डेली न्यूज़ (17 Nov, 2021)



सफाई मित्र सुरक्षा चुनौती अभियान

प्रिलिम्स के लिये:

संयुक्त राष्ट्र, सिंगल यूज़ प्लास्टिक, विश्व शौचालय दिवस, स्वच्छ भारत मिशन

मेन्स के लिये:

सफाई मित्र सुरक्षा चुनौती अभियान के महत्त्वपूर्ण बिंदु 

चर्चा में क्यों?

आवास और शहरी कार्य मंत्रालय द्वारा  'विश्व शौचालय दिवस' (19 नवंबर) समारोह के भाग के रूप में एक सप्ताह का 'स्वच्छ अमृत दिवस' तक चलने वाले सफाई मित्र सुरक्षा चुनौती (Safari Mitra Suraksha Challenge- SSC) जागरूकता अभियान शुरू किया गया है।

  • स्वच्छ सर्वेक्षण 2021 में राज्यों, शहरों, यूएलबी और छावनी बोर्ड की भूमिका तथा प्रयासों को मान्यता देने और कचरा मुक्त स्टार रेटिंग प्रमाणन के लिये 20 नवंबर, 2021 को 'स्वच्छ अमृत दिवस' पुरस्कार समारोह का आयोजन किया जाएगा।

'विश्व शौचालय दिवस'

  • वर्ष 2013 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने आधिकारिक तौर पर 19 नवंबर को विश्व शौचालय दिवस के रूप में नामित किया। यह सरकारों और भागीदारों के सहयोग से संयुक्त राष्ट्र-जल (UN-Water) द्वारा समन्वित है।
  • इसका उद्देश्य स्वच्छता को लेकर लोगों के मध्य नकारात्मक विचारधारा को समाप्त करना है  क्योंकि शौचालय और स्वच्छता के मुद्दे पर चुप्पी के घातक परिणाम हो सकते हैं।
  • वर्ष 2021 की थीम शौचालयों के मूल्यांकन (Valuing Toilets) से संबंधित है।

 प्रमुख बिंदु 

  • सफाई मित्र सुरक्षा चुनौती अभियान के बारे में:
    • ‘सफाई मित्र सुरक्षा चुनौती’ में कुल 246 शहर भाग ले रहे हैं जिसे देश भर में आयोजित किया जा रहा है। राज्यों की राजधानियाँ, शहरी स्थानीय निकाय और स्मार्ट शहर इस अभियान में भाग लेने के पात्र होंगे।
    • शहरों को तीन उप-श्रेणियों (10 लाख से अधिक, 3-10 लाख और 3 लाख तक की आबादी) में सम्मानित किया जाएगा। कुल पुरस्कार राशि 52 करोड़ रुपए निर्धारित की गई है।
    • यह हाथ से मैला ढोने की प्रथा से निपटने के सरकारी प्रयासों में से एक है।
  • सफाई मित्र सुरक्षा चुनौती:
    • SSC को 19 नवंबर, 2020 को विश्व शौचालय दिवस के अवसर पर लॉन्च किया गया था।
    • सफाई मित्र सुरक्षा चुनौती (SSC) का उद्देश्य शहरों को अपने सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के कार्यों को मशीनीकृत करने के लिये प्रोत्साहित करना है।
    • सरकार द्वारा अप्रैल 2021 में सभी राज्यों के लिये सीवर-सफाई को मशीनीकृत करने के लिये चेलेंज फॉर आल की शुरुआत की गई। इसके साथ ही यदि किसी व्यक्ति को अपरिहार्य आपात स्थिति में सीवर लाइन में प्रवेश करने की आवश्यकता होती है, तो उसे उचित उपकरण/सामग्री और ऑक्सीजन सिलेंडर आदि उपलब्ध कराए जाने चाहिये।
  • शुरू की गई पहलें: 
    • SSC अभियान के तहत ऋण मेले जैसी कई पहलें शुरू की गई हैं। SSC के अंतर्गत राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी वित्त और विकास निगम (NSKFDC), सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, एमओएचयूए द्वारा समर्थित देश भर में ऋण मेलों का आयोजन किया जा रहा है।
      • इसका उद्देश्य सफाई मित्रों को सीवर/सेप्टिक टैंकों की मशीनीकृत सफाई के लिये टैंक सफाई मशीन/उपकरण खरीद हेतु स्वच्छता उद्यमी योजना (एसयूवाई) के तहत ऋण प्राप्त करने में मदद करना है। 
    • NSKFDC के माध्यम से 115 शहरों में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के सहयोग से सफाई मित्रों का कौशल विकास प्रशिक्षण भी आयोजित किया गया है।
    • सेप्टिक टैंक/सीवर की सुरक्षित सफाई और खतरनाक सफाई के संबंध में शिकायतें दर्ज  करने के लिये 345 शहरों में कॉल सेंटर एवं हेल्पलाइन नंबर चालू किये गए हैं।
    • 31 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों ने ज़िम्मेदार स्वच्छता प्राधिकरण (Responsible Sanitation Authority- RSA) की स्थापना की है और इन राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के 210 शहरों में स्वच्छता प्रतिक्रिया इकाइयांँ (Sanitation Response Units- SRU) मौजूद हैं।
    • भाग लेने वाले सभी 246 शहरों ने पहले ही सिंगल यूज़ प्लास्टिक (Single-Use Plastic- SUP) पर प्रतिबंध लगा दिया है।

मैनुअल स्कैवेंजिंग: 

  • परिचय:
    • मैनुअल स्कैवेंजिंग (Manual Scavenging) को "सार्वजनिक सड़कों और सूखे शौचालयों से मानव मल को हटाने, सेप्टिक टैंक, नालियों तथा सीवर की सफाई" के रूप में परिभाषित किया गया है। 
    • मैनुअल स्कैवेंजिंग प्रथा भारत की जाति व्यवस्था से जुड़ी हुई है, जहाँ तथाकथित निचली जातियों से ही इस काम को करने की उम्मीद की जाती है।  
    • आधिकारिक तौर पर हाथ से मैला ढोने वालों की संख्या वर्ष 2018 में घटकर 42,303 हो गई, जो वर्ष 2008 में 7,70,338 थी। वर्ष 2018 में हाथ से मैला ढोने वालों का सर्वेक्षण NSKFDC द्वारा किया गया था।
  • संबंधित पहल:

स्रोत: पीआईबी


LGBTQ अधिकारों के लिये महत्त्वपूर्ण उपलब्धि

प्रिलिम्स के लिये: 

उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति संबंधी प्रक्रिया

मेन्स के लिये: 

भारत में LGBTQ समुदाय की स्थिति और संबंधित चुनौतियाँ

चर्चा में क्यों?

वरिष्ठ अधिवक्ता सौरभ कृपाल भारत के पहले समलैंगिक न्यायाधीश हो सकते हैं। चार बार स्थगित करने के बाद सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम ने अंततः दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में उनके नाम की सिफारिश की है।

  • यद्यपि ‘हितों के टकराव’ को स्थगन के एक कारण के रूप में प्रस्तुत किया गया, किंतु कई जानकार मानते हैं कि उनके नाम की सिफारिश उनके यौन अभिविन्यास के कारण नहीं की जा रही थी।
  • यदि उनका चयन होता है तो यह LGBTQ अधिकारों में एक महत्त्वपूर्ण कदम साबित होगा। LGBTQ लेस्बियन, गे, बाई-सेक्सुअल, ट्रांसजेंडर और क्वीर लिये एक संक्षिप्त शब्द है।
  • इससे पहले यूरोपीय संसद ने यूरोपीय संघ को ‘LGBTIQ फ्रीडम ज़ोन’ घोषित किया था।

उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति:

  • संविधान के अनुच्छेद 217 के मुताबिक, उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और राज्य के राज्यपाल के परामर्श से की जाएगी, वहीं मुख्य न्यायाधीश के अलावा किसी अन्य न्यायाधीश की नियुक्ति के मामले में उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श किया जाता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने ‘द्वितीय न्यायाधीश मामले’ (Second Judges Case-1993) में ‘कॉलेजियम प्रणाली’ की शुरुआत यह मानते हुए की कि ‘परामर्श’ से तात्पर्य ‘सहमति’ से है। 
    • इसमें कहा गया है कि यह CJI की व्यक्तिगत राय नहीं थी, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों के परामर्श से निर्मित एक संस्थागत राय थी।
  • उच्च न्यायपालिका के न्यायाधीशों की नियुक्ति केवल कॉलेजियम प्रणाली के माध्यम से होती है और सरकार की भूमिका तब शुरू होती है जब कॉलेजियम द्वारा नाम तय कर लिये जाते हैं।
  • उच्च न्यायालय (HC) कॉलेजियम में संबंधित मुख्य न्यायाधीश और उस न्यायालय के चार अन्य वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं।
    • उच्च न्यायालय कॉलेजियम द्वारा नियुक्ति के लिये अनुशंसित नाम मुख्य न्यायाधीश और सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम द्वारा अनुमोदन के बाद ही सरकार तक पहुँचते हैं।
  • यदि किसी वकील को उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किया जाना है, तो सरकार की भूमिका इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) द्वारा जाँच कराने तक सीमित है।
    • इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB): यह एक प्रतिष्ठित खुफिया एजेंसी है। यह आधिकारिक तौर पर गृह मंत्रालय द्वारा नियंत्रित है।
  • यह कॉलेजियम की पसंद पर आपत्तियाँ भी उठा सकता है और स्पष्टीकरण मांग सकता है, लेकिन अगर कॉलेजियम उन्हीं नामों को दोहराता है, तो सरकार संविधान पीठ के फैसलों के तहत उन्हें न्यायाधीशों के रूप में नियुक्त करने के लिये बाध्य है।

प्रमुख बिंदु

  • भारत में LGBTQ समुदाय की स्थिति:
    • राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण बनाम भारत संघ (2014): सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि ‘ट्रांसजेंडरों को ‘तीसरे लिंग’ के रूप में मान्यता देना एक सामाजिक या चिकित्सा मुद्दा नहीं है, बल्कि मानवाधिकार का मुद्दा है।’
    • नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ (2018): सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 377 के कुछ हिस्सों को हटाकर समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया, जिन्हें LGBTQ समुदाय के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना जाता था।
      • सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है और यह सभी वर्गों के नागरिकों पर लागू होता है।
      • इसने भारत में संवैधानिक नैतिकता की श्रेष्ठता को भी बरकरार रखा, यह देखते हुए कि कानून के समक्ष समानता को सार्वजनिक या धार्मिक नैतिकता को वरीयता देकर नकारा नहीं जा सकता है।
      • सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि 'यौन अभिविन्यास और लिंग पहचान के मुद्दों के संबंध में अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुप्रयोग पर योग्याकार्ता सिद्धांत' को भारतीय कानून के एक हिस्से के रूप में लागू किया जाना चाहिये।
        • योग्याकार्ता सिद्धांत मानव अधिकारों के हिस्से के रूप में यौन अभिविन्यास और लिंग पहचान की स्वतंत्रता को मान्यता देते हैं।
        • उन्हें 2006 में इंडोनेशिया के योग्याकार्ता में अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार विशेषज्ञों के एक विशिष्ट समूह द्वारा प्रतिपादित किया गया था।
    • समान लिंग विवाह को लेकर विवाद:शफीन जहान बनाम अशोकन के.एम. और अन्य’ (2018) वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि एक साथी की पसंद व्यक्ति का मौलिक अधिकार है और इसलिये समान लिंग के युगल भी हो सकते हैं।
      • हालाँकि फरवरी 2021 में केंद्र सरकार ने दिल्ली उच्च न्यायालय में समलैंगिक विवाह का विरोध करते हुए कहा कि भारत में विवाह को तभी मान्यता दी जा सकती है जब वह ‘जैविक पुरुष’ और बच्चे पैदा करने में सक्षम ‘जैविक महिला’ के बीच हो।
    • ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019: संसद ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) विधेयक, 2019 पारित किया है तथा कई जानकारों ने लिंग और यौन पहचान संबंधी मुद्दों को सही ढंग से संबोधित न करने को लेकर इसकी आलोचना की है।
  • LGBTQ समुदाय के समक्ष चुनौतियाँ:
    • परिवार: यौन अभिविन्यास और लिंग पहचान की समस्या विवाद व पारिवारिक विघटन की ओर ले जाती है।
      • माता-पिता और उनके किसी LGBTQ बच्चों के बीच संचार की कमी तथा गलतफहमी पारिवारिक संघर्ष को बढ़ाता है।
    • कार्यस्थल पर भेदभाव: LGBTQ कार्यस्थल पर भेदभाव के कारण बड़े पैमाने पर सामाजिक-आर्थिक असमानताओं से ग्रस्त हैं।
    • स्वास्थ्य संबंधी मुद्दे: समलैंगिक व्यक्तियों के साथ भेदभाव किया जाना अपराध है और LGBTQ लोगों को स्वास्थ्य प्रणाली के भीतर सेवाओं तक खराब या अपर्याप्त पहुँच मिलती है।
      • यह सेवाओं की उपलब्धता और HIV रोकथाम, परीक्षण तथा उपचार सेवाओं तक पहुँचने की क्षमता दोनों में बाधा उत्पन्न करता है।
    • अलगाव और नशीली दवाओं का दुरुपयोग: वे धीरे-धीरे आत्मसम्मान में कमी और कम आत्मविश्वास की भावना से ग्रस्त हो जाते हैं और मित्रों तथा परिवार से अलग हो जाते हैं।
      • ये लोग ज़्यादातर खुद को तनाव और अस्वीकृति तथा भेदभाव से मुक्त करने के लिये ड्रग्स, शराब व तंबाकू के आदी हो जाते हैं।

आगे की राह

  • LGTBQ समुदाय को एक भेदभाव-विरोधी कानून की आवश्यकता है जो उन्हें लैंगिक पहचान या यौन अभिविन्यास के बावजूद उत्पादक जीवन और संबंध बनाने का अधिकार देता है तथा बदलाव की ज़िम्मेदारी राज्य एवं समाज पर डालता है, न कि व्यक्ति पर।
  • सरकारी निकायों, विशेष रूप से स्वास्थ्य और कानून व्यवस्था से संबंधित निकायों को यह सुनिश्चित करने के लिये संवेदनशील बनाने की आवश्यकता है कि LGBTQ समुदाय को सार्वजनिक सेवाओं से वंचित न किया जाए या उनके यौन अभिविन्यास के लिये उन्हें परेशान न किया जाए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


पूर्वांचल एक्सप्रेसवे: यूपी

प्रिलिम्स के लिये:

औद्योगिक गलियारा, पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे, युमना एक्सप्रेस वे, नॉएडा एक्सप्रेस वे 

मेन्स के लिये:

औद्योगिक गलियारों का महत्त्व

चर्चा में क्यों?  

हाल ही में प्रधानमंत्री द्वारा उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल एक्सप्रेसवे (Purvanchal Expressway) का उद्घाटन किया गया।

प्रमुख बिंदु

  • पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के बारे में:
    • यह लखनऊ ज़िले में मौजूदा लखनऊ-सुल्तानपुर रोड (एनएच-731) के पास स्थित चांदसराय गांँव से शुरू होता है तथा गाजीपुर ज़िले में यूपी-बिहार सीमा से 18 किमी. दूर राष्ट्रीय राजमार्ग 31 पर हैदरिया गांँव में समाप्त होता है।
    • यह एक्सप्रेसवे एक औद्योगिक गलियारा बनाते हुए मौजूदा आगरा-लखनऊ और आगरा-नोएडा यमुना एक्सप्रेसवे से जुड़ जाएगा, जो यूपी की पूर्वी से पश्चिमी सीमाओं तक कनेक्टिविटी प्रदान करेगा।
      • औद्योगिक गलियारा मूल रूप से एक गलियारा/रास्ता होता है जिसमें मल्टी -मोडल ट्रांसपोर्ट सेवाएंँ (Multi-Modal Transport Services) शामिल होती हैं जो राज्यों से मुख्य मार्गों के रूप में गुज़रती हैं।
    • इस ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे पर पड़ने वाले ज़िले लखनऊ, बाराबंकी, अमेठी, सुल्तानपुर, अयोध्या, अंबेडकर नगर, आजमगढ़, मऊ और गाजीपुर हैं।
  • एक्सप्रेसवे की विशेषताएंँ:
    • इस एक्सप्रेसवे पर वाहनों के लिये सीएनजी स्टेशन, इलेक्ट्रिक रिचार्ज स्टेशन होंगे और इसे आगरा तथा बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे द्वारा डिफेंस कॉरिडोर से जोड़ा जाएगा।
  • अपेक्षित लाभ:
    • राज्य का पूर्वी क्षेत्र न केवल लखनऊ से बल्कि राष्ट्रीय राजधानी से भी आगरा-लखनऊ और यमुना एक्सप्रेसवे के माध्यम से जुड़ जाएगा।
    • यह उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्सों के आर्थिक विकास को बढ़ावा देगा।
    • यह एक्सप्रेसवे निर्मित कृषि वस्तुओं और अन्य उत्पादों के लिये बड़े बाज़ारों तक बेहतर और त्वरित पहुंँच प्रदान करेगा।
  • उत्तर प्रदेश में एक्सप्रेसवे का नया नेटवर्क:
    • उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के अलावा पहले से ही संचालित आगरा-लखनऊ और यमुना एक्सप्रेसवे, कम-से-कम तीन और एक्सप्रेसवे, प्रस्तावित रक्षा गलियारे  पूरा होने के विभिन्न चरणों में हैं।
    • इन परियोजनाओं को पूरा करने की ज़िम्मेदारी उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (Uttar Pradesh Expressways Industrial Development Authority- UPEIDA) को दी गई है।
      • UPEIDA की स्थापना यूपी औद्योगिक क्षेत्र विकास अधिनियम के तहत की गई है।

expressways

औद्योगिक गलियारा:

  • औद्योगिक गलियारों के बारे में:
    • भारत राष्ट्रीय औद्योगिक गलियारा कार्यक्रम के हिस्से के रूप में विभिन्न औद्योगिक कॉरिडोर परियोजनाओं का विकास कर रहा है।
    • राष्ट्रीय औद्योगिक गलियारा विकास कार्यक्रम भारत का सबसे महत्त्वाकांक्षी बुनियादी ढांँचा कार्यक्रम है जिसका लक्ष्य नए औद्योगिक शहरों को ‘स्मार्ट सिटी’ के रूप में विकसित करना और अगली पीढ़ी की प्रौद्योगिकियों को बुनियादी ढांँचा क्षेत्रों में परिवर्तित करना है।
  • उद्देश्य:
    • इसका उद्देश्य भारत में भविष्य के औद्योगिक शहरों का विकास करना है जो विश्व  के सर्वश्रेष्ठ विनिर्माण और निवेश स्थलों के साथ प्रतिस्पर्द्धा कर सकें।
    • इससे रोज़गार के अवसर उत्पन्न होंगे और समग्र सामाजिक-आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलेगा।
  • क्रियान्वयन एजेंसी:
    • इन ग्यारह औद्योगिक गलियारा परियोजनाओं (नीचे दिये गए चित्र में) के विकास को राष्ट्रीय औद्योगिक गलियारा विकास और कार्यान्वयन ट्रस्ट (National Industrial Corridor Development and Implementation Trust- NICDIT) के माध्यम से लागू किया जाएगा 

National-Industries

  • औद्योगिक गलियारे विश्व स्तरीय बुनियादी ढांँचे का निर्माण करते हैं, जैसे:
    • उच्च गति परिवहन नेटवर्क - रेल और सड़क।
    • अत्याधुनिक कार्गो हैंडलिंग उपकरण वाले बंदरगाह।
    • आधुनिक हवाई अड्डे।
    • विशेष आर्थिक क्षेत्र/औद्योगिक क्षेत्र।
    • लॉजिस्टिक पार्क/ट्रांसशिपमेंट हब।
    • औद्योगिक ज़रूरतों को पूरा करने पर केंद्रित नॉलेज पार्क।
    • टाउनशिप/रियल एस्टेट जैसे पूरक बुनियादी ढांँचे।
    • नीतिगत ढांँचे को सक्षम करने के साथ-साथ अन्य शहरी आधारभूत संरचनाएंँ। 

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


ताप विद्युत संयंत्रों द्वारा अक्षय ऊर्जा का उत्पादन

प्रिलिम्स के लिये:

डिस्कॉम, COP26, अक्षय ऊर्जा 

मेन्स के लिये:

ताप विद्युत संयंत्रों द्वारा अक्षय ऊर्जा के उत्पादन हेतु जारी दिशा-निर्देशों का महत्त्व 

चर्चा में क्यों? 

हाल ही में ऊर्जा तथा नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालयों (Ministries of  Power and New and Renewable Energy) द्वारा दिशा-निर्देश जारी किये गए है जो थर्मल उत्पादन कंपनियों को मौजूदा बिजली खरीद समझौतों/पावर परचेज़ अग्रीमेंट (Power Purchase Agreements- PPAs) के तहत अक्षय ऊर्जा उत्पादन क्षमता (Renewable Energy Generation Capacity) स्थापित करने और उपभोक्ताओं को बिजली की आपूर्ति करने की अनुमति प्रदान करते हैं।

प्रमुख बिंदु 

  • दिशा-निर्देश:
    • हरित ऊर्जा के लिये अक्षय ऊर्जा का उत्पादन: नए दिशा-निर्देश अक्षय/थर्मल उत्पादन कंपनियों को ‘स्वयं’ द्वारा या डेवलपर्स के माध्यम से खुली बोलियों द्वारा अक्षय ऊर्जा उत्पादन क्षमता स्थापित करने और मौजूदा PPA के तहत उपभोक्ताओं को विद्युत की आपूर्ति करने की अनुमति देते हैं।
      • पावर परचेज़ अग्रीमेंट (PPA), या इलेक्ट्रिसिटी पावर अग्रीमेंट, दो पक्षों के मध्य एक अनुबंध है, जिसमें एक विद्युत का उत्पादन करता है (बिजली उत्पादन कंपनियांँ (जेनकोस) और जो विद्युत खरीदना चाहता है (डिस्कॉम)। 
    • आरपीओ पूरक डिस्कॉम: डिस्कॉम को योजना के अंतर्गत खरीदी गई अक्षय ऊर्जा की गणना अक्षय खरीद दायित्व (Renewable Purchase Obligation- RPO) के तहत करने की अनुमति होगी।
      • RPO एक ऐसा तंत्र है जिसके तहत राज्य विद्युत नियामक आयोग अक्षय ऊर्जा स्रोतों से बिजली का एक निश्चित प्रतिशत खरीदने के लिये बाध्य होते हैं।
      • अक्षय ऊर्जा की मांग उत्पन्न करने के उद्देश्य से पूरे देश में RPO को लागू किया जा रहा है।
    • RPO लक्ष्य: आरपीओ के दीर्घकालिक विकास प्रक्षेपवक्र के तहत राज्यों को वित्त वर्ष 2022 में अक्षय स्रोतों से प्राप्त विद्युत अनुपात को उनकी कुल खरीद के 21.2% तक बढ़ाने के लिये कहा गया है।
    • डिस्कॉम के साथ फंड शेयरिंग: अक्षय ऊर्जा के माध्यम से विद्युत उत्पादन की कम लागत से थर्मल पावर प्लांट को होने वाली किसी भी बचत को 50:50 के आधार पर डिस्कॉम के साथ साझा किया जाएगा।

Structure of Power Sector 

Power-Sector

5-Pledges

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


पहला ऑडिट दिवस : कैग

चर्चा में क्यों?

हाल ही में प्रधानमंत्री ने पहले ऑडिट दिवस (16 नवंबर, 2021) को चिह्नित करने के लिये भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) के कार्यालय में सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रतिमा का अनावरण किया।

  • यह कैग (CAG) संस्थान की ऐतिहासिक स्थापना को चिह्नित करने के लिये मनाया जाता है। इसका उद्देश्य पारदर्शिता और सुशासन को बढ़ावा देने हेतु कैग (CAG) के समृद्ध योगदान को उज़ागर करना है।
  • गिरीश चंद्र मुर्मू ने 8 अगस्त, 2020 को भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक के रूप में पदभार ग्रहण किया। 

प्रमुख बिंदु

  • संवैधानिक निकाय: अनुच्छेद 148 कैग के एक स्वतंत्र कार्यालय का प्रावधान करता है। यह भारत की सर्वोच्च लेखापरीक्षा संस्था है।
    • CAG से संबंधित अन्य प्रावधानों में शामिल हैं: अनुच्छेद 149 (कर्त्तव्य और शक्तियाँ), अनुच्छेद 150 (संघ और राज्यों के खातों का विवरण), अनुच्छेद 151 (CAG की रिपोर्ट), अनुच्छेद 279 (‘शुद्ध आय’ की गणना आदि)  तथा तीसरी अनुसूची (शपथ या प्रतिज्ञान) और छठी अनुसूची (असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम राज्यों में जनजातीय क्षेत्रों का प्रशासन)।
  • संक्षिप्त विवरण:
    • भारतीय लेखा परीक्षा और लेखा विभाग के प्रमुख - 1753 में बनाए गए।
    • वह लोक व्यय का संरक्षक होने के साथ-साथ केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर देश की संपूर्ण वित्तीय प्रणाली को नियंत्रित करता है।
    • CAG को भारत सरकार की लोकतांत्रिक प्रणाली में एक संरक्षक दीवार कहा जाता है।
    • वित्तीय प्रशासन के क्षेत्र में कार्यपालिका (अर्थात् मंत्रिपरिषद) की संसद के प्रति जवाबदेही CAG की लेखापरीक्षा रिपोर्टों के माध्यम से सुनिश्चित की जाती है।
  • नियुक्ति: उसे भारत के राष्ट्रपति के हस्ताक्षर और मुहर लगे एक अधिपत्र (Warrant) द्वारा नियुक्त किया जाता है।
  • कार्यकाल: इसका कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक होता है। ( दोनों में से जो भी पहले हो) 
  • निष्कासन: CAG को राष्ट्रपति द्वारा उसी आधार पर और उसी तरह हटाया जा सकता है जिस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है। वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत अपना पद धारण नहीं करता है।
    • दूसरे शब्दों में उसे राष्ट्रपति द्वारा संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत से पारित एक प्रस्ताव के आधार पर या तो साबित दुर्व्यवहार या अक्षमता के आधार पर हटाया जा सकता है।
  • अन्य संबंधित बिंदु:
    • वह कार्यकाल समाप्त होने के बाद भारत सरकार या किसी भी राज्य सरकार के अधीन किसी अन्य रोज़गार हेतु पात्र नहीं होगा। 
    • वेतन और अन्य सेवा शर्तें संसद द्वारा निर्धारित की जाती हैं। 
    • CAG के कार्यालय का प्रशासनिक व्यय, जिसमें उस कार्यालय में कार्यरत सभी व्यक्तियों का वेतन, भत्ते और पेंशन शामिल हैं, जो भारत की संचित निधि पर भारित होते हैं जिन पर संसद में मतदान नहीं हो सकता।
    • कोई भी मंत्री संसद में CAG  का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है।
  •  इसके कार्य और शक्तियाँ नियंत्रक और महालेखापरीक्षक (कर्त्तव्य, शक्तियाँ और सेवा शर्तें) अधिनियम, 1971 के तहत शामिल हैं।
    • CAG भारत की संचित निधि और प्रत्येक राज्य, केंद्रशासित प्रदेश जिसकी विधानसभा होती है, की संचित निधि से संबंधित खातों के सभी प्रकार के व्यय से संबंधित लेखाओं का लेखा परीक्षण करता है।
    • वह भारत की आकस्मिक निधि और भारत के सार्वजनिक खाते के साथ-साथ प्रत्येक राज्य की आकस्मिक निधि व सार्वजनिक खाते से होने वाले सभी खर्चों का परीक्षण करता है।
    • वह केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के किसी भी विभाग के सभी ट्रेडिंग, विनिर्माण, लाभ- हानि खातों, बैलेंस शीट तथा अन्य अतिरिक्त खातों का ऑडिट करता है।
    • निम्नलिखित की प्राप्तियों और व्यय की लेखापरीक्षा करता है:
      • केंद्र या राज्य के राजस्व से पर्याप्त रूप से वित्तपोषित निकाय और प्राधिकरण;
      • सरकारी कंपनियाँ;  
      • अन्य निगम और निकाय, जब संबंधित कानूनों द्वारा ऐसा आवश्यक हो।
    • राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा अनुशंसित किये जाने पर वह किसी अन्य प्राधिकरण के खातों का ऑडिट करता है, जैसे- कोई स्थानीय निकाय की लेखापरीक्षा।
    • संसद की लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee) के मार्गदर्शक, मित्र और सलाहकार के रूप में भी कार्य करता है।
  • सीमाएँ:
    • भारत का संविधान CAG को नियंत्रक के साथ-साथ महालेखा परीक्षक के रूप में देखता है। हालाँकि व्यवहारिक रूप से CAG केवल एक महालेखा परीक्षक की भूमिका निभा रहा है, नियंत्रक की नहीं। 
    • दूसरे शब्दों में CAG का समेकित निधि से धन के मुद्दे पर कोई नियंत्रण नहीं है और कई विभाग CAG से विशिष्ट प्राधिकरण के बिना चेक जारी करके धन निकालने के लिये अधिकृत हैं, जो केवल लेखा परीक्षा चरण में संबंधित है जबकि व्यय पहले ही हो चुका है।
    • इस संबंध में भारत का CAG ब्रिटेन के CAG से पूरी तरह भिन्न है, जिसके पास नियंत्रक और महालेखा परीक्षक दोनों की शक्तियाँ हैं। 
      • दूसरे शब्दों में ब्रिटेन में कार्यपालिका केवल CAG की स्वीकृति से ही सरकारी राजकोष से धन आहरित कर सकती है।

स्रोत: द हिंदू


बिडेन-शी शिखर सम्मेलन

प्रिलिम्स के लिये:

शीत युद्ध, उइगर मुस्लिम, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र, 'वन चाइना' नीति 

मेन्स के लिये:

बाइडेन-शी शिखर सम्मेलन का महत्त्व, अमेरिका-चीन संबंध

चर्चा में क्यों?

हाल ही में संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने पहली वर्चुअल द्विपक्षीय बैठक के लिये मुलाकात की। यह बैठक दोनों पक्षों के बीच मतभेदों को समाप्त करने में असफल रही।

  • अमेरिका-चीन के बीच विवाद कई मोर्चों पर है जिसमें वैचारिक और सांस्कृतिक आधिपत्य प्रतिद्वंद्विता, व्यापार युद्ध शामिल हैं जिसे अक्सर नया शीत युद्ध कहा जाता है।

प्रमुख बिंदु

  • चीन के विरुद्ध अमेरिका का आरक्षण:
    • मानवाधिकार उल्लंघन: अमेरिका ने शिनजियांग’ (Xinjiang) (उइगर मुस्लिम), तिब्बत और हॉन्गकॉन्ग में मानवाधिकार उल्लंघन प्रथाओं के बारे में चिंता जताई।
    • व्यापार युद्ध: वर्ष 2017 में चीन के साथ अमेरिका का व्यापार घाटा लगभग 375 बिलियन अमेरिकी डॉलर था। इसके कारण पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिका को चीनी निर्यात पर आयात शुल्क लगाया।
      • अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि अमेरिकी श्रमिकों और उद्योगों को चीन के अनुचित व्यापार और आर्थिक व्यवहार से बचाने की आवश्यकता है।
      • अमेरिकी ट्रेज़री विभाग ने चीन को करेंसी मैनिपुलेटर घोषित किया है।
    • स्वतंत्र और खुला इंडो-पैसिफिक क्षेत्र: दक्षिण चीन सागर में चीन ने दृढ़ता के साथ समुद्र के अधिकांश हिस्से को अपने क्षेत्र के रूप में दावा करते हुए अमेरिका को क्षेत्र की समृद्धि के लिये नेविगेशन की स्वतंत्रता और सुरक्षित ओवरफ्लाइट के महत्त्व को दोहराने के लिये प्रेरित किया है।
    • ताइवान: वर्ष 1949 में हुए गृहयुद्ध के दौरान चीन और ताइवान अलग हो गए, हालाँकि इसके बावजूद चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है और आवश्यकता पड़ने पर किसी भी तरह से उस पर नियंत्रण प्राप्त करने की वकालत करता है। जबकि ताइवान के नेताओं का कहना है कि ताइवान एक संप्रभु देश है।
      • अमेरिका 'वन चाइना' नीति के लिये प्रतिबद्ध है। हालाँकि वह "ताइवान जलडमरूमध्य में यथास्थिति को बदलने या शांति और स्थिरता को कमज़ोर करने के एकतरफा प्रयासों का कड़ा विरोध करता है"।
  • अमेरिका के खिलाफ चीन का आरक्षण:
    • गठबंधन और समूह: चीन ने अमेरिका के नेतृत्व वाले गठबंधनों और समूहों के संबंध में आपत्ति जताई है। चीन ने माना कि इन समूहों ने दुनिया में ‘विभाजन’ को जन्म दिया है।
      • यह क्वाड समूह का एक बिंदु था, जिसमें अमेरिका, भारत, ऑस्ट्रेलिया और जापान शामिल हैं और ऑस्ट्रेलिया, यूके तथा यूएस के बीच ऑस्ट्रेलिया को परमाणु-संचालित पनडुब्बियों को वितरित करने हेतु ‘ऑकस’ (AUKUS) सौदा शामिल है।
      • इसके अलावा अमेरिका ने हाल ही में चीन को शामिल किये बिना G7 को G-11 तक विस्तारित करने का प्रस्ताव दिया है।
    • विश्व वित्त पर हावी होने हेतु प्रतिस्पर्द्धा: अमेरिका के प्रभुत्व वाले अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन का मुकाबला करने के लिये चीन ‘एशिया इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक’ और ‘न्यू डेवलपमेंट बैंक’ जैसे वैकल्पिक वित्तीय संस्थानों के साथ सामने आया है।
  • अमेरिका-भारत-चीन संबंध:

आगे की राह 

  • यूएस-चीन की ज़िम्मेदारी: यह सुनिश्चित करना चीन और अमेरिका के नेताओं की ज़िम्मेदारी है कि देशों के मध्य प्रतिस्पर्द्धा किसी संघर्ष का रूप न ले।
  • भारत उन्मुख संतुलन: भारत को अपनी बढ़ती वैश्विक शक्ति का एहसास होना चाहिये और अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता में फंँसने के बजाय शांतिपूर्ण आपसी संबंध बनाए रखते हुए अपने हितों और विकास को प्राथमिकता देनी चाहिये।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस