प्रिलिम्स फैक्ट्स (06 Mar, 2026)



लोकसभा की विशेषाधिकार समिति

स्रोत: द हिंदू 

लोकसभा अध्यक्ष ने आधिकारिक रूप से विशेषाधिकार समिति का पुनर्गठन किया, जो सदन एवं उसके सदस्यों के अधिकारों की रक्षा करने वाली एक महत्त्वपूर्ण संसदीय समिति है।

  • संसदीय विशेषाधिकार: यह संसद को एक संस्था के रूप में तथा सांसदों को व्यक्तिगत रूप से प्राप्त विशेष अधिकारों और शक्तियों को संदर्भित करता है।
    • ये विशेषाधिकार सुनिश्चित करते हैं कि विधायिका बिना बाहरी हस्तक्षेप के अपने संवैधानिक कर्त्तव्यों का स्वतंत्र एवं प्रभावी निर्वहन कर सकें।

    • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 105 संसद एवं उसके सदस्यों को विशेषाधिकार प्रदान करता है, जबकि संविधान का अनुच्छेद 194 राज्य विधानमंडलों को समान विशेषाधिकार प्रदान करता है।

  • विशेषाधिकार हनन: जब कोई कार्य संसद या उसके सदस्यों के अधिकारों या विशेषाधिकारों का उल्लंघन करता है, उसे विशेषाधिकार का हनन माना जाता है।

  • विशेषाधिकार समिति: यह संसदीय विशेषाधिकार के हनन संबंधी मामलों की जाँच करने वाली संसद की स्थायी समिति है।

    • संघटन:

      • लोकसभा समिति: लोकसभा के अध्यक्ष द्वारा नामित 15 सदस्य।

      • राज्यसभा समिति: राज्यसभा के सभापति द्वारा नामित 10 सदस्य।

    • कार्य: सदन और उसके सदस्यों के विशेषाधिकारों के उल्लंघन से संबंधित मामलों की जाँच करती है। गवाहों को बुलाकर और दस्तावेज़ो की जाँच करके मामले की पड़ताल करती है।

      • विशेषाधिकार के हनन या सदन की अवमानना के घटित होने का निर्धारण करती है।
      • विशेषाधिकार समिति अपनी रिपोर्ट सदन को प्रस्तुत करती है, जिसे स्वीकार, अस्वीकार या संशोधित किया जा सकता है।
      • हालाँकि अधिकांश विशेषाधिकार संबंधी आसूचनाओं को सामान्यतः अस्वीकार कर दिया जाता है, दंडात्मक कार्रवाई केवल कुछ मामलों में की जाती है।
  • दलबदल संबंधी मामले: भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची तथा लोकसभा सदस्य (दलबदल के आधार पर अयोग्यता) नियम, 1985 के अंतर्गत अध्यक्ष दलबदल के आधार पर सांसदों की अयोग्यता संबंधी याचिकाओं को अंतिम निर्णय लेने से पूर्व प्रारंभिक अन्वेषण हेतु समिति को प्रेषित कर सकते हैं।
  • महत्त्व: विशेषाधिकार समिति संसद की स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा करती है तथा संसदीय कार्यप्रणाली में बाधा उत्पन्न करने वाली कार्रवाइयों के लिये उत्तरदायित्व सुनिश्चित करती है।

    • यह समिति विधायी कार्यवाहियों में अनुशासन और अखंडता बनाए रखने में सहायक है।

और पढ़ें:  भारत में संसदीय विशेषाधिकार


राष्ट्रीय विज्ञान दिवस 2026

स्रोत: पीआईबी 

भारत ने 28 फरवरी को भौतिकी वैज्ञानिक  सी,वी. रमन के रमन इफेक्ट (1928) की खोज की स्मृति में राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाया। वर्ष 2026 का विषय है– "विज्ञान में महिलाएँ: विकसित भारत को उत्प्रेरित करना"।

  • भारत सरकार ने वर्ष 1986 में 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस घोषित किया, इसका पहला आयोजन वर्ष 1987 में हुआ।

सी.वी. रमन

  • परिचय: सर चंद्रशेखर वेंकट रमन (CV रमन) भारत के महान भौतिकशास्त्रियों में से एक हैं, जिन्हें रमन इफेक्ट की खोज के लिये वर्ष 1930 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला। उनके कार्य ने प्रकाश की क्वांटम प्रकृति को सिद्ध किया।
  • नोबेल पुरस्कार का महत्त्व: वर्ष 1930 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार प्राप्त करके रमन किसी भी वैज्ञानिक क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार जीतने वाले पहले एशियाई और पहले गैर-श्वेत व्यक्ति बने
  • अन्य सम्मान एवं मान्यताएँ: उन्हें वर्ष 1929 में नाइट की उपाधि मिली, वर्ष 1924 में रॉयल सोसाइटी के फेलो (FRS) चुने गए, भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न (1954) एवं लेनिन शांति पुरस्कार (1957) प्राप्त हुआ।
  • संस्थागत योगदान: उन्होंने तीन स्थायी वैज्ञानिक संस्थाएँ स्थापित कीं: बंगलूरू में रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट (1948), इंडियन जर्नल ऑफ फिजिक्स (1926) तथा इंडियन एकेडमी ऑफ साइंसेज़ (1934), जो भारतीय वैज्ञानिक अनुसंधान के लिये स्थायी आधारभूत ढाँचा प्रदान करती हैं।

रमन इफेक्ट

  • के.एस. कृष्णन के सहयोग से यह खोज तब हुई जब पारदर्शी पदार्थ से गुज़रने वाला प्रकाश अणुओं के कंपन के साथ अंतःक्रिया के कारण तरंगदैर्घ्य में परिवर्तन से गुज़रता है।
  • रमन इफेक्ट अणुओं की संरचना का विश्लेषण करने का एक नॉन-डिस्ट्रक्टिव मेथड है, जो रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी का आधार बनाता है।
    • रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी का आज रसायन विज्ञान, जीवविज्ञान, सामग्री विज्ञान, अपराध वैज्ञानिक जाँच एवं चिकित्सा में व्यापक स्तर पर उपयोग होता है, जो मुहरबंद साक्ष्य थैलियों (Sealed Evidence Bags) में औषधियों का पता लगाने, सुरक्षित परमाणु अपशिष्ट का विश्लेषण करने एवं गैर-विनाशकारी सामग्री की पहचान करने जैसे अनुप्रयोगों को सक्षम बनाता है।

और पढ़ें: विज्ञान क्षेत्र के नोबेल पुरस्कारों में भारत का निम्न प्रदर्शन


कपाटा गुड्डा वन्यजीव अभयारण्य

स्रोत: द हिंदू

कर्नाटक उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि कर्नाटक के गडग ज़िले में स्थित कपाटा गुड्डा वन्यजीव अभयारण्य में मनमाने ढंग से छोड़े गए 55 वर्ग किमी. आरक्षित वन क्षेत्र को औपचारिक रूप से सम्मिलित किया जाए, जिससे इसे मूल स्वीकृत आकार में बहाल किया जाए।

  • न्यायालय ने अभयारण्य के ईको-सेंसिटिव ज़ोन (ESZ) में संचालित स्टोन-क्रशिंग यूनिट से संबंधित याचिकाओं को खारिज कर पारिस्थितिक संरक्षण को प्राथमिकता दी।
  • वन्यजीव अभयारण्य: वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत, वन्यजीव अभयारण्य एक ऐसा सुरक्षित क्षेत्र है जिसे वन्यजीवों और उनके प्राकृतिक आवास की रक्षा के लिये बनाया जाता है। इसे इसकी विशेष पारिस्थितिकी, वनस्पतियों या भू-आकृति के महत्त्व के कारण आरक्षित वन या जलक्षेत्र के भीतर घोषित किया जाता है।

कपाटा गुड्डा वन्यजीव अभयारण्य

  • विशिष्ट संरक्षण उद्देश्य: इसे राज्य का एकमात्र ऐसा वन्यजीव अभयारण्य होने का विशिष्ट दर्जा प्राप्त है, जिसे विशेष रूप से वनस्पतियों के संरक्षण के लिये समर्पित किया गया है, जिससे औषधीय जड़ी-बूटियों और घासों के समृद्ध स्थानिक जीन भंडार की रक्षा होती है।
  • पारिस्थितिकी तंत्र और परिदृश्य: समृद्ध जैव विविधता और पारिस्थितिक महत्त्व के कारण इसे अक्सर ‘उत्तर कर्नाटक का पश्चिमी घाट’ कहा जाता है।
    • कपाटा गुड्डा वन्यजीव अभयारण्य शुष्क पारितंत्र का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ मुख्य रूप से झाड़ीदार वन और घास के मैदान पाए जाते हैं। इसके साथ ही निचले भागों तथा घाटियों में शुष्क पर्णपाती तथा नदी-तटीय वनों के कुछ क्षेत्र भी मौजूद हैं।
  • जलवैज्ञानिक महत्त्व: यह एक महत्त्वपूर्ण जलागम क्षेत्र के रूप में कार्य करता है और तुंगभद्रा नदी के लिये प्रमुख कैचमेंट क्षेत्र है।
  • जीव-जंतु विविधता: शुष्क भूभाग होने के बावजूद यहाँ तेंदुए, भारतीय भेड़िये, धारीदार लकड़बग्घे, काले हिरण और चार-सींग वाले मृग सहित वन्यजीवों की समृद्ध विविधता पाई जाती है, जो छोटे तथा बड़े माँसाहारी जीवों के बीच पारिस्थितिक सेतु का कार्य करती है।
  • पारिस्थितिक खतरे: यह आवास काफी हद तक खंडित हो चुका है और आवास पर अतिक्रमण, अत्यधिक चराई, अवैध रूप से जलाऊ लकड़ी का संग्रह तथा शिकार जैसे गंभीर मानवजनित दबावों से प्रभावित है।
और पढ़ें: पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्र


अमेरिका-इज़रायल-ईरान संघर्ष में आत्मरक्षा, IHL और UNCLOS

स्रोत: द हिंदू 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में अमेरिका और इज़रायल द्वारा ईरान पर हमले हुए, जिनमें मिनाब (ईरान) स्थित एक बालिका विद्यालय पर बमबारी भी शामिल है, जिन्हें एक “आसन्न खतरे” के प्रति “पूर्व-निवारक” प्रतिक्रिया के रूप में उचित ठहराया गया, यूनाइटेड नेशन चार्टर के अंतर्गत बल प्रयोग की वैधता, विशेषतः अनुच्छेद 51 और आत्मरक्षा सिद्धांत, को चुनौती देते हैं।

बल प्रयोग पर अंतर्राष्ट्रीय कानून क्या है?

आत्मरक्षा का सिद्धांत

  • बल प्रयोग का प्रतिषेध: अंतर्राष्ट्रीय शांति की नींव संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(4) है, जो सदस्य राज्यों को किसी अन्य राज्य की 'क्षेत्रीय अखंडता' या 'राजनीतिक स्वतंत्रता' के खिलाफ बल की धमकी या प्रयोग करने से रोकता है।
    • जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा अधिकृत किया गया हो, या
    • अनुच्छेद 51 के तहत आत्मरक्षा के अधिकार के प्रयोग में।
    • नियम के अपवाद: संयुक्त राष्ट्र चार्टर के तहत बल का प्रयोग केवल दो परिदृश्यों में कानूनी है, अर्थात्
  • अनुच्छेद 51 की सख्त व्याख्या: अनुच्छेद 51 के तहत आत्मरक्षा का अधिकार केवल "वास्तविक सशस्त्र हमले" की प्रतिक्रिया में सक्रिय होता है। चूँकि ईरान ने हाल ही में किसी भी राज्य पर हमला नहीं किया था, इसलिये हमले इस सख्त मानदंड को पूरा नहीं करते हैं।
  • प्रत्याशित आत्मरक्षा का सिद्धांत: अमेरिका और इज़रायल का तर्क "प्रत्याशित" आत्मरक्षा के विवादास्पद सिद्धांत पर टिका है। हालाँकि, कई भू-राजनीतिक विद्वानों का तर्क है कि अंतर्राष्ट्रीय कानून एक हमले के खिलाफ आत्मरक्षा में बल प्रयोग के अधिकार को मान्यता नहीं देता है, जो अभी तक नहीं हुआ है।
    • यहाँ तक कि प्रत्याशित आत्मरक्षा सिद्धांत के तहत भी बल का प्रयोग तभी कानूनी होगा जब तीन शर्तें पूरी होंगी, अर्थात (1) ईरान ने हमला करने का फैसला किया; (2) उसके पास ऐसा करने की क्षमता थी; और (3) यह उस भविष्य के हमले को रोकने का "अंतिम अवसर" था।
    • इसके अतिरिक्त, अमेरिका-ईरान परमाणु वार्त्ता, जिसमें ओमान ने मध्यस्थता की थी, जिनेवा में सक्रिय रूप से चल रही थी, फिर भी अमेरिका और इज़रायल ने ईरान पर संयुक्त सैन्य हमले  

अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानून (IHL)

  • अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानून के मूल सिद्धांत: यूनाइटेड नेशन चार्टर के विपरीत, जो युद्ध शुरू करने की वैधता (जूस एड बेलम, जिसका लैटिन में शाब्दिक अर्थ है "युद्ध का अधिकार") को संबोधित करता है, अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानून यह नियंत्रित करता है कि युद्ध कैसे लड़े जाते हैं (जूस इन बेलो, जिसका लैटिन में शाब्दिक अर्थ है "युद्ध का कानून"), जिससे, संघर्ष कैसे भी शुरू हुआ हो, मानवीय आचरण सुनिश्चित होता है।
    • शत्रुता का संचालन चार मूल सिद्धांतों द्वारा नियंत्रित होता है, अर्थात् 'भेदभाव', 'आनुपातिकता', 'सैन्य आवश्यकता' और 'सावधानी'।
  • भेदभाव का सिद्धांत: यह सिद्धांत 'योद्धाओं' और 'सैन्य लक्ष्यों' का 'नागरिकों' और 'नागरिक वस्तुओं' (स्कूलों, अस्पतालों, पूजा स्थलों) से स्पष्ट पृथक्करण की आवश्यकता रखता है। यदि किसी लक्ष्य की प्रकृति के बारे में कोई संदेह है, तो उसे नागरिक माना जाना चाहिये।
    • स्कूलों सहित विभिन्न नागरिक वस्तुएँ, यदि उनका उपयोग सैन्य उद्देश्यों के लिये किया जाता है (जैसे, बेस या कमांड पोस्ट के रूप में), तो वे अपनी संरक्षित स्थिति खो सकते हैं। हालाँकि इस बात का कोई साक्ष्य नहीं है कि मिनाब स्कूल (ईरान, इज़रायली-अमेरिकी हवाई हमले का लक्ष्य) का सैन्य रूप से उपयोग किया गया था।
  • बच्चों के लिये कानूनी सुरक्षा: बाल अधिकारों पर सम्मेलन, 1989 (अनुच्छेद 38(4)) के लिये राज्यों को सशस्त्र संघर्ष से प्रभावित बच्चों की रक्षा करने की आवश्यकता होती है।
    • इसके अतिरिक्त, रोम संविधि, 1998 नागरिकों और शैक्षणिक भवनों के जानबूझकर लक्ष्यीकरण को युद्ध अपराध के रूप में परिभाषित करती है।
  • पार्श्व क्षति का सिद्धांत: यदि स्कूल निकटवर्ती सैन्य सुविधा पर हमले के दौरान आकस्मिक रूप से क्षतिग्रस्त हुआ, तो वैधता आनुपातिकता एवं सावधानी के सिद्धांतों पर निर्भर करती है।
    • नागरिकों को आकस्मिक नुकसान केवल तभी कानूनी है, जब अपेक्षित नुकसान हमले से प्रत्याशित "ठोस और प्रत्यक्ष सैन्य लाभ" के संबंध में अत्यधिक न हो।

UNCLOS क्या है और नौसैनिक युद्ध में इसकी क्या भूमिका है? 

UNCLOS और नौसैनिक युद्ध:

  • हालाँकि संयुक्त राष्ट्र समुद्री विधि सम्मेलन (UNCLOS) समुद्री शासन के लिये मुख्य ढाँचा है, यह शांति काल की गतिविधियों पर केंद्रित है। हालंकि इसमें सशस्त्र संघर्ष के दौरान युद्धरत पक्षों के व्यवहार को नियंत्रित करने वाले स्पष्ट प्रावधान शामिल नहीं हैं। अमेरिका UNCLOS का सदस्य नहीं है।
    • UNCLOS, 1982 (जिसे अक्सर "महासागरों का संविधान" कहा जाता है) एक अंतर्राष्ट्रीय संधि है, जो समुद्री गतिविधियों के शासन के लिये एक व्यापक कानूनी ढाँचा स्थापित करती है।
      • यह क्षेत्र निर्धारित करता है जैसे क्षेत्रीय समुद्र (12 नौटिकल मील तक), विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (200 नौटिकल मील तक) और हाई सी (200 नौटिकल मील से आगे), साथ ही शांति पूर्ण उपयोग, संसाधन प्रबंधन, नौवहन अधिकार और समुद्री पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देता है।

नौसैनिक युद्ध का कानून

  • सशस्त्र संघर्षों के दौरान, नौसैनिक युद्ध कानून UNCLOS के साथ समानांतर रूप से लागू होता है। इस ढांचे के तहत, किसी युद्धरत नौसेना का युद्धपोत (जैसे IRIS डीना) उस समय उसकी शांतिपूर्ण भूमिका के बावजूद एक वैध सैन्य लक्ष्य माना जाता है।
    • कुछ लोग यह मानते हैं कि हाई सी पर किसी विदेशी युद्धपोत के खिलाफ बल का प्रयोग ‘स्वाभाविक रूप से अवैध’ है, जब तक कि इसे अनुच्छेद 51 के तहत आत्मरक्षा के रूप में स्पष्ट रूप से न्यायसंगत न ठहराया जाए या यह किसी चल रहे सशस्त्र संघर्ष का हिस्सा न हो।
  • IRIS डेना को वर्ष 2023 में अमेरिका द्वारा रूस को कथित UAV आपूर्ति के लिये प्रतिबंधित किया गया था। हालाँकि प्रतिबंध मुख्य रूप से व्यावसायिक गतिविधियों को सीमित करते हैं और अपने आपमें सैन्य हमले को कानूनी नहीं बनाते। यह जहाज़ एक अंतर्राष्ट्रीय अभ्यास (अभ्यास मिलान 2026) के बाद शांतिपूर्ण मार्ग पर था।
और पढ़ें: अमेरिकी टॉरपीडो ने हिंद महासागर में ईरानी युद्धपोत को डुबोया

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(4) क्या निषेध करता है?

यह किसी भी राज्य की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलाफ बल का प्रयोग या उसके उपयोग की धमकी देने को निषेध करता है, जो आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा का मूल सिद्धांत है।

2. संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 का दायरा क्या है?

अनुच्छेद 51 केवल वास्तविक सशस्त्र हमले के प्रत्युत्तर में आत्मरक्षा के लिये बल के प्रयोग की अनुमति देता है, जब तक कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद आवश्यक कदम नहीं उठाती।

3. अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानून (IHL) के मुख्य सिद्धांत क्या हैं?

मुख्य सिद्धांत हैं: भेदभाव, अनुपात, सैन्य आवश्यकता और सावधानी, जिनका उद्देश्य सशस्त्र संघर्षों के दौरान नागरिकों की सुरक्षा करना तथा दुख-कष्ट को सीमित करना है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रश्न. कभी-कभी समाचारों में उल्लिखित पद ‘टू-स्टेट सॉल्यूशन’ किसकी गतिविधियों के संदर्भ में आता है ?  (2018)

(a) चीन

(b) इज़रायल

(c) इराक 

(d) यमन

उत्तर: (b)

प्रश्न. भारत द्वारा चाबहार बंदरगाह विकसित करने का क्या महत्त्व है? (2017)

(a) अफ्रीकी देशों से भारत के व्यापार में अपार वृद्धि होगी।
(b) तेल-उत्पादक अरब देशों से भारत के संबंध सुदृढ़ होंगे।
(c) अफगानिस्तान और मध्य एशिया में पहुँच के लिये भारत को पाकिस्तान पर निर्भर नहीं होना पड़ेगा।
(d) पाकिस्तान, इराक और भारत के बीच गैस पाइपलाइन का संस्थापन सुकर बनाएगा और उसकी सुरक्षा करेगा।

उत्तर: (c)

प्रश्न. दक्षिण-पश्चिमी एशिया का निम्नलिखित में से कौन-सा एक देश भूमध्यसागर तक फैला नहीं है? (2015)

(a) सीरिया

(b) जॉर्डन

(c) लेबनान

(d) इज़रायल

उत्तर: (b)


भारत में राज्यपाल और उपराज्यपाल की नियुक्ति

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों? 

भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने हाल ही में कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के राज्यपालों और उपराज्यपालों की नियुक्तियों में बड़े पैमाने पर फेरबदल की घोषणा की।

  • तमिलनाडु के पूर्व राज्यपाल आर.एन. रवि को पश्चिम बंगाल का नया राज्यपाल नियुक्त किया गया है। केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर को तमिलनाडु का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है।
  • तरनजीत सिंह संधू को दिल्ली का नया उपराज्यपाल (LG) नियुक्त किया गया है।

राज्यपाल की नियुक्ति से संबंधित प्रक्रिया क्या है?

  • अनुच्छेद 153 (राज्यों के राज्यपाल): इसमें यह अनिवार्य किया गया है कि प्रत्येक राज्य के लिये एक राज्यपाल होना चाहिये। 
  • वर्ष 1956 के 7वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम ने एक ही व्यक्ति द्वारा एक साथ कई राज्यों के लिये राज्यपाल की नियुक्ति को सुगम बनाया।

  • अनुच्छेद 154 (राज्य की कार्यकारी शक्ति): राज्य की कार्यकारी शक्ति आधिकारिक तौर पर राज्यपाल में निहित है। 

  • अनुच्छेद 155 (राज्यपाल की नियुक्ति): राज्यपाल की नियुक्ति प्रत्यक्ष रूप से भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। 
    • राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति के हस्ताक्षर और मुहर वाले एक वारंट द्वारा औपचारिक रूप से की जाती है। यह प्रक्रिया राज्यपाल को केंद्र सरकार के नामित व्यक्ति के रूप में स्थापित करती है।
  • अनुच्छेद 156 (कार्यकाल): राज्यपाल भारत के राष्ट्रपति के 'प्रसादपर्यंत' पद धारण करते हैं।
    • संविधान में राज्यपाल को पद से हटाने के लिये कोई आधार निर्दिष्ट नहीं है। राष्ट्रपति किसी भी समय राज्यपाल को पद से हटा सकते हैं या उनका तबादला कर सकते हैं।
      • राष्ट्रपति की इच्छा के अधीन, राज्यपाल का सामान्य कार्यकाल पदभार ग्रहण करने की तिथि से पाँच वर्ष का होता है। पाँच वर्ष की अवधि समाप्त होने के बाद भी राज्यपाल तब तक पद पर बने रहेंगे जब तक कि उनका उत्तराधिकारी औपचारिक रूप से पदभार ग्रहण नहीं कर लेता।
      • राज्यपाल अपना इस्तीफा स्वहस्तलिखित पत्र के माध्यम से सीधे भारत के राष्ट्रपति को संबोधित करते हुए दे सकता है।
  • अनुच्छेद 157 (नियुक्ति के लिये योग्यता): व्यक्ति भारत का नागरिक होना चाहिये और उसकी आयु 35 वर्ष पूरी हो चुकी होनी चाहिये।
    • अनुच्छेद 158 (पद की शर्तें): राज्यपाल संसद के किसी भी सदन (राज्य परिषद या लोकसभा) या राज्य विधानमंडल के किसी भी सदन (विधानसभा या विधान परिषद) का सदस्य नहीं हो सकता। 

    • यदि किसी मौजूदा सदस्य को नियुक्त किया जाता है, तो राज्यपाल का पदभार ग्रहण करने के दिन से ही कानूनी रूप से यह माना जाता है कि उन्होंने अपना पद खाली कर दिया है।
    • राज्यपाल को किसी भी अन्य लाभ का पद धारण करने से सख्ती से प्रतिबंधित किया गया है।
    • राज्यपाल को वह वेतन, भत्ते और विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं जो भारत की संसद द्वारा निर्धारित किये जाते हैं। इसके अतिरिक्त, उन्हें बिना किराए के आधिकारिक आवास का अधिकार भी होता है।
      • जब कोई व्यक्ति दो या दो से अधिक राज्यों के राज्यपाल के रूप में कार्य करता है, तो उसके वित्तीय भत्तों का बँटवारा संबंधित राज्यों के बीच राष्ट्रपति के आदेश द्वारा निर्धारित अनुपात में किया जाता है।
      • इसके अलावा, राज्यपाल के कार्यकाल के दौरान इन वेतन और भत्तों में कटौती नहीं की जा सकती है।
  • अनुच्छेद 159 (शपथ या प्रतिज्ञान): पद ग्रहण करने से पूर्व राज्यपाल को यह शपथ या प्रतिज्ञान लेना होता है कि वे अपने पद का निष्ठापूर्वक निर्वहन करेंगे, संविधान और विधि का परिरक्षण, संरक्षण एवं रक्षा करेंगे तथा राज्य की जनता की सेवा और कल्याण में स्वयं को समर्पित करेंगे।
    • यह शपथ संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा उनकी अनुपस्थिति में उस न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश द्वारा दिलाई जाती है।
  • स्थापित परंपराएँ:
    • बाहरी व्यक्ति का सिद्धांत (Outsider Rule): किसी राज्य का राज्यपाल सामान्यतः उस राज्य का निवासी नहीं होता, बल्कि दूसरे राज्य से नियुक्त किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य राज्यपाल की तटस्थता बनाए रखना और उन्हें स्थानीय राजनीतिक हस्तक्षेप से दूर रखना है।
    • मुख्यमंत्री से परामर्श: नियुक्ति से पहले राष्ट्रपति द्वारा संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री से परामर्श किये जाने की अपेक्षा की जाती है, ताकि संवैधानिक व्यवस्था का सुचारु संचालन सुनिश्चित हो सके। हालाँकि व्यवहार में इस परंपरा का अक्सर पालन नहीं किया जाता है।

उपराज्यपाल की नियुक्ति से संबंधित प्रक्रिया क्या है?

  • अनुच्छेद 239: राज्यपालों (जिनका प्रावधान संविधान के भाग VI में किया गया है) के विपरीत, केंद्रशासित प्रदेशों का प्रशासन संविधान के भाग VIII (अनुच्छेद 239 से 241) के अंतर्गत वर्णित है।
    • संविधान का अनुच्छेद 239 यह प्रावधान करता है कि प्रत्येक केंद्रशासित प्रदेश का प्रशासन भारत के राष्ट्रपति द्वारा उनके द्वारा नियुक्त एक ‘प्रशासक’ के माध्यम से किया जाएगा, जिसे राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित किसी भी पदनाम से संबोधित किया जा सकता है।
  • पदनाम: राष्ट्रपति निम्नलिखित प्रशासक का पदनाम निर्दिष्ट करते हैं। 
    • पाँच केंद्रशासित प्रदेशों (दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, पुडुचेरी, जम्मू और कश्मीर, लद्दाख और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह) में उन्हें उपराज्यपाल (LG) के रूप में नामित किया गया है।
    • चंडीगढ़, लक्षद्वीप, दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव में उन्हें केवल ‘प्रशासक’ कहा जाता है।
  • अनुच्छेद 239AA: यह विशेष रूप से निर्देश देता है कि दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCT) के प्रशासक को 'उपराज्यपाल' (Lieutenant Governor) के रूप में नामित किया जाएगा।
  • नियुक्ति प्रक्रिया: उपराज्यपाल की नियुक्ति प्रत्यक्ष रूप से भारत के राष्ट्रपति द्वारा अपने हस्ताक्षर और मुहर (Warrant under hand and seal) के माध्यम से की जाती है।
    • चूँकि राष्ट्रपति अपनी शक्तियों का प्रयोग केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह (अनुच्छेद 74) पर करते हैं, इसलिये उपराज्यपाल का चयन और सिफारिश प्रभावी रूप से केंद्र सरकार द्वारा की जाती है।
  • कार्यकाल और पदच्युति: एक राज्य के राज्यपाल की तरह उपराज्यपाल राष्ट्रपति के 'प्रसादपर्यंत' पद धारण करते हैं।
    • संविधान में उपराज्यपाल को पद से हटाने के आधारों का उल्लेख नहीं है। केंद्र सरकार के पास राष्ट्रपति को किसी भी समय उपराज्यपाल का स्थानांतरण करने, उन्हें हटाने या उनसे इस्तीफा मांगने की सलाह देने का अधिकार है।

भारत में राज्यपाल चुने जाने के बजाय नियुक्त क्यों किये जाते हैं?

  • संघर्ष की रोकथाम: संविधान निर्माण के दौरान संविधान सभा ने एक निर्वाचित राज्यपाल (अमेरिकी मॉडल) के बजाय एक मनोनीत राज्यपाल (कनाडाई मॉडल) को चुना।
    • एक निर्वाचित राज्यपाल निर्वाचित मुख्यमंत्री से टकराव उत्पन्न कर सकता है, जिससे समानांतर शक्ति केंद्र और संवैधानिक गतिरोध उत्पन्न हो सकता है।
  • नाममात्र प्रमुख: चूँकि राज्य एक संसदीय प्रणाली का पालन करता है जहाँ मुख्यमंत्री वास्तविक कार्यपालक होता है, एक नाममात्र प्रमुख के लिये राज्यव्यापी चुनाव पर धन और ऊर्जा खर्च करना अनावश्यक समझा गया।
  • राष्ट्रीय एकता: एक मनोनीत राज्यपाल केंद्र और राज्य के बीच एक महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करता है, जो राष्ट्रीय स्थिरता और एकीकरण सुनिश्चित करने में मदद करता है।
  • कार्यालय की तटस्थता का संरक्षण: एक निर्वाचित राज्यपाल को राज्यव्यापी चुनाव जीतने के लिये अनिवार्य रूप से किसी राजनीतिक दल के टिकट पर चुनाव लड़ना होगा या पार्टी तंत्र पर निर्भर रहना होगा।
    • यह एक तटस्थ मध्यस्थ के रूप में कार्य करने की उसकी क्षमता से समझौता करेगा, विशेष रूप से राष्ट्रपति शासन लगाने जैसे महत्त्वपूर्ण समय के दौरान।

राज्यपाल की नियुक्ति के संबंध में मुख्य सिफारिशें

  • सरकारिया आयोग (1983): नियुक्त व्यक्ति राज्य के बाहर का एक प्रतिष्ठित व्यक्ति होना चाहिये। वह राजनीति में सक्रिय नहीं होना चाहिये।
    • नियुक्ति करने से पहले राज्य के मुख्यमंत्री, भारत के उपराष्ट्रपति और लोकसभा अध्यक्ष से परामर्श करना संवैधानिक रूप से अनिवार्य बनाया जाना चाहिये।
    • सिफारिश की कि राज्यपालों को दुर्लभ और अपरिहार्य परिस्थितियों को छोड़कर, उनके पाँच वर्ष के कार्यकाल के पूरा होने से पहले नहीं हटाया जाना चाहिये।
  • पुंछी आयोग (2007):  संविधान से ‘राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत’ वाक्यांश को हटाने की सिफारिश।
    • सिफारिश की कि एक राज्यपाल को केवल राज्य विधानमंडल द्वारा पारित प्रस्ताव के माध्यम से निष्कासित किया जाना चाहिये (राष्ट्रपति के महाभियोग प्रक्रिया के समान)।
  • वेंकटचेलैया आयोग (2002): सिफारिश की कि राज्यपालों को सामान्यतः अपना पाँच वर्ष का कार्यकाल पूरा करना चाहिये और यदि पहले निष्कासित किया जाता है, तो केंद्र सरकार को संबंधित मुख्यमंत्री से परामर्श करना चाहिये

 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. राज्यपाल की नियुक्ति और भूमिका से कौन-से संवैधानिक अनुच्छेद संबंधित हैं?
भारत के संविधान के अनुच्छेद 153 से 159 राज्यपाल की नियुक्ति, शक्तियों, योग्यताओं और शपथ की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं।

2. भारत में किसी राज्य के राज्यपाल की नियुक्ति कौन करता है?
अनुच्छेद 155 के तहत भारत का राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुहर के तहत वारंट के माध्यम से राज्यपाल की नियुक्ति करता है।

3. भारत में एक राज्यपाल का कार्यकाल कितना होता है?
अनुच्छेद 156 के अनुसार, राज्यपाल सामान्यतः पाँच वर्ष का कार्यकाल पूरा करता है, लेकिन वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है।

4. राज्यपाल की नियुक्ति में "बाहरी व्यक्ति का नियम" क्या है?
यह एक परंपरा है कि राजनीतिक तटस्थता बनाए रखने के लिये राज्यपाल की नियुक्ति संबंधित राज्य के बाहर से की जानी चाहिये।

5. राज्यपाल के निष्कासन के संबंध में क्या सुधार सुझाए गए हैं?
पुंछी आयोग (2007) ने "राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत" राज्यपाल के निष्कासन की सिफारिश की और राज्य विधानमंडल के एक प्रस्ताव के माध्यम से निष्कासन का सुझाव दिया।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न

प्रिलिम्स:

प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2018)

  1. किसी राज्य के राज्यपाल के विरुद्ध उसकी पदावधि के दौरान किसी न्यायालय में कोई दांडिक कार्यवाही संस्थित नहीं की जाएगी।
  2. किसी राज्य के राज्यपाल की परिलब्धियाँ और भत्ते उसकी पदावधि के दौरान कम नहीं किये जाएंगे।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1, न ही 2

उत्तर: (c)

प्रश्न. निम्नलिखित में से कौन-सी किसी राज्य के राज्यपाल को दी गई विवेकाधीन शक्तियाँ हैं? (2014)

  1. भारत के राष्ट्रपति को राष्ट्रपति शासन अधिरोपित करने के लिये रिपोर्ट भेजना
  2. मंत्रियों की नियुक्ति करना
  3. राज्य विधानमंडल द्वारा पारित कतिपय विधेयकों को भारत के राष्ट्रपति के विचार के लिये आरक्षित करना
  4. राज्य सरकार के कार्य संचालन के लिये नियम बनाना

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 1 और 3

(c) केवल 2, 3 और 4

(d) 1, 2, 3 और 4

उत्तर: (b)


ऊर्जा दक्षता ब्यूरो का स्थापना दिवस

स्रोत: पीआईबी 

ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (BEE) ने 1 मार्च, 2026 को अपने 25वें स्थापना दिवस का आयोजन किया, जिसमें नवीन डिजिटल पहलों का शुभारंभ किया गया तथा ऊर्जा दक्षता को देश का "फर्स्ट फ्यूल" तथा ऊर्जा सुरक्षा, वहनीयता एवं स्थिरता के संतुलन के लिये प्रमुख साधन के रूप में पुनः प्रतिपादित किया गया।

  • रिन्यूएबल कंजम्पशन ऑब्लिगेशन (RCO) पोर्टल, BEE स्टार लेबल मोबाइल ऐप तथा BEE@25 लोगो का शुभारंभ निगरानी को सशक्त बनाने, उपभोक्ताओं को सशक्त करने तथा ऊर्जा दक्षता को राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में BEE की प्रतिबद्धता के प्रतीक के लिये किया गया।
    • रिन्यूएबल कंजम्पशन ऑब्लिगेशन (RCO) ऊर्जा संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2022 के अंतर्गत एक अनिवार्य नीतिगत प्रणाली है, इसके तहत निर्दिष्ट उपभोक्ताओं के लिये यह आवश्यक है कि वे विद्युत की खपत का एक न्यूनतम निर्धारित प्रतिशत पात्र गैर-जीवाश्म स्रोतों (मुख्य रूप से नवीकरणीय ऊर्जा, जैसे– सौर, पवन, जलविद्युत, बायोमास आदि) से प्राप्त करें।

ऊर्जा दक्षता ब्यूरो

  • परिचय: BEE विद्युत मंत्रालय के अधीन एक वैधानिक निकाय है, जिसकी स्थापना 1 मार्च, 2002 को ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 के अंतर्गत की गई।
  • उद्देश्य: इसका प्राथमिक उद्देश्य उद्योग, भवनों, परिवहन, कृषि एवं उपकरण क्षेत्रों को संलग्न करके समन्वित प्रयासों द्वारा ऊर्जा तीव्रता (आर्थिक उत्पादन इकाई प्रति ऊर्जा उपयोग) को कम करना है।
  • उत्सर्जन न्यूनीकरण प्रभाव: भारत ने वर्ष 2005 के स्तर से GDP की उत्सर्जन तीव्रता में 36% कमी हासिल की है तथा 52% गैर-जीवाश्म ईंधन स्थापित क्षमता प्राप्त की है — वर्ष 2030 के जलवायु लक्ष्यों से बहुत पहले।
  • संस्थागत समन्वय: BEE राज्य निर्दिष्ट एजेंसियों (SDA) के माध्यम से राज्य स्तर पर ऊर्जा दक्षता कार्यक्रमों को कार्यान्वित करता है, जिससे राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण नीतियों का संघीय समन्वय एवं स्थानीय कार्यान्वयन सुनिश्चित होता है।

और पढ़ें: निर्माण क्षेत्र में ऊर्जा दक्षता


तिरुमंगई अलवार की मूर्ति भारत में वापस

स्रोत: द हिंदू

ऑक्सफोर्ड के एशमोलियन म्यूज़ियम ने संत तिरुमंगई अलवार की 16वीं शताब्दी की एक कांस्य प्रतिमा भारत सरकार को वापस सौंप दी है। यह कदम तब उठाया गया जब शोध के माध्यम से यह पुष्टि हो गई कि यह प्रतिमा तमिलनाडु के सौंदरराज पेरुमल मंदिर की है।

  • इस प्रतिमा की पहचान 'इंडिया प्राइड प्रोजेक्ट' नामक एक कल्चरल एडवोकेसी ग्रुप द्वारा की गई थी। उन्होंने एशमोलियन की कांस्य प्रतिमा की पहचान फ्रेंच इंस्टीट्यूट ऑफ पांडिचेरी के वर्ष 1957 के अभिलेखीय (archival) चित्रों से किया।  

तिरुमंगई अलवर

  • परिचय: तिरुमंगई 12 अलवार संतों में से अंतिम थे। अलवार तमिल कवि-संत थे, जिन्होंने 8वीं शताब्दी ईस्वी के दौरान वैष्णव परंपरा में अपना जीवन भगवान विष्णु को समर्पित कर दिया था।
  • योद्धा के रूप में प्रारंभिक जीवन: मूल रूप से कालियान नाम से जाने जाने वाले, उनका जन्म कल्लर समुदाय (एक योद्धा जाति) में हुआ था और उन्होंने चोल साम्राज्य के अधीन एक सैन्य कमांडर और सरदार के रूप में सेवा की (जिसके लिये उन्हें तिरुमंगई मन्नन की उपाधि प्राप्त हुई)। वे एक कुशल तीरंदाज़ थे।
  • साहित्यिक योगदान: उन्हें ‘नारकवि पेरुमल’ (उत्कृष्ट कवि) के रूप में जाना जाता है और उन्होंने 1,000 से अधिक छंदों की रचना की है। उनकी प्रमुख कृतियों में 'पेरिया थिरुमोझी', 'थिरुनेदुनथंडकम' और 'थिरुक्कुरुथंडकम' शामिल हैं, जो पवित्र 'नालयिरा दिव्य प्रबंधम' का हिस्सा हैं।
  • मंदिर विरासत: उन्होंने श्रीरंगम मंदिर के संवर्द्धन में योगदान दिया और कहा जाता है कि उन्होंने सभी 108 दिव्य देशमों (पवित्र विष्णु मंदिरों) का दर्शन किया था।
    • उन्होंने श्रीरंगम श्री रंगनाथस्वामी मंदिर (तिरुचिरापल्ली, तमिलनाडु) की दीवारों में से एक का निर्माण कराया था और भगवान श्री रंगनाथन पर कविताओं की रचना की थी।
  • आध्यात्मिक महत्त्व: उन्हें भगवान विष्णु के 'शारंग' धनुष का अवतार माना जाता है। उनका जीवन वृत्तांत 'भक्ति' के माध्यम से सांसारिक भौतिकवाद से परम भक्ति की ओर परिवर्तन के विषय को उजागर करता है।