भारत का नवाचार पारितंत्र - व्यापकता और गहनता का संगम | 24 Mar 2026
यह एडिटोरियल 22/03/2026 को द हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित ‘Firing up innovation for the new tech age’ शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह एडिटोरियल भारत के एक संप्रभु नवाचार पारितंत्र की ओर रणनीतिक बदलाव का विश्लेषण करता है। साथ ही यह उन वित्तीय और नियामक बाधाओं का भी उल्लेख करता है, जिन्हें 2026 तक भारत को वैश्विक ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था में रूपांतरित करने के लिये संबोधित करना आवश्यक है।
प्रिलिम्स के लिये: अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (ANRF), इंडिया AI मिशन, भारत सेमीकंडक्टर मिशन 2.0, ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स
मेन्स के लिये: एक सशक्त नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र की दिशा में भारत की प्रगति, प्रमुख मुद्दे और आवश्यक उपाय।
भारत का नवाचार तंत्र एक निर्णायक दौर में प्रवेश कर रहा है, जो व्यापकता और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना पर आधारित है। आधार कार्ड 14 लाख लोगों को कवर करता है, जबकि UPI के माध्यम से प्रति माह 20 अरब से अधिक लेन-देन होते हैं। 2 लाख से अधिक मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स के साथ, जिनमें से लगभग 50% द्वितीय-तृतीय शहरों से उभर रहे हैं, नवाचार ने भौगोलिक समावेशिता को प्रदर्शित किया है। भारत वर्तमान में विश्व का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप पारितंत्र का आश्रयदाता है, जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम तथा जैव-प्रौद्योगिकी जैसे गहन-प्रौद्योगिकी क्षेत्रों को समाहित करता है। ‘भारत इनोवेट्स’ जैसी पहलों तथा ₹10,000 करोड़ के फंड ऑफ फंड्स के समर्थन से, भारत स्वयं को विस्तारयोग्य, संप्रभु तथा समावेशी नवाचार के वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित कर रहा है।
भारत एक सशक्त नवाचार पारितंत्र बनने की दिशा में किस प्रकार प्रगति कर रहा है?
- सॉवरेन डीप-टेक और AI इकोसिस्टम: भारत ने स्वदेशी तकनीकी क्षमता के साथ संस्थागत पूंजी के संरेखण द्वारा मानव-केंद्रित, सॉवरेन AI फ्रेमवर्क को सक्रिय रूप से तीव्र किया है।
- यह सार्वजनिक-निजी समन्वय एल्गोरिथ्मिक पक्षपात को न्यून करता है, साथ ही महत्त्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक क्षेत्रों में गहन-प्रौद्योगिकी के परिनियोजन को प्रोत्साहित करता है।
- उदाहरणार्थ, वर्ष 2026 के प्रारंभ में क्रियान्वित ₹1 लाख करोड़ का अनुसंधान, विकास एवं नवाचार (RDI) कोष प्रारंभिक चरण के गहन-प्रौद्योगिकी निवेशों के जोखिम को कम करता है।
- इसके अतिरिक्त, भारत हेतु सॉवरेन AI के निर्माण पर केंद्रित सर्वम AI जैसे स्टार्टअप्स देश में AI अंगीकरण को प्रोत्साहित कर रहे हैं, जिससे वर्ष 2035 तक $1.7 ट्रिलियन का आर्थिक मूल्य सृजित होने की अपेक्षा है।
- रणनीतिक द्विपक्षीय नवाचार कूटनीति: भारत की कूटनीतिक स्थिति संरचनात्मक रूप से पारंपरिक रक्षा व्यापार से हटकर रणनीतिक वैश्विक भागीदारों के साथ अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों के सह-विकास की ओर अग्रसर हुई है।
- यह बदलाव द्विपक्षीय संबंधों को पारस्परिक नवाचार पारितंत्र में रूपांतरित करता है जो स्थानीय स्तर पर परिनियोजन हेतु विदेशी पूंजी का लाभ उठाते हैं।
- 'भारत इनोवेट्स' प्लेटफॉर्म द्वारा समर्थित, 2026 को भारत-फ्राँस नवाचार वर्ष के रूप में नामित करना, इस रणनीतिक अभिसरण का एक उत्तम उदाहरण है।
- इस विशेष पहल के तहत उच्च क्षमता वाले 100 भारतीय डीप-टेक स्टार्टअप्स का सक्रिय रूप से चयन किया जा रहा है ताकि उन्हें सीधे यूरोपीय वेंचर नेटवर्क और उन्नत अनुसंधान संस्थानों के साथ एकीकृत किया जा सके।
- सेमीकंडक्टर आपूर्ति शृंखला का स्वदेशीकरण: प्रौद्योगिकीय संप्रभुता सुनिश्चित करने तथा वैश्विक आपूर्ति शृंखला आघातों से घरेलू उद्योगों को सुरक्षित रखने के लिये भारत अपने सेमीकंडक्टर विनिर्माण पारितंत्र का तीव्र स्थानीयकरण कर रहा है।
- सॉफ्टवेयर-प्रधान निर्यातक से हार्डवेयर-सुदृढ़ अर्थव्यवस्था की ओर यह संक्रमण राष्ट्रीय रक्षा तथा औद्योगिक स्वचालन के भविष्य के लिये आधारभूत है।
- वर्ष 2026-27 के केंद्रीय बजट में भारत सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 के अंतर्गत ₹1,000 करोड़ का आवंटन उपकरण विनिर्माण तथा स्वदेशी बौद्धिक संपदा डिज़ाइन को लक्षित करता है।
- परिणामतः, वर्ष 2026 के प्रारंभ तक गुजरात स्थित नव-क्रियाशील ATMP सुविधा सहित चार स्वीकृत सेमीकंडक्टर संयंत्र वाणिज्यिक उत्पादन की दिशा में अग्रसर हैं।
- जलवायु-अनुकूलित कृषि प्रौद्योगिकी का एकीकरण: कृषि अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक रूपांतरण परिलक्षित हो रहा है, जहाँ जलवायु-अनुकूलित पद्धतियाँ राज्य समर्थित डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के साथ समेकित हो रही हैं।
- यह एकीकरण उन्नत एग्रीटेक तक पहुँच का लोकतंत्रीकरण करता है, जिससे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होती है तथा प्राकृतिक कृषि का पारिस्थितिकीय प्रभाव न्यून होता है।
- एग्रीस्टैक, जिसे 2024 में कृषि क्षेत्र हेतु डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना मिशन के अंतर्गत प्रारंभ किया गया, एकल मंच पर डेटा के समेकन का कार्य करता है।
- इसके साथ ही AI-सक्षम मृदा स्वास्थ्य निगरानी विकेंद्रीकृत कृषि तंत्रों में सतत कृषि पद्धतियों की ओर संक्रमण को प्रेरित कर रही है।
- हरित प्रौद्योगिकी और पारिस्थितिक पुनर्स्थापना: पर्यावरणीय शासन अब प्रकृति-आधारित प्रौद्योगिकीय समाधानों को प्राथमिकता दे रहा है, जिससे कार्बन सिंक की पुनर्स्थापना तथा संवेदनशील जल-प्रणालियों का संरक्षण सुनिश्चित हो सके।
- यह बहुआयामी दृष्टिकोण व्यापक आर्थिक अवसंरचना विकास को जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध सुदृढ़ पारिस्थितिकीय सुरक्षा के साथ संतुलित करता है।
- उदाहरणार्थ, MISHTI योजना के माध्यम से मुख्यतः गुजरात में 22,500 हेक्टेयर से अधिक मैंग्रोव का पुनर्स्थापन किया गया है, जिससे तटीय पारिस्थितिकी तंत्र सुदृढ़ हुआ है।
- विस्तारित ग्रीन इंडिया मिशन तथा 2026 ग्रीनटेक समिट रूपरेखाओं के माध्यम से AI-सक्षम आर्द्रभूमि संरक्षण तथा विकेंद्रीकृत अपशिष्ट-जल पुनर्चक्रण में नवाचारों का तीव्र विस्तार किया जा रहा है।
- यह बहुआयामी दृष्टिकोण व्यापक आर्थिक अवसंरचना विकास को जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध सुदृढ़ पारिस्थितिकीय सुरक्षा के साथ संतुलित करता है।
- अनुसंधान एवं विकास अनुकूलन के माध्यम से राजकोषीय सुदृढ़ीकरण: सरकार अनुसंधान एवं विकास हेतु निजी पूंजी को आकर्षित करने के लिये अपने राजकोषीय व्यय का पुनर्संरचन कर रही है, जिससे आर्थिक विकास मॉडल को ज्ञान-आधारित उत्पादन की ओर स्थानांतरित किया जा सके।
- यह राजकोषीय अनुशासन दीर्घकालिक व्यापक आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करता है तथा सतत वैज्ञानिक नवाचार की राष्ट्रीय क्षमता का विस्तार करता है।
- अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (ANRF) के क्रियान्वयन के माध्यम से भारत बिखरे अनुदानों से लक्षित, उच्च-प्रभावी ब्लॉक फंडिंग की ओर संक्रमण कर रहा है।
- संशोधित स्टार्टअप ढाँचे के अंतर्गत पात्रता मानदंडों में शिथिलता प्रदान की गई है, जिसमें आयु सीमा 20 वर्ष तक विस्तारित तथा टर्नओवर सीमा ₹300 करोड़ तक बढ़ाई गई है।
- सार्वजनिक रसद और अवसंरचना का आधुनिकीकरण: कोर अवसंरचना नेटवर्क का व्यवस्थित आधुनिकीकरण स्वदेशी सुरक्षा प्रौद्योगिकियों तथा डेटा-आधारित लॉजिस्टिक नियोजन के माध्यम से किया जा रहा है।
- यह आधुनिकीकरण लॉजिस्टिक बाधाओं को कम कर घरेलू नवाचार पारितंत्र की समग्र वाणिज्यिक गति एवं दक्षता को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाता है।
- उदाहरणस्वरूप, कवच भारतीय रेल द्वारा विकसित स्वदेशी स्वचालित ट्रेन सुरक्षा (ATP) प्रणाली है, जो SIL-4 प्रमाणन के साथ उच्च स्तरीय सुरक्षा सुनिश्चित करती है तथा दिसंबर 2025 तक 2,200+ मार्ग किमी के लिये स्थापित की जा चुकी है।
- यह आधुनिकीकरण लॉजिस्टिक बाधाओं को कम कर घरेलू नवाचार पारितंत्र की समग्र वाणिज्यिक गति एवं दक्षता को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाता है।
- स्टार्टअप अर्थव्यवस्था का स्थानिक लोकतंत्रीकरण: उद्यम पूंजी और राज्य द्वारा संचालित इनक्यूबेशन का भौगोलिक वितरण पारंपरिक महानगरों से क्षेत्रीय, द्वितीय और तृतीय स्तर के नवाचार केंद्रों की ओर स्थानांतरित हो रहा है।.
- यह स्थानिक लोकतंत्रीकरण व्यापक, पूर्व में अल्प-उपयोगित प्रतिभा-स्रोत को सक्रिय करता है, जिससे सामाजिक-आर्थिक विकास समावेशी तथा व्यापक बनता है।
- वर्ष 2026 तक भारत के 2 लाख मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स में से 50% से अधिक इन विकेंद्रीकृत क्षेत्रों से उभर रहे हैं, जिन्हें मुद्रा योजना के अंतर्गत महिला उद्यमियों द्वारा विशेष रूप से प्रोत्साहन मिल रहा है।
- साथ ही, चिप्स टू स्टार्टअप्स (C2S) पहल के माध्यम से सेमीकंडक्टर क्षेत्र में प्रतिभा विकास हेतु 10 वर्षों में 85,000 इंजीनियरों को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
भारत के नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़े प्रमुख मुद्दे क्या हैं?
- अनुसंधान एवं विकास पर सकल व्यय (GERD) और निजी पूंजी की अरुचि: भारत की नवाचार प्रगति अनुसंधान एवं विकास पर सकल व्यय (GERD) के दीर्घकालिक निम्न स्तर तथा अल्पकालिक लाभ को वरीयता देने वाली संकुचित निजी क्षेत्रीय निवेश प्रवृत्ति के कारण गंभीर रूप से अवरुद्ध बनी हुई है।
- यह वित्तीय असंतुलन उच्च-जोखिम वाले मूलभूत विज्ञान का प्रमुख भार राज्य पर डालता है, जिससे वैश्विक गहन-प्रौद्योगिकी नेतृत्व की ओर संक्रमण अवरुद्ध होता है।
- आर्थिक समीक्षा 2025-26 के अनुसार, भारत का GERD सकल घरेलू उत्पाद का 0.64% पर स्थिर है, जो चीन तथा दक्षिण कोरिया की तुलना में उल्लेखनीय रूप से कम है।
- इसके अतिरिक्त, कुल R&D व्यय में निजी क्षेत्र का योगदान मात्र 36% है, जबकि उन्नत नवाचार-आधारित अर्थव्यवस्थाओं में यह 75% से अधिक है।
- प्रयोगशाला से बाज़ार रूपांतरण में ‘वैली ऑफ डेथ’ की समस्या: स्वदेशी अनुसंधान को शैक्षणिक प्रोटोटाइप से विस्तारयोग्य औद्योगिक उत्पादों में रूपांतरित करने में एक संरचनात्मक अंतर विद्यमान है, जिसके कारण ‘वैली ऑफ डेथ’ की स्थिति उत्पन्न होती है, जहाँ उच्च-क्षमता वाले नवाचार पायलट अवसंरचना के अभाव में निष्प्रभावी हो जाते हैं।
- भारत प्रारंभिक वैज्ञानिक प्रकाशनों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करता है, तथापि प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तथा वाणिज्यिक रूपांतरण हेतु संस्थागत तंत्र खंडित एवं अल्प-वित्तपोषित है।
- वर्ष 2025 के वैश्विक नवाचार सूचकांक (GII) में भारत ज्ञान एवं प्रौद्योगिकी उत्पादन में 22वें स्थान पर है, किंतु व्यवसायिक परिष्कार (64वाँ) तथा अवसंरचना (61वाँ) में अपेक्षाकृत निम्न स्थान पर है।
- पेटेंट लंबित अवधि (लगभग 58 माह) तथा मानक-आवश्यक पेटेंट (SEP) की कमी भारत को प्रौद्योगिकी-उपभोक्ता बनाए रखती है।
- सीमांत प्रौद्योगिकी हार्डवेयर में भू-राजनीतिक संवेदनशीलता: 'मेक इन इंडिया' अभियान के बावजूद, यह इकोसिस्टम सेमीकंडक्टर और दुर्लभ पृथ्वी सामग्री जैसे महत्त्वपूर्ण हार्डवेयर बिल्डिंग ब्लॉक के लिये अस्थिर वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं पर गहरी निर्भरता से ग्रस्त है।
- यद्यपि विनिर्माण संयंत्र वर्ष 2026 तक परिचालन के निकट हैं, तथापि भारत अब भी अपने सक्रिय इलेक्ट्रॉनिक घटकों का लगभग 80-90% आयात करता है।
- यह संरचनात्मक निर्भरता भारत को एक संप्रभु प्रौद्योगिकी निर्माता के स्थान पर मात्र 'सिस्टम इंटीग्रेटर' तक सीमित कर देती है, जिससे घरेलू स्टार्टअप रणनीतिक 'अवरोध बिंदुओं' के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाते हैं।
- डीप-टेक एवं एआई नैतिकता में विनियामक विलंब: कृत्रिम बुद्धिमत्ता एवं डीप-टेक के तीव्र प्रसार ने एक सुदृढ़, अधिकार-आधारित विनियामक ढाँचे के विकास को पीछे छोड़ दिया है, जिसके परिणामस्वरूप नवप्रवर्तकों के लिये कानूनी अनिश्चितता तथा नागरिकों के लिये नैतिक जोखिम उत्पन्न हुए हैं।
- इस शासनगत शून्य की स्थिति में 'अनुमति-रहित नवाचार' को प्रोत्साहित करने एवं डीपफेक तथा एल्गोरिथमिक पूर्वाग्रह जैसे एआई-जनित दुष्प्रभावों के लिये कड़ी जवाबदेही सुनिश्चित करने के मध्य एक संतुलन स्थापित करना आवश्यक हो गया है।
- सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश एवं डिजिटल मीडिया नैतिकता संहिता) संशोधन नियम, 2026 द्वारा हानिकारक कृत्रिम सामग्री को हटाने हेतु 3 घंटे की समय-सीमा अनिवार्य की गई है, जो यद्यपि एक महत्त्वपूर्ण पहल है, किंतु तकनीकी प्लेटफार्मों पर उल्लेखनीय परिचालन दबाव भी उत्पन्न करती है।
- कौशल-विसंगति एवं प्रतिभा एकाग्रता का अंतर: यद्यपि भारत के पास इंजीनियरिंग स्नातकों का विशाल आधार उपलब्ध है, तथापि क्वांटम कंप्यूटिंग एवं उन्नत लिथोग्राफी जैसे क्षेत्रों में अग्रणी अनुसंधान एवं विकास का नेतृत्व करने में सक्षम उच्च-स्तरीय विशेषज्ञ प्रतिभा का अभाव स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है।
- यह पारिस्थितिकी तंत्र शीर्ष स्तर पर 'प्रतिभा पलायन' तथा 'फैब-फ्लोर' अनुभव की कमी से जूझ रहा है, जिसके परिणामस्वरूप शैक्षणिक योग्यता एवं औद्योगिक तत्परता के मध्य गंभीर अंतर उत्पन्न हो रहा है।
- यद्यपि विश्व के लगभग 20% सेमीकंडक्टर डिज़ाइन इंजीनियर भारत में स्थित हैं, फिर भी उन्नत चिप निर्माण के लिये आवश्यक फैब्रिकेशन-स्तरीय विशेषज्ञता का आधार अत्यंत सीमित बना हुआ है।
- इसके अतिरिक्त, वर्ष 2027 तक भारत में लगभग 3 लाख कुशल सेमीकंडक्टर पेशेवरों की कमी का अनुमान इस कौशल अंतर की गंभीरता को रेखांकित करता है।
- स्थानिक एवं लैंगिक नवाचार असमानता: टियर-II एवं टियर-III शहरों में स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र को प्रोत्साहन मिलने के बावजूद, डीप-टेक नवाचार गतिविधियाँ अभी भी कुछ महानगरीय 'सुपर-क्लस्टर' तक अत्यधिक सीमित बनी हुई हैं।
- यह स्थानिक एवं जनसांख्यिकीय असंतुलन वेंचर कैपिटल के लोकतंत्रीकरण में बाधा उत्पन्न करता है तथा स्टार्टअप अर्थव्यवस्था के व्यापक सामाजिक-आर्थिक प्रभाव को प्रमुख शहरी केंद्रों तक सीमित कर देता है।
- यद्यपि विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग एवं गणित (STEM) में महिलाओं का नामांकन वैश्विक स्तर पर उच्च है, तथापि वाणिज्यिक नवाचार कार्यबल में उनका प्रतिनिधित्व उल्लेखनीय रूप से सीमित बना हुआ है।
- उदाहरणस्वरूप, भारत में STEM स्नातकों में लगभग 43% महिलाएँ हैं, जो प्रमुख वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं में सर्वाधिक अनुपात है, किंतु STEM कार्यबल में उनकी भागीदारी मात्र 27% तक सीमित है, जो एक स्पष्ट लैंगिक असंतुलन को दर्शाता है।
- वेंचर कैपिटल में अस्थिरता एवं IPO परिदृश्य का परिवर्तन: भारतीय स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र वर्तमान में एक 'फंडिंग पुनर्संतुलन' (funding recalibration) के दौर से गुजर रहा है, जिसमें वेंचर कैपिटल निवेश अधिक चयनात्मक हो गया है तथा 'किसी भी कीमत पर विकास' के स्थान पर 'लागत दक्षता' को प्राथमिकता दी जा रही है।
- इस प्रवृत्ति के परिणामस्वरूप, स्टार्टअप्स को अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिये संघर्ष करना पड़ रहा है, जिसके चलते वे दीर्घकालिक अनुसंधान एवं विकास निवेश को त्यागकर त्वरित लाभप्रदता प्रदान करने वाले अपेक्षाकृत सुरक्षित एवं श्रम-प्रधान व्यावसायिक मॉडल अपनाने के लिये बाध्य हो रहे हैं।
- उदाहरण के लिये, वर्ष 2025 में भारतीय स्टार्टअप्स ने लगभग 13 बिलियन डॉलर की फंडिंग जुटाई, जो वर्ष 2024 के 14.4 बिलियन डॉलर की तुलना में लगभग 10% की गिरावट को दर्शाता है।
- इसके अतिरिक्त, वर्ष 2026-27 के बजट में प्रतिभूति लेनदेन कर (STT) में वृद्धि ने पूंजी बाज़ार में अस्थिरता को और अधिक बढ़ा दिया है, जिससे इनिशियल पब्लिक ऑफर (IPO) की संभावनाओं पर भी प्रभाव पड़ा है।
भारत में नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करने हेतु कौन-से उपाय आवश्यक हैं?
- प्रयोगशाला से बाज़ार तक अनुवाद हेतु चतुर्भुज हेलिक्स एकीकरण: भारत को एक संस्थागत 'चतुर्भुज हेलिक्स मॉडल' स्थापित करना चाहिये, जो शिक्षा जगत, उद्योग, सरकार तथा नागरिक समाज को एक समेकित 'नवाचार-प्रेरणा निरंतरता' में औपचारिक रूप से एकीकृत करे।
- विश्वविद्यालयों के भीतर एकीकृत प्रौद्योगिकी तत्परता स्तर (TRL) एक्सीलरेटर स्थापित कर, राज्य अनिवार्य उद्योग-संलग्न कैपस्टोन परियोजनाओं के माध्यम से अनुसंधान के 'वैली ऑफ डेथ' चरण को प्रभावी रूप से पाट सकता है।
- यह संरचनात्मक समन्वय सुनिश्चित करता है कि वैज्ञानिक अनुसंधान केवल शैक्षणिक प्रकाशनों तक सीमित न रहकर, वाणिज्यिक व्यवहार्यता एवं तीव्र औद्योगिक तैनाती के अनुरूप विकसित हो।
- संप्रभु पेटेंट पूलिंग एवं मानक आवश्यक पेटेंट (SEP): प्रौद्योगिकी उपभोक्ता से वैश्विक मानक-निर्धारक बनने हेतु भारत को एक राष्ट्रीय संप्रभु पेटेंट कोष की स्थापना करनी चाहिये, जो 6G एवं क्वांटम कंप्यूटिंग जैसे उभरते क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण बौद्धिक संपदा (IP) के अधिग्रहण, समेकन एवं संरक्षण को सुनिश्चित करे।
- घरेलू कंपनियों को मानक आवश्यक पेटेंट (SEP) में सक्रिय योगदान हेतु प्रोत्साहित करने से 'रॉयल्टी अपवाह' में कमी आएगी तथा वैश्विक व्यापार वार्ताओं में रणनीतिक बढ़त प्राप्त होगी।
- इसके अतिरिक्त, प्रमुख नवाचार भागीदारों के साथ 'पेटेंट अभियोजन राजमार्ग' स्थापित करने से स्वदेशी बौद्धिक संपदा के सीमा-पार प्रमाणीकरण एवं स्वीकृति की प्रक्रिया में तीव्रता लाई जा सकती है।
- डीप-टेक एन्युइटी के माध्यम से 'पेशेंट कैपिटल' का संवर्द्धन: राजकोषीय ढाँचे को दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाते हुए 'पेशेंट कैपिटल' को प्रोत्साहित करना आवश्यक है, जिसके लिये डीप-टेक इनोवेशन बॉण्ड जैसे कर-प्रोत्साहित निवेश साधनों का विकास किया जाना चाहिये।
- सरकार समर्थित फर्स्ट-लॉस गारंटी (FLG) तंत्र के माध्यम से प्रारंभिक चरण के हार्डवेयर उद्यमों के जोखिम को कम कर, राज्य सेमीकंडक्टर उपकरण एवं जैव प्रौद्योगिकी जैसे उच्च-जोखिम वाले क्षेत्रों में निजी निवेश को आकर्षित कर सकता है।
- यह दृष्टिकोण वर्तमान 'मूल्यांकन-जाल' से बचाव सुनिश्चित करता है, जिसमें स्टार्टअप्स अल्पकालिक राजस्व संकेतकों के दबाव में दीर्घकालिक अनुसंधान एवं विकास निवेश का परित्याग कर देते हैं।
- द्वितीय एवं तृतीय स्तर के भौगोलिक क्षेत्रों में विकेंद्रीकृत नवाचार क्लस्टर: स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र के लोकतंत्रीकरण हेतु भारत को महानगरीय 'सुपर-क्लस्टर' से आगे बढ़ते हुए एक हब-एंड-स्पोक आधारित क्षेत्रीय नवाचार ढाँचे को अपनाना चाहिये, जो छोटे शहरों की स्थानीय क्षमताओं का प्रभावी दोहन करे।
- विशिष्ट प्रौद्योगिकी क्षेत्रों—जैसे कृषि क्षेत्रों में सटीक कृषि तकनीक तथा तटीय क्षेत्रों में ब्लू इकोनॉमी प्रौद्योगिकी—के लिये क्षेत्र-विशिष्ट विशेष आर्थिक क्षेत्र (SSEZ) की स्थापना से क्षेत्रीय प्रतिभा के अप्रयुक्त भंडार का उपयोग संभव होगा।
- यह स्थानिक लोकतंत्रीकरण सुनिश्चित करता है कि नवाचार समावेशी, व्यापक आधार वाला एवं संतृप्त महानगरीय केंद्रों की उच्च लॉजिस्टिक लागतों के प्रति लचीला बना रहे।
- उभरती प्रौद्योगिकी शासन हेतु नियामक सैंडबॉक्स: राज्य को क्षेत्र-विशिष्ट नियामक सैंडबॉक्स तंत्र लागू करना चाहिये, जो नियंत्रित निगरानी के अंतर्गत विशेष रूप से एआई नैतिकता, ड्रोन लॉजिस्टिक्स एवं ब्लॉकचेन-आधारित फिनटेक जैसे क्षेत्रों में 'अनुमति-रहित नवाचार' को सक्षम बनाते हैं।
- 'एज़ाइल गवर्नेंस' मॉडल, जिसमें उद्योग हितधारकों के साथ सह-निर्माण के माध्यम से नियम विकसित किये जाते हैं, को अपनाने से अनुपालन संबंधी विलंब में कमी लाई जा सकती है, जो प्रायः उभरते नवाचारों को बाधित करते हैं।
- यह सक्रिय एवं अनुकूलनशील कानूनी ढाँचा नवप्रवर्तकों को कठोर पारंपरिक विनियमों के तत्काल दबाव से मुक्त रखते हुए उच्च-प्रभावी समाधानों के परीक्षण हेतु सुरक्षित वातावरण प्रदान करता है।
- मिशन-मोड क्रय नीति एवं 'प्रथम-उपयोगकर्त्ता' नीतियाँ: नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करने के लिये सरकार को गवर्नमेंट-एज़-ए-प्लेटफॉर्म (GAAP) आधारित खरीद रणनीति के माध्यम से स्वदेशी नवाचारों के लिये एक लीड कस्टमर (anchor client) की भूमिका निभानी चाहिये।
- 'फर्स्ट-यूजर' नीति को लागू कर, जिसमें राज्य एजेंसियाँ वैश्विक OEM की तुलना में स्थानीय डीप-टेक स्टार्टअप्स से खरीद को प्राथमिकता देती हैं, नवाचारों को प्रारंभिक घरेलू मान्यता एवं विश्वसनीयता प्राप्त होती है।
- यह मिशन-मोड दृष्टिकोण एक पूर्वानुमेय प्रोत्साहन (predictable demand-pull) उत्पन्न करता है, जो विशेष रूप से पूंजी-गहन हार्डवेयर एवं रक्षा-प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में कार्यरत स्टार्टअप्स की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिये आवश्यक है।
- अंतर्विषयी प्रतिभा गतिशीलता तथा ‘रिवर्स ब्रेन-गेन’: भारत को एक वैश्विक नवाचार गतिशीलता ग्रिड की आवश्यकता है जो अकादमिक संस्थानों, राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं और निजी क्षेत्र की अनुसंधान एवं विकास इकाइयों के बीच उच्च स्तरीय शोधकर्त्ताओं के निर्बाध आवागमन को सुगम बनाए।
- वैश्विक प्रवासी विशेषज्ञों को भारतीय सार्वजनिक-निजी परियोजनाओं में पार्श्व प्रवेश प्रदान करने वाली 'नवाचार फैलोशिप' की पेशकश करके, ‘राज्य रिवर्स ब्रेन-गेन’ को प्रोत्साहित कर सकता है।
- यह अंतःविषयक दृष्टिकोण वर्तमान 'पृथक' शिक्षा मॉडल को विघटित करते हुए एक ऐसे कार्यबल का निर्माण करता है, जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता, हार्डवेयर तथा सामाजिक विज्ञान के जटिल अंतर्संबंधों को समग्र रूप से समझने में सक्षम हो।
- सतत एवं चक्रीय 'ग्रीन-टेक' का स्वदेशीकरण: भारत के नवाचार एजेंडा को चक्रीय अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिये, जिसमें अपशिष्ट-से-ऊर्जा, कार्बन कैप्चर तथा जल प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में जलवायु-लचीली प्रौद्योगिकियों को प्राथमिकता दी जाए।
- लघु एवं मध्यम उद्यमों हेतु एक समर्पित ग्रीन-टेक संक्रमण कोष की स्थापना कर, राज्य यह सुनिश्चित कर सकता है कि औद्योगिक आधुनिकीकरण पारिस्थितिक रूप से सतत हो तथा वैश्विक कार्बन-सीमा समायोजन तंत्रों के अनुरूप बना रहे।
- 'मितव्ययी एवं भविष्य-उन्मुख' इंजीनियरिंग पर केंद्रित यह रणनीति भारत को वैश्विक दक्षिण के लिये सतत नवाचार के अग्रणी केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
भारत के नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?
- प्रयोगशाला से बाज़ार तक अंतरण हेतु चतुर्भुज हेलिक्स एकीकरण: भारत को एक चतुर्भुज हेलिक्स मॉडल को संस्थागत रूप देना चाहिये जो औपचारिक रूप से शिक्षा जगत, उद्योग, सरकार और नागरिक समाज को एक निर्बाध 'नवाचार-प्रेरणा' निरंतरता में समेकित करता है।
- विश्वविद्यालयों के भीतर एकीकृत प्रौद्योगिकी तत्परता स्तर (TRL) एक्सीलरेटर स्थापित करके, राज्य अनिवार्य उद्योग-संबंधित कैपस्टोन परियोजनाओं के माध्यम से 'वैली ऑफ डेथ' को नियंत्रित कर सकता है।
- यह संरचनात्मक समन्वय सुनिश्चित करता है कि वैज्ञानिक अनुसंधान केवल प्रकाशन तक सीमित न रहे, बल्कि उसे वाणिज्यिक रूपांतरण और तीव्र औद्योगिक अनुप्रयोग के अनुरूप संयोजित किया जाए ।
- सॉवरेन पेटेंट पूलिंग और मानक आवश्यक पेटेंट (SEP): प्रौद्योगिकी का अंगीकरण करने वाले देश से वैश्विक ट्रेंडसेटर बनने के लिये, भारत को 6G और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसे उभरते क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण IP को हासिल करने, एकत्रित करने तथा उसकी रक्षा करने के लिये एक राष्ट्रीय संप्रभु पेटेंट कोष की आवश्यकता है।
- घरेलू कंपनियों को मानक आवश्यक पेटेंट (SEP) में योगदान देने के लिये सक्रिय रूप से प्रोत्साहित करने से 'रॉयल्टी की बर्बादी' कम होगी तथा वैश्विक व्यापार वार्ताओं में रणनीतिक लाभ मिलेगा।
- प्रमुख नवाचार साझेदारों के साथ 'पेटेंट अभियोजन राजमार्ग' स्थापित करने से स्वदेशी बौद्धिक संपत्तियों के सीमा-पार सत्यापन में और तेज़ी आएगी।
- डीप-टेक एन्युइटी के माध्यम से पेशेंट कैपिटल को प्रोत्साहन: राजकोषीय ढाँचे को लंबी अवधि की विकास अवधि वाली अग्रणी परियोजनाओं के लिये डीप-टेक इनोवेशन बॉण्ड जैसे विशेष कर-प्रोत्साहित निवेश साधनों को पेश करके 'पेशेंट कैपिटल' की ओर उन्मुख करना आवश्यक है।
- सरकार समर्थित फर्स्ट-लॉस गारंटी (FLG) योजनाओं के माध्यम से प्रारंभिक चरण के हार्डवेयर उद्यमों के जोखिम को कम करके, राज्य सेमीकंडक्टर उपकरण और जैव प्रौद्योगिकी जैसे उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में निजी इक्विटी को आकर्षित कर सकता है।
- इससे मौजूदा 'मूल्यांकन-जाल' से बचा जा सकता है, जहाँ स्टार्टअप अल्पकालिक राजस्व-संचालित मापदंडों के लिये दीर्घकालिक अनुसंधान एवं विकास का त्याग कर देते हैं।
- द्वितीय/तृतीय स्तर के भौगोलिक क्षेत्रों में विकेंद्रीकृत नवाचार क्लस्टर: स्टार्टअप अर्थव्यवस्था का लोकतंत्रीकरण करने के लिये, भारत को महानगरीय 'सुपर-क्लस्टर' से हटकर एक हब-एंड-स्पोक क्षेत्रीय नवाचार ढाँचे की ओर बढ़ना चाहिये, जो छोटे शहरों में स्थानीय शक्तियों का लाभ उठाता है।
- विशिष्ट तकनीकों (जैसे कृषि क्षेत्रों में परिशुद्ध कृषि प्रौद्योगिकी या तटीय क्षेत्रों में नीली अर्थव्यवस्था प्रौद्योगिकी) के लिये क्षेत्र-विशिष्ट विशेष आर्थिक क्षेत्र (SSEZ) स्थापित करने से क्षेत्रीय प्रतिभाओं का अप्रयुक्त उपयोग संभव हो सकेगा।
- यह स्थानिक लोकतंत्रीकरण सुनिश्चित करता है कि नवाचार व्यापक आधार वाला, समावेशी और संतृप्त शहरी केंद्रों की लॉजिस्टिक्स संबंधी लागतों के प्रति लचीला हो।
- उभरते प्रौद्योगिकी शासन के लिये नियामक सैंडबॉक्स: राज्य को क्षेत्रीय नियामक सैंडबॉक्स लागू करने चाहिये जो नियंत्रित निगरानी के तहत 'अनुमति रहित नवाचार' में सहायक होते हैं, विशेष रूप से AI एथिक्स, ड्रोन लॉजिस्टिक्स और ब्लॉकचेन-आधारित फिनटेक के लिये।
- 'त्वरित शासन प्रणाली' (जहाँ उद्योग के हितधारकों के साथ मिलकर नियम बनाए जाते हैं) की ओर बढ़ने से अनुपालन में होने वाले विलंब को रोका जा सकता है, जो प्रायः अत्याधुनिक नवाचारों को बाधित करती है।
- यह सक्रिय कानूनी ढाँचा नवप्रवर्तकों को कठोर पुराने कानूनों के तत्काल बोझ के बिना उच्च-प्रभाव वाले समाधानों का परीक्षण करने के लिये आवश्यक 'सुरक्षित आश्रय' प्रदान करता है।
- मिशन-मोड खरीद और 'प्रथम-उपयोगकर्त्ता' नीतियाँ: पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करने के लिये सरकार को स्वदेशी नवाचारों के लिये अनिवार्य गवर्नमेंट-एज़-ए-प्लेटफॉर्म (GaaP) खरीद रणनीति के माध्यम से 'प्रमुख ग्राहक' के रूप में कार्य करना आवश्यक है।
- 'फर्स्ट-यूजर' नीति को लागू करने से, जहाँ राज्य एजेंसियाँ वैश्विक OEM की तुलना में स्थानीय डीप-टेक स्टार्टअप से खरीदारी को प्राथमिकता देती हैं, वैश्विक स्तर पर विस्तार के लिये आवश्यक घरेलू मान्यता मिलती है।
- यह मिशन-मोड दृष्टिकोण एक अनुमानित मांग-पक्षीय आकर्षण उत्पन्न करता है, जो पूंजी-गहन हार्डवेयर और रक्षा-तकनीक क्षेत्रों में काम करने वाले स्टार्टअप को बनाए रखने के लिये आवश्यक है।
- अंतर-विषयक प्रतिभा गतिशीलता और 'रिवर्स ब्रेन-गेन': भारत को एक वैश्विक नवाचार गतिशीलता ग्रिड की आवश्यकता है जो अकादमिक संस्थानों, राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं और निजी क्षेत्र की अनुसंधान एवं विकास इकाइयों के बीच उच्च स्तरीय शोधकर्त्ताओं की निर्बाध आवाजाही को सुगम बनाए।
- भारत में सार्वजनिक-निजी परियोजनाओं में वैश्विक प्रवासी विशेषज्ञों को पार्श्व प्रवेश प्रदान करने वाली 'नवाचार फैलोशिप' की पेशकश करके, राज्य 'प्रतिवर्ती प्रतिभा लाभ' को उत्प्रेरित कर सकता है।
- यह अंतर-विषयक दृष्टिकोण मौजूदा 'पृथक' शिक्षा मॉडल को तोड़ता है, जिससे AI, हार्डवेयर तथा सामाजिक विज्ञान के जटिल अंतर्संबंधों को समझने में सक्षम कार्यबल का विकास होता है।
- सतत और चक्रीय 'ग्रीन-टेक' स्वदेशीकरण: नवाचार एजेंडा को चक्रीय अर्थव्यवस्था सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिये, जिसमें अपशिष्ट-से-ऊर्जा, कार्बन कैप्चर और जल प्रबंधन के लिये जलवायु-अनुकूल समाधान प्रदान करने वाली प्रौद्योगिकियों को प्राथमिकता दी जाए।
- लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिये विशेष रूप से ग्रीन-टेक ट्रांज़िशन फंड स्थापित करके, भारत यह सुनिश्चित कर सकता है कि उसका औद्योगिक आधुनिकीकरण पारिस्थितिक रूप से सुदृढ़ हो तथा वैश्विक स्तर पर कार्बन-सीमा समायोजन तंत्रों के अनुरूप हो।
- 'किफायती होने के साथ-साथ भविष्य के लिये भी उपयुक्त' इंजीनियरिंग पर यह ध्यान केंद्रित करना भारत को ग्लोबल साउथ के लिये सतत नवाचार में एक अग्रणी देश के रूप में स्थापित करता है।
निष्कर्ष:
भारत का एक डिजिटल सेवा प्रदाता से एक संप्रभु उन्नत-प्रौद्योगिकी महाशक्ति की ओर संक्रमण निजी क्षेत्र द्वारा संचालित अनुसंधान एवं विकास तथा संस्थागत ‘पेशेंट कैपिटल’ की दिशा में संरचनात्मक परिवर्तन की आवश्यकता को इंगित करता है।
‘वैली ऑफ डेथ (विकास-अवरोध घाटी)’ को ‘चतुष्कीय समन्वय मॉडल’ के माध्यम से समाप्त करते हुए और मानक-आवश्यक पेटेंटों को सुरक्षित करके भारत अपने विकास को वैश्विक आपूर्ति शृंखला के आघातों से संरक्षित कर सकता है।
अंततः ‘भारत इनोवेट्स’ की सफलता उच्च-स्तरीय प्रौद्योगिकी के क्षेत्रीय केंद्रों में लोकतंत्रीकरण तथा एक नैतिक, अधिकार-आधारित शासन-ढाँचे को सुनिश्चित करने पर निर्भर करती है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न “भारत की नवाचार यात्रा मितव्ययी अनुकूलन से संप्रभु उन्नत-प्रौद्योगिकी निर्माण की ओर परिवर्तित हो रही है।” इस परिवर्तन को प्राप्त करने में ‘डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना’ और ‘भारत कृत्रिम बुद्धिमत्ता मिशन’ की भूमिका का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. ‘भारत इनोवेट्स’ मंच क्या है?
यह एक राष्ट्रीय पहल है, जिसका उद्देश्य भारतीय प्रयोगशालाओं से 100 उच्च-क्षमता वाले उन्नत-प्रौद्योगिकी नवप्रवर्तक उपक्रमों को वैश्विक बाज़ारों तक पहुँचाना है (नीस, फ्राँस, जून 2026)।
2. भारत का सकल घरेलू अनुसंधान व्यय चिंता का विषय क्यों है?
यह सकल घरेलू उत्पाद के 0.64 प्रतिशत पर स्थिर बना हुआ है, जिसमें निजी क्षेत्र का योगदान केवल 40 प्रतिशत है, जो वैश्विक नवाचार अग्रणी देशों की तुलना में अत्यंत कम है।
3. भारत के लिये ‘संप्रभु कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ का क्या अर्थ है?
स्थानीय आँकड़ों और भाषा-आधारित मॉडलों (जैसे: बोधन AI) का उपयोग करते हुए स्वदेशी कृत्रिम बुद्धिमत्ता क्षमताओं का विकास करना, जिससे आँकड़ा संप्रभुता एवं नैतिक शासन सुनिश्चित किया जा सके।
4. ‘वैली ऑफ डेथ (विकास-अवरोध घाटी)’ क्या है?
यह वह अंतराल है, जहाँ नवप्रवर्तक उपक्रम अनुसंधान-आधारित प्रारूप से व्यावसायिक उत्पाद में रूपांतरण के दौरान वित्तपोषण और अवसंरचना की कमी के कारण विफल हो जाते हैं।
5. वर्ष 2026-27 के बजट में अर्द्ध-चालक क्षेत्र को किस प्रकार समर्थन दिया जा रहा है?
‘भारत अर्द्ध-चालक मिशन 2.0’ के माध्यम से, जिसमें उपकरण निर्माण और स्वदेशी बौद्धिक संपदा अभिकल्पना के लिये 1,000 करोड़ रुपये आवंटित किये गए हैं, ताकि आयात-निर्भरता को कम किया जा सके।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न 1. जोखिम पूंजी से क्या तात्पर्य है? (2014)
(a) उद्योगों को उपलब्ध कराई गई अल्पकालीन पूंजी
(b) नये उद्यमियों को उपलब्ध कराई गई दीर्घकालीन प्रारंभिक पूंजी
(c) उद्योगों को हानि उठाते समय उपलब्ध कराई गई निधियाँ
(d) उद्योगों के प्रतिस्थापन एवं नवीकरण के लिये उपलब्ध कराई गई निधियाँ
उत्तर: (b)