स्टेट ऑफ इंडियाज़ एनवायरमेंट 2026
चर्चा में क्यों?
स्टेट ऑफ इंडियाज़ एनवायरमेंट (SOE) 2026 रिपोर्ट, जिसे विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र तथा डाउन टू अर्थ द्वारा संयुक्त रूप से जारी किया गया है, चेतावनी देती है कि मानवीय गतिविधियों के कारण कई ग्रह-सीमाएँ पार की जा रही हैं, साथ ही पारिस्थितिकी तंत्र का ह्रास के चलते भारत भर में मानव–बाघ संघर्ष भी तेज़ हो रहा है।
स्टेट ऑफ इंडियाज़ एनवायरमेंट (SOE) 2026 रिपोर्ट की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं?
- ग्रह-सीमाओं का संकट: SOE 2026 रिपोर्ट चेतावनी देती है कि पृथ्वी की स्थिरता बनाए रखने वाली नौ में से सात ग्रह-सीमाएँ (Planetary Boundaries) पार हो चुकी हैं, जिनमें महासागरीय अम्लीकरण सातवीं पार की गई सीमा के रूप में उभरकर सामने आया है।
- पार की जा चुकी ग्रह-सीमाओं में जलवायु परिवर्तन, जैवमंडलीय अखंडता, भूमि-प्रणाली में परिवर्तन, मीठे जल का क्षय, जैव-भू-रासायनिक प्रवाह, नवीन कृत्रिम तत्त्व (नोवेल एंटिटीज़) तथा महासागरीय अम्लीकरण शामिल हैं।
- औद्योगिक युग के बाद से महासागरों की अम्लता में लगभग 30-40% की वृद्धि हुई है, जिससे समुद्री ईकोसिस्टम पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो रहा है।
- जलवायु संकट की तीव्रता: रिपोर्ट रेखांकित करती है कि विश्व 1.5°C वैश्विक तापवृद्धि सीमा के उल्लंघन के कगार पर है, जो अपरिवर्तनीय जलवायु प्रभावों का संकेत देता है।
- जलवायु संबंधी व्यवधान अनुमान से पहले ही सामने आ रहे हैं, जिससे प्रवाल भित्ति और अमेज़न वर्षावन जैसे ईकोसिस्टम गंभीर टिपिंग पॉइंट की ओर धकेले जा रहे हैं।
- जैव विविधता और वनों में गिरावट: वैश्विक वन आवरण घटकर 59% रह गया है, जो 75% के सुरक्षित स्तर से काफी कम है, जबकि प्रजातियों के विलुप्त होने की दर प्रति मिलियन प्रजाति-वर्ष 100 से अधिक है (जो सुरक्षित सीमा से दस गुना अधिक है)।
- प्राकृतिक आवासों का क्षरण और पारिस्थितिकी असंतुलन जैव विविधता के ह्रास को तीव्र कर रहे हैं।
- स्वच्छ जल और प्रदूषण के खतरे: अत्यधिक दोहन और जलवायु परिवर्तन के कारण स्वच्छ जल के भंडार गंभीर दबाव में हैं।
- प्लास्टिक, सिंथेटिक रसायनों और अन्य नवीन तत्त्वों का बढ़ता प्रसार दीर्घकालिक पारिस्थितिक तथा स्वास्थ्य संबंधी जोखिम उत्पन्न करता है, जो प्रदूषण की बढ़ती चुनौती को रेखांकित करता है।
- मानव-बाघ संघर्ष में वृद्धि: रिपोर्ट के अनुसार आवास क्षरण, शिकार प्रजातियों की कमी तथा वनों के निकट मानव गतिविधियों के बढ़ने से बाघों के व्यवहार में परिवर्तन आ रहा है और मानव-बाघ मुठभेड़ों की घटनाएँ बढ़ रही हैं।
- आक्रामक पौधा लैंटाना कैमरा अब वनों और झाड़ीदार क्षेत्रों के लगभग 50% भाग पर विस्तृत हो चुका है, जिससे देशी घासों का दमन हो रहा है और बाघों के लिये उपलब्ध शिकार प्रजातियाँ घट रही हैं। इससे बाघों को मवेशियों का शिकार करने के लिये विवश होना पड़ता है, जिसके परिणामस्वरूप मानव-बाघ संपर्क और संघर्ष बढ़ जाता है।
अनुशंसाएँ
- संस्थागत अखंडता: पर्यावरणीय प्रक्रिया-आधारित कागज़ी कार्यवाही की बजाय वास्तविक पारिस्थितिकीय सार को प्राथमिकता देने के लिये राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) और पर्यावरणीय क्लियरिंग हाउसों को सुदृढ़ बनाना।
- संप्रभु जलवायु कार्रवाई: राष्ट्रीय लेखांकन में 'ग्रहों की सीमाओं' को एकीकृत करना और तकनीक-नेतृत्व वाले, 'फुल-स्टैक' डीकार्बोनाइजेशन।
- सह-अस्तित्व मॉडल: 'लैंडस्केप-स्केल' गवर्नेंस की ओर अग्रसर, जो स्थानीय समुदायों को संरक्षण में बाधा मानने के बजाय उन्हें प्राथमिक हितधारक के रूप में देखता है।
प्लैनेटरी बाउंड्री
- परिचय: 'प्लैनेटरी बाउंड्रीज़' फ्रेमवर्क उन सुरक्षित सीमाओं को परिभाषित करता है जिनके भीतर मानवता पृथ्वी की जीवन-सहायता प्रणालियों को अस्थिर किये बगैर कार्य कर सकती है।
- इसे सर्वप्रथम वर्ष 2009 में जोहान रॉकस्ट्रॉम के नेतृत्व में वैज्ञानिकों द्वारा प्रस्तावित किया गया था और वर्ष 2023 में अपडेट किया गया। यह नौ महत्त्वपूर्ण पृथ्वी प्रणाली प्रक्रियाओं की पहचान करता है जो ग्रहों की स्थिरता को नियंत्रित करती हैं।
- इन बाउंड्री को पार करने से आकस्मिक और अपरिवर्तनीय पर्यावरणीय परिवर्तनों का जोखिम बढ़ जाता है, जो पारिस्थितिक तंत्र, अर्थव्यवस्थाओं और मानव अस्तित्व के लिये खतरा उत्पन्न करते हैं।
- ये बाउंड्री परस्पर संबंधित हैं, जिसका अर्थ है कि एक प्रणाली में व्यवधान दूसरों पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है।
- ये नीति निर्माताओं और वैज्ञानिकों को यह आकलन करने में मदद करते हैं कि क्या मानवीय गतिविधियाँ पृथ्वी को उसके 'सुरक्षित परिचालन स्थान' से पृथक् कर रही हैं।
- नौ 'प्लैनेटरी बाउंड्रीज़' की स्थिति:
- जलवायु परिवर्तन: ग्रीनहाउस गैसों की बढ़ती सांद्रता गर्मी को रोकती है, जिससे वैश्विक तापन और जलवायु पैटर्न बदल जाते हैं। बढ़ते CO₂ स्तरों ने इस सीमा को सुरक्षित स्तर से परे पहुँचा दिया है।
- बायोस्फीयर इंटीग्रिटी (जैव विविधता हानि): प्रजातियों के विलुप्त होने की त्वरित दर और पारिस्थितिक तंत्र का क्षरण पृथ्वी के पारिस्थितिक संतुलन और लचीलेपन को कमज़ोर करता है।
- भूमि प्रणाली में परिवर्तन: वनों की कटाई, कृषि और शहरीकरण ने वैश्विक वन आवरण को सुरक्षित स्तर से नीचे कर दिया है, जिससे कार्बन अवशोषण की क्षमता और जैव विविधता कमज़ोर हुई है।
- मीठे जल की स्थिति में परिवर्तन: नदियों, झीलों और मृदा आर्द्रता के चक्रों में मानवीय हस्तक्षेप जल सुरक्षा, पारिस्थितिक तंत्र और जलवायु विनियमन के लिये खतरा उत्पन्न करता है।
- बायोजियोकेमिकल फ्लो: उर्वरकों से निकलने वाला अतिरिक्त नाइट्रोजन और फॉस्फोरस पोषक चक्रों को बाधित करता है, जिससे यूट्रोफिकेशन और पारिस्थितिक तंत्र में असंतुलन उत्पन्न होता है।
- नए प्रकार के पदार्थ (पारिस्थितिक तंत्र पर हमला): पर्याप्त सुरक्षा मूल्यांकन के बिना प्लास्टिक, कृत्रिम रसायन और आनुवंशिक रूप से संशोधित जीव (जीएमओ) जैसे नए पदार्थ पारिस्थितिक तंत्र में प्रवेश कर रहे हैं।
- महासागरीय अम्लीकरण: औद्योगिक युग के बाद से महासागर 30-40% अधिक अम्लीय हो गए हैं, जो प्रवाल (Corals) और कवचधारी (शेल फोर्मिंग) जीवों को नुकसान पहुँचा रहे हैं जिससे महासागरों की कार्बन अवशोषण क्षमता कमज़ोर हो रही है।
- वायुमंडलीय एरोसोल (सुरक्षित स्तर के भीतर, लेकिन संभावित जोखिम वाले): ये वायु में मौजूद कण हैं जो जलवायु और मानसून के प्रारूप को प्रभावित करते हैं। वर्तमान में, इनका स्तर सुरक्षित सीमा के भीतर है, लेकिन यह क्षेत्रीय रूप से व्यवधान उत्पन्न करते हैं।
- समतापमंडलीय ओज़ोन क्षरण (सुरक्षित सीमा के भीतर): मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत हुए वैश्विक प्रयासों के परिणामस्वरूप ओज़ोन परत की बहाली पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि सिद्ध हुई है।
निष्कर्ष:
SOE 2026 रिपोर्ट एक कठोर 'प्लेनेटरी हेल्थ चेक' (ग्रह के स्वास्थ्य की जाँच) के रूप में कार्य करती है, जो इस मूल सत्य को रेखांकित करती है कि “खराब पर्यावरण कभी भी अच्छी अर्थव्यवस्था नहीं बन सकता।” चूँकि भारत नौ में से सात 'प्लेनेटरी बाउंड्रीज़' (ग्रह की सीमाओं) का उल्लंघन कर रहा है, इसलिये विकसित भारत @ 2047 के विज़न को प्राप्त करने के लिये भारत को ‘प्रतिक्रियात्मक क्षतिपूर्ति’ (Reactive Compensation) के मॉडल से बदलकर ‘सक्रिय क्षतिपूर्ति’ (Proactive Restoration) के मॉडल को अपनाना होगा।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. पर्यावरणीय शासन के एक उपकरण के रूप में प्लैनेटरी बाउंड्रीज़ फ्रेमवर्क की अवधारणा पर चर्चा कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. प्लैनेटरी बाउंड्रीज़ क्या हैं?
ये सुरक्षित पारिस्थितिक सीमाएँ हैं, जो यह सुनिश्चित करती हैं कि मानव गतिविधियाँ पृथ्वी की जीवन-समर्थन प्रणालियों को अस्थिर न करें। इन सीमाओं के भीतर कार्य करके मानवता अपूरणीय पर्यावरणीय परिवर्तनों के जोखिम में वृद्धि किये बिना आगे बढ़ सकती है। इन सीमाओं का उल्लंघन गंभीर और अपरिवर्तनीय पर्यावरणीय क्षति का खतरा उत्पन्न करता है।
2. SOE 2026 के अनुसार कितनी प्लैनेटरी बाउंड्रीज़ का उल्लंघन हो चुका है?
नौ में से सात ग्रहीय सीमाओं का अतिक्रमण हो चुका है। इनमें जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता हानि, भूमि-प्रणाली में बदलाव, ताज़े पानी की कमी, जैव-रासायनिक चक्र प्रवाह, नवीन तत्त्वों का निर्माण और महासागरों का अम्लीकरण शामिल हैं।
3. महासागरीय अम्लीकरण एक बड़ी चिंता क्यों है?
औद्योगिक युग के बाद से महासागरों की अम्लता में 30–40% की वृद्धि हुई है, जिससे प्रवाल भित्तियों, समुद्री जैव विविधता और महासागरों की कार्बन अवशोषण क्षमता को गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है।
4. लैंटाना कैमारा और मानव–बाघ संघर्ष के बीच क्या संबंध है?
यह आक्रामक पौधा स्थानीय घासों को दबाकर, शिकार की उपलब्धता को कम करता है और इसके परिणामस्वरूप, बाघों को पशुधन पर हमला करने के लिए मजबूर करता है। इससे मानव और बाघ के बीच संघर्ष में वृद्धि होती है।
5. SOE 2026 रिपोर्ट कौन-से संस्थागत सुधार सुझाती है?
रिपोर्ट में राष्ट्रीय हरित अधिकरण को सशक्त बनाने, राष्ट्रीय लेखांकन में प्लैनेटरी बाउंड्रीज़ को शामिल करने तथा समुदाय-आधारित परिदृश्य को बढ़ावा देने की सिफारिश की गई है।
https://www.youtube.com/watch?v=gI7i4pJ8gCE
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)
मेन्स
प्रश्न. ग्लोबल वार्मिंग (वैश्विक तापन) की चर्चा कीजिये और वैश्विक जलवायु पर इसके प्रभावों का उल्लेख कीजिये। क्योटो प्रोटोकॉल, 1997 के आलोक में ग्लोबल वार्मिंग का कारण बनने वाली ग्रीनहाउस गैसों के स्तर को कम करने के लिये नियंत्रण उपायों को समझाइये। (2022)
रेलटेक नीति और e-RCT डिजिटलीकरण
चर्चा में क्यों?
रेल मंत्रालय ने अपनी ‘52 सप्ताह में 52 सुधार’ पहल के अंतर्गत दो प्रमुख सुधार रेलटेक नीति (RailTech Policy) और रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल (e-RCT) का डिजिटलीकरण प्रस्तुत किये हैं, जिनका उद्देश्य पारदर्शिता बढ़ाना तथा न्याय तक पहुँच को अधिक सुगम बनाना है।
रेलटेक नीति और e-RCT डिजिटलीकरण क्या है?
रेलटेक नीति
- परिचय: यह एक समर्पित, उच्च-प्रौद्योगिकी, 24×7 डिजिटल सिंगल-विंडो प्लेटफॉर्म है, जो प्रस्तावों के एंड-टू-एंड डिजिटल सबमिशन और प्रोसेसिंग को सक्षम बनाता है। इसके माध्यम से नवप्रवर्तक सरल एक-चरणीय प्रक्रिया में विस्तृत प्रस्ताव प्रस्तुत कर सकते हैं, जिससे पुराने बहु-चरणीय विक्रेता चयन तंत्र की जगह अधिक कुशल व्यवस्था स्थापित होती है।
- रेलटेक पोर्टल: रेलवे में नवाचार को बढ़ावा देने हेतु नवप्रवर्तकों, स्टार्ट-अप्स, उद्योग और संस्थानों के लिये एक समर्पित रेलटेक पोर्टल स्थापित किया जाएगा।
- वित्तीय प्रोत्साहन: नीति के अंतर्गत स्केल-अप अनुदान को तीन गुना से अधिक बढ़ाया गया है तथा प्रोटोटाइप विकास और परीक्षण के लिये अधिकतम अनुदान को दोगुना किया गया है। रेलवे व्यवहार्य समाधानों के विकास के लिये कुल विकास लागत का 50% तक वित्तीय सहायता प्रदान करेगा।
- प्रमुख नवाचार क्षेत्र: यह नीति प्रमुख परिचालन चुनौतियों के समाधान हेतु निम्नलिखित क्षेत्रों पर केंद्रित है:
- AI-आधारित हाथी घुसपैठ पहचान प्रणाली (EIDS)
- कोचों में AI-आधारित अग्नि पहचान प्रणाली
- ड्रोन आधारित टूटी हुई रेल की पटरियों की पहचान
- कोहरे की स्थिति में अवरोध पहचान प्रणाली
- AI-आधारित कोच सफाई निगरानी प्रणाली
- पार्सल वैन पर सेंसर आधारित भार गणना प्रणाली
- स्केलेबिलिटी: सफल नवाचारों को दीर्घकालिक बड़े ऑर्डर के माध्यम से समर्थन दिया जाएगा, ताकि इन समाधानों का विस्तार पूरे रेलवे नेटवर्क में किया जा सके।
रेलवे दावा अधिकरण (e-RCT) का डिजिटलीकरण
- e-RCT डिजिटलीकरण: यह रेलवे दावा अधिकरण (RCT) के संपूर्ण कंप्यूटरीकरण और डिजिटलीकरण की शुरुआत करता है, जिससे दावा दाखिल करना, प्रक्रिया और निर्णय तेज़ और पारदर्शी हो जाता है।
- e-RCT के मुख्य मॉड्यूल: यह प्लेटफॉर्म तीन प्रमुख घटकों पर आधारित है:
- e-फाइलिंग: SMS और ई-मेल के माध्यम से त्वरित पावती के साथ 24x7 ऑनलाइन फाइलिंग।
- केस इनफॉर्मेशन सिस्टम (CIS): फाइलिंग से लेकर अंतिम निपटान तक रियल टाइम केस ट्रैकिंग के लिये केंद्रीकृत डेटाबेस।
- दस्तावेज़ प्रबंधन प्रणाली (DMS): डिजिटल रूप से हस्ताक्षरित अभिलेखों के साथ अभिवचन, आदेश और निर्णयों का डिजिटल भंडारण।
- e-RCT का कानूनी आधार: रेलवे दावा अधिकरण एक अर्द्ध-न्यायिक निकाय है जिसका गठन रेलवे दावा अधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत दुर्घटनाओं में मृत्यु/चोट, अप्रिय घटनाओं, माल की हानि और किराए की वापसी से संबंधित दावों का निर्णय करने के लिये किया गया है। संपूर्ण भारत में इसकी 23 पीठें हैं (मुख्य पीठ दिल्ली में)।
- समय-सीमा और विस्तार: आगामी 12 महीनों में संपूर्ण भारत में सभी 23 RCT पीठों को पूरी तरह से डिजिटल बनाने का लक्ष्य है। सफल होने पर इस मॉडल को केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण जैसे अन्य अधिकरणों तक बढ़ाया जा सकता है।
- नागरिक-केंद्रित लाभ: नई व्यवस्था पीड़ित यात्रियों को देश में कहीं से भी इलेक्ट्रॉनिक रूप से दावा दाखिल करने की अनुमति देती है, जिससे विशेष रूप से अंतर-राज्यीय यात्रा घटनाओं में, क्षेत्राधिकार वाली पीठों को लेकर भ्रम समाप्त हो जाता है।
- यह तेज़ी से मामलों के निपटान, कम स्थगन, वास्तविक समय स्थिति का अपडेट, आदेशों तक ऑनलाइन पहुँच, मुद्रण और कूरियर संबंधी खर्चों को कम करके वादियों के लिये महत्त्वपूर्ण लागत बचत सुनिश्चित करता है।
52 सप्ताह 52 सुधार संकल्प
- परिचय: वर्ष 2026 के प्रारंभ में शुरू किया गया यह कार्यक्रम एक महत्त्वाकांक्षी और समयबद्ध कार्यक्रम है। यह पहल भारतीय रेलवे को संपूर्ण कैलेंडर वर्ष 2026 के दौरान प्रति सप्ताह एक प्रमुख संरचनात्मक सुधार (Structural Reform) लागू करने के लिये प्रतिबद्ध करती है। इसका प्राथमिक उद्देश्य राष्ट्रीय परिवहन जीवन-रेखा का एक व्यापक, पारदर्शी और भविष्योन्मुखी रूपांतरण करना है।
- विज़न का संरेखण: यह पहल भारतीय रेलवे की व्यापक ‘रिफॉर्म्स एक्सप्रेस’ विज़न के साथ संरेखित है। यह कार्यक्रम पिछले दशक में रेलवे क्षेत्र में किये गए बुनियादी सुधारों पर आधारित है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. ‘52 सप्ताह में 52 सुधार’ पहल क्या है?
यह 2026 में रेल मंत्रालय द्वारा शुरू किया गया एक समयबद्ध कार्यक्रम है, जिसके अंतर्गत पूरे वर्ष में प्रत्येक सप्ताह एक प्रमुख संरचनात्मक सुधार लागू किया जाता है। इसका उद्देश्य रेलवे का व्यापक आधुनिकीकरण करना है।
2. रेलटेक नीति (RailTech Policy) क्या है और इसका मुख्य उद्देश्य क्या है?
यह एक डिजिटल सिंगल-विंडो प्लेटफॉर्म (सुधार संख्या तीन) है, जिसका उद्देश्य नवाचारकर्त्ताओं और स्टार्टअप्स को जोड़ना, प्रस्ताव प्रस्तुत करने की प्रक्रिया को सरल बनाना तथा रेलवे में तकनीकी समाधानों के लिये बेहतर वित्तपोषण उपलब्ध कराना है।
3. e-RCT प्रणाली के तीन प्रमुख मॉड्यूल कौन-से हैं?
ई-फाइलिंग (E-Filing), केस सूचना प्रणाली (CIS), दस्तावेज़ प्रबंधन प्रणाली (DMS) ये तीनों मिलकर एंड-टू-एंड डिजिटल केस प्रबंधन को सक्षम बनाते हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्षों के प्रश्न (PYQs)
प्रिलिम्स:
प्रश्न. भारतीय रेलवे द्वारा उपयोग किये जाने वाले जैव-शौचालय के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2015)
- जैव-शौचालय में मानव अपशिष्ट का अपघटन एक कवक इनोकुलम द्वारा शुरू किया जाता है।
- इस अपघटन में अमोनिया और जलवाष्प एकमात्र अंतिम उत्पाद हैं, जो वायुमंडल में निर्मुक्त होते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (d)
वीर सावरकर की पुण्यतिथि
प्रधानमंत्री ने विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) की 60वीं पुण्यतिथि (26 फरवरी, 2026) पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। उनका निधन 26 फरवरी, 1966 को बंबई में हुआ था।
विनायक दामोदर सावरकर
- परिचय: वे एक क्रांतिकारी राष्ट्रवादी, राजनीतिक विचारक और समाज सुधारक थे, जो बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल जैसे नेताओं से प्रेरित थे। उन्हें स्वातंत्र्यवीर सावरकर के नाम से भी जाना जाता था।
- क्रांतिकारी राष्ट्रवाद: उन्होंने वर्ष 1899 में मित्र मेला की स्थापना की, जो बाद में वर्ष 1904 में अभिनव भारत सोसाइटी के रूप में विकसित हुआ। उन्होंने लंदन में फ्री इंडिया सोसाइटी (1906) की भी स्थापना की। वे क्रांतिकारी गतिविधियों के केंद्र, इंडिया हाउस (श्यामजी कृष्ण वर्मा द्वारा लंदन में स्थापित) से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए थे।
- मुकदमा और कालापानी की सज़ा: उन्हें नासिक के कलेक्टर की हत्या की साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था (नासिक षड्यंत्र मामला, 1910)। उन्हें मार्सिले (फ्राँस) के रास्ते ले जाते समय उन्होंने अंग्रेजों से भागने का एक प्रयास किया, लेकिन उन्हें दोबारा पकड़ लिया गया और मुकदमा चलाकर कालापानी की सज़ा सुनाई गई।
- मुकदमे के बाद, उन्हें 50 साल के कारावास की सज़ा सुनाई गई और वर्ष 1911 में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की कुख्यात सेलुलर जेल (कालापानी) में निर्वासित कर दिया गया। वर्ष 1911 से 1920 के बीच कई दया याचिका के बाद, उन्हें अंततः 1924 में रिहा किया गया।
- राजनीतिक कॅरियर: उन्होंने वर्ष 1937 से 1943 तक हिंदू महासभा के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन (1942) का विरोध करते हुए इसे अव्यावहारिक बताया। इसके अलावा वे क्रिप्स मिशन (1942) और वेवेल योजना (1945) पर हुई चर्चाओं में भी शामिल रहे।
- सामाजिक सुधार: उन्होंने अस्पृश्यता और जातिगत भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष किया। इसके लिये उन्होंने अंतर-जातीय विवाह को प्रोत्साहित किया, वर्ष 1931 में रत्नागिरि में पतित-पावन मंदिर की स्थापना कर दलितों के मंदिर प्रवेश का समर्थन किया तथा समुद्र पार यात्रा (सी-क्रॉसिंग) के अधिकार का भी समर्थन किया।
- साहित्यिक योगदान: उन्होंने अपनी प्रभावशाली पुस्तक 'द हिस्ट्री ऑफ द फर्स्ट वार ऑफ इंडियन इंडिपेंडेंस' (1909) लिखी, जिसने 1857 के विद्रोह को एक एकीकृत राष्ट्रवादी संघर्ष के रूप में पुनर्परिभाषित किया। वे अपने लेखन (जैसे– 'एसेंशियल्स ऑफ हिंदुत्व') के लिये कभी-कभी 'महरट्टा' (Mahratta) उपनाम का उपयोग भी करते थे।
- वर्ष 1923 में रत्नागिरि में नज़रबंदी के दौरान, उन्होंने 'हिंदुत्व: हू इज़ अ हिंदू?' नामक कालजयी रचना की। इस पुस्तक में उन्होंने भारत को एक सांस्कृतिक और सभ्यतागत पहचान के आधार पर 'हिंदू राष्ट्र' के रूप में परिभाषित किया।
- विरासत: सावरकर के बलिदानों को एक प्रतीकात्मक सम्मान देते हुए वर्ष 2002 में पोर्ट ब्लेयर हवाई अड्डे का नाम बदलकर वीर सावरकर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा कर दिया गया।
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स्पेस साइबर सुरक्षा हेतु CERT-In फ्रेमवर्क
भारतीय कंप्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया टीम (CERT-In) ने सैटकॉम उद्योग संघ (SIA-भारत) के सहयोग से अंतरिक्ष साइबर सुरक्षा के लिये एक व्यापक परामर्शात्मक फ्रेमवर्क जारी किया है, जिसका उद्देश्य उभरते साइबर जोखिमों से भारत की अंतरिक्ष परिसंपत्तियों की सुरक्षा करना है।
- फ्रेमवर्क का उद्देश्य भारत के विस्तारित होते अंतरिक्ष ईकोसिस्टम में ‘सिक्योर बाय डिज़ाइन’ आर्किटेक्चर को बढ़ावा देते हुए अनुकूलनशीलता, जवाबदेही और सक्रिय जोखिम प्रबंधन की संस्कृति को प्रोत्साहित करना है।
- ये दिशा-निर्देश परामर्शात्मक प्रकृति के हैं और सभी हितधारकों पर लागू होते हैं, जिनमें सरकारी एजेंसियाँ, उपग्रह सेवा प्रदाता, ग्राउंड स्टेशन ऑपरेटर, विक्रेता तथा निजी अंतरिक्ष उद्यम शामिल हैं।
फ्रेमवर्क के प्रमुख प्रावधान
- जोखिम आकलन: यह अंतरिक्ष प्रणालियों के लिये विशिष्ट जोखिमों की पहचान करता है, जैसे– सिग्नल जैमिंग, स्पूफिंग, अनधिकृत कमांड अपलिंक, ग्राउंड स्टेशन से समझौता तथा फर्मवेयर में हेरफेर।
- सेगमेंट-वार सुरक्षा नियंत्रण: यह अंतरिक्ष खंड, ग्राउंड अवसंरचना, संचार लिंक और उपयोगकर्त्ता टर्मिनलों में प्रमाणीकरण, एंक्रिप्शन, अभिगम नियंत्रण तथा घुसपैठ पहचान को शामिल करते हुए सुरक्षा उपायों को अनिवार्य करता है।
- घटना प्रतिक्रिया: CERT-In के निर्देशों के अनुरूप घटना की पहचान, प्रतिक्रिया और रिपोर्टिंग के लिये अधिदेशों को रेखांकित करता है।
- शासन: सैटकॉम प्रणालियों का संचालन करने वाले संगठनों में मुख्य सूचना सुरक्षा अधिकारी (CISO) की नियुक्ति पर बल देता है।
- आपूर्ति शृंखला सुरक्षा: इसमें जोखिम मूल्यांकन, आपूर्ति शृंखला सुरक्षा और उपकरणों के प्रमाणन के प्रावधान शामिल हैं।
- वैश्विक मानकों के साथ संरेखण: यह ढाँचा अंतर्राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा ढाँचों के साथ संरेखित है, जिसमें अंतर्राष्ट्रीय दूरसंचार संघ (ITU), अंतरिक्ष डेटा प्रणाली के लिये सलाहकार समिति (CCSDS), राष्ट्रीय मानक एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (NIST), SPACE-शील्ड, TREKS और SPARTA (अंतरिक्ष हमला अनुसंधान और रणनीति विश्लेषण) शामिल हैं।
CERT-In
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 70B के तहत नामित CERT-In हैकिंग और फिशिंग जैसे साइबर खतरों का जवाब देने के लिये भारत की राष्ट्रीय एजेंसी है।
- वर्ष 2004 से इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत संचालित, यह साइबर घटनाओं से निपटने के लिये 24×7 हेल्प डेस्क संचालित करता है और रोकथाम तथा सुरक्षा प्रबंधन सेवाएँ प्रदान करता है।
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और पढ़ें: भारतीय कंप्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया टीम (CERT-In) |
सीमा-पार संरक्षण के लिये भारत-नेपाल समझौता ज्ञापन
भारत के केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने नेपाल के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के साथ वन, वन्यजीव, पर्यावरण, जैव विविधता संरक्षण और जलवायु परिवर्तन के क्षेत्रों में द्विपक्षीय सहयोग को बढ़ावा देने के लिये एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किये हैं।
- भूदृश्य स्तर पर संरक्षण: इस समझौता ज्ञापन में हाथियों, गंगा डॉल्फिन, गैंडों, हिम तेंदुओं, बाघ और गिद्ध जैसी प्रमुख प्रजातियों सहित भूभाग स्तर पर जैव विविधता संरक्षण रणनीतियों को तैयार करने में सहयोग की परिकल्पना की गई है।
- सीमा-पार पारिस्थितिक तंत्रों पर ध्यान केंद्रित करना: अपने साझा पारिस्थितिक तंत्रों और सीमा-पार वन्यजीव पर्यावासों को पहचानते हुए, दोनों देशों ने वन्यजीव गलियारों को बहाल करने और क्षेत्रों को आपस में जोड़ने पर विशेष ध्यान देने के साथ समन्वय को मज़बूत करने पर सहमति व्यक्त की।
- उदाहरण के तौर पर, खाता कॉरिडोर (नेपाल के बर्दिया राष्ट्रीय उद्यान को भारत के कतर्नियाघाट वन्यजीव अभयारण्य से जोड़ता है।
- वाल्मीकि-चितवन लिंकेज (भारत के बिहार में स्थित वाल्मीकि टाइगर रिज़र्व, जो नेपाल के चितवन नेशनल पार्क और पर्सा वन्यजीव अभयारण्य के निकट स्थित है।)
- वन्यजीव अपराध: समझौते का एक महत्त्वपूर्ण पहलू वन और वन्यजीव अपराधों पर अंकुश लगाना है। इसके तहत, जैव विविधता संरक्षण के खतरों से निपटा जाएगा और प्रवर्तन एजेंसियों के अग्रिम पंक्ति के कर्मचारियों के क्षमता निर्माण को मज़बूत किया जाएगा।
- उदाहरण के लिये, गैंडे के सींगों के लिये अवैध शिकार पर अंकुश लगाना, बाघ की खाल, हड्डियों, पंजों, दाँतों और अन्य अंगों के लिये अवैध शिकार पर अंकुश लगाना, हाथी के दाँतों (हाथीदाँत) के लिये अवैध शिकार पर अंकुश लगाना आदि।
- बहुपक्षीय समझौतों के प्रति प्रतिबद्धता: भारत और नेपाल दोनों बहुपक्षीय पर्यावरण समझौतों और सम्मेलनों पर सहयोग करने के लिये सहमत हुए हैं क्योंकि वे अंतर्राष्ट्रीय बिग कैट एलायंस (IBCA), जैव विविधता पर कन्वेंशन (CBD, 1992), वन्य जीवों एवं वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन (CITES, 1973) आदि के पक्षकार हैं।
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