प्रिलिम्स फैक्ट्स (26 Feb, 2026)



‘कार्बन कैप्चर एंड यूटिलाइज़ेशन’ (CCU) तकनीक

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों?

कार्बन कैप्चर एंड यूटिलाइज़ेशन (CCU) एक उभरती हुई जलवायु शमन तकनीक है जो औद्योगिक उत्सर्जन से कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) को संगृहीत करके तथा वर्ष 2070 तक भारत को चक्रीय अर्थव्यवस्था और नेट-ज़ीरो लक्ष्य की ओर ले जाने में मदद कर सकती है।

कार्बन कैप्चर और उसका उपयोग क्या है?

  • CCU: यह उन तकनीकों को संदर्भित करता है जो औद्योगिक स्रोतों से या सीधे हवा से CO₂ उत्सर्जन को संगृहीत करके उन्हें ईंधन, रसायन और निर्माण सामग्री जैसे उपयोगी उत्पादों में परिवर्तित करती हैं। 
    • कार्बन कैप्चर एंड स्टोरेज (CCS) CO₂ को स्थायी रूप से भूमिगत रूप से संगृहीत करने पर केंद्रित है, जबकि CCUS में कैप्चर किये गए कार्बन को आर्थिक उपयोग में लाया जाता है।
  • भारत के लिये प्रासंगिकता: भारत चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका के बाद विश्व का तीसरा सबसे बड़ा CO₂ उत्सर्जक है। देश में उत्सर्जन का एक बड़ा हिस्सा विद्युत्, सीमेंट, इस्पात और रसायन उद्योगों से आता है। इन औद्योगिक प्रक्रियाओं को कार्बनमुक्त करने के लिये भारत को कार्बन कैप्चर और यूटिलाइज़ेशन (CCU) तकनीक की आवश्यकता है, क्योंकि इन्हें केवल नवीकरणीय ऊर्जा से पूरी तरह से कार्बनमुक्त करना चुनौतीपूर्ण है।
  • भारत की वर्तमान स्थिति और पहलें:
    • सरकारी पहल: केंद्रीय बजट 2026-27 में अगले 5 वर्षों में रसायन क्षेत्र सहित प्रमुख उद्योगों में कार्बन कैप्चर, यूटिलाइज़ेशन और स्टोरेज (CCUS) प्रौद्योगिकियों के विकास के समर्थन हेतु 20,000 करोड़ रुपये के आवंटन की घोषणा की गई है।
      • विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग ने CCU के लिये एक विशिष्ट अनुसंधान एवं विकास संबंधी रूपरेखा तैयार की है।
      • पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने CCUS के लिये वर्ष 2030 का मसौदा रूपरेखा प्रस्तुत किया है।
    • निजी क्षेत्र की परियोजनाएँ: अंबुजा सीमेंट, एक परियोजना के तहत, IIT बॉम्बे के सहयोग से एक भारत-स्वीडन पायलट परियोजना पर कार्य कर रही है। इस परियोजना का लक्ष्य संगृहीत  कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) को ईंधन और उपयोगी सामग्रियों में परिवर्तित करना है।
      • जेके सीमेंट हल्के कंक्रीट ब्लॉक और ओलेफिन जैसे अनुप्रयोगों के लिये CO₂ को कैप्चर करने हेतु एक CCU टेस्टबेड पर सहयोग कर रहा है।
      • ऑर्गेनिक रीसाइक्लिंग सिस्टम्स लिमिटेड (ORSL) भारत के पहले बायो-कार्बन कैप्चर और यूटिलाइजेशन (Bio-CCU) पायलट प्रोजेक्ट का संचालन कर रही है, जो बायोगैस स्ट्रीम से CO₂ को बायो-अल्कोहल और विशेष रसायनों में परिवर्तित कर रही है।
  • वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाएँ: यूरोपीय संघ की बायो-इकोनॉमी स्ट्रेटजी और चक्रीय अर्थव्यवस्था कार्य योजना CO₂ को फीडस्टॉक में परिवर्तित करने के लिये कार्बन कैप्चर एवं उसके उपयोग का स्पष्ट रूप से समर्थन करती है, इसे सर्कुलरिटी और सस्टेनेबिलिटी संबंधी लक्ष्यों से जोड़ती है। 
    • बेल्जियम में एक परियोजना इस्पात और रासायनिक उत्पादन के लिये कैप्चर की गई CO₂ को कार्बन मोनोऑक्साइड में परिवर्तित करने की तकनीक का परीक्षण कर रही है। 
    • अमेरिका कार्बन कैप्चर एवं उसके उपयोग को बढ़ाने के लिये टैक्स क्रेडिट और वित्तपोषण के संयोजन का उपयोग करता है। 
    • संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की अल रियाद परियोजना और आगामी 'CO₂-टू-केमिकल्स' हब, हरित हाइड्रोजन के साथ कार्बन कैप्चर एवं उपयोग (CCU) के एकीकरण का उत्कृष्ट उदाहरण हैं, जो टिकाऊ औद्योगिक विकास को नई दिशा दे रहे हैं।
  • भारत के लिये प्रमुख चुनौतियाँ:
    • लागत प्रतिस्पर्द्धात्मकता: कार्बन कैप्चर एवं उसकाउपयोग ऊर्जा-गहन और महंगा है; नीतिगत प्रोत्साहनों के बगैर, उत्पाद सस्ते जीवाश्म-आधारित विकल्पों के साथ प्रतिस्पर्द्धा नहीं कर सकते।
    • अवसंरचना तत्परता: सह-स्थित औद्योगिक क्लस्टर और विश्वसनीय CO₂ परिवहन की आवश्यकता है, जो असमान रूप से विकसित हैं।
    • नीति एवं मानक अंतराल: स्पष्ट मानकों, प्रमाणन और बाज़ार संकेतों का अभाव निवेशकों के लिये अनिश्चितता उत्पन्न करते हैं।

CCUS_Process

कार्बन कैप्चर में उपयोग होने वाली प्रौद्योगिकियाँ क्या हैं?

कैप्चर फेज़

  • पोस्ट-कंबशन कैप्चर: ईंधन दहन के पश्चात् फ्लू गैसों से पृथक्करण, सामान्यतः रासायनिक विलायकों (जैसे– एमीन-आधारित अवशोषण) का उपयोग करके।
  • प्री-कंबशन कैप्चर: ईंधन का सिनगैस मिश्रण में रूपांतरण, उसके बाद दहन से पूर्व CO₂ पृथक्करण।
  • ऑक्सी-फ्यूल कंबशन: आसान कैप्चर के लिये CO₂-समृद्ध निकास धारा उत्पन्न करने हेतु ईंधन को लगभग शुद्ध ऑक्सीजन में जलाना।
  • डायरेक्ट एयर कैप्चर (DAC): सॉर्बेंट या सॉल्वेंट का उपयोग करके वायु से CO₂ निष्कर्षण, यद्यपि निम्न वायुमंडलीय सांद्रता के कारण यह अधिक ऊर्जा-गहन है।

यूटिलाइज़ेशन फेज़

  • प्रत्यक्ष उपयोग (गैर-रूपांतरण): यह CO₂ का उसके भौतिक गुणों के लिये उपयोग करता है, बिना उसके आणविक संरचना को बदले। प्रमुख अनुप्रयोगों में शामिल हैं:
    • संवर्द्धित तेल की पुनःप्राप्ति (EOR): अधिक तेल निकालने के लिये कैप्चर की गई CO₂ को समाप्त होते तेल क्षेत्रों में इंजेक्ट करना। यह सबसे परिपक्व अनुप्रयोग है, किंतु विवादास्पद है क्योंकि यह आगे जीवाश्म ईंधन निष्कर्षण को सक्षम बनाता है।
    • खाद्य एवं पेय उद्योग: पेय पदार्थों को कार्बोनेटेड बनाने और शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिये संशोधित पैकेजिंग में उपयोग किया जाता है।
    • ग्रीनहाउस एवं शैवाल संवर्द्धन: पौधों की वृद्धि को बढ़ावा देने और शैवाल उगाने के लिये CO₂ एक उर्वरक के रूप में कार्य करती है।
    • रेफ्रिजरेंट और ड्राई आइस: औद्योगिक शीतलन प्रणालियों तथा परिवहन के दौरान शीतलन बनाए रखने के लिये उपयोग किये जाते हैं।
  • रसायनों एवं ईंधनों में रूपांतरण: इसमें CO₂ को रासायनिक प्रक्रियाओं के माध्यम से जटिल अणुओं में परिवर्तित किया जाता है, जिसके लिये पर्याप्त ऊर्जा और उत्प्रेरकों की आवश्यकता होती है।
    • सिंथेटिक ईंधन (ई-फ्यूल): कैप्चर किये गए CO₂ को ग्रीन हाइड्रोजन के साथ संयोजित करने पर मेथनॉल, गैसोलीन या जेट ईंधन जैसे ‘ड्रॉप-इन रेडी’ ईंधन तैयार किये जा सकते हैं। हालाँकि, इनके उत्पादन में अत्यधिक ऊर्जा लगती है और जलने पर ये पुनः CO₂ को वायुमंडल में त्याग देते हैं।
    • रसायन: CO₂ का उपयोग पॉलिमर, प्लास्टिक तथा यूरिया (एक प्रमुख उर्वरक घटक) के उत्पादन में किया जा सकता है।
  • खनिजीकरण (CO₂ से खनिज): यह प्रक्रिया प्राकृतिक भू-रासायनिक चक्रों का अनुकरण करती है, जिसमें CO₂ को खनिजों अथवा औद्योगिक क्षारीय अपशिष्टों के साथ अभिक्रिया कराकर स्थायी एवं ठोस कार्बोनेट में रूपांतरित किया जाता है। इस प्रकार CO₂ का दीर्घकालिक और स्थायी रूप से सुरक्षित भंडारण सुनिश्चित होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. कार्बन अभिग्रहण उपयोग (CCU) क्या है?
CCU एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें CO₂ को औद्योगिक स्रोतों या सीधे वायु से कैप्चर कर उसे ईंधन, रसायन और निर्माण सामग्री जैसे उपयोगी उत्पादों में परिवर्तित किया जाता है, जिससे परिपत्र कार्बन अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलता है।

2. CCU CCS से किस प्रकार भिन्न है?
CCS में कैप्चर किये गए CO₂ को स्थायी रूप से भूमिगत भंडारित किया जाता है ताकि वह वायुमंडल में न जाए, जबकि CCU में उसी CO₂ का विभिन्न आर्थिक एवं औद्योगिक उपयोगों के लिये पुनः प्रयोग किया जाता है।

3. भारत के लिये CCU क्यों महत्त्वपूर्ण है?
भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा CO₂ उत्सर्जक है, इसलिये सीमेंट और इस्पात जैसे हार्ड-टू-एबेट क्षेत्रों के डीकार्बोनाइज़ेशन के लिये CCU आवश्यक है, क्योंकि ये क्षेत्र केवल नवीकरणीय ऊर्जा पर निर्भर होकर उत्सर्जन में कमी नहीं ला सकते।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रिलिम्स 

प्रश्न 1. निम्नलिखित कृषि पद्धतियों पर विचार कीजिये: (2012) 

1. समोच्च बांध  

2. अनुपद सस्यन

3. शून्य जुताई

वैश्विक उलवायु परिवर्तन के संदर्भ में, उपर्युक्त में से कौन-सा/से मृदा में कार्बन प्रच्छादन/संग्रहण में सहायक है/ हैं?

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 3

(cj 1, 2 और 3

(d) इनमें से कोई नहीं

उत्तर: (b)


प्रश्न 2. कार्बन डाइऑक्साइड के मानवोद्भवी उत्सर्जनों के कारण आसन्न भूमंडलीय तापन के न्यूनीकरण के संदर्भ में, कार्बन प्रच्छादन हेतु निम्नलिखित में से कौन-सा/से संभावित स्थान हो सकता/सकते है/हैं?

1. परित्यक्त एवं गैर-लाभकारी कोयला संस्तर

2. निःशेष तेल एवं गैस भंडार

3. भूमिगत गभीर लवणीय शैलसमूह

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये: (2017) 

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 3

(c) केवल 1 और 3

(d) 1,2 और 3

उत्तर: (d)


‘लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स’ का प्रशिक्षण

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों? 

इंडिया-AI इंपैक्ट समिट 2026 में सर्वम AI ने दो स्वदेशी लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLM) का अनावरण किया, जो भारत के AI ईकोसिस्टम में एक महत्त्वपूर्ण कदम है। 

  • इन मॉडलों को विशेष रूप से भारतीय भाषाओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने और निम्न विद्युत् तथा कंप्यूटिंग ऊर्जा की खपत के लिये डिज़ाइन किया गया है। यह भारत की कम लागत पर, स्थानीय रूप से प्रासंगिक LLM प्रशिक्षण प्रदान करने की बढ़ती क्षमता को दर्शाता है।

लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स (LLM) को किस प्रकार प्रशिक्षित किया जाता है?

  • लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLM): यह एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणाली है जो मानव भाषा को समझने, उसकी व्याख्या करने और उसे उत्पन्न करने में सक्षम है। इसका निर्माण ट्रांसफॉर्मर-बेस्ड न्यूरल नेटवर्क का उपयोग करके किया जाता है।
    • LLM विशाल डेटासेट पर प्रशिक्षित होते हैं और डीप लर्निंग का उपयोग करते हुए यह सीखते हैं कि शब्दों और वाक्यों के बीच क्या संबंध हैं, इस प्रकार वे पाठ में पैटर्न को पहचानते हैं।
    • इनका प्रदर्शन डेटा की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। इन्हें अनुवाद, सारांश और प्रश्नोत्तर जैसे विशिष्ट कार्यों के लिये बेहतर बनाया जाता है।

प्रशिक्षण

  • डेटा संग्रह और पूर्व-प्रसंस्करण: LLM (लार्ज लैंग्वेज मॉडल) के प्रशिक्षण की शुरुआत डेटा संग्रह और पूर्व-प्रसंस्करण से होती है। इसमें इंटरनेट, किताबें, विकिपीडिया और कोड रिपॉजिटरी जैसे स्रोतों से पाठ का एक विशाल संग्रह एकत्रित किया जाता है।
    • पाठ को टोकन (शब्दों या उपशब्दों की छोटी इकाइयाँ) में परिवर्तित किया जाता है ताकि मशीनें इसे संसाधित कर सकें। 
    • इसके बाद डेटा को शुद्ध किया जाता है, जिसमें स्पैम, दोहराव, पक्षपातपूर्ण और हानिकारक सामग्री को हटाया जाता है। यह प्रक्रिया सुनिश्चित करती है कि मॉडल सही, विश्वसनीय और उच्च-गुणवत्ता वाले भाषा पैटर्न को प्रभावी ढंग से सीख सके।
  • पूर्व-प्रशिक्षण (स्व-पर्यवेक्षित शिक्षण): पूर्व-प्रशिक्षण चरण में, मॉडल नेक्स्ट-टोकन प्रेडिक्शन का उपयोग करके भाषा के पैटर्न सीखता है, जिसके अंतर्गत वह दिये गए वाक्य में अगले शब्द का अनुमान लगाता है।
    • अधिकांश आधुनिक लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLMs) ट्रांसफॉर्मर आर्किटेक्चर का उपयोग करते हैं, जिसमें सेल्फ-अटेंशन तकनीक होती है। इससे वे दूर-दूर स्थित शब्दों के बीच संबंधों को समझने में सक्षम होते हैं।
    • इस चरण में एक ऐसा आधारभूत मॉडल तैयार होता है, जो व्याकरण, तथ्यों और तर्क को समझता है, लेकिन अभी निर्देशों का प्रभावी ढंग से पालन करने में पूरी तरह सक्षम नहीं होता।
  • पर्यवेक्षित फाइन-ट्यूनिंग (इंस्ट्रक्शन ट्यूनिंग): पर्यवेक्षित फाइन-ट्यूनिंग के दौरान मॉडल को मानव विशेषज्ञों द्वारा बनाए गए चयनित प्रॉम्प्ट-रिस्पॉन्स युग्मों पर प्रशिक्षित किया जाता है।
    • यह मॉडल को निर्देशों पर प्रतिक्रिया देना, प्रश्नों के उत्तर देना और सारांश बनाने जैसे कार्य करना सिखाता है। 
    • इससे मॉडल संवाद के प्रारूप को समझकर वास्तविक दुनिया के अनुप्रयोगों में अधिक उपयोगी बन जाता है।
  • RLHF का उपयोग करके संरेखण: संरेखण प्रक्रिया के दौरान मॉडल को सुरक्षित, निष्पक्ष और सहायक प्रतिक्रियाएँ देने के लिये सुनिश्चित करने हेतु डेवलपर RLHF (मानव प्रतिक्रिया से सुदृढ़ीकरण सीखना) का उपयोग करते हैं।
    • मॉडल कई उत्तर प्रदान करता है। मनुष्य गुणवत्ता और सुरक्षा के आधार पर इन उत्तरों को क्रमबद्ध करते हैं। 
    • एक रिवार्ड मॉडल इस क्रमबद्धता (प्राथमिकताओं) को सीखता है। इस तरह LLM को मानवीय मूल्यों और नैतिक मानकों के अनुरूप प्रतिक्रियाएँ देने के लिये अनुकूलित किया जाता है।
  • भारत में LLM (लॉन्ग-लेवल लर्निंग) को प्रशिक्षित करने की सीमाएँ: भारतीय AI मॉडल कई बाधाओं का सामना करते हैं, जिनमें भारतीय भाषाओं में उच्च-गुणवत्ता वाले डेटासेट की कमी शामिल है, जो सटीकता और समावेशिता को प्रभावित करती है। 
    • कई मॉडल प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिये इनपुट को अंग्रेज़ी में अनुवाद करके अधिक टोकन का उपभोग करते हैं, जिससे कंप्यूटेशनल लागत बढ़ जाती है। 
    • इसके अतिरिक्त, सीमित पूंजी उपलब्धता और त्वरित वाणिज्यिक उपयोग के मामलों की कमी के कारण भारत में LLM (अध्ययनीय स्तर पर स्नातकोत्तर शिक्षा) प्रशिक्षण चुनौतीपूर्ण बना हुआ है, जो घरेलू AI विकास में बड़े पैमाने पर निवेश को बाधित करता है।

नोट: प्रारंभिक लार्ज लैंग्वेज मॉडल, जिनमें सैकड़ों अरब या यहाँ तक कि खरबों पैरामीटर होते थे, अनुमान के दौरान सभी पैरामीटर सक्रिय करके प्रश्नों को संसाधित करते थे, जिससे वे संगणनात्मक रूप से महंगे और संसाधन-गहन हो जाते थे।

  • नए मॉडल मिक्सचर ऑफ एक्सपर्ट्स (MoE) का उपयोग करते हैं, जो एक AI मॉडल आर्किटेक्चर है जिसमें संपूर्ण मॉडल का उपयोग करने के स्थान पर प्रत्येक प्रश्न के लिये पैरामीटरों का केवल एक छोटा उप-समूह ("विशेषज्ञ") सक्रिय किया जाता है। 
  • यह लार्ज लैंग्वेज मॉडल को तेज़, सस्ता और अधिक संगणना-कुशल बनाता है, जिससे भारत जैसे संसाधन-बाधित वातावरण में लागत-प्रभावी कार्यान्वयन संभव होता है।
  • सर्वम के 105 अरब पैरामीटर वाले LLM और भारतजेन के बहुभाषी 17 अरब पैरामीटर वाले मॉडल जैसे भारतीय मॉडल स्थानीय भाषाओं और शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवा जैसे क्षेत्रों का समर्थन करने के लिये दक्षता-केंद्रित दृष्टिकोण का उपयोग करते हैं।

इंडिया AI मिशन

  • मार्च 2024 में 10,372 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ शुरू किया गया, इंडिया AI मिशन का उद्देश्य भारत में एक व्यापक AI ईकोसिस्टम का निर्माण करना है।
  • मिशन के तहत सरकार ने भारतीय डेटा सेंटर में 36,000 से अधिक ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट (GPU) स्थापित किये हैं और 20,000 और जोड़कर क्षमता का विस्तार कर रही है, जिसका लक्ष्य वर्ष 2026 के अंत तक 100,000 GPU से अधिक करना है।
    • सर्वम AI जैसे स्टार्टअप को AI प्रशिक्षण और अनुमान के लिये कंप्यूट अवसंरचना तक सब्सिडी वाली पहुँच प्राप्त हुई है। सर्वम AI को कॉमन कंप्यूट क्लस्टर से 4,096 GPU तक पहुँच प्रदान की गई, जिसमें लगभग 100 करोड़ रुपये की सब्सिडी शामिल थी।
  • यह मिशन 13,500 से अधिक छात्रों के लिये प्रतिभा विकास का भी समर्थन करता है, इंडिया डेटा एंड AI लैब्स की स्थापना कर रहा है और भारतीय डेटासेट पर प्रशिक्षित संप्रभु आधारभूत मॉडलों को बढ़ावा देता है, जिसमें खुले स्रोत नवाचार और स्टार्टअप वृद्धि को बढ़ावा देने के लिये कंप्यूट और संबंधित लागतों को कवर करने वाली वित्तीय सहायता शामिल है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न 

लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLM) क्या है?
LLM एक ट्रांसफार्मर-आधारित AI प्रणाली है जिसे गहन शिक्षण का उपयोग करके मानव भाषा को समझने के लिये बड़े पैमाने के डेटासेट पर प्रशिक्षित किया जाता है।

AI में मिक्सचर ऑफ एक्सपर्ट्स (MoE) आर्किटेक्चर क्या है?
MoE प्रति प्रश्न मॉडल मापदंडों के केवल एक उप-समूह को सक्रिय करता है, जिससे LLM कार्यान्वयन में कंप्यूट लागत कम होती है और दक्षता में सुधार होता है।

इंडिया AI मिशन का उद्देश्य क्या है?
इसका उद्देश्य कंप्यूट इंफ्रास्ट्रक्चर, स्वदेशी मॉडल, डेटासेट और प्रतिभा विकास के माध्यम से एक संप्रभु AI पारिस्थितिक तंत्र का निर्माण करना है।

भारत के लिये स्वदेशी LLM महत्त्वपूर्ण क्यों हैं?
वे भारतीय भाषा समर्थन में सुधार करते हैं, डेटा संप्रभुता सुनिश्चित करते हैं और विदेशी AI प्लेटफॉर्मों पर निर्भरता कम करते हैं।

RLHF AI मॉडल में कैसे सुधार करता है?
मानव प्रतिक्रिया से सुदृढ़ीकरण सीखना, AI आउटपुट को मानवीय मूल्यों के साथ संरेखित करता है, जिससे सुरक्षा, सटीकता और नैतिक प्रतिक्रियाएँ सुनिश्चित होती हैं।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न 

प्रारंभिक परीक्षा

प्रश्न. विकास की वर्तमान स्थिति में, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence), निम्नलिखित में से किस कार्य को प्रभावी रूप से कर सकती है? (2020)

  1. औद्योगिक इकाइयों में विद्युत् की खपत कम करना 
  2. सार्थक लघु कहानियों और गीतों की रचना 
  3. रोगों का निदान 
  4. टेक्स्ट से स्पीच (Text- to- Speech) में परिवर्तन 
  5. विद्युत् ऊर्जा का बेतार संचरण

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1, 2, 3 और 5

(b) केवल 1, 3 और 4

(c) केवल 2, 4 और 5

(d) 1, 2, 3, 4 और 5

उत्तर: (b)


CBDC आधारित खाद्य सब्सिडी वितरण पायलट परियोजना

स्रोत: पीआईबी

भारत सरकार ने पुडुचेरी में प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) के तहत केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा (CBDC) आधारित खाद्य सब्सिडी वितरण हेतु एक पायलट परियोजना शुरू की है। यह सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के माध्यम से खाद्य सब्सिडी के वितरण में एक महत्त्वपूर्ण सुधार है, क्योंकि इसमें डिजिटल रुपया (e₹) को प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) ढाँचे के साथ एकीकृत किया गया है।

  • प्रोग्राम  योग्य और उद्देश्यपूर्ण उपयोग: इस पायलट परियोजना के अंतर्गत खाद्य सब्सिडी के लिये चिह्नित  लाभार्थियों के CBCD वॉलेट में प्रोग्राम योग्य सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBCD) टोकन के रूप में सीधे जमा की जाएगी। 
    • इन टोकनों का उपयोग केवल अधिकृत व्यापारियों एवं उचित मूल्य की दुकानों (FPS) से खाद्यान्नों की खरीद के लिये किया जा सकेगा, जिससे सब्सिडी का उद्देश्यपूर्ण उपयोग सुनिश्चित होगा एवं पारदर्शिता बढ़ेगी।
  • प्रणाली की दक्षता और पारदर्शिता: यह डिजिटल नकद प्रणाली अत्यंत सुरक्षित, त्वरित और पूर्णतः पता लगाने योग्य होने के कारण प्रणाली की दक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करती है। यह बाधाओं को काफी कम करती है, जिससे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा प्रणाली में भ्रष्टाचार को रोकने और जवाबदेही को बढ़ाने में मदद मिलती है।
    • यह पायलट प्रोजेक्ट पुडुचेरी सरकार, भारतीय रिज़र्व बैंक, सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन प्रणाली (PFMS) और केनरा बैंक के समन्वय से कार्यान्वित किया जा रहा है।
    • पुडुचेरी में इसकी शुरुआत के बाद, इस पहल को चरणबद्ध तरीके से अन्य केंद्रशासित प्रदेशों और लाभार्थियों तक विस्तारित किया जाएगा।

सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी

  • परिचय: यह किसी देश की प्रचलित मुद्रा का डिजिटल रूप है। आपके पारंपरिक बैंक खाते में मौजूद डिजिटल मुद्रा (जो वाणिज्यिक बैंक की देनदारी होती है) के विपरीत, CBDC सीधे देश के केंद्रीय बैंक द्वारा जारी की जाती है तथा यह एक प्रत्यक्ष संप्रभु देनदारी का प्रतिनिधित्व करती है। 
    • डिजिटल रुपया (e₹) भारत की आधिकारिक केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा (CBDC) है। इसे वैध मुद्रा के रूप में कानूनी मान्यता प्राप्त है, जिसका अर्थ है कि इसका मूल्य भौतिक नकदी के बराबर है। इसे कागज़ी मुद्रा के साथ एक के बाद एक विनिमय किया जा सकता है।
  • रिटेल CBDC (e₹-R): यह आम जनता और रोज़मर्रा के व्यवसायों के लिये डिज़ाइन किया गया है। यह बैंकों द्वारा प्रदान किये गए डिजिटल वॉलेट के माध्यम से संचालित होता है, जो मूल्य का एक सुरक्षित भंडार प्रदान करता है और तत्काल पीयर-टू-पीयर और पीयर-टू-मर्चेंट लेनदेन को सक्षम बनाता है।
    • क्योंकि यह वास्तविक नकदी की तरह दिखता है, इसलिये वॉलेट में जमा राशि पर कोई ब्याज नहीं दिया जाता है।
  • थोक CBDC (e₹-W): यह CBDC विशेष रूप से वित्तीय संस्थानों और मध्यस्थों के लिये है। इसे सरकारी प्रतिभूतियों में द्वितीयक बाज़ार व्यापार और अंतर-बैंक ऋण जैसे उच्च-मूल्य के लेन-देनों को सुव्यवस्थित करने के उद्देश्य से बनाया गया है। इसके उपयोग से निपटान लागत में काफी कमी आती है और प्रतिपक्ष निपटान जोखिम कम होते हैं।
  • UPI से भिन्न: यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) एक साधारण भुगतान इंटरफेस है जो पारंपरिक बैंक खातों के बीच मौजूदा धन को स्थानांतरित करता है।
    • डिजिटल रुपी लेनदेन बिना किसी वाणिज्यिक बैंक के बैकएंड लेजर की आवश्यकता के, वॉलेट-टू-वॉलेट तुरंत भुगतान हो जाते हैं। हालाँकि, उपयोगकर्त्ताओं की सुविधा के लिये ई-रुपये ऐप्स मौजूदा UPI QR कोड के साथ पूरी तरह संगत (इंटरऑपरेबल) बनाए गए हैं।

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और पढ़ें: सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी


भारतीय रिज़र्व बैंक की स्विच नीलामी

स्रोत: बिज़नेस स्टैंडर्ड

ऋण परिपक्वता का प्रबंधन करने और वित्त वर्ष 2027 में मोचन दबाव (रिडेंपशन प्रेशर) को कम करने के उद्देश्य से भारतीय रिज़र्व बैंक ने ₹25,000 करोड़ की सरकारी प्रतिभूतियों (G-Secs) की स्विच नीलामी की घोषणा की है। इससे पहले केंद्रीय बैंक कुल ₹84,804 करोड़ की दो ऐसी नीलामियाँ आयोजित कर चुका है।

  • जब बड़ी मात्रा में बॉण्ड या ऋण साधन एक ही समय पर परिपक्व हो जाते हैं और उनके पुनर्भुगतान या पुनर्वित्तपोषण की आवश्यकता होती है, ऐसी स्थिति में सरकार पर पड़ने वाले वित्तीय बोझ को मोचन दबाव कहा जाता है।
  • स्विच नीलामी: यह भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा प्रयुक्त एक ऋण प्रबंधन उपकरण है, जिसके माध्यम से सरकार अपने पुनर्भुगतान के बोझ को संतुलित करती है। इस प्रक्रिया में परिपक्वता के निकट अल्पकालिक बॉण्डों को नए दीर्घकालिक बॉण्डों से बदल दिया जाता है, जिससे भुगतान की बाध्यता आगे के वर्षों के लिये स्थगित हो जाती है।
  • परिपक्वता प्रोफाइल में परिवर्तन: हालिया ₹25,000 करोड़ की स्विच नीलामी का उद्देश्य वित्त वर्ष 2027 में देय ₹5.47 लाख करोड़ के बॉन्डों से उत्पन्न होने वाले मोचन दबाव को कम करना है।
    • वित्त वर्ष 2032 के बाद तक परिपक्वता अवधि को बढ़ाकर भारतीय रिज़र्व बैंक सरकार की ऋण संरचना को संतुलित करने, पुनर्वित्तपोषण जोखिम को कम करने तथा राजकोषीय स्थिरता बनाए रखने में सहायता करता है।
  • प्रभावी राजकोषीय प्रबंधन: सरकार का सकल बाज़ार उधार पहले ही ₹17.2 लाख करोड़ के उच्च स्तर पर निर्धारित होने के कारण स्विच नीलामी परिपक्वता प्रोफाइल को सुचारु रूप से संतुलित करती है और पुनर्भुगतान दायित्वों का प्रबंधन इस प्रकार संभव बनाती है कि तात्कालिक रूप से बड़ी नकद चलनिधि की आवश्यकता न पड़े।

और पढ़ें: मौद्रिक नीति की मात्रात्मक लिखतें


भारत-स्वीडन SITAC साझेदारी

स्रोत: पीआईबी 

इंडिया AI मिशन और बिजनेस स्वीडन ने इंडिया AI इंपैक्ट समिट 2026 के अवसर पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और डिजिटल प्रौद्योगिकियों में द्विपक्षीय सहयोग को सुदृढ़ करने के लिये एक आशय वक्तव्य (SoI) पर हस्ताक्षर किये।

  • SITAC का शुभारंभ: इस साझेदारी के तहत स्वीडन-इंडिया टेक्नोलॉजी एंड आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस कॉरिडोर (SITAC) की स्थापना की जाएगी। यह दोनों देशों की सरकारी एजेंसियों, उद्योग, स्टार्टअप और शैक्षणिक संस्थानों के बीच संरचित जुड़ाव के लिये प्रमुख मंच के रूप में कार्य करेगा।
  • रियल-वर्ल्ड इंपैक्ट पर केंद्रित: यह सहयोग औद्योगिक और सामाजिक परिणामों के लिये AI समाधानों के विकास और कार्यान्वयन पर बल देता है, संबद्ध जोखिमों का समाधान करते हुए नवाचार, आर्थिक वृद्धि और सतत विकास के लिये AI का लाभ उठाता है।
  • शक्तियों का समन्वय: यह साझेदारी इंडिया AI मिशन के राष्ट्रीय AI ईकोसिस्टम (कंप्यूट, डेटा और प्रतिभा तक पहुँच) के निर्माण के लक्ष्य को औद्योगिक नवाचार, उन्नत अनुसंधान एवं विकास और उत्तरदायी AI कार्यान्वयन में स्वीडन की शक्तियों के साथ संरेखित करती है।

भारत-स्वीडन अन्य प्रौद्योगिकी साझेदारियाँ

  • सतत भविष्य के लिये भारत-स्वीडन नवाचार भागीदारी पर संयुक्त घोषणा (2018): यह भारत-स्वीडन प्रौद्योगिकी साझेदारी के लिये आधारभूत ढाँचा है, जो सह-वित्तपोषण और सह-निर्माण के इर्द-गिर्द संरचित है ताकि स्मार्ट सिटी, AI और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में सामाजिक चुनौतियों का समाधान किया जा सके।
  • भारत-स्वीडन उद्योग संक्रमण भागीदारी (ITP) (2023): यह इस्पात और सीमेंट जैसे भारी उद्योगों को डीकार्बोनाइज़ करने पर केंद्रित है, जिसमें संयुक्त नवाचार, ज्ञान साझाकरण और निम्न-कार्बन प्रौद्योगिकियों, कार्बन कैप्चर, हाइड्रोजन उपयोग और एआई ऑप्टिमाइज़ेशन से संबंधित पायलट परियोजनाएँ शामिल हैं।

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भारत निर्वाचन आयोग-राज्य निर्वाचन आयोग राष्ट्रीय घोषणा 2026

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

भारत निर्वाचन आयोग (ECI) और राज्य निर्वाचन आयुक्तों (SECs) के सम्मेलन, 2026 में 27 वर्षों के अंतराल के बाद चुनावी प्रक्रियाओं में संघीय समन्वय को मजबूत करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय घोषणा 2026 को अपनाया गया।

  • निर्वाचन का मूल आधार—सत्यापित मतदाता सूची: राष्ट्रीय घोषणा में यह स्पष्ट किया गया कि “सत्यापित मतदाता सूची” (त्रुटिरहित और अद्यतित) लोकतंत्र की नींव है और पारदर्शी तथा प्रभावी चुनाव संचालन सुनिश्चित करना अनिवार्य है।
  • मुख्य उद्देश्य: इस सम्मेलन का लक्ष्य पंचायत और नगर निकायों के चुनावों (SECs द्वारा आयोजित) के नियमों तथा प्रक्रियाओं को संसद (राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, लोकसभा, राज्यसभा) एवं राज्य विधानमंडल (राज्य विधायी विधानसभा व परिषद) के चुनावों (ECI द्वारा आयोजित) के साथ समन्वित करना था।
    • भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने प्रस्ताव रखा कि नेशनल राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस वार्षिक रूप से आयोजित किया जाए, आदर्श रूप में उन वैश्विक सम्मेलनों के साथ जिसमें ECI अध्यक्षता करता है और SECs को इसके अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रमों में भाग लेने के लिये आमंत्रित किया।
    • एक संयुक्त कानूनी एवं तकनीकी कार्यदल द्वारा राज्य चुनाव आयोगों के सुझावों का विस्तृत विश्लेषण किया जाएगा। इसके आधार पर, प्रत्येक राज्य और केंद्रशासित प्रदेश के लिये आगामी तीन माह के भीतर एक व्यापक रोडमैप तैयार कर प्रस्तुत किया जाएगा।
  • तकनीकी संसाधनों का साझाकरण: ECI ने चुनावों में दक्षता बढाने के उद्देश्य से SECs के साथ अपने निम्नलिखित तकनीकी संसाधनों को साझा करने का प्रस्ताव रखा:
  • IICDEM 2026 पर प्रकाशन: सम्मेलन के दौरान, ‘A Confluence of Democracies’ नामक ECI की एक नई पुस्तक का विमोचन किया गया, जिसमें इंडिया इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ डेमोक्रेसी एंड इलेक्टोरल मैनेजमेंट (IIIDEM) 2026 तथा 'दिल्ली घोषणा 2026' को अपनाने का दस्तावेज़ीकरण किया गया है।

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