भारत की विकास यात्रा में डीकार्बोनाइज़ेशन | 25 Feb 2026

यह लेख 23/02/2026 को द हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित 'From budget provision to national capability: Why India’s CCUS commitment matters' शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख भारत की बहुआयामी डीकार्बोनाइज़ेशन रणनीति की समग्र रूपरेखा प्रस्तुत करता है और कोयला आधारित ऊर्जा सुरक्षा तथा प्रौद्योगिकी-आधारित नेट-जीरो औद्योगिक संक्रमण के मध्य अंतर्विरोधों का आलोचनात्मक विश्लेषण करता है।

प्रिलिम्स के लिये: कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CCTS), CCUS, पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना, प्रदर्शन, उपलब्धि और व्यापार (PAT), बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (BESS)

मेन्स के लिये: कार्बन उत्सर्जन कम करने की प्रक्रिया में प्रमुख घटनाक्रम, डीकार्बोनाइज़ेशन  में विद्यमान समस्याएँ और आवश्यक कदम

भारत वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो लक्ष्य प्राप्त करने हेतु बहुआयामी डीकार्बोनाइज़ेशन रणनीति अपना रहा है, जिसका आधार वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता का महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य और वर्ष 2026 में नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के बजट में 24% की वृद्धि है। इस दिशा में राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (वार्षिक 5 मिलियन मीट्रिक टन उत्पादन लक्ष्य) को इस्पात और सीमेंट जैसे कठिन उत्सर्जन-नियंत्रण क्षेत्रों हेतु कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग सिस्टम (CCUS) के अंतर्गत 20,000 करोड़ रुपये की नई वित्तीय प्रतिबद्धता के साथ समेकित किया गया है। वर्ष 2026 के मध्य तक घरेलू कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CCTS) की शुरुआत तथा इलेक्ट्रिक वाहन आपूर्ति शृंखलाओं के लिये रेयर अर्थ कॉरिडोर की स्थापना के माध्यम से भारत साधारण ऊर्जा प्रतिस्थापन से आगे बढ़कर प्रौद्योगिकी-आधारित व्यापक औद्योगिक रूपांतरण की दिशा में अग्रसर है।

भारत अपने विकास पथ के डीकार्बोनाइज़ेशन की दिशा में कौन-से कदम उठा रहा है?

  • भारी उद्योग का डीकार्बोनाइज़ेशन (CCUS): भारत ऊर्जा प्रतिस्थापन से हटकर गहन औद्योगिक परिवर्तन की ओर बढ़ते हुए औद्योगिक उत्सर्जन को कम करने में कठिन चुनौतियों का व्यावहारिक रूप से समाधान कर रहा है।
    • कार्बन कैप्चर, यूटिलाइज़ेशन और स्टोरेज (CCUS) देश को जलवायु संबंधी अनिवार्यताओं के अनुरूप रहते हुए अपने नवीन विनिर्माण परिसंपत्ति आधार को संरक्षित करने की अनुमति देता है। 
    • औद्योगिक गलियारों में क्लस्टर-आधारित कैप्चर संरचनाओं की स्थापना से प्रति-इकाई लागत तथा नियामकीय अवरोध घटते हैं, जबकि आर्थिक वृद्धि प्रभावित नहीं होती। 
    • केंद्रीय बजट 2026–27 में CCUS अवसंरचना के विस्तार और निजी पूंजी के जोखिम न्यूनीकरण हेतु 20,000 करोड़ रुपये का अभूतपूर्व प्रावधान किया गया है।
  • गैर-जीवाश्म ऊर्जा का व्यापक विस्तार: उपयोगिता स्तर पर और विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन क्षमता का तीव्र विस्तार, जीवाश्म ईंधन से आर्थिक विकास को पृथक करने की भारत की रणनीति का आधार है। 
    • देश वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म क्षमता के लक्ष्य की ओर अग्रसर है और कुल नवीकरणीय क्षमता 200 गीगावाट से अधिक हो चुकी है। 
    • वर्ष 2025 के अंत तक, कुल स्थापित विद्युत क्षमता में गैर-जीवाश्म स्रोतों की हिस्सेदारी 51% से अधिक हो गई। 
  • हरित हाइड्रोजन पारितंत्र का विस्तार: हरित हाइड्रोजन को भारी गतिशीलता, उर्वरक तथा परिष्करण क्षेत्रों के डीकार्बोनाइज़ेशन का प्रमुख कारक माना गया है, जहाँ प्रत्यक्ष विद्युतीकरण अपर्याप्त सिद्ध होता है।
    • घरेलू इलेक्ट्रोलाइज़र विनिर्माण और अणु-उत्पादन को भारी सब्सिडी देकर, सरकार भारत को एक प्रमुख वैश्विक हरित निर्यात केंद्र के रूप में स्थापित करना चाहती है।
    • ययह परिवर्तन आयातित LNG और अमोनिया के स्थान पर स्वदेशी स्वच्छ अणुओं को बढ़ावा देकर दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा सुदृढ़ करता है।
    • 19,744 करोड़ रुपये की राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन परियोजना वर्ष 2030 तक 5 मिलियन मीट्रिक टन की वार्षिक उत्पादन क्षमता प्राप्त करने हेतु बड़े पैमाने पर निविदाएँ जारी कर रही है। 
    • साथ ही, नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने दीनदयाल पोर्ट प्राधिकरण (गुजरात), वी.ओ. चिदंबरनार पोर्ट प्राधिकरण (तमिलनाडु) और पारादीप पोर्ट प्राधिकरण (ओडिशा) को राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (NGHM) के अंतर्गत ग्रीन हाइड्रोजन हब के रूप में औपचारिक रूप से मान्यता दी है।
  • कार्बन बाज़ारों के माध्यम से औद्योगिक डीकार्बोनाइज़ेशन : भारत उत्सर्जन में कमी के लिये बाज़ार-आधारित दृष्टिकोण को संस्थागत रूप दे रहा है, जिसके तहत एक घरेलू कैप-एंड-ट्रेड अनुपालन तंत्र स्थापित किया गया है।
    • भारत में कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CCTS) ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कार्बन मूल्य निर्धारण के माध्यम से घटाने हेतु अभिकल्पित एक तंत्र है।
    • सत्यापित उत्सर्जन कटौती का मुद्रीकरण कर, यह प्रणाली निजी पूंजी को सर्वाधिक लागत-प्रभावी डीकार्बोनाइज़ेशन  प्रौद्योगिकियों की ओर प्रवाहित करती है। यह ढाँचा दो धाराओं में विभाजित है- एक अनिवार्य अनुपालन तंत्र और दूसरा ऑफसेट तंत्र
    • जनवरी 2026 तक, भारतीय कार्बन बाज़ार देश के सर्वाधिक उत्सर्जन-गहन उद्योगों में 490 बाध्य इकाइयों को सम्मिलित करता है।
    • भारत सरकार CCTS के अंतर्गत एल्युमिनियम, सीमेंट, रिफाइनरी और पेट्रोकेमिकल्स सहित प्रमुख कार्बन-गहन क्षेत्रों के लिये ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन तीव्रता (GEI) लक्ष्य अधिसूचित कर रही है, जिससे भारतीय कार्बन बाज़ार के अनुपालन ढाँचे का विस्तार हो रहा है। 
  • ई-मोबिलिटी और बैटरी आपूर्ति शृंखलाओं का संवर्द्धन: सतही परिवहन का विद्युतीकरण शहरी गतिशीलता को पुनर्संरचित करते हुए आयातित कच्चे तेल पर संरचनात्मक निर्भरता घटा रहा है। 
    • आपूर्ति-पक्ष के उत्पादन-प्रोत्साहन और मांग-पक्ष की सब्सिडियाँ परस्पर पूरक बनकर दोपहिया तथा वाणिज्यिक बेड़ों के तीव्र अंगीकरण को प्रोत्साहित कर रही हैं।
    • घरेलू बैटरी आपूर्ति शृंखलाओं में समानांतर निवेश, महत्त्वपूर्ण खनिज निर्भरताओं से जुड़े भू-राजनीतिक जोखिमों को सीमित करता है और स्वदेशी विनिर्माण को सुदृढ़ करता है।
    • पीएम ई-ड्राइव योजना जैसी निरंतर पहलों के कारण वर्ष 2030 तक कुल वाहन बिक्री में इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी 30% तक पहुँचने के लक्ष्य को प्राप्त करने में मदद मिल रही है। 
    • उन्नत रसायन सेल (ACC) बैटरी निर्माण क्षमता को ₹18,100 करोड़ की समर्पित PLI योजना के अंतर्गत तीव्रता से विस्तारित किया जा रहा है।
  • ग्रिड ऊर्जा भंडारण अवसंरचना का संवर्द्धन: उपयोगिता-स्तर की नवीकरणीय ऊर्जा की अंतर्निहित अनिश्चितताओं को संतुलित करने के लिये चौबीसों घंटे चलने वाली ग्रिड स्थिरीकरण अवसंरचना और उन्नत पीक-लोड शिफ्टिंग क्षमताओं की आवश्यकता होती है। 
    • नीतिगत ध्यान तेज़ी से बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (BESS) और पंप्ड हाइड्रो प्रोजेक्ट्स की ओर स्थानांतरित हुआ है ताकि राष्ट्रीय ग्रिड का दीर्घकालिक लचीलापन सुनिश्चित हो सके।
    • लक्षित व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण (VGF) प्रारंभिक निजी निवेश को बढ़ावा देकर परिवर्तनशील हरित ऊर्जा को विश्वसनीय, स्थिर बिजली आधार भार में रूपांतरित कर रहा है। 
    • उदाहरणस्वरूप, विद्युत मंत्रालय ने 30 गीगावाट स्टैंडअलोन BESS के लक्ष्य से बड़ी दूसरी VGF योजना को मंजूरी दी है, जिसमें विद्युत प्रणाली विकास कोष (PSDF) से ₹5,400 करोड़ आवंटित किये गए हैं।
  • जैव ईंधन और चक्रीय अर्थव्यवस्था का संवर्द्धन: जैव ईंधन के माध्यम से कृषि अवशेषों और नगरपालिका कचरे की उपयोगिता को अधिकतम करना शहरी अपशिष्ट प्रबंधन और ग्रामीण ऊर्जा संक्रमण के लिये दोहरा समाधान प्रदान करता है। 
    • इथेनॉल के मिश्रण से परिवहन के दौरान निकलने वाले धुएँ और आयात शुल्क में कमी आती है, जबकि कृषि अर्थव्यवस्था में अतिरिक्त राजस्व प्राप्त होता है। 
    • संपीड़ित बायोगैस (CBG) का रणनीतिक प्रचार विकेंद्रीकृत, कम-कार्बन ऊर्जा नेटवर्क का निर्माण करता है, जो वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के झटकों से स्वतंत्र रहता है। 
    • उदाहरण के लिये, भारत ने पेट्रोल में 20% इथेनॉल मिश्रण (E20) का लक्ष्य समय से पहले हासिल कर लिया, जिससे लाखों टन कार्बन उत्सर्जन में कमी आई। 
    • इसके अतिरिक्त, भारत नेतृत्व वाले ग्लोबल बायोफ्यूल्स एलायंस ने अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों को मानकीकृत करते हुए, वैश्विक स्तर पर बायोफ्यूल अपनाने हेतु प्रौद्योगिकी-साझाकरण प्रोटोकॉल लागू किये हैं।
  • हरित वित्त और वर्गीकरण: शून्य उत्सर्जन के लक्ष्य की दिशा में व्यापक अवसंरचना के नवीनीकरण हेतु घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय पूंजी का विशाल भंडार एकत्र करना आवश्यक है। सरकारी हरित बॉण्ड निजी क्षेत्र के हरित ऋण और दीर्घकालिक जोखिम मूल्यांकन के लिये आधिकारिक मूल्य निर्धारण मानक स्थापित करते हैं।
    • मानकीकृत राष्ट्रीय हरित वर्गीकरण की दिशा में विनियामक प्रगति कंपनियों द्वारा किये जाने वाले ग्रीनवॉशिंग को रोकती है।
    • उदाहरणस्वरूप, भारत ने वित्त वर्ष 2026 में 15,000 करोड़ रुपये के सॉवरेन ग्रीन बॉण्ड जारी किये, जिससे वित्त वर्ष 2023 से अब तक कुल जारी बॉण्ड 72,697 करोड़ रुपये हो गए हैं।
    • नगरपालिका हरित बॉण्ड अगले दशक में शहरी स्थानीय निकायों द्वारा जलवायु संबंधी कार्यों के लिये 2.5 से 6.9 अरब अमेरिकी डॉलर जुटा सकते हैं।
  • ऊर्जा दक्षता और मांग अनुकूलन: मांग-पक्ष अनुकूलन से समग्र ऊर्जा तीव्रता में कमी राष्ट्रीय डीकार्बोनाइज़ेशन के लिये सबसे लागत-प्रभावी और तत्काल उपाय है।
    •  घरेलू उपकरण और भारी औद्योगिक प्रक्रियाओं के अनिवार्य ऊर्जा दक्षता मानक नई बिजली उत्पादन आवश्यकता से पहले ही कुल मांग वक्र को काफी कम कर देते हैं।
    •  स्मार्ट ग्रिड और उन्नत मीटरिंग अवसंरचना उपभोक्ताओं को वास्तविक समय ग्रिड मूल्य संकेतों के आधार पर उपभोग अनुकूलित करने में सक्षम बनाती है।
    • प्रदर्शन, उपलब्धि और व्यापार (PAT) योजना ने अकेले लगभग 110 मिलियन टन CO2 वार्षिक उत्सर्जन कम किया और ऊर्जा-गहन क्षेत्रों में विशिष्ट उपभोग घटाकर प्रति वर्ष ₹55,000 करोड़ की बचत की।
    • इसके अतिरिक्त, उजाला योजना के तहत 77 करोड़ पारंपरिक बल्ब/CFL और 3.5 करोड़ स्ट्रीटलाइट्स को LED में बदलकर 85 लाख किलोवाट-घंटे बिजली और 15,000 टन CO₂ बचत की गई है।

भारत के डीकार्बोनाइज़ेशन प्रयासों में कौन-कौन-सी चुनौतियाँ विद्यमान हैं? 

  • कोयले के 'चरणबद्ध तरीके से कम करने' बनाम 'चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने' की दुविधा: भारत की तेज़ी से बढ़ती आर्थिक वृद्धि के कारण विश्वसनीय बेसलोड बिजली की असीमित मांग है, जिससे निकट भविष्य में थर्मल ऊर्जा उत्पादन से दूर हटना व्यावहारिक रूप से असंभव हो जाता है। 
    • नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में प्रबल वृद्धि के बावजूद, राष्ट्रीय ग्रिड की स्थिरता चरम मांग के घंटों के दौरान बड़े पैमाने पर बिजली कटौती को रोकने के लिये कोयले पर मज़बूती से निर्भर है। 
    • भारत में कुल बिजली उत्पादन का लगभग 72% हिस्सा अभी भी कोयले से आता है। भारत की तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था की अनुमानित बिजली मांग को पूरा करने के लिये, वित्त वर्ष 2025-26 में 13.32 गीगावाट की नई कोयला आधारित तापीय ऊर्जा परियोजना के लिये आवंटन किया गया है।
    • इसके अलावा, झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे खनिज संपदा से भरपूर राज्यों में लाखों लोग अपनी आजीविका के लिये प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोयला मूल्य शृंखला पर निर्भर हैं।
    • यदि गहन पुन: कौशल विकास और आर्थिक विविधीकरण के माध्यम से एक उच्च-प्रबंधित 'न्यायसंगत संक्रमण (Just Transition)' तैयार नहीं किया गया, तो यह स्थानीय बेरोज़गारी और गंभीर राजनीतिक प्रतिक्रियाओं को अनिवार्य रूप से जन्म देगा।
  • अत्यधिक हरित वित्त घाटा: भारत के शुद्ध शून्य उत्सर्जन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये आवश्यक पूंजी की विशाल मात्रा घरेलू राजकोषीय क्षमता और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की वर्तमान गति दोनों से कहीं अधिक है। 
    • घरेलू स्तर पर पूंजी की लगातार उच्च लागत और मुद्रा हेजिंग जोखिम अंतर्राष्ट्रीय संस्थागत निवेशकों को भारतीय हरित अवसंरचना में दीर्घकालिक ऋण देने से गंभीर रूप से रोकते हैं। 
    • व्यापक आर्थिक अनुमानों से संकेत मिलता है कि भारत को वर्ष 2070 तक शुद्ध शून्य लक्ष्य प्राप्त करने के लिये 10 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की आवश्यकता होगी, जिसका अर्थ है कि प्रतिवर्ष सैकड़ों अरब डॉलर का वित्तीय अंतर होगा। 
  • महत्त्वपूर्ण खनिजों में आपूर्ति शृंखला की भेद्यता: जीवाश्म ईंधन से स्वच्छ प्रौद्योगिकियों की ओर तेज़ी से संक्रमण के कारण तेल कार्टेल पर ऐतिहासिक निर्भरता की जगह स्थानीय स्तर पर महत्त्वपूर्ण खनिज आपूर्ति शृंखलाओं के प्रति तीव्र भेद्यता उत्पन्न हो गई है। 
    • लिथियम, कोबाल्ट और दुर्लभ मृदा तत्त्वों जैसे आवश्यक तत्त्वों की घरेलू कमी भारत को प्रमुख वैश्विक शोधकों (जैसे चीन) और शत्रुतापूर्ण राज्य अभिकर्त्ताओं से महत्त्वपूर्ण भू-राजनीतिक लाभ के लिये उजागर करती है। 
    • स्वदेशी प्रसंस्करण क्षमताओं का विकास करना और विदेशी खनन संपत्तियों को सुरक्षित करना एक अत्यधिक पूंजी-गहन, बहु-वर्षीय प्रक्रिया है जो घरेलू इलेक्ट्रिक वाहन और भंडारण स्थापना में लगातार बाधा उत्पन्न करने का खतरा उत्पन्न करती है।
      • उदाहरण के लिये, जम्मू-कश्मीर में 59 लाख टन लिथियम-संभावित संसाधनों की खोज के बावजूद, व्यावसायिक उत्खनन और बैटरी-ग्रेड रिफाइनिंग अभी भी व्यावहारिकता से वर्षों दूर हैं।
  • ग्रिड की अनिश्चितता और उच्च भंडारण लागत: परिवर्तनीय नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार राष्ट्रीय ग्रिड की आवृत्ति को अस्थिर करता है, जिसके लिये स्थिर अवसंरचना और प्रेषणीय भंडारण समाधानों में बड़े पैमाने पर निवेश आवश्यक है। 
  • हालाँकि, बड़े पैमाने पर उपयोग होने वाली बैटरियों की समतुल्य भंडारण लागत (LCOS) अभी भी अत्यधिक महंगी है, जिससे वितरण कंपनियां चौबीसों घंटे हरित बिजली (RTC) समझौतों पर हस्ताक्षर करने में हिचकिचा रही हैं। 
    • राष्ट्रीय विद्युत योजना (NEP) 2023 के अनुसार, भारत को वर्ष 2031-32 तक लगभग 411.4 गीगावाट-घंटे (GWh) ऊर्जा भंडारण क्षमता की आवश्यकता होगी, जिसमें से 236.22 GWh बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों (BESS) से प्राप्त होने की संभावना है। किंतु भंडारण क्षमता के विकास की वर्तमान गति इस लक्ष्य को पूरा करने के लिये अपर्याप्त है।
  • भूमि अधिग्रहण और सामाजिक-पारिस्थितिकी: मेगावाट-स्तरीय सौर और पवन पार्क भूमि आधारित  परियोजनाएँ हैं, जो कृषि समुदाय और आबादी के साथ सामाजिक-आर्थिक मतभेद उत्पन्न करती हैं। 
    • भूमि स्वामित्व की अस्पष्टता, पर्यावरण संबंधी स्वीकृतियों में लगने वाला लंबा समय और पारेषण लाइनों के लिये मार्ग के अधिकार को लेकर होने वाले विवाद लगातार परियोजना की समयसीमा को बाधित करते हैं और निष्पादन लागत को बढ़ाते हैं। 
      • उदाहरण के लिये, फरवरी 2026 में, राजस्थान में सौर ऊर्जा संयंत्रों के लिये ओरान (पवित्र उपवनों) के मार्ग परिवर्तन के विरोध में 700 किलोमीटर की एक विशाल पदयात्रा निकाली गई थी।
      • इसके अलावा, राजस्थान में प्रमुख उच्च-वोल्टेज पारेषण परियोजनाओं को अक्सर स्थानीय कृषि विरोध प्रदर्शनों और गंभीर रूप से लुप्तप्राय ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के आवासों के अतिव्यापी होने के कारण कई वर्षों के कानूनी निषेधों का सामना करना पड़ता है।
  • कार्बन ट्रेडिंग योजना में बाज़ार की विश्वसनीयता: वर्ष 2026 में भारत के कार्बन बाज़ार (ICM) के अनुपालन चरण की शुरुआत के साथ, क्रेडिट की 'अति-आपूर्ति' और कमज़ोर मूल्य संकेतों की चिंता बनी हुई है, जो वास्तविक प्रौद्योगिकी परिवर्तनों को प्रोत्साहित करने में विफल हो सकती है। 
  • मज़बूत मूल्य-स्थिरता तंत्र के अभाव में कंपनियाँ महंगे औद्योगिक डीकार्बोनाइज़ेशन निवेश के बजाय सस्ते, निम्न-गुणवत्ता वाले ऑफसेट खरीदने की संभावना रखती हैं। 
  • वर्ष 2010–2022 के बीच, भारत ने स्वैच्छिक कार्बन बाज़ार में 278 मिलियन क्रेडिट जारी किये, जो वैश्विक आपूर्ति का 17% है। 
    • विशेषज्ञों के अनुसार, यदि मूल्य समायोजन तंत्र नहीं है, तो क्रेडिट की कीमतें (वर्तमान में ₹500–700) इतनी कम बनी रह सकती हैं कि महँगी हरित प्रौद्योगिकियों जैसे कार्बन कैप्चर को अपनाने के लिये पर्याप्त प्रोत्साहन न मिल सके।

भारत के कार्बन उत्सर्जन कम करने के प्रयासों को गति देने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?  

  • कार्बन मूल्य निर्धारण संरचना को परिपक्व बनाना: कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के लिये घरेलू कार्बन बाज़ारों को तेज़ी से मज़बूत करने की आवश्यकता है, जिसके लिये उत्सर्जन सीमा को कम करना और एक विश्वसनीय न्यूनतम मूल्य निर्धारित करना आवश्यक है। 
    • भारत को स्वैच्छिक, तीव्रता-आधारित लक्ष्यों से हटकर पूर्ण उत्सर्जन सीमा निर्धारित करनी चाहिये, विशेष रूप से उन क्षेत्रों के लिये जिनमें उत्सर्जन कम करना कठिन है, ताकि वास्तविक कमी एवं मज़बूत मूल्य संकेत उत्पन्न हो सकें।
    • घरेलू बाज़ारों को मज़बूत तृतीय-पक्ष MRV प्रणालियों द्वारा समर्थित अंतर्राष्ट्रीय कार्बन ढाँचों से जोड़ना, कार्बन रिसाव को रोकेगा, ग्रीनवॉशिंग पर अंकुश लगाएगा और वैश्विक पूंजी का संग्रह करेगा, जिससे उद्योगों को जलवायु से जुड़ी बाह्य लागतों का आंतरिककरण करने और गहन डीकार्बोनाइज़ेशन  प्रौद्योगिकियों का अंगीकरण करने के लिये विवश होना पड़ेगा।
  • डिस्पैचेबिलिटी और सहायक ग्रिड बाज़ारों का विस्तार: नवीकरणीय ऊर्जा की अनिश्चितता को दूर करने के लिये समर्पित सहायक सेवा बाज़ारों के माध्यम से ऊर्जा भंडारण के लिये प्रबल प्रोत्साहन की आवश्यकता है। 
    • ग्रिड नियामकों को दिन के समय के अनुसार मूल्य निर्धारण अनिवार्य करना चाहिये तथा पीक शिफ्टिंग और आवृत्ति विनियमन को पुरस्कृत करना चाहिये।
    • राजस्व संचय की अनुमति, इंटर-ऑपरेबिलिटी का मानकीकरण और बड़े सौर एवं पवन पार्कों में भंडारण के सह-स्थापन को अनिवार्य करने से कर्टेलमेंट हानियाँ कम होंगी तथा परिवर्तनशील नवीकरणीय स्रोत विश्वसनीय रूप से चौबीसों घंटे स्वच्छ ऊर्जा में रूपांतरित हो सकेंगे।
  • ब्लेंडेड फाइनेंस और ग्रीन टैक्सोनॉमी का संस्थानीकरण: जलवायु वित्त की कमी को दूर करने के लिये ऐसे ब्लेंडेड फाइनेंस साधनों की आवश्यकता है, जो सॉवरेन गारंटी को रियायती बहुपक्षीय पूँजी के साथ जोड़कर निजी निवेश के जोखिम को कम करें। 
    • पूँजी के गलत आवंटन को रोकने के लिये एक विधिक रूप से बाध्यकारी ग्रीन टैक्सोनॉमी का क्रियान्वयन अनिवार्य है।
    • पर्यावरण, पारिस्थितिकी और विकास (ESG) संबंधी सख्त प्रकटीकरण और अपतटीय पवन ऊर्जा जैसी उच्च-जोखिम प्रौद्योगिकियों के लिये लक्षित सॉवरेन ग्रीन बॉण्ड पूँजी लागत को घटाएँगे तथा बड़े पैमाने पर हरित अवसंरचना के विस्तार का मार्ग प्रशस्त करेंगे।
  • ग्रीन पब्लिक प्रोक्योरमेंट (GPP) को अनिवार्य बनाना: राज्य को अनिवार्य ग्रीन पब्लिक प्रोक्योरमेंट के माध्यम से कम कार्बन वाले इस्पात एवं सीमेंट हेतु सुनिश्चित बाज़ार निर्माण के लिये सार्वजनिक व्यय का लाभ उठाना चाहिये। 
    • सार्वजनिक परियोजनाओं में निहित कार्बन की बढ़ती सीमाएँ निर्धारित करने से भारी उद्योग पर बोझ बने ‘ग्रीन प्रीमियम’ की समस्या कम होगी।
    • दीर्घकालिक ऑफटेक की गारंटी निजी निवेश के जोखिम को घटाती है, जिससे सार्वजनिक पूँजी एक ‘मार्केट-मेकर’ के रूप में कार्य करते हुए पैमाने को बढ़ा सकती है तथा लागत में त्वरित कमी ला सकती है।
  • CCUS हब-एंड-स्पोक मॉडल का त्वरित विस्तार: CCUS के विस्तार के लिये औद्योगिक क्लस्टरों में साझा अवसंरचना आवश्यक है, जिसे हब-एंड-स्पोक मॉडल के माध्यम से विकसित किया जा सकता है। पाइपलाइन और भंडारण सुविधाओं में सरकार की ‘एंकर टेनेंट’ के रूप में भागीदारी प्रारंभिक उच्च लागत को कम करती है।
    • इस्पात, सीमेंट और पेट्रोकेमिकल क्षेत्रों के उत्सर्जनों को एकत्रित करना, साथ ही त्वरित राइट-ऑफ-वे स्वीकृतियाँ एवं दीर्घकालिक दायित्व के स्पष्ट नियम, शमन लागत को घटाते हैं तथा भारत के औद्योगिक आधार की प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बनाए रखते हैं।
  • चक्रीय अर्थव्यवस्था और शहरी खनन का स्वदेशीकरण: आपूर्ति शृंखला सुरक्षा के लिये बैटरी और सौर घटकों के लिये अनिवार्य बंद-लूप पुनर्चक्रण एवं शहरी खनन के औपचारिककरण की आवश्यकता है। 
    • विस्तारित निर्माता उत्तरदायित्व (EPR) के सशक्त मानदंडों को द्वितीयक सामग्रियों के उपयोग में क्रमिक वृद्धि सुनिश्चित की जानी चाहिये।
    • रिकवरी प्रौद्योगिकियों को सब्सिडी देना और अनौपचारिक अपशिष्ट क्षेत्र को एकीकृत करना, अस्थिर वैश्विक खनिज बाज़ारों पर निर्भरता घटाएगा तथा इससे स्वच्छ प्रौद्योगिकी विकास को पारिस्थितिक रूप से विनाशकारी खनन से अलग किया जा सकेगा।  
  • पीयर-टू-पीयर ट्रेडिंग के माध्यम से ऊर्जा का विकेंद्रीकरण: ग्रिड के लोकतंत्रीकरण के लिये प्रोस्यूमर्स और माइक्रोग्रिड्स के बीच P2P विद्युत व्यापार हेतु नियामकीय सैंडबॉक्स आवश्यक हैं।  
    • घरों को छत पर लगे सौर ऊर्जा संयंत्रों को स्थानीय स्तर पर बेचने की अनुमति देने से अल्प-कुशल यूटिलिटी एकाधिकारों पर निर्भरता घटती है।
    • अनिवार्य बाय-डायरेक्शनल चार्जिंग और V2G एकीकरण इलेक्ट्रिक वाहनों को एक वितरित भंडारण परिसंपत्ति में परिवर्तित कर सकता है, जिससे ट्रांसमिशन हानियाँ घटेंगी, ग्रिड का लचीलापन बढ़ेगा तथा ग्रामीण ऊर्जा स्वायत्तता को गति मिलेगी।
  • नियंत्रित ‘जस्ट ट्रांज़िशन’ का अभियांत्रिकीकरण: जीवाश्म ईंधनों के प्रयोग को चरणबद्ध तरीके से कम करने के लिये कोयले पर निर्भर क्षेत्रों की सुरक्षा हेतु कानूनी रूप से आधारित न्यायसंगत संक्रमण ढाँचे की आवश्यकता है।
    • समर्पित सॉवरेन ट्रांज़िशन फण्ड को आर्थिक विविधीकरण और औद्योगिक पुनर्गठन के लिये वित्तपोषण करना चाहिये।  
    • नेशनल ग्रीन स्किल्स टैक्सोनॉमी, पुनःप्रशिक्षण कार्यक्रम तथा खदानों को सौर पार्क या जल विद्युत संयंत्रों में रूपांतरित करना वैकल्पिक रोज़गार उत्पन्न कर सकता है, जिससे राजनीतिक प्रतिरोध कम होगा तथा सामाजिक रूप से समावेशी डीकार्बनाइज़ेशन सुनिश्चित होगा।
  • कृषि ऊर्जा-जल संबंध का अनुकूलन: कृषि के डीकार्बनाइज़ेशन के लिये सौर-आधारित ग्रामीण फीडरों को भूजल संरक्षण के साथ एकीकृत करना आवश्यक है। सोलर पंपों और माइक्रोग्रिड को स्मार्ट मीटरिंग के साथ जोड़ा जाना चाहिये, ताकि एक्विफर का अत्यधिक दोहन न हो।
    • किसानों को अतिरिक्त बिजली बेचने के लिये प्रोत्साहित करना और फसल अवशेषों से संपीडित बायोगैस (CBG) का विस्तार पराली दहन पर अंकुश लगा सकता है, ग्रामीण आय को बढ़ावा दे सकता है तथा कृषि को भारत की नेट-ज़ीरो रणनीति का एक स्तंभ बना सकता है।

निष्कर्ष: 

भारत की डीकार्बोनाइज़ेशन यात्रा अब मात्र महत्त्वाकांक्षी लक्ष्यों तक सीमित न रहकर उच्च-सटीक औद्योगिक रणनीति के रूप में विकसित हो चुकी है, जिसका संकेत वर्ष 2026 में CCUS हेतु बजटीय प्रतिबद्धता और घरेलू कार्बन बाज़ार के संचालन से मिलता है। यद्यपि कोयले पर निर्भरता और ग्रीन प्रीमियम जैसी संरचनात्मक चुनौतियाँ बनी हुई हैं, तथापि प्रौद्योगिकी-आधारित रेयर अर्थ कॉरिडोर तथा मिश्रित वित्त की ओर उन्मुखीकरण एक परिपक्व जलवायु संरचना का द्योतक है। अंततः सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि राष्ट्र कितनी कुशलता से प्रबल औद्योगिक वृद्धि को अपने संसाधन-निर्भर केंद्रीय क्षेत्रों के लिये सामाजिक रूप से समावेशी 'न्यायसंगत संक्रमण के साथ समन्वित कर पाता है। अतः वर्ष 2070 तक नेट ज़ीरो का लक्ष्य प्राप्त करना अब केवल एक पर्यावरणीय दायित्व नहीं, बल्कि भारत की भावी समष्टि-आर्थिक संप्रभुता का एक मूलभूत खाका बन चुका है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न 

'भारत के नेट ज़ीरो 2070 लक्ष्य की प्राप्ति हेतु केवल ऊर्जा प्रतिस्थापन पर्याप्त नहीं, बल्कि गहन औद्योगिक परिवर्तन की ओर संक्रमण अनिवार्य है। इस संदर्भ में, भारत के उन क्षेत्रों को कार्बनमुक्त करने में कार्बन कैप्चर, यूटिलाइज़ेशन और स्टोरेज (CCUS) की भूमिका का मूल्यांकन कीजिये, जिनमें कार्बन उत्सर्जन को कम करना कठिन है।

 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न 

प्रश्न 1. वर्ष 2026 CCUS बजट आवंटन का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इस्पात, सीमेंट और रिफाइनरी जैसे उच्च उत्सर्जन वाले क्षेत्रों हेतु अवसंरचना सुदृढ़ करने तथा निजी निवेश के जोखिम को घटाने के लिये 20,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।

प्रश्न 2. कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CCTS) की कार्यप्रणाली क्या है?
यह कैप-एंड-ट्रेड प्रणाली पर आधारित है, जिसमें 490 अधिसूचित संस्थाएँ निर्धारित ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन तीव्रता (GEI) लक्ष्यों की पूर्ति के अनुरूप क्रेडिट क्रेडिट का व्यापार करती हैं।

प्रश्न 3. 'ग्रीन प्रीमियम' से क्या तात्पर्य है?
पारंपरिक जीवाश्म ईंधन आधारित तकनीकों के स्थान पर स्वच्छ तकनीकों (जैसे हरित हाइड्रोजन) को अपनाने से उत्पन्न अतिरिक्त लागत।

प्रश्न 4. रेयर अर्थ कॉरिडोर का अर्थ क्या है?
इलेक्ट्रिक वाहन एवं बैटरी आपूर्ति शृंखला के लिये आवश्यक महत्त्वपूर्ण खनिजों के संरक्षण और प्रसंस्करण हेतु प्रस्तावित विशेष औद्योगिक क्षेत्र (वर्ष 2026 के बजट में प्रस्तावित)।

प्रश्न 5. पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना का क्या महत्त्व है?
यह रूफटॉप सौर ऊर्जा की प्रमुख योजना है, जिसने ऊर्जा उत्पादन के विकेंद्रीकरण की दिशा में 30 लाख घरों के लक्ष्य को हाल ही में प्राप्त किया है।

 UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ) 

प्रिलिम्स:

प्रश्न.  सार्वजनिक परिवहन में बसों के लिये ईंधन के रूप में हाइड्रोजन समृद्ध CNG (H-CNG) के उपयोग के प्रस्तावों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजियेकेें: (2019)

  1. एच-सीएनजी के उपयोग का मुख्य लाभ कार्बन मोनोऑक्साइड उत्सर्जन का उन्मूलन है।
  2. ईंधन के रूप में एच-सीएनजी कार्बन डाइऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन उत्सर्जन को कम करता है।
  3. बस द्वारा ईंधन के रूप में सीएनजी के एक पाँचवे हिस्से तक हाइड्रोजन मिलाया जा सकता है।
  4. एच-सीएनजी ईंधन को CNG से कम महँगा बनाता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 4
(d) 1, 2, 3 और 4

उत्तर: (b)


मेन्स 

प्रश्न. भारत में तीव्र आर्थिक विकास के लिये कुशल और किफ़ायती शहरी जन परिवहन कैसे महत्त्वपूर्ण है? (2019)