भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य पर अपर्याप्त व्यय | 31 Jan 2026
चर्चा में क्यों?
भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य पर अपर्याप्त व्यय निरंतर एक गंभीर चुनौती रहा है, क्योंकि केंद्र सरकार राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (NHP), 2017 में निर्धारित व्यय लक्ष्यों को प्राप्त करने में असफल रही है।
भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय की वर्तमान स्थिति क्या है?
- राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति में विफलता: राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 के अंतर्गत वर्ष 2025 तक सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय को GDP के 2.5% तक बढ़ाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था, जो अब तक पूरा नहीं हो सका है। कुल सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय में केंद्र सरकार की हिस्सेदारी को 40% (GDP का 1%) तक ले जाने का लक्ष्य था, जबकि यह 2025–26 में मात्र 0.29% GDP पर सिमटी हुई है।
- कोविड-19 के बाद व्यय में गिरावट: कोविड-19 महामारी के उपरांत केंद्र सरकार का स्वास्थ्य व्यय वर्ष 2020–21 में GDP के 0.37% से घटकर वर्ष 2025–26 में GDP का 0.29% रह गया है, जो स्वास्थ्य क्षेत्र में दीर्घकालिक निवेश की कमी को दर्शाता है।
- राज्य बनाम केंद्र प्रवृत्ति: जहाँ राज्यों ने अपने स्वास्थ्य व्यय को वर्ष 2017–18 में GDP के 0.67% से बढ़ाकर वर्ष 2025–26 में 1.1% तक किया है, वहीं केंद्र सरकार ने अपनी हिस्सेदारी घटा दी है। इससे राज्यों की तुलना में केंद्र के बढ़ते वित्तीय प्रभुत्व की प्रवृत्ति देखने को मिल रही है, जो सहकारी संघवाद की भावना के प्रतिकूल है।
- केंद्र प्रायोजित योजनाओं के अंतर्गत राज्यों को स्वास्थ्य क्षेत्र में किये जाने वाले केंद्रीय अंतरण की हिस्सेदारी वर्ष 2014–15 में 75.9% से घटकर वर्ष 2024–25 में मात्र 43% रह गई है, जिससे राज्यों की स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करने की क्षमता प्रभावित होती है।
- उपकरों का दुरुपयोग: स्वास्थ्य एवं शिक्षा उपकर का उद्देश्य निर्धन वर्गों के लिये स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार करना था। हालाँकि, व्यवहार में यह उपकर मुख्य स्वास्थ्य बजट का पूरक बनने के बजाय उसका प्रतिस्थापक बन गया है। वर्ष 2023–24 में स्वास्थ्य एवं शिक्षा उपकर से प्राप्त कुल राशि का केवल एक-चौथाई भाग ही स्वास्थ्य क्षेत्र को आवंटित किया गया।
- वैश्विक असमानता: भारत का प्रति व्यक्ति सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय विश्व में सबसे कम स्तरों में शामिल है। वर्ष 2021 में यह पड़ोसी देशों, जैसे– भूटान (लगभग 2.5 गुना अधिक) तथा श्रीलंका (लगभग 3 गुना अधिक) की तुलना में उल्लेखनीय रूप से कम रहा, जबकि यह BRICS देशों (लगभग 14–15 गुना अधिक) तथा थाईलैंड/मलेशिया (लगभग 10 गुना अधिक) से बहुत ज़्यादा पीछे है।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (NHP), 2017
- परिचय: राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 भारत में सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज के उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु एक व्यापक रूपरेखा प्रदान करती है। यह नीति बदलते रोग परिदृश्य, बढ़ती स्वास्थ्य-लागत पर नियंत्रण तथा सार्वजनिक निवेश में वृद्धि के माध्यम से सभी नागरिकों के लिये समान, किफायती एवं गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं की सुनिश्चितता का लक्ष्य रखती है।
- मुख्य उद्देश्य:
- स्वास्थ्य कार्ड से संबद्ध लोगों के लिये समग्र एवं निशुल्क प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
- सार्वजनिक अस्पतालों तथा निजी क्षेत्र से रणनीतिक क्रय के माध्यम से किफायती द्वितीयक एवं तृतीयक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच में सुधार करना।
- अतिरिक्त व्यय तथा अत्यधिक बोझकारी स्वास्थ्य व्यय में उल्लेखनीय कमी लाना।
- मूल सिद्धांत: यह नीति दस प्रमुख सिद्धांतों द्वारा निर्देशित है, जिनमें समता, सुलभता, सार्वभौमिकता, रोगी-केंद्रित गुणवत्तापूर्ण देखभाल तथा जवाबदेही शामिल हैं।
- विशिष्ट मात्रात्मक लक्ष्य: इस नीति के अंतर्गत अनेक समयबद्ध लक्ष्य निर्धारित किये गये हैं, जैसे—
- वर्ष 2025 तक सरकारी स्वास्थ्य व्यय को GDP के 1.15% से बढ़ाकर 2.5% करने का लक्ष्य था।
- राज्यों के कुल बजट में स्वास्थ्य व्यय की हिस्सेदारी 8% से अधिक करना।
- मातृ मृत्यु दर को वर्ष 2020 तक 100 तक घटाना और पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर को वर्ष 2025 तक 23 तक लाना था।
- गैर-संचारी रोगों (NCD) से होने वाली समयपूर्व मृत्यु दर को वर्ष 2025 में 25% तक कम करना था।
- वर्ष 2025 तक क्षय रोग का उन्मूलन करना तथा कालाज़ार और कुष्ठ रोग के उन्मूलन की स्थिति को बनाए रखना।
- नीतिगत बल एवं प्रमुख परिवर्तन:
- निवारक एवं प्रेरक स्वास्थ्य: “सभी नीतियों में स्वास्थ्य” दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है तथा अंतर-क्षेत्रीय समन्वय को संस्थागत रूप देता है। स्वच्छ भारत, संतुलित आहार, तंबाकू नियंत्रण और सड़क सुरक्षा सहित 7 प्राथमिक क्षेत्रों को वरीयता देता है।
- स्वास्थ्य सेवाओं का संगठन: 7 प्रमुख बदलाव प्रस्तावित करता है, जिनमें ‘हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर’ के माध्यम से चयनात्मक से व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा की ओर संक्रमण तथा सार्वजनिक अस्पतालों में निशुल्क दवाएँ, जाँच और आपातकालीन देखभाल सुनिश्चित करना शामिल है।
- सुदृढ़ प्रणाली: विशेष रूप से वंचित क्षेत्रों में अवसंरचना और मानव संसाधन की कमी को दूर करने तथा एक सुदृढ़ स्वास्थ्य प्रबंधन सूचना प्रणाली (HMIS) विकसित करने पर बल देती है।
- निजी क्षेत्र की सहभागिता: रणनीतिक खरीद और विनियमन के माध्यम से निजी क्षेत्र को सार्वजनिक स्वास्थ्य लक्ष्यों के अनुरूप लाने का उद्देश्य रखती है।
भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय कम होने के क्या कारण हैं?
- "दृश्यमान" अवसंरचना का राजनीतिक अर्थशास्त्र: चुनावी दृष्टि से भौतिक अवसंरचना (जैसे– सड़कें, पुल) पर खर्च या प्रत्यक्ष नकद अंतरण, सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसी धीमी और प्रणालीगत मज़बूती में निवेश की तुलना में, त्वरित और स्पष्ट राजनीतिक लाभ देता है, हालाँकि सार्वजनिक स्वास्थ्य दीर्घकालिक हित है जिसके लाभ प्रत्यक्ष रूप से कम दिखते हैं।
- विखंडित स्वास्थ्य वित्तपोषण ढाँचा: भारत में एक एकीकृत, संरक्षित स्वास्थ्य वित्तपोषण पूल का अभाव है। समर्पित स्वास्थ्य कर या बीमा कोष वाली प्रणालियों के विपरीत, स्वास्थ्य बजट वार्षिक रूप से राजनीतिक सौदे के प्रति संवेदनशील है जबकि आंतरिक रूप से अन्य क्षेत्रों से प्रतिस्पर्द्धा करता है।
- "सभी नीतियों में स्वास्थ्य" दृष्टिकोण की कमी: राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 इसका समर्थन करती है, लेकिन व्यवहार में स्वास्थ्य के प्रमुख निर्धारक — स्वच्छता, पोषण, वायु प्रदूषण — अलग-अलग बजट वाले अलग-अलग मंत्रालयों द्वारा सँभाले जाते हैं। यह खंडित दृष्टिकोण स्वास्थ्य के लिये आवश्यक कुल सार्वजनिक निवेश को कम आँकता है और समग्र परिणामों के लिये संयुक्त संसाधन के आवंटन को रोकता है।
- निजी स्वास्थ्य देखभाल का प्रभाव: निजी स्वास्थ्य क्षेत्र के तेज़ी से बढ़ते प्रसार से यह सार्वजनिक धारणा और राजनीतिक तर्क मज़बूत होता है क्योंकि स्वास्थ्य सेवा मूलतः एक निजी उपभोक्ता वस्तु है, न कि ऐसा लोककल्याणकारी उपकरण जिसके लिये राज्य निवेश करे। इसका परिणाम यह होता है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के लिये राज्य से अधिक धन उपलब्ध कराने को लेकर जनता की ओर से दबाव (डिमांड-साइड प्रेशर) कम हो जाता है।
- लागत, समयबद्ध रोडमैप का अभाव: यद्यपि राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 में GDP का एक निर्धारित प्रतिशत का लक्ष्य रखा गया है, परंतु केंद्र और राज्य सरकारों के लिये अनिवार्य चरणबद्ध लक्ष्यों सहित कोई विधिक रूप से बाध्यकारी वार्षिक व्यय-आधारित क्रियान्वयन योजना मौजूद नहीं है, जिससे यह लक्ष्य व्यावहारिक की बजाय मात्र आकांक्षात्मक बनकर रह जाता है।
भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय बढ़ाने के लिये कौन-से कदम आवश्यक हैं?
- राजकोषीय क्षमता बढ़ाना: सकल घरेलू उत्पाद के सापेक्ष कर संग्रह अनुपात में सुधार करके सरकार की राजस्व क्षमता मज़बूत की जानी चाहिये, अर्थात कर संबंधी सुधार करना, कर आधार का विस्तार करना, डिजिटल अनुपालन और GST संरचना का युक्तीकरण करना, जैसा कि नीति आयोग के 2025 के फिस्कल हेल्थ इंडेक्स में रेखांकित किया गया है। स्वास्थ्य सेवाओं के लिये समर्पित संसाधन जुटाने हेतु एक स्वास्थ्य उपकर या हानिकारक वस्तुओं पर अधिक GST (उदा. 35%) लगाया जा सकता है।
- 15वें वित्त आयोग के स्वास्थ्य अनुदानों का तीव्र उपयोग: 15वें वित्त आयोग द्वारा अनुशंसित स्वास्थ्य अनुदानों की राशि का शीघ्र और पूर्ण रूप से वितरण कर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC), सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) जैसी बुनियादी ढाँचे की इकाइयों का तेज़ी से निर्माण और सुदृढ़ीकरण किया जाना चाहिये।
- ब्लेंडेड फाइनेंस का उपयोग: नीति आयोग (2022) की सिफारिशों के अनुरूप सार्वजनिक और निजी पूंजी को एकीकृत करने वाले ब्लेंडेड फाइनेंस मॉडल का विस्तार किया जाए। “अदृश्य मध्यम वर्ग” के लिये प्रीमियम पर अनुदान प्रदान कर तथा अप्रत्यक्ष व्ययों को शामिल करके पीएम-जय को अधिक सुदृढ़ बनाया जाए, ताकि लोगों पर जेब से होने वाले स्वास्थ्य खर्च का बोझ कम हो सके।
- खरीद तंत्र को सुदृढ़ कर तथा परिणाम-आधारित बजट व्यवस्था अपनाकर अपव्यय को कम किया जाना चाहिये। साथ ही, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के माध्यम से संसाधनों के रिसाव को रोका जाए और स्वास्थ्य लेखा प्रतिवेदनों के सार्वजनिक प्रकाशन द्वारा लेखापरीक्षण की पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए।
- स्वास्थ्य को राजनीतिक इच्छाशक्ति बढ़ाने हेतु आर्थिक निवेश के रूप में पुनः प्रस्तुत करना। मुख्य और रोकथाम पर आधारित देखभाल की ओर बजट का संतुलन बदलना और NHP 2017 के अनुसार दो-तिहाई बजट प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल के लिये आवंटित करना।
- कानूनी और नीतिगत सुधार: एक राइट टू हेल्थ एक्ट लागू किया जाना चाहिये, जो पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाओं को कानूनी रूप से अनिवार्य बनाए। इसके साथ ही सार्वजनिक स्वास्थ्य को मज़बूत राष्ट्रीय मानकों के लिये समवर्ती सूची में शामिल करने हेतु संविधान में संशोधन पर विचार किया जाना चाहिये।
निष्कर्ष
भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य में लगातार कम निवेश राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 में नीतिगत और कार्यान्वयन के बीच मौजूद गंभीर अंतर को दर्शाता है। केंद्रीय सरकार के खर्च में वृद्धि, बेहतर वित्तीय संघवाद और कानूनी रूप से समर्थित वित्तपोषण तंत्र के बिना यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज, आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च में कमी और समानतापूर्ण स्वास्थ्य सेवा जैसे लक्ष्य हासिल करना असंभव रहेगा।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य वित्तपोषण के रुझानों का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिये और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च को सतत रूप से बढ़ाने के लिये आवश्यक संस्थागत, वित्तीय और कानूनी सुधारों का सुझाव दीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (NHP), 2017 का मुख्य लक्ष्य स्वास्थ्य व्यय के संदर्भ में क्या है?
इसका लक्ष्य 2025 तक सरकारी स्वास्थ्य व्यय को GDP के 2.5% तक बढ़ाना था, जिसमें केंद्र का हिस्सा GDP का 1% होना था।
2. महामारी के बाद केंद्र सरकार ने स्वास्थ्य वित्तपोषण क्षेत्र में क्या बदलाव किया है?
केंद्र का स्वास्थ्य खर्च 0.37% GDP (2020–21) से घटकर 0.29% GDP (2025–26) हो गया है, साथ ही राज्यों को किये जाने वाले वित्तीय अंतरण में भी कमी आई है।
3. स्वास्थ्य और शिक्षा उपकर (HEC) की प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
HEC मुख्य रूप से मूल स्वास्थ्य व्यय की जगह ले रहा है, न कि उसमें वृद्धि कर रहा है। वर्ष 2023–24 में इसके संग्रह का केवल 25% भाग स्वास्थ्य क्षेत्र में उपयोग हुआ।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)
प्रिलिम्स
प्रश्न. निम्नलिखित में से कौन-से 'राष्ट्रीय पोषण मिशन' (नेशनल न्यूट्रिशन मिशन) के उद्देश्य हैं? (2017)
- गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं में कुपोषण संबंधी जागरूकता उत्पन्न करना।
- छोटे बच्चों, किशोरियों और महिलाओं में रक्ताल्पता को कम करना।
- बाजरा, मोटे अनाज और अपरिष्कृत चावल के उपभोग को बढ़ाना।
- मुर्गी के अंडों के उपभोग को बढ़ाना।
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 1, 2 और 3
(c) केवल 1, 2 और 4
(d) केवल 3 और 4
उत्तर: (a)
मेन्स
प्रश्न. "एक कल्याणकारी राज्य की नैतिक अनिवार्यता के अलावा, प्राथमिक स्वास्थ्य संरचना धारणीय विकास की एक आवश्यक पूर्व शर्त है।" विश्लेषण कीजिये। (2021)