वंदे मातरम् और जन गण मन पर गृह मंत्रालय का नया प्रोटोकॉल
चर्चा में क्यों?
गृह मंत्रालय (MHA) ने राज्यों और सरकारी निकायों को नई निर्देशावली जारी की है, जिसमें यह अनिवार्य किया गया है कि जब किसी कार्यक्रम में राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् और राष्ट्रीय गान जन गण मन दोनों शामिल हों, तो वंदे मातरम् को पहले गाया या बजाया जाए।
राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रीय गान के संबंध में नया प्रोटोकॉल क्या है?
- प्रस्तुति का क्रम: जब एक ही कार्यक्रम में राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रीय गान दोनों बजाए जाते हैं, तो 'वंदे मातरम्' (राष्ट्रीय गीत) पहले बजाया या गाया जाना चाहिये, उसके बाद 'जन गण मन' (राष्ट्रीय गान) गाया जाना चाहिये।
- यह सरकारी समारोहों के लिये स्पष्ट प्राथमिकता क्रम स्थापित करता है।
- अनिवार्य सम्मान: जब राष्ट्रीय गीत का सरकारी संस्करण (लगभग 3 मिनट 10 सेकंड लंबा) गाया या बजाया जाता है, तो श्रोताओं को खड़े होकर सम्मान व्यक्त करना अनिवार्य है।
- यदि राष्ट्रीय गीत को न्यूज़रील, वृत्तचित्र या फिल्म के हिस्से के रूप में बजाया जाता है, तो श्रोताओं से खड़े होने की अपेक्षा नहीं की जाती। स्क्रीनिंग के दौरान खड़े होना प्रदर्शन में व्यवधान और अव्यवस्था/भ्रम उत्पन्न कर सकता है, न कि गरिमा बढ़ाता है।
- प्रस्तुति के अवसर: अब राष्ट्रीय गीत को विशेष उच्च स्तरीय सरकारी कार्यक्रमों में अनिवार्य रूप से बजाया या गाया जाना तय किया गया है।
- राष्ट्रपति/राज्यपाल संबंधी कार्यक्रम: राष्ट्रपति या राज्यपाल/उप-राज्यपाल के आगमन और प्रस्थान पर औपचारिक राज्य समारोहों में।
- प्रसारण: राष्ट्रपति के देश को संबोधित करने से तुरंत पहले और बाद में, चाहे वह ऑल इंडिया रेडियो या टीवी पर हो।
- ध्वज समारोह: जब राष्ट्रीय ध्वज परेड में लाया जाता है।
- सांस्कृतिक कार्यक्रम: सांस्कृतिक या औपचारिक समारोहों में (परेड के अलावा) राष्ट्रीय ध्वज फहराने पर।
- संगीत और बैंड प्रोटोकॉल: जब राष्ट्रीय गीत को बैंड द्वारा बजाया जाता है, तो श्रोताओं को सूचित करने के लिये पहले ड्रम की धुन बजाना अनिवार्य है।
- विद्यालयों हेतु निर्देश: दिशा-निर्देशों के अनुसार, सभी विद्यालयों में दैनिक कार्य की शुरुआत राष्ट्रीय गीत के सामूहिक गायन से की जा सकती है।
- विद्यालय प्राधिकारियों को निर्देशित किया गया है कि वे राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रीय गान के गायन को लोकप्रिय बनाने हेतु समुचित व्यवस्थाएँ सुनिश्चित करें, जिससे राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान की भावना सुदृढ़ हो।
- यह नया प्रोटोकॉल संविधान के अनुच्छेद 51A(a) के अंतर्गत निहित मूल कर्त्तव्य राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रीय गान एवं अन्य राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान से प्रत्यक्ष रूप से संबद्ध है।
वंदे मातरम् के संबंध में प्रमुख तथ्य क्या हैं?
- उत्पत्ति एवं रचना: वंदे मातरम् (जिसे बंदे मातरम् भी उच्चारित किया जाता है) की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। यह पहली बार वर्ष 1875 में बंगदर्शन पत्रिका में प्रकाशित हुआ तथा बाद में उनके उपन्यास आनंदमठ (1882) में सम्मिलित किया गया।
- इस गीत को संगीतबद्ध रवींद्रनाथ टैगोर ने किया। यह भारत की सांस्कृतिक एवं राजनीतिक पहचान का एक सशक्त प्रतीक बनकर उभरा, जो एकता, त्याग और राष्ट्रभक्ति की भावना का प्रतिनिधित्व करता है।
- राष्ट्रीय दर्जा: 24 जनवरी, 1950 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि जहाँ जन गण मन को राष्ट्रीय गान के रूप में स्वीकार किया जाएगा, वहीं स्वतंत्रता आंदोलन में उसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका के कारण वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत के रूप में समान सम्मान प्रदान किया जाएगा।
- भारत के संविधान में ‘राष्ट्रीय गीत ’ का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया है। तथापि, अनुच्छेद 51A(a) के अंतर्गत नागरिकों का यह मूल कर्त्तव्य निर्धारित किया गया है कि वे संविधान, राष्ट्रीय ध्वज तथा राष्ट्रीय गान का सम्मान करें।
- स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका:
- कांग्रेस द्वारा अंगीकरण: वर्ष 1896 में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में वंदे मातरम् का गायन किया।
- वर्ष 1905 में वाराणसी अधिवेशन में ‘वंदे मातरम्’ को अखिल भारतीय अवसरों पर गाए जाने हेतु स्वीकार किया गया।
- जन-संगठन एवं प्रेस की भूमिका: वर्ष 1905 में उत्तरी कलकत्ता में बंदे मातरम् का गठन हुआ, जिसका उद्देश्य मातृभूमि के प्रति भक्ति-भाव को प्रोत्साहित करना था।
- वर्ष 1906 में बिपिन चंद्र पाल के नेतृत्व में अंग्रेज़ी दैनिक बंदे मातरम् प्रारंभ किया गया, जिसमें बाद में श्री अरविंद भी जुड़े। इस पत्र ने स्वदेशी, राष्ट्रीय एकता और औपनिवेशिक शासन के प्रतिरोध के विचारों का व्यापक प्रसार किया।
- विभाजन-विरोधी एवं छात्र आंदोलन: 7 अगस्त, 1905 को कलकत्ता टाउन हॉल में विद्यार्थियों के जुलूसों के दौरान ‘वंदे मातरम्’ का पहली बार एक राजनीतिक नारे के रूप में प्रयोग किया गया। इसके बाद यह स्वदेशी और विभाजन विरोधी आंदोलन का प्रमुख उद्घोष बन गया।
- इसकी व्यापक जन-स्वीकृति और लोकप्रियता से चिंतित होकर लॉर्ड कर्ज़न ने इसे गाने वालों की गिरफ्तारी हेतु आदेश दिये।
- विदेश में भारतीय क्रांतिकारियों पर प्रभाव:
- वर्ष 1907 में मैडम भीकाजी कामा ने जर्मनी के स्टुटगार्ट में पहली बार भारत के बाहर तिरंगा ध्वज फहराया। इस ध्वज पर शब्द ‘वंदे मातरम्’ अंकित थे।
- अगस्त 1909 में जब मदन लाल धींगरा को इंग्लैंड में फाँसी दी गई, तो फाँसी देने से पहले उनके अंतिम शब्द ‘बंदे मातरम्’ थे।
- अक्तूबर 1912 में गोपाल कृष्ण गोखले का केप टाउन में भव्य जुलूस के साथ स्वागत किया गया, जिसमें लोग ‘वंदे मातरम्’ का उद्घोष करते थे।
- कांग्रेस द्वारा अंगीकरण: वर्ष 1896 में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में वंदे मातरम् का गायन किया।
जन गण मन (राष्ट्रीय गान) के संबंध में प्रमुख तथ्य क्या हैं?
- उत्पत्ति एवं रचना: इसकी रचना एवं संगीत रचना नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ ठाकुर द्वारा वर्ष 1911 में की गई थी।
- यह मूल कविता “भारतो भाग्य विधाता” का प्रथम पद है, जिसमें कुल पाँच पद सम्मिलित हैं।
- “जन गण मन” मूलतः बांग्ला भाषा में, विशेष रूप से साधु भाषा, जो संस्कृतनिष्ठ उपभाषा है, में रचित है।
- प्रथम प्रस्तुति: इसे पहली बार 27 दिसंबर, 1911 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में सार्वजनिक रूप से गाया गया था।
- औपचारिक अंगीकरण: इसे 24 जनवरी, 1950 को भारत की संविधान सभा द्वारा राष्ट्रीय गान के रूप में अंगीकृत किया गया।
- अनुवाद: रवींद्रनाथ ठाकुर ने इस गीत का अंग्रेज़ी में अनुवाद आंध्र प्रदेश के मदनपल्ले में प्रवास के दौरान किया था। इस अनुवाद का शीर्षक “द मॉर्निंग सॉन्ग ऑफ इंडिया” है।
- “शुभ सुख चैन” शीर्षक से इसका एक हिंदुस्तानी संस्करण सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय सेना के लिये तैयार किया गया था।
- “सिंध” में कोई संशोधन नहीं: वर्ष 2005 में “सिंध” शब्द, जो वर्तमान में पाकिस्तान में स्थित है, को “कश्मीर” से प्रतिस्थापित करने संबंधी याचिका को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निरस्त कर दिया गया।
- न्यायालय ने निर्णय दिया कि राष्ट्रीय गान में प्रयुक्त “सिंध” शब्द केवल भौगोलिक क्षेत्र का संकेत नहीं करता, बल्कि वह एक सांस्कृतिक समुदाय का द्योतक है।
नोट: रवींद्रनाथ ठाकुर ऐसे एकमात्र व्यक्ति हैं जिन्होंने दो देशों के राष्ट्रीय गान की रचना की, भारत के लिये “जन गण मन” तथा बांग्लादेश के लिये “आमार सोनार बांग्ला”।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. राष्ट्रीय प्रतीकों के संबंध में गृह मंत्रालय द्वारा जारी नया प्रोटोकॉल क्या है?
यदि किसी आधिकारिक कार्यक्रम में “वंदे मातरम्” और “जन गण मन” दोनों सम्मिलित हों, तो “जन गण मन” से पूर्व “वंदे मातरम्” का वादन अथवा गायन किया जाना अनिवार्य होगा।
2. क्या “वंदे मातरम्” का संविधान में राष्ट्रीय गीत के रूप में उल्लेख है?
नहीं। संविधान में राष्ट्रीय गीत का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, किंतु अनुच्छेद 51A(a) के अंतर्गत राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान करना नागरिकों का मूल कर्त्तव्य निर्धारित किया गया है।
3. “जन गण मन” को राष्ट्रीय गान के रूप में कब अंगीकृत किया गया?
इसे 24 जनवरी, 1950 को संविधान सभा द्वारा राष्ट्रीय गान के रूप में अंगीकृत किया गया।
4. “वंदे मातरम्” की रचना किसने की और स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी क्या भूमिका रही?
इसकी रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। यह स्वदेशी आंदोलन तथा बंग-भंग विरोधी आंदोलन के दौरान एक प्रेरक उद्घोष के रूप में उभरा।
5. राष्ट्रीय गान में “सिंध” शब्द के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय का क्या निर्णय था?
वर्ष 2005 में सर्वोच्च न्यायालय ने “सिंध” शब्द को प्रतिस्थापित करने संबंधी याचिका को निरस्त करते हुए कहा कि यह शब्द क्षेत्रीय भूगोल के बजाय सांस्कृतिक विरासत का द्योतक है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स:
प्रश्न. निम्नलिखित में से कौन अंग्रेज़ी में प्राचीन भारतीय धार्मिक गीतों के अनुवाद 'सॉन्ग्स फ्रॉम प्रिज़न' से संबंधित है? (2021)
(a) बाल गंगाधर तिलक
(b) जवाहरलाल नेहरू
(c) मोहनदास करमचंद गांधी
(d) सरोजिनी नायडू
उत्तर: (c)
प्रश्न. भारत के राष्ट्रीय ध्वज में धर्मचक्र (अशोक चक्र) में कितनी तीलियाँ होती हैं? (2008)
(a) 16
(b) 18
(c) 22
(d) 24
उत्तर: (d)
सूचना प्रौद्योगिकी संशोधन नियम, 2026
इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के अंतर्गत वर्ष 2021 में अधिसूचित नियमों में संशोधन करते हुए सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) संशोधन नियम, 2026 को अधिसूचित किया है।
- 20 फरवरी, 2026 से प्रभावी यह नया ढाँचा कृत्रिम (सिंथेटिक) मीडिया तथा आपत्तिजनक सामग्री/कंटेंट हटाने से संबंधित मानकों को अधिक सख्त बनाता है।
- सामग्री हटाने की समय-सीमा में उल्लेखनीय कमी: अब सोशल मीडिया मंचों को किसी न्यायालय अथवा ‘समुचित सरकार’ द्वारा अवैध घोषित की गई सामग्री को 3 घंटे के भीतर हटाना अनिवार्य होगा, जबकि पूर्व में यह समय-सीमा 24 से 36 घंटे के बीच थी।
- संवेदनशील सामग्री, विशेषकर बिना सहमति के प्रकाशित अश्लील/आपत्तिजनक चित्र/वीडियो तथा डीपफेक सामग्री, को शिकायत प्राप्त होने के 2 घंटे के भीतर हटाना अनिवार्य किया गया है।
- ‘कृत्रिम’ सामग्री की परिभाषा: नियमों के अनुसार, सिंथेटिक सामग्री से आशय ऐसी ऑडियो-विज़ुअल सूचना से है, जिसे एल्गोरिद्मिक प्रक्रियाओं के माध्यम से निर्मित अथवा परिवर्तित किया गया हो और जो “किसी सामान्य व्यक्ति या वास्तविक घटना से अभेद्य प्रतीत” होती हो।
- एक विशेष छूट उन छोटे सुधारों के लिये प्रदान की गई है जो स्वचालित रूप से स्मार्टफोन कैमरों द्वारा किये जाते हैं, यह सुनिश्चित करते हुए कि दैनिक फोटो सुधारों को दंडित नहीं किया जाता है।
- अनिवार्य प्रकटीकरण एवं लेबलिंग: नियमों के अनुसार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा सृजित छवियों को ‘स्पष्ट एवं प्रमुख रूप से’ चिह्नित करना अनिवार्य होगा।
- प्लेटफॉर्म को यह सुनिश्चित करना होगा कि यदि कोई सामग्री कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा सृजित है, तो उसके संबंध में उपयोगकर्त्ताओं से अनिवार्य रूप से प्रकटीकरण प्राप्त किया जाए।
- विशेष रूप से बिना सहमति के बनाए गए डीपफेक के मामलों में यदि कोई उपयोगकर्त्ता इस प्रकार का प्रकटीकरण करने में विफल रहता है, तो प्लेटफॉर्म पर यह दायित्व होगा कि वह या तो उक्त सामग्री को स्पष्ट रूप से चिह्नित करे अथवा उसे हटाए।
- सेफ हार्बर संरक्षण का ह्रास: इन नियमों का पालन न करने की स्थिति में मध्यस्थों को सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79 के अंतर्गत प्राप्त ‘सेफ हार्बर’ संरक्षण अर्थात तृतीय-पक्ष सामग्री के लिये विधिक दायित्व से प्रतिरक्षा के खोने का जोखिम रहेगा।
- जो मध्यस्थ उल्लंघनकारी सिंथेटिक सामग्री को जानबूझकर अनुमति देते हैं, उसका प्रचार-प्रसार करते हैं अथवा उस पर कार्रवाई करने में विफल रहते हैं, उन्हें ‘समुचित सावधानी’ का पालन न करने वाला माना जाएगा।
- राज्यों के लिये प्रशासनिक अनुकूलनशीलता: राज्य सरकारें सामग्री हटाने के आदेश जारी करने हेतु एक से अधिक अधिकृत अधिकारियों को नामित कर सकेंगी।
आर्कटिक सेंट्री मिशन
NATO ने आर्कटिक में अपनी उपस्थिति को सुदृढ़ करने हेतु ‘आर्कटिक सेंट्री’ नामक मिशन शुरू करने की घोषणा की।
- परिचय: ‘आर्कटिक सेंट्री’ एक बहु-क्षेत्रीय मिशन है, जिसका उद्देश्य रणनीतिक रूप से संवेदनशील आर्कटिक क्षेत्र में सामूहिक रक्षा, समन्वय और स्थिरता को सुदृढ़ करना है।
- उद्देश्य: यह नया मिशन नाटो की सामूहिक क्षमता का उपयोग करते हुए उसके क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा आर्कटिक एवं हाई नॉर्थ, जो आर्कटिक वृत्त तथा उससे सटे उत्तरतम क्षेत्रों को संदर्भित करता है, को सुरक्षित बनाए रखने का लक्ष्य रखता है।
- विशेषता: इसका उद्देश्य क्षेत्र में निगरानी और सुरक्षा को सुदृढ़ करना है। यह नाटो की मौजूदा पहलों, जैसे– बाल्टिक सेंट्री और ईस्टर्न सेंट्री के अनुरूप विकसित की जा रही है।
- सैन्य अभ्यास एवं तत्परता: इस पहल के अंतर्गत एक्सरसाइज़ कोल्ड रिस्पॉन्स तथा यूनाइटेड किंगडम के नेतृत्व में लायन प्रोटेक्टर जैसे प्रमुख सैन्य अभ्यास सम्मिलित हैं। इनका उद्देश्य सहयोगी सेनाओं को आर्कटिक अभियानों के लिये प्रशिक्षित करना, महत्त्वपूर्ण अवसंरचना की रक्षा को सुदृढ़ करना तथा नॉर्वे, आइसलैंड और डेनिश जलडमरूमध्य क्षेत्र में तोड़फोड़ संबंधी खतरों का प्रतिरोध करना है।
आर्कटिक क्षेत्र
- यह क्षेत्र आर्कटिक वृत्त (66°34′ उत्तरी अक्षांश) के उत्तर में स्थित है, जिसका केंद्र उत्तरी ध्रुव है। इसमें आर्कटिक महासागर तथा आठ देशों– कनाडा, डेनमार्क (ग्रीनलैंड), फिनलैंड, आइसलैंड, नॉर्वे, रूस, स्वीडन और संयुक्त राज्य अमेरिका के कुछ भाग सम्मिलित हैं, जो मिलकर आर्कटिक परिषद का गठन करते हैं।
- यह क्षेत्र खनिजों और दुर्लभ मृदा तत्त्वों के महत्त्वपूर्ण भंडारों से संपन्न है तथा उभरते समुद्री मार्गों, संसाधन क्षमता और प्रमुख शक्तियों के सामरिक निकटता के कारण इसकी भू-राजनीतिक महत्ता निरंतर बढ़ रही है।
मिस्र में खोजे गए तमिल ब्राह्मी अभिलेख
मिस्र के वैली ऑफ द किंग्स में कब्रों पर हाल ही में पाए गए लगभग 30 अभिलेख, जो तमिल ब्राह्मी, प्राकृत और संस्कृत में हैं, प्राचीन तामिलगाम, भारत के अन्य क्षेत्रों और रोमन साम्राज्य के बीच व्यापारिक संपर्कों के प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।
- स्थान: ये अभिलेख मिस्र के थेबन नेक्रोपोलिस में नदी नील के पश्चिमी तट पर स्थित वैली ऑफ द किंग्स में पाए गए। इन्हें भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी-पश्चिमी, पश्चिमी और दक्षिणी क्षेत्रों के व्यक्तियों द्वारा छोड़ा गया था, जिसमें दक्षिणी क्षेत्र के लोग अधिकांश थे।
- अभिलेखों की प्रकृति: आगंतुकों ने मकबरों की दीवारों और गलियारों पर संक्षिप्त ग्रैफिटी (भित्ति-लेख) उत्कीर्ण किये, जिनमें मुख्य रूप से उनके व्यक्तिगत नाम थे। ये अभिलेख ग्रीक ग्रैफिटी के साथ पाए जाते हैं, जिससे पता चलता है कि भारतीय आगंतुकों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिये स्थानीय प्रचलित परंपरा का पालन किया।
- मुख्य निष्कर्ष: तमिल ब्राह्मी नाम 'सीकै कोट्टन' (Cikai Koṟraṉ) पाँच अलग-अलग मकबरों में आठ बार पाया गया है, जो कभी-कभी भीतरी दीवारों पर काफी ऊँचाई पर उत्कीर्ण किया गया था। 'सीकै' (Cikai) शब्द संस्कृत के 'शिखा' (शिखा या मुकुट) से संबंधित हो सकता है, जबकि 'कोट्टन’ (Koṟṟaṉ) तमिल मूल शब्द 'कोट्टम' (विजय, वध) से लिया गया है, जो चेर योद्धा देवी 'कोट्टवई' और 'कोट्टवन' (राजा) शब्द से संबंधित है। अन्य अभिलेखों में 'कोपान वरत कंतन' (Kopāṉ varata kantan - जिसका अर्थ है: कोपान आया और देखा) के साथ-साथ 'सातन' (Cātaṉ) और 'किरण' (Kiraṉ) जैसे नाम भी शामिल हैं।
- बेरेनिक और संगम साहित्य से संबंध: 'कोट्टन' (koṟṟaṉ) शब्द 'कोट्टपुमान' (Koṟṟapumāṉ) में भी दिखाई देता है, जो बेरेनिके (Berenike) में पाया गया है—यह लाल सागर पर स्थित एक बंदरगाह शहर है जो भारत-रोमन व्यापार के लिये जाना जाता था। यह नाम संगम साहित्य और प्राचीन चेर राजधानी 'पुगलूर' (Pugalur) से प्राप्त अभिलेखों (दूसरी-तीसरी शताब्दी ईस्वी) में भी मिलता है।
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पं. दीनदयाल उपाध्याय की पुण्यतिथि
भारत के उपराष्ट्रपति ने पं. दीनदयाल उपाध्याय को उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि अर्पित की।
- परिचय: 25 सितंबर, 1916 को जन्मे पं. दीनदयाल उपाध्याय भारतीय राजनेता, दार्शनिक और RSS तथा भारतीय जन संघ (BJS) (जो बाद में भारतीय जनता पार्टी बना) के विचारक थे।
- योगदान: उन्होंने अंत्योदय पर विशेष बल दिया, अर्थात समाज के अंतिम व्यक्ति के उत्थान तथा सर्वाधिक वंचित वर्गों की आवश्यकताओं की पूर्ति पर ध्यान केंद्रित किया।
- उनके ‘एकात्म मानववाद’ के दर्शन में कल्याण, सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता तथा आत्मनिर्भरता पर विशेष ज़ोर दिया गया।
- मान्यता: 25 सितंबर, 2014 से उनकी जयंती को राष्ट्र के प्रति उनके योगदान के सम्मान में अंत्योदय दिवस के रूप में मनाया जाता है।
- वर्ष 2015 में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) का नाम परिवर्तित कर दीनदयाल अंत्योदय योजना–राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन रखा गया।
- वर्ष 2018 में उत्तर प्रदेश में मुगलसराय जंक्शन का नाम बदलकर उनके नाम पर रखा गया।
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और पढ़ें: संगठन से समृद्धि: DAY-NRLM |
सशस्त्र बलों के कार्मिकों द्वारा पुस्तकों के प्रकाशन का विनियमन
पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे (सेवानिवृत्त) की अप्रकाशित पुस्तक फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी को लेकर उत्पन्न विवाद के बीच रक्षा मंत्रालय सेवारत तथा सेवानिवृत्त सशस्त्र बलों के कार्मिकों द्वारा पुस्तक प्रकाशन के लिये एक नई विनियामक रूपरेखा का मसौदा तैयार कर रहा है।
- सेवानिवृत्त कार्मिकों के लिये वर्तमान विधिक शून्यता: सेवारत कार्मिकों के विपरीत सेवानिवृत्त सेना अधिकारियों द्वारा पुस्तक लेखन को विशेष रूप से विनियमित करने वाला वर्तमान में कोई एक समेकित विधिक प्रावधान उपलब्ध नहीं है।
- यद्यपि वे प्रकाशनों के संदर्भ में सेना अधिनियम, 1950 तथा सेना नियम, 1954 के अधीन नहीं आते, तथापि विनियामक परिदृश्य अब भी एक “विधिक धूसर क्षेत्र” के रूप में बना हुआ है, जो प्रायः व्यक्तिगत विवेक पर निर्भर करता है।
- शासकीय गुप्त बात अधिनियम (OSA) का लागू होना: शासकीय गुप्त बात अधिनियम, 1923 सेवानिवृत्ति के पश्चात भी आजीवन कार्मिकों पर लागू रहता है।
- वर्गीकृत सूचनाओं, परिचालन संबंधी विवरणों अथवा राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रतिकूल सामग्री का प्रकटीकरण विधि के अंतर्गत दंडनीय अपराध बना रहता है।
- सेवारत कार्मिकों के लिये विनियम: राष्ट्रीय हित से संबंधित विषय-वस्तु के प्रकाशन हेतु संबंधित रक्षा सेवाओं के भीतर अनुमति प्रदान करने की एक निर्धारित प्रक्रिया विद्यमान है तथा किसी भी त्रुटिपूर्ण या अवैध प्रकटीकरण से निपटने के लिये विधिक प्रावधान उपलब्ध हैं।
- किसी भी साहित्यिक अथवा पारिश्रमिक गतिविधि आरंभ करने से पूर्व लिखित अनुमति अनिवार्य है।
- यह सुनिश्चित करने हेतु कि किसी भी प्रकार के परिचालन विवरण, खुफिया जानकारी या आंतरिक प्रक्रियाओं से समझौता न हो, विषय-वस्तु को जाँच हेतु सीरीज़ ऑफ कमांड (सेना मुख्यालय या रक्षा मंत्रालय तक) के माध्यम से प्रेषित किया जाता है।
- सिविल सेवकों के साथ तुलना: सरकार ने वर्ष 2021 में केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियमों में संशोधन किया था।
- इस संशोधन के अंतर्गत खुफिया या सुरक्षा से संबंधित संगठनों, जैसे– अनुसंधान एवं विश्लेषण विंग (RAW) तथा इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) से सेवानिवृत्त अधिकारियों को सक्षम प्राधिकारी की पूर्व स्वीकृति के बिना संवेदनशील सूचना प्रकाशित करने से विशेष रूप से प्रतिबंधित किया गया है।
- रक्षा मंत्रालय द्वारा प्रस्तावित दिशा-निर्देश: प्रस्तावित नई रूपरेखा का उद्देश्य पांडुलिपियों की स्वीकृति प्रक्रिया का मानकीकरण करना है। इसमें वर्तमान सेवा नियमों तथा शासकीय गुप्त बात अधिनियम के प्रावधानों को समाहित करते हुए पूर्व सैनिकों के संबंध में विद्यमान विनियामक अंतराल को समाप्त करने का प्रयास किया गया है।


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