प्रिलिम्स फैक्ट्स (22 Jan, 2026)



सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी

स्रोत: द हिंदू

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने वर्ष 2026 के BRICS शिखर सम्मेलन (आयोजक: भारत) के एजेंडे में BRICS देशों की सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDCs) को जोड़ने का प्रस्ताव शामिल करने की सिफारिश की है।

सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी क्या है?

  • परिचय: सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) किसी देश की फिएट मुद्रा का डिजिटल रूप है, जिसे सीधे उसके केंद्रीय बैंक द्वारा जारी और समर्थित किया जाता है। यह केंद्रीय बैंक की देनदारी का प्रतिनिधित्व करती है, जैसे– भौतिक नकदी (नोट और सिक्के) या वाणिज्यिक बैंकों द्वारा केंद्रीय बैंक में रखे गए रिज़र्व।
    • क्रिप्टोकरेंसी जैसे बिटकॉइन के विपरीत, जो विकेंद्रीकृत और आमतौर पर अस्थिर होती हैं, CBDC केंद्रीकृत होती है, मूल्य में स्थिर (राष्ट्रीय मुद्रा से जुड़ी हुई) होती है और कानूनी मुद्रा के रूप में काम करती है।
  • कार्यप्रणाली: CBDC में सुरक्षा, अखंडता और प्रमाणीकरण सुनिश्चित करने के लिये क्रिप्टोग्राफी का उपयोग किया जाता है।
    • तकनीक में डेटा सुरक्षा के लिये एंक्रिप्शन और लेन-देन को अधिकृत करने हेतु डिजिटल हस्ताक्षर शामिल हैं।
    • प्राइवेसी बढ़ाने वाली तकनीकें ज़ीरो-नॉलेज प्रूफ गुमनामी और नियमन के बीच संतुलन बनाए रखती हैं।
  • उद्देश्य: इसका लक्ष्य भुगतान प्रणालियों को आधुनिक बनाना है, खासकर निजी डिजिटल मुद्राओं (जैसे– स्टेबलकॉइन) के बढ़ते प्रभाव और नकद उपयोग में कमी के दौर में, ताकि वित्तीय प्रणाली को अधिक कुशल तथा समावेशी बनाया जा सके।
  • लाभ: 

  • मुख्य विशेषताएँ:
    • जारीकर्त्ता और समर्थन: इसे केवल केंद्रीय बैंक द्वारा ही जारी किया जाता है, जो सरकार के पूर्ण विश्वास तथा क्रेडिट को सुनिश्चित करता है। इसे निजी संस्थाएँ या वाणिज्यिक बैंक जारी नहीं करते।
    • डिजिटल प्रकृति: यह केवल इलेक्ट्रॉनिक रूप में अस्तित्व में होती है, जिसे केंद्रीकृत लेज़र, डिस्ट्रिब्यूटेड लेज़र टेक्नोलॉजी (DLT) या हाइब्रिड प्रणालियों पर दर्ज किया जाता है। यह मुख्य निपटान (सेटलमेंट) के लिये मध्यस्थों पर निर्भर हुए बिना निर्बाध डिजिटल भुगतान को संभव बनाती है।
    • उद्देश्य और उपलब्धता: इसे भौतिक नकदी और मौजूदा बैंक जमा के पूरक (न कि उनके स्थानापन्न) के रूप में डिज़ाइन किया गया है। यह भुगतान का माध्यम, मूल्य की इकाई तथा मूल्य-संचय का साधन के रूप में कार्य करती है।
  • प्रकार: रिटेल CBDC (rCBDC) आम जनता के दैनिक भुगतानों, जैसे– स्थानांतरण और खरीदारी के लिये होती है। होलसेल CBDC (wCBDC) केवल बैंकों और संस्थानों तक सीमित रहती है, जिसका उपयोग अंतर-बैंक निपटान और बड़े लेन-देन के लिये किया जाता है।
  • मौजूदा डिजिटल धन से भिन्नता: आज अधिकांश धन पहले से ही डिजिटल रूप में है (जैसे– बैंक खातों में जमाराशि या मोबाइल भुगतान), लेकिन वे वाणिज्यिक बैंकों की देनदारियाँ होती हैं। इसके विपरीत, CBDC केंद्रीय बैंक पर प्रत्यक्ष दावा होती है, जो नकदी के समान उच्चतम स्तर की सुरक्षा और तरलता प्रदान करती है।
  • वैश्विक परिप्रेक्ष्य: बहामास 2020 में सैंड डॉलर नामक देशव्यापी CBDC लॉन्च करने वाला पहला देश बना, इसके बाद नाइजीरिया ने भी वर्ष 2020 में ईनाइरा (eNaira) जारी किया। विश्व के 90% से अधिक केंद्रीय बैंक CBDC की संभावनाओं का अध्ययन कर रहे हैं तथा लगभग 60% पहले से ही परीक्षण या प्रूफ ऑफ कॉन्सेप्ट चला रहे हैं।
    • हालाँकि किसी भी BRICS सदस्य देश ने अभी तक पूर्ण रूप से डिजिटल मुद्रा लॉन्च नहीं की है, लेकिन पाँचों देश पायलट परियोजनाएँ चला रहे हैं।


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डिजिटल मुद्रा

  • डिजिटल मुद्रा: डिजिटल मुद्रा वह मुद्रा होती है जो केवल इलेक्ट्रॉनिक रूप में अस्तित्व में रहती है। इसे डिजिटल मनी, इलेक्ट्रॉनिक मनी या साइबरकैश भी कहा जाता है और इसके लेन-देन कंप्यूटर या इंटरनेट से जुड़े वॉलेट्स के माध्यम से किये जाते हैं।
    • डिजिटल मुद्रा के माध्यम से अमेरिकी डॉलर या SWIFT प्रणाली का उपयोग किये बिना भी भुगतान किया जा सकता है। साथ ही, डिजिटल मुद्रा को शर्तों के साथ प्रोग्राम किया जा सकता है, जैसे कि उसे व्यय करने के लिये समय-सीमा निर्धारित करना।
  • प्रमुख विशेषताएँ: यह केंद्रीकृत होती है, जैसे सेंट्रल बैंक द्वारा जारी फिएट करेंसी, या विकेंद्रीकृत, जैसे बिटकॉइन और एथेरियम जैसी क्रिप्टोकरेंसी, जो ट्रांजेक्शन को सुरक्षित करने के लिये क्रिप्टोग्राफी का उपयोग करती हैं। 
  • डिजिटल करेंसी के प्रकार: मोटेतौर पर डिजिटल मुद्राओं को तीन प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है:
    • क्रिप्टोकरेंसी (उदाहरण: बिटकॉइन)
    • वर्चुअल करेंसी (उदाहरण: गेमिंग टोकन)
    • सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC)
  • CBDC बनाम फिएट मुद्रा: फिजिकल करेंसी के विपरीत, डिजिटल करेंसी का कोई मूर्त रूप नहीं होता। CBDC पूर्णतः डिजिटल रूप में मौज़ूद होती हैं और पारंपरिक फिएट करेंसी के पूरक या प्रतिस्थापन के रूप में कार्य करती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) क्या है?
CBDC किसी देश की फिएट करेंसी का एक डिजिटल रूप है, जिसे सेंट्रल बैंक द्वारा जारी किया जाता है। यह कानूनी निविदा के रूप में कार्य करती है और सेंट्रल बैंक पर एक सुरक्षित दावा प्रदान करती है।

2. CBDC बिटकॉइन जैसी क्रिप्टोकरेंसी से कैसे भिन्न है?
CBDC केंद्रीकृत, स्थिर और सरकार द्वारा समर्थित हैं, जबकि क्रिप्टोकरेंसी विकेंद्रीकृत, अस्थिर और कानूनी निविदा नहीं होती हैं।

3. कौन-से ब्रिक्स देश CBDC का पायलट परीक्षण कर रहे हैं?
ब्राज़ील (Drex), रूस (डिजिटल रूबल), भारत (e-Rupee), चीन (e-CNY) CBDC का पायलट परीक्षण कर रहे हैं, जबकि दक्षिण अफ्रीका शोध चरण में बना हुआ है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न

प्रश्न. केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्राओं के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2023)

  1. यूएस डॉलर या एसडब्ल्यूआईएफटी प्रणाली का प्रयोग किये बिना डिजिटल मुद्रा में भुगतान करना संभव है।
  2. कोई डिजिटल मुद्रा इसके अंदर प्रोग्रामिंग प्रतिबंध, जैसे कि इसके व्यय के समय-ढाँचे के साथ वितरित की जा सकती है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा /से सही है/हैं?

(a) केवल 1                             

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों                

(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (c)


मणिपुर, मेघालय और त्रिपुरा का राज्य स्थापना दिवस

स्रोत: DD 

मणिपुर, त्रिपुरा और मेघालय ने 21 जनवरी को अपना राज्य स्थापना दिवस मनाया। इसी दिन वर्ष 1972 में उत्तर-पूर्वी क्षेत्र (पुनर्गठन) अधिनियम, 1971 के तहत ये तीनों पूर्ण राज्य बने।

मणिपुर, मेघालय और त्रिपुरा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं पुनर्गठन क्या है?

  • मणिपुर: स्वतंत्रता से पहले मणिपुर एक स्वतंत्र रियासत था, जिसने वर्ष 1947 में अधिग्रहण पत्र (इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन) के माध्यम से भारत में विलय किया, जिसमें आंतरिक स्वायत्तता बनी रही।
    • वर्ष 1948 में मणिपुर ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर भारत का पहला चुनाव कराया और एक संवैधानिक राजतंत्र बना।
    • वर्ष 1949 में महाराजा ने निर्वाचित विधानसभा से परामर्श किये बिना विलय समझौते पर हस्ताक्षर किये, जिसके बाद विधानसभा को भंग कर दिया गया।
    • मणिपुर का प्रशासन पार्ट-C राज्य (1949–56) के रूप में किया गया, वर्ष 1956 में यह केंद्रशासित प्रदेश बना और अंततः वर्ष 1971 के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र (पुनर्गठन) अधिनियम के तहत 1972 में पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त हुआ, साथ ही पहाड़ी क्षेत्रों के लिये अनुच्छेद 371C के अंतर्गत विशेष संरक्षण प्रदान किया गया।
  • त्रिपुरा: त्रिपुरा माणिक्य वंश द्वारा शासित एक रियासत था और वर्ष 1949 में रानी कंचन प्रभा देवी के संरक्षक शासन के दौरान भारतीय संघ में विलय हुआ।
    • प्रारंभ में इसे पार्ट-C राज्य के रूप में प्रशासित किया गया और वर्ष 1956 में यह केंद्रशासित प्रदेश बना।
    • क्षेत्रीय आकांक्षाओं और प्रशासनिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए वर्ष 1971 के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र (पुनर्गठन) अधिनियम के माध्यम से 1972 में त्रिपुरा को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया, साथ ही छठी अनुसूची के अंतर्गत त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त ज़िला परिषद के माध्यम से जनजातीय स्वशासन सुनिश्चित किया गया।
  • मेघालय: मेघालय को राज्य का दर्जा खासी, जयंतिया और गारो पहाड़ियों द्वारा अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक एवं भाषायी पहचान की सुरक्षा हेतु की गई स्वायत्तता की मांग के परिणामस्वरूप मिला, विशेषकर असम की भाषा नीति के विरोध के संदर्भ में।
    • इसे 1969 के 22वें संविधान संशोधन अधिनियम के तहत पहले असम के भीतर एक स्वायत्त राज्य के रूप में गठित किया गया।
    • इसके बाद 1971 के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र (पुनर्गठन) अधिनियम के माध्यम से 1972 में मेघालय को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया, जिससे यह भारत का 21वाँ राज्य बना, साथ ही पूरे राज्य का शासन छठी अनुसूची के अंतर्गत स्वायत्त ज़िला परिषदों के माध्यम से किया गया।

उत्तर-पूर्वी क्षेत्र (पुनर्गठन) अधिनियम, 1971 का महत्त्व:

  • उप-राष्ट्रीयतावाद की पूर्ति: इस अधिनियम ने पहाड़ी जनजातियों (खासी, गारो, जयंतिया, मिज़ो) की लंबे समय से चली आ रही स्वायत्तता की मांगों को संबोधित किया, जो स्वयं को असम-प्रधान मैदानी क्षेत्रों से सांस्कृतिक और भाषायी रूप से भिन्न मानती थीं।
    • केंद्रशासित प्रदेशों को राज्यों में उन्नत करके इस अधिनियम ने स्थानीय जनसंख्या को अपनी स्वयं की विधानसभाएँ प्रदान कीं, जिससे वे अपनी विशिष्ट जनजातीय परंपराओं और आवश्यकताओं के अनुरूप नीतियाँ बना सकें।
  • रणनीतिक और सुरक्षा आवश्यकताएँ: यह अधिनियम बांग्लादेश के निर्माण (1971 का युद्ध) के तुरंत बाद लागू किया गया। भारत को उत्तर-पूर्व की आंतरिक स्थिरता मज़बूत करने की आवश्यकता थी ताकि "चिकन नेक" कॉरिडोर और अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
    • उत्तर-पूर्वी सीमा एजेंसी (NEFA) को अरुणाचल प्रदेश के केंद्रशासित प्रदेश में परिवर्तित करके इस अधिनियम ने इस रणनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (चीन से सटा हुआ) को भारतीय राजनीतिक मुख्यधारा में औपचारिक रूप से एकीकृत किया और इसे ‘फ्रंटियर एजेंसी’ की अस्पष्ट स्थिति से सुस्पष्ट संवैधानिक दर्जा दिलाया।
      • यह अरुणाचल प्रदेश को 1987 में 55वें संविधान संशोधन के माध्यम से पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त करने से पहले का संक्रमणात्मक कदम था।
  • उत्तर-पूर्वी परिषद (NEC): यह एक सांविधिक निकाय है, जिसे पूर्वोत्तर परिषद अधिनियम, 1971 के तहत स्थापित किया गया है।
    • NEC उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के आर्थिक और सामाजिक विकास के लिये मुख्य समन्वय एजेंसी के रूप में कार्य करती है, जिसमें अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, नगालैंड, सिक्किम, और त्रिपुरा शामिल हैं।
    • यह उत्तर-पूर्वी क्षेत्र विकास मंत्रालय (MDoNER) के प्रशासनिक नियंत्रण के तहत कार्य करता है और इसमें इन राज्यों के राज्यपाल और मुख्यमंत्री के साथ-साथ राष्ट्रपति द्वारा नामित तीन सदस्य शामिल होते हैं।

Reorganisation_of_States

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. मणिपुर, मेघालय और त्रिपुरा को राज्य का दर्जा कब प्राप्त हुआ?
ये राज्य 21 जनवरी, 1972 को , पूर्वोत्तर क्षेत्र (पुनर्गठन) अधिनियम, 1971 के तहत, पूर्ण राज्य बने।

2. किस अधिनियम ने पूर्वोत्तर को पुनर्गठित किया और इन राज्यों को राज्य का दर्जा दिया?
 पूर्वोत्तर क्षेत्र (पुनर्गठन) अधिनियम, 1971 ने इस क्षेत्र को पुनर्गठित किया और मणिपुर, मेघालय एवं त्रिपुरा को राज्य का दर्जा दिया।

3. मणिपुर पर कौन-से विशेष संवैधानिक प्रावधान लागू होते हैं?
अनुच्छेद 371C मणिपुर हिल एरिया के लिये विशेष सुरक्षा प्रदान करता है।

4. त्रिपुरा और मेघालय में आदिवासी स्वायत्तता कैसे सुनिश्चित होती है?
संविधान की छठी अनुसूची के तहत स्वायत्त ज़िला परिषदों के माध्यम से।

5. पूर्वोत्तर क्षेत्र (पुनर्गठन) अधिनियम, 1971 की रणनीतिक महत्ता क्यों थी?
इससे 1971 के युद्ध के बाद उत्तर-पूर्व की आंतरिक स्थिरता सुदृढ़ हुई, अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं की सुरक्षा हुई तथा संवेदनशील सीमा क्षेत्रों को भारतीय राजनीतिक ढाँचे में एकीकृत किया गया।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न

प्रिलिम्स 

प्रश्न. पूर्वोत्तर परिषद् (NEC) की स्थापना पूर्वोत्तर परिषद् अधिनियम, 1971 द्वारा की गई थी। वर्ष 2002 में NEC अधिनियम में संशोधन के बाद परिषद में निम्नलिखित में से किन-किन सदस्यों को शामिल किया गया है?  (2024)

1. संघटक राज्य का राज्यपाल

2. संघटक राज्य का मुख्यमंत्री

3. भारत के राष्ट्रपति द्वारा नामनिर्दिष्ट तीन सदस्य

4. भारत का गृ मंत्री

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1,2 और 3

(b) केवल 1,3 और 4

(c) केवल 2 और 4

(d) 1,2,3 और 4

उत्तर: (a)


रास बिहारी बोस

स्रोत: पीआईबी 

हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री ने रास बिहारी बोस की पुण्यतिथि पर उन्हें उन्हें सादर नमन किया।

रास बिहारी बोस

  • परिचय: रास बिहारी बोस, जिनका जन्म 25 मई, 1886 को बर्धमान, बंगाल में हुआ था, एक क्रांतिकारी राष्ट्रवादी थे जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम को वैश्विक आयाम दिया।
  • क्रांतिकारी गतिविधियाँ: उन्हें अलीपुर बम कांड (1908) के दौरान ख्याति मिली और उन्होंने 1912 में वायसरॉय चार्ल्स हार्डिंग को निशाना बनाने वाली बम साजिश में हिस्सा लिया।
    • वर्ष 1913 में रास बिहारी बोस ने जतिन मुखर्जी (बाघा जतिन) से मुलाकात की, जिनके मार्गदर्शन में बोस भारत की स्वतंत्रता के लिये लड़ने हेतु और अधिक दृढ़ हो गए।
    • वे गदर आंदोलन के एक प्रमुख व्यक्ति बन गए, जो ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने के लिये भारतीय प्रवासियों द्वारा स्थापित एक अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक आंदोलन था।
    • वर्ष 1924 में जापान में वीर सावरकर के सहयोग से रास बिहारी बोस और सुभाष चंद्र बोस की मुलाकात हुई।
  • जापान की ओर पलायन: ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों की नजरों से बचते हुए उन्होंने वर्ष 1915 में भारत छोड़ दिया और अंततः जापान में शरण ली।
    • वर्ष 1942 में उन्होंने जापान में भारतीय स्वतंत्रता लीग (IIL) की स्थापना की, जिसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष के लिये भारतीयों को संगठित और प्रेरित करना था।
  • आज़ाद हिंद फौज: वर्ष 1942 में रास बिहारी बोस ने भारत की आज़ादी के लिये लड़ने हेतु आज़ाद हिंद फौज का गठन किया।
    • उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व करने की क्षमता को देखते हुए भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA) का नेतृत्व सुभाष चंद्र बोस को सौंप दिया।
  • विरासत: रास बहारी बोस का जीवन भारत के स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारी बलिदान और रणनीतिक धैर्य की भावना का प्रतीक है, जो प्रारंभिक सशस्त्र प्रतिरोध को लगातार संगठनात्मक प्रयासों से जोड़ता है। उनकी मृत्यु टोक्यो में 21 जनवरी, 1945 को हुई।

और पढ़ें: हैदराबाद के विलय की 76वीं वर्षगाँठ


ज़ेहनपोरा स्तूप

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस 

हाल ही में बारामूला (उत्तरी कश्मीर) के ज़ेहनपोरा में पुरातात्त्विक खुदाई के दौरान 2,000 वर्ष से अधिक प्राचीन एक विशाल बौद्ध स्तूप के अवशेष मिले, जो कुषाण काल (प्रथम शताब्दी ईस्वी से तीसरी शताब्दी ईस्वी) का है।

  • पुरातात्त्विक महत्त्व: यह स्थल कश्मीर का सबसे बड़ा ज्ञात बौद्ध केंद्र माना जाता है, जहाँ लगभग 10 एकड़ क्षेत्र में खुदाई हुई है, जिसमें लकड़ी की ऊपरी संरचना और अपरिवर्तित टीले शामिल हैं जो इसे विशिष्ट ऐतिहासिक जानकारी प्रदान करते हैं।
  • अंतर्राष्ट्रीय अभिलेखों से संबंध: इस स्थल की एक ऐतिहासिक तस्वीर, जिसमें तीन बौद्ध स्तूप दिखाई देते हैं, फ्राँस के एक संग्रहालय के अभिलेखागार में मिली है। माना जाता है कि यह तस्वीर किसी ब्रिटिश यात्री ने खींची थी, जो यह संकेत देती है कि 19वीं या 20वीं सदी की शुरुआत में ही यह स्थल औपनिवेशिक काल के यात्रा-वृत्तांतों में दर्ज हो चुका था।
  • कश्मीर में बौद्ध धर्म: कश्मीर में बौद्ध धर्म की शुरुआत मौर्य काल के दौरान राजा अशोक के शासनकाल से जोड़ी जाती है। हालाँकि कल्हण की राजतरंगिणी में राजा सुरेंद्र (क्षेत्र के पहले बौद्ध राजा) द्वारा कश्मीर में मठ बनवाने का उल्लेख है, जबकि अन्य ऐतिहासिक अभिलेखों में इस क्षेत्र में इंडो-ग्रीक शासक मेनांडर ((Menander)) और भिक्षु नागसेन के बीच हुए बौद्ध संवाद की चर्चा है।
    • बाद में, कनिष्क जैसे कुषाण राजाओं के संरक्षण ने बौद्ध प्रथाओं के उदय को समर्थन दिया और कश्मीर को वह क्षेत्र माना जाता है जहाँ महायान संप्रदाय (लगभग 72 ईस्वी में कश्मीर में चौथी बौद्ध संगीति) ने अपनी जड़ें जमाईं
    • श्रीलंका के बौद्ध साहित्यिक ग्रंथ महावंश के अनुसार, अशोक ने लगभग 250 ईसा पूर्व पाटलिपुत्र में आयोजित तृतीय बौद्ध संगीति के लिये कश्मीर के बौद्ध विद्वानों को आमंत्रित किया था।
  • कश्मीर में बौद्ध विरासत: संपूर्ण कश्मीर में कई पुरातात्त्विक स्थल बौद्ध धर्म की सुदृढ़ता को दर्शाते हैं:
    • उत्तरी कश्मीर: कनिसपोरा, उश्कुर, ज़ेहनपोरा, परिहसपोरा
    • मध्य कश्मीर: हरवन बौद्ध परिसर (श्रीनगर)
    • दक्षिणी कश्मीर: सेमथान, हुतमुर, होइनार, कुतबल।

और पढ़ें: भारत में बौद्ध धर्म 


ODOP योजना के तहत कलाडी का विस्तार

स्रोत: पीआईबी 

हाल ही में, विज्ञान और प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) ने निर्देश दिया कि जम्मू-कश्मीर के उधमपुर के GI-टैग वाले डेयरी उत्पाद 'कलाडी' को 'एक जिला, एक उत्पाद' (ODOP) पहल के तहत वैज्ञानिक रूप से उन्नत किया जाए, साथ ही इसके पारंपरिक स्वाद और पौष्टिक मूल्य को सुरक्षित रखा जाए।

कलाड़ी

  • परिचय: कलाड़ी उधमपुर (जम्मू-कश्मीर) का एक पारंपरिक डेयरी उत्पाद है, जिसे अपने दूधिया स्वाद और लचीली बनावट के कारण "जम्मू का मोज़रेला" कहा जाता है। इसे कच्चे फुल-फैट दूध से बनाया जाता है, जिसमें छाछ के पानी को प्राकृतिक जमाने वाले एजेंट के रूप में उपयोग किया जाता है।
  • GI टैग: GI टैग ने कलाड़ी के आर्थिक मूल्य और स्थानीय आजीविका को बढ़ाया है, मूलतः ग्रामीण युवाओं के लिये रोज़गार के अवसरों को बढ़ावा दिया है।
  • प्रमुख चुनौती: उत्पाद की कम शेल्फ लाइफ, मूलतः बिना प्रशीतन के, इसके बाजार पहुँच को सीमित करती है। सरकार का लक्ष्य वैज्ञानिक सत्यापन के माध्यम से इसे सुधारना है, साथ ही कलाड़ी के स्वाद, बनावट और पोषण संबंधी पहचान को संरक्षित रखते हुए व्यंजन विविधीकरण के अवसर उत्पन्न करना है।
  • वैज्ञानिक सहयोग: CSIR-केंद्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान (CSIR-CFTRI), मैसूर और CSIR-भारतीय एकीकृत चिकित्सा संस्थान (CSIR-IIIM), जम्मू, न्यूट्रीएंट प्रोफाइलिंग, वर्गीकरण, मूल्यवर्द्धन और शेल्फ लाइफ बढ़ाने पर सहयोग करेंगे ताकि कलाड़ी के उत्पादन को बढ़ाने में मदद मिल सके।
  • बाज़ार और निर्यात विस्तार: इस पहल का लक्ष्य कलाड़ी को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों में लाना है, जिससे किसानों की आय में सुधार हो और विश्व भर में डोगरा व्यंजनों को प्रदर्शित किया जा सके।

और पढ़ें: 17 से अधिक उत्पादों के लिये GI टैग


INS सागरध्वनि सागर मैत्री-V के लिये रवाना

स्रोत: पीआईबी

हाल ही में भारतीय नौसेना ने दक्षिणी नौसेना कमान, कोच्चि से  सागरध्वनि को सागर मैत्री-V (SM-5) मिशन के पाँचवें संस्करण के लिये रवाना किया।

सागर मैत्री पहल

  • परिचय: सागर मैत्री (SM) भारतीय नौसेना और DRDO का एक संयुक्त कार्यक्रम है, जो महासागर (MAHASAGAR) क्षेत्रों में सुरक्षा और विकास के लिये पारस्परिक एवं समग्र उन्नति के भारत के विज़न के अनुरूप है।
    • इसका वैज्ञानिक घटक MAITRI (मरीन एंड एलाइड इंटरडिसिप्लिनरी ट्रेनिंग एंड रिसर्च इनिशिएटिव) साझेदार देशों के साथ दीर्घकालिक संयुक्त अनुसंधान तथा क्षमता निर्माण पर केंद्रित है।
  • उद्देश्य: यह पहल निर्धारित प्रेक्षण मार्गों के साथ-साथ महासागरीय (ओशनोग्राफिक) एवं ध्वनिक (अकूस्टिक) डेटा के संग्रह तथा हिंद महासागर परिक्षेत्र (IOR) देशों के बीच वैज्ञानिक सहयोग को सुदृढ़ करने का लक्ष्य रखती है।
    • यह समुद्री सुरक्षा के लिये अंडरवाटर डोमेन अवेयरनेस (UDA) को सुदृढ़ करने हेतु DRDO के प्रयासों का एक केंद्रीय घटक है।
  • SM-5 मिशन: SM-5 मिशन के अंतर्गत INS सागरध्वनि INS कृष्णा के ऐतिहासिक मार्गों का पुनः अनुगमन करेगा, जिसने 1962-65 के अंतर्राष्ट्रीय हिंद महासागर अभियान में भाग लिया था। इससे सहयोगात्मक महासागरीय अनुसंधान को पुनरुज्जीवित किया जाएगा।
  • INS सागरध्वनि: एक समुद्री ध्वनिक अनुसंधान पोत, जिसे नेवल फिजिकल एंड ओशनोग्राफिक लैबोरेटरी (NPOL), कोच्चि द्वारा अभिकल्पित किया गया है तथा गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE), कोलकाता द्वारा निर्मित किया गया है।
    • जुलाई 1994 में कमीशनिंग के बाद से यह दीर्घकालिक महासागरीय प्रेक्षण और समुद्री अनुसंधान के लिये भारत का प्रमुख प्लेटफॉर्म रहा है।

और पढ़ें: सागर मैत्री 2


लोकायन 26

स्रोत: पीआईबी

INS सुदर्शिनी 20 जनवरी, 2026 को लोकायन 26 की अपनी मुख्य यात्रा पर निकलेगा, जो 10 महीने का एक ट्रांसओशनिक अभियान है, जो भारत की समुद्री विरासत और वसुधैव कुटुम्बकम् की सोच को दर्शाता है।

  • परिचय: लोकायन 26 एक 10 महीने की ट्रांसओशनिक अभियान है, जो 22,000 समुद्री मील से अधिक यात्रा करेगा, जिसमें 13 देशों के 18 विदेशी बंदरगाहों का दौरा शामिल है
    • इस यात्रा में मेज़बान देशों के साथ समुद्री साझेदारी गतिविधियाँ शामिल हैं, जो सहयोग को मज़बूत करती हैं तथा MAHASAGAR (क्षेत्र में सभी के लिये सक्रिय सुरक्षा और विकास हेतु समुद्री प्रमुख) की दृष्टि को आगे बढ़ाती हैं।
  • सक्रियताएँ: INS सुदर्शन फ्राँस में प्रसिद्ध एस्केल ए सेट और अमेरिका के न्यूयॉर्क में एसएआईएल 250 जैसे प्रमुख टॉल-शिप कार्यक्रमों में भाग लेगा, जिससे भारत की समुद्री विरासत और नौसैनिक परंपराओं को प्रदर्शित किया जाएगा।
  • प्रशिक्षण और क्षमता विकास: 200 से अधिक भारतीय नौसेना तथा तट रक्षक प्रशिक्षु गहन पाल प्रशिक्षण प्राप्त करेंगे, जिसमें उन्हें लंबी दूरी की नौवहन, पारंपरिक समुद्री कौशल एवं अन्य नौसेनाओं के प्रशिक्षुओं के साथ संवाद का अनुभव मिलेगा।
    • आईएनएस सुदर्शिनी, भारतीय नौसेना का दूसरा सेल प्रशिक्षण जहाज अब तक 1,40,000 नॉटिकल मील से अधिक की दूरी तय कर चुका है। लोकायन 26 के जरिए यह वैश्विक मंच पर भारत की सामुद्रिक शक्ति, व्यावसायिकता और सद्भावना की मिसाल बनी हुई है।
  • INS सुदर्शिनी के संबंध में: INS सुदर्शिनी भारतीय नौसेना का दूसरा सेल प्रशिक्षण पोत है (पहला INS तरंगिनी), जिसने अब तक 1,40,000 समुद्री मील से अधिक की यात्रा की है तथा भारत की सामुद्रिक शक्ति, व्यावसायिकता और सद्भावना की मिसाल बनी हुई है।

INS_Sudarshini

और पढ़ें: महासागर पहल