डेली न्यूज़ (25 Nov, 2021)



रोगाणुरोधी प्रतिरोध

प्रिलिम्स के लिये:

रोगाणुरोधी प्रतिरोध, विश्व स्वास्थ्य संगठन, विश्व रोगाणुरोधी जागरूकता सप्ताह

मेन्स के लिये:

AMR को संबोधित करने के लिये किये गए उपाय

चर्चा में क्यों?

हाल ही में पशुपालन और डेयरी मंत्रालय ने विश्व रोगाणुरोधी जागरूकता सप्ताह (WAAW - 18-24 नवंबर) के दौरान रोगाणुरोधी प्रतिरोध (AMR) से निपटने के लिये राष्ट्रीय कार्ययोजना पर एक कार्यशाला का आयोजन किया।

प्रमुख बिंदु

  • परिचय:
    • रोगाणुरोधी प्रतिरोध (Antimicrobial Resistance-AMR) का तात्पर्य किसी भी सूक्ष्मजीव (बैक्टीरिया, वायरस, कवक, परजीवी आदि) द्वारा एंटीमाइक्रोबियल दवाओं (जैसे- एंटीबायोटिक्स, एंटीफंगल, एंटीवायरल, एंटीमाइरियल और एंटीहेलमिंटिक्स) जिनका उपयोग संक्रमण के इलाज के लिये किया जाता है, के खिलाफ प्रतिरोध हासिल कर लेने से है। 
    • इसके कारण मानक उपचार अप्रभावी हो जाते हैं, संक्रमण जारी रहता है और दूसरों में फैल सकता है।
    • रोगाणुरोधी प्रतिरोध विकसित करने वाले सूक्ष्मजीवों को कभी-कभी "सुपरबग्स" के रूप में जाना जाता है।
    • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा AMR की पहचान शीर्ष 10 वैश्विक स्वास्थ्य खतरों में से एक के रूप में की गई है।
  • AMR के प्रसार का कारण:
    • इसमें दवा निर्माण/फार्मास्यूटिकल स्थलों के आसपास संदूषण शामिल है, जहाँ अनुपचारित अपशिष्ट से अधिक मात्रा में सक्रिय रोगाणुरोधी वातावरण में मुक्त हो जाते हैं।
    • कई अन्य कारक भी दुनिया भर में AMR के खतरे को गति प्रदान करते है, जिसमें मानव, पशुधन और कृषि में दवाओं के अति प्रयोग व दुरुपयोग के साथ-साथ स्वच्छ पेयजल, सफाई तथा स्वच्छता की खराब स्थिति शामिल है।
  • चिंताएँ:
    • स्वास्थ्य देखभाल लागत में वृद्धि:
      • AMR पहले ही प्रतिवर्ष लगभग 7,00,000 मौतों  के लिये ज़िम्मेदार है। यह अस्पतालों में लंबे समय तक रहने तथा अतिरिक्त परीक्षणों और अधिक महँगी दवाओं के उपयोग के साथ स्वास्थ्य देखभाल की लागत को भी बढ़ाता है।
    • प्रगति में गिरावट: 
      • AMR ने चिकित्सा में प्रगति को एक सदी पीछे धकेल दिया है; पहले ज्जिन संक्रमणों  का उपचार और इलाज दवाओं से संभव था वे लाइलाज  या जोखिमपूर्ण बनते जा रहे हैं क्योंकि दवाएँ संक्रमण के खिलाफ काम नहीं कर रही हैं।
    • संक्रमण और सर्जरी का जोखिम: 
      • यहाँ तक कि आम संक्रमण भी जोखिमपूर्ण होने के साथ-साथ समस्या बनते जा रहे हैं। सर्जरी करना जोखिमपूर्ण होता जा रहा है और इन सबका कारण मानव द्वारा एंटीमाइक्रोबियल का दुरुपयोग या अति प्रयोग करना है।
    • नई एंटीबायोटिक दवाओं को अपर्याप्त प्रोत्साहन:
      • मुख्य रूप से इन दवाओं के विकास और उत्पादन को अपर्याप्त प्रोत्साहन के कारण विगत तीन दशकों में एंटीबायोटिक दवाओं का कोई भी नया विकल्प बाज़ार में उपलब्ध नहीं हो पाया है।
    • एंटीबायोटिक के बिना भविष्य खतरे में:
      • यदि तत्काल कार्रवाई नहीं की गई तो एंटीबायोटिक दवाओं के बिना हमारा भविष्य खतरे में पड़ जाएगा, इसके अभाव में बैक्टीरिया का पूरी तरह से उपचार संभव नहीं होगा और वे अधिक प्रतिरोधी बन जाएंगे तथा आम संक्रमण व मामूली समस्याएँ भी खतरा उत्पन्न कर सकती हैं।
  • भारत में AMR:
    • भारत में एक बड़ी आबादी के संयोजन के साथ बढ़ती हुई आय एंटीबायोटिक दवाओं की खरीद में सक्षम बनाती है, संक्रामक रोगों का उच्च बोझ और एंटीबायोटिक दवाओं के लिये आसान ओवर-द-काउंटर (Over-the-Counter) पहुँच की सुविधा प्रदान करती है, प्रतिरोधी जीन (ऐसे जीन एंटीबायोटिक दवाओं के संपर्क में आने पर बैक्टीरिया को जीवित रहने में मदद करते हैं) की पीढ़ी को बढ़ावा देती है। 
    • बहु-दवा प्रतिरोध निर्धारक (Multi-Drug Resistance Determinant), नई दिल्ली। मेटालो-बीटा-लैक्टामेज़-1 (NDM-1), इस क्षेत्र में विश्व स्तर पर तेज़ी से उभरे हैं।
      • अफ्रीका, यूरोप और एशिया के अन्य भाग भी दक्षिण एशिया से उत्पन्न होने वाले बहु-दवा प्रतिरोधी टाइफाइड से प्रभावित हुए हैं।
    • भारत में सूक्ष्मजीवों (जीवाणु और विषाणु सहित) के कारण सेप्सिस से प्रत्येक वर्ष 56,000 से अधिक नवजात बच्चों की मौत हो जाती है जो पहली पंक्ति के एंटीबायोटिक दवाओं के प्रतिरोधी हैं।
  • AMR को संबोधित करने के लिये किये गए उपाय:
    • AMR नियंत्रण पर राष्ट्रीय कार्यक्रम:  
      • इस कार्यक्रम के तहत राज्यों के मेडिकल कॉलेजों में प्रयोगशालाओं की स्थापना करके AMR निगरानी नेटवर्क को मज़बूत किया गया है।
    • AMR पर राष्ट्रीय कार्ययोजना
      • यह एक स्वास्थ्य दृष्टिकोण पर केंद्रित है जिसे विभिन्न हितधारक मंत्रालयों/विभागों को शामिल करने के उद्देश्य से शुरू किया गया था।
    • AMR सर्विलांस एंड रिसर्च नेटवर्क(AMRSN): 
      • इसे वर्ष 2013 में लॉन्च किया गया था ताकि देश में दवा प्रतिरोधी संक्रमणों के सबूत, प्रवृत्तियों तथा पैटर्न का अनुसरण किया जा सके।
    • एंटीबायोटिक प्रबंधन कार्यक्रम: 
      • ICMR ने अस्पताल के वार्डों और आईसीयू में एंटीबायोटिक दवाओं के दुरुपयोग तथा अति प्रयोग को नियंत्रित करने के लिये भारत में एक पायलट परियोजना पर एंटीबायोटिक स्टीवर्डशिप कार्यक्रम शुरू किया है।
    • AMR के लिये एकीकृत स्वास्थ्य निगरानी नेटवर्क:
      • एकीकृत AMR निगरानी नेटवर्क में शामिल होने के लिये भारतीय पशु चिकित्सा प्रयोगशालाओं की तैयारी का आकलन करना।
    • अन्य:
      • भारत ने कम टीकाकरण कवरेज को संबोधित करने के लिये मिशन इंद्रधनुष जैसी कई गतिविधियाँ शुरू की हैं, साथ ही निगरानी एवं जवाबदेही में सुधार के लिये सूक्ष्म योजना और अन्य अतिरिक्त तंत्रों को मज़बूत किया गया है।
      • स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के साथ अपने सहयोगात्मक कार्य के लिये AMR को शीर्ष 10 प्राथमिकताओं में से एक के रूप में पहचाना है।

आगे की राह: 

  • विशेष रूप से टियर- 2 और टियर- 3 शहरों में नकली दवाओं की बिक्री का पता लगाना और इसकी रोकथाम करना।
  • फार्माकोकाइनेटिक्स (Pharmacokinetics) और फार्माकोडायनामिक्स (Pharmacodynamics) में जैव उपलब्धता का सामयिक माप, प्रिस्क्रिप्शन डेटाबेस के माध्यम से एंटीबायोटिक नीतियों को लागू करना और फार्मेसियों की ऑडिटिंग करना।
    • फार्माकोकाइनेटिक्स को दवा के अवशोषण, वितरण, चयापचय और उत्सर्जन के समय के अध्ययन के रूप में परिभाषित किया गया है। 
  • ई-प्रिस्क्रिप्शन के मिलान के साथ वस्तु एवं सेवा कर (Goods and Services Tax-GST) के साथ दवाओं की बिक्री की निगरानी।
  •  सिंड्रोमिक दृष्टिकोण (Syndromic Approach) से निदान के उपचार (Treatment of the Diagnosis) की तरफ बढ़ने हेतु इमेजिंग और जैव सूचना विज्ञान व भौगोलिक सूचना प्रणाली जैसी नई तकनीकों का उपयोग।
  • WASH रणनीति का पालन: एंटीबायोटिक-मुक्त पशु चारा और जानवरों को खिलाए जाने वाले एंटीबायोटिक्स मनुष्यों द्वारा खाए जाने वाले (जैसे विभिन्न रंग योजनाओं द्वारा चिह्नित) से भिन्न होना चाहिये।

स्रोत: पीआईबी


वैश्विक पोषण रिपोर्ट, 2021

प्रिलिम्स के लिये:

वैश्विक पोषण लक्ष्य, एनीमिया,  चाइल्डहुड वेस्टिंग

मेन्स के लिये:

वैश्विक पोषण रिपोर्ट, 2021 के महत्त्वपूर्ण प्रावधान 

चर्चा में क्यों?   

हाल ही में जारी वैश्विक पोषण रिपोर्ट, 2021 (Global Nutrition Report) के अनुसार, भारत ने एनीमिया (Anaemia) और चाइल्डहुड वेस्टिंग (Childhood Wasting)  पर कोई प्रगति नहीं की है।

वैश्विक पोषण लक्ष्य:

  • वर्ष 2012 में विश्व स्वास्थ्य सभा (विश्व स्वास्थ्य संगठन की निर्णय लेने वाली संस्था) ने वर्ष 2025 तक के लिये छह पोषण लक्ष्यों की पहचान की है, जो निम्नलिखित हैं:
    • 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में स्टंटिंग को 40% तक कम करना।
    • 19-49 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाओं में एनीमिया के प्रसार को 50% तक कम करना।
    • बच्चो में जन्म के समय कम वज़न की समस्या में 30% की कमी सुनिश्चित करना।
    • बचपन में अधिक वज़न न बढ़े, इस बात को सुनिश्चित करना।
    • पहले छह महीनों में स्तनपान की दर को कम-से-कम 50% तक बढ़ाना। 
    • चाइल्डहुड वेस्टिंग को 5% से कम करना और इसे बनाए रखना।

प्रमुख बिंदु 

  • रिपोर्ट के महत्त्वपूर्ण बिंदु:
    • वैश्विक पोषण लक्ष्य:
      • प्रगति के वर्तमान स्तर या दर पर वैश्विक पोषण लक्ष्यों को वर्ष 2025 तक विश्व स्तर पर अधिकांश देशों द्वारा हासिल नहीं किया जा सकेगा।
    • डेटा उपलब्धता में बदलाव/परिवर्तन:
      • 194 देशों में वैश्विक पोषण लक्ष्यों की दिशा में डेटा उपलब्धता और प्रगति में पर्याप्त भिन्नता है।
        • वर्ष 2025 तक केवल सात देश छह मातृ, शिशु और युवा बाल पोषण लक्ष्यों में से चार को पूरा करने की दिशा पर अग्रसर हैं, जबकि कोई भी देश वयस्क मोटापे में वृद्धि को रोकने या नमक/सोडियम सेवन में 30% की सापेक्ष कमी हासिल करने की दिशा पर अग्ररसर नहीं है।
    • कोविड-19 का प्रभाव:
      • कोविड-19 महामारी वैश्विक पोषण लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में प्रगति में बाधक है।
        • महामारी ने अनुमानित अतिरिक्त 155 मिलियन लोगों को विश्व स्तर पर अत्यधिक गरीबी में धकेल दिया गया है, जबकि आहार से संबंधित जीर्ण रोग वाले लोग कोविड-19 के बदतर परिणामों का अनुभव कर रहे हैं।
    • आहार सुधार में अल्प प्रगति:
      • पिछले दशक में आहार में सुधार करने में बहुत कम प्रगति हुई है और वयस्कों की होने वाली कुल मौतों में से एक-चौथाई का कारण खराब आहार है।
    • वैश्विक स्तर पर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन:
      • खाद्य उत्पादन वर्तमान में विश्व स्तर पर सभी ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का एक-तिहाई से अधिक का उत्पन्न करता है और पर्यावरण संसाधनों की अत्यधिक मात्रा का उपयोग करता है।
    • सतत् विकास लक्ष्य:
      • कोई भी क्षेत्र आहार और खाद्य प्रणाली से संबंधित स्वास्थ्य एवं पर्यावरणीय बोझ को सीमित करने के उद्देश्य से सतत् विकास लक्ष्यों को पूरा करने की दिशा में पर्याप्त प्रगति नहीं कर रहा है।
  • भारत-विशिष्ट आँकड़े:
    • एनीमिक भारतीय महिलाएँ:
      • 15-49 आयु वर्ग की आधी से अधिक भारतीय महिलाएँ एनीमिया से पीड़ित हैं।
      • वर्ष 2016 से वर्ष 2020 के बीच एनीमिक भारतीय महिलाओं की संख्या 52.6% से बढ़कर 53% हो गई है।
    • चाइल्डहुड वेस्टिंग:
      • 5 वर्ष से कम उम्र के 17% से अधिक भारतीय बच्चे इससे प्रभावित हैं।
      • भारत भी उन 23 देशों में शामिल है, जिन्होंने 'चाइल्डहुड वेस्टिंग' को कम करने की दिशा में कोई प्रगति नहीं की है या वहाँ स्थिति और खराब हो रही है।
        • वेस्टिंग से तात्पर्य उन बच्चों से है जिनका वज़न उनकी ऊँचाई के हिसाब से कम है।
    • चाइल्ड स्टंटिंग:
      • 5 वर्ष से कम उम्र के 34% से अधिक बच्चे अभी भी इससे प्रभावित हैं।
      • भारत उन 53 देशों में से एक है, जो जल्द ही स्टंटिंग के लक्ष्य को प्राप्त करने वाले हैं।
        • स्टंटिंग, उम्र के अनुसार कम ऊँचाई को संदर्भित करता है।
    • चाइल्डहुड ओवरवेट:
      • भारत उन 105 देशों में से एक है, जो जल्द ही चाइल्डहुड ओवरवेट के लक्ष्य को प्राप्त करने वाले हैं।
    • भारत द्वारा प्राप्त किये गए लक्ष्य:
      • भारत ने 13 वैश्विक पोषण लक्ष्यों में से 7 को पूरा कर लिया है, जिसमें सोडियम का सेवन, बढ़ा हुआ रक्तचाप (पुरुष व महिला दोनों), मोटापा (पुरुष और महिला दोनों) तथा मधुमेह (पुरुष एवं महिला दोनों) शामिल हैं।
  • सुझाव:
    • वित्त को बढ़ाना: 
      • असंतुलित आहार और कुपोषण को समाप्त करने के लिये प्रयासों और वित्तीय निवेशों हेतु कदम उठाए जाने की आवश्यकता है।
    • समग्र दृष्टिकोण: 
      • सभी के लिये एक स्वस्थ भविष्य बनाने हेतु असंतुलित आहार और कुपोषण को समग्र तथा स्थायी रूप से संबोधित किया जाना चाहिये।
    • जवाबदेही और निगरानी:
      • आवश्यक प्रगति की पहचान करने हेतु बेहतर डेटा, व्यापक जवाबदेही और व्यवस्थित निगरानी महत्त्वपूर्ण है।

Nutrition-Report

वैश्विक पोषण रिपोर्ट: 

  • वर्ष 2013 में संपन्न पहले 'न्यूट्रीशन फॉर ग्रोथ इनिशिएटिव समिट' (N4G) के बाद इसकी कल्पना की गई थी।
  • पहली रिपोर्ट वर्ष 2014 में प्रकाशित हुई थी।
  • यह वैश्विक, क्षेत्रीय और विभिन्न देशों के मध्य विश्व की पोषण स्थिति के बारे में विवरण प्रदान करती है और इसे सुधारने के प्रयासों पर एक रिपोर्ट कार्ड के रूप में कार्य करती है।
  • यह एक बहु-हितधारक पहल है, जिसमें एक हितधारक समूह, स्वतंत्र विशेषज्ञ समूह और सचिवालयी रिपोर्ट शामिल हैं।

स्रोत: डाउन टू अर्थ


प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना

प्रिलिम्स के लिये:

PMGKAY, PMGKP, सार्वजनिक वितरण प्रणाली,राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम

मेन्स के लिये:

प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना : महत्त्व एवं चुनौतियाँ

चर्चा में क्यों?

हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY-Phase V) को 4 महीने की अवधि यानी दिसंबर 2021 से मार्च 2022 तक बढ़ाने के लिये मंज़ूरी दे दी है।

प्रमुख बिंदु

  • परिचय:
    • ‘प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना’ कोविड-19 के विरुद्ध लड़ाई में गरीब और संवेदनशील वर्ग की सहायता करने के लिये ‘प्रधानमंत्री गरीब कल्याण पैकेज’ (PMGKP) के हिस्से के रूप में शुरू की गई थी।
      • वित्त मंत्रालय इसका नोडल मंत्रालय है।
    • प्रारंभ में इस योजना की शुरुआत तीन माह (अप्रैल, मई और जून 2020) की अवधि के लिये की गई थी, जिसमें कुल 80 करोड़ राशन कार्डधारक शामिल थे। बाद में इसे नवंबर 2020 तक बढ़ा दिया गया था।
      • इस योजना के चरण- I और चरण- II क्रमशः अप्रैल से जून, 2020 और जुलाई से नवंबर, 2020 तक संचालित थे।
      • योजना का तीसरा चरण मई से जून 2021 तक संचालित था।
      • योजना का चौथा चरण वर्तमान में जुलाई-नवंबर 2021 के लिये संचालित है।
    • इस योजना के तहत सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के माध्यम से पहले से ही प्रदान किये गए 5 किलोग्राम अनुदानित खाद्यान्न के अलावा प्रत्येक व्यक्ति को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA), 2013 के तहत 5 किलोग्राम अतिरिक्त अनाज (गेहूँ या चावल) मुफ्त में उपलब्ध कराने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। 
    • PMGKAY के इस नए संस्करण में इसके महत्त्वपूर्ण घटकों में से एक का अभाव है जो कि वर्ष 2020 के PMGKAY में उपस्थित था: NFSA के अंतर्गत आने वाले प्रत्येक परिवार के लिये प्रतिमाह 1 किलोग्राम मुफ्त दाल।
  • व्यय:
    • पीएमजीकेएवाई चरण I- V में सरकार लगभग 2.60 लाख करोड़ रुपए खर्च करेगी।
    • PMGKAY-V में 53344.52 करोड़ रुपए की अनुमानित अतिरिक्त खाद्य सब्सिडी होगी।
  • अब तक आवंटन:
    • PMGKAY (चरण 1 से 4) के तहत राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों को कुल मिलाकर लगभग 600 लाख मीट्रिक टन (LMT) खाद्यान्न का आवंटन किया गया, जो लगभग 2.07 लाख करोड़ रुपए की खाद्यान्न सब्सिडी के बराबर है। 
    • PMGKAY 4 के तहत वितरण का कार्य वर्तमान में चल रहा है और अब तक राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों से उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, 93.8% खाद्यान्न आवंटित किया गया है।
  • महत्त्व:
    • यह दैनिक श्रमिकों और अनौपचारिक क्षेत्र के उद्यमियों की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है, जिन्होंने कोविड-19 प्रेरित लॉकडाउन के मद्देनज़र अपनी नौकरी खो दी।
  • चुनौती:
    • एक प्रमुख मुद्दा यह है कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के लाभार्थी अंतिम जनगणना (2011) पर आधारित हैं, हालाँकि तब से खाद्य-असुरक्षित लोगों की संख्या में वृद्धि हुई है, जो अब इस योजना के तहत शामिल नहीं हैं।

स्रोत: पीआईबी


कॉफी उत्पादन में गिरावट

प्रिलिम्स के लिये:

अरेबिका कॉफी, कॉफी, जैव विविधता हॉटस्पॉट, पश्चिमी घाट

मेन्स के लिये:

भारत में कॉफी उत्पादन में गिरावट के कारण एवं प्रभाव

चर्चा में क्यों?

प्लांटर्स समुदाय द्वारा उपलब्ध कराए गए आँकड़ों के अनुसार, जनवरी में समाप्त होने वाले इस फसल सीज़न में भारत के अरेबिका कॉफी उत्पादन में 30% और रोबस्टा में 20% की गिरावट आएगी।

प्रमुख बिंदु

  • वर्तमान चुनौतियाँ:
    • अत्यधिक वर्षण:
      • अत्यधिक वर्षा, पौधों की क्षति, फलियों के फटने और बेरी गिरने के कारण कॉफी का उत्पादन गिर जाएगा।
        • भारत में कॉफी उत्पादक क्षेत्रों में बंगाल की खाड़ी में दबाव और कम दबाव वाले क्षेत्रों के कारण विस्तारित वर्षा देखी जा रही है।
      • वर्तमान में अरेबिका की कटाई चल रही है और वर्षा के दौरान फली को सुखाना और इसे यार्ड में फैलाना चुनौतीपूर्ण है।
    • कॉफी उत्पादन की लागत:
      • उर्वरकों और श्रम लागतों सहित उत्पादन लागत में वृद्धि के कारण उत्पादकों को कम लाभ मिलने तथा उत्पादन में निवेश धीमा होने की संभावना है।

कॉफी:

  • इतिहास:
    • कॉफी को भारत में सत्रहवीं शताब्दी के अंत में पेश किया गया था।
    • कहानी यह है कि मक्का गया एक भारतीय तीर्थयात्री वर्ष 1670 में यमन से सात फलियों को तस्करी कर भारत लाया (उस समय अरब से कॉफी के बीज लाना अवैध माना जाता था) और उसने उन्हें कर्नाटक की चंद्रगिरी पहाड़ियों में लगाया।
    • डचों (जिन्होंने 17वीं शताब्दी के दौरान भारत के अधिकांश हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया) ने पूरे देश में कॉफी की खेती को फैलाने में मदद की, लेकिन उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में ब्रिटिश राज के आगमन के साथ ही वाणिज्यिक कॉफी की खेती पूरी तरह से फली-फूली।
  • परिचय:
    • भारत में कॉफी पश्चिमी और पूर्वी घाटों के पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में घने प्राकृतिक वृष्टि छाया क्षेत्र में उगाई जाती है।
      • यह दुनिया के 25 जैव विविधता हॉटस्पॉट में से एक है।
    • कॉफी मुख्य रूप से एक निर्यात उन्मुख वस्तु है और देश में उत्पादित 65% से 70% कॉफी का निर्यात किया जाता है, जबकि शेष की खपत देश में होती है।
    • कॉफी क्षेत्र की अनूठी जैव विविधता को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है और दूरस्थ, पहाड़ी क्षेत्रों में सामाजिक-आर्थिक विकास के लिये भी ज़िम्मेदार है।
  • आवश्यक जलवायु परिस्थितियाँ:
    • कॉफी के पौधों के लिये ऊष्ण और आर्द्र जलवायु की आवश्यकता होती है, जिसमें तापमान 15 डिग्री सेल्सियस और 28 डिग्री सेल्सियस के बीच होता है तथा 150 से 250 सेमी. तक वर्षा होती है।
    • तुषार/पाला (Frost), हिमपात, 30 डिग्री सेल्सियस से ऊपर उच्च तापमान और तेज धूप कॉफी फसल के लिये अनुकूल नहीं होती है तथा आमतौर पर यह छायादार पेड़ों के नीचे उगाई जाती है।
    • बेरी के पकने के समय शुष्क मौसम की आवश्यकता होती है।
    • इसके लिये स्थिर जल हानिकारक होता है और समुद्र तल से 600 से 1600 मीटर की ऊँचाई पर पहाड़ी ढलानों पर फसल उगाई जाती है।
    • बेहतर जल निकास प्रणाली, दोमट मिट्टी, जिसमें भरपूर मात्रा में ह्यूमस, आयरन और कैल्शियम जैसे खनिज पदार्थ होते हैं, कॉफी की खेती के लिये आदर्श हैं।
  • कॉफी उत्पादन के लिये मृदा:
    • कॉफी कई प्रकार की मिट्टी में उगाई जा सकती है लेकिन इसके लिये उपजाऊ ज्वालामुखीय लाल मिट्टी या गहरी रेतीली दोमट मिट्टी आदर्श मानी जाती है।
    • कॉफी के पेड़ों के विकास के लिये यह महत्त्वपूर्ण है कि मिट्टी उचित जल निकासी वाली हो जबकि अधिक चिकनी मिट्टी या रेतीली मिट्टी इसके लिये उपयुक्त नहीं है।
  • प्रमुख क्षेत्र:
    • भारत में कॉफी की पारंपरिक खेती पश्चिमी घाट के कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में की जाती है। 
      • कर्नाटक कुल कॉफी उत्पादन के लगभग 70% के साथ सबसे बड़ा उत्पादक है।
    • कॉफी की खेती आंध्र प्रदेश और ओडिशा के गैर-पारंपरिक क्षेत्रों के साथ-साथ उत्तर-पूर्व राज्यों में भी तेज़ी से बढ़ रही है।

Coffee-Market

  • मुख्य किस्में: भारत में कॉफी की अरेबिका और रोबस्टा किस्मों की खेती की जाती हैं। 
    • अरेबिका हल्की कॉफी है, लेकिन इसकी फलियाँ अधिक सुगंधित होने के कारण रोबस्टा फलियों की तुलना में इसका बाजार मूल्य अधिक है। दूसरी ओर रोबस्टा में अधिक तेज़ होती है और इसलिये विभिन्न मिश्रणों में इसका उपयोग किया जाता है।
      • अरेबिका की खेती रोबस्टा की तुलना में अधिक ऊँचाई पर की जाती है।
    • अरेबिका को अधिक देखभाल और पोषण की आवश्यकता होती है तथा यह बड़ी जोत के लिये अधिक उपयुक्त है, जबकि रोबस्टा की खेती किसी भी आकार के जोत में की जा सकती है।
    • अरेबिका कीटों और रोगों जैसे- श्वेत तनाछेदक (White Stem Borer), लीफ रस्ट/पत्ती रतुआ आदि के लिये अतिसंवेदनशील है और रोबस्टा की तुलना में इसके लिये अधिक छाया की आवश्यकता होती है।
    • अरेबिका की फसल की कटाई नवंबर से जनवरी के बीच होती है, जबकि रोबस्टा के फसल की कटाई दिसंबर से फरवरी के बीच होती है।

स्रोत: द हिंदू


आधार 2.0 कार्यशाला

प्रिलिम्स के लिये:

आधार, भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण

मेन्स के लिये:

‘आधार’ का महत्त्व और संबंधित मुद्दे

चर्चा में क्यों?

हाल ही में इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने 'आधार 2.0- डिजिटल पहचान और स्मार्ट शासन के नए युग की शुरुआत' नामक एक 3 दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया।

  • कार्यशाला का उद्देश्य सरकार द्वारा शुरू किये गए प्रमुख सुधारों और योजनाओं में डिजिटल पहचान हेतु पहुँच का विश्लेषण करना है।
  • इसका उद्देश्य सामाजिक और वित्तीय दोनों तरह से सार्वभौमिक समावेशन प्राप्त करने के लिये डिजिटल पहचान के विभिन्न पहलुओं पर गौर करना है।

प्रमुख बिंदु

  • परिचय:
    • यह भारत और विदेशों में डिजिटल पहचान पर काम कर रहे सरकार और उद्योग जगत के नेताओं, प्रख्यात शिक्षाविदों एवं वैज्ञानिकों, नवोन्मेषकों तथा चिकित्सकों के साथ विचारों को साझा करने व आदान-प्रदान करने के लिये एक मंच प्रदान करेगा।
    • यह कार्यशाला भारत-विशिष्ट चुनौतियों और लोगों, प्रक्रियाओं, प्रौद्योगिकी, अनुसंधान, नियामक ढाँचे, कानूनी नीति व शासन के संदर्भ में सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा करने के अवसरों को दर्शाते हुए क्षेत्रीय एवं वैश्विक बहस में शामिल होने का अवसर प्रदान करेगी।
  • प्रमुख चर्चाएँ:
    • आधार के उपयोग का विस्तार:SWIK’ नियमों (सामाजिक कल्याण, नवाचार और ज्ञान) के आलोक में ‘आधार’ स्वयं को ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों मोड में पहचान सत्यापन के मुख्य प्रवर्तकों में से एक के रूप में जारी रख सकता है।
      • उदाहरण के लिये ‘आधार’ ई-कॉमर्स, ई-बैंकिंग और वित्त क्षेत्र के लिये उपयोगी हो सकता है।
    • आधार एक अंतर्राष्ट्रीय डिजिटल पहचान मानक के रूप में: आधार को डिजिटल पहचान के लिये अंतर्राष्ट्रीय मानक बनाने, अंतर्राष्ट्रीय डिजिटल पहचान मानकों के लिये एक रोडमैप और सीमाओं के पार अंतर्संचालनीयता के लिये रूपरेखा के रूप में विकसित किया जाना है।
    • क्रिटिकल टेक्नोलॉजी का उपयोग: आधार में बायोमेट्रिक्स को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीप लर्निंग तकनीकों का उपयोग करके बेहतर बनाया जा सकता है।
      • ब्लॉकचेन आधारित प्रौद्योगिकियों और अनुप्रयोगों के साथ-साथ बैंकिंग क्षेत्र में आधार तथा इन नई प्रौद्योगिकियों के प्रभाव का पता लगाया जाना चाहिये।

आधार:

  • परिचय:
    • आधार संख्या ‘भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण’ (UIDAI) द्वारा भारत के निवासियों को निर्धारित सत्यापन प्रक्रिया को पूरा करने के बाद जारी की गई 12 अंकों की एक यादृच्छिक संख्या है।
    • कोई भी व्यक्ति जो भारत का निवासी है, चाहे वह किसी भी उम्र और लिंग का हो, आधार संख्या प्राप्त करने के लिये स्वेच्छा से नामांकन कर सकता है।
    • नामांकन के इच्छुक व्यक्ति को नामांकन प्रक्रिया के दौरान न्यूनतम जनसांख्यिकीय और बायोमेट्रिक जानकारी प्रदान करनी होगी जो पूरी तरह से निःशुल्क है।
    • एक व्यक्ति को केवल एक बार आधार के लिये नामांकन करने की आवश्यकता होती है और डी-डुप्लीकेशन (De-Duplication) के बाद केवल एक आधार ही उत्पन्न होगा, क्योंकि विशिष्टता जनसांख्यिकीय और बायोमेट्रिक, डी-डुप्लीकेशन की प्रक्रिया के माध्यम से प्राप्त की जाती है।
  • कानूनी ढांँचा: संसद ने आधार और अन्य कानून (संशोधन) अधिनियम, 2019 पारित किया है जो पहचान के प्रमाण के रूप में आधार के स्वैच्छिक उपयोग की अनुमति देता है।
  • आधार के लाभ:
    • पारदर्शिता और सुशासन को बढ़ावा देना: आधार नंबर ऑनलाइन एवं किफायती तरीके से सत्यापन योग्य है।
      • यह डुप्लीकेट और नकली पहचान को खत्म करने में अद्वितीय है और इसका उपयोग कई सरकारी कल्याण योजनाओं का लाभ प्राप्त करने हेतु किया जाता है जिससे पारदर्शिता और सुशासन को बढ़ावा मिलता है।
    • निचले स्तर तक मदद: आधार ने बड़ी संख्या में ऐसे लोगों को पहचान प्रदान की  है जिनकी पहले कोई पहचान नहीं थी। 
    • तटस्थ: आधार संख्या किसी भी जाति, धर्म, आय, स्वास्थ्य और भूगोल के आधार पर लोगों को वर्गीकृत नहीं करती है।
      • आधार संख्या पहचान का प्रमाण है, हालांँकि आधार संख्या इसके धारक को नागरिकता या अधिवास का कोई अधिकार प्रदान नहीं करती है।
    • जन-केंद्रित शासन: आधार सामाजिक और वित्तीय समावेशन, सार्वजनिक क्षेत्र के वितरण सुधारों, वित्तीय बजटों के प्रबंधन, सुविधा बढ़ाने और बाधा मुक्त जन-केंद्रित शासन को बढ़ावा देने हेतु एक रणनीतिक नीति उपकरण है। 
    • स्थायी वित्तीय पता: आधार को स्थायी वित्तीय पते के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है तथा यह समाज के वंचित और कमज़ोर वर्गों को वित्तीय समावेशन की सुविधा प्रदान करता है, अत: इस कारण यह वितरण न्याय और समानता का एक उपकरण है।