिक परिचालन स्थिरता दोनों को बढ़ावा देना है।
  • संशोधित उड़ान योजना की आवश्यकता: मूल उड़ान योजना, जिसे अक्तूबर 2016 में शुरू किया गया था, के परिचालन क्षेत्र में 663 मार्गों को सफलतापूर्वक शामिल किया जा चुका है और इसके माध्यम से 162.47 लाख से अधिक यात्रियों को सेवा प्रदान की गई है। हालाँकि, इसे स्थिरता संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ा, जिसके कारण संशोधित उड़ान योजना की आवश्यकता महसूस हुई।
    • उच्च समापन दर: भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की एक रिपोर्ट के अनुसार, प्रारंभिक सब्सिडी अवधि समाप्त होने के बाद केवल 7% से 10% मार्ग ही आर्थिक रूप से व्यवहार्य बने रहे।
      • मूल रूप से, एयरलाइंस के लिये टियर-2 और टियर-3 मार्गों पर एक आत्मनिर्भर बाज़ार विकसित करने हेतु, सब्सिडी पर निर्धारित तीन वर्ष की सीमा पर्याप्त नहीं थी।
  • परित्यक्त मार्ग और हवाई अड्डे: वर्ष 2017 से 663 मार्गों पर परिचालन कार्य शुरू किया गया जिसमें से, फरवरी 2026 तक 327 मार्ग परिचालन से बाहर हो गए थे। 
    • इसके अलावा इस योजना के तहत पुनर्निमित 95 हवाई अड्डों में से 15 पर परिचालन बंद कर दिया था।
  • संशोधित उड़ान योजना के मुख्य घटक:
    • व्यवहार्यता अंतर निधि (विजिबिलिटी फंड): हवाई किराए को वहनीय बनाए रखने के लिये (आधी सीटों के लिये प्रति घंटे उड़ान के 2,500 रुपये तक सीमित) सरकार एयरलाइन ऑपरेटरों को सब्सिडी देती है। 
      • संशोधित योजना के तहत, एयरलाइंस को लाभदायक मार्ग स्थापित करने हेतु अधिक समय प्रदान करने के लिये सब्सिडी की अवधि तीन वर्ष से बढ़ाकर पाँच वर्ष कर दी गई है।
    • प्रत्यक्ष सरकारी वित्तपोषण: सब्सिडी के लिये अब प्रमुख मार्गों के यात्री टिकटों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने के बजाय, यह वित्तीय सहायता प्रत्यक्ष सरकारी कोष से प्रदान की जाएगी।
    • परिचालन और रखरखाव (O&M) में सहायता: सरकार अब केवल हवाई अड्डों के निर्माण पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, कम यातायात वाले हवाई अड्डों को बंद होने से बचाने हेतु उनके दैनिक परिचालन लागतों के लिये सक्रिय रूप से सब्सिडी प्रदान करेगी।
    • व्यापक अवसंरचना विस्तार: इस योजना का लक्ष्य वर्तमान में अनुपयोगी हवाई पट्टियों से 100 हवाई अड्डों का विकास करना और दूरस्थ, पर्वतीय और द्वीपीय क्षेत्रों के लिये विशेष रूप से डिज़ाइन किये गए 200 आधुनिक हेलीपैड का निर्माण करना है।
    • स्वदेशी विमानन पर ध्यान केंद्रित करना: आत्मनिर्भर भारत पहल के अनुरूप, इस कार्यक्रम में दुर्गम इलाकों में उड़ान भरने के लिये स्थानीय स्तर पर निर्मित विमानों, जैसे कि HAL ध्रुव हेलीकॉप्टर और HAL डोर्नियर विमान, की खरीद के प्रावधान शामिल हैं।

UDAN योजना की पृष्ठभूमि क्या है?

  • परिचय: उड़ान नागरिक उड्डयन मंत्रालय की एक प्रमुख योजना है, जिसका उद्देश्य उड्डयन का लोकतंत्रीकरण करना और क्षेत्रीय संपर्क को सुदृढ़ करना है, जिससे दूरदराज के क्षेत्रों में भी हवाई यात्रा तक पहुँच सुनिश्चित हो सके।
    • वर्ष 2016 की राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन नीति (NCAP) के तहत शुरू की गई यह योजना बाज़ार-संचालित अपितु वित्तीय रूप से समर्थित मॉडल के माध्यम से टियर-2 और टियर-3 शहरों को जोड़ने पर केंद्रित है, जिसमें भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI) एक नोडल कार्यान्वयन एजेंसी है।
  • मूल तंत्र और वित्तपोषण: यह योजना वहनीय हवाई यात्रा को हवाई किराया सीमा के माध्यम से अनुरक्षित रखती है, जिसे केंद्र द्वारा व्यवहार्यता अंतर निधि (VGF) के माध्यम से वित्तीय सहयोग प्रदान किया जाता है।
    • यह योजना सहयोगी शासन को चरितार्थ करती है, जिसमें लैंडिंग शुल्क माफ करना और एविएशन टरबाइन फ्यूल (ATF) पर VAT को 1% या उससे कम करने के लिये राज्यों की प्रतिबद्धता शामिल हैं।
  • व्यापक अवसंरचना विस्तार: भारत के समग्र हवाई अड्डा नेटवर्क का विस्तार दोगुने से अधिक हो गया है, जो वर्ष 2014 में 74 हवाई अड्डों से बढ़कर वर्ष 2024 में 159 हवाई अड्डों तक पहुँच गया है।
  • सामरिक विकास (उड़ान 1.0 से 5.0): इस पहल ने व्यवस्थित रूप से अपने दायरे का विस्तार कम सेवा वाले हवाई अड्डों को जोड़ने से लेकर उड़ान 2.0 में हेलीपैड शामिल करने, उड़ान 3.0 में पर्यटन मार्गों तक विस्तार करने, उड़ान 4.0 में पर्वतीय क्षेत्रों, पूर्वोत्तर तथा द्वीपीय क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने और उड़ान 5.0 के तहत सीप्लेन संचालन को बढ़ावा देने तक किया है।

 

  • कृषि उड़ान का एकीकरण: कृषि उड़ान, एक महत्त्वपूर्ण बहु-मंत्रालयी योजना है जो कृषि उपज के लिये समय पर और लागत प्रभावी हवाई रसद प्रदान करने के लिये हवाई नेटवर्क को शामिल करती है, जिसमें 58 हवाई अड्डों को समाहित करते हुए जनजातीय, पर्वतीय और पूर्वोत्तर क्षेत्रों के किसानों के लिये उनके उत्पादों हेतु उचित मूल्यों की प्राप्ति पर ध्यान केंद्रित किया गया है।

UDAN

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. उड़ान योजना का उद्देश्य क्या है?
इसका उद्देश्य हवाई यात्रा को वहनीय बनाना और विशेष रूप से टियर-2 और टियर-3 शहरों में क्षेत्रीय संपर्क को सुदृढ़ करना है।

2. संशोधित उड़ान योजना में मुख्य बदलाव क्या है?
यह सब्सिडी की अवधि को 3 से 5 वर्ष तक बढ़ाती है और वित्तपोषण को सरकारी राजस्व से समर्थित करती है।

3. उड़ान में व्यवहार्यता अंतर निधि (VGF) क्या है?
यह हवाई किराए को वहनीय बनाए रखने और गैर-व्यवहार्य मार्गों का समर्थन करने के लिये एयरलाइनों को दी जाने वाली सरकारी सब्सिडी है।

4. उड़ान योजना किस नीति के तहत शुरू की गई थी?
यह राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन नीति (NCAP), 2016 के तहत शुरू की गई थी।

5. कृषि उड़ान की क्या भूमिका है?
यह कृषि उत्पादों को हवाई परिवहन की सुविधा प्रदान करता है, जिससे बाज़ार तक पहुँच और किसानों की आय में सुधार होता है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रश्न. सार्वजनिक-निज़ी भागीदारी (PPP) मॉडल के अधीन संयुक्त उपक्रमों के माध्यम से भारत में विमानपत्तनों के विकास का परीक्षण कीजिये। इस संबंध में प्राधिकरणों के समक्ष कौन-सी चुनौतियाँ हैं? (2017)


द्वारका बेसिन

स्रोत: द हिंदू 

वैज्ञानिकों ने हाल ही में द्वारका बेसिन में जीवाश्म स्थल खोजे हैं, जो प्रारंभिक मियोसीन युग (23 मिलियन से 5.3 मिलियन वर्ष पहले) का झरोखा प्रस्तुत करते हैं। यहाँ 42 घोंघा प्रजातियों की पहचान की गई, जो इस क्षेत्र के ऐतिहासिक रूप से उष्ण और पोषक तत्त्वों से समृद्ध होने का संकेत देती हैं।

घोंघों के अलावा, तलछटी परतें फोरामिनिफेरा (सूक्ष्म समुद्री जीव जिनके खोल/शेल्स होते हैं) से समृद्ध हैं। यह बेसिन ऊर्जा कंपनियों के लिये भी आकर्षण का केंद्र है, जो ज्वालामुखीय चट्टानों की परतों के नीचे तेल और गैस के भंडार की खोज कर रही हैं।

द्वारका बेसिन

  • परिचय: द्वारका बेसिन (जलमग्न द्वारका शहर) गुजरात, भारत के आधुनिक द्वारका और बेट द्वारका के तट के पास स्थित एक शृंखला है, जिसमें जल-पुरातात्त्विक अवशेष पाए जाते हैं। यह गुजरात के सौराष्ट्र प्रायद्वीप के पश्चिमी छोर पर स्थित है।
    • भूविज्ञानी सुझाव देते हैं कि यह शहर ग्लेशियल युग के बाद समुद्र स्तर में वृद्धि, टेक्टोनिक गतिविधियों या सैकड़ों वर्षों में तटीय क्षरण के कारण जलमग्न हो सकता है।
    • हालाँकि, कई लोगों का व्यापक रूप से यह मानना है कि यह भगवान कृष्ण का पौराणिक राज्य था, जिसे महाभारत और पुराणों  के अनुसार उनके संसार से प्रस्थान करने के बाद अरब सागर ने निगल लिया। इसे पारंपरिक रूप से कलियुग में संक्रमण के रूप में देखा जाता है।
  • समयरेखा: कुछ पुरातत्त्वविदों, जैसे कि दिवंगत डॉ. एस.आर. राव, ने इन अवशेषों की उम्र लगभग 1500-2000 ईसा पूर्व (प्रोटोऐतिहासिक काल) निर्धारित की है, जो हड़प्पा सभ्यता की समाप्ति के समय से संबंधित है।
  • पुरापुरातात्त्विक विरासत: 1980 के दशक से, भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (ASI) ने विशाल बलुआ पत्थर के ब्लॉकों, अर्द्धवृत्ताकार संरचनाओं और दीवार जैसी बनावटों का दस्तावेज़ीकरण किया है। विभिन्न प्रकार के 120 से अधिक पत्थर के लंगर/एंकर्स (त्रिकोणीय, ग्रैप्नेल और रिंग-स्टोन) पाए गए हैं, जो इस क्षेत्र के प्राचीन समय में एक प्रमुख बंदरगाह और घाट/जेटी होने की पुष्टि करते हैं।
    • खुदाई में मिट्टी के बर्तन के टुकड़े, तांबे की वस्तुएँ, लोहे के अयस्क और मनके प्राप्त हुए हैं। एक महत्त्वपूर्ण खोज एक मुहर थी जिसमें तीन सिर वाले पशु का चित्रण किया गया था।
  • आधुनिक महत्त्व: वर्तमान द्वारका शहर में द्वारकाधीश मंदिर (जगत मंदिर) स्थित है, जो एक प्रमुख कृष्ण भक्ति स्थल है और जिसे 1472 में महमूद बेगड़ा द्वारा ध्वंस किये जाने के बाद 15वीं-16वीं शताब्दी में पुनर्निर्मित किया गया था। यहाँ शारदा पीठ भी स्थित है, जो आदिशंकराचार्य द्वारा स्थापित पश्चिमी मठ है।
    • गुजरात सरकार इन जल-स्थल संरचनाओं तक आम जनता की पहुँच के लिये सबमरीन पर्यटन शुरू करने की योजना बना रही है।
    • यह चार धाम तीर्थस्थलों में से एक है, जिसमें उत्तर में बद्रीनाथ, पूर्व में जगन्नाथपुरी और दक्षिण में रामेश्वरम शामिल हैं।

Dwarka

और पढ़ें: द्वारका और बेट द्वारका


प्रीह विहियर मंदिर

स्रोत: टाइम्स ऑफ इंडिया

खमेर वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण, प्रीह विहियर मंदिर, कंबोडिया और थाईलैंड के बीच तीव्र सैन्य झड़पों के बाद वर्तमान में गंभीर संरचनात्मक क्षरण का सामना कर रहा है।

प्रीह विहियर मंदिर

  • परिचय: यह खमेर साम्राज्य द्वारा निर्मित एक प्राचीन हिंदू मंदिर है, जो कंबोडिया और थाईलैंड की सीमा पर दांगरेक पर्वत शृंखला में 525 मीटर ऊँची चट्टान के शीर्ष पर स्थित है।
    • मूल रूप से यह मंदिर हिंदू देवता शिव को समर्पित था, लेकिन बाद में यह बौद्ध स्थल में परिवर्तित हो गया, जो इस क्षेत्र के धार्मिक विकास और परिवर्तन को दर्शाता है।
  • निर्माण: हालाँकि इस मंदिर का निर्माण 9वीं शताब्दी में शुरू हुआ था, लेकिन इसके सबसे महत्त्वपूर्ण संरचनात्मक हिस्से खमेर राजाओं सूर्यवर्मन प्रथम और सूर्यवर्मन द्वितीय के शासनकाल में बनाए गए थे। सूर्यवर्मन द्वितीय ने ही अंकोर वाट का भी निर्माण किया था, जो कंबोडिया में स्थित एक हिंदू-बौद्ध मंदिर परिसर है।
  • विशिष्ट संरचना: अधिकांश खमेर मंदिरों के विपरीत, जो पूर्व दिशा की ओर मुख किये हुए आयताकार योजना में बने होते हैं, प्रीह विहियर मंदिर लगभग 800 मीटर लंबी उत्तर-दक्षिण धुरी पर निर्मित है।
    • इसमें अभयारण्यों की एक शृंखला शामिल है, जो मार्गों और सीढ़ियों से जुड़ी हुई है और चट्टान के किनारे की ओर ऊपर उठती जाती है। यह संरचना पवित्र मेरु पर्वत (जो हिंदू, जैन और बौद्ध ब्रह्मांडीय मान्यताओं में वर्णित पाँच शिखरों वाला पवित्र पर्वत है) का प्रतीक है।
  • यूनेस्को स्थिति: इसे वर्ष 2008 में UNESCO द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया था, क्योंकि यह ‘खमेर वास्तुकला की उत्कृष्ट कृति’ है और इसमें असाधारण पत्थर की नक्काशीदार सजावट पाई जाती है।
  • क्षेत्रीय विवाद: वर्ष 1904 में फ्राँस (जो उस समय कंबोडिया पर शासन कर रहा था) और सियाम (थाईलैंड) के बीच हुए एक संधि में प्रीह विहियर मंदिर को थाईलैंड में स्थित माना गया था। हालाँकि वर्ष 1907 में फ्राँसीसी अधिकारियों द्वारा बनाए गए एक मानचित्र में इसे कंबोडिया के क्षेत्र में दर्शाया गया और थाईलैंड ने कई दशकों तक इस मानचित्र पर आधिकारिक आपत्ति नहीं जताई।
  • ICJ निर्णय: अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने वर्ष 1962 में निर्णय दिया कि यह मंदिर कंबोडिया का है और इस निर्णय की वर्ष 2013 में भी पुनः पुष्टि की गई। वर्तमान में यह मंदिर कंबोडिया के प्रशासन के अधीन है।
    • वर्ष 2025 के अंत और वर्ष 2026 की शुरुआत में कंबोडिया और थाईलैंड के बीच फिर से बढ़े सैन्य तनाव के दौरान सभी पाँच प्रवेश मंडप (गोपुरम) क्षतिग्रस्त हो गए।

Preah_Vihear_Temple

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