विश्व जल दिवस, 2026 | 24 Mar 2026
प्रिलिम्स के लिये: विश्व जल दिवस, चक्रीय जल अर्थव्यवस्था, लघु सिंचाई गणना, जल निकायों की गणना, FICCI, ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF), भुवन, रियो पृथ्वी शिखर सम्मेलन,1992, सतत विकास लक्ष्य, नीति आयोग, जल ऋण, सिंधु नदी तंत्र, सुपोषण, आर्सेनिक, फ्लोराइड, रामसर स्थल, कदन्न
मेन्स के लिये: विश्व जल दिवस संगोष्ठी, 2026 की प्रमुख बातें, वैश्विक स्तर पर और भारत में जल से संबंधित प्रमुख चिंताएँ और आगे की राह।
चर्चा में क्यों?
जलशक्ति मंत्रालय ने विश्व जल दिवस, 2026 के अवसर पर "इंडस्ट्री फॉर वाटर" विषय के अंतर्गत विश्व जल दिवस संगोष्ठी, 2026 का आयोजन किया, जो एक चक्रीय जल अर्थव्यवस्था की ओर सामरिक बदलाव का प्रतीक है।
सारांश
- विश्व जल दिवस संगोष्ठी, 2026 औद्योगिक प्रतिबद्धताओं को सामुदायिक भागीदारी के साथ एकीकृत करके भारत के डेटा-संचालित चक्रीय जल अर्थव्यवस्था में परिवर्तन का प्रतीक है।
- यह घटती प्रति-व्यक्ति जल उपलब्धता का सामना करने के लिये ग्लेशियर निगरानी और अपशिष्ट जल पुनर्चक्रण को प्राथमिकता देता है।
- यह समग्र दृष्टिकोण आर्थिक विकास को पर्यावरणीय स्थिरता और लैंगिक-समावेशी जल सुरक्षा के साथ संरेखित करता है।
विश्व जल दिवस संगोष्ठी, 2026 की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?
- चक्रीय जल अर्थव्यवस्था पर केंद्रित: संगोष्ठी ने चक्रीय जल अर्थव्यवस्था के महत्त्व पर बल दिया, जो "टेक-यूज़-डिस्कार्ड" सिस्टम का स्थान लेने वाला एक रेस्टोरेटिव मॉडल है।
- यह अपशिष्ट जल को एक बहुमूल्य सीमित संसाधन के रूप में मानता है, जो रिड्यूज़, रियूज़ और रिसायकल पर बल देता है। यह सुनिश्चित करता है कि जल खपत की तुलना में अलग हो, जिससे दीर्घकालिक जलवायु लचीलापन को बढ़ावा मिले।
- ऐतिहासिक डेटा संसाधनों का शुभारंभ: संगोष्ठी में 7वीं लघु सिंचाई गणना, दूसरे जल निकायों की गणना और प्रमुख एवं मध्यम सिंचाई परियोजनाओं की गणना, साथ ही राष्ट्रीय जल डेटा नीति, 2026 को जारी किया गया।
- संयुक्त उद्योग घोषणा: प्रमुख उद्योग संघों (FICCI, एसोचैम, CII) ने वर्ष 2027 तक नियमित जल का ऑडिट करने, वर्ष 2030 तक शून्य तरल निर्वहन (ZLD) प्राप्त करने और वर्ष 2030 तक कॉर्पोरेट वाटर फुटप्रिंट को 50% तक कम करने की प्रतिबद्धता जताई।
- क्रायोस्फीयर और ग्लेशियल निगरानी: राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (NRSC)-ISRO के सहयोग से कार्यक्रम में हिमालयी सुरक्षा के लिये भुवन जैसे प्लेटफॉर्मों का उपयोग करते हुए एक ग्लेशियल निगरानी ढाँचे और ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) जोखिम न्यूनीकरण पर बल दिया गया।
- प्रौद्योगिकी एकीकरण: पारंपरिक प्रबंधन से सटीक जल शासन में बदलाव के लिये AI और IoT का लाभ उठाने पर ज़ोर दिया गया।
विश्व जल दिवस
- परिचय: संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिवर्ष 22 मार्च को विश्व जल दिवस (World Water Day) मनाया जाता है। इसका उद्देश्य ताज़े पानी (Freshwater) के संसाधनों के महत्त्व को उजागर करना और उनके सतत प्रबंधन के लिये जागरूकता बढ़ाना है।
- यह UN-Water द्वारा समन्वित किया जाता है, जो जल और स्वच्छता पर संयुक्त राष्ट्र की अंतर-एजेंसी समन्वय प्रणाली है।
- 2026 का थीम: 2026 के लिये थीम है ‘वाटर एंड जेंडर’ और इसके अभियान का नारा है “जहाँ जल बहता है, वहाँ समानता बढ़ती है” (Where water flows, equality grows)।
- यह जल पहुँच, महिलाएँ और लैंगिक समानता के बीच संबंधों को उजागर करता है और यह स्वीकार करता है कि वैश्विक जल संकट महिलाओं तथा लड़कियों को असमान रूप से प्रभावित करता है।
- उत्पत्ति: विश्व जल दिवस का प्रस्ताव सर्वप्रथम वर्ष 1992 के रियो अर्थ समिट (पर्यावरण एवं विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन) में प्रस्तुत किया गया था। इसके पश्चात 22 मार्च, 1993 को वैश्विक स्तर पर प्रथम बार इस दिवस का आयोजन किया गया।
- SDG से संरेखण: यह सतत विकास लक्ष्य 6 (SDG 6) को सीधे समर्थन देता है, जिसका उद्देश्य 2030 तक सभी के लिये स्वच्छ जल और स्वच्छता सुनिश्चित करना है।
भारत में जल संरक्षण की पहल
- विधायी ढाँचा: जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986।
- नीतिगत पहलें: राष्ट्रीय जल नीति (NWP), 2012
- सरकारी योजनाएँ: जल जीवन मिशन 2.0, अटल भूजल योजना, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (प्रति बूँद अधिक फसल)।
- NGO और नागरिक समाज: तरुण भारत संघ – राजेंद्र सिंह (‘भारत के जलपुरुष’) के नेतृत्व में, राजस्थान में अरवरी नदी का पुनरुद्धार करने के लिये प्रसिद्ध। अर्घ्यम् (Arghyam) – विकेंद्रीकृत, समुदाय-संचालित जल परियोजनाओं का समर्थन करता है। पानी पंचायत – महाराष्ट्र में समान जल वितरण के लिये ज़मीनी स्तर की पहल।
वैश्विक स्तर पर और भारत में जल से संबंधित प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
- सुरक्षित जल और स्वच्छता की कमी: संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, लगभग 2.2 अरब लोग सुरक्षित तरीके से प्रबंधित पेयजल तक पहुँच से वंचित हैं।
- इसके परिणामस्वरूप स्वास्थ्य पर अत्यधिक बोझ पड़ता है, जिसमें प्रतिवर्ष निवारण योग्य जल-जनित कारणों से होने वाली अनुमानित 14 लाख मौतें और बार-बार होने वाले प्रकोप जैसे कि हैज़ा जैसी महामारियाँ शामिल हैं।
- जलवायु परिवर्तन और जलवायु अस्थिरता: ग्लोबल वार्मिंग प्राकृतिक जल-चक्र की लय को बाधित कर रहा है, जिसके परिणामस्वरूप चरम मौसमी घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता में अभूतपूर्व वृद्धि देखी जा रही है। यह व्यवधान वैश्विक जल सुरक्षा के लिये एक गंभीर चुनौती है। इसका परिणाम ‘बहुत अधिक या बहुत कम’ स्थिति में निकलता है—लंबे सूखे के बाद विनाशकारी बाढ़ आती है।
- केवल सूखे से होने वाली वार्षिक आर्थिक लागत हाल के वर्षों में 300 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक हो गई है।
- सांप्रभौमिक जल संघर्ष: वैश्विक ताज़े पानी के प्रवाह का 60% से अधिक भाग ऐसे बेसिनों से होता है जो दो या दो से अधिक देशों द्वारा साझा किये जाते हैं। सहयोगात्मक संधियों की कमी अक्सर भू-राजनीतिक तनावों (जैसे– भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी प्रणाली का विवाद) को जन्म देती है।
- उदाहरणतः खाड़ी क्षेत्र (मध्य पूर्व) में बड़ी नदियाँ नहीं हैं और पानी के लिये यह डिसेलिनेशन पर निर्भर है, जिससे यह अत्यधिक संवेदनशील बन जाता है, हाल ही में ईरान संघर्ष की धमकियों ने महत्त्वपूर्ण जल अवसंरचना के जोखिम को उजागर किया है।
- जल गुणवत्ता और प्रदूषण: उद्योगों का अपशिष्ट, बिना उपचारित सीवेज तथा कृषि अपवाह (कीटनाशक/नाइट्रेट) ताज़े पानी के स्रोतों को प्रदूषित कर रहे हैं, जिससे पोषक तत्त्वों की अत्यधिक वृद्धि (यूट्रोफिकेशन) एवं जलजनित रोगों का प्रसार हो रहा है।
- भूजल क्षय और पारिस्थितिक तंत्र में गिरावट: 1990 के दशक की शुरुआत से विश्व की आधे से अधिक बड़ी झीलों का स्तर घटा है, 1970 के बाद से लगभग 35% प्राकृतिक आर्द्रभूमियाँ नष्ट हो चुकी हैं तथा लगभग 70% प्रमुख जलभृतों में दीर्घकालिक गिरावट देखी जा रही है। इससे भूमि धँसाव की समस्या उत्पन्न हुई है, जो 2 अरब से अधिक लोगों को प्रभावित कर रही है एवं खाद्य उत्पादन पर भी खतरा बढ़ गया है, क्योंकि वैश्विक सिंचित कृषि भूमि का आधे से अधिक हिस्सा उच्च जल तनाव का सामना कर रहा है।
- लैंगिक और सामाजिक असमानताएँ: महिलाएँ और लड़कियाँ इस समस्या का सबसे अधिक बोझ उठाती हैं, जो रोज़ाना लगभग 250 मिलियन घंटे पानी लाने में खर्च करती हैं। इससे उनकी शिक्षा, आर्थिक अवसरों और सुरक्षा प्रभावित होते हैं, जबकि जल शासन में उनकी भागीदारी अभी भी सीमित बनी हुई है।
भारत में विशिष्ट चिंताएँ
- भूजल क्षय: भारत विश्व में भूजल का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। कृषि के लिये अत्यधिक दोहन (बिजली सब्सिडी से बढ़ावा मिला) के कारण जल स्तर में गंभीर गिरावट आई है, विशेषकर पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में।
- उदाहरण के लिये भारत में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 1950 में 5,200 घन मीटर (जल-समृद्ध) से घटकर 2024 में 1,400–1,500 घन मीटर (जल-संकटग्रस्त) रह गई है और 2050 तक इसके 1,191 घन मीटर तक पहुँचने का अनुमान है, जो 1,000 घन मीटर की जल-अभाव सीमा के खतरनाक रूप से करीब है।
- अंतर-राज्यीय विवाद: नदियों के जल बँटवारे को लेकर संवैधानिक चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं। कावेरी (कर्नाटक-तमिलनाडु) और कृष्णा जल बँटवारे जैसे लंबे समय से चले आ रहे विवाद अक्सर विकास परियोजनाओं को बाधित करते हैं।
- जल की गुणवत्ता और संदूषण
- भू-जनित प्रदूषण: भूजल में आर्सेनिक और फ्लोराइड के उच्च स्तर इंडो-गंगा मैदान तथा मध्य भारत में लाखों लोगों को प्रभावित कर रहे हैं। उदाहरण के लिये भारत में लगभग 90 मिलियन लोग आर्सेनिक के उच्च स्तर के संपर्क में हैं।
- बठिंडा-बीकानेर एक्सप्रेस, जिसे ‘कैंसर ट्रेन’ कहा जाता है, पंजाब के कॉटन बेल्ट से कई कैंसर मरीज़ों को इलाज के लिये राजस्थान ले जाती है। कैंसर के मामले मुख्य रूप से भूजल में यूरेनियम, आर्सेनिक, फ्लोराइड और प्रतिबंधित कीटनाशकों, जैसे– DDT (डाइक्लोरो-डाइफिनाइल-ट्राइक्लोरोएथेन) के अवशेषों से होने वाले प्रदूषण के कारण बढ़ रहे हैं।
- जीवाणुजनित प्रदूषण: अनुमान है कि भारत के लगभग 70% सतही जलस्रोत बिना उपचारित शहरी सीवेज से प्रदूषित हैं।
- भू-जनित प्रदूषण: भूजल में आर्सेनिक और फ्लोराइड के उच्च स्तर इंडो-गंगा मैदान तथा मध्य भारत में लाखों लोगों को प्रभावित कर रहे हैं। उदाहरण के लिये भारत में लगभग 90 मिलियन लोग आर्सेनिक के उच्च स्तर के संपर्क में हैं।
- ‘हिमालयी संकट’ ‘तीसरे ध्रुव’ के रूप में हिमालयी ग्लेशियरों का पिघलना गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र नदियों की सदानीरा प्रकृति को खतरे में डाल रहा है, जो उत्तर भारत की जीवनरेखा हैं।
- शहरी जल संकट: तीव्र और अनियोजित शहरीकरण के कारण बंगलुरु और चेन्नई जैसे शहरों में ‘ज़ीरो डे’ जैसी स्थिति का खतरा पैदा हो गया है, जहाँ मांग आपूर्ति से कहीं अधिक है और स्थानीय जलस्रोत (आर्द्रभूमि/झीलें) अतिक्रमण का शिकार हो गए हैं।
सतत जल संरक्षण हेतु किन कदमों की आवश्यकता है?
- कृषि परिवर्तन: कृषि (लगभग 80% जल उपयोग) को ड्रिप/स्प्रिंकलर सिंचाई, फसल विविधीकरण (जल-संकट वाले क्षेत्रों में धान-गेहूँ की बजाय श्रीअन्न/अनाज आदि) और सूक्ष्म-सिंचाई के माध्यम से लक्षित करना। ऐसी तकनीकों को अपनाना जो धान की जल-गहन रोपाई प्रक्रिया को छोड़ने में सक्षम हों।
- औद्योगिक और शहरी परिसंचरण: बड़े और अक्सर असफल केंद्रीय संयंत्रों तक प्रदूषित जल को ले जाने के बजाय, छोटे पैमाने के सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) का उपयोग करके स्रोत पर ही प्रदूषित जल स्वच्छ किया जाए।
- शहरी अपार्टमेंट्स में द्वि-नली प्रणाली (dual-piping system) लागू करना, ताकि शुद्ध किये गए रसोई और स्नान के जल का उपयोग फ्लशिंग और बागवानी हेतु किया जा सके।
- पारिस्थितिक एवं धरोहर पुनर्स्थापन: भारत की प्राचीन जल-प्रज्ञा को पुनरुज्जीवित करना, जैसे– आहर-पाइन (बिहार), जोहड़ (राजस्थान) और बावड़ियाँ (बाओली), जो स्थानीय स्थलाकृति के अनुरूप स्वाभाविक रूप से उपयुक्त हैं। अधिक रामसर स्थलों को नामित किया जाए और ‘शहरी स्पंज’ (बाढ़भूमि और झीलें) को अतिक्रमण से सुरक्षित रखना, ताकि प्राकृतिक भूजल पुनर्भरण बना रहे।
- शासन सुधार: ‘जन भागीदारी से जल संचय संभव है’ अभियान को सक्रियता से लागू करना, ताकि जल संरक्षण को एक जन आंदोलन में परिवर्तित किया जा सके। अत्यधिक दोहन को रोकने के लिये मुफ्त बिजली को असीमित भूजल दोहन से क्रमशः अलग किया जाए।
- मूल्य निर्धारण एवं आर्थिक साधन: स्तरीय (टियर आधारित) जल मूल्य निर्धारण मॉडल लागू करना, जो अपव्यय को हतोत्साहित करते हुए संवेदनशील वर्गों के लिये बुनियादी पहुँच सुनिश्चित करती है। कार्बन क्रेडिट की तरह वाटर क्रेडिट की शुरुआत करना, ताकि उद्योगों और डेवलपर्स को अपने संरक्षण लक्ष्यों से अधिक प्रदर्शन करने के लिये प्रोत्साहित किया जा सके और वे अपनी अतिरिक्त ‘बचत’ का अन्य लोगों के साथ व्यापार कर सकें।
निष्कर्ष
विश्व जल दिवस सम्मेलन, 2026 भारत की जल रणनीति को साधारण दोहन से एक परिपत्र (सर्कुलर) जल अर्थव्यवस्था की ओर परिवर्तित करता है। औद्योगिक जवाबदेही (ZLD/जल ऑडिट), उन्नत डेटा शासन तथा पारंपरिक ज्ञान (आहर-पाइन) के एकीकरण के माध्यम से, यह पहल आर्थिक विकास को जल क्षय से अलग करने का प्रयास करती है, जिससे दीर्घकालिक जलवायु लचीलापन और लैंगिक-सम्मिलित जल सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. भारत के समक्ष उपस्थित प्रमुख जल-संबंधी चुनौतियों का परीक्षण कीजिये। जलवायु परिवर्तन के परिप्रेक्ष्य में इन समस्याओं के समाधान हेतु किन नीतिगत उपायों की आवश्यकता है? |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. विश्व जल दिवस, 2026 की थीम क्या है?
विश्व जल दिवस, 2026 की थीम ‘वाटर एंड जेंडर’ (Water and Gender) ” है, जिसका अभियान नारा है- ‘जहाँ जल बहता है, वहाँ समानता बढ़ती है।’
2. SDG 6 के लिये ‘वाटर एंड जेंडर’ विषय का क्या महत्त्व है?
यह स्वीकार करता है कि जल संकट का बोझ महिलाओं पर असमान रूप से अधिक पड़ता है और पहुँच में लैंगिक असमानता को दूर करना सार्वभौमिक स्वच्छता और स्वास्थ्य प्राप्त करने के लिये आवश्यक है।
3. भारत में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता उसके जल तनाव की स्थिति को कैसे दर्शाती है?
भारत में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 1950 के 5,200 घन मीटर से घटकर 2024 में 1,400-1,500 घन मीटर रह गई है, जो वर्ष 2050 तक अनुमानित 1,000 घन मीटर के जल-अभाव की सीमा के जोखिमपूर्ण रूप से निकट है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स:
प्रश्न. ‘वाटरक्रेडिट’ के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2021)
- यह जल एवं स्वच्छता क्षेत्र में कार्य के लिये सूक्ष्म वित्त साधनों (माइक्रोफाइनेंस टूल्स) को लागू करता है।
- यह एक वैश्विक पहल है जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन और विश्व बैंक के तत्त्वावधान में प्रारंभ किया गया है।
- इसका उद्देश्य निर्धन व्यक्तियों को सहायिकी के बिना अपनी जल-संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये समर्थ बनाना है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (c)
प्रश्न. निम्नलिखित में से कौन-सा प्राचीन नगर अपने उन्नत जल संचयन और प्रबंधन प्रणाली के लिये सुप्रसिद्ध है, जहाँ बांधों की शृंखला का निर्माण किया गया था और संबद्ध जलाशयों में नहर के माध्यम से जल को प्रवाहित किया जाता था? (2021)
(a) धौलावीरा
(b) कालीबंगा
(c) राखीगढ़ी
(d) रोपड़
उत्तर: (a)
मेन्स
प्रश्न. भारत में घटते भूजल के लिये उत्तरदायी कारकों का परीक्षण कीजिये। भूजल में ऐसी क्षीणता को कम करने के लिये सरकार ने क्या कदम उठाए हैं? (2025)
प्रश्न. भारत में नदी के जल का औद्योगिक प्रदूषण एक महत्त्वपूर्ण पर्यावरणीय मुद्दा है। इस समस्या से निपटने के लिये विभिन्न शमन उपायों और इस संबंध में सरकारी पहल की भी चर्चा कीजिये। (2024)
प्रश्न. जल संरक्षण एवं जल सुरक्षा हेतु भारत सरकार द्वारा प्रवर्तित जलशक्ति अभियान की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं? (2020)
प्रश्न. रिक्तीकरण परिदृश्य में विवेकी जल उपयोग के लिये जल भंडारण और सिंचाई प्रणाली में सुधार के उपायों को सुझाइये। (2020)