भारत में उपभोक्ता विश्वास | 03 Feb 2026

प्रिलिम्स के लिये: युक्तिसंगत GST, अवस्फीति, खुदरा मुद्रास्फीति, CPI, उपभोक्ता विश्वास सर्वेक्षण (CCS), अपस्फीति, मुद्रास्फीति, K-शेप्ड रिकवरी, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), MSME, पूंजीगत व्यय (कैपेक्स)                       

मेन्स के लिये: भारत में उपभोक्ता विश्वास को बढ़ावा देने वाले कारक और उनसे संबंधित चुनौतियाँ। भारत में स्थायी उपभोक्ता विश्वास बनाए रखने के लिये आवश्यक कदम।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस 

चर्चा में क्यों ?

प्रमुख नीतिगत सुधारों, आयकर दरों में कमी और युक्तिसंगत GST, के बाद आर्थिक संवृद्धि की आधारशिला मानी जाने वाली उपभोग क्षमता में वृद्धि हुई है, हाँलाकि उपभोक्ता विश्वास में हुए इस सकारात्मक परिवर्तन में अंतर्निहित दबाव अभी भी बने हुए हैं।

सारांश:

  • नीतिगत उपायों के परिणामस्वरूप मुद्रास्फीति में हुई गिरावट और कर सुधारों से उपभोक्ता विश्वास में अस्थायी रूप से सुधार हुआ है।
  • घरेलू ऋण, अपर्याप्त आय वृद्धि और असमानता वस्तुओं की मांग की स्थिरता की दृष्टि से खतरा उत्पन्न करते हैं।
  • स्थायी उपभोग-प्रधान विकास के लिये सर्वसमावेशी संवृद्धि, मज़दूरी में वृद्धि और वित्तीय अनुकूलन अनिवार्य हैं।

हाल के समय में किन कारकों ने उपभोक्ता विश्वास को बढ़ावा दिया है?

  • दीर्घोपयोगी उपभोक्ता वस्तुओं में वृद्धि: GST दरों में कटौती के परिणामस्वरूप अक्तूबर 2025 में हेडलाइन खुदरा मुद्रास्फीति घटकर रिकॉर्ड निम्न स्तर 0.25% पर आ गई, जिससे वस्तुएँ और सेवाएँ सुलभ हुईं। इसके फलस्वरूप वर्ष 2025 में दशहरा-दीपावली के दौरान उपभोक्ता दीर्घोपयोगी वस्तुओं के लिये ऋण की मांग पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 1.5 गुना रही, जो उपभोक्ता विश्वास में हुए सुधार का संकेत देती है।
  • ग्रामीण मज़दूरी में वृद्धि: तीन वर्षों तक औसतन शून्य रहने के बाद वास्तविक ग्रामीण मज़दूरी वृद्धि (मुद्रास्फीति समायोजित) 2025-26 की पहली तिमाही (अप्रैल–जून) में बढ़कर 4.1% हो गई। यह सुधार मुख्यतः ग्रामीण CPI मुद्रास्फीति के 5.5% से घटकर 2.4% (अप्रैल–जून 2025) होने के परिणामस्वरूप हुआ। सांकेतिक मज़दूरी वृद्धि 6.5% रही, जो मध्य 2023 के बाद का उच्चतम स्तर है।
  • शहरी मज़दूरी में वृद्धि: शहरी मज़दूरी के एक संकेतक—सूचीबद्ध कंपनियों के कर्मचारियों की लागत में वृद्धि—में जुलाई-सितंबर 2025 के दौरान वास्तविक रूप से 5.7% की वृद्धि दर्ज की गई, जो पिछले दो वर्षों से अधिक समय में सर्वाधिक है। इसमें भी निम्न शहरी मुद्रास्फीति (2.1%) का योगदान रहा।
  • नीतिगत समर्थन का स्थायी प्रभाव: वर्ष 2025 में RBI द्वारा की गई 125 आधार अंकों की दर कटौती का प्रभाव अभी भी अर्थव्यवस्था में संचरित हो रहा है, जो आगे भी मांग को समर्थन प्रदान करता रहेगा।

RBI का उपभोक्ता विश्वास सर्वेक्षण (CCS)

  • परिचय: उपभोक्ता विश्वास सर्वेक्षण (CCS) एक द्वि-मासिक सर्वेक्षण है, जिसे RBI द्वारा वर्तमान और अपेक्षित आर्थिक परिस्थितियों के प्रति उपभोक्ताओं की भावनाओं और दृष्टिकोण को मापने के लिये आयोजित किया जाता है।
  • कवरेज: परंपरागत रूप से और अपने मूल स्वरूप में CCS एक शहरी-केंद्रित सर्वेक्षण रहा है, जो प्रमुख महानगरों और शहरी केंद्रों (आमतौर पर 13–19 शहर, जैसे– मुंबई, दिल्ली, बंगलूरु, चेन्नई, कोलकाता, हैदराबाद आदि) में आयोजित किया जाता है।
    • RBI ने शहरी सर्वेक्षण के पूरक के रूप में अलग से ग्रामीण उपभोक्ता विश्वास सर्वेक्षण (RCCS) शुरू किया है।
    • RCCS विशेष रूप से 31 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी परिवारों को लक्षित करता है, जिससे घरेलू भावनाओं की अधिक समावेशी राष्ट्रीय तस्वीर मिलती है।
  • मुख्य मानक:
    • सामान्य आर्थिक स्थिति
    • रोज़गार परिदृश्य
    • समग्र मूल्य स्थिति / मुद्रास्फीति
    • स्वयं के परिवार की आय
    • वर्तमान और नियोजित व्यय
  • महत्त्व और उपयोग: यह RBI और नीति निर्धारकों को घरेलू उपभोक्ता मनोवृत्ति को समझने में मदद करता है, जिसका प्रभाव नीतिगत रुख, समग्र मांग, खुदरा बिक्री और उपभोक्ता-अनुकूल वस्तुओं के दृष्टिकोण पर पड़ता है।

भारत में उपभोक्ता विश्वास से संबंधित क्या चिंताएँ हैं?

  • घरेलू बैलेंस शीट की बिगड़ती स्थिति: घरेलू वित्तीय देयता वर्ष 2019-20 के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 3.9% से बढ़कर वर्ष 2023-24 में 6.2% हो गई, जिसके बाद वर्ष 2024–25 में यह हल्की गिरावट के साथ 4.7% रह गई। शुद्ध वित्तीय संपत्तियाँ वर्ष 2022–23 में GDP के 4.9% पर कई दशकों के निचले स्तर पर पहुँच गई थीं। वित्त वर्ष 2009 से 2023 के बीच वास्तविक व्यक्तिगत बैंक ऋण 2.9 गुना बढ़ा, जबकि औद्योगिक मज़दूरी केवल 1.9 गुना बढ़ी।
    • इससे घरेलू बैलेंस शीट पर दबाव बढ़ा है, जिससे ऋण सेवा लागत बढ़ी है और खपत की क्षमता घटी है, विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में।
  • अस्थिर आय वृद्धि: वास्तविक ग्रामीण मज़दूरी में हालिया सुधार मुख्य रूप से मुद्रास्फीति में तीव्र गिरावट के कारण हुए हैं, न कि अभिहित आय में उल्लेखनीय बढ़ोतरी के कारण। यदि खाद्य कीमतें अपस्फीति में बनी रहती हैं, तो किसानों की आय प्रभावित हो सकती है, जिससे मांग कमज़ोर होगी। 
    • यह प्रयोज्य आय को सीमित करेंगी और आवश्यक एवं विवेकाधीन दोनों प्रकार की वस्तुओं पर खर्च को प्रतिबंधित करेंगी।
  • आय और उपभोग असमानता: भारत की आर्थिक पुनर्बहाली K-आकार के पैटर्न को दर्शाती है, जिसमें समृद्ध वर्ग प्रीमियम और वैकल्पिक उपभोग को आगे बढ़ा रहा है, जबकि निम्न और मध्यम आय वर्ग की क्रय-शक्ति स्थिर या कमज़ोर बनी हुई है। इससे व्यापक उपभोक्ता आधार सीमित हो जाता है और समग्र मांग के विस्तार पर अंकुश लगता है।
    • K-आकार के पैटर्न एक असमान आर्थिक पुनर्प्राप्ति को दर्शाते हैं, जहाँ कुछ क्षेत्र या आय समूह तेज़ी से बढ़ते हैं जबकि अन्य में कमी जारी रहती है, जिससे असमानता में वृद्धि होती है।
  • व्यापक ढाँचागत समस्या: घटती घरेलू बचत की दरें, शिक्षा पर व्यय के भाग में कमी (जो भविष्य की रोज़गार-क्षमता को प्रभावित कर सकती है) तथा ऋण-आधारित उपभोग पर बढ़ती निर्भरता स्थिरता को लेकर चिंता उत्पन्न करती हैं। इसके साथ ही, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों की ओर झुकाव और स्वास्थ्य संबंधी व्यय में वृद्धि उपभोग के बदलते रुझानों को दर्शाती है, जिनके कल्याण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकते हैं।

भारत में सतत उपभोक्ता विश्वास बनाए रखने हेतु निम्नलिखित प्रमुख कदम आवश्यक हैं:

  • पारिवारिक आय को सुरक्षित और सुदृढ़ करना: नीति को श्रम-प्रधान निर्यात की ओर मोड़ना, उत्पादकता से जुड़ी बढ़ोतरी के माध्यम से वास्तविक वेतन वृद्धि सुनिश्चित करना तथा नौकरियों की गुणवत्ता तथा आय बढ़ाने के लिये 'न्यूनतम समर्थन मूल्य' (MSP) से आगे बढ़कर आपूर्ति शृंखला निवेश के साथ खेती को मज़बूत करना।
  • पारिवारिक वित्तीय सुरक्षा को पुनः मज़बूत करना: सकारात्मक वास्तविक रिटर्न के लिये वित्तीय बचत को प्रोत्साहित करना, असुरक्षित ऋणों पर RBI के व्यापक-विवेकपूर्ण मानदंडों और वित्तीय साक्षरता को लागू करना तथा एहतियाती बचत (precautionary saving) को कम करने के लिये सामाजिक सुरक्षा कवरेज (स्वास्थ्य, पेंशन) का विस्तार करना।
  • मूल्य स्थिरता और पूर्वानुमेयता सुनिश्चित करना: सक्रिय खाद्य मूल्य प्रबंधन के साथ एक अनुकूल मुद्रास्फीति व्यवस्था बनाए रखना और दीर्घकालिक पारिवारिक नियोजन के लिये पारदर्शी व स्थिर कर नीति (GST, प्रत्यक्ष कर) सुनिश्चित करना।
  • व्यापक और समावेशी विकास को बढ़ावा देना: लक्षित बुनियादी ढाँचे के माध्यम से ग्रामीण-शहरी अंतर को पाटना और 'K-शेप्ड के सुधार' का मुकाबला करने के लिये क्रेडिट (ऋण) और वैश्विक मूल्य शृंखला एकीकरण के माध्यम से MSME का समर्थन करना।
  • रणनीतिक और विश्वसनीय राजकोषीय नीति: पूंजीगत व्यय तथा मानव पूंजी निवेश के बीच संतुलन बनाना, 'काउंटर-साइक्लिक' (चक्र-विरोधी) उपायों के लिये बफर बनाने हेतु राजकोषीय विवेक के प्रति प्रतिबद्धता दिखाना एवं नीतिगत निश्चितता के माध्यम से निजी निवेश को प्रोत्साहित करना।

निष्कर्ष

हालिया नीतिगत प्रोत्साहनों और कम मुद्रास्फीति ने अल्पकाल में उपभोग को सहारा दिया है, लेकिन घटती घरेलू बचत, बढ़ता कर्ज़ तथा असमान आय वृद्धि के कारण भारत का उपभोक्ता विश्वास दीर्घकालिक दबाव में है। सतत उपभोक्ता विश्वास तभी संभव है जब सुरक्षित आय बढ़ाने, वित्तीय सुरक्षा कवच को पुनर्निर्मित करने एवं व्यापक एवं समावेशी आर्थिक विस्तार सुनिश्चित करने वाले संरचनात्मक सुधार किए जाएँ।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. भारत के उपभोग की मज़बूती अक्सर घरेलू बैलेंस शीट के कमज़ोर होने के कारण सवालों के घेरे में रहती है। भारतीय अर्थव्यवस्था में सतत उपभोक्ता विश्वास बनाए रखने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. हाल की किन नीतियों ने भारत में उपभोक्ता विश्वास को समर्थन दिया है?
कम आयकर दरें, GST का युक्तीकरण और RBI की ब्याज दरों में कटौती से मुद्रास्फीति और उधारी लागत घटी, जिससे अल्पकालिक उपभोग को बढ़ावा मिला।

2. हालिया ग्रामीण मज़दूरी वृद्धि को कमज़ोर क्यों माना जाता है?

यह वृद्धि मुख्यतः कम मुद्रास्फीति के कारण है, न कि मज़बूत नाममात्र आय वृद्धि से। अतः भविष्य में कीमतें बढ़ने पर यह टिकाऊ नहीं रह सकती।

3. उपभोग के संदर्भ में K-आकार की रिकवरी का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है असमान पुनर्प्राप्ति, जहाँ उच्च आय वर्ग का उपभोग बढ़ रहा है, जबकि निम्न आय वर्ग में मांग ठहरी हुई या कमज़ोर बनी हुई है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

मेन्स

प्रश्न. भारत की संभाव्य संवृद्धि के अनेक कारको में बचत दर सर्वाधिक प्रभावी है। क्या आप इससे सहमत हैं ? संवृद्धि संभाव्यता के अन्य कौन-से कारक उपलब्ध हैं? (2017)