भारत के ऊर्जा सुरक्षा प्रतिमान पर पुनर्विचार | 28 Mar 2026
यह एडिटोरियल 23/03/2026 को द हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित ‘West Asia’s shadow on energy security in India’ शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख भारत के ऊर्जा क्षेत्र से संबंधित कमियों का बहुआयामी विश्लेषण प्रस्तुत करता है तथा वर्तमान रणनीतिक भंडार एवं वैश्विक सुरक्षा मानकों के मध्य विद्यमान महत्त्वपूर्ण अंतर को रेखांकित करता है। इसमें भू-राजनीतिक आपूर्ति बाधाओं से भारतीय अर्थव्यवस्था की सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु एक परिवर्तनकारी कार्ययोजना का भी विवेचन किया गया है।
प्रिलिम्स के लिये: रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR), भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC), हरित हाइड्रोजन मिशन।
मेन्स के लिये: ऊर्जा सुरक्षा में भारत की प्रगति, प्रमुख मुद्दे और आवश्यक उपाय।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा अभी भी संरचनात्मक रूप से कमज़ोर बनी हुई है, क्योंकि ऊर्जा मिश्रण में तेल एवं गैस की हिस्सेदारी लगभग 36% है, जबकि कच्चे तेल के लिये आयात निर्भरता लगभग 90% तथा प्राकृतिक गैस के लिये लगभग 47% है। कच्चे तेल का लगभग 50% एवं LNG का 55-60% आयात होर्मुज़ जलडमरूमध्य के माध्यम से होकर गुजरता है, जिससे भारत भू-राजनीतिक अस्थिरताओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाता है। वर्तमान रणनीतिक भंडार मात्र 9-10 दिनों के कच्चे तेल की आपूर्ति सुनिश्चित करते हैं, जो कि वैश्विक मानक (90 दिन) की तुलना में अत्यंत कम है। इस प्रकार यह उच्च बाह्य निर्भरता एवं संवेदनशीलता भारत की ऊर्जा सुरक्षा को केवल एक आर्थिक चिंता तक सीमित न रखते हुए, एक महत्त्वपूर्ण रणनीतिक आवश्यकता के रूप में स्थापित करती है।
भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को किस प्रकार सुदृढ़ कर रहा है?
- रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार और सुरक्षा तंत्र: भू-राजनीतिक अस्थिरता के कारण आपूर्ति शृंखला व्यवधानों से प्रभावी संरक्षण हेतु तदर्थ भंडारण से वैधानिक भंडार दायित्वों की ओर त्वरित संक्रमण आवश्यक है।
- मुद्रास्फीति एवं केंद्रित समुद्री संकटों से समग्र अर्थव्यवस्था की सुरक्षा के लिये एक मज़बूत घरेलू सुरक्षा कवच का निर्माण अनिवार्य है।
- ऊर्जा सुरक्षा तंत्र को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से सरकार रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) के द्वितीय चरण विस्तार को 6.5 मिलियन मीट्रिक टन तक बढ़ाने की प्रक्रिया को गति प्रदान कर रही है।
- इसमें चंदीखोल (ओडिशा) में 4 MMT की नई भूमिगत भंडारण सुविधा तथा पादुर (कर्नाटक) में 2.5 MMT के विस्तार को सम्मिलित किया गया है, जिसका उद्देश्य आपातकालीन कच्चे तेल भंडारण क्षमता में वृद्धि करना तथा बाह्य आपूर्ति बाधाओं के प्रति संवेदनशीलता को कम करना है।
- अंतर्राष्ट्रीय गलियारों के माध्यम से राजनयिक जोखिम में कमी: भारत अपने ऊर्जा पारगमन मार्गों में विविधता लाने हेतु अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक गलियारों का उपयोग करते हुए पश्चिम एशियाई निर्भरता से उत्पन्न कमज़ोरियों को न्यूनतम करने का प्रयास कर रहा है।
- रणनीतिक द्विपक्षीय साझेदारियों के सुदृढ़ीकरण से दीर्घकालिक आपूर्ति समझौते सुनिश्चित होते हैं, जो पारंपरिक समुद्री तनाव क्षेत्रों एवं भू-राजनीतिक अवरोधों से बचाव प्रदान करते हैं।
- भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) के त्वरित क्रियान्वयन से वैकल्पिक एवं सुरक्षित ऊर्जा तथा व्यापार मार्गों का विकास संभव होगा।
- इस गलियारे के माध्यम से यात्रा समय में संभावित रूप से 40% तथा लॉजिस्टिक्स लागत में लगभग 30% तक की कमी का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
- इसके अतिरिक्त, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL) ने ADNOC गैस की सहायक कंपनी अबू धाबी गैस लिक्विफिकेशन कंपनी के साथ 10 वर्षीय LNG आपूर्ति समझौता संपन्न किया है, जो तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) की स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित करते हुए भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करता है।
- कार्बन कैप्चर और औद्योगिक संक्रमण: भारी उद्योगों के कार्बन उत्सर्जन में कमी लाना अब ऊर्जा सुरक्षा का एक केंद्रीय स्तंभ बन गया है, जो पर्यावरणीय प्रतिबद्धताओं को रणनीतिक आर्थिक तंत्र में रूपांतरित करता है।
- गहन प्रौद्योगिकी आधारित संक्रमण अवसंरचना में निवेश भारत को व्यापक औद्योगिक विकास हेतु आयातित जीवाश्म ईंधनों पर संरचनात्मक निर्भरता को कम करने में सहायक सिद्ध होगा।
- केंद्रीय बजट 2026-27 में कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन एवं स्टोरेज (CCUS) अवसंरचना के विकास हेतु ₹20,000 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है।
- यह पहल घरेलू इस्पात एवं सीमेंट क्षेत्रों में आयातित कोकिंग कोयले पर निर्भरता को कम करने के लिये ‘मेक इन इंडिया’ पहल को सुदृढ़ करती है।
- हरित हाइड्रोजन क्षेत्र: राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के माध्यम से स्वयं को हरित हाइड्रोजन के वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में अग्रसर होकर, भारत इस्पात एवं उर्वरक जैसे कठिन-अपसारणीय औद्योगिक क्षेत्रों के जोखिम को कम करने का प्रयास कर रहा है।
- इस रणनीति का उद्देश्य ‘ग्रे’ हाइड्रोजन (प्राकृतिक गैस आधारित) को ‘ग्रीन’ हाइड्रोजन से प्रतिस्थापित करना है, जिससे महत्त्वपूर्ण उद्योगों को प्राकृतिक गैस आपूर्ति शृंखला व्यवधानों से प्रभावी संरक्षण प्राप्त हो सके।
- इसके अतिरिक्त, वी.ओ. चिदंबरनार बंदरगाह पर हरित हाइड्रोजन पायलट परियोजना का शुभारंभ किया गया है तथा हरित मेथनॉल बंकरिंग की योजना भी प्रस्तावित है, जिससे बंदरगाहों में स्वच्छ ऊर्जा उपयोग को प्रोत्साहन मिलेगा।
- यह पहल भारत के ऊर्जा संक्रमण लक्ष्यों के अनुरूप हरित नौवहन, नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार एवं बंदरगाह-आधारित सतत विकास को सुदृढ़ आधार प्रदान करती है।
- नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता विस्तार एवं ग्रिड एकीकरण का सुदृढ़ीकरण: हाइब्रिड नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन का व्यापक विस्तार ग्रिड अनिश्चितता को न्यूनतम करता है तथा बड़े पैमाने पर औद्योगिक विद्युतीकरण के लिये आधार निर्मित करता है।
- विभिन्न नवीकरणीय स्रोतों का समन्वित उपयोग एक सुरक्षित एवं घरेलू रूप से नियंत्रित ऊर्जा आधार सुनिश्चित करता है, जो वैश्विक भू-राजनीतिक प्रभावों से अपेक्षाकृत स्वतंत्र बना रहता है।
- 29 जुलाई, 2025 को भारत ने विद्युत उत्पादन में नवीकरणीय ऊर्जा की अब तक की उच्चतम हिस्सेदारी प्राप्त की, जब कुल 203 GW मांग में से 51.5% ऊर्जा नवीकरणीय स्रोतों से प्राप्त हुई।
- बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों (BESS) के विस्तार के साथ यह आयातित तापीय कोयले पर आधारित विद्युत निर्भरता को सीधे कम करता है।
- भारत ने वर्ष 2025 में 547 MWh बैटरी भंडारण क्षमता जोड़ी, जो वर्ष 2024 में जोड़ी गई 433 MWh की तुलना में लगभग 26% की वृद्धि को दर्शाती है।
- माल एवं सड़क परिवहन का विद्युतीकरण: लॉजिस्टिक्स क्षेत्र तथा दो/तीन पहिया वाहनों के तेज़ी से विद्युतीकरण के माध्यम से जीवाश्म ईंधन की खपत के मध्य-शताब्दी में अनुमानित उच्चतम स्तर को प्रत्यक्ष रूप से घटाया जा सकता है।
- सड़क परिवहन को विद्युत एवं वैकल्पिक ईंधनों की ओर स्थानांतरित करने से घरेलू शोधन अवसंरचना के अप्रयुक्त रहने की संभावना घटती है तथा साथ ही आयात बिल में भी उल्लेखनीय कमी आती है।
- उदाहरणार्थ, पीएम ई-ड्राइव योजना के तहत भारत ने इलेक्ट्रिक वाहनों के प्रसार को उल्लेखनीय रूप से गति प्रदान की है, जहाँ 28 लाख के निर्धारित लक्ष्य की तुलना में फरवरी 2026 तक 22.12 लाख वाहनों की बिक्री दर्ज की गई है।
- घरेलू LPG उत्पादन का अधिकतमकरण: घरेलू उपभोक्ताओं की ईंधन आवश्यकताओं को प्राथमिकता देने हेतु राष्ट्रीय रिफाइनरी उत्पादन का पुनर्संरेखण, आयातित ईंधनों की महँगाई एवं आपूर्ति शृंखला असुरक्षा से कमज़ोर वर्गों की रक्षा करता है।
- रणनीतिक रिफाइनरी प्रबंधन यह सुनिश्चित करता है कि वैश्विक कच्चे तेल की उपलब्धता में उतार-चढ़ाव के बावजूद घरेलू ऊर्जा आपूर्ति, विशेषतः खाना पकाने हेतु LPG बाधित न हो।
- पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण ऊर्जा आपूर्ति पर उत्पन्न जोखिमों के मद्देनज़र, आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के अंतर्गत सरकार द्वारा पारित निर्देशों के पश्चात भारतीय रिफाइनरियों ने घरेलू LPG उत्पादन में 25% से अधिक की वृद्धि की है।
- ‘फार्म-टू-फ्यूल’ के माध्यम से जैव ईंधन आत्मनिर्भरता: भारत एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (EBP) कार्यक्रम को गति प्रदान करते हुए अपने कृषि अधिशेष को रणनीतिक ऊर्जा संसाधन में रूपांतरित कर रहा है।
- यह पहल एक ओर विदेशी मुद्रा बचत सुनिश्चित करती है, वहीं दूसरी ओर पश्चिम एशियाई कच्चे तेल बाज़ारों की अस्थिरता के विरुद्ध एक प्रभावी ‘सुरक्षा कवच’ प्रदान करती है।
- भारत ने पेट्रोल में 20% इथेनॉल मिश्रण (E20) का लक्ष्य वर्ष 2025 के अंत तक प्राप्त कर लिया है, जो निर्धारित वर्ष 2030 के लक्ष्य से लगभग पाँच वर्ष पूर्व है।
- परमाणु ऊर्जा पुनर्जागरण एवं SMR: भारत की बढ़ती औद्योगिक विद्युत मांग की पूर्ति हेतु उन्नत परमाणु प्रौद्योगिकी के माध्यम से शून्य-उत्सर्जन आधारभूत क्षमता का विविधीकरण अनिवार्य हो गया है।
- हालिया नीतिगत ढाँचे स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टरों (SMR) के स्थानीय विकास को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित कर रहे हैं।
- वर्तमान स्थापित परमाणु ऊर्जा क्षमता वर्ष 2031-32 तक 8180 मेगावाट से बढ़कर लगभग 22480 मेगावाट होने का अनुमान है। यह विस्तार स्वदेशी तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम का पूरक सिद्ध होगा, जिससे भारत की गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित आधारभूत क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।
- इसके अतिरिक्त, परमाणु ऊर्जा का सतत दोहन एवं विकास विधेयक, 2025 के माध्यम से परमाणु क्षेत्र को निजी भागीदारी के लिये खोला गया है, जिसमें स्तरीय देयता मानदंडों का प्रावधान करते हुए एक वैधानिक नियामक एवं शिकायत निवारण ढाँचा स्थापित किया गया है, जिससे भारत के ऊर्जा संक्रमण को सुदृढ़ आधार प्राप्त होगा।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा से संबंधित प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
- भू-राजनीतिक आपूर्ति बाधाओं के प्रति संवेदनशीलता: आयातित जीवाश्म ईंधनों पर भारत की अत्यधिक निर्भरता उसकी समष्टि आर्थिक स्थिरता को अस्थिर भू-राजनीतिक तनावों तथा समुद्री आपूर्ति शृंखला व्यवधानों के प्रति प्रत्यक्ष रूप से संवेदनशील बनाती है।
- वर्तमान में भारत अपने कच्चे तेल का लगभग 90% तथा प्राकृतिक गैस का लगभग 50% आयात करता है, जिसमें से आधे से अधिक ऐतिहासिक रूप से अस्थिर होर्मुज़ जलडमरूमध्य के माध्यम से होकर गुजरता है।
- पश्चिम एशिया से LPG आयात पर उच्च निर्भरता के कारण खाद्य सुरक्षा एवं घरेलू उपभोग बजट दोनों ही होर्मुज़ क्षेत्रीय व्यवधानों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाते हैं।
- चूँकि LPG एक ‘जस्ट-इन-टाइम’ ईंधन है तथा इसके भंडार सीमित हैं। अतः शिपिंग में किसी भी विलंब की स्थिति में आपूर्ति कमी एवं राशनिंग जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।
- मार्च 2026 तक LPG आयात का लगभग 90% भाग होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है तथा हालिया क्षेत्रीय तनावों के कारण इसकी आपूर्ति में उल्लेखनीय कमी परिलक्षित हुई है।
- अपर्याप्त रणनीतिक भंडारण: वैधानिक रूप से अनिवार्य एवं व्यापक रणनीतिक भंडारण अवसंरचना के अभाव में भारत की अर्थव्यवस्था की दीर्घकालिक आपूर्ति बाधाओं से निपटने की क्षमता गंभीर रूप से सीमित हो जाती है।
- जहाँ विकसित अर्थव्यवस्थाएँ व्यापक भंडारण व्यवस्था के लिये सुदृढ़ वैधानिक ढाँचों का सहारा लेती हैं, वहीं भारत अब भी तदर्थ प्रशासनिक उपायों और अपर्याप्त रूप से उपयोग की जा रही वाणिज्यिक क्षमताओं पर आश्रित बना हुआ है।
- भारत का रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) वर्तमान में केवल लगभग 9.5 दिनों का शुद्ध आयात कवरेज प्रदान करता है, जो अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) द्वारा अनुशंसित 90-दिवसीय मानक की तुलना में अत्यंत अपर्याप्त है।
- इसके अतिरिक्त, समर्पित रणनीतिक प्राकृतिक गैस भंडारों की पूर्ण अनुपस्थिति मूल्य-संवेदनशील क्षेत्रों को पूर्णतः जोखिम ग्रस्त बना देती है।
- ‘महत्त्वपूर्ण खनिज जाल’ की उभरती चुनौती: जीवाश्म ईंधनों से स्वच्छ ऊर्जा की ओर संक्रमण, भारत की आयात निर्भरता को मध्य-पूर्व के कच्चे तेल कार्टेल से हटाकर अत्यधिक केंद्रीकृत महत्त्वपूर्ण खनिज आपूर्ति शृंखलाओं की ओर स्थानांतरित करने का जोखिम उत्पन्न करता है।
- विद्युत गतिशीलता तथा नवीकरणीय ऊर्जा भंडारण के तीव्र विस्तार को सुरक्षित एवं विविधीकृत वैश्विक खनन एवं प्रसंस्करण साझेदारियों के अभाव में गंभीर बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है।
- वर्तमान में भारत अपनी लिथियम तथा कोबाल्ट आवश्यकताओं का लगभग 100% आयात करता है, जबकि वैश्विक प्रसंस्करण क्षमता पर चीन का प्रभुत्व है।
- जम्मू-कश्मीर में लिथियम भंडार जैसे घरेलू खोजों के बावजूद, वाणिज्यिक उत्खनन अभी कई वर्षों दूर है, जिससे विदेशी खदान अधिग्रहण की तात्कालिक आवश्यकता उत्पन्न होती है।
- ग्रिड अनिश्चितता एवं भंडारण की कमी: नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन में तीव्र वृद्धि, सौर एवं पवन ऊर्जा की अंतर्निहित अनिश्चितता के कारण ग्रिड एकीकरण में गंभीर चुनौतियाँ उत्पन्न करती है।
- ऊर्जा भंडारण तथा ग्रिड आधुनिकीकरण में समुचित निवेश के अभाव में अतिरिक्त नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन व्यर्थ हो सकता है,, जबकि सायंकालीन उच्चतम मांग अब भी जीवाश्म ईंधनों पर निर्भर रहती है।
- जहाँ एक ओर भारत 500 GW गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता लक्ष्य की दिशा में तीव्र प्रगति कर रहा है, वहीं बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (BESS) का विस्तार अभी प्रारंभिक अवस्था में है, जिसमें हाल ही में मात्र 547 MWh की वृद्धि दर्ज की गई है।
- परिणामस्वरूप, जब राष्ट्रीय अधिकतम विद्युत मांग निरंतर 240 GW के स्तर को पार कर रही है, तब भी ग्रिड को आधारभूत आपूर्ति हेतु कोयला क्षेत्र पर निर्भर रहना पड़ता है, जो अप्रैल 2025 तक कुल विद्युत उत्पादन का 74% योगदान करता है।
- DISCOM की वित्तीय अस्थिरता: भारत की ऊर्जा मूल्य शृंखला में राज्य-स्वामित्व वाली वितरण कंपनियाँ (DISCOM) अब भी सबसे कमज़ोर कड़ी बनी हुई हैं, जिनकी दीर्घकालिक वित्तीय अस्थिरता अवसंरचनात्मक उन्नयन में प्रमुख बाधा उत्पन्न करती है।
- संचित संरचनात्मक ऋण एवं उच्च संचरण हानियाँ स्मार्ट ग्रिड में निजी निवेश को हतोत्साहित करती हैं तथा विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के निर्बाध एकीकरण को विलंबित करती हैं।
- यद्यपि पुनर्गठित वितरण क्षेत्र योजना (RDSS) के अंतर्गत कुछ लेखांकन सुधार परिलक्षित हुए हैं, तथापि वित्त वर्ष 2024-25 में राष्ट्रीय स्तर पर औसत 15.04% के उच्च सकल तकनीकी एवं वाणिज्यिक (AT&C) हानियों के साथ DISCOM अभी भी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही हैं, जो वैश्विक मानकों से अधिक है।
- घरेलू गहन प्रौद्योगिकी तथा अनुसंधान और विकास की कमी: अगली पीढ़ी के ऊर्जा समाधानों हेतु आयातित प्रौद्योगिकी पर अत्यधिक निर्भरता, रणनीतिक ऊर्जा स्वायत्तता एवं वैश्विक विनिर्माण नेतृत्व की दिशा में भारत की आकांक्षाओं को गंभीर रूप से कमज़ोर करती है।
- घरेलू पारिस्थितिकी तंत्र में वर्तमान में उन्नत संक्रमणकालीन ईंधनों एवं स्थानीय उत्सर्जन न्यूनीकरण प्रौद्योगिकियों को प्रतिस्पर्द्धी स्तर पर स्वतंत्र रूप से व्यावसायीकरण करने के लिये आवश्यक गहन प्रौद्योगिकी R&D आधार का अभाव है।
- भारत वर्तमान में हरित हाइड्रोजन उत्पादन हेतु आवश्यक उच्च दक्षता वाले इलेक्ट्रोलाइजरों का एक बड़ा भाग आयात करता है, जिससे लागत संरचना अभी भी व्यावसायिक व्यवहार्यता के स्तर से ऊपर बनी रहती है।
- इसी प्रकार कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन एवं स्टोरेज (CCUS) अवसंरचना का विस्तार अभी भी मुख्यतः पायलट चरण में है, जिसके लिये हालिया ₹20,000 करोड़ रुपये के प्रारंभिक सरकारी आवंटन को पूरक बनाने हेतु वृहद् निजी निवेश की आवश्यकता है।
- ऊर्जा अवसंरचना पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव: जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप बढ़ती चरम मौसमी घटनाएँ भारत के ऊर्जा उत्पादन एवं पारेषण नेटवर्क की भौतिक स्थिरता को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर रही हैं।
- परिवर्तित जलचक्र एवं भीषण लू के कारण तापीय शीतलन प्रणालियों की परिचालन क्षमता प्रभावित होती है तथा जल विद्युत उत्पादन की विश्वसनीयता में कमी आती है।
- उदाहरणार्थ, वर्ष 2024 में अनियमित वर्षा के कारण भारत के जल विद्युत उत्पादन में लगभग 16.3% की गिरावट दर्ज की गई।
- इसके अतिरिक्त, ग्रीष्मकालीन हीटवेव तापीय संयंत्रों को कम दक्षता पर संचालित करने हेतु बाध्य करती हैं, जिससे राष्ट्रीय ग्रिड पर दबाव बढ़ता है, विशेषकर उस समय जब शहरी क्षेत्रों में शीतलन की मांग तीव्रता से बढ़ रही होती है।
- ‘न्यायपूर्ण परिवर्तन’ की जटिलता: घरेलू कोयला उत्पादन में चरणबद्ध कमी संसाधन-समृद्ध राज्यों के लिये गंभीर सामाजिक-आर्थिक चुनौतियाँ उत्पन्न करती है, जहाँ स्थानीय अर्थव्यवस्थाएँ खनन पारिस्थितिकी तंत्र पर अत्यधिक निर्भर हैं।
- कोयला क्षेत्र प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 36 लाख लोगों को रोज़गार प्रदान करता है, जिनमें से अधिकांश झारखंड, ओडिशा एवं छत्तीसगढ़ जैसे आर्थिक रूप से पिछड़े राज्यों में केंद्रित हैं।
- ‘न्यायसंगत संक्रमण’ के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु श्रमिकों के पुनः कौशल विकास, क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं के संरचनात्मक विविधीकरण तथा ऊर्जा उपलब्धता एवं वहनीयता के मध्य संतुलन स्थापित करने के लिये वृहद पूंजी निवेश की आवश्यकता होगी।
- चूँकि भारत की कुल ऊर्जा मांग आगामी दो दशकों में दोगुनी होने का अनुमान है, अतः व्यावहारिक आर्थिक विकल्पों के अभाव में तापीय ऊर्जा संयंत्रों का समयपूर्व बंद होना क्षेत्रीय अस्थिरता एवं व्यापक आजीविका व्यवधान का कारण बन सकता है।
- ‘ग्रीन-ऑन-ग्रीन’ भूमि अधिग्रहण संघर्ष: ‘गीगा-स्केल’ सौर एवं पवन परियोजनाओं के तीव्र विस्तार से कृषि उत्पादकता एवं स्थानीय जैव विविधता के साथ प्रत्यक्ष टकराव उत्पन्न हो रहा है, जिसके परिणामस्वरूप परियोजना क्रियान्वयन में विलंब तथा कानूनी अवरोध बढ़ रहे हैं।
- ये ‘ग्रीन-ऑन-ग्रीन’ संघर्ष तब उभरते हैं जब जलवायु परिवर्तन शमन हेतु आवश्यक भूमि उपयोग का प्रतिस्पर्द्धा खाद्य सुरक्षा अथवा संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण के लिये आवश्यक भूमि से होने लगती है।
- उदाहरणार्थ, जून 2025 में असम सरकार को स्वदेशी एवं आदिवासी समुदायों के तीव्र विरोध के कारण एक सौर परियोजना को निरस्त करना पड़ा, जो इस प्रकार के स्थानीय-सामाजिक संघर्षों की तीव्रता को दर्शाता है।
- ऊर्जा अवसंरचना पर साइबर हमलों का खतरा: स्मार्ट मीटर, IoT-सक्षम सौर इन्वर्टर तथा EV चार्जिंग स्टेशनों के माध्यम से ऊर्जा क्षेत्र के तीव्र डिजिटलीकरण ने साइबर हमलों की संभावनाओं को अत्यधिक बढ़ा दिया है।
- इन परस्पर संयोजित प्रणालियों में किसी भी प्रकार की विफलता अथवा दुर्भावनापूर्ण हस्तक्षेप स्थानीय स्तर पर विद्युत आपूर्ति बाधित कर सकती है अथवा राष्ट्रीय ग्रिड प्रणाली तक प्रभावित हो सकती है, जिससे डिजिटल सुरक्षा उतनी ही महत्त्वपूर्ण हो जाती है जितनी भौतिक ईंधन सुरक्षा।
- उदाहरणार्थ, मई 2025 में पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (PGCIL) को एक समन्वित DDoS हमले का सामना करना पड़ा, जिससे उसका आधिकारिक पोर्टल 31 मिनट तक बाधित रहा।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करने हेतु कौन से उपाय आवश्यक हैं?
- वैधानिक गहन भंडारण संरचना: कार्यकारी तदर्थ दृष्टिकोण से वैधानिक भंडारण दायित्वों की ओर संक्रमण, दीर्घकालिक भू-राजनीतिक आपूर्ति बाधाओं को अवशोषित करने में सक्षम एवं गहन भंडारण अवसंरचना के निर्माण हेतु अनिवार्य है।
- इसके लिये बाध्यकारी विधायी प्रावधानों की आवश्यकता है, जो तेल विपणन कंपनियों को रणनीतिक भंडार बनाए रखने के साथ-साथ हरित-हाइड्रोजन-अनुकूल भूमिगत गैस भंडारण बफर के विकास हेतु बाध्य करें।
- अंतर्राष्ट्रीय राजनयिक हेजिंग: ऊर्जा पारगमन मार्गों में विविधता सुनिश्चित करने हेतु अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक गलियारों का व्यापक संचालन एवं रणनीतिक द्विपक्षीय ऊर्जा साझेदारियों का सुदृढ़ीकरण आवश्यक है।
- रणनीतिक सहयोगियों के साथ व्यापक आर्थिक समझौते सुरक्षित एवं दीर्घकालिक आपूर्ति अनुबंधों को सुनिश्चित करते हैं तथा वैकल्पिक स्वच्छ ईंधन आपूर्ति शृंखलाओं में स्थानीय निवेश को प्रोत्साहित करते हैं।
- CCUS एवं डीप-टेक स्थानीयकरण: कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन एवं स्टोरेज (CCUS) अवसंरचना के व्यावसायिक विस्तार में तीव्रता लाना, भारी औद्योगिक विकास को आयातित उत्सर्जन-गहन ईंधनों से संरचनात्मक रूप से पृथक करने हेतु आवश्यक है।
- लक्षित बजटीय व्यय एवं निजी पूंजी संकलन के माध्यम से स्थानीयकृत डीप-टेक पारिस्थितिकी तंत्र का विकास, कठिन-अपसारणीय क्षेत्रों के डीकार्बोनाइजेशन को गति प्रदान करेगा तथा दीर्घकालिक राजकोषीय सुदृढ़ता को भी सशक्त बनाएगा।
- हरित जनादेश के माध्यम से आयात प्रतिस्थापन: उर्वरक और रिफाइनरी क्षेत्रों में हरित हाइड्रोजन के अनिवार्य उपभोग कोटा का क्रियान्वयन आयातित प्राकृतिक गैस के स्थान पर घरेलू स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों का संरचनात्मक प्रतिस्थापन सुनिश्चित कर सकता है।
- यह रणनीतिक परिवर्तन न केवल कृषि अर्थव्यवस्था को वैश्विक स्पॉट बाज़ार की अस्थिरता से सुरक्षित करता है, बल्कि संप्रभु सब्सिडी बोझ को भी कम करता है, जिससे एक मज़बूत समष्टि आर्थिक बफर का निर्माण होता है।
- समग्र महत्त्वपूर्ण खनिज नीति: स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण के संदर्भ में उभरती नई आयात निर्भरताओं को रोकने हेतु विदेशी महत्त्वपूर्ण खनिज संपत्तियों में संप्रभु इक्विटी सुरक्षित करना तथा स्थानीयकृत चक्रीय प्रसंस्करण अर्थव्यवस्था की स्थापना करना अनिवार्य है।
- संप्रभु धन कोषों का उपयोग कर रणनीतिक खनन अधिकारों का अधिग्रहण तथा घरेलू धातुकर्म R&D को प्रोत्साहन, ग्रिड-स्तरीय बैटरी भंडारण पारिस्थितिकी तंत्र के लिये निर्बाध आपूर्ति शृंखला सुनिश्चित करेगा।
- संरचनात्मक DISCOM विखंडन: राज्य-स्वामित्व वाली वितरण कंपनियों (DISCOM) की दीर्घकालिक वित्तीय अस्थिरता को संरचनात्मक विखंडन एवं घाटेग्रस्त सर्किलों के निजीकरण के माध्यम से संबोधित करना, नवीकरणीय ऊर्जा के निर्बाध एकीकरण की पूर्वापेक्षा है।
- स्मार्ट मीटरिंग, गतिशील समय-आधारित मूल्य निर्धारण तथा ट्रांसमिशन अवसंरचना के व्यापक उन्नयन से उपयोगिता-स्तरीय बैटरी भंडारण हेतु आवश्यक निजी पूंजी को आकर्षित किया जा सकेगा।
- विकेंद्रीकृत जैव-ऊर्जा एकीकरण: प्राकृतिक कृषि पद्धतियों के साथ विकेंद्रीकृत जैव-ऊर्जा उत्पादन का समन्वय ग्रामीण ऊर्जा गरीबी एवं कृषि अवशेष प्रबंधन के लिये एक बहुआयामी समाधान प्रस्तुत करता है।
- कृषि जैवमास को संपीड़ित बायोगैस (CBG) में परिवर्तित करने हेतु प्रोत्साहन, स्थानीय चक्रीय अर्थव्यवस्थाओं का विकास करता है तथा आयातित LPG पर निर्भरता को संरचनात्मक रूप से कम करता है।
- स्वदेशी SMR का व्यावसायीकरण: निजी क्षेत्र की सक्रिय भागीदारी के माध्यम से स्थानीयकृत स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टरों (SMR) का विकास, विश्वसनीय एवं शून्य-उत्सर्जन आधारित ऊर्जा स्थापित करने के लिये महत्त्वपूर्ण है, जो अनियमित नवीकरणीय ऊर्जा का प्रभावी पूरक बन सके।
- परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में सार्वजनिक-निजी संयुक्त उद्यमों की अनुमति हेतु नियामक ढाँचे का सरलीकरण, गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता में तीव्र वृद्धि सुनिश्चित करेगा तथा तापीय कोयले पर संरचनात्मक निर्भरता को क्रमशः प्रतिस्थापित करेगा।
निष्कर्ष:
भारत की ऊर्जा सुरक्षा अब केवल एक पर्यावरणीय उद्देश्य तक सीमित नहीं रही है, बल्कि अस्थिर वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं तथा होर्मुज़ जलडमरूमध्य में उत्पन्न अवरोधों की पृष्ठभूमि में यह एक अनिवार्य रणनीतिक आवश्यकता के रूप में उभर चुकी है। वैधानिक भंडारण प्रावधानों को हरित हाइड्रोजन एवं लघु मॉड्यूलर रिएक्टर जैसी उन्नत प्रौद्योगिकियों के साथ समन्वित करके भारत अपने आर्थिक विकास को भू-राजनीतिक जोखिमों से संरचनात्मक रूप से अलग कर सकता है। अंततः जीवाश्म ईंधन-मुक्त आधार की ओर संक्रमण, बाह्य ऊर्जा दबावों के विरुद्ध भारत की विश्वसनीय दीर्घकालिक सुरक्षा का प्रतिनिधित्व करता है।
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दृष्टि मेन्स का प्रश्न: भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मज़बूत करने में ऊर्जा स्रोतों और आपूर्ति शृंखलाओं के विविधीकरण की भूमिका पर चर्चा कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. भारत के SPR का वर्तमान ‘नेट इम्पोर्ट कवरेज’ क्या है?
यह लगभग 9–10 दिन है, जो अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के 90-दिवसीय वैश्विक मानक की तुलना में काफी कम है।
2. होर्मुज़ जलडमरूमध्य का भारत पर क्या प्रभाव है?
यह भारत के 50% से अधिक कच्चे तेल एवं लगभग 55% LNG आयात के लिये प्रमुख पारगमन मार्ग के रूप में कार्य करता है।
3. बजट 2026-27 में CCUS के लिये कितना आवंटन किया गया था?
केंद्रीय बजट 2026-27 में कार्बन कैप्चर, उपयोग एवं भंडारण (CCUS) अवसंरचना हेतु 20,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
4. भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों के विकास में सबसे बड़ी बाधा क्या है?
लिथियम एवं कोबाल्ट जैसे महत्त्वपूर्ण खनिजों पर लगभग 100% आयात निर्भरता, जिनका प्रसंस्करण मुख्यतः चीन में होता है।
5. ग्रीन हाइड्रोजन खाद्य सुरक्षा में किस प्रकार योगदान दे सकता है?
उर्वरक उत्पादन में आयातित LNG का स्थान लेकर 30 अरब डॉलर के भारी सब्सिडी बिल को कम किया जा सकता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ)
प्रश्न: भारतीय अक्षय ऊर्जा विकास एजेंसी लिमिटेड (IREDA) के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? (2015)
- यह एक पब्लिक लिमिटेड सरकारी कंपनी है।
- यह एक गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी है।
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये।
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (c)
मेन्स
प्रश्न. "सतत्, विश्वसनीय, टिकाऊ और आधुनिक ऊर्जा तक पहुँच सतत विकास लक्ष्यों (SDG) को प्राप्त करने के लिये अनिवार्य है।" इस संबंध में भारत में हुई प्रगति पर टिप्पणी कीजिये। (2018)