अनुसूचित जाति से संबंधित लोगों को सार्वजनिक स्थानों से वंचित करना
चर्चा में क्यों?
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की 'भारत में अपराध 2023' रिपोर्ट उन मामलों में वृद्धि पर प्रकाश डालती है, जिनमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत अनुसूचित जातियों (SC) को सार्वजनिक स्थानों तक पहुँच से वंचित किया गया था।
सार्वजनिक स्थानों तक पहुँच से वंचित किये जाने से संबंधित NCRB के आँकड़े
- देश भर में सार्वजनिक स्थानों तक पहुँच से वंचित करने के 180 मामलों में से 173 उत्तर प्रदेश से संबंधित थे, जिससे यह राज्य इस श्रेणी में स्पष्ट रूप से अलग-थलग दिखाई देता है।
- यह रुझान वर्ष 2017 से बढ़ रहे हैं, जो मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश में मामलों की बढ़ती रिपोर्टिंग और पंजीकरण से प्रेरित है।
- रिपोर्ट किये गए कुल मामलों में राज्य का हिस्सा वर्ष 2018 में लगभग 68% से बढ़कर वर्ष 2019 में लगभग 80% हो गया।
- वर्ष 2022 में यह एकाग्रता और भी अधिक स्पष्ट हो गई, जब देश भर में रिपोर्ट किये गए ऐसे सभी मामलों में से 98% से अधिक उत्तर प्रदेश से आए।
- अनुसूचित जातियों की तुलना में, देश भर में अनुसूचित जनजातियों (ST) को सार्वजनिक स्थानों तक पहुँच से वंचित किये जाने के मामले अपेक्षाकृत कम बने हुए हैं।
सार्वजनिक स्थानों से वंचित किये जाने के मूल कारण क्या हैं?
- जाति-आधारित स्थानिक भिन्नता: कई ग्रामीण क्षेत्रों में अनौपचारिक जातीय भूगोल अभी भी मौज़ूद है जहाँ प्रभुत्वशाली जातियाँ मंदिरों, जल निकायों, श्मशान घाटों और गाँव के रास्तों को नियंत्रित करती हैं।
- आधुनिकीकरण के बावज़ूद, आनुष्ठानिक शुद्धता की रूढ़िवादी धारणा विशिष्ट सार्वजनिक वस्तुओं, विशेष रूप से जलस्रोतों और धार्मिक स्थलों तक पहुँच निर्धारित करती हैं।
- रूढ़िवादी तत्त्वों द्वारा किसी अनुसूचित जाति के व्यक्ति के प्रवेश को अभी भी साझा सार्वजनिक संसाधनों को "अपवित्र" करने के रूप में देखा जाता है।
- ऐसी प्रथाएँ, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 के तहत इसके उन्मूलन के बावज़ूद, अस्पृश्यता के निरंतर रूपों को दर्शाती हैं, अनुच्छेद 15 की गारंटी को कमज़ोर करती हैं जो सार्वजनिक स्थानों तक समान पहुँच सुनिश्चित करता है।
- आधुनिकीकरण के बावज़ूद, आनुष्ठानिक शुद्धता की रूढ़िवादी धारणा विशिष्ट सार्वजनिक वस्तुओं, विशेष रूप से जलस्रोतों और धार्मिक स्थलों तक पहुँच निर्धारित करती हैं।
- स्थानीय शक्ति संरचनाओं का प्रभुत्व: ग्रामीण शासन संरचनाएँ और अनौपचारिक जाति पंचायतें अक्सर सामाजिक पदानुक्रम को सुदृढ़ करती हैं।
- ग्रामीण क्षेत्रों में अनुसूचित जातियों की बड़ी आबादी आज भी भूमिहीन कृषि मज़दूरों के रूप में जीवनयापन करती है। भूमि स्वामित्व और आर्थिक निर्भरता प्रभुत्वशाली समूहों को डराने-धमकाने या सामाजिक बहिष्कार के माध्यम से बहिष्कार करने में सक्षम बनाती है ताकि उपेक्षित समुदायों को सार्वजनिक स्थानों पर अपने कानूनी अधिकारों का दावा करने से रोका जा सके।
- अत्याचार निरोधक कानूनों का कमज़ोर प्रवर्तन: अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 अनुसूचित जातियों के लिये सार्वजनिक स्थानों तक पहुँच से वंचित करने को अपराध घोषित करता है, हालाँकि इसके प्रवर्तन में कमियाँ बनी हुई हैं।
- कई मामलों में पीड़ितों को प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने में विलंब, अपर्याप्त पुलिस जाँच और अत्याचार के मामलों में कम दोषसिद्धि दर का सामना करना पड़ता है, जो कानून के निवारक प्रभाव को कमज़ोर करता है और भेदभावपूर्ण प्रथाओं को जारी रहने देता है।
- कानूनी अधिकारों के बारे में सीमित जागरूकता: कई उपेक्षित समुदाय अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 और संवैधानिक सुरक्षा उपायों के तहत सुरक्षा के बारे में अनजान हैं।
- कानूनी साक्षरता की कमी पीड़ितों को भेदभाव की रिपोर्ट करने या संस्थागत उपचार की तलाश करने से रोकती है।
सार्वजनिक स्थानों को लोकतांत्रिक बनाने के लिये कौन-सी विधिक और संस्थागत सुरक्षा उपलब्ध हैं?
- अनुच्छेद 15: जाति के आधार पर भेदभाव को प्रतिषेध करता है और दुकानों, कुओं, तालाबों, सड़कों जैसे सार्वजनिक स्थानों तक समान पहुँच को सुनिश्चित करता है।
- अनुच्छेद 17: अस्पृश्यता का उन्मूलन करता है और इसे किसी भी रूप में व्यवहार में लाने को दंडनीय अपराध घोषित करता है।
- अनुच्छेद 21: प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार प्रदान करता है।
- 73वाँ संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1992: पंचायती राज संस्थाओं में अनुसूचित जातियों (SC), अनुसूचित जनजातियों (ST) और महिलाओं के लिये आरक्षण अनिवार्य करता है, जिससे स्थानीय शासन में उनकी भागीदारी एवं ग्रामीण संसाधनों और सार्वजनिक स्थानों पर अधिक समावेशी नियंत्रण सुनिश्चित होता है।
- अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989: अनुसूचित जाति/जनजाति के व्यक्तियों को सार्वजनिक स्थानों, मंदिरों, जलस्रोतों और सामुदायिक संसाधनों में प्रवेश से वंचित करने जैसे कृत्यों को अपराध घोषित करता है।
- नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955: अस्पृश्यता से उत्पन्न होने वाली प्रथाओं के खिलाफ कानूनी सुरक्षा उपाय प्रदान करता है, जिसमें सार्वजनिक सुविधाओं तक पहुँच से वंचित करना शामिल है।
- राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग: अनुसूचित जाति समुदायों के लिये सुरक्षा उपायों की निगरानी करता है और भेदभाव से संबंधित शिकायतों की जाँच करता है।
- न्यायिक घोषणाएँ:
- कर्नाटक राज्य बनाम अप्पा बालू इंगले (1995): भारत के उच्चतम न्यायालय ने यह माना है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 और संबंधित कानूनों का उद्देश्य समाज को भेदभावपूर्ण जातिगत प्रथाओं के अंधानुकरण से मुक्त करना है, जिनका अब कोई कानूनी या नैतिक आधार नहीं रह गया है।
- अरुमुगम सर्वै बनाम तमिलनाडु राज्य (2011): उच्चतम न्यायालय ने ज़िला प्रशासनों को दैनिक स्थानिक अस्पृश्य प्रथाओं, जैसे– सार्वजनिक चाय की दुकानों में भेदभावपूर्ण "टू-टंबलर सिस्टम" को समाप्त करने का निर्देश दिया।
भारत में सार्वजनिक स्थलों को लोकतांत्रिक बनाने के लिये क्या कदम उठाए जा सकते हैं?
- स्थानिक न्याय सुनिश्चित करना: पारंपरिक जाति-आधारित स्थानीय भेदभाव को तोड़ने के लिये सार्वजनिक सुविधाओं (पंचायत भवन, आंगनवाड़ी, PDS दुकानें, कुओं) को तटस्थ या अनुसूचित जाति-बहुल क्षेत्रों में स्थापित करना, जिससे प्रभुत्वशाली जातियाँ स्थानों पर नियंत्रण (गेटकीपिंग) करने के बजाय उन्हें साझा करने के लिये मजबूर हों।
- निधियों को सामाजिक लेखांकन/ऑडिट से जोड़ना: ग्रामसभा के सामाजिक लेखांकन को अनिवार्य बनाना और विकास अनुदानों को इस प्रमाणीकरण से जोड़ना कि कोई अस्पृश्यता या स्थानिक बहिष्कार मौज़ूद नहीं है।
- आधिकारिक जवाबदेही: अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 4 को सख्ती से लागू करना, जो उन सार्वजनिक अधिकारियों को दंडित करती है जो प्राथमिकी दर्ज करने या पीड़ितों की रक्षा करने जैसे कर्त्तव्यों की उपेक्षा करते हैं।
- विशिष्ट विशेष न्यायालय स्थापित करना: अत्याचार संबंधी मामलों में त्वरित सुनवाई सुनिश्चित करने, लंबित मामलों को कम करने और निवारक प्रभाव में सुधार करने के लिये ज़िला स्तर पर विशिष्ट न्यायालय स्थापित करना।
- व्यवहार परिवर्तन अभियान: बी.आर. अंबेडकर, ज्योतिराव फुले और पेरियार ई.वी. रामासामी के संवैधानिक मूल्यों और जाति-विरोधी सुधार विचारों को बढ़ावा देना।
निष्कर्ष
सार्वजनिक स्थानों तक पहुँच से वंचित करना यह दर्शाता है कि दैनिक जीवन में जाति आधारित ऊँच-नीच की व्यवस्था अभी भी बनी हुई है। इस समस्या के समाधान हेतु मज़बूत कानून प्रवर्तन, सामाजिक-आर्थिक सशक्तीकरण तथा संवैधानिक नैतिकता और समानता के प्रति समाज की गहरी प्रतिबद्धता आवश्यक है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. भारत के संविधान का अनुच्छेद 17 क्या प्रावधान करता है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 17 'अस्पृश्यता' (छुआछूत) का उन्मूलन करता है और किसी भी रूप में इसके आचरण को निषिद्ध करता है। अस्पृश्यता से उपजी किसी भी अक्षमता को लागू करना कानून के अनुसार एक दंडनीय अपराध होगा।
2. अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 का उद्देश्य क्या है?
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 जाति आधारित अत्याचारों को अपराध घोषित करता है, जिसमें सार्वजनिक स्थानों तक पहुँच से वंचित करना भी शामिल है और इसके अंतर्गत विशेष न्यायालय, पीड़ितों की सुरक्षा तथा राहत के प्रावधान किये गए हैं।
3. संविधान के अनुच्छेद 15(2) का क्या महत्त्व है?
भारत के संविधान का अनुच्छेद 15(2) सार्वजनिक धन से संचालित या जनता के उपयोग के लिये उपलब्ध स्थानों, जैसे– दुकानों, कुओं, तालाबों और सड़कों पर पहुँच के मामले में किसी भी प्रकार के भेदभाव को प्रतिबंधित करता है।
4. कौन-सा कानून अस्पृश्यता से उत्पन्न होने वाली प्रथाओं को दंडित करता है?
नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 अस्पृश्यता से उत्पन्न सामाजिक या धार्मिक निर्योग्यताओं को लागू करने पर दंड का प्रावधान करता है।
5. स्टेट ऑफ कर्नाटक बनाम अप्पा बालू इंगले (1995) मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का क्या महत्त्व था?
स्टेट ऑफ कर्नाटक बनाम अप्पा बालू इंगले (1995) मामले में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि अनुच्छेद 17 का उद्देश्य उन भेदभावपूर्ण जातिगत प्रथाओं को समाप्त करना है जिनका कोई भी कानूनी या नैतिक आधार नहीं है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
मेन्स
प्रश्न 1. बहु-सांस्कृतिक भारतीय समाज को समझने में क्या जाति की प्रासंगिकता समाप्त हो गई है ? उदाहरणों सहित विस्तृत उत्तर दीजिये। (2020)
प्रश्न 2. "जाति व्यवस्था नई-नई पहचानों और सहचारी रूपों को धारण कर रही है। अतः, भारत में जाति व्यवस्था का उन्मूलन नहीं किया जा सकता है।" टिप्पणी कीजिये । (2018)
प्रश्न 3. स्वतंत्रता के बाद अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के प्रति भेदभाव को दूर करने के लिये राज्य द्वारा की गई दो प्रमुख विधिक पहलें क्या हैं? (मुख्य परीक्षा- 2017)
प्रश्न 4: अपसारी उपागमों और रणनीतियों के होने के बावजूद, महात्मा गांधी और डॉ. बी.आर. अंबेडकर का दलितों की बेहतरी का एक समान लक्ष्य था। स्पष्ट कीजिये। (2015)
भारत-नेपाल सहयोग की नए सिरे से पुनः स्थापना
यह एडिटोरियल 08/03/2026 को द हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित ‘The making of a new political order in Nepal’ शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह संपादकीय वर्ष 2026 में तकनीक-प्रधान नेतृत्व के उदय और ‘जेन–Z’ के प्रभाव के बाद भारत–नेपाल संबंधों में आए परिवर्तन का परीक्षण करता है। यह विश्लेषण करता है कि आधुनिक अवसंरचना और डिजिटल एकीकरण को अब ‘अग्निपथ’ योजना तथा क्षेत्रीय विवादों जैसे गहरे निहित मतभेदों के साथ किस प्रकार समन्वित करने की आवश्यकता है।
प्रिलिम्स के लिये: शांति और मित्रता संधि, 1950, महाकाली संधि, मोतिहारी-अमलेखगंज पाइपलाइन, अग्निपथ योजना
मेन्स के लिये: भारत-नेपाल संबंधों का विकास, सहयोग के प्रमुख क्षेत्र, संबंधों में तनाव के क्षेत्र, संबंधों को मज़बूत करने के लिये आवश्यक उपाय।
नेपाल में हाल ही में हुए चुनावी परिवर्तन भारत के पड़ोसी देशों के बदलते राजनीतिक परिदृश्य का संकेत देते हैं। भारत के लिये, ऐसे परिवर्तन नेपाल के साथ उसके ऐतिहासिक रूप से घनिष्ठ संबंधों के बदलते स्वरूप को उजागर करते हैं, जो साझा सभ्यता, खुली सीमा और गहरे जन-संबंधों पर आधारित हैं। समय के साथ, यह संबंध सांस्कृतिक समन्वय से आगे बढ़कर रणनीतिक, आर्थिक और विकासात्मक सहयोग तक विस्तृत हो गया है। इस संदर्भ में भारत–नेपाल संबंधों को अपनी पारंपरिक साझेदारी को बनाए रखते हुए नई राजनीतिक वास्तविकताओं के अनुरूप स्वयं को अनुकूलित करने की आवश्यकता है।
समय के साथ भारत-नेपाल संबंधों में किस प्रकार परिवर्तन आए हैं?
- चरण I: सुरक्षा संरक्षकवाद और आधारभूत युग (1950-1990)
- वर्ष 1950 की संधि का प्रतिमान: शांति और मैत्री संधि ने ‘असममित पारस्परिकता’ की व्यवस्था स्थापित की, जिसके अंतर्गत नेपाल को सुरक्षा आश्वासन और आर्थिक पहुँच प्राप्त हुई, जबकि इसके बदले भारत के हिमालयी सुरक्षा हितों के साथ सामंजस्य अपेक्षित था।
- भारत के लिये सामरिक अवरोध के रूप में नेपाल: वर्ष 1962 के भारत–चीन युद्ध के बाद भारत ने नेपाल को एक महत्त्वपूर्ण सुरक्षा अवरोध के रूप में और अधिक महत्त्व दिया, क्योंकि हिमालय को चीन के विरुद्ध भारत की प्राकृतिक रक्षा-रेखा माना जाता है।
- प्रभाव की अवसंरचना: प्रारंभिक सहयोग में कोसी और गंडक बांध जैसी विशाल परियोजनाओं का वर्चस्व था, जो सिंचाई प्रदान करने के साथ-साथ नेपाल में 'जल राष्ट्रवाद' के प्रारंभिक स्रोत भी बन गए।
- वर्ष 1989 का विच्छेद: पहला बड़ा परिवर्तन तब हुआ जब राजा बीरेंद्र द्वारा चीन से हथियार खरीदने के प्रयास के परिणामस्वरूप भारत ने 15 महीनों का आर्थिक अवरोध लागू किया।
- चरण II: लोकतांत्रिक संक्रमण और राजतंत्रोत्तर पुनर्संरेखण (1990–2015)
- बहुदलीय लोकतंत्र का समर्थन: भारत ने राजतंत्र के समर्थन से हटकर माओवादी समूहों और मुख्यधारा के राजनीतिक दलों के बीच वर्ष 2005 के ‘बारह सूत्रीय समझौते’ को सुगम बनाया।
- 'द्वि स्तंभ' से गणतंत्र की ओर परिवर्तन: भारत ने अपनी ‘द्वि-स्तंभ’ नीति (राजतंत्र + लोकतंत्र) को त्यागकर एक पंथनिरपेक्ष संघीय गणराज्य का समर्थन किया, जो ऐतिहासिक सभ्यतागत संबंधों से हटकर राजनीतिक यथार्थवाद की दिशा में एक परिवर्तन था।
- वर्ष 2015 का संवैधानिक संकट: नए संविधान के प्रख्यापन से एक बड़ा विवाद उत्पन्न हुआ। मधेशी आंदोलनों के प्रति भारत के कथित समर्थन और उसके पश्चात् हुए ‘अनौपचारिक अवरोध’ ने नेपाल में प्रबल अतिराष्ट्रवाद को जन्म दिया।
- सहयोग का संस्थागत रूप: राजनीतिक तनावों के बावजूद इस काल में इंटीग्रेटेड चेक पोस्ट (ICP) तथा पंचेश्वर बहुउद्देश्यीय परियोजना जैसी पहलों की परिकल्पना हुई, जिनका उद्देश्य व्यापार को संस्थागत स्वरूप प्रदान करना था।
- चरण III: भू-राजनीतिक विविधीकरण और ‘मानचित्र विवाद’ (2015–2024)
- ‘चीन विकल्प’ की परिपक्वता: के.पी. शर्मा ओली के नेतृत्व में नेपाल ने चीन के साथ परिवहन और पारगमन समझौते पर हस्ताक्षर किये। वर्ष 2018 में अंतिम रूप दिये गए इस कदम का उद्देश्य व्यापार मार्गों का विविधीकरण करना तथा भारत पर दीर्घकालिक निर्भरता को कम करना था।
- क्षेत्रीय एवं मानचित्र संबंधी दावा: वर्ष 2020 में कालापानी–लिपुलेख क्षेत्र को लेकर विवाद के बाद नेपाल ने ‘नया मानचित्र’ संशोधन पारित किया, जिससे यह संकेत मिला कि नेपाल सीमा प्रबंधन में अब ‘यथास्थिति’ को स्वीकार नहीं करेगा।
- संरक्षकवाद से व्यावहारिकता की ओर: भारत ने ‘मौन कूटनीति’ की ओर रुख किया और प्रत्यक्ष राजनीतिक हस्तक्षेप के बिना ‘उच्च प्रभाव वाले सामुदायिक विकास परियोजनाओं (HICDP)’ को पूरा करने पर ध्यान केंद्रित किया, ताकि जनसमर्थन पुनः प्राप्त किया जा सके।
- कूटनीति के रूप में संपर्क का प्रयोग: मोतीहारी–अमलेखगंज अंतर-सीमा पेट्रोलियम पाइपलाइन के उद्घाटन ने ‘ठोस अवसंरचना आधारित पारस्परिक निर्भरता’ की दिशा में परिवर्तन का संकेत दिया।
- चरण IV: व्यावहारिक परिवर्तन (2025–वर्तमान)
- वर्ष 2025 का ‘जेन–Z’ विद्रोह: नेपाल में सितंबर 2025 में एक बड़ा राजनीतिक उथल-पुथल देखने को मिला, जब सरकार द्वारा प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर प्रतिबंध लगाने से युवाओं के नेतृत्व में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए, जिन्हें लोकप्रिय रूप से ‘जेन–Z आंदोलन’ कहा गया।
- प्रदर्शनकारियों पर की गई कार्रवाई ने प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली को इस्तीफा देने के लिये विवश कर दिया।
- इस संकट ने भारत के लिये एक रणनीतिक शून्यता को उजागर किया, जो लंबे समय से नेपाल में केवल उच्च-स्तरीय राजनीतिक नेतृत्व के साथ संवाद पर निर्भर रहा था। इसके परिणामस्वरूप खुली सीमा के निकट अस्थिरता की आशंकाओं के बीच नई दिल्ली को सावधानीपूर्ण ‘प्रतीक्षा और अवलोकन’ की नीति अपनानी पड़ी।
- नेपाल का चुनावी परिवर्तन और नई राजनीतिक व्यवस्था: मार्च 2026 के चुनावों के पश्चात नेपाल के राजनीतिक परिदृश्य में एक निर्णायक परिवर्तन हुआ, जिसमें नेपाल की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) ने ऐतिहासिक जनादेश प्राप्त किया और पारंपरिक पार्टियों के प्रभुत्व को समाप्त कर दिया।
- वर्तमान में भारत–नेपाल संबंध अधिक व्यावहारिक और संस्थागत ढाँचे की ओर अग्रसर हैं, जिनका केंद्र जलविद्युत निर्यात, डिजिटल संपर्क तथा वित्तीय प्रौद्योगिकी के एकीकरण जैसे क्षेत्रों में आर्थिक सहयोग है।
- वर्ष 2025 का ‘जेन–Z’ विद्रोह: नेपाल में सितंबर 2025 में एक बड़ा राजनीतिक उथल-पुथल देखने को मिला, जब सरकार द्वारा प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर प्रतिबंध लगाने से युवाओं के नेतृत्व में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए, जिन्हें लोकप्रिय रूप से ‘जेन–Z आंदोलन’ कहा गया।
भारत और नेपाल के बीच सहयोग के प्रमुख क्षेत्र क्या हैं?
- जलविद्युत और ऊर्जा एकीकरण: नेपाल के साथ भारत की रणनीति पारंपरिक भू-राजनीतिक संतुलन से आगे बढ़कर, दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक एकीकरण की दिशा में निर्णायक रूप से परिवर्तित हो गई है।
- नेपाल की अप्रयुक्त जलविद्युत क्षमता के लिये स्वयं को प्राथमिक बाज़ार के रूप में स्थापित करके, भारत एक 'मज़बूत' आर्थिक निर्भरता को बढ़ावा दे रहा है, जो चीनी प्रभाव को निष्प्रभावी करते हुए अपने स्वयं के हरित ऊर्जा परिवर्तन को आगे बढ़ा रहा है।
- उदाहरण के लिये, वर्ष 2024 के दीर्घकालिक विद्युत व्यापार समझौते में यह गारंटी दी गई है कि भारत 10 वर्षों में नेपाल से 10,000 मेगावाट बिजली का आयात करेगा।
- प्रमुख परियोजनाओं में 900 मेगावाट की अरुण-III और 490 मेगावाट की अरुण-4 शामिल हैं, जिनसे नेपाल के निर्यात राजस्व में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।
- सीमा पार डिजिटल कनेक्टिविटी: नेपाल में भारत के डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) का विस्तार वित्तीय एकीकरण और जीवन की सुगमता के उद्देश्य से की गई सॉफ्ट-पावर कूटनीति का एक नया आयाम प्रस्तुत करता है।
- यह निर्बाध सीमा पार भुगतान प्रणाली अनौपचारिक प्रेषण चैनलों (हुंडी) को कमज़ोर करती है तथा नेपाल के उपभोक्ता बाज़ार और पर्यटन क्षेत्र को भारतीय अर्थव्यवस्था के साथ गहराई से एकीकृत करती है।
- वर्ष 2024 में भारत के एकीकृत भुगतान इंटरफेस (UPI) को नेपाल के राष्ट्रीय भुगतान इंटरफेस (NPI) से जोड़ने की ऐतिहासिक पहल ने लाखों पर्यटकों और प्रवासी श्रमिकों के लिये तात्कालिक सीमा-पार लेन-देन को संभव बनाया है।
- परिवहन और पारगमन अवसंरचना: चीन की ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI)’ के प्रस्तावों का संतुलन स्थापित करने के लिये भारत ने सीमा-पार भौतिक अवसंरचना के निर्माण और क्रियान्वयन को उल्लेखनीय रूप से तीव्र कर दिया है, जिससे ‘केवल आश्वासित’ परियोजनाओं के स्थान पर ‘वास्तव में पूर्ण की गई’ परियोजनाओं पर बल दिया गया है।
- 'कूटनीति के रूप में कनेक्टिविटी' पर केंद्रित यह दृष्टिकोण नेपाल की पारगमन लागत को कम करने तथा इस भू-आबद्ध राष्ट्र के व्यापार मार्गों को भारतीय बंदरगाहों से स्थायी रूप से जोड़ने के उद्देश्य से है।
- हाल के महत्त्वपूर्ण चरणों में कुर्था-बिजलपुरा रेल लाइन का संचालन, रूपैडिहा-नेपालगंज में एकीकृत चेक पोस्ट (ICP) का निर्माण तथा मोतिहारी-अमलेखगंज पेट्रोलियम पाइपलाइन शामिल हैं।
- रक्षा एवं सुरक्षा सहयोग: काठमांडू में राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बावजूद सैन्य-से-सैन्य संबंधों की गहरी जड़ें द्विपक्षीय स्थिरता का सबसे मज़बूत आधार बनी हुई हैं।
- भारत 1,850 किमी. की खुली सीमा को साझा सुरक्षा आयाम के रूप में देखता है, जिसके लिये तस्करी, जाली मुद्रा और अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद जैसे गैर-पारंपरिक खतरों को कम करने हेतु गहन सहयोग आवश्यक है।
- वार्षिक 'सूर्य किरण' संयुक्त सैन्य अभ्यास तथा एक-दूसरे के सेना प्रमुखों को जनरल का मानद पद प्रदान करने की परंपरा, निरंतर उपकरण और प्रशिक्षण सहायता के साथ-साथ इस बंधन को रेखांकित करती है।
- कृषि नवाचार और खाद्य सुरक्षा: क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करने और आर्थिक प्रवासन को कम करने के लिये नेपाल की कृषि संबंधी कमज़ोरियों का समाधान करना भारत के लिये एक रणनीतिक अनिवार्यता है।
- उच्च उपज वाली प्रौद्योगिकियों को साझा करके और संयुक्त अनुसंधान पहलों की स्थापना करके, भारत नेपाल की खाद्य सुरक्षा का समर्थन करने और उसकी कृषि अर्थव्यवस्था का आधुनिकीकरण करने के लिये अपनी कृषि संबंधी प्रगति का लाभ उठाता है।
- कृषि एवं संबद्ध नवाचार में उत्कृष्टता केंद्र स्थापित करने के लिये कर्नाटक सरकार द्वारा वर्ष 2026 में किया गया समझौता नेपाल के साथ सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा करने के लिये उप-राष्ट्रीय कूटनीति का खाका प्रदान करता है।
- सांस्कृतिक और धार्मिक पर्यटन: साझा सभ्यतागत विरासत, जिसे प्रायः 'रोटी-बेटी' कहा जाता है, को सुनियोजित पर्यटन परिपथों के माध्यम से रणनीतिक रूप से आर्थिक रूप दिया जा रहा है।
- यह सांस्कृतिक कूटनीति न केवल लोगों के बीच संबंधों को मज़बूत करती है बल्कि स्थानीय स्तर पर पर्याप्त रोज़गार का भी सृजन करती है, साथ ही दोनों देशों के एक-दूसरे के नागरिकों के लिये मौजूद अपार धार्मिक महत्त्व का लाभ उठाती है।
- अयोध्या को जनकपुर से जोड़ने वाले 'रामायण सर्किट' तथा लुंबिनी को सारनाथ और बोधगया से जोड़ने वाले 'बौद्ध सर्किट' के विकास का उद्देश्य धार्मिक पर्यटकों की वर्तमान संख्या को कई गुना बढ़ाना है।
- आपदा प्रबंधन और जलवायु अनुकूलन: हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की साझा सुभेद्यता को देखते हुए, संयुक्त आपदा प्रतिक्रिया और जलवायु शमन अब वैकल्पिक नहीं बल्कि अस्तित्वगत आवश्यकताएँ हैं।
- संकटों के दौरान 'प्रथम प्रतिक्रियाकर्त्ता' के रूप में भारत की भूमिका उसकी पड़ोस नीति का एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ है, जो अपार सद्भावना का निर्माण करती है और बाढ़ एवं भूकंप जैसी आपदाओं के प्रति समन्वित प्रतिक्रियाओं को संस्थागत रूप देती है।
- वर्ष 2015 के भूकंप के दौरान भारत की त्वरित तैनाती (ऑपरेशन मैत्री) तथा कोसी एवं गंडक नदियों के लिये बाढ़ पूर्वानुमान तंत्र पर चल रहा सहयोग इस जीवन रक्षक सहयोग को उजागर करता है।
- व्यापार और आर्थिक साझेदारी: भारत नेपाल की निर्विवाद आर्थिक जीवनरेखा बना हुआ है, जो उसके अधिकांश प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की आपूर्ति करता है तथा वैश्विक बाज़ारों तक पहुँचने के लिये प्राथमिक पारगमन मार्ग के रूप में कार्य करता है।
- नेपाल के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में भारत की हिस्सेदारी 65% है, जिसमें भारत से नेपाल को होने वाला 8 अरब डॉलर का निर्यात शामिल है। इसके अलावा, भारत और नेपाल ने रेल आधारित माल ढुलाई को बढ़ावा देने के लिये एक समझौते पर हस्ताक्षर किये हैं, जिससे दोनों देशों के बीच व्यापार एवं संपर्क को मज़बूती मिलेगी।
भारत-नेपाल संबंधों में तनाव के प्रमुख क्षेत्र कौन-से हैं?
- क्षेत्रीय विवाद और मानचित्र संबंधी दावा: कालापानी-लिपुलेख-लिम्पियाधुरा त्रिपक्षीय पर्वत शृंखला पर अनसुलझा सीमा विवाद द्विपक्षीय संबंधों में सबसे शक्तिशाली भावनात्मक और राजनीतिक तनाव का मुद्दा बना हुआ है।
- नेपाल द्वारा वर्ष 2020 में किये गए संवैधानिक संशोधन के तहत इन क्षेत्रों को अपने आधिकारिक मानचित्र में शामिल करना और उसके बाद वर्ष 2025 में संशोधित मानचित्र वाले करेंसी नोटों का जारी होना, एक क्षेत्रीय 'यथास्थिति' को संस्थागत रूप दे चुका है जिसे भारत ऐतिहासिक रूप से आधारहीन बताते हुए स्पष्टतः अस्वीकार करता है।
- यह विवाद लगभग 372 वर्ग किलोमीटर के रणनीतिक उच्च-तुंगता वाले हिमालयी क्षेत्र को कवर करता है, भारत इस क्षेत्र का प्रशासन भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के माध्यम से संचालित करता है, जबकि नेपाल द्वारा वर्ष 2025 में मुद्रा नोट जारी करने की उकसाने वाली पहल के कारण औपचारिक सीमा वार्ताएँ पूर्णतः स्थगित हो गईं।
- अग्निपथ योजना और गोरखा भर्ती पर रोक: भारत द्वारा 2022 में अग्निपथ योजना की शुरुआत ने अनजाने में एक सदी पुरानी सैन्य परंपरा को बाधित कर दिया है, जिससे नेपाल के पर्वतीय क्षेत्रों में एक महत्त्वपूर्ण ‘सामाजिक सुरक्षा’ शून्य उत्पन्न हो गया है।
- काठमांडू का तर्क है कि चार वर्ष का 'अग्निवीर' अनुबंध 1947 के त्रिपक्षीय समझौते का उल्लंघन करता है, जिसने स्थायी सेवा और पेंशन की गारंटी दी थी, जिसके कारण वर्ष 2022 से भर्ती रैलियों को निलंबित कर दिया गया है।
- वर्तमान में भारतीय सेना में 32,000 से कुछ अधिक गोरखा सैनिक सेवारत हैं। सैनिकों के क्रमिक सेवानिवृत्ति और नई भर्तियों के अभाव में अनुमान है कि लगभग सात वर्षों में गोरखा बटालियनों की संख्या आज की तुलना में आधी रह जाएगी।
- वर्ष 1950 की भारत-नेपाल संधि पर बहस: नेपाल के युवा, राष्ट्रवादी राजनीतिक वर्ग द्वारा वर्ष 1950 की संधि को तीव्रता से एक 'असमान औपनिवेशिक अवशेष' के रूप में देखा जा रहा है, जो उनकी संप्रभु स्वायत्तता से समझौता करता है।
- यद्यपि विशिष्ट व्यक्तियों के समूह (EPG) ने कई वर्ष पहले संशोधन संबंधी सिफारिशों सहित अपनी रिपोर्ट तैयार कर ली थी, फिर भी भारतीय नेतृत्व द्वारा उस दस्तावेज़ को औपचारिक रूप से स्वीकार न करने से भारत के 'बिग ब्रदर' जैसे हठधर्मिता की धारणाओं को बल मिला है।
- नेपाल इस संधि के प्रमुख प्रावधानों में संशोधन चाहता है, जिनमें विशेष रूप से अनुच्छेद 5 (रक्षा उपकरणों का आयात) भी शामिल है, ताकि वह अधिक स्वायत्तता स्थापित कर सके।
- चीन की रणनीतिक उपस्थिति का विस्तार: चीन की बेल्ट एंड रोड पहल (BRI) के माध्यम से नेपाल का रणनीतिक 'विविधीकरण' भारत द्वारा हिमालय क्षेत्र में अपने पारंपरिक प्रभाव क्षेत्र के लिये एक प्रत्यक्ष चुनौती के रूप में देखा जाता है।
- नेपाल में वर्ष 2025 की राजनीतिक उथल-पुथल के बाद, चीन ने विशेष रूप से वर्ष 2026 के आम चुनावों का समर्थन करने के लिये 4 मिलियन डॉलर का अनुदान प्रदान किया।
- यह कदम तथा व्यापक ‘तकनीकी सहायता’ विश्लेषकों और भारतीय अधिकारियों के अनुसार नेपाल की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर चीन के बढ़ते प्रभाव का संकेत माना गया है।
- इसके अलावा, चीन और नेपाल ने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत ट्रांस-हिमालयन मल्टी-डायमेंशनल कनेक्टिविटी नेटवर्क को औपचारिक रूप दिया है, जिससे हिमालयी क्षेत्र में बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों को लेकर भारत में सामरिक चिंताएँ उत्पन्न हुई हैं।
- नेपाल में वर्ष 2025 की राजनीतिक उथल-पुथल के बाद, चीन ने विशेष रूप से वर्ष 2026 के आम चुनावों का समर्थन करने के लिये 4 मिलियन डॉलर का अनुदान प्रदान किया।
- व्यापार घाटा और आर्थिक विषमता: नेपाल का भारत के साथ भारी व्यापार असंतुलन प्रायः स्थानीय राजनेताओं द्वारा 'आर्थिक वर्चस्व' एवं शोषण के प्रमाण के रूप में प्रयोग किया जाता है।
- सोयाबीन तेल जैसी कुछ अस्थिर वस्तुओं में नेपाल के निर्यात का अत्यधिक संकेंद्रण इसकी अर्थव्यवस्था को भारतीय टैरिफ संरचनाओं में परिवर्तन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनाता है, जिससे पारस्परिक व्यापार रियायतों की लगातार मांग होती है।
- वित्त वर्ष 2025/26 के पहले पाँच महीनों में भारत के साथ नेपाल का व्यापार घाटा 339 अरब रुपये तक पहुँच गया, जिससे काठमांडू में चालू खाते का संकट और अधिक गंभीर हो गया।
- जल संधि और पंचेश्वर गतिरोध: वर्ष 1996 में महाकाली संधि पर हस्ताक्षर होने के बावजूद, पंचेश्वर बहुउद्देश्यीय परियोजना अब भी सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण से संबंधित ‘लाभ के बँटवारे’ पर गहरे मतभेदों के कारण ठप पड़ी हुई है।
- एक प्रमुख विवाद का मुद्दा 'आनुपातिक लाभ' है। नेपाल का तर्क है कि जल एक अनमोल संसाधन है और भारत को 'नियमित जल' से मिलने वाले लाभों (सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण) के लिये भुगतान करना चाहिये जो उसे निचले इलाकों में प्राप्त होते हैं।
- वहीं भारत बिजली की लागत साझा करने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।
- एक प्रमुख विवाद का मुद्दा 'आनुपातिक लाभ' है। नेपाल का तर्क है कि जल एक अनमोल संसाधन है और भारत को 'नियमित जल' से मिलने वाले लाभों (सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण) के लिये भुगतान करना चाहिये जो उसे निचले इलाकों में प्राप्त होते हैं।
- नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता की चिंता: नेपाल में नेतृत्व-स्तर पर निरंतर होने वाले परिवर्तन भारत को स्थिर संस्थागत व्यवस्थाओं के बजाय परिवर्तित होती व्यक्तिगत निष्ठाओं और राजनीतिक समीकरणों के जटिल संरचना के अनुरूप स्वयं को समायोजित करने के लिये बाध्य करते हैं।
- वर्ष 2025 में ओली सरकार का पतन इसका प्रमुख उदाहरण है, क्योंकि ऐसी अस्थिरता ‘विराम की नीति’ को जन्म देती है, जिसमें जब भी कोई शासकीय गठबंधन गिरता है तो भारत समर्थित प्रमुख पहलों की गति धीमी हो जाती है।
- इसके अलावा, अभिजात वर्ग के स्तर पर सौदाकारी पर निर्भरता द्विपक्षीय प्रगति को नेताओं के बदलते लोकलुभावन रुझानों के प्रति संवेदनशील बना देती है, जिससे घरेलू राजनीतिक अस्तित्व को प्राथमिकता देते हुए सीमा पार सहयोग प्रायः पृष्ठभूमि में चला जाता है।
भारत-नेपाल संबंधों को मज़बूत करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?
- बुनियादी राजनयिक ढाँचों का आधुनिकीकरण: मनोवैज्ञानिक अंतर्विरोध को समाप्त करने के लिये भारत को ‘विशिष्ट व्यक्तियों के समूह (EPG)’ की रिपोर्ट को औपचारिक रूप से स्वीकार करते हुए उस पर चरणबद्ध विचार-विमर्श प्रारंभ करना चाहिये।
- वर्ष 1950 की ‘शांति और मैत्री संधि’ के संबंध में रचनात्मक संवाद की ओर अग्रसर होना नेपाल की ‘संप्रभु समानता’ के प्रति गहरे सम्मान का संकेत देगा।
- इस आधारभूत रूपरेखा को पारस्परिक साझेदारी के मॉडल में रूपांतरित करना काठमांडू में उग्र राष्ट्रवादी वक्तव्य की प्रवृत्ति को निष्प्रभावी करता है।
- यह सक्रिय कूटनीतिक पुनर्संतुलन पारंपरिक संरक्षकवादी दृष्टिकोण का स्थान लेकर दूरदर्शी, न्यायसंगत और संतुलित सुरक्षा संरचना को स्थापित करता है।
- वर्ष 1950 की ‘शांति और मैत्री संधि’ के संबंध में रचनात्मक संवाद की ओर अग्रसर होना नेपाल की ‘संप्रभु समानता’ के प्रति गहरे सम्मान का संकेत देगा।
- रणनीतिक 'गोरखा प्रतिधारण प्रोटोकॉल' का निर्माण: भारत को पुरानी सैन्य सहजीविता को अक्षुण्ण रखने के लिये ‘अग्निपथ योजना’ के अंतर्गत एक विशेष रणनीतिक व्यवस्था के रूप में ‘गोरखा प्रतिधारण प्रोटोकॉल’ को शीघ्र लागू करना चाहिये।
- नेपाली अग्निवीरों को भारतीय केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में सेवानिवृत्ति के बाद स्थायी नियुक्ति की गारंटी देना व्यावहारिक रूप से अत्यंत आवश्यक है।
- यह विशिष्ट सैन्य कूटनीति एक विनाशकारी सामाजिक-आर्थिक शून्य को रोकती है और सैन्य कौशल को प्रतिकूल देशों की ओर मुड़ने से अवरुद्ध करती है।
- रोज़गार के इस महत्त्वपूर्ण माध्यम को पुनः स्थापित करना रक्षा सहयोग से कहीं बढ़कर है तथा यह द्विपक्षीय सामाजिक सुरक्षा का एक मूलभूत स्तंभ है।
- नेपाली अग्निवीरों को भारतीय केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में सेवानिवृत्ति के बाद स्थायी नियुक्ति की गारंटी देना व्यावहारिक रूप से अत्यंत आवश्यक है।
- ट्रांस-हिमालयन डिजिटल अंतर-संचालनीयता का विस्तार: भारत को भारतीय और नेपाली ई-गवर्नेंस रजिस्ट्रियों के बीच गहन अंतर-संचालनीयता को बढ़ावा देकर अपनी डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) कूटनीति का सक्रिय रूप से विस्तार करना चाहिये।
- निर्बाध डिजिटल कॉरिडोर स्थापित करने से प्रवासी कामगारों और सीमा पार व्यवसायों के लिये प्रशासनिक संबंधी बाधाएँ काफी हद तक कम हो जाती हैं। स्थानीय तकनीकी प्रणालियों का सह-विकास डेटा सुरक्षा सुनिश्चित करता है, साथ ही अदृश्य, अत्यंत कुशल डिजिटल संबंधों के माध्यम से दोनों अर्थव्यवस्थाओं को आपस में जोड़ता है।
- यह तकनीकी एकीकरण एक अपरिहार्य, उपयोगकर्त्ता-केंद्रित पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करके भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा को निष्प्रभावी कर देता है, जिससे आम नागरिकों को प्रतिदिन लाभ मिलता है।
- क्षेत्रीय सीमा प्रबंधन का गैर-राजनीतिकरण: सीमा-क्षेत्र संबंधी तनाव को निर्वाचन-राजनीति से व्यवस्थित रूप से पृथक करने के लिये एक संरक्षित, स्थायी और संयुक्त तकनीकी सीमांकन आयोग की स्थापना की जानी चाहिये।
- इस निकाय को उन्नत भू-स्थानिक मानचित्रण और बाध्यकारी मध्यस्थता प्रोटोकॉल से सशक्त बनाने से भावनात्मक मानचित्र संबंधी विवाद नैदानिक अभ्यासों में परिवर्तित हो जाते हैं।
- राजनीतिक मंचों से विमर्श को हटाकर ‘विशेषज्ञों के बंद-द्वार संवादों’ तक सीमित कर देने से मत-संग्रह की राजनीति के लिये भूगोल के दुरुपयोग को रोका जा सकेगा। यह संस्थागत विवाद-निवारण तंत्र एक महत्त्वपूर्ण भू-राजनीतिक आघात-शामक के रूप में कार्य करता है, जिससे पृथक विवाद व्यापक आर्थिक कार्यसूची को गतिहीन न बना सकें।
- हरित ऊर्जा सह-स्वामित्व को बढ़ावा देना: ऊर्जा प्रतिमान को एक सरलीकृत लेन-देन मॉडल से विकसित होकर एक व्यापक हरित ऊर्जा सह-स्वामित्व ढाँचे में परिवर्तित होना चाहिये।
- भारत को अपने दिग्गज कॉरपोरेट समूहों को नेपाली संस्थाओं के साथ न्यायसंगत संयुक्त उद्यम बनाने के लिये प्रोत्साहित करना चाहिये, उन्हें इक्विटी हिस्सेदारी एवं प्रौद्योगिकी अंतरण की पेशकश करनी चाहिये।
- एक गहन रूप से एकीकृत उप-क्षेत्रीय ऊर्जा ग्रिड का विकास काठमांडू के आर्थिक हितों को नई दिल्ली की ऊर्जा सुरक्षा के साथ स्थायी रूप से संरेखित करता है।
- यह परिवर्तन एक अटूट आर्थिक परस्पर निर्भरता का निर्माण करता है जो स्वाभाविक रूप से बाह्य क्षेत्रीय रणनीतिक अतिक्रमण को रोकता है।
- उप-राष्ट्रीय पराकूटनीति का संस्थागतकरण: नई दिल्ली को पड़ोसी राज्यों को सशक्त बनाकर अपने पड़ोसी संबंधों का विकेंद्रीकरण करना चाहिये ताकि वे पड़ोसी नेपाली प्रांतों के साथ औपचारिक पराकूटनीति में संलग्न हो सकें।
- सीमा पार वैधानिक प्रांतीय परिषदों की स्थापना से बाढ़ प्रबंधन और सूक्ष्म व्यापार अवरोधों जैसे स्थानीय स्तर पर उत्पन्न होने वाले विवादों के समाधान का विकेंद्रीकरण होता है।
- यह स्थानीयकृत कूटनीतिक रूपरेखा प्रशासनिक अवरोधों को निष्प्रभावी करते हुए सीमांत क्षेत्रों में त्वरित, प्रभावी और सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील शासन-व्यवस्था को संभव बनाती है।
- प्रत्यक्ष संवादों को सुगम बनाना ऐसे स्वाभाविक, निम्न-स्तरीय आर्थिक गलियारों को प्रोत्साहित करता है, जो तराई क्षेत्र की वास्तविक सामाजिक-सांस्कृतिक स्थितियों को प्रतिबिंबित करते हैं।
- जलवायु-सहिष्णु पारिस्थितिक गलियारों का निर्माण: भविष्य के द्विपक्षीय अवसंरचनात्मक निवेशों को हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की संवेदनशीलताओं को स्वीकार करते हुए सक्रिय रूप से जलवायु-सहिष्णु आर्थिक गलियारों के रूप में पुनर्रचित किया जाना चाहिये। सतत और आपदा-रोधी अंतर्देशीय जलमार्गों तथा रोपवे पर बल देने से दीर्घकालिक अवसंरचना-स्थायित्व सुनिश्चित होगा।
- भारत और नेपाल को हिमनदीय झील विस्फोटजन्य बाढ़ों (GLOF) की संयुक्त निगरानी के लिये समर्पित एक हिमालयी जलवायु शमन कोष की सह-स्थापना करनी चाहिये। पर्यावरणीय स्थिरता को एक मूल उद्देश्य के रूप में शामिल करने से घरेलू पारिस्थितिक दुष्परिणामों को कम किया जा सकता है तथा हिमालयी संसाधनों के साझा प्रबंधन को बढ़ावा दिया जा सकता है।
निष्कर्ष:
भारत-नेपाल साझेदारी भावनात्मक 'विशेष संबंध' से हटकर एक व्यावहारिक, तकनीकी गठबंधन में संरचनात्मक परिवर्तन से गुजर रही है। गोरखा भर्ती गतिरोध का समाधान करके और ‘विशिष्ट व्यक्तियों के समूह’ की रिपोर्ट को औपचारिक रूप देकर नई दिल्ली प्रतिकूल प्रभावों को निष्प्रभावी कर सकती है तथा अपनी हिमालयी सीमा को अधिक सुरक्षित बना सकती है। अंततः हरित ऊर्जा में सह-स्वामित्व और डिजिटल एकीकरण की ओर संक्रमण यह सुनिश्चित करेगा कि द्विपक्षीय संबंध ऐतिहासिक शिकायतों के बजाय साझा समृद्धि पर आधारित हों।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न नेपाल में हो रहे घरेलू राजनीतिक घटनाक्रम भारत-नेपाल द्विपक्षीय संबंधों को किस प्रकार प्रभावित करते हैं? हाल के उदाहरणों के साथ विश्लेषण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1. 10,000 मेगावाट विद्युत समझौते का क्या महत्त्व है?
यह नेपाल को भारत के लिये अधिशेष जलविद्युत के निर्यात हेतु दीर्घकालीन संस्थागत ढाँचा उपलब्ध कराता है, जिससे दोनों देशों के बीच आर्थिक पारस्परिक निर्भरता और अधिक सुदृढ़ होती है।
प्रश्न 2. ‘अग्निपथ योजना’ तनाव का कारण क्यों है?
काठमांडू का तर्क है कि 4-वर्षीय अनुबंध वर्ष 1947 के त्रिपक्षीय समझौते की भावना के विपरीत है तथा इसमें गोरखा सेवा से पारंपरिक रूप से जुड़े दीर्घकालिक पेंशन लाभों का अभाव है।
प्रश्न 3. ‘विश्व बंधु’ रूपरेखा क्या है?
यह नेपाल की वर्तमान विदेश-नीति की अवधारणा है, जो गुटनिरपेक्षता एवं सभी वैश्विक शक्तियों के साथ विकासोन्मुख सहभागिता पर बल देती है।
प्रश्न 4. एकीकृत त्वरित भुगतान प्रणाली और नेपाल भुगतान व्यवस्था के बीच संयोजन से द्विपक्षीय संबंधों को किस प्रकार लाभ होता है?
यह पर्यटकों और प्रवासी श्रमिकों के लिये त्वरित तथा कम-लागत सीमापार भुगतान को संभव बनाता है, जिससे दोनों अर्थव्यवस्थाओं का डिजिटल एकीकरण सुदृढ़ होता है।
प्रश्न 5. पाठ में उल्लिखित ‘मानचित्र युद्ध’ से क्या अभिप्राय है?
इससे आशय कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को लेकर उत्पन्न विवाद से है, जो वर्ष 2025 में नेपाल द्वारा इन क्षेत्रों को दर्शाने वाले मुद्रा-नोट जारी करने के निर्णय से और अधिक तीव्र हो गया।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न 1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये- (2020)
- पिछले दशक में भारत-श्रीलंका व्यापार के मूल्य में सतत वृद्धि हुई है।
- भारत और बांग्लादेश के बीच होने वाले व्यापार में ‘कपड़े और कपड़े से बनी चीज़ों’ का व्यापार प्रमुख है।
- पिछले पाँच वर्षों में, दक्षिण एशिया में भारत के व्यापार का सबसे बड़ा भागीदार नेपाल रहा है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2
(c) केवल 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (b)
मेन्स
प्रश्न 1. दक्षिण एशिया के अधिकतर देशों तथा म्याँमार से लगी विशेषकर लंबी छिद्रिल सीमाओं की दृष्टि से भारत की आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियाँ सीमा प्रबंधन से कैसे जुड़ी हैं? (2013)
प्रश्न 2. गुजराल सिद्धांत से क्या अभिप्राय है? क्या आज इसकी कोई प्रासंगिकता है ? विवेचना कीजिये। (2013)
फिसकल हेल्थ इंडेक्स 2026
प्रिलिम्स के लिये: फिसकल हेल्थ इंडेक्स, नीति आयोग, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP), राजकोषीय घाटा
मेन्स के लिये: राजकोषीय संघवाद और भारत की सार्वजनिक वित्त संरचना में राज्यों की भूमिका, भारतीय राज्यों में ऋण स्थिरता एवं राजकोषीय अनुशासन, राज्य वित्त में सुधार हेतु फिसकल हेल्थ इंडेक्स का महत्त्व
चर्चा में क्यों?
नीति आयोग ने भारतीय राज्यों के राजकोषीय प्रदर्शन का मूल्यांकन करने हेतु फिसकल हेल्थ इंडेक्स (Fiscal Health Index—FHI) 2026 का दूसरा संस्करण जारी किया है। यह इंडेक्स राजकोषीय स्थिरता का मूल्यांकन करने, राज्य वित्त की तुलना करने और सुधारों को दिशा देने के लिये एक डेटा-आधारित रूपरेखा प्रदान करता है।
- यह रिपोर्ट इसलिये महत्त्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि वैश्विक सार्वजनिक ऋण 2024 में बढ़कर लगभग 102 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया है, जिससे विश्वभर में सार्वजनिक वित्त पर दबाव बढ़ा है।
सारांश
- नीति आयोग द्वारा जारी फिसकल हेल्थ इंडेक्स (FHI) 2026, व्यय की गुणवत्ता, राजस्व एकत्रीकरण, राजकोषीय विवेक, ऋण सूचकांक और ऋण स्थिरता - इन पाँच स्तंभों का उपयोग करके भारतीय राज्यों के राजकोषीय प्रदर्शन का मूल्यांकन करता है एवं इसमें उत्तर-पूर्वी और हिमालयी राज्यों को शामिल करने के लिये कवरेज का विस्तार किया गया है, जो राजकोषीय अनुशासन तथा ऋण स्तरों में व्यापक भिन्नताओं को उजागर करता है।
- रिपोर्ट में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि भारत की व्यापक आर्थिक स्थिरता के लिये मज़बूत राज्य वित्त व्यवस्था महत्त्वपूर्ण है और कर एकत्रीकरण में सुधार, प्रतिबद्ध व्यय को नियंत्रित करने, पूंजीगत व्यय को बढ़ाने, राजकोषीय पारदर्शिता को मज़बूत करने एवं मध्यम अवधि की राजकोषीय योजना अपनाने जैसे उपायों की सिफारिश की गई है।
फिसकल हेल्थ इंडेक्स क्या है?
- परिचय: FHI, भारतीय राज्यों के राजकोषीय प्रदर्शन का आकलन और तुलना करने के लिये नीति आयोग द्वारा विकसित एक व्यापक रूपरेखा है।
- यह राज्यों का मूल्यांकन पाँच प्रमुख स्तंभों के आधार पर करता है: व्यय की गुणवत्ता, राजस्व एकत्रीकरण, राजकोषीय विवेक, ऋण सूचकांक और ऋण स्थिरता।
- यह इंडेक्स नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक द्वारा सत्यापित आँकड़ों का उपयोग करता है, जो सटीकता और पारदर्शिता सुनिश्चित करता है।
- इसका उद्देश्य सुधार हेतु मार्गदर्शन करना, साक्ष्य-आधारित नीति-निर्माण को प्रोत्साहित करना और राज्यों के बीच समान मानकीकरण को सक्षम बनाना है।
- FHI 2026: यह वित्त वर्ष 2014-15 से वित्त वर्ष 2023-24 तक एक दशक में राजकोषीय प्रवृत्तियों का विश्लेषण करता है, जिससे राज्यों की प्रगति या गिरावट के बारे में एक दीर्घकालिक परिप्रेक्ष्य मिलता है।
- दूसरे संस्करण में सामान्य श्रेणी के 18 राज्यों के अलावा उत्तर-पूर्वी और हिमालयी क्षेत्र के 10 राज्यों को भी शामिल किया गया है, जिससे यह इंडेक्स भारत के विविध वित्तीय परिदृश्य को और अधिक व्यापक रूप से दर्शाता है।
- पूर्वोत्तर राज्यों के लिये उप-संकेतकों को परिष्कृत किया गया है ताकि उनकी विशिष्ट चुनौतियों जैसे- भौगोलिक दूरी, विरल जनसंख्या घनत्व, सीमित स्व-राजस्व क्षमता, उच्च प्रतिबद्ध व्यय और केंद्र सरकार से मिलने वाले हस्तांतरण पर अधिक निर्भरता को प्रतिबिंबित किया जा सके।
- निष्पक्ष और प्रासंगिक तुलना सुनिश्चित करने के लिये पूर्वोत्तर एवं हिमालयी राज्यों को सामान्य श्रेणी के राज्यों से अलग स्थान दिया गया है।
- इस संस्करण में प्रमुख राज्यों के लिये वही पाँच मुख्य स्तंभ रखे गए हैं, साथ ही कथात्मक अंतर्दृष्टि और प्रवृत्ति विश्लेषण की गहराई में सुधार किया गया है।
- दूसरे संस्करण में सामान्य श्रेणी के 18 राज्यों के अलावा उत्तर-पूर्वी और हिमालयी क्षेत्र के 10 राज्यों को भी शामिल किया गया है, जिससे यह इंडेक्स भारत के विविध वित्तीय परिदृश्य को और अधिक व्यापक रूप से दर्शाता है।
FHI 2026 की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?
18 प्रमुख राज्य
- अचीवर्स: ओडिशा, गोवा, झारखंड।
- नियंत्रित घाटे, स्थिर राजस्व और साल-दर-साल बेहतर होते स्कोर के कारण ओडिशा रैंकिंग में शीर्ष पर बना हुआ है।
- सफल राज्यों में कुछ सामान्य विशेषताएँ हैं: स्वयं के कर का हिस्सा 60% से अधिक, सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) का लगभग 4-5% पूंजीगत व्यय, सकल राज्य घरेलू उत्पाद का 3% से कम राजकोषीय घाटा, सकल राज्य घरेलू उत्पाद का 25% से कम मध्यम ऋण स्तर और नियंत्रित ब्याज भार।
- गोवा और ओडिशा में राज्य के स्वामित्व वाले राजस्व का अनुपात उच्च दर्ज किया गया है, जो मज़बूत कर आधार एवं अधिक राजकोषीय स्वायत्तता को दर्शाता है।
- फ्रंट रनर्स: गुजरात, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक।
- गुजरात और महाराष्ट्र में ऋण का स्तर कम है तथा वे ब्याज के बोझ को नियंत्रित रखते हैं, जिससे राजकोषीय स्थिरता को बढ़ावा मिलता है।
- परफॉर्मर्स: मध्य प्रदेश, हरियाणा, बिहार, तमिलनाडु, राजस्थान।
- बिहार ने एस्पिरेशनल राज्य की श्रेणी से परफॉर्मर्स राज्य की श्रेणी में सुधार किया है, जो बेहतर घाटा प्रबंधन का संकेत है।
- कर्नाटक और तेलंगाना अग्रणी राज्यों की श्रेणी से बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों की श्रेणी में आ गए हैं, जो मामूली राजकोषीय चूक को दर्शाता है।
- तमिलनाडु 'परफॉर्मर' से 'एस्पिरेशनल' श्रेणी में गया है, जो उभरते वित्तीय दबावों का संकेत देता है।
- एस्पिरेशनल (सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले राज्य): पश्चिम बंगाल, केरल, आंध्र प्रदेश, पंजाब।
- इन राज्यों को लगातार राजस्व और राजकोषीय घाटे का सामना करना पड़ता है, जो अक्सर FRBM (राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन) मानदंडों का उल्लंघन करते हैं।
- ऋण का स्तर सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) के लगभग 35-45% के बीच है, जो राष्ट्रीय सीमा से काफी ऊपर है।
- राजस्व प्राप्तियों का लगभग 50-60% हिस्सा प्रतिबद्ध व्यय में खर्च हो जाता है, जिससे विकासात्मक व्यय के लिये बहुत कम संसाधन शेष रह जाते हैं।
- ब्याज भुगतान राजस्व प्राप्तियों के 15-20% से अधिक है, जिससे राजकोषीय अनुकूलन और भी कम हो जाता है।
- सभी प्रमुख राज्यों में पंजाब, केरल और पश्चिम बंगाल पर सबसे अधिक ऋण एवं ब्याज प्रतिबद्धताएँ हैं।
उत्तर-पूर्वी तथा हिमालयी राज्य
- अचीवर्स: अरुणाचल प्रदेश तथा उत्तराखंड।
- अरुणाचल प्रदेश उच्च व्यय गुणवत्ता, विवेकपूर्ण ऋण प्रबंधन तथा नियंत्रित राजकोषीय घाटे के कारण प्रथम स्थान पर है। कुछ अवसरों पर इसने राजकोषीय अधिशेष भी दर्ज किया है।
- उत्तराखंड का प्रदर्शन अपेक्षाकृत बेहतर स्व-राजस्व एकत्रीकरण के कारण मज़बूत रहा है, जिससे इसे अधिक राजकोषीय स्वायत्तता प्राप्त होती है।
- परफॉर्मर्स: असम, मेघालय, मिज़ोरम, सिक्किम तथा त्रिपुरा।
- त्रिपुरा ने ऋण स्थिरता के क्षेत्र में अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया है, जबकि मिज़ोरम को अपेक्षाकृत कमज़ोर ऋण स्थिरता संकेतकों के कारण चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
- सिक्किम में राजकोषीय विवेक की स्थिति अपेक्षाकृत कमज़ोर रही है, जबकि नागालैंड को राजस्व एकत्रीकरण तथा व्यय गुणवत्ता के संदर्भ में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
- एस्पिरेशनल: हिमाचल प्रदेश, मणिपुर तथा नागालैंड।
- हिमाचल प्रदेश और मणिपुर कमज़ोर राजस्व आधार, उच्च प्रतिबद्ध व्यय जैसे- वेतन तथा पेंशन तथा निरंतर राजकोषीय घाटों के कारण सूची के निचले स्थानों पर बने हुए हैं।
- इन राज्यों का ऋण स्तर लगभग GSDP के 40–50% के आस-पास है, जिससे ऋण सेवा दायित्व का दबाव बढ़ता है तथा राजकोषीय अनुकूलन सीमित होता है।
राज्यों की राजकोषीय स्थिति का क्या महत्त्व है?
- भारत की समष्टिगत आर्थिक स्थिरता: राज्य सरकारें भारत के कुल सरकारी ऋण का लगभग एक-तिहाई वहन करती हैं, जिससे उनकी राजकोषीय स्थिति राष्ट्रीय राजकोषीय स्थिरता के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण बन जाती है।
- जब राज्यों को वित्तीय संकट का सामना करना पड़ता है, तो इससे मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ सकता है, निजी निवेश में कमी आ सकती है और केंद्र सरकार को राहत पैकेज के साथ हस्तक्षेप करने के लिये मजबूर होना पड़ सकता है, जिससे व्यापक अर्थव्यवस्था अस्थिर हो जाती है।
- भारत का कुल सार्वजनिक ऋण GDP का लगभग 82% है, इसलिये ऋण भार को नियंत्रण में रखने के लिये राज्यों द्वारा उत्तरदायी राजकोषीय प्रबंधन आवश्यक है।
- सार्वजनिक व्यय और विकास में बड़ी भूमिका: राज्य सरकारें स्वास्थ्य, शिक्षा, बुनियादी ढाँचे और कल्याणकारी कार्यक्रमों पर व्यय का एक बड़ा हिस्सा वहन करती हैं, जो नागरिकों के कल्याण एवं विकास परिणामों को सीधे प्रभावित करता है।
- मज़बूत राजकोषीय स्थिति राज्यों को पूंजीगत व्यय में अधिक निवेश करने की अनुमति देती है, जिससे क्षेत्रीय असमानताओं को कम करने और दीर्घकालिक आर्थिक विकास को बढ़ावा देने में मदद मिलती है।
- बढ़ता ऋण और राजकोषीय दबाव: राज्यों का ऋण-से-जीएसडीपी अनुपात वर्ष 2013-14 में लगभग 16.7% से बढ़कर वर्ष 2022-23 में लगभग 23% हो गया, जो बढ़ते उधार दबाव को दर्शाता है।
- राज्यों का संयुक्त राजकोषीय घाटा वित्त वर्ष 2025 में GDP के लगभग 3.2% तक बढ़ गया, जो राज्य सरकारों पर बढ़ते राजकोषीय दबाव को दर्शाता है, जिसे यदि सावधानीपूर्वक प्रबंधित नहीं किया गया तो राजकोषीय स्थिरता को खतरा हो सकता है।
राज्य के वित्त को मज़बूत करने के लिये FHI 2026 द्वारा कौन-से नीतिगत उपाय अनुशंसित किये गए हैं?
- राजस्व में वृद्धि: GST कर आधार में विस्तार किया जाए, कर अनुपालन में सुधार किया जाए और राज्य के अपने कर राजस्व जैसे-संपत्ति कर, उत्पाद शुल्क एवं स्टाम्प शुल्क को मज़बूत करें। कर चोरी को कम करने के लिये डिजिटल कर प्रशासन और डेटा विश्लेषण में सुधार किया जाए।
- व्यय पर नियंत्रण: राजकोषीय अनुकूलन को बहाल करने के लिये "प्रतिबद्ध व्यय" (जैसे- अत्यधिक पेंशन और वेतन बिल) पर अंकुश लगाया जाए और सब्सिडी को युक्तिसंगत बनाया जाए।
- 16वें वित्त आयोग (2026-31) ने भी सब्सिडियों के युक्तिकरण की अनुशंसा की है, विशेषकर बिना शर्त नकद अंतरण के संदर्भ में, जो कुल सब्सिडी व्यय का लगभग 20.2% है।
- पूंजीगत व्यय में सुधार: दीर्घकालिक आर्थिक संवृद्धि को प्रोत्साहित करने के लिये पूंजीगत व्यय की संरचना तथा गुणवत्ता में सुधार पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिये।
- भविष्य की योजना: राज्यों को राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन अधिनियम (FRBM) के लक्ष्यों का पालन करते हुए अपने राजकोषीय घाटे को GSDP के लगभग 3% के आस-पास बनाए रखना चाहिये।
- 16वें वित्त आयोग (2026–31) ने केंद्र सरकार के राजकोषीय घाटे को वर्ष 2030–31 तक GDP के 3.5% तक सीमित करने की भी अनुशंसा की है, ताकि राजकोषीय अनुशासन तथा सतत ऋण स्तर बनाए रखे जा सकें।
- पारदर्शिता में वृद्धि: बजट से बाहर के उधारों पर कड़े नियंत्रण लागू किये जाने चाहिये, नकदी प्रबंधन में सुधार किया जाए तथा बेहतर सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन के लिये CAG द्वारा सत्यापित आँकड़ों का उपयोग किया जाना चाहिये।
निष्कर्ष
फिस्कल हेल्थ इंडेक्स 2026 यह रेखांकित करता है कि मज़बूत राज्य वित्त भारत की समष्टिगत आर्थिक स्थिरता के लिये अत्यंत आवश्यक है। इस बेंचमार्किंग टूल के माध्यम से राज्य अपनी राजकोषीय कमज़ोरियों की पहचान कर सकते हैं, लक्षित सुधारों को लागू कर सकते हैं, क्षेत्रीय असमानताओं को कम कर सकते हैं तथा राजकोषीय शासन को सुदृढ़ कर सकते हैं, जिससे विकसित भारत @2047 के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायता मिल सके।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न प्रश्न. “राज्यों का वित्तीय स्वास्थ्य भारत की सकल आर्थिक स्थिरता के लिये केंद्रीय है।” फिस्कल हेल्थ इंडेक्स 2026 के संदर्भ में विश्लेषण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. फिस्कल हेल्थ इंडेक्स (FHI) क्या है?
FHI एक ढाँचा है जिसे नीति आयोग (NITI Aayog) द्वारा विकसित किया गया है। यह भारतीय राज्यों के वित्तीय प्रदर्शन का आकलन और तुलना करने के लिये उपयोग होता है, जिसमें राजस्व सृजन, व्यय की गुणवत्ता, वित्तीय अनुशासन एवं ऋण स्थिरता जैसे संकेतक शामिल हैं।
2. राज्यों का मूल्यांकन करने हेतु कौन‑से स्तंभ (pillars) प्रयोग किये जाते हैं?
यह सूचकांक राज्यों का मूल्यांकन पाँच स्तंभों (five pillars) के आधार पर करता है: व्यय की गुणवत्ता (Quality of Expenditure), राजस्व सृजन (Revenue Mobilisation), वित्तीय अनुशासन (Fiscal Prudence), ऋण सूचकांक (Debt Index) और ऋण स्थिरता (Debt Sustainability)।
3. फिस्कल हेल्थ इंडेक्स 2026 में शीर्ष प्रदर्शन करने वाले राज्य कौन‑से हैं?
प्रमुख राज्यों में, ओडिशा, गोवा और झारखंड को उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले राज्यों के रूप में रैंक दिया गया है, क्योंकि इन राज्यों में प्रबल राजस्व सृजन, कम वित्तीय घाटा एवं मध्यम ऋण स्तर हैं।
4. FHI 2026 में उत्तर‑पूर्वी और हिमालयी राज्यों को अलग क्यों रैंक किया गया है?
इन राज्यों को संरचनात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जैसे कठिन भौगोलिक परिस्थितियाँ, विरल जनसंख्या, सीमित राजस्व क्षमता और उच्च सेवा वितरण लागत, इसलिये इनके मूल्यांकन के लिये संदर्भ-विशिष्ट दृष्टिकोण आवश्यक है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रिलिम्स
प्रश्न. शासन के संदर्भ में निम्नलिखित पर विचार कीजिये: (2010)
- प्रत्यक्ष विदेशी निवेश अंतर्वाह को प्रोत्साहित करना
- उच्च शिक्षण संस्थानों का निजीकरण
- नौकरशाही का आकार कम करना
- सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के शेयरों की बिक्री/ऑफलोडिंग
भारत में राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने के उपायों के रूप में उपर्युक्त में से किनका उपयोग किया जा सकता है?
(a) केवल 1, 2 और 3
(b) केवल 2, 3 और 4
(c) केवल 1, 2 और 4
(d) केवल 3 और 4
उत्तर: (d)
प्रश्न. निम्नलिखित में से कौन-सा अपने प्रभाव में सबसे अधिक मुद्रास्फीतिकारक हो सकता है? (2021)
(a) सार्वजनिक ऋण की चुकौती
(b) बजट घाटे के वित्तीयन के लिये जनता से उधार लेना
(c) बजट घाटे के वित्तीयन के लिये बैंकों से उधार लेना
(d) बजट घाटे के वित्तीयन के लिये नई मुद्रा का सृजन करना
उत्तर: (d)
प्रश्न. निम्नलिखित में से किनको/किसको भारत सरकार के पूंजीगत बजट में शामिल किया जाता है? (2016)
- सड़कों, भवनों, मशीनरी आदि जैसी परिसंपत्तियों के अधिग्रहण पर व्यय
- विदेशी सरकारों से प्राप्त ऋण
- राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों को अनुदत्त ऋण तथा अग्रिम
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (d)
मेन्स:
प्रश्न. 2017-18 के संघीय बजट के अभीष्ट उद्देश्यों में से एक 'भारत को रूपांतरित करना, ऊर्जावान बनाना और भारत को स्वच्छ करना' है। इस उद्देश्य प्राप्त करने के लिये बजट 2017-18 सरकार द्वारा प्रस्तावित उपायों का विश्लेषण कीजिये। (मुख्य परीक्षा, 2017)
प्रश्न. पूंजी बजट और राजस्व बजट के मध्य अंतर स्पष्ट कीजिये। इन दोनों बजटों के संघटकों को समझाइये। (मुख्य परीक्षा, 2021)
प्रश्न. क्या आप इस मत से सहमत हैं कि स्थिर सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) की स्थायी संवृद्धि तथा निम्न मुद्रास्फीति ने भारतीय अर्थव्यवस्था अच्छी स्थिति में है? अपने तर्कों के समर्थन में कारण दीजिये। (मुख्य परीक्षा, 2019)



