भारत का पोषण-केंद्रित खाद्य सुरक्षा मॉडल | 17 Feb 2026
यह एडिटोरियल 16/02/2026 को द बिज़नेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित ' Addressing nutrition along with hunger: Funding and policy push vital' शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख भारत के खाद्य सुरक्षा से पोषण सुरक्षा की ओर संक्रमण का विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जिसमें व्यापक कल्याणकारी योजनाओं के बावजूद सूक्ष्म पोषक तत्त्वों, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य और आहार विविधता में निरंतर कमियों को उजागर किया गया है। इसमें तर्क दिया गया है कि भारत की भावी मानव संसाधन को सुरक्षित करने हेतु सतत वित्तीय सहायता, नीतिगत समन्वय और पोषण-केंद्रित कृषि अनिवार्य हैं।
प्रिलिम्स के लिये: पोषण अभियान, पोषण ट्रैकर, एक राष्ट्र एक राशन कार्ड, जलवायु-अनुकूल कृषि
मेन्स के लिये: भारत में पोषण सुरक्षा की वर्तमान स्थिति, प्रमुख विकास, पोषण सुरक्षा से जुड़े मुद्दे, पोषण सुरक्षा प्राप्त करने के लिये आवश्यक उपाय।
हरित क्रांति ने भारत को बड़े पैमाने पर भुखमरी के संकट से तो मुक्त किया, लेकिन अनजाने में इसने पोषण गुणवत्ता की तुलना में कैलोरी की मात्रा को प्राथमिकता दे दी। आज देश प्रच्छन्न भुखमरी (hidden hunger) का सामना कर रहा है, जहाँ मुख्य आहार पर्याप्त ऊर्जा तो प्रदान करता है, किंतु उसमें स्वस्थ विकास के लिये आवश्यक महत्त्वपूर्ण सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी रहती है। इस संदर्भ में खाद्य सुरक्षा से पोषण सुरक्षा की ओर ध्यान केंद्रित करना अब कोई विकल्प नहीं बल्कि भारत की भावी मानव संसाधन की उत्पादकता और स्वास्थ्य में सुधार के लिये एक जैविक अनिवार्यता बन गया है।
भारत में पोषण सुरक्षा की वर्तमान स्थिति क्या है?
- कुपोषण और भुखमरी
- भारत की लगभग 12% आबादी (करीब 172 मिलियन लोग) अब भी कुपोषण से प्रभावित है। यद्यपि यह अनुपात पूर्व वर्षों की तुलना में घटा है, परंतु समस्या का पैमाना अभी भी गंभीर बना हुआ है।
- वैश्विक भुखमरी सूचकांक (GHI 2025) में भारत का स्थान काफी नीचे है, गंभीर स्तर की भुखमरी वाले 123 देशों में से यह 102वें स्थान पर है।
- बाल कुपोषण; नवीनतम अनुमानों के अनुसार:
- स्टंटिंग (आयु के अनुपात में कम लंबाई) 5 वर्ष से कम उम्र के लगभग 35% बच्चों में यह समस्या पाई जाती है, जो दीर्घकालिक कुपोषण का संकेत है।
- वेस्टिंग (लंबाई के अनुपात में कम वज़न) की दर लगभग 18.7% है, जो विश्व में उच्चतम स्तरों में से एक है तथा तीव्र कुपोषण को दर्शाती है।
- साथ ही, बच्चों में अधिक वज़न और मोटापे की प्रवृत्ति भी उभर रही है, जो कुपोषण के दोहरे बोझ को रेखांकित करती है।
- सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी
- एनीमिया विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों में व्यापक रूप से फैला हुआ है। भारत में लगभग 67.1% बच्चे तथा 59.1% किशोरियाँ एनीमिया से ग्रस्त हैं (NFHS-5)।
- सूक्ष्म पोषक तत्त्वों (आयरन, जिंक, विटामिन A आदि) की कमी व्यापक प्रच्छन्न भुखमरी को दर्शाती है, जहाँ कैलोरी की पूर्ति के बावजूद पोषण अपर्याप्त रहता है।
- आहार की गुणवत्ता और सामर्थ्य
- विश्व में खाद्य और पोषण की स्थिति (SOFI) 2025 की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2024 में लगभग 40.4% जनसंख्या स्वस्थ आहार वहन करने में असमर्थ थी। बढ़ती खाद्य कीमतों के कारण पोषक तत्त्वों से युक्त भोजन महँगा होता जा रहा है।
- परिणामस्वरूप, अनेक परिवार सब्सिडी वाले अनाज से केवल कैलोरी आवश्यकताएँ पूरी कर पाते हैं, जबकि प्रोटीन, फल, सब्ज़ियाँ और सूक्ष्म पोषक तत्त्वों से युक्त संतुलित आहार उनकी पहुँच से बाहर रहता है।
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आयाम |
संकेतक |
मुख्य आँकड़े (राष्ट्रीय औसत) |
प्रवृत्ति/ स्थिति |
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बाल पोषण (5 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिये) |
स्टंटिंग (आयु के हिसाब से कम कद) |
35.5% |
सुधार हुआ: NFHS-4 (38.4%) की तुलना में गिरावट। |
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वेस्टिंग (लंबाई के अनुपात में कम वज़न) |
19.3% |
कोई सुधार नहीं: वर्ष 2014 (15.1%) तथा 2000 (17.15%) के स्तर से भी अधिक |
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अंडरवेट (कम वज़न) |
32.1% |
सुधार हुआ: NFHS-4 (35.8%) से कमी। |
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ओवरवेट (अधिक वज़न) |
3.4% |
बिगड़ती प्रवृत्ति: 2.1% से वृद्धि। |
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सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की स्थिति (प्रच्छन्न भुखमरी) |
एनीमिया (6–59 माह के बच्चे) |
67.1% |
गंभीर: NFHS-4 (58.6%) से उल्लेखनीय वृद्धि। |
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एनीमिया (15–49 वर्ष की महिलाएँ |
57.0% |
गंभीर: 53.1% से वृद्धि |
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विटामिन D की कमी |
पाँच में से एक भारतीय |
व्यापक: 'मौन महामारी' के रूप में चिह्नित। |
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खाद्य सुरक्षा और पहुँच |
स्वस्थ आहार की वहनीयता |
लगभग 43% |
चुनौतीपूर्ण: हालिया रिपोर्टों के अनुसार लगभग आधी आबादी पोषक तत्त्वों से भरपूर आहार का खर्च वहन नहीं कर सकती है। |
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अल्पपोषण (प्रचलन) |
लगभग 12% |
सुधार: हालाँकि, वैश्विक स्तर पर भारत अल्पपोषण के आकलन के लिये चुने गए 204 देशों में से 48वें स्थान पर रहा। (SOFI रिपोर्ट 2025) |
भारत में पोषण सुरक्षा की ओर परिवर्तन में प्रमुख विकास क्या हैं?
- 'आनुवंशिक' पोषण की दिशा में संक्रमण: कृषि प्रतिमान अब निर्णायक रूप से कैलोरी पर्याप्तता से आगे बढ़कर पोषक तत्त्व सघनता पर केंद्रित हो रहा है। इस दृष्टिकोण में जैव-संरचित फसलों के माध्यम से ज़िंक और आयरन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्त्वों को बिना आहार व्यवहार बदले ही जनसंख्या तक निष्क्रिय रूप से पहुँचाने का प्रयास किया जा रहा है।
- उदाहरण के लिये, ICAR ने 150 से अधिक जैव-पोषक किस्मों का विकास किया है। ये जैव-पोषक किस्में पारंपरिक किस्मों की तुलना में 1.5 से 3.0 गुना अधिक पौष्टिक होती हैं।
- जैसे, चावल की किस्म CR DHAN 315 में जिंक अधिक है; गेहूँ की किस्म HD 3298 प्रोटीन और आयरन से समृद्ध है; पूसा सरसों 32 में एरूसिक अम्ल कम है; जबकि मूंगफली की गिरनार 4 और 5 किस्मों में ओलिक एसिड की मात्रा अधिक होती है।
- उदाहरण के लिये, ICAR ने 150 से अधिक जैव-पोषक किस्मों का विकास किया है। ये जैव-पोषक किस्में पारंपरिक किस्मों की तुलना में 1.5 से 3.0 गुना अधिक पौष्टिक होती हैं।
- चावल का सार्वभौमिक फोर्टिफिकेशन: 'चावल फोर्टिफिकेशन' पहल एक सीमित प्रायोगिक योजना से विकसित होकर राष्ट्रव्यापी पोषण सुरक्षा तंत्र का रूप ले चुकी है, जिसके माध्यम से सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) सबसे वंचित वर्गों तक आयरन, फोलिक एसिड और विटामिन B12 की आपूर्ति का प्रभावी साधन बन गई है।
- वर्तमान में, भारतीय खाद्य निगम (FCI) और राज्य एजेंसियों द्वारा केंद्रीय पूल को प्रदत्त कस्टम-मिल्ड चावल (CMR) का 100% फोर्टिफाइड किया जा रहा है।
- उत्तर प्रदेश के चंदौली (आकांक्षी ज़िला) में हुए एक प्रभाव अध्ययन में फोर्टिफाइड चावल की निरंतर उपलब्धता से एनीमिया की दर में 7.5% की गिरावट दर्ज की गई।
- पोषण ट्रैकर और डिजिटल शासन: पोषण प्रशासन मैनुअल अभिलेखों से स्थानांतरित होकर वास्तविक समय आधारित एल्गोरिथ्मिक निगरानी की ओर अग्रसर हुआ है। पोषण ट्रैकर ऐप अब आंगनवाड़ी स्तर पर केवल वितरण नहीं, बल्कि वास्तविक उपभोग का अनुश्रवण कर 'वितरण अंतर' को न्यूनतम करता है।
- अंतिम चरण की सेवा आपूर्ति सुनिश्चित करने हेतु टेक-होम राशन के वितरण में फेशियल रिकग्निशन सिस्टम (FRS) को एकीकृत किया गया है, जिससे लाभ केवल पंजीकृत और लक्षित लाभार्थियों तक सीमित रहे।
- श्री अन्न” का मुख्यधारा में समावेशन: अंतर्राष्ट्रीय मिलेट्स वर्ष (IYOM) 2023 के बाद, नीतिगत प्रोत्साहनों ने जलवायु-सहिष्णु मिलेट्स को राज्य कीखरीद प्रणाली में सफलतापूर्वक एकीकृत कर दिया है, जिससे परिष्कृत कार्बोहाइड्रेट को उच्च फाइबर, खनिज-समृद्ध विकल्पों से बदलकर 'मधुमेह-कुपोषण' के दोहरे बोझ का समाधान किया जा रहा है।
- उदाहरण के लिये, ओडिशा ने मध्याह्न भोजन में बाजरे के लड्डू को सम्मिलित किया है।
- साथ ही, खरीफ विपणन सत्र (KMS) 2025–26 में ज्वार (हाइब्रिड) के न्यूनतम समर्थन मूल्य में 328 रुपए प्रति क्विंटल की वृद्धि तथा रागी के MSP में सर्वाधिक बढ़ोतरी कर इसे 596 रुपए प्रति क्विंटल किया गया है।
- 'प्रारंभिक 1000 दिनों' पर विशेष ध्यान: हस्तक्षेपों को गर्भाधान से दो वर्ष की आयु तक की निर्णायक अवधि पर लक्षित किया गया है, यह मानते हुए कि स्टंटिंग (32.9%) इस अवधि के बाद प्रायः अपरिवर्तनीय हो जाती है। यह रणनीति को सशर्त नकद हस्तांतरण (CCT) की ओर स्थानांतरित करता है, जो प्रारंभिक स्वास्थ्य निगरानी सुनिश्चित करने के लिये प्रसवपूर्व देखभाल (ANC) और टीकाकरण अनुपालन से सख्ती से जुड़ा हुआ है।
- PMMVY 2.0 के अंतर्गत (यदि दूसरी संतान कन्या हो) कवरेज का विस्तार किया गया तथा नकद सहायता बढ़ाकर ₹6,000 की गई।
- इसके अलावा, मिशन पोषण 2.0 के तहत, 15वें वित्त आयोग के चक्र में सरकारी भवनों में स्थित 2 लाख आंगनवाड़ी केंद्रों को सक्षम आंगनवाड़ी के रूप में सुदृढ़ किया जाना है ताकि बेहतर पोषण और प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा (ECCE) प्रदान की जा सके।
- PMMVY 2.0 के अंतर्गत (यदि दूसरी संतान कन्या हो) कवरेज का विस्तार किया गया तथा नकद सहायता बढ़ाकर ₹6,000 की गई।
- जलवायु-अनुकूल पोषण सुरक्षा: यह मानते हुए कि बढ़ते CO₂ स्तर प्रमुख फसलों में पोषक तत्त्वों की सघनता को घटाते हैं, नवीन कृषि रोडमैप में जलवायु तनाव से उत्पन्न आहार-गुणवत्ता ह्रास को रोकने हेतु “प्रति बूंद पोषण” तथा ऊष्मा-सहिष्णु किस्मों को प्राथमिकता दी गई है।
- पोषण सुरक्षा को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से, प्राकृतिक कृषि पर राष्ट्रीय मिशन को 17,267 क्लस्टरों में 8.52 लाख हेक्टेयर (जनवरी 2025) क्षेत्र में लागू किया गया है, जिसमें अनियमित मानसून की परिस्थितियों में प्रोटीन उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु वर्षा-आधारित क्षेत्रों में दलहन उत्पादन पर विशेष बल दिया गया है।
- सामाजिक लेखापरीक्षा के माध्यम से 'प्रच्छन्न भुखमरी' से निपटना: 'जन आंदोलन' दृष्टिकोण ने जवाबदेही का विकेंद्रीकरण करते हुए “पोषण पंचायतों” को सामाजिक लेखापरीक्षा संचालित करने तथा स्थानीय पोषण उद्यानों के प्रबंधन का अधिकार दिया है, जिससे कार्बोहाइड्रेट-प्रधान राशन में ताज़े सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की पूर्ति सुनिश्चित हो सके।
- पोषण-केंद्रित हस्तक्षेपों के अंतर्गत, मार्च 2023 तक आंगनवाड़ियों में 4 लाख से अधिक पोषण वाटिकाओं की स्थापना की गई है, तथा ग्रामीण पायलट क्षेत्रों में गर्भवती महिलाओं के बीच हरी पत्तेदार सब्ज़ियों के सेवन में वृद्धि दर्ज की गई है।
- 'दोहरे बोझ' का समाधान: कुपोषण और मोटापे/गैर-संचारी रोगों के एक साथ उत्पन्न संकट से निपटने के लिये पोषण नीति का दायरा बढ़ाया गया है और FSSAI ने अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की खपत को हतोत्साहित करने के लिये आक्रामक 'फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग' (FOPL) को लागू किया है।
- इसके अतिरिक्त, सर्वोच्च न्यायालय ने चीनी, नमक और संतृप्त वसा की उच्च मात्रा वाले पैकेट बंद खाद्य पदार्थों पर अनिवार्य फ्रंट-ऑफ-पैकेज चेतावनी लेबल लागू करने की संभावना की समीक्षा करने का आग्रह किया है, यह रेखांकित करते हुए कि नागरिकों के स्वास्थ्य के अधिकार की रक्षा हेतु ऐसे विनियामक उपाय आवश्यक हैं।
- वन नेशन वन राशन कार्ड (ONORC): ONORC प्लेटफॉर्म ने भोजन तक पहुँच की भौगोलिक बाधाओं को समाप्त करते हुए लगभग 450 मिलियन प्रवासी श्रमिकों के लिये एक प्रमुख पोषण सुरक्षा कवच प्रदान किया है, जिन्हें परंपरागत रूप से प्रवास के दौरान खाद्य असुरक्षा का सामना करना पड़ता था।
- खाद्य सुरक्षा की सुवाह्यता के पैमाने को दर्शाते हुए, वर्ष 2019 से दिसंबर 2025 तक इस योजना के अंतर्गत 197 करोड़ से अधिक लेन-देन दर्ज किये गए हैं।
- पीएम-जनमन: अंतिम छोर तक पहुँच (आदिवासी पोषण): सबसे अधिक वंचित वर्गों को लक्षित करते हुए, पीएम-जनमन विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTG) पर केंद्रित है, यह स्वीकार करते हुए कि सामान्य कवरेज दूरस्थ बस्तियों तक पर्याप्त रूप से नहीं पहुँच पाता।
- यह एक संतृप्ति-आधारित मॉडल अपनाता है, जिसके अंतर्गत पोषण अवसंरचना (आंगनवाड़ी) को प्राथमिकता के आधार पर पृथक एवं दुर्गम बसाहटों तक विस्तारित किया जाता है।
- प्रधानमंत्री जनमन योजना के तहत 75 PVTG के लक्षित विकास हेतु देशभर में 2,500 आंगनवाड़ी केंद्रों के निर्माण को स्वीकृति दी गई है।
- यह एक संतृप्ति-आधारित मॉडल अपनाता है, जिसके अंतर्गत पोषण अवसंरचना (आंगनवाड़ी) को प्राथमिकता के आधार पर पृथक एवं दुर्गम बसाहटों तक विस्तारित किया जाता है।
भारत में पोषण सुरक्षा से जुड़े प्रमुख मुद्दे क्या हैं?
- 'कैलोरी-पोषक तत्त्व' असंतुलन: भारत की खाद्य प्रणाली 'हरित क्रांति के प्रभाव' से ग्रस्त है, जो अभी भी कुछ हद तक पोषक तत्त्वों की सघनता की तुलना में कैलोरी की पर्याप्तता (उपज) को प्राथमिकता देती है, जिसके परिणामस्वरूप सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी वाले मुख्य अनाजों के कारण आबादी ‘तृप्त हुई किंतु कुपोषित’ है।
- भारत की सामाजिक सुरक्षा प्रणाली मुख्यतः कार्बोहाइड्रेट-समृद्ध अनाजों (चावल और गेहूँ) की ओर झुकी हुई है, जबकि प्रोटीन और दलहनों की उपेक्षा की जाती है। जिससे मांसपेशियों के क्षय और संज्ञानात्मक ह्रास से निपटने के लिये आवश्यक संतुलित ‘थाली’ उपलब्ध नहीं हो पाती।
- हाल ही में हुए एक राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण से एक गंभीर पोषण संकट का खुलासा हुआ है: शहरी भारतीयों में से लगभग 60% प्रोटीन की कमी से पीड़ित हैं।
- आर्थिक सर्वेक्षण- 2026 स्वास्थ्य पूरकों के बारे में अधिक जागरूकता की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है तथा पोषण संबंधी कमियों से जुड़ी जीवनशैली संबंधी बीमारियों के बढ़ते प्रचलन पर चिंता व्यक्त करता है।
- भारत की सामाजिक सुरक्षा प्रणाली मुख्यतः कार्बोहाइड्रेट-समृद्ध अनाजों (चावल और गेहूँ) की ओर झुकी हुई है, जबकि प्रोटीन और दलहनों की उपेक्षा की जाती है। जिससे मांसपेशियों के क्षय और संज्ञानात्मक ह्रास से निपटने के लिये आवश्यक संतुलित ‘थाली’ उपलब्ध नहीं हो पाती।
- बच्चों में लगातार शिशु-वृद्धिरोधन और दुर्बलता: अंतर-पीढ़ीगत गरीबी और खराब मातृ स्वास्थ्य के कारण संरचनात्मक कुपोषण खतरनाक रूप से उच्च बना हुआ है, जिससे एक ऐसा चक्र बनता है जहाँ कुपोषित माताएँ कुपोषित बच्चों को जन्म देती हैं, जिससे मानव संसाधन विकास बाधित होता है।
- व्यापक खाद्य सुरक्षा उपायों के बावजूद, GHI-2025 में भारत को 102वाँ स्थान दिया गया है, जो निरंतर पोषण संबंधी कमियों को रेखांकित करता है।
- 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों में शिशु-वृद्धिरोधन और कुपोषण की उच्च दर देश को 'गंभीर' भुखमरी की श्रेणी में रखती है।
- महिलाओं में एनीमिया का भार: लिंग आधारित पोषण संबंधी असमानता बनी हुई है, जिसमें महिलाएँ 'सबसे अंत में और सबसे कम' भोजन ग्रहण करती हैं। इससे दीर्घकालिक लौह तत्त्व की कमी उत्पन्न होती है, जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव उत्पादकता और नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य पर पड़ता है और यह दशकों से चल रहे अनुपूरण कार्यक्रमों के बावजूद बनी हुई है।
- स्तनपान कराने वाली माताओं में भी कुपोषण व्यापक है। प्रजनन आयु वर्ग की 50 प्रतिशत से अधिक महिलाएँ आज भी एनीमिक हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि जैव-संपोषित फसलों की शुरुआत अब तक व्यापक पोषणीय लाभों में परिवर्तित नहीं हो सकी है।
- जैव-संवर्द्धित फसलों के अंगीकरण की धीमी गति: पोषक तत्त्वों से भरपूर बीजों (लौह तत्त्व युक्त मिलेट्स, ज़स्ता तत्त्व युक्त गेहूँ) के विकास के बावजूद, 'प्रयोगशाला-से-खेत तक' के स्थानांतरण की गति अत्यंत मंद है क्योंकि किसान पोषण गुणवत्ता के लिये गारंटीकृत प्रीमियम मूल्य निर्धारण के बिना पुरानी उच्च-उपज किस्मों को प्राथमिकता देते हैं।
- हालाँकि 100 से अधिक जैव-पोषक तत्त्वों से भरपूर किस्में जारी की जा चुकी हैं, फिर भी वे कुल क्षेत्रफल के एक छोटे से हिस्से को ही कवर करती हैं। इसके अलावा, व्यापक रूप से उगाई जाने वाली व्यावसायिक फसलों में अभी भी आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी है।
- पोषक तत्त्वों की गुणवत्ता पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव: वायुमंडल में CO2 की बढ़ती मात्रा और तापमान के दबाव के कारण मुख्य फसलों में प्रोटीन, आयरन और ज़िंक की मात्रा सक्रिय रूप से कम हो रही है, जिसका अर्थ है कि भोजन की समान मात्रा अब दशकों पहले की तुलना में कम पोषण प्रदान करती है।
- हाल ही में हुए एक अध्ययन से पता चलता है कि CO₂ के बढ़ते स्तर से चावल में प्रोटीन की मात्रा लगभग 10% तक कम हो सकती है और इसमें आयरन का स्तर लगभग 8% तक घट सकता है।
- 'सुरक्षात्मक खाद्य पदार्थों' की आर्थिक पहुँच का अभाव: यद्यपि मुख्य खाद्य पदार्थों पर सब्सिडी दी जाती है, 'सुरक्षात्मक खाद्य पदार्थों' (अंडे, सब्जियाँ, फल) की महंगाई कामकाज़ी गरीबों के लिये विविध आहार को अभिगम्यता से बाहर कर देती है, जिससे लोग सस्ते किंतु पोषण-रहित कैलोरी स्रोतों पर निर्भर होने को विवश हो जाते हैं।
- अनाज पर सब्सिडी होने के बावजूद, अंडे, फल और सब्ज़ियों जैसे पौष्टिक खाद्य पदार्थों की बढ़ती महंगाई ने कामकाज़ी गरीबों के लिये संतुलित आहार को वहनीय नहीं रहने दिया है, जिससे परिवार सस्ते, कैलोरी से भरपूर लेकिन पोषक-रहित खाद्य पदार्थों का सेवन करते हैं।
- शीत शृंखला अवसंरचना की गंभीर कमी के कारण भारत में बागवानी उत्पादों का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा उपभोक्ता तक पहुँचने से पहले ही सड़ जाता है, जिससे पोषक तत्त्वों से भरपूर फल और सब्जियाँ कृत्रिम रूप से महंगी तथा गरीबों की पहुँच से बाहर हो जाती हैं, जिससे उत्पादन में हुई वृद्धि प्रभावी रूप से निष्प्रभावी हो जाती है।
- बढ़ता 'दोहरा बोझ': भारत एक साथ कुपोषण तथा मोटापा और गैर-संचारी रोगों की बढ़ती समस्या से जूझ रहा है। शहरीकरण के साथ आहार पैटर्न प्रसंस्कृत और चीनी-प्रधान खाद्य पदार्थों की ओर स्थानांतरित हो गया है, जबकि कुपोषण का पूर्ण उन्मूलन अभी तक नहीं हो सका है।
- भारत में होने वाली सभी मौतों में से लगभग 63-65% मौतें हृदय रोग, मधुमेह, कैंसर और पुरानी श्वसन संबंधी बीमारियों जैसी गैर-संक्रामक बीमारियों के कारण होती हैं।
- शहरी झुग्गी-झोपड़ी क्षेत्रों में यह विरोधाभासी प्रवृत्ति देखी जाती है कि एक ही परिवार में शिशु वृद्धिरोधन और मोटापा सह-अस्तित्व में होते हैं, जिसका कारण ऊर्जा-सघन किंतु पोषण-रहित प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का उपभोग है।
- नीतिगत क्रियान्वयन की कमियाँ: पोषण सुरक्षा के लिये ‘अभिसरण’ आधारित दृष्टिकोण (स्वच्छता + स्वास्थ्य + भोजन) आवश्यक है, किंतु मंत्रालयों के बीच समन्वय के अभाव एवं वितरण तंत्र में अपव्यय के कारण पोषण अभियान जैसी योजनाओं का प्रभाव क्षीण हो जाता है।
- खराब जल, स्वच्छता और स्वच्छता व्यवहार (WASH) के कारण उत्पन्न पर्यावरणीय आंत्र विकार पोषक तत्त्वों के अवशोषण को बाधित करता है। परिणामस्वरूप, 'पोषण' कार्यक्रम 'पोषण' प्रदान करने में विफल रहते हैं क्योंकि बच्चे की कमज़ोर आंत लगातार पोषक तत्त्वों का रिसाव करती रहती है।
- एंटीबायोटिक प्रतिरोध (AMR) और ‘आँत-स्वास्थ्य’ पर आघात: भारतीय पोल्ट्री और दुग्ध क्षेत्रों में वृद्धि-प्रवर्द्धक प्रतिजैविकों के अनियंत्रित उपयोग से औषधि-प्रतिरोधी जीवाणु उत्पन्न हो रहे हैं। ये खाद्य शृंखला के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश कर आँतों में असंतुलन उत्पन्न करते हैं, जिससे पोषक तत्त्वों का अवशोषण बाधित हो जाता है और उत्तम आहार भी अप्रभावी हो जाता है।
- उदाहरण के लिये, केरल पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय के शोधकर्त्ताओं द्वारा किये गए एक अध्ययन में राज्य के छह ज़िलों से एकत्रित चिकन नमूनों में प्रतिजैविक-प्रतिरोधी (AMR) एस्चेरिचिया कोलाई (E. coli) की उल्लेखनीय उपस्थिति पाई गई।
- पोषण संबंधी जागरूकता और आहार विविधता का अभाव: सांस्कृतिक आदतें और पोषण साक्षरता की अपर्याप्तता उन वर्गों में भी असंतुलित आहार को जन्म देती है, जो बेहतर आहार खरीदने में सक्षम हैं, और ऐसे लोग फल, सब्ज़ियों एवं मोटे अनाजों से रहित नीरस आहार पर अत्यधिक निर्भर रहते हैं।
- अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की आक्रामक मार्केटिंग और बढ़ती शहरी जीवनशैली ने उपभोग के पैटर्न को कैलोरी से भरपूर लेकिन पोषक तत्त्वों से रहित आहार की ओर और अधिक स्थानांतरित कर दिया है।
- स्थानीय स्तर पर उपलब्ध, मौसमी और पारंपरिक खाद्य पदार्थों पर अपर्याप्त ज़ोर देने से आहार विविधता भी कमज़ोर हुई है, जिससे प्रच्छन्न भुखमरी और सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी बढ़ गई है।
भारत में पोषण सुरक्षा को मज़बूत करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?
- पोषण-संबद्ध न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP): किसानों के लिये पोषण को आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाने हेतु, कृषि खरीद नीति को 'पोषण-संबद्ध न्यूनतम समर्थन मूल्य' संरचना में परिवर्तित करना चाहिये।
- पारंपरिक अनाजों की तुलना में जैव-संवर्द्धन वाली किस्मों (जैसे: उच्च-जिंक गेहूँ या आयरन-पर्ल कदन्न) के लिये एक विशिष्ट मूल्य प्रीमियम की पेशकश करके, राज्य स्वाभाविक रूप से 'मात्रा-केंद्रित' से 'गुणवत्ता-केंद्रित' खेती की ओर संक्रमण को प्रोत्साहित कर सकता है।
- इससे यह सुनिश्चित होता है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) जटिल फसल कटाई के बाद के सुदृढ़ीकरण संबंधी व्यवस्थाओं की आवश्यकता के बिना ही आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्त्वों से समृद्ध हो जाती है।
- विकेंद्रीकृत 'न्यूट्री-बास्केट' खरीद: सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) को केंद्रीकृत अनाज भंडार से विकसित होकर एक स्थानीयकृत 'न्यूट्री-बास्केट' प्रणाली में बदलना चाहिये, जिसमें क्षेत्रीय रूप से प्रासंगिक मोटे अनाज (कदन्न) और दालों को शामिल करना अनिवार्य हो।
- स्थानीय सुपरफूड्स (जैसे: दक्षिणी राज्यों में रागी या पश्चिम में मिलेट्स) की खरीद और वितरण के लिये ज़िलों को सशक्त बनाने से लॉजिस्टिक्स के कार्बन फुटप्रिंट में भारी कमी आती है, साथ ही यह सुनिश्चित होता है कि लाभार्थियों को सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य, उच्च फाइबर वाला आहार मिले जो गरीबों में मधुमेह तथा मोटापे की बढ़ती घटनाओं से सक्रिय रूप से निपटने में सहायता करता है।
- 'प्रारंभिक 1000 दिनों' के लिये अभिसरण: हस्तक्षेपों के लिये एक ‘जीवन-चक्र अभिसरण ढाँचे’ को सख्ती से लागू करना चाहिये, जो गर्भावस्था-पूर्व से लेकर दो वर्ष की आयु तक की निर्णायक अवधि में मातृ स्वास्थ्य, स्वच्छता तथा टीकाकरण को एकीकृत वितरण तंत्र में समाहित करता है।
- मातृत्व लाभों को गर्भावस्था-पूर्व पोषण अनुपालन और पूर्ण स्तनपान की उपलब्धियों से विधिक रूप से जोड़ना, कुपोषित बच्चों के उपचार से आगे बढ़ते हुए गर्भस्थ शिशु वृद्धिरोधन की रोकथाम की दिशा में एक नया दृष्टिकोण प्रदान करता है, जिससे जन्म से पहले ही शिशु वृद्धिरोधन (Stunting) रोका जा सके।
- AI के माध्यम से गतिशील 'हॉटस्पॉट' लक्ष्यीकरण: भारत के डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना का लाभ उठाते हुए, प्रशासन को विलंबित सर्वेक्षण डेटा पर निर्भर रहने के बजाय वास्तविक समय में 'पोषण हॉटस्पॉट' की पहचान करने के लिये पोषण ट्रैकर डेटा पर AI-संचालित विश्लेषण का उपयोग करना चाहिये।
- इससे विशिष्ट उच्च-बोझ वाले ब्लॉकों या झुग्गी-झोपड़ियों में पूरक पोषण और चिकित्सा अधिकारियों का सटीक एवं गतिशील आवंटन संभव हो पाता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि गंभीर कुपोषण के अपरिवर्तनीय होने से पहले वित्तीय संसाधन सबसे कमज़ोर जनसांख्यिकी पर केंद्रित हों।
- सामुदायिक नेतृत्व वाली सामाजिक लेखापरीक्षाएँ: भ्रष्टाचार को रोकने और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिये, आँगनवाड़ियों के संचालन को स्थानीय स्वयं सहायता समूहों (SHG) द्वारा समर्थित 'सामुदायिक नेतृत्व वाली सामाजिक लेखापरीक्षाओं' के माध्यम से लोकतांत्रिक बनाया जाना चाहिये।
- पोषण को एक प्रशासनिक कार्य से बदलकर एक सामुदायिक स्वामित्व वाली संपत्ति में बदलने से यह सुनिश्चित होता है कि पूरक पोषण के लिये धनराशि वास्तव में दूध और अंडे पर खर्च की जाए, साथ ही जवाबदेही की एक ज़मीनी स्तर की संस्कृति को बढ़ावा मिले, जहाँ गांव स्वयं अपने बच्चों के विकास चार्ट की निगरानी करता है।
- अनिवार्य 'निष्क्रिय सुदृढ़ीकरण' मानक: नियामक निकायों को खाद्य तेल, दूध और नमक जैसी खुले बाजार में बिकने वाली आवश्यक वस्तुओं के लिये 'अनिवार्य सुदृढ़ीकरण मानकों' को सख्ती से लागू करना चाहिये ताकि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के दायरे से बाहर रहने वाले शहरी गरीबों के लिये एक निष्क्रिय प्रतिरक्षा कवच बनाया जा सके।
- सूक्ष्म पोषक तत्त्वों के प्रीमिक्स को मानकीकृत करने के लिये निजी क्षेत्र के साथ सहयोग करके और लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिये अनुपालन लागतों पर सब्सिडी देकर, राज्य यह सुनिश्चित करता है कि गैर-सब्सिडी वाली, दैनिक मजदूरी पर की जाने वाली खाद्य खरीद भी विटामिन A और D के राष्ट्रीय आधारभूत स्तर को बढ़ाने में योगदान दे।
- जलवायु-अनुकूल 'कृषि-पोषण' क्षेत्र: कृषि नियोजन को 'कृषि-पोषण क्षेत्रों' की स्थापना की दिशा में आगे बढ़ना चाहिये जो फसल पैटर्न को स्थानीय पारिस्थितिक वहन क्षमता के साथ संरेखित करते हैं, ताकि बढ़ते कार्बन डाइऑक्साइड स्तरों के कारण होने वाले 'पोषक तत्त्व तनुकरण' प्रभाव को रोका जा सके।
- इससे सतत खाद्य उत्पादन सुनिश्चित होता है जो पोषण गुणवत्ता से समझौता नहीं करता है, जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न 'प्रच्छन्न भुखमरी' से भावी पीढ़ियों की रक्षा करता है, साथ ही जल एवं उर्वरक पर निर्भरता को कम करता है।
- शहरी 'प्रवासी-विशिष्ट' पोषण गलियारे: भारत के अस्थायी कार्यबल की विशिष्ट पोषण संबंधी भेद्यता को पहचानते हुए, 'एक राष्ट्र एक राशन कार्ड' (ONORC) को 'शहरी पोषण गलियारों' में विस्तारित किया जाना चाहिये जो रियायती, उच्च-ऊर्जा युक्त पका हुआ भोजन प्रदान करते हैं।
- प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में 'सामुदायिक रसोईघर' स्थापित करने से यह सुनिश्चित होता है कि प्रवासी श्रमिकों को, जिनके पास प्रायः खाना पकाने के ईंधन और पीने योग्य जल की कमी होती है, असुरक्षित स्ट्रीट फूड पर निर्भर हुए बिना पर्याप्त कैलोरी और प्रोटीन प्राप्त हो सके।
- सामाजिक और व्यवहारिक परिवर्तन संचार (SBCC) के माध्यम से व्यवहारिक 'प्रेरणा': आहार संबंधी मिथकों को दूर करने और महत्त्वाकांक्षी प्रसंस्कृत वस्तुओं के बजाय विविध, स्थानीय रूप से उपलब्ध 'सुरक्षात्मक खाद्य पदार्थों' के सेवन को बढ़ावा देने के लिये एक सतत 'सामाजिक एवं व्यवहारिक परिवर्तन संचार' (SBCC) अभियान आवश्यक है।
- स्कूलों के पाठ्यक्रम में पोषण संबंधी साक्षरता को शामिल करने से स्वस्थ खानपान के लिये मांग उत्पन्न होती है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि बढ़ी हुई क्रय शक्ति परिष्कृत कार्बोहाइड्रेट के अधिक सेवन के बजाय बेहतर पोषण संबंधी परिणामों में परिणत हो।
- 'वन हेल्थ' जूनोटिक निगरानी: शाकाहारी प्रधान समाज में प्रोटीन की कमी से निपटने के लिये पशु-आधारित खाद्य पदार्थों (दूध, अंडे, मांस) की गुणवत्ता की निगरानी एवं नियंत्रण के लिये 'वन हेल्थ' ढाँचे को अपनाना महत्त्वपूर्ण है।
- पशु चिकित्सा सेवाओं को सुदृढ़ करने से यह सुनिश्चित होता है कि पशुधन क्षेत्र सुरक्षित, उच्च प्रोटीन युक्त पोषण प्रदान करे और मानव खाद्य शृंखला में पशुओं से होने वाली बीमारियों या एंटीबायोटिक अवशेषों को प्रवेश होने से बचाए, जिससे पोषण की स्थिति एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा दोनों की रक्षा हो सके।
निष्कर्ष
आज भारत की पोषण संबंधी चुनौती केवल भोजन की कमी नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण पोषण की कमी है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) औरप्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PM-GKAY) जैसी सशक्त सुरक्षा योजनाओं के बावजूद, बच्चों में बौनापन (stunting), कुपोषण (wasting) और एनीमिया की उच्च दर संरचनात्मक और आहार संबंधी गंभीर कमियों को प्रकट करती है। बायोफोर्टिफिकेशन, मिलेट्स, डिजिटल गवर्नेंस और प्रारंभिक 1000 दिनों के हस्तक्षेप की दिशा में हालिया नीतिगत बदलाव निर्णायक सुधार का संकेत देते हैं। फिर भी, सशक्त समन्वय, पर्याप्त वित्त पोषण और व्यवहारिक परिवर्तन के अभाव में, पोषण सुरक्षा भारत के विकास एजेंडे का केवल अधूरा हिस्सा ही बनी रहेगी।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न व्यापक कल्याणकारी योजनाओं के बावजूद, भारत में बच्चों में बौनापन और एनीमिया की समस्या अभी भी बहुत गंभीर है। इसके संरचनात्मक कारणों का विश्लेषण कीजिये और प्रभावी समाधान बताइये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1. प्रच्छन्न भुखमरी क्या है?
पर्याप्त कैलोरी होने के बावजूद आवश्यक सूक्ष्मपोषक तत्त्वों की कमी होना।
प्रश्न 2. पोषण के लिये मिलेट्स को क्यों बढ़ावा दिया जाता है?
ये जलवायु-सहिष्णु हैं और फाइबर एवं खनिजों से समृद्ध हैं।
प्रश्न 3. प्रारंभिक 1000 दिनों का दृष्टिकोण क्या है?
गर्भाधान से लेकर दो वर्ष की आयु तक पोषण पर ध्यान केंद्रित करने रणनीति।
प्रश्न 4. भारत में एनीमिया की समस्या लगातार क्यों बनी रहती है?
लैंगिक असमानता, आहार में विविधता की कमी और कम अवशोषण क्षमता के कारण।
प्रश्न 5. पोषण में PDS की क्या भूमिका है?
कैलोरी की उपलब्धता सुनिश्चित करता है, लेकिन मुख्य रूप से अनाज-केंद्रित रहता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ)
प्रिलिम्स:
प्रश्न 1. जलवायु-अनुकूल कृषि (क्लाइमेट-स्मार्ट एग्रीकल्चर) के लिये भारत की तैयारी के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये-
- भारत में ‘जलवायु-स्मार्ट ग्राम (क्लाइमेट-स्मार्ट विलेज)’ दृष्टिकोण, अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान कार्यक्रम-जलवायु परिवर्तन, कृषि एवं खाद्य सुरक्षा (सी.सी.ए.एफ.एस.) द्वारा संचालित परियोजना का एक भाग है।
- सी.सी.ए.एफ.एस. परियोजना, अंतर्राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान हेतु परामर्शदात्री समूह (सी.जी.आई.ए.आर.) के अधीन संचालित किया जाता है, जिसका मुख्यालय प्राँस में है।
- भारत में स्थित अंतर्राष्ट्रीय अर्धशुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान (आई.सी.आर.आई.एस.ए.टी.), सी.जी.आई.ए.आर. के अनुसंधान केंद्रों में से एक है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (d)
प्रश्न 2. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के तहत किये गए प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2018)
- केवल 'गरीबी रेखा से नीचे (BPL) की श्रेणी में आने वाले परिवार ही सब्सिडी वाले खाद्यान्न प्राप्त करने के पात्र हैं।
- परिवार में 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र की सबसे अधिक उम्र वाली महिला ही राशन कार्ड निर्गत किये जाने के प्रयोजन से परिवार की मुखिया होगी।
- गर्भवती महिलाएँ एवं दुग्ध पिलाने वाली माताएँ गर्भावस्था के दौरान और उसके छ: महीने बाद तक प्रतिदिन 1600 कैलोरी वाला राशन घर ले जाने की हकदार हैं।
उपर्युत्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) 1 और 2
(b) केवल 2
(c) 1 और 3
(d) केवल 3
उत्तर: (b)
मेन्स
प्रश्न. प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डी.बी.टी.) के द्वारा कीमत सहायिकी का प्रतिस्थापन भारत में सहायिकियों के परिदृश्य का किस प्रकार परिवर्तन कर सकता है? चर्चा कीजिये। (2015)