प्रिलिम्स फैक्ट्स (11 Mar, 2026)



मुख्य निर्वाचन आयुक्त का निष्कासन

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों? 

विपक्षी दल पूरी तरह से पक्षपातपूर्ण आचरण के आरोपों को लेकर मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) के विरुद्ध महाभियोग प्रस्ताव पर विचार कर रहे हैं।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पद से किस प्रकार हटाया जा सकता है?

  • संवैधानिक सुरक्षा उपाय और प्रावधान: निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिये, संविधान मुख्य निर्वाचन आयुक्त के कार्यकाल की कड़ी सुरक्षा का प्रावधान करता है, जो एक महत्त्वपूर्ण संवैधानिक सुरक्षा उपाय है।
    • संविधान का अनुच्छेद 324(5): अनुच्छेद संसद द्वारा बनाए गए किसी भी कानून के अधीन यह निर्दिष्ट करता है कि निर्वाचन आयुक्तों और क्षेत्रीय आयुक्तों की सेवा-शर्तें एवं कार्यकाल राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित किये जाते हैं। 
      • मुख्य निर्वाचन आयुक्त को केवल उसी प्रक्रिया और आधार पर हटाया जा सकता है, जिस तरह से सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है तथा नियुक्ति के बाद उनकी सेवा-शर्तों में कोई अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जा सकता है।
      • अन्य चुनाव आयुक्तों या क्षेत्रीय आयुक्तों को केवल मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश पर ही हटाया जा सकता है।
    • इसके बाद संसद ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा-शर्तें एवं कार्यकाल) अधिनियम, 2023 पारित किया, जिसमें इस्तीफे और बर्खास्तगी की प्रक्रिया का प्रावधान है। यह संविधान में उल्लिखित प्रक्रिया का ही अनुसरण करता है।
  • पद से हटाने के आधार: संविधान द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों (तथा मुख्य निर्वाचन आयुक्तों) को पद से हटाने के आधारों को सख्ती से ‘सिद्ध दुर्व्यवहार या अक्षमता’ तक सीमित किया गया है।
  • शब्दावली संबंधी टिप्पणी: राजनीतिक चर्चा में व्यापक रूप से 'महाभियोग' शब्द का प्रयोग किया जाता है। हालाँकि, संवैधानिक रूप से 'महाभियोग' शब्द विशेषरूप से भारत के राष्ट्रपति के लिये ही प्रयोग किया जाता है, जिसका उल्लेख अनुच्छेद 61 में है।
    • न्यायाधीशों और मुख्य निर्वाचन आयोग के लिये, औपचारिक संवैधानिक शब्द निष्कासन (रिमूवल) है।

निष्कासन प्रक्रिया

  • मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया अर्द्ध-न्यायिक प्रक्रिया के तहत की जाती है, जो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया के समान है तथा न्यायाधीश जाँच अधिनियम, 1968 द्वारा शासित है।
  • निष्कासन प्रस्ताव की शुरुआत: निष्कासन के आधारों को बताते हुए निष्कासन प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है।
    • इस पर लोकसभा के 100 सदस्यों या राज्यसभा के 50 सदस्यों के हस्ताक्षर होने चाहियें।
    • इसके बाद हस्ताक्षरित प्रस्ताव संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी (लोकसभा में अध्यक्ष या राज्यसभा में सभापति) को प्रस्तुत किया जाता है।
  • स्वीकृति एवं जाँच: अध्यक्ष/सभापति प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं। 
    • आरोपों की स्वीकृति की स्थिति में, उनकी जाँच हेतु एक त्रिसदस्यीय समिति (जिसमें उच्चतम न्यायालय के एक न्यायाधीश, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित न्यायविद्  शामिल होते हैं) का गठन किया जाता है।
  • रिपोर्ट प्रस्तुतीकरण: समिति जाँच करती है और मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) को अपना बचाव करने का अधिकार है। 
    • यदि समिति निष्कर्ष निकालती है कि आरोप साबित नहीं हुए, तो प्रस्ताव को छोड़ दिया जाता है और प्रक्रिया समाप्त हो जाती है।
    • यदि समिति मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) को कदाचार (Misbehaviour) या अक्षमता (Incapacity) का दोषी पाती है, तो रिपोर्ट उस सदन में प्रस्तुत की जाती है, जहाँ मूलरूप से प्रस्ताव पेश किया गया था।
  • संसद में मतदान: प्रस्ताव को पारित करने के लिये इसे दोनों सदनों में उसी सत्र के दौरान विशेष बहुमत से समर्थन प्राप्त होना आवश्यक है।
    • विशेष बहुमत का अर्थ है- उस सदन की कुल सदस्यता का बहुमत और उपस्थित सदस्यों में से कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत, जो मतदान में हिस्सा ले रहे हों।
  • अध्यक्षीय आदेश द्वारा हटाना: यदि प्रस्ताव दोनों सदनों में सफलतापूर्वक पारित हो जाता है, तो भारत के राष्ट्रपति को एक औपचारिक संबोधन प्रस्तुत किया जाता है।
    • अंततः राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का आधिकारिक आदेश जारी करते हैं।

और पढ़ें: भारत निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. मुख्य निर्वाचन आयुक्त के हटाने को कौन-सा संवैधानिक प्रावधान नियंत्रित करता है?
मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) को हटाने का प्रावधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत नियंत्रित होता है, जो यह कहता है कि CEC को केवल सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के समान प्रक्रिया और समान आधारों पर ही हटाया जा सकता है।

2. मुख्य निर्वाचन आयुक्त को किन आधारों पर हटाया जा सकता है?
मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) को केवल साबित कदाचार या असक्षमता के आधार पर ही हटाया जा सकता है, जो कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के लिये लागू होने वाले समान आधार हैं।

3. मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) को हटाने के लिये जाँच प्रक्रिया को कौन-सा कानून नियंत्रित करता है?
जाँच प्रक्रिया न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम, 1968 के प्रावधानों के अनुसार होती है, जो संवैधानिक अधिकारियों के खिलाफ आरोपों की जाँच की प्रक्रिया को निर्दिष्ट करता है।

4. मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने के लिये संसद में कौन-सा बहुमत आवश्यक है?
हटाने के प्रस्ताव को संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से पारित किया जाना चाहिये, अर्थात कुल सदस्यता का बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों में से दो-तिहाई बहुमत।

5. मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने का अंतिम आदेश कौन जारी करते हैं।
जब संसद प्रस्ताव पारित कर देती है, तो मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का अंतिम आदेश भारत के राष्ट्रपति द्वारा जारी किया जाता है।


UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs) 

प्रिलिम्स

प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये : (2017)

1- भारत निर्वाचन आयोग पाँच सदस्यीय निकाय है।

2- केंद्रीय गृह मंत्रालय आम चुनाव और उपचुनाव, दोनों के संचालन के लिये चुनाव कार्यक्रम तय करता है।

3- निर्वाचन आयोग मान्यताप्राप्त राजनीतिक दलों के विभाजन/विलय से संबंधित विवादों को हल करता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 और 2 

(b) केवल 2

(c) केवल 2 और 3  

(d) केवल 3  

उत्तर: (d)


मेन्स

प्रश्न: आदर्श आचार संहिता के विकास के आलोक में भारत निर्वाचन आयोग की भूमिका पर चर्चा कीजिये। (2022)


LIGO-भारत की पहली ग्रेविटेशनल वेव ऑब्जर्वेटरी

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

चर्चा में क्यों?

महाराष्ट्र के हिंगोली ज़िले में भारत की महत्वाकांक्षी लेज़र इंटरफेरोमीटर ग्रेविटेशनल वेव ऑब्जर्वेटरी (LIGO-India) परियोजना कार्यान्वयन विलंब का सामना कर रही है, जिससे वर्ष 2030 तक इसके पूरा होने के आधिकारिक आश्वासनों के बावजूद इसकी समय-सीमा को लेकर चिंताएँ व्यक्त की गई हैं।

LIGO-India परियोजना क्या है?

  • परिचय: LIGO-India भारत की पहली प्रमुख ग्रेविटेशनल वेव ऑब्जर्वेटरी है। यह परियोजना वैश्विक ग्रेविटेशनल-वेव डिटेक्शन नेटवर्क में देश के महत्त्वपूर्ण योगदान को दर्शाती है।
    • भारतीय ऑब्जर्वेटरी में एक उन्नत लीगो-शैली (LIGO-style) का इंटरफेरोमीटर होगा, जिससे यह अमेरिका के हनफोर्ड और लिविंगस्टन स्थित केंद्रों, इटली के विर्गो (Virgo) और जापान के काग्रा (KAGRA) के साथ वैश्विक नेटवर्क का 5वाँ नोड बन जाएगा।
  • प्रमुख एजेंसियाँ ​​और सहयोग: इस परियोजना का संयुक्त नेतृत्व परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) कर रहे हैं। इसमें यूएस LIGO लेबोरेटरी (US LIGO Lab) और इंटर-यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स (IUCAA), पुणे  जैसे प्रमुख भारतीय संस्थानों का भी महत्त्वपूर्ण योगदान शामिल है।
  • वैज्ञानिक उद्देश्य: एक "मेगा-साइंस" प्रोजेक्ट के रूप में इसका लक्ष्य स्काई कवरेज़ को बढ़ाना, स्रोत स्थानीयकरण (विशेष रूप से दक्षिणी गोलार्द्ध में) में सुधार करना और अंतर्राष्ट्रीय गुरुत्वाकर्षण-तरंग नेटवर्क के लिये डिटेक्शन सेंसिटिविटी को बढ़ावा देना है।
  • तकनीकी विनिर्देश: LIGO ऑब्जर्वेटरी में 90-डिग्री के कोण पर बनी दो 4-किमी लंबी भुजाएँ होती हैं। इनके अंत में परावर्तक दर्पणों के साथ वैक्यूम चैम्बर होते हैं। लेज़र किरणों को इन दर्पणों से परावर्तित किया जाता है और गुरुत्वाकर्षण तरंगों का पता लगाने के लिये उपयोग किया जाता है।
    • ऐतिहासिक उपलब्धि: ऐसी पहली तरंग का पता वर्ष 2015 में चला था, जो 1.3 अरब प्रकाश-वर्ष दूर दो ब्लैक होल के विलय के कारण उत्पन्न हुई थी।

LIGO

गुरुत्वाकर्षण तरंगें क्या हैं?

  • परिचय: गुरुत्वाकर्षण तरंगें दिक्-काल (spacetime) में उत्पन्न होने वाली वे तरंगें हैं, जो विशाल वस्तुओं के त्वरण के कारण होती हैं। इनकी भविष्यवाणी सर्वप्रथम वर्ष 1915 में आइंस्टीन के सामान्य सापेक्षता सिद्धांत द्वारा की गई थी। ये आधुनिक भौतिकी में एक क्रांतिकारी परिघटना है, जो वैज्ञानिकों को उन ब्रह्मांडीय घटनाओं का निरीक्षण करने की अनुमति देती हैं जिन्हें पारंपरिक दूरबीनें नहीं देख सकतीं।
  • प्रसार की विशेषताएँ: ये तरंगें प्रकाश की गति से यात्रा करती हैं और अपने स्रोतों से ऊर्जा को दूर ले जाती हैं। ये अंतरिक्ष-समय (और इसके भीतर मौजूद किसी भी पदार्थ) को एक विशिष्ट क्वाड्रुपोलर पैटर्न (quadrupolar pattern) में खींचती और सिकोड़ती हैं (एक साथ दो खिंचाव और दो दबाव, एक-दूसरे के समकोण पर)।
  • विद्युत चुंबकीय तरंगों से भिन्नता: विद्युत चुंबकीय तरंगों (प्रकाश, रेडियो, एक्स-रे, आदि) के विपरीत, गुरुत्वाकर्षण तरंगें विद्युत चुंबकीय स्पेक्ट्रम का हिस्सा नहीं हैं। ये दोलनशील आवेशों के बजाय गुरुत्वाकर्षण क्षेत्रों में परिवर्तन से उत्पन्न होती हैं।
  • प्राथमिक स्रोत: अत्यंत शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण तरंगों के स्रोतों में शामिल हैं:
    • ब्लैक होल या न्यूट्रॉन स्टार के बाइनरी सिस्टम का इनवार्ड स्पाइरल और आपस में विलय।
    • कोर-कोलेप्स सुपरनोवा
    • ब्रह्मांडीय परिघटनाएँ
  • डिटेक्शन में आने वाली चुनौती: पृथ्वी तक पहुँचने तक, ये तरंगें अत्यंत कमज़ोर हो जाती हैं — आमतौर पर किलोमीटर-पैमाने की दूरी पर लगभग 10⁻²¹ का आंशिक लंबाई परिवर्तन उत्पन्न करती हैं। इसके सटीक डिटेक्शन के लिये LIGO जैसे अत्यधिक संवेदनशील उपकरणों की आवश्यकता होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. LIGO-भारत परियोजना क्या है?
LIGO-भारत एक ग्रेविटेशनल वेव ऑब्जर्वेटरी है, जो महाराष्ट्र के हिंगोली में स्थापित होने की योजना है। यह वैश्विक LIGO नेटवर्क का पाँचवाँ नोड बनेगी और कॉस्मिक गुरुत्वीय तरंगों का पता लगाने में मदद करेगी।

2. गुरुत्वीय तरंगें क्या हैं?
गुरुत्वीय तरंगें स्पेसटाइम में उत्पन्न होने वाली तरंगें या लहरें हैं, जो तेज़ी से गति करने वाली भारी वस्तुओं के कारण बनती हैं। इन्हें अल्बर्ट आइंस्टीन की सापेक्षता के सामान्य सिद्धांत (1916) में पूर्वानुमानित किया गया था।

3. LIGO गुरुत्वीय तरंगों का पता कैसे लगाता है?
LIGO गुरुत्वीय तरंगों के कारण उत्पन्न होने वाले अत्यंत सूक्ष्म स्पेसटाइम विकृतियों का पता लगाने के लिये लेजर इंटरफेरोमेट्री तकनीक का उपयोग करता है, जिसमें दो एक-दूसरे के लंबवत 4-किमी लंबी भुजाएँ होती हैं।

4. गुरुत्वीय तरंगों के मुख्य स्रोत क्या हैं?
मुख्य स्रोतों में ब्लैक होल का विलय, न्युट्रॉन स्टार का टकराव और कोर-कॉलैप्स सुपरनोवा शामिल हैं, जो शक्तिशाली स्पेसटाइम तरंगें उत्पन्न करते हैं।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रिलिम्स

प्रश्न. हाल ही में वैज्ञानिकों ने पृथ्वी से अरबों प्रकाश वर्ष दूर विशालकाय 'ब्लैक होलों' के विलय का प्रेक्षण किया। इस प्रेक्षण का क्या महत्त्व है? (2019)

(a) 'हिग्स बोसॉन कणों' का अभिज्ञान हुआ।

(b) 'गुरुत्वीय तरंगों' का अभिज्ञान हुआ।

(c) 'वाॅर्महोल' से होते हुए से अंतरा-मंदाकिनीय अंतरिक्ष यात्रा की संभावना की पुष्टि की हुई।

(d) इसने वैज्ञानिकों को 'विलक्षणता (सिंगुलैरिटी)' को समझना सुकर बनाया।

उत्तर: (b)


प्रश्न: 'विकसित लेज़र इंटरफेरोमीटर' अंतरिक्ष एंटीना (eLISA)' परियोजना का उद्देश्य क्या है? (2017)

(a) न्यूट्रिनो का पता लगाने के लिये

(b) गुरुत्वाकर्षण तरंगों का पता लगाने के लिये

(c) मिसाइल रक्षा की प्रभावशीलता का पता लगाने के लिये प्रणाली

(d) सौर फ्लेयर्स के प्रभाव का अध्ययन करने के लिये संचार प्रणाली

उत्तर: (b)


भू-सीमावर्ती देशों से FDI प्रतिबंधों में ढील

स्रोत: द हिंदू

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने प्रेस नोट 3 (2020) के तहत प्रतिबंधों में ढील दी है, जिससे रणनीतिक क्षेत्रों के लिये सुरक्षा उपायों को बरकरार रखते हुए, चीन सहित भारत के साथ भूमि सीमा साझा करने वाले देशों से सीमित निवेश की मंजूरी दी गई है।

  • प्रेस नोट (PN) 3 (2020): प्रेस नोट (PN) 3 (2020) के अनुसार, उन देशों से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के लिये सरकार की मंजूरी लेना आवश्यक है जो भारत के साथ अपनी भूमि सीमा साझा करते हैं।
    • इसका प्राथमिक उद्देश्य चीन से निवेश आकर्षित करना है। इसके विपरीत, बांग्लादेश और पाकिस्तान की संस्थाएँ पहले से ही केवल सरकारी चैनलों के माध्यम से निवेश करती हैं, जबकि नेपाल, म्याँमार, भूटान और अफगानिस्तान जैसे पड़ोसी देशों से निवेश बहुत कम है।
    • यह नियम कोविड-19 महामारी के दौरान भारतीय कंपनियों के अवसरवादी अधिग्रहणों को रोकने के उद्देश्य से लागू किया गया था। गलवान घाटी संघर्ष के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण इसे जारी रखा गया।

संशोधित प्रत्यक्ष विदेशी निवेश मानदंड

  • स्वचालित मार्ग से 10% तक गैर-नियंत्रणकारी लाभकारी स्वामित्व: भूमि-सीमावर्ती देशों के वे निवेशक जिनके पास 10% तक का गैर-नियंत्रणकारी लाभकारी स्वामित्व है, उन्हें अब स्वचालित मार्ग के तहत अनुमति दी गई है, जो क्षेत्रीय सीमाओं और नियामक शर्तों के अधीन है।
  • लक्षित क्षेत्र: यह छूट सख्ती से पूंजीगत वस्तु, इलेक्ट्रॉनिक पूंजीगत वस्तु, इलेक्ट्रॉनिक घटक, पॉलीसिलिकॉन और सौर सेल के लिये पिंड-वेफर्स पर लागू होती है।
    • राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण सेमीकंडक्टर जैसे रणनीतिक क्षेत्रों पर प्रतिबंध जारी हैं।
  • स्वामित्व और नियंत्रण की शर्तें: अधिकांश स्वामित्व और नियंत्रण हर समय भारतीय निवासी नागरिकों या भारतीय स्वामित्व वाली संस्थाओं के पास रहना चाहिये।
    • मनी लॉन्ड्रिंग विरोधी नियमों का पालन करते हुए, प्रॉक्सी निवेशों को रोकने के लिये अब निवेशक इकाई स्तर पर लाभकारी स्वामित्व का परीक्षण किया जाएगा।
  • समयबद्ध मंजूरी: व्यापार करने में आसानी को बढ़ावा देने के लिये, सरकार ने इन निवेश प्रस्तावों पर कार्रवाई करने और निर्णय लेने के लिये 60 दिनों की सख्त समय सीमा निर्धारित की है।
  • अनिवार्य रिपोर्टिंग: स्वचालित मार्ग के अंतर्गत किये गए ऐसे सभी निवेशों के लिये निवेश प्राप्त करने वाली इकाई को उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्द्धन विभाग (DPIIT) को संबंधित विवरण रिपोर्ट करना आवश्यक है।
    • मंत्रिमंडल सचिव की अध्यक्षता में सचिवों की एक समिति (COS) का गठन किया गया है, जिसे निर्दिष्ट अनुमत क्षेत्रों की सूची में संशोधन करने का अधिकार दिया गया है।
  • नीति बदलाव के कारण: आर्थिक समीक्षा 2023-24 ने असामरिक क्षेत्रों में चीनी निवेश की सिफारिश की थी, ताकि निर्यात बढ़ाया जा सके और आत्मनिर्भर भारत को प्रोत्साहित किया जा सके।
    • PN3 प्रतिबंध उन वैश्विक प्राइवेट इक्विटी (PE) और वेंचर कैपिटल (VC) फंडों को भी प्रभावित कर रहे थे, जिनमें मामूली चीनी निवेश शामिल था।
    • यह कदम होर्मुज़ जलडमरूमध्य को लेकर उत्पन्न तनाव से जुड़े वैश्विक आपूर्ति शृंखला संकटों के जवाब में उठाया गया है।
    • यह भारत–चीन के बीच कूटनीतिक संबंधों में धीरे-धीरे सुधार को दर्शाता है, जिसमें कैलाश मानसरोवर यात्रा का पुनः आरंभ और प्रत्यक्ष उड़ानों की बहाली शामिल हैं।

और पढ़ें: भारत-चीन संबंधों में एक नई दिशा का निर्माण


केंद्रीय मंत्रिमंडल ने जल जीवन मिशन की अवधि को 2028 तक बढ़ाया

स्रोत: पीआईबी

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने जल जीवन मिशन (JJM) की अवधि को दिसंबर 2028 तक बढ़ाने की मंज़ूरी दे दी है, जिसमें कुल परिव्यय (8.69 लाख करोड़ रुपये) में वृद्धि की गई है और JJM 2.0 के तहत ग्रामीण पेयजल आपूर्ति में संरचनात्मक सुधारों पर ध्यान केंद्रित किया गया है।

  • JJM 2.0 का उद्देश्य : JJM 2.0 का उद्देश्य दिसंबर 2028 तक सभी 19.36 करोड़ ग्रामीण परिवारों को नल-जल कनेक्शन उपलब्ध कराकर सभी ग्राम पंचायतों को 'हर घर जल' के रूप में प्रमाणित करना है।
    • वर्तमान में, लगभग 15.80 करोड़ (81.61%) ग्रामीण परिवारों के पास नल-जल कनेक्शन उपलब्ध है।
  • डिजिटल शासन ढाँचा: एक समान राष्ट्रीय डिजिटल ढाँचा, जिसे ‘सुजलम भारत’ कहा जाएगा, स्थापित किया जाएगा, जिसके तहत प्रत्येक गाँव को एक विशिष्ट सुजल गाँव/सेवा क्षेत्र आईडी आवंटित की जाएगी, जो स्रोत से नल तक संपूर्ण पेयजल आपूर्ति प्रणाली का डिजिटल मानचित्रण करेगी।
  • सामुदायिक स्वामित्व तंत्र: पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिये,  ‘जल अर्पण’ के अंतर्गत योजनाओं के क्रियान्वयन में ग्राम पंचायतों और ग्राम जल स्वच्छता समितियों को शामिल करना अनिवार्य है। पर्याप्त संचालन और रखरखाव तंत्र की पुष्टि होने पर ही कोई ग्राम पंचायत स्वयं को ‘हर घर जल’ प्रमाणित करेगी।
  • रणनीतिक दृष्टि: JJM 2.0, ‘संपूर्ण सरकारी’ दृष्टिकोण का उपयोग करते हुए, अवसंरचना-केंद्रित दृष्टिकोण से नागरिक-केंद्रित उपयोगिता-आधारित सेवा वितरण दृष्टिकोण की ओर बढ़ते हुए, 24×7 सुनिश्चित ग्रामीण पेयजल आपूर्ति के साथ विकसित भारत @2047  के विज़न को भी बढ़ावा देता है।

JJM का सामाजिक-आर्थिक प्रभाव

  • एसबीआई रिसर्च: JJM ने 9 करोड़ महिलाओं को पानी ढोने के काम से मुक्त किया है, जिससे वे अन्य आर्थिक कार्यकलापों में अधिक भागीदारी कर पा रही हैं।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO): यह अनुमान लगाया गया है कि महिलाओं के श्रमसाध्य कार्य में प्रतिदिन 5.5 करोड़ घंटे की बचत करने से डायरिया से होने वाली 400,000 मौतों को रोका जा सका है और 14 मिलियन दिव्यांगजनों समायोजित जीवन वर्षों (DALY) की बचत हुई है।
  • नोबेल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर माइकल क्रेमर ने पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर में 30 प्रतिशत की संभावित कमी का अनुमान लगाया है, जिससे प्रतिवर्ष 1,36,000 बच्चों की जान बचाई जा सकती है।
  • IIM बंगलूरू और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) ने JJM के माध्यम से 59.9 लाख प्रत्यक्ष एवं 2.2 करोड़ अप्रत्यक्ष व्यक्ति-वर्ष के संभावित रोज़गार सृजन का अनुमान लगाया है।

और पढ़ें: जल महोत्सव 2026


सावित्रीबाई फुले की पुण्यतिथि

स्रोत: पीआईबी 

केंद्रीय गृहमंत्री ने 10 मार्च को सावित्रीबाई फुले की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए, सामाजिक कुप्रथाओं से युक्त उस दौर में महिलाओं को शिक्षा के दायरे में लाने में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया।

सावित्रीबाई फुले

  • परिचय: सावित्रीबाई फुले 19वीं सदी के महाराष्ट्र की वह समाज सुधारक थीं, जिन्होंने पितृसत्तात्मक और जातिगत पदानुक्रमों को चुनौती देकर भारतीय समाज को मौलिक रूप दिया। 
    • उनका जन्म 3 जनवरी, 1831 को महाराष्ट्र के सतारा में माली समुदाय में हुआ था, 9 वर्ष की आयु में उनका विवाह ज्योतिबा फुले से हुआ था।
  • प्रमुख योगदान:
    • महिला शिक्षा: वर्ष 1848 में, उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर पुणे में लड़कियों के लिये भारत का पहला औपचारिक विद्यालय खोलकर इतिहास रचा। इस दंपति ने मिलकर कुल 18 विद्यालय स्थापित किये और उनका संचालन किया।
      • उन्होंने 'नेटिव फीमेल स्कूल, पुणे' और 'सोसाइटी फॉर प्रमोटिंग द एजुकेशन ऑफ महार्स' जैसे ट्रस्ट स्थापित करने में सहायता की, जिससे जाति-आधारित भेदभाव को सीधी चुनौती मिली।
    • लैंगिक न्याय: वर्ष 1852 में, उन्होंने महिलाओं के अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिये महिला सेवा मंडल की स्थापना की, बाल विवाह के खिलाफ अभियान चलाया और विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया।
    • कन्या भ्रूण हत्या को रोकना: वर्ष 1863 में, इस दंपति ने बालहत्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना की, जिसे कन्या भ्रूण हत्या को रोकने और गर्भवती ब्राह्मण विधवाओं व बलात्कार पीड़ितों को आश्रय देने वाले भारत के पहले केंद्र के रूप में मान्यता प्राप्त है।
    • जातिगत समानता: उन्होंने जातिगत और पितृसत्तात्मक मानदंडों को समाप्त करने के लिये सत्यशोधक विवाह (दहेज़-मुक्त, पुजारी-रहित और गैर-ब्राह्मणवादी समारोह) की शुरुआत करके सामाजिक समानता को संस्थागत रूप दिया।
    • साहित्यिक योगदान: एक कवयित्री और लेखिका के रूप में, उनकी उल्लेखनीय कृतियों में काव्य फुले (1854) और बावन काशी सुबोध रत्नाकर (1892) शामिल हैं। उनकी प्रसिद्ध कविता, ‘जाओ, शिक्षा प्राप्त करो’, ने उत्पीड़ित जातियों को गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ने के लिये प्रोत्साहित किया।
  • विरोध और मृत्यु: उन्होंने कट्टरपंथी विरोध का सामना किया, सामाजिक हमलों और पत्थरबाज़ी को सहन किया। वर्ष 1897 में एक प्लेग रोगी की निस्वार्थ सेवा करते समय वे स्वयं ब्यूबोनिक प्लेग संबंधी बीमारी की चपेट में आ गईं और उनकी मृत्यु हो गई।

Savitribai_Phule

और पढ़ें: सावित्रीबाई और ज्योतिराव फुले


गृह मंत्रालय द्वारा लुक आउट सर्कुलर संबंधी दिशानिर्देशों में बदलाव

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस 

गृह मंत्रालय (MHA) ने लुक आउट सर्कुलर (LOC) जारी करने के दिशानिर्देशों में संशोधन किया है, जिसके तहत किसी व्यक्ति के देश से बाहर जाने पर रोक लगाने के लिये ब्यूरो ऑफ इमीग्रेशन (BoI) को सीधे आदेश देने की शक्तियों को सीमित कर दिया गया है।

  • सांविधिक निकायों पर प्रतिबंध: गृह मंत्रालय ने राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW), राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC), राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) और राष्ट्रीय कंपनी कानून अधिकरण (NCLT) जैसे सांविधिक निकायों को सीधे ब्यूरो ऑफ इमीग्रेशन (BoI) से लुक आउट सर्कुलर (LOC) जारी करने का अनुरोध करने से स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित कर दिया है।
    • ऐसे निकायों से समस्त LOC से संबंधित अनुरोध अब आपराधिक अधिकार क्षेत्र वाली कानून प्रवर्तन एजेंसी (जैसे- पुलिस, CBI) के माध्यम से प्रेषित किये जाने चाहियें।
  • मानकीकृत कार्रवाई: LOC प्रारूप को अद्यतन करके इसमें कार्रवाई के लिये 3 मानकीकृत विकल्प शामिल किये गए हैं,
    • अभिरक्षा में लेना और जारीकर्त्ता (LOC जारी करने वाली एजेंसी) को सूचित करना
    • प्रस्थान को रोकना और जारीकर्त्ता को सूचित करना
    • कार्रवाई को चिह्नित करना
  • खुफिया एजेंसी का विशेषाधिकार: ‘चिह्नित करने’ की श्रेणी का उपयोग केवल आतंकवाद विरोधी उद्देश्यों के लिये IB, R&AW, CBI, NIA और स्टेट एंटी टेररिज्म स्क्वाड यूनिट जैसी खुफिया एजेंसियों द्वारा किया जा सकता है।
    • ‘चिह्नित करने’ की श्रेणी संवेदनशील राष्ट्रीय सुरक्षा संदर्भों में लचीली या गैर-मानकीकृत प्रतिक्रिया की अनुमति देती है, जहाँ पूर्वनिर्धारित कार्रवाइयाँ पर्याप्त नहीं हो सकती हैं।
  • न्यायालय के आदेशों का निपटान: जब प्रवासन विभाग को कोई न्यायालय आदेश प्राप्त होता है, तो उसे तुरंत उस एजेंसी को सूचित करना चाहिये, जिसने मूल LOC जारी की थी। उस एजेंसी को 7 कार्य दिवसों के भीतर जवाब देना होगा। जब तक प्रवासन ब्यूरो न्यायालय के निर्देशानुसार LOC की स्थिति को अद्यतन नहीं कर देता, तब तक व्यक्ति भारत नहीं छोड़ सकता।
  • अभिरक्षा की समय-सीमा: यदि किसी व्यक्ति को लुक आउट सर्कुलर (LOC) के अंतर्गत रोका जाता है, तो संबंधित मूल एजेंसी को 3 घंटे के भीतर अपनी हिरासत में लेना होगा, ऐसा न होने पर उस व्यक्ति को स्थानीय पुलिस के हवाले कर दिया जाएगा। इसके पश्चात मूल एजेंसी के पास औपचारिक अभिरक्षा ग्रहण करने के लिये 24 घंटे का समय होगा।

लुक आउट सर्कुलर (LOC)

  • एक LOC (लुकआउट सर्कुलर) यह सुनिश्चित करने के लिये जारी किया जाता है कि कोई व्यक्ति जो फरार है या कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा वांछित है, देश छोड़कर न जा सके। इसका उपयोग मुख्य रूप से आव्रजन शाखा द्वारा अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डों और समुद्री बंदरगाहों पर आव्रजन चौकियों पर किया जाता है।
  • गृह मंत्रालय (MHA) के तहत कार्यरत ब्यूरो ऑफ इमीग्रेशन (BoI), ऐसी अधिसूचनाओं को लागू करने के लिये ज़िम्मेदार है, जिसके तहत जिन व्यक्तियों के खिलाफ LOC जारी किया गया है, उनके आवागमन को रोका जाता है।

और पढ़ें: विलफुल डिफॉल्टर्स के लिये लुक-आउट सर्कुलर