विश्व भू-राजनीति में संतुलनकारी शक्ति के रूप में भारत | 11 Mar 2026

यह एडिटोरियल 04/03/2026 को द हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित “In the age of power, India must play peacemaker” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख वर्ष 2026 में पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव तथा परिवर्तित होती शक्ति-समीकरणों की पृष्ठभूमि में वैश्विक मध्यस्थ के रूप में भारत की बहुआयामी भूमिका का विश्लेषण करता है। साथ ही यह आर्थिक निर्भरता और संस्थागत बहिष्कार की संरचनात्मक बाधाओं का विश्लेषण करते हुए भारत को एक विश्वसनीय शांतिदूत के रूप में स्थापित करने के लिये व्यावहारिक उपायों का प्रस्ताव करता है।

प्रिलिम्स के लिये: होर्मुज़ जलडमरूमध्य, iCET पहल, लॉस एंड डैमेज फंड, उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजना, अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA), IMEC कॉरिडोर

मेन्स के लिये: वैश्विक शांति निर्माता के रूप में भारत की भूमिका, प्रमुख चुनौतियाँ और वैश्विक शांति निर्माता के रूप में भारत की भूमिका को सशक्त करने हेतु आवश्यक उपाय।

पश्चिम एशिया में हालिया तनाव, विशेष रूप से अमेरिका और इज़रायल द्वारा ईरान पर किये गए हमले, वैश्विक राजनीति में कठोर शक्ति के पुनरुत्थान को स्पष्ट रूप से रेखांकित करते हैं। इस तीव्रता से ध्रुवीकृत होते अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में विश्वसनीय मध्यस्थों की आवश्यकता पहले की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण हो गई है। सामरिक स्वायत्तता के अपने सिद्धांत, परस्पर प्रतिद्वंद्वी गुटों के साथ संतुलित संबंधों तथा ग्लोबल साउथ में अर्जित विश्वसनीयता के आधार पर भारत एक विशिष्ट कूटनीतिक स्थान रखता है। यह स्थिति भारत को एक संभावित वैश्विक शांतिदूत के रूप में स्थापित करती है, जो संवाद की प्रक्रिया को सुगम बनाने तथा भू-राजनीतिक तनावों को कम करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने की क्षमता रखता है।

परिवर्तनशील वैश्विक शक्ति-परिदृश्य में भारत किस प्रकार एक संतुलनकारी और मध्यस्थकारी शक्ति के रूप में उभर रहा है?

  • ग्लोबल साउथ का प्रतीक और स्वर: पश्चिम के ध्रुवीकरणकारी वित्तीय वर्चस्व और चीन की ऋण-जाल कूटनीति के बीच, भारत ग्लोबल साउथ के आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों का सशक्त रूप से समर्थन करता है। वैश्विक मंचों पर विकासशील देशों की शिकायतों और चिंताओं को प्रभावी रूप से व्यक्त करके भारत एक अधिक संतुलित और न्यायसंगत अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को प्रोत्साहित करता है, जिससे उत्तर–दक्षिण के बीच उत्पन्न होने वाले तनाव में मूलतः कमी आती है।
    • इस प्रकार की सक्रिय कूटनीति संरचनात्मक आर्थिक असमानताओं को संभावित संघर्ष के स्रोत में परिवर्तित होने से रोकते हुए उन्हें संवाद तथा शांतिपूर्ण कूटनीतिक विमर्श के एजेंडा में रूपांतरित करने में सहायक सिद्ध होती है।
    • अपनी G20 अध्यक्षता के दौरान भारत ने सफलतापूर्वक अफ्रीकी संघ को इस समूह में सम्मिलित कराया, जिससे 1.4 अरब लोगों की भू-राजनीतिक आवाज़ को प्रत्यक्ष रूप से सशक्त किया गया।
      • इसके अतिरिक्त भारत ने लगातार संप्रभु ऋण के पुनर्गठन की आवश्यकता पर बल दिया है, जिससे वर्तमान में 60 से अधिक विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित कर रही गंभीर वित्तीय अस्थिरता का सामना किया जा सके।
  • डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) एक सौम्य शक्ति के रूप में: भारत अपने ‘इंडिया स्टैक’ (UPI, Aadhaar) को मुक्त-स्रोत और गैर-शोषणकारी मॉडल के रूप में निर्यात कर रहा है, जो पश्चिम और चीन के स्वामित्व-आधारित डिजिटल मॉडलों का एक वैकल्पिक ढाँचा प्रस्तुत करता है। प्रौद्योगिकी का यह लोकतंत्रीकरण विकासशील देशों की वित्तीय प्रणालियों को स्थिर बनाता है तथा उन्हें डिजिटल एकाधिकारों के प्रति कम-से-कम संवेदनशील बनाता है।
    • उदाहरण के लिये भारत ने अपने UPI नेटवर्क को सफलतापूर्वक संयुक्त अरब अमीरात (Aani), नेपाल तथा नामीबिया के साथ जोड़ा है। इसके अतिरिक्त ‘वैक्सीन मैत्री’ पहल के अंतर्गत पहले ही 100 देशों को 30 करोड़ से अधिक वैक्सीन खुराकें उपलब्ध कराई जा चुकी हैं, जिससे भारत की ‘मानव-केंद्रित’ नेतृत्व क्षमता सुदृढ़ हुई है।
  • पश्चिम एशिया में रणनीतिक ‘विभाजन’ और मध्यस्थता: भारत ने रणनीतिक विभाजन की नीति में दक्षता प्राप्त कर ली है, जिसके अंतर्गत वह इज़रायल, ईरान और सऊदी अरब जैसे परस्पर प्रतिस्पर्द्धी देशों के साथ एक साथ मज़बूत साझेदारी बनाए रखता है।
    • यह विशिष्ट स्थिति नई दिल्ली को तनाव कम करने के लिये एक तटस्थ ‘बैक-चैनल’ के रूप में कार्य करने की क्षमता प्रदान करती है, विशेषकर ऐसे समय में जब प्रत्यक्ष सैन्य तनाव के दौरान पश्चिमी मध्यस्थता को प्रायः संदेह की दृष्टि से देखा जाता है।
      • उदाहरणस्वरूप फरवरी 2026 में भारतीय प्रधानमंत्री ने इज़रायल के साथ संबंधों को ‘विशेष रणनीतिक साझेदारी’ के स्तर तक उन्नत किया। वहीं दूसरी ओर भारत ने ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह के विकास और प्रबंधन के लिये 10-वर्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किये, जिससे भारत क्षेत्रीय विभाजनों के बीच गहन संस्थागत विश्वास रखने वाली एकमात्र शक्ति बना हुआ है।
  • यूरेशिया संघर्ष में विश्वसनीय मध्यस्थता: भारत ने मॉस्को और कीव दोनों के साथ उच्च स्तरीय विश्वास बनाए रखकर एक शांति स्थापत्यकार (Peace Architect) की भूमिका निभाई है तथा एक ऐसा तटस्थ मंच प्रदान किया है, जो पश्चिमी शक्तियों के पास प्रायः उपलब्ध नहीं होता।
    • भारत द्वारा व्यापार को राजनीतिक हथियार के रूप में उपयोग न करने की नीति ने उसे मानवीय और कूटनीतिक ‘बैक-चैनल’ संवाद के लिये एक प्रभावी मध्यस्थ बनने में सहायता प्रदान की है।
    • वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के नवीनतम आँकड़ों के अनुसार जनवरी 2026 में भारत ने रूस से 1.98 अरब डॉलर का कच्चा तेल आयात किया
    • दूसरी ओर यूक्रेन की तेल बाज़ार विश्लेषण संस्था नाफ्टोरिनोक के अनुसार जुलाई 2025 में यूक्रेन के कुल डीज़ल आयात का 15.5% भारत से आया, जो किसी भी देश द्वारा प्रदान की गई सबसे अधिक हिस्सेदारी थी।
      • इसके साथ ही भारतीय प्रधानमंत्री ने अंतर्राष्टीय शांति सम्मेलनों में सक्रिय रूप से भाग लेते हुए लगातार यह संदेश दिया है कि “यह युद्ध का युग नहीं है।”
  • हिंद-प्रशांत क्षेत्र में प्रमुख सुरक्षा प्रदाता: हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती समुद्री आक्रामकता और क्षेत्रीय अस्थिरता के परिप्रेक्ष्य में भारत एक महत्त्वपूर्ण स्थिरीकरण और संतुलनकारी शक्ति के रूप में उभर रहा है। क्षेत्रीय लोकतांत्रिक देशों के साथ नौसैनिक अंतर-संचालनीयता को सुदृढ़ बनाकर भारत औपचारिक और कठोर सैन्य गठबंधनों का सहारा लिये बिना ही एकतरफा आक्रामकता को निरुत्साहित करता है। 
    • यह सक्रिय समुद्री नीति नौवहन की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करती है तथा महत्त्वपूर्ण वैश्विक व्यापार गलियारों को दमनकारी भू-राजनीतिक दबावों से सुरक्षित बनाए रखती है। सामूहिक समुद्री क्षेत्र जागरूकता को सुदृढ़ करने के लिये भारत क्वाड भागीदारों के साथ मालाबार अभ्यास जैसे जटिल संयुक्त नौसैनिक अभियानों का नियमित आयोजन करता है। 
      • हाल के समय में भारतीय नौसेना ने अरब सागर तथा अदन की खाड़ी में युद्धपोतों की सफल तैनाती कर समुद्री डाकुओं की गतिविधियों को विफल किया तथा वाणिज्यिक जहाज़ों को ड्रोन आधारित असममित खतरों से सुरक्षा प्रदान की।
  • वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के शस्त्रीकरण के जोखिम को कम करना: जैसे-जैसे वैश्विक शक्तियाँ प्रौद्योगिकी और व्यापार को रणनीतिक उपकरण के रूप में उपयोग कर रही हैं, भारत अनुकूल और वैकल्पिक आपूर्ति शृंखलाओं के निर्माण की दिशा में सक्रिय प्रयास कर रहा है ताकि वैश्विक भू-राजनीतिक दबावों और आर्थिक ब्लैकमेल की संभावनाओं को कम किया जा सके। 
    • स्वयं को एक विश्वसनीय और लोकतांत्रिक विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करते हुए नई दिल्ली उन एकाधिकारवादी निर्भरताओं को कम करने में योगदान दे रही है, जो प्रायः वैश्विक व्यापार संघर्षों को जन्म देती हैं। यह आर्थिक कूटनीति एकतरफा प्रतिबंधों की विनाशकारी क्षमता को सीमित करती है तथा सहयोगात्मक और विकेंद्रीकृत वैश्विक विकास को प्रोत्साहित करती है। 
    • भारत की उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं ने अरबों डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आकर्षित किया है, जिससे सेमीकंडक्टर और फार्मास्यूटिकल्स जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में घरेलू विनिर्माण को उल्लेखनीय बढ़ावा मिला है। 
      • परिणामस्वरूप एप्पल जैसी प्रमुख प्रौद्योगिकी कंपनियों ने अपने वैश्विक iPhone उत्पादन का लगभग 25% भारत में स्थानांतरित कर दिया है, जिससे पूर्वी एशिया के अस्थिर विनिर्माण केंद्रों पर निर्भरता में उल्लेखनीय कमी आई है।
  • वैश्विक जलवायु कूटनीति में मध्यस्थ: जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर भारत विकसित और विकासशील देशों के बीच विद्यमान विश्वास की कमी को दूर करने में एक महत्त्वपूर्ण मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। सामूहिक हरित पहलों में अग्रणी भूमिका निभाते हुए भारत ‘सामान्य किंतु विभेदित उत्तरदायित्व’ के सिद्धांत का समर्थन करता है, ताकि जलवायु नीतियाँ विकासशील और गरीब देशों के आर्थिक विकास में बाधा न उत्पन्न करें। 
    • इस प्रकार की संतुलित पर्यावरणीय कूटनीति ‘जलवायु साम्राज्यवाद’ जैसी संभावित प्रवृत्तियों को वैश्विक संघर्ष का नया केंद्र बनने से रोकने का प्रयास करती है। भारत के नेतृत्व में स्थापित अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) में वर्तमान में 100 से अधिक सदस्य देश सम्मिलित हैं, जो सुलभ नवीकरणीय ऊर्जा निवेश में अरबों डॉलर की भागीदारी कर रहे हैं। 
    • इसके अतिरिक्त जलवायु परिवर्तन से प्रभावित देशों के लिये लॉस एंड डैमेज फंड के संचालन हेतु भारत के सतत प्रयासों के परिणामस्वरूप 700 मिलियन डॉलर से अधिक की प्रारंभिक वैश्विक प्रतिबद्धताएँ प्राप्त हुई हैं। 
      • साथ ही भारत ने महत्त्वपूर्ण COP वार्ताओं में कोयले के पूर्ण उन्मूलन के स्थान पर इसके चरणबद्ध उपयोग में कमी का समर्थन करते हुए संतुलित ऊर्जा संक्रमण की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है।
  • बहुपक्षीय संस्थागत सुधार के लिये उत्प्रेरक: भारत यह मानता है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद निर्मित संस्थाएँ वर्तमान वैश्विक संघर्षों का प्रभावी प्रबंधन करने में पर्याप्त नहीं हैं। इसलिये भारत वैश्विक शासन की लोकतांत्रिक पुनर्संरचना का लगातार समर्थन करता है।
    • संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) और विश्व व्यापार संगठन (WTO) में संरचनात्मक सुधार की मांग करते हुए नई दिल्ली ऐसे ढाँचे स्थापित करना चाहती है जो वर्तमान बहुध्रुवीय शक्ति-संतुलन को यथार्थ रूप से प्रतिबिंबित करें।
    • इस सुधारवादी प्रयास का उद्देश्य महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता को एकतरफा युद्ध के बजाय वैध, संरचित और विधिक बहुपक्षीय मंचों की ओर मोड़ना है।
    • भारत G4 देशों के साथ मिलकर 21वीं शताब्दी की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करने हेतु UNSC में स्थायी सदस्यता के लिये निरंतर अभियान चला रहा है।
      • इसी प्रकार WTO में भारत के महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेपों ने खाद्य भंडारण (Public Stockholding) की व्यवस्था को सुरक्षित रखा है, जिससे करोड़ों किसानों की आजीविका और खाद्य सुरक्षा की रक्षा संभव हुई है।
  • मानवीय सहायता का अग्रदूत तथा सॉफ्ट पावर का संवाहक: भारत संकट के समय त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता का उपयोग करते हुए बिना किसी शर्त के मानवीय सहायता प्रदान करता है, जिससे पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी क्षेत्रों में भी व्यापक सद्भावना उत्पन्न होती है।
    • राज्य संसाधनों का यह गैर-दबावकारी उपयोग गहन रणनीतिक विश्वास का निर्माण करता है तथा संकट के समय क्षेत्रीय तनाव को प्रभावी रूप से कम करता है।
    • उदाहरण के लिये फरवरी 2023 में तुर्किये और सीरिया में आए विनाशकारी भूकंप के बाद भारत ने ‘ऑपरेशन दोस्त’ प्रारंभ कर व्यापक राहत सहायता प्रदान की।
    • इसी प्रकार वर्ष 2024 में ‘ऑपरेशन सद्भाव’ के माध्यम से भारत ने लाओस, म्यांमार और वियतनाम को मानवीय सहायता और आपदा राहत (HADR) उपलब्ध कराई।
    • इस प्रकार सहानुभूति और कुशल लॉजिस्टिक क्षमता के साथ नेतृत्व करते हुए भारत यह प्रदर्शित करता है कि शक्ति का प्रदर्शन स्वभावतः स्थिरता प्रदान करने वाला, सहयोगात्मक तथा जीवनरक्षक भी हो सकता है।

परिवर्तनशील वैश्विक शक्ति-संतुलन में विश्वसनीय वैश्विक मध्यस्थ बनने में भारत के समक्ष कौन-सी बाधाएँ हैं?

  • महाशक्ति संबंधों में लेन-देन आधारित दृष्टिकोण: जैसे-जैसे वैश्विक व्यवस्था अधिक लेन-देन आधारित (Transactional) होती जा रही है, भारत पर अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे साझेदारों की ओर से यह दबाव बढ़ रहा है कि वह रणनीतिक स्वायत्तता की नीति से आगे बढ़कर स्पष्ट रूप से किसी एक गुट के साथ संरेखण करे।
    • यह तथाकथित ‘चयन का दबाव’ (Choice Pressure) भारत की तटस्थ स्थिति को चुनौती देता है, क्योंकि पश्चिमी सहयोगी प्रायः नई दिल्ली के मध्यस्थता प्रयासों को प्रतिबंधित देशों के साथ लाभकारी संबंध बनाए रखने की रणनीति के रूप में देखते हैं।
    • परिणामस्वरूप यह संवेदनशील संतुलन भारत की अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता में निर्णायक और कभी-कभी जोखिमपूर्ण रुख अपनाने की क्षमता को सीमित कर देता है।
      • उदाहरणस्वरूप, भारत यूक्रेन में रूस की कार्रवाइयों की आलोचना से संबंधित संयुक्त राष्ट्र के अनेक प्रस्तावों पर मतदान से विरत रहा है। साथ ही अमेरिका के साथ iCET पहल को और अधिक गहरा करते हुए उसने सहयोग को आगे बढ़ाया है, जिससे प्राथमिकताओं के विभाजन की वह दुविधा स्पष्ट होती है जो उसकी ‘तटस्थशांतिदूत की भूमिका को जटिल बनाती है।
  • पड़ोसी देशों के साथ बढ़ती शत्रुता: भारत की वैश्विक शांति स्थापना की आकांक्षाएँ प्रायः ‘पड़ोसी देशों के संबंधों के अभिशाप’ से प्रभावित होती हैं, जहाँ पाकिस्तान और चीन के साथ लंबे समय से अनसुलझे सीमा विवाद उसकी रणनीतिक क्षमता को सीमित कर देते हैं। 
    • आलोचकों का मत है कि जो राष्ट्र अपने निकटवर्ती क्षेत्र में स्थिरता स्थापित करने में कठिनाई का सामना कर रहा हो, उसकी पश्चिम एशिया अथवा यूरोप जैसे दूरस्थ क्षेत्रों में संघर्ष प्रबंधन की क्षमता को लेकर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में संदेह उत्पन्न हो सकता है। 
    • अपनी सीमाओं पर ‘ग्रे-ज़ोन युद्ध’ की निरंतरता भारत को वैश्विक कूटनीतिक सक्रियता की अपेक्षा क्षेत्रीय अखंडता को प्राथमिकता देने के लिये विवश करती है, जिससे अपेक्षाकृत अधिक अंतर्मुखी सुरक्षा नीति अपनाने की प्रवृत्ति उभरती है। 
    • ऑपरेशन सिंदूर (2025) तथा वर्ष 2020 में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर 50,000 से अधिक सैनिकों की तैनाती यह दर्शाती है कि अनेक अवसरों पर घरेलू ‘आपातकालीन स्थिति से निपटना’ वैश्विक ‘शांति स्थापना’ की अपेक्षा अधिक तात्कालिक प्राथमिकता बन जाता है।
  • संस्थागत क्षमता और राजनयिक अपर्याप्तता: वैश्विक स्तर पर ‘नीति-निर्माता’ (Global Shaper) बनने की भारत की आकांक्षा उसके अपेक्षाकृत कम आकार के कूटनीतिक तंत्र के कारण सीमित हो जाती है। 
    • भारत की राजनयिक सेवा विश्व की सबसे कम कर्मचारियों वाली सेवाओं में से एक मानी जाती है, जिसके पास बहु-क्षेत्रीय मध्यस्थता के लिये आवश्यक पर्याप्त मानव संसाधन नहीं हैं।
    • विदेश सेवा में व्यापक विस्तार के अभाव में भारत के लिये अपने तत्काल क्षेत्र से बाहर जटिल शांति प्रक्रियाओं में दीर्घकालिक और सतत उपस्थिति बनाए रखना कठिन हो जाता है।
    • हालिया रिपोर्टों के अनुसार विश्व स्तर पर भारत के लगभग 193 राजनयिक मिशन कार्यरत हैं। फिर भी विश्लेषण बताते हैं कि भारत की वैश्विक भूमिका की तुलना में उसका कूटनीतिक नेटवर्क अभी भी सीमित है। 
      • उदाहरणस्वरूप लोवी इंस्टीट्यूट के अनुसार कुल राजनयिक चौकियों की संख्या के आधार पर भारत 11वें स्थान पर है और अभी भी 50 से अधिक देशों में उसकी कोई राजनयिक उपस्थिति नहीं है।
  • ‘पुरानी विश्व व्यवस्था’ में सीमित संस्थागत प्रभाव: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की स्थायी सदस्यता से भारत का वंचित रहना उसे शांति समझौतों को लागू कराने के लिये आवश्यक वीटो-समर्थित औपचारिक अधिकार से वंचित कर देता है।
    • उच्च निर्णय-स्तर की इस व्यवस्था में स्थान न होने के कारण भारत के मध्यस्थता प्रयास प्रायः परामर्शात्मक अथवा ‘ट्रैक-2’ प्रकृति के रह जाते हैं, जिन्हें उन शक्तियों द्वारा कई बार नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है जिनके पास वैश्विक शासन के वास्तविक विधिक साधन उपलब्ध हैं। 
    • यह संस्थागत बहिष्करण भारत को व्यवस्था के भीतर कार्य करने के बजाय कई बार उसके बाहर पहल करने के लिये बाध्य करता है, जिसे कुछ विश्लेषक स्थिरता प्रदान करने के बजाय संशोधनवादी दृष्टिकोण के रूप में भी देख सकते हैं।
  • आंतरिक ‘विकास बनाम भू-राजनीति’ की दुविधा: एक विकासशील अर्थव्यवस्था होने के कारण भारत को घरेलू गरीबी उन्मूलन में निवेश करने तथा वैश्विक शक्ति-प्रदर्शन से संबंधित महँगी व्यवस्थाओं को वित्तपोषित करने के बीच निरंतर संतुलन स्थापित करना पड़ता है। 
    • भारत की वर्तमान प्रति व्यक्ति GDP लगभग 3,000 डॉलर से कम है, जो चीन या अमेरिका जैसे अन्य संभावित वैश्विक मध्यस्थों की तुलना में काफी कम है। 
    • शांति स्थापना के लिये विदेशी सहायता, पुनर्निर्माण और शांतिरक्षा अभियानों के लिये महत्त्वपूर्ण वित्तीय व्यय की आवश्यकता होती है, जिसे मुद्रास्फीति और बेरोज़गारी का सामना कर रहे घरेलू मतदाताओं के लिये अक्सर उचित ठहराना कठिन होता है। 
      • इस प्रकार की ‘गन बनाम बटर’ की बहस के परिणामस्वरूप भारत की वैश्विक भूमिका प्रायः ‘सॉफ्ट पावर में सशक्त’ किंतु ‘कठोर संसाधनों (सैन्य, आर्थिक एवं तकनीकी जैसी प्रत्यक्ष शक्ति के साधनों) में सीमित’ प्रतीत होती है, जिसके कारण ज़मीनी स्तर पर उसके वास्तविक प्रभाव का दायरा सीमित रह जाता है।
  • ऊर्जा निर्भरता की बाधा: पश्चिम एशिया में भारत की शांति-स्थापक भूमिका उसके ऊर्जा आयात पर अत्यधिक निर्भरता के कारण जटिल हो जाती है। विश्व के प्रमुख ऊर्जा आयातकों में से एक होने के कारण उसकी तटस्थता कई बार आवश्यकता जैसी प्रतीत होती है। 
    • खाड़ी क्षेत्र में संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होने पर भारत की प्राथमिकता प्रायः तेल आपूर्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर केंद्रित रहती है, न कि संघर्षरत पक्षों के बीच विद्यमान गंभीर राजनीतिक मतभेदों के समाधान पर।
    • यह व्यावहारिक अथवा लेन-देन आधारित दृष्टिकोण भारत की नैतिक विश्वसनीयता को कुछ हद तक कम कर सकता है, विशेषकर तब जब वह प्रतिबंधित देशों के साथ भी व्यापार जारी रखता है।
      • उदाहरण के लिये भारत के कच्चे तेल आयात का लगभग 40–50% हिस्सा होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है, जो वर्ष 2026 में ईरान–इज़रायल तनाव के कारण अत्यंत संवेदनशील बना हुआ है और जिसके समाधान की दिशा में भारत प्रयास कर रहा है।
  • संरचनात्मक रक्षा निर्भरता और रणनीतिक संवेदनशीलता: एक विश्वसनीय शांतिदूत के लिये युद्धरत गुटों के दबावों का सामना करने हेतु पर्याप्त तकनीकी तथा सैन्य आत्मनिर्भरता आवश्यक होती है। 
    • हालाँकि भारत की विदेशी रक्षा उपकरणों पर उल्लेखनीय निर्भरता एक प्रकार का ‘निर्भरता जाल’ उत्पन्न करती है।
    • SIPRI के आँकड़ों के अनुसार भारत अब भी विश्व का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक देश है। यह स्थिति कई बार नई दिल्ली के लिये प्रमुख हथियार आपूर्तिकर्त्ता देशों के विरुद्ध कठोर रुख अपनाना कठिन बना देती है, विशेषकर तब जब उनके कदम अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों के उल्लंघन से संबंधित हों।

विश्वसनीय वैश्विक शांतिदूत के रूप में भारत अपनी भूमिका को किस-प्रकार सुदृढ़ कर सकता है?

  • कूटनीतिक क्षमता और संस्थागत पहुँच का विस्तार: भारत को अपनी राजनयिक कमी को दूर करने के लिये भारतीय विदेश सेवा (IFS) का पर्याप्त विस्तार करना चाहिये तथा मध्यस्थता और वैश्विक शासन से संबंधित विशेष प्रकोष्ठों की स्थापना करनी चाहिये। 
    • बैक-चैनल कूटनीति’ से संबंधित इकाइयों को संस्थागत रूप प्रदान करके नई दिल्ली अपनी पारंपरिक राजनयिक क्षमता को प्रभावित किये बिना यूरेशिया और पश्चिम एशिया में शांति प्रक्रियाओं को बनाए रखने का लक्ष्य प्राप्त कर सकती है। 
    • इस प्रकार शांति स्थापना की प्रक्रिया में प्रतिक्रियात्मक दृष्टिकोण के स्थान पर सक्रिय भूमिका निभाने हेतु भारत को अधिक व्यापक और विशिष्ट राजनयिक दल की आवश्यकता है।
  • वैकल्पिक विवाद समाधान संरचनाओं का संस्थागतकरण: भारत को अपने तदर्थ मध्यस्थता प्रयासों को औपचारिक स्वरूप प्रदान करते हुए संघर्ष समाधान और ट्रैक-1.5 कूटनीति के लिये एक स्थायी तथा राज्य समर्थित संस्थागत ढाँचा स्थापित करना चाहिये। 
    • क्षेत्रीय विशेषज्ञता से युक्त शांति दूतों का एक विशेष दल तैयार करने से नई दिल्ली को ध्रुवीकृत पश्चिमी अथवा पूर्वी शक्ति केंद्रों से परे तटस्थ मध्यस्थता के लिये एक वैकल्पिक मंच उपलब्ध कराने में सहायता मिलेगी। 
    • यह सुनियोजित दृष्टिकोण भारत को एक प्रतिक्रियाशील संकट प्रबंधक के स्थान पर शांति के सतत निर्माता के रूप में रूपांतरित कर सकता है, जो आवश्यकता पड़ने पर गोपनीय वार्ताओं को सुगम बनाने में सक्षम हो।
  • रक्षा और प्रौद्योगिकी के स्वदेशीकरण में तीव्रता: निष्पक्ष शांति स्थापना की क्षमता को सुदृढ़ करने के लिये भारत को विदेशी सैन्य उपकरणों तथा महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों पर अपनी असंतुलित निर्भरता को क्रमिक रूप से समाप्त करना चाहिये।
    • रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण को सुदृढ़ करने से नई दिल्ली को आपूर्ति शृंखलाओं के शस्त्रीकरण और युद्धरत गुटों द्वारा लगाए जाने वाले संभावित एकतरफा प्रतिबंधों से सुरक्षा मिलती है। ऐसी संप्रभु क्षमता भारतीय राजनयिकों को अचानक उत्पन्न होने वाले भू-राजनीतिक दबावों या ब्लैकमेल की आशंका से मुक्त होकर वार्ताओं में भाग लेने के लिये आवश्यक मनोवैज्ञानिक तथा रणनीतिक लाभ प्रदान करती है। 
    • अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था को बाह्य निर्भरताओं से पृथक करके भारत वैश्विक समुदाय की दृष्टि में अपनी गुटनिरपेक्ष विश्वसनीयता को और अधिक सुदृढ़ कर सकता है। परिणामस्वरूप आत्मनिर्भर सैन्य क्षमता एक अधिक स्वतंत्र, मुखर और सिद्धांत-आधारित विदेश नीति को बल प्रदान करती है, जो वैश्विक स्थिरता की दिशा में कार्य करती है।
  • मानवीय सुरक्षा के अग्रिम प्रक्षेपण की व्यवस्था: एक सक्रिय नेट सुरक्षा प्रदाता के रूप में उभरने के लिये भारत को महत्त्वपूर्ण समुद्री और स्थलीय गलियारों में अग्रिम रूप से तैनात मानवीय सहायता और आपदा राहत (HADR) तंत्र को संस्थागत रूप देना चाहिये। 
    • मित्र देशों में त्वरित प्रतिक्रिया वाले लॉजिस्टिक नोड्स की स्थापना के माध्यम से भारत संकटों के पूर्ण पैमाने के संघर्ष में परिवर्तित होने से पहले ही जीवनरक्षक स्थिरीकरण बलों की तैनाती कर सकता है। 
    • शक्ति का यह गैर-सैन्य, मानवीय प्रदर्शन रणनीतिक विश्वास को सुदृढ़ करता है तथा उन शून्यों को भरने में सहायक होता है जिनका दुरुपयोग प्रायः शत्रुतापूर्ण अथवा संशोधनवादी शक्तियाँ करती हैं। 
    • वैश्विक साझा संसाधनों की सुरक्षा तथा संवेदनशील आबादी की रक्षा करने की क्षमता का प्रभावी प्रदर्शन भारत की भूमिका को केवल एक क्षेत्रीय शक्ति तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे मानव सुरक्षा के वैश्विक संरक्षक के रूप में स्थापित करने की दिशा में अग्रसर करता है।
  • विषय-आधारित शासन के लिये मिनीलेटरल गठबंधनों का निर्माण: चूँकि पारंपरिक बहुपक्षीय संस्थाएँ महाशक्तियों के वीटो के कारण कई बार निष्क्रिय हो जाती हैं, इसलिये भारत को विषय-विशिष्ट और लचीले मिनीलेटरल गठबंधनों को प्रोत्साहित करना चाहिये।
    • समुद्री सुरक्षा, साइबर स्पेस विनियमन और जलवायु लचीलापन जैसे क्षेत्रों में मध्य-स्तरीय शक्तियों के गठबंधन बनाकर भारत पारंपरिक संस्थागत अवरोधों को पार कर सकता है।
    • ऐसी कूटनीतिक संरचनाएँ त्वरित और सर्वसम्मति-आधारित निर्णयों को संभव बनाती हैं, जिससे स्थानीय विवादों को वैश्विक संकट में परिवर्तित होने से रोका जा सकता है।
    • यह रणनीति वैश्विक समस्याओं के समाधान की प्रक्रिया को लोकतांत्रिक बनाती है और उभरती बहुध्रुवीय व्यवस्था में भारत की नेतृत्व भूमिका को सुदृढ़ करती है।
  • भू-राजनीतिक क्षेत्रों में अग्रणी मानक-निर्धारण: भविष्य के संभावित वैश्विक संघर्षों की आशंका को कम करने के लिये भारत को कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष सैन्यीकरण और स्वायत्त युद्ध प्रणालियों जैसे उभरते एवं अपेक्षाकृत अनियंत्रित क्षेत्रों में मानक-निर्धारण प्रक्रियाओं में सक्रिय नेतृत्वकारी भूमिका निभानी चाहिये।
    • इन विघटनकारी प्रौद्योगिकियों के उपयोग को नियंत्रित करने वाली मूलभूत संधियों और नैतिक ढाँचों के निर्माण में अग्रणी योगदान देकर नई दिल्ली विनाशकारी तकनीकी हथियारों की संभावित प्रतिस्पर्द्धा को प्रारंभिक स्तर पर ही नियंत्रित करने में सहायक हो सकती है। 
    • इस दूरदर्शी कूटनीति के लिये वैज्ञानिक समुदाय को विदेश नीति के केंद्रीय ढाँचे से जोड़ना आवश्यक होगा, ताकि न्यायसंगत और शांतिपूर्ण नियमों का निर्माण किया जा सके।
    • इस प्रकार भारत केवल वर्तमान क्षेत्रीय विवादों के प्रबंधन तक सीमित न रहकर भविष्य की वैश्विक व्यवस्था के शांतिपूर्ण शासन का स्थापत्यकार बनने की दिशा में अग्रसर हो सकता है।
  • सभ्यतागत लोकाचार को कूटनीतिक सिद्धांत में क्रियान्वित करना: लेन-देनवादी महाशक्तियों से अपनी विशिष्टता स्थापित करने के लिये भारत को बहुलवाद और अहिंसा पर आधारित अपने सभ्यतागत दर्शन को एक व्यवस्थित और आधुनिक कूटनीतिक सिद्धांत के रूप में औपचारिक रूप से संहिताबद्ध करना चाहिये। 
    • इस प्रक्रिया में वैश्विक नातेदारी (Universal Kinship) की प्राचीन अवधारणाओं को ऐसे मानकीकृत संघर्ष-समाधान तंत्रों में परिवर्तित किया जा सकता है, जो दंडात्मक प्रतिबंधों के बजाय पुनर्स्थापनात्मक न्याय को प्राथमिकता दें।
    • अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में प्रचलित शून्य-योग यथार्थवाद के स्थान पर एक नैतिक और संतुलित वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करके भारत वैश्विक सुलह एवं सहयोग का एक विशिष्ट मार्ग प्रदान कर सकता है।
    • अंततः यह दृष्टिकोण वैश्विक शांति-स्थापना की अवधारणा को पुनर्परिभाषित करते हुए भारत को अधिक सामंजस्यपूर्ण और स्थायी विश्व व्यवस्था का प्रमुख स्थापत्यकार बना सकता है।

निष्कर्ष: 

एक प्रतिक्रियाशील क्षेत्रीय शक्ति से सक्रिय वैश्विक शांतिदूत के रूप में भारत का विकास इस बात पर निर्भर करता है कि वह संरचनात्मक आर्थिक निर्भरताओं तथा संस्थागत बहिष्कार जैसी बाधाओं से किस प्रकार ऊपर उठता है। अपनी विशिष्ट रणनीतिक स्वायत्तता और सभ्यतागत मूल्यों का उपयोग करते हुए भारत प्रतिस्पर्द्धी शक्ति-गुटों के बीच बढ़ते हुए अंतराल को समाप्त करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। तथापि इस कूटनीतिक प्रयास की अंतिम सफलता के लिये रक्षा स्वदेशीकरण तथा वैचारिक संप्रभुता के क्षेत्र में घरेलू स्तर पर समन्वित प्रगति अनिवार्य है। कठोर शक्ति की पुनरावृत्ति के इस दौर में भारत का ‘मध्यम मार्ग’ एक स्थिर और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की स्थापना के लिये सर्वाधिक व्यावहारिक खाका प्रस्तुत करता है। 

दृष्टि मेन्स प्रश्न 

"भारत को वैश्विक शांतिदूत बनने के लिये, उसे पहले अपने आसपास के क्षेत्रों में शांति स्थापित करनी होगी।" पड़ोसी देशों की शत्रुता और दोतरफा खतरों का भारत की वैश्विक कूटनीतिक आकांक्षाओं पर पड़ने वाले प्रभाव की चर्चा कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न 

प्रश्न 1. विदेश नीति में भारत की "रणनीतिक स्वायत्तता" से क्या तात्पर्य है? 
इसका तात्पर्य किसी भी शक्ति गुट के साथ औपचारिक रूप से गठबंधन किये बिना अंतर्राष्ट्रीय मामलों में स्वतंत्र निर्णय लेने के भारत के दृष्टिकोण से है, जिससे उसे एक साथ अनेक प्रतिस्पर्द्धी शक्तियों के साथ बातचीत करने की अनुमति मिलती है।

प्रश्न 2. वर्तमान भू-राजनीतिक व्यवस्था में भारत को संभावित वैश्विक शांतिदूत क्यों माना जाता है?
भारत अमेरिका, रूस, इज़रायल, ईरान और खाड़ी देशों जैसी प्रतिस्पर्द्धी शक्तियों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखता है, साथ ही ग्लोबल साउथ में भी इसकी विश्वसनीयता है, जिससे यह संवाद और तनाव कम करने में सहायक होता है।

प्रश्न 3. भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता में किस प्रकार योगदान देता है? 
भारत नौसैनिक सहयोग, समुद्री सुरक्षा पहलों और मालाबार अभ्यास जैसे संयुक्त अभ्यासों के माध्यम से एक प्रमुख सुरक्षा प्रदाता के रूप में कार्य करता है, ताकि नौवहन की स्वतंत्रता और सुरक्षित वैश्विक व्यापार मार्गों को सुनिश्चित किया जा सके।

प्रश्न 4. वैश्विक शांतिदूत के रूप में भारत की भूमिका को सीमित करने वाली प्रमुख बाधाएँ क्या हैं?
प्रमुख बाधाओं में पड़ोसी देशों के साथ संघर्ष, सीमित राजनयिक क्षमता, ऊर्जा आयात पर निर्भरता, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का अभाव और संरचनात्मक आर्थिक सीमाएँ शामिल हैं।

प्रश्न 5. भारत को एक विश्वसनीय वैश्विक शांति निर्माता के रूप में अपनी भूमिका को सुदृढ़ करने के लिये कौन-से कदम उठाने चाहिये? 
भारत को अपनी राजनयिक क्षमता का विस्तार करने, रक्षा और तकनीकी आत्मनिर्भरता को सुदृढ़ करने, लघुपक्षीय गठबंधनों को बढ़ावा देने, मध्यस्थता तंत्रों को संस्थागत रूप देने और मानवीय कूटनीति और सौम्य शक्ति का निरंतर उपयोग करने की आवश्यकता है।

 

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रिलिम्स:

प्रश्न. कभी-कभी समाचारों में "टू स्टेट सॉल्यूशन" शब्द का उल्लेख किस संदर्भ में किया जाता है? (2018)

(a) चीन
(b) इज़रायल
(c) इराक
(d) यमन

उत्तर: (b)


मेन्स:

प्रश्न. “भारत के इज़रायल के साथ संबंधों ने हाल ही में एक ऐसी गहराई और विविधता हासिल की है, जिसकी पुनर्वापसी नहीं की जा सकती है।” विवेचना कीजिये। (2018)