एक अनुकूलित भारतीय हिमालयी क्षेत्र की ओर | 27 Jan 2026
यह लेख 23/01/2026 को द हिंदू में प्रकाशित “A dangerous march towards a Himalayan ecocide” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। इस लेख में रेखांकित किया गया है कि किस प्रकार असुरक्षित भूमि उपयोग, अवसंरचना का अनियंत्रित विस्तार और पारिस्थितिकी उपेक्षा हिमालय क्षेत्र में जलवायु संकट को बार-बार घटित होने वाली आपदाओं में रूपांतरित कर रहे हैं। लेख भारत के सर्वाधिक संवेदनशील और महत्त्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्रों में आपदा-प्रवण परियोजनाओं के स्थान पर आपदा-प्रतिरोधक क्षमता तथा विज्ञान-आधारित नियोजन को प्राथमिकता दिये जाने की आवश्यकता पर ज़ोर देता है।
प्रिलिम्स के लिये: भारतीय हिमालयी क्षेत्र, BRO, EIA, प्रकृति-आधारित समाधान, ब्लैक कार्बन, हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्ष्ण हेतु राष्ट्रीय मिशन
मेन्स के लिये: हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र का महत्त्व, सरकारी पहल, प्रमुख मुद्दे और उपाय।
हिमालय, जो विश्व की सर्वाधिक जलवायु-संवेदनशील पर्वतीय शृंखलाओं में से एक है, वैश्विक औसत की तुलना में लगभग 50% अधिक तीव्र गति से गर्म हो रहा है, जिससे दुर्लभ आपदाएँ अब बार-बार घटित होने वाली घटनाओं में परिवर्तित हो रही हैं। केवल वर्ष 2025 में ही भारत में जलवायु-संबंधी चरम घटनाओं से 4,000 से अधिक लोगों की मृत्यु हुई, जिसमें हिमालयी राज्यों का अंश सर्वाधिक रहा। जो संकट आज प्राकृतिक आपदा के रूप में दिखाई देता है, वह तीव्रता से मानव-जनित जोखिम में रूपांतरित हो रहा है, जिसका मूल कारण संवेदनशील भू-परिस्थितियों में असुरक्षित भूमि उपयोग और अत्यधिक बुनियादी ढाँचा विस्तार है। इस प्रकार, हिमालयी संकट अब केवल पर्यावरणीय चुनौती नहीं रहा, बल्कि भारत की विकास दृष्टि और आपदा-प्रबंधन क्षमता की एक निर्णायक कसौटी बन गया है।
भारत के लिये हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र का क्या महत्त्व है?
- जल सुरक्षा के रूप में एशिया का जलस्तंभ: हिमालय एक महत्त्वपूर्ण 'तीसरे ध्रुव' के रूप में कार्य करता है, जो विशाल ताज़े जल के भंडार को संगृहीत करता है, जो बारहमासी नदी प्रणालियों (सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र ) को पोषित करता है, जिससे भारत के कृषि प्रधान क्षेत्र को सहारा मिलता है।
- यह क्रायोस्फेरिक भंडार मानसून से पहले के शुष्क महीनों के दौरान गलनजल (meltwater) छोड़ता है, जो उत्तरी मैदानी क्षेत्रों के 'खाद्य भंडार' के लिये सूखे के खिलाफ एक महत्त्वपूर्ण सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करता है।
- उदाहरण के लिये, हिंदूकुश हिमालय लगभग 240 मिलियन पर्वतीय निवासियों और भारत सहित लगभग 1.65-1.9 बिलियन निम्न क्षेत्रों के लाभार्थियों का समर्थन करता है।
- जलवायु संबंधीतापमान नियंत्रक: यह पर्वत शृंखला एक विशाल जलवायु अवरोधक के रूप में कार्य करती है, जो बर्फीली मध्य एशियाई कैटाबेटिक पवनों को उत्तरी भारत को शीत मरुस्थल में बदलने से रोकती है, जबकि साथ ही आर्द्रता युक्त दक्षिण-पश्चिम मानसून पवनों को रोककर रखती है।
- यह 'पर्वतीय उत्थापन' उपमहाद्वीप में वर्षा का प्राथमिक चालक है, जो खरीफ फसल चक्र के लिये आवश्यक आर्द्र-शुष्क चक्रों को नियंत्रित करता है।
- यह पर्वत शृंखला सुनिश्चित करती है कि गंगा के मैदानी क्षेत्रों में प्रतिवर्ष 1000 मिमी से अधिक वर्षा प्राप्त हो।
- रणनीतिक 'भू-राजनीतिक प्राचीर' और सीमा रक्षा: हिमालय वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के साथ एक प्राकृतिक उच्च-ऊँचाई वाला किला प्रदान करता है।
- यह क्षेत्र अब भारत की 'दोहरे उपयोग वाली अवसंरचना' रणनीति का केंद्र बन गया है, जो सीमावर्ती क्षेत्रों में सैन्य गतिशीलता और नागरिक संपर्क के बीच संतुलन बनाए रखकर विस्थापन को रोकने का काम करता है।
- उदाहरण के लिये, वर्ष 2024 में चालू हुई सेला सुरंग तवांग तक सभी मौसमों में आवागमन सुनिश्चित करती है। साथ ही, जीवंत ग्राम कार्यक्रम के तहत इस 'जीवंत प्राचीर' की सुरक्षा हेतु 663 सीमावर्ती गांवों के विकास के लिये ₹4,800 करोड़ आवंटित किये गए हैं।
- यह कदम चीन द्वारा LAC के पास निर्मित 628 'शियाओकांग' रक्षा गाँवों के प्रति भारत की रणनीतिक प्रतिक्रिया भी है।
- हरित ऊर्जा का केंद्र: हिमालय भारत के नवीकरणीय ऊर्जा संक्रमण के केंद्र में स्थित है।
- इसके तीव्र ऊँचाई वाली प्रवणता (altitudinal gradients) उच्च गतिज ऊर्जा उत्पन्न करती है जो नदी-प्रवाह परियोजनाओं के लिये आदर्श है और सौर और पवन ऊर्जा से उत्पन्न होने वाली ग्रिड की अनिश्चितता को स्थिर कर सकती है।
- इस क्षेत्र में अनुमानित जलविद्युत क्षमता 115,550 मेगावाट है, जिसमें से लगभग 46,850 मेगावाट (≈40%) पहले से ही स्थापित है, जिससे यह क्षेत्र देश का सबसे बड़ा जलविद्युत भंडार बन गया है।
- जैव विविधता भंडार और औषधीय संपदा: भारत में स्थित चार वैश्विक 'जैव विविधता हॉटस्पॉट' में से एक के रूप में, हिमालय लुप्तप्राय वनस्पतियों और संभावित औषधीय खोजों (आयुष) के लिये एक आनुवंशिक भंडार का काम करता है।
- यह जैविक समृद्धि पर्यावरणीय सेवाएँ प्रदान करती है जैसे परागण और मिट्टी की स्थिरता।
- उदाहरण के लिये, हिमालयी जैव विविधता हॉटस्पॉट में लगभग 10,000 संवहनी पौधों की प्रजातियों में से, लगभग 3,160 प्रजातियाँ (71 जीनस का प्रतिनिधित्व) स्थानिक हैं, अर्थात पृथ्वी पर कहीं और नहीं पाई जातीं।
- यह जैविक समृद्धि पर्यावरणीय सेवाएँ प्रदान करती है जैसे परागण और मिट्टी की स्थिरता।
- वैश्विक तापन के लिये क्रायोस्फेरिक प्रहरी: हिमालयी ग्लेशियरों का स्वास्थ्य भारत के लिये सबसे दृश्यमान 'जलवायु डैशबोर्ड' के रूप में कार्य करता है, जो हज़ारों किलोमीटर दूर समुद्र के स्तर में वृद्धि और तटीय सुरक्षा को प्रभावित करने वाले ग्लोबल टिपिंग पॉइंट्स की प्रारंभिक चेतावनी प्रदान करता है।
- यहाँ के ग्लेशियरों की पिघलने की दर सीधे तापीय विस्तार और गलनजल के कारण मुंबई और कोलकाता जैसे तटीय महानगरों के भविष्य के जलमग्न होने के जोखिम से संबंधित है।
- सामाजिक-आर्थिक गलियारा और सतत पर्यटन: यह क्षेत्र आध्यात्मिक पर्यटन और बागवानी द्वारा संचालित एक अद्वितीय 'उच्च-ऊँचाई वाली अर्थव्यवस्था' का समर्थन करता है।
- यहाँ सतत प्रबंधन अत्यंत महत्त्वपूर्ण है ताकि 'जनसांख्यिकीय पलायन' को रोका जा सके, जिसमें आपदा के जोखिमों के कारण स्थानीय लोग पलायन कर जाते हैं, जिससे रणनीतिक सीमावर्ती क्षेत्र निर्जन हो जाते हैं।
- चार धाम परियोजना एक निर्माणाधीन राजमार्ग परियोजना है जिसे केदारनाथ, बद्रीनाथ, यमुनात्री और गंगोत्री नामक चार तीर्थस्थलों को हर मौसम में सुगम संपर्क प्रदान करने के लिये बनाया गया है।
भारत ने भारतीय हिमालयी क्षेत्र में सतत विकास हेतु क्या उपाय किये हैं?
- पर्यावरण-अनुकूल गतिशीलता में बदलाव - ‘पर्वत माला’ (राष्ट्रीय रोपवे कार्यक्रम ): सरकार भू-भाग को नुकसान पहुँचाने वाले सड़क चौड़ीकरण के स्थान पर हवाई रोपवे का तेज़ी से उपयोग कर रही है ताकि ढलान की अस्थिरता एवं भू-गतिकीय उत्प्रेरण को कम किया जा सके।
- इसका लक्ष्य 250 से अधिक परियोजनाओं के माध्यम से 1,200 किलोमीटर रोपवे का निर्माण (बजट 2024-25) करना है।
- उदाहरण के लिये, सोनप्रयाग-केदारनाथ रोपवे ने यात्रा का समय 8 घंटे से घटाकर 36 मिनट कर दिया, जिससे ट्रेकिंग मार्गों पर मानवीय दबाव कम हुआ।
- यह 'ज़ीरो फूटप्रिंट मॉबिलिटी’ वाला परिवहन मॉडल अत्यंत सुभेद्य भू-भाग को पूरी तरह बायपास करता है तथा पारंपरिक चार-लेन वाले राजमार्गों की तुलना में भूस्खलन जोखिम को बहुत हद तक कम करता है।
- इसका लक्ष्य 250 से अधिक परियोजनाओं के माध्यम से 1,200 किलोमीटर रोपवे का निर्माण (बजट 2024-25) करना है।
- सामुदायिक नेतृत्व वाली संरक्षण 'SECURE हिमालय' परियोजना: जंगलों की बाड़बंदी से आगे बढ़कर, यह पहल मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिये हिम तेंदुए के संरक्षण को स्थायी आजीविका के साथ एकीकृत करती है।
- इसमें प्रमुख भू-भागों (जैसे: गंगोत्री-गोविंद, कंचनजंगा) को शामिल किया गया और 1,000 से अधिक स्थानीय युवाओं को प्रकृति मार्गदर्शक एवं निगरानी का प्रशिक्षण दिया गया।
- स्थानीय समुदायों को 'रक्षा की पहली पंक्ति' के रूप में मानकर, यह पारिस्थितिक पर्यटन और औषधीय पौधों की मूल्य शृंखलाओं के माध्यम से संरक्षण का मुद्रीकरण करता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि जैव विविधता की रक्षा करना उच्च तुंगता पर रह रहे निवासियों के लिये आर्थिक रूप से व्यवहार्य हो जाए।
- न्यायिक 'वहनीय क्षमता' जनादेश और कानूनी अधिकार: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'प्रतिकूल जलवायु प्रभावों से मुक्त होने के अधिकार' को मूल अधिकार के रूप में कानूनी रूप से मान्यता (एम.के. रणजीत सिंह बनाम भारत संघ मामला) देने के साथ शासन में एक ऐतिहासिक परिवर्तन आया है।
- इस कारण सरकार को 'असीमित विकास' मॉडल को रोकना पड़ा है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 13 हिमालयी राज्यों की वहन क्षमता का सटीक आकलन करने के लिये उपाय प्रस्तावित किये हैं।
- अशोक कुमार राघव बनाम भारत संघ मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय हिमालयी क्षेत्र (IHR) में अनियंत्रित विकास पर रोक लगाने के लिये 'वहनीय क्षमता' पर आधारित कार्य योजनाओं को आगे बढ़ाने का आह्वान किया।
- इस कारण सरकार को 'असीमित विकास' मॉडल को रोकना पड़ा है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 13 हिमालयी राज्यों की वहन क्षमता का सटीक आकलन करने के लिये उपाय प्रस्तावित किये हैं।
- विकेंद्रीकृत ऊर्जा संक्रमण - पहाड़ियों में 'पीएम सूर्य घर': दूरस्थ क्षेत्रों में ग्रिड ट्रांसमिशन लाइनों (जिनके लिये वनों की कटाई की आवश्यकता होती है) तथा डीज़ल जनरेटर पर निर्भरता कम करने के लिये, सरकार डिसेंट्रलाइज्ड रूफटॉप सोलर माइक्रोग्रिड को बढ़ावा दे रही है।
- सरकार ने दिशानिर्देश जारी किये हैं जिनमें पूर्वोत्तर राज्यों एवं उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख जैसे पहाड़ी क्षेत्रों सहित 'विशेष श्रेणी के राज्यों' के लिये प्रति किलोवाट 10% की अतिरिक्त सब्सिडी का प्रावधान है।
- यह आपदा के दौरान ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करता है तथा डीज़ल से उत्पन्न ‘ब्लैक कार्बन’ उत्सर्जन को कम करता है, जो हिमनद विगलन को तीव्र करता है।
- जलवैज्ञानिक पुनरुद्धार- 'स्प्रिंगशेड प्रबंधन' कार्यढाँचा: यह मानते हुए कि ग्लेशियर पिघलने की पृष्ठभूमि में, NITI आयोग ने बाँध-आधारित समाधानों के बजाय जलभंडार पुनर्भरण पर ध्यान केंद्रित किया है, क्योंकि पर्वतीय क्षेत्रों में ‘धाराएँ’ (स्प्रिंग्स) तात्कालिक जीवनरेखा हैं।
- यह 'धारा विकास' दृष्टिकोण सूखते हुए झरनों को पुनर्जीवित करने के लिये भूमिगत जलभंडारों का मानचित्रण करता है, जिससे प्राकृतिक नदी प्रवाह को बाधित किये बिना पहाड़ी कृषि के लिये जल सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
- NITI आयोग की वर्ष 2018 की एक रिपोर्ट के अनुसार, अंतर्राष्ट्रीय मानव संसाधन क्षेत्र (IHR) में लगभग 50% झरने या तो सूख रहे हैं या सूख चुके हैं।
- उदाहरण के लिये, इस परियोजना ने सिक्किम में 50 से अधिक झीलों और दर्जनों झरनों का सफलतापूर्वक पुनरुद्धार किया है, जिससे सिक्किम राष्ट्रीय मॉडल के रूप में स्थापित हो गया है।
- 'स्थिरता के माध्यम से सुरक्षा' - वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम (VVP): पारंपरिक सैन्य सुदृढ़ीकरण से आगे बढ़ते हुए, यह कार्यक्रम सीमा सुरक्षा को एक पारिस्थितिक और जनांकिकीय चुनौती के रूप में देखता है।
- इस रणनीति का उद्देश्य संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों से ‘आप्रवासन’ को रोकना है, जिसके लिये इको-टूरिज़्म और जैविक क्लस्टर जैसी ‘क्लाइमेट-स्मार्ट’ आजीविकाओं को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
- इससे सीमावर्ती गाँव आबाद बने रहते हैं तथा भारी और पर्यावरणीय रूप से हानिकारक सैन्य ढाँचे के बिना ही रणनीतिक ‘आँख और कान’ की भूमिका निभाते हैं।
- उदाहरण के लिये, किबिथू (अरुणाचल) एक 'स्मार्ट विलेज' पायलट प्रोजेक्ट के रूप में विकसित हुआ है।
- चक्रीय अर्थव्यवस्था पहल- 'जमा वापसी योजना' (DRS) और EPR: हिमालयी जल स्रोतों को संदूषित कर रहे प्लास्टिक संकट से निपटने के लिये, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्य 'बाय-बैक' मॉडल का परीक्षण कर रहे हैं।
- यह नीति उत्पादकों को अपशिष्ट संग्रहण के लिये भुगतान करने के लिये बाध्य करती है तथा स्थानीय लोगों को गैर-बायोडिग्रेडेबल पैकेजिंग एकत्र करने के लिये प्रोत्साहित करती है, जिससे दुर्गम इलाकों में आत्मनिर्भर अपशिष्ट संग्रहण अर्थव्यवस्था बनाने के लिये अपशिष्ट पर प्रभावी रूप से एक 'मूल्य टैग' लगाया जाता है।
- हिमाचल प्रदेश मंत्रिमंडल ने अपशिष्ट प्रबंधन से निपटने के लिये 'डिपॉज़िट रिफंड स्कीम 2025' शुरू की है, जिसके अंतर्गत लौटाये गये प्लास्टिक अपशिष्ट पर नकद रिफंड प्रदान किया जायेगा।
- प्रौद्योगिकी-एकीकृत अनुकूलन - 'ग्लेशियल लेक अर्ली वार्निंग सिस्टम' (GLEWS): हिमनद झील विस्फोट बाढ़ (GLOFs) के बढ़ते खतरे के मद्देनज़र, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने प्रतिक्रियात्मक राहत से हटकर स्वचालित निगरानी को अपनाया है।
- इसके अंतर्गत उच्च जोखिम वाली हिमनदीय झीलों पर ओवर-द-होराइज़न रडार और उपग्रह-संयोजित सेंसर स्थापित किये जा रहे हैं, जिससे डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों को समय रहते चेतावनी दी जा सके।
- राष्ट्रीय हिमनद झील विस्फोट बाढ़ (GLOF) जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम के तहत, सिक्किम के दक्षिण ल्होनाक झील और शाको चो (सिक्किम) में प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियाँ संचालित की गई हैं, जो रिमोट सेंसिंग एवं सामुदायिक चेतावनी तंत्र को एकीकृत करती हैं।
- वैज्ञानिक क्षमता और 'ज्ञान-नीति' सेतु (NMSHE चरण-II): हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने के राष्ट्रीय मिशन ने निष्क्रिय अवलोकन से सक्रिय 'साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण' की ओर रुख किया है।
- यह संस्थागत तंत्र अब हिमालयी राज्यों को जलवायु परिवर्तन पर अपनी राज्य कार्य योजनाओं (SAPCC) को कठोर ज़िला-स्तरीय भेद्यता मानचित्रों के साथ संरेखित करने के लिये बाध्य करता है, जिससे तदर्थ निर्णयों को दीर्घकालिक 'जलवायु-जोखिम-सूचित' शासन से प्रतिस्थापित किया जा सके।
- चरण-II (2021-2026) के तहत NMSHE ने प्रमुख विषयगत कार्य बलों (जैसे: हिमालयी कृषि, वन संसाधन और पादप विविधता आदि) को सक्रिय किया तथा IIT रुड़की का नया उत्कृष्टता केंद्र अब राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों को वास्तविक समय में आपदा जोखिम डेटा सीधे प्रदान करता है।
भारतीय हिमालयी क्षेत्र से संबंधित चुनौतियाँ क्या हैं?
- क्रायोस्फीयर पतन और जलवायु अस्थिरता: 'तीसरे ध्रुव' पर क्रायोस्फीयर में एक अपरिवर्तनीय कमी देखी जा रही है, जहाँ बढ़ते तापमान केवल ग्लेशियरों को पिघला नहीं रहे बल्कि वृष्टि के चरणों (बर्फ से बारिश) को भी बदल रहे हैं, जिससे निम्न क्षेत्रों के कृषि और ऊर्जा स्रोतों के लिये जल-सुरक्षा अस्थिर हो रही है।
- यह परिवर्तन एक “भारी-बूँद सूखा” विरोधाभास उत्पन्न करता है, जहाँ तीव्र स्थानीय बाढ़ के बाद लंबे समय तक जल संकट उत्पन्न होता है, जो भारत के “वाटर टॉवर” की स्थिति को खतरे में डालता है।
- उदाहरण के लिये, हिंदूकुश हिमालय में बर्फ के द्रव्यमान में 65% अधिक तेज़ी से कमी दर्ज की गई (ICIMOD 2024 के अनुसार)।
- इसके अलावा, दक्षिण ल्होनक GLOF (सिक्किम, अक्तूबर 2023) ने 50 क्यूबिक मिलियन पानी छोड़ा, जिससे तीस्ता III बांध नष्ट हो गया।
- अवसंरचना-प्रेरित ढलान अस्थिरता ('धंसने' का सिंड्रोम): तीव्र शहरीकरण और रणनीतिक मेगा-परियोजनाएँ (राजमार्ग, सुरंगें) अपरूपण क्षेत्रों और विवर्तनिक संवेदनशीलता की अनदेखी करती हैं, जिससे भूमि धंसाव और ढलान विफलताएँ बढ़ जाती हैं।
- पर्याप्त मलबे के निपटान या जल निकासी योजना के बिना भारी इंजीनियरिंग दृष्टिकोण (विस्फोट और ऊर्ध्वाधर कटाई) ने सुप्त भूस्खलनों को सक्रिय कर दिया है, जिससे रहने योग्य शहर आपदा क्षेत्रों में बदल गए हैं।
- उदाहरण के लिये, जोशीमठ के धंसने के विश्लेषण से पता चलता है कि दिसंबर 2022 और दिसंबर 2024 के बीच, जोशीमठ के कुछ हिस्से 30 सेंटीमीटर से अधिक धंस गए।
- पर्याप्त मलबे के निपटान या जल निकासी योजना के बिना भारी इंजीनियरिंग दृष्टिकोण (विस्फोट और ऊर्ध्वाधर कटाई) ने सुप्त भूस्खलनों को सक्रिय कर दिया है, जिससे रहने योग्य शहर आपदा क्षेत्रों में बदल गए हैं।
- वहन क्षमता का अतिक्रमण और अतिपर्यटन का दबाव: अनियमित धार्मिक और साहसिक पर्यटन ने पारिस्थितिकी वहन क्षमता का उल्लंघन किया है, जिससे उच्च ऊँचाई वाले क्षेत्रों में संसाधनों की बर्बादी का गंभीर असंतुलन उत्पन्न हो गया है।
- 'पंप-एंड-डंप' पर्यटन मॉडल विलासितापूर्ण उपभोग के लिये स्थानीय जल स्रोतों का दोहन करता है, जबकि पीछे गैर-जैव अपघटनीय अपशिष्ट छोड़ देता है जो जल स्रोतों में सूक्ष्म प्लास्टिक का रिसाव करता है, जिससे स्रोत पर ही पारिस्थितिकी तंत्र प्रदूषित हो जाता है।
- उदाहरण के लिये, केदारनाथ की भौतिक वहन क्षमता प्रतिदिन लगभग 24,500 आगंतुकों की है, लेकिन इसकी वास्तविक वहन क्षमता 9,833 है।
- नीति आयोग और विश्व बैंक के अनुमानों के अनुसार, भारतीय हिमालयी क्षेत्र में प्रतिवर्ष 5-8 मिलियन मीट्रिक टन अपशिष्ट उत्पन्न होता है। इसके अलावा, इस अपशिष्ट का अधिकांश भाग पुनर्चक्रण योग्य नहीं है।
- ब्लैक कार्बन और एल्बेडो फीडबैक लूप: बायोमास जलाने और वाहनों के उत्सर्जन से होने वाला क्षेत्रीय प्रदूषण ग्लेशियरों पर ब्लैक कार्बन जमा करता है, जिससे सतह काली हो जाती है और एल्बेडो (परावर्तकता) कम हो जाती है।
- इससे शून्य से नीचे के तापमान में भी बर्फ पिघलने की प्रक्रिया तीव्र हो जाती है, जिससे एक खतरनाक प्रतिक्रिया चक्र बन जाता है जहाँ 'प्रदूषित बर्फ' अधिक गर्मी को अवशोषित करती है, जिससे स्थानीय तापमान वृद्धि की दर वैश्विक औसत से कहीं अधिक बढ़ जाती है।
- क्लाइमेट ट्रेंड्स द्वारा किये गए एक नए अध्ययन (जिसका शीर्षक है 'हिमालयी ग्लेशियरों पर ब्लैक कार्बन का प्रभाव') से पता चलता है कि ब्लैक कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि ने पिछले दो दशकों में हिमालय में पिघलने की प्रक्रिया को 4 डिग्री सेल्सियस तक तीव्र कर दिया है, जिसमें पूर्वी और मध्य हिमालय में उच्च सांद्रता देखी गई है।
- जैव विविधता का समरूपीकरण और पर्यावास का विखंडन: रैखिक अवसंरचना (रेलमार्ग, ट्रांसमिशन लाइन) वन्यजीव मार्गों को काट रही है, जिससे जानवर मानव आवासों की ओर मजबूर हो रहे हैं और स्नो लेपर्ड जैसी प्रजातियों में आनुवंशिक पृथक्करण बढ़ रहा है।
- इसके साथ ही, वैश्विक तापमान वृद्धि आक्रामक प्रजातियों को उच्च ऊँचाई तक चढ़ने का अवसर देती है, जो देशी अल्पाइन वनस्पतियों से प्रतिस्पर्धा कर क्षेत्र की जैव विविधता को एकरूपता प्रदान करती हैं।
- भारतीय रिमोट सेंसिंग संस्थान (IIRS) द्वारा 2024 में किये गए एक अध्ययन में तेज़ी से शहरीकरण हो रहे पश्चिमी हिमालयी क्षेत्रों में वर्ष 1991 और 2023 के बीच प्राकृतिक वन क्षेत्र में 11% की गिरावट दर्ज की गई, जो मुख्यतः शहरीकरण और अवसंरचना विकास में 184% वृद्धि के कारण हुई।
- इसके अलावा, रेलवे और बिजली लाइनों जैसी परियोजनाओं के कारण पूरे भारत में बड़े वन क्षेत्रों की संख्या में 71.5% की कमी हुई, जिससे 'किनारे से आंतरिक भाग' का अनुपात बढ़ा और पर्यावास विखंडन विशेष रूप से हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ गया।
- संस्थागत विखंडन और नीतिगत क्षीणता: हिमालयी शासन अभी भी अलग-थलग है, जिसमें सड़कों, जलविद्युत और पर्यटन को अलग-अलग मंत्रालयों द्वारा संभाला जाता है। एक एकीकृत, हिमालय-विशिष्ट भवन संहिता या एकीकृत पारिस्थितिकी निगरानी का अभाव है।
- 'रणनीतिक' परियोजनाओं के लिये पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) के महत्त्व में कमी आने से कानूनी सुरक्षा उपाय कमज़ोर हो गए हैं, जिससे पारिस्थितिकीरूप से अपरिवर्तनीय हस्तक्षेप संभव हो गए हैं।
- वन (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2023 के तहत, LAC/अंतर्राष्ट्रीय सीमा के 100 किलोमीटर के भीतर की परियोजनाओं को वन मंज़ूरी से छूट दी गई है, जिससे चांगथांग (लद्दाख) जैसे संवेदनशील भूभागों में रणनीतिक परियोजनाओं को पूर्ण EIA (पर्यावरण प्रभाव आकलन) से बचने की अनुमति मिलती है।
- 'भूकंपीय अंतराल' और जलाशय-प्रेरित जोखिम: मध्य हिमालय एक सक्रिय भूकंपीय अंतराल के ऊपर स्थित है, जआँ संचित विवर्तनिक दबाव विशाल बांधों के जल भार से लगातार बढ़ता जा रहा है, जिससे जलाशय-प्रेरित भूकंपीयता का खतरा बढ़ जाता है।
- पर्याप्त भूकंपीय सुरक्षा के बिना कठोर कंक्रीट संरचनाएँ भविष्य के भूकंपों को क्रमिक विफलताओं में बदल सकती हैं।
- NGRI (2025) ने इस क्षेत्र को लगभग 8.5 तीव्रता के भूकंप के संभावित क्षेत्र के रूप में चिह्नित किया है, जबकि टिहरी बांध के पास 1,500 से अधिक सूक्ष्म झटके स्थानीय फॉल्ट लाइनों पर बढ़ते दबाव का संकेत देते हैं।
- 'शीतकालीन अग्नि' और कार्बन सिंक: पारंपरिक ग्रीष्मकालीन अग्नि अब 'बर्फ की कमी' और शुष्क बायोमास संचय के कारण सर्दियों में भड़क रही है, जिससे हिमालयी कार्बन सिंक उत्सर्जक में बदल रहा है। यह सुप्त बीज भंडार और चीड़ के पेड़ों को प्रभावित करता है, ओक के जंगलों में आक्रामक विस्तार को बढ़ाता है, मिट्टी सूखने और प्राकृतिक जल-सोखने की क्षमता नष्ट होने का कारण बनता है।
- उत्तराखंड और मध्य हिमालय में असामान्य शुष्क शीतकाल और कम वर्षा/हिमपात से फसल हानि, जल संबंधी दबाव और ग्लेशियर द्रव्यमान संतुलन में नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न हो रहा है।
- इस जलवायु विसंगति की गंभीरता का प्रमाण नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान जैसे उच्च ऊँचाई वाले संरक्षित क्षेत्रों में भी देखी गई वन आग की घटनाओं से मिलता है।
- इस जलवायु विसंगति का प्रमाण नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान में उच्च ऊँचाई वाले क्षेत्रों में बढ़ी वनाग्नि घटनाओं से मिलता है। 14–20 जनवरी, 2026 के बीच उत्तराखंड हिमालय में 440 वन अग्नि घटनाएँ हुईं, जबकि वर्ष 2025 में इसी अवधि में 45 अग्नि घटनाएँ हुईं, जो लगभग दस गुना वृद्धि है।
भारतीय हिमालयी क्षेत्र के सतत प्रबंधन के लिये कौन-से उपाय आवश्यक हैं?
- हिमालय-विशिष्ट भूमि उपयोग और भवन संहिता लागू करना: भारत को एक कानूनी रूप से बाध्यकारी हिमालयी पर्वतीय संहिता की आवश्यकता है जो सामान्य मैदानी मानदंडों को प्रॉन-संवेदनशील, भूविज्ञान-संरेखित मानकों से प्रतिस्थापित करे।
- इस संहिता में भूकंपीय और भूस्खलन क्षेत्रों में सड़क की चौड़ाई, पहाड़ी कटान के कोण, सुरंगों का घनत्व, भवन की ऊँचाई और अनुमेय भार को विनियमित किया जाना चाहिये। विकास अनुमतियाँ सूक्ष्म-क्षेत्रीकरण और संचयी प्रभाव सीमा के आधार पर दी जानी चाहिये।
- इस तरह की संहिता 'सावधानी' को सलाह से बदलकर लागू करने योग्य कानून बना देगी।
- इस संहिता में भूकंपीय और भूस्खलन क्षेत्रों में सड़क की चौड़ाई, पहाड़ी कटान के कोण, सुरंगों का घनत्व, भवन की ऊँचाई और अनुमेय भार को विनियमित किया जाना चाहिये। विकास अनुमतियाँ सूक्ष्म-क्षेत्रीकरण और संचयी प्रभाव सीमा के आधार पर दी जानी चाहिये।
- अवसंरचना-आधारित विकास से अनुकूलन-आधारित योजना की ओर संक्रमण: विकास रणनीति को परिसंपत्ति निर्माण से जोखिम न्यूनीकरण की ओर मोड़ना होगा, जिससे आपदा अनुकूलन प्राथमिक डिज़ाइन पैरामीटर बन जाए।
- अवसंरचना का मूल्यांकन गति या क्षमता के आधार पर नहीं, बल्कि जीवनकाल स्थिरता, रखरखाव और विफलता के परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिये।
- इसके लिये परियोजना के डिज़ाइन चरण में ही भूवैज्ञानिकों, पारिस्थितिकीविदों और आपदा वैज्ञानिकों को शामिल करना आवश्यक है, न कि मंज़ूरी के बाद के सुधार कार्यों में। अनुकूलन को प्राथमिकता देने वाली योजना से दीर्घकालिक वित्तीय और मानवीय लागत कम होती है।
- संचयी प्रभाव और बेसिन-स्तरीय आकलन को संस्थागत रूप देना: परियोजना-वार स्वीकृतियों की जगह परिदृश्य और नदी बेसिन स्तर की योजना अपनाई जानी चाहिये, विशेषकर हाइड्रोपावर, सड़क और पर्यटन क्लस्टर के लिये।
- बेसिन अधिकारियों को ढलान की स्थिरता, तलछट भार और वहन क्षमता के आधार पर अवसंरचना घनत्व को सीमित करना चाहिये।
- इससे 'हज़ारों छोटे-छोटे मोड़ों से होने वाली मृत्यु' के प्रभाव को रोका जा सकता है, जहाँ अलग-अलग स्वीकृत परियोजनाएँ सामूहिक रूप से पूरी घाटियों को अस्थिर कर देती हैं, विभिन्न क्षेत्रों में एकीकरण ही प्रणालीगत जोखिम को रोकने का एकमात्र तरीका है।
- प्राकृतिक समाधान को मुख्य अवसंरचना मानना: वनों, आर्द्रभूमियों, अल्पाइन घास के मैदानों और नदी तटवर्ती क्षेत्रों को महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक अवसंरचना के रूप में माना जाना चाहिये, न कि सहायक संरक्षण संपत्तियों के रूप में।
- वृक्षारोपण के माध्यम से ढलान स्थिरीकरण, आर्द्रभूमि के माध्यम से बाढ़ नियंत्रण और वन बेल्ट के माध्यम से हिमस्खलन नियंत्रण प्रायः इंजीनियरिंग समाधानों की तुलना में सस्ते और अधिक स्थायी होते हैं।
- आपदा जोखिम न्यूनीकरण रणनीति के रूप में पारिस्थितिकी तंत्र बहाली के लिये बजट आवंटन में स्पष्ट रूप से धनराशि आवंटित की जानी चाहिये। इससे पारिस्थितिकी सुधार आर्थिक विवेक के अनुरूप हो जाता है।
- पर्यटन को वहन क्षमता और स्थानिक ज़ोनिंग के अनुसार नियंत्रण: पर्यटन नीति को मात्रा-आधारित मॉडल से क्षमता-विनियमित और मौसमी रूप से क्रमबद्ध मॉडल की ओर बढ़ना चाहिये।
- संवेदनशील क्षेत्रों में पैदल यात्रियों, वाहनों और निर्माण पर सख्त सीमाएँ होनी चाहिये, जिन्हें परमिट और मूल्य निर्धारण संकेतों के माध्यम से लागू किया जाना चाहिये।
- पर्यटन अवसंरचना का विकेंद्रीकरण किया जाना चाहिये ताकि दबाव कम हो और स्थानीय आजीविका स्थिर हो सके। सुनियोजित पर्यटन पारिस्थितिकी तंत्र और उन पर निर्भर आर्थिक आधार दोनों की रक्षा करता है।
- हाइड्रोपावर और परिवहन को संदर्भ-संवेदनशील डिज़ाइन के साथ पुनःसंरचित करना: जलविद्युत और सड़क परियोजनाओं को भूभाग के अनुकूल डिज़ाइन, संकरी सड़कें, लचीले संरेखण, न्यूनतम सुरंग निर्माण और विशाल संरचनाओं पर वितरित ऊर्जा प्रणालियों को अपनाना होगा।
- भौगोलिक अनिश्चितता को डिज़ाइन प्रतिबंध के रूप में मानना चाहिए, असुविधा के रूप में नहीं।
- अस्थिर परियोजनाओं में सुधार करने से पहले, अस्थिरता उत्पन्न करने वाले डिज़ाइनों को रोकना अधिक महत्त्वपूर्ण है। इससे अपरिवर्तनीय जोखिम के स्थायी होने की संभावना कम हो जाती है।
- स्थानीय संस्थाओं और सामुदायिक भागीदारी को सशक्त करना: स्थानीय समुदायों को परियोजना से प्रभावित हितधारकों की भूमिका से हटकर भूदृश्यों के सह-प्रबंधक बनना होगा। पंचायतों को योजना बनाने का अधिकार, आपदा निधि और पारिस्थितिकी निगरानी की भूमिकाएँ सौंपने से अनुपालन और पूर्व चेतावनी में सुधार होता है।
- ढलान व्यवहार, जल प्रवाह और वन प्रबंधन पर स्वदेशी ज्ञान को औपचारिक निर्णय लेने में आधार बनाया जाना चाहिये। विकेंद्रीकृत प्रबंधन वैधता और ज़मीनी स्तर पर प्रभावशीलता को बढ़ाता है।
- जलवायु, आपदा और विकास शासन का एकीकरण: हिमालय क्षेत्र के लिये जलवायु अनुकूलन, आपदा जोखिम न्यूनीकरण और अवसंरचना नियोजन को एक ही शासन ढाँचे में समाहित किया जाना चाहिये। विभाजित अधिकार क्षेत्र जवाबदेही को कमज़ोर करते हैं तथा नीतियों में चूक को प्रोत्साहित करते हैं।
- एकीकृत योजना से दीर्घकालिक दृष्टिकोण निर्धारित करना, लाभ-हानि का मूल्यांकन करना और पारदर्शी प्राथमिकता निर्धारण संभव होता है। हिमालय की रक्षा के लिये इसे एक एकीकृत भू-प्रणाली के रूप में संचालित करना आवश्यक है, न कि पृथक प्रशासनिक क्षेत्रों के रूप में।
निष्कर्ष:
हिमालय की सुरक्षा अब केवल विकास और संरक्षण के बीच चयन का विषय नहीं, बल्कि दूरदर्शिता और विफलता के बीच निर्णायक विकल्प बन चुकी है। जब संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों पर मैदानी क्षेत्रों जैसी महत्त्वाकांक्षाओं का बोझ डाला जाता है, तो आपदाएँ प्राकृतिक नहीं, बल्कि नीतिगत परिणाम बन जाती हैं। केवल अनुकूलित और पारिस्थितिकी-केंद्रित शासन ही जीवन, आजीविका और राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। हिमालय में स्थिरता अब कोई आदर्श नहीं, बल्कि रक्षा की अंतिम पंक्ति है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न 'हिमालयी संकट जलवायु परिवर्तन की विफलता के साथ-साथ शासन और योजना-निर्माण की विफलता का परिणाम भी है।' भारतीय हिमालयी क्षेत्र में अवसंरचना विकास, भूमि उपयोग प्रथाओं और आपदा प्रतिरोध क्षमता के संदर्भ में इस कथन का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये। |
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1. हिमालय में आपदाएँ क्यों बढ़ रही हैं?
क्योंकि असुरक्षित भूमि उपयोग और बुनियादी ढाँचे का अत्यधिक विस्तार संवेदनशील भूभाग में जलवायु-प्रेरित चरम घटनाओं को बढ़ा रहे हैं।
प्रश्न 2. क्या हिमालयी आपदाओं का एकमात्र कारण जलवायु परिवर्तन है?
नहीं। हालाँकि जलवायु परिवर्तन जोखिम को तीव्र रूप से बढ़ाता है, लेकिन अवैज्ञानिक नियोजन और पारिस्थितिकीय असंतुलन इसके मुख्य कारण हैं।
प्रश्न 3. हिमालयी क्षेत्र के लिये मैदानी विकास मॉडल अनुपयुक्त क्यों हैं?
ये ढलानों की स्थिरता, भूकंपीय संवेदनशीलता और वहन क्षमता की उपेक्षा करते हैं, परिणामस्वरूप विकास स्वयं जोखिम का कारक बन जाता है।
प्रश्न 4. हिमालयी शासन में मुख्य नीतिगत कमी क्या है?
हिमालय क्षेत्र के लिये एक एकीकृत, विशिष्ट भूमि उपयोग और भवन निर्माण संहिता और एकीकृत निगरानी का अभाव है।
प्रश्न 5. आगे की राह के लिये सबसे प्रभावी मार्ग क्या है?
अवसंरचना-आधारित विकास से हटकर स्थानीय शासन पर आधारित, अनुकूलित और पर्यावरण-प्रथम योजना को अपनाया जाए।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ)
प्रिलिम्स:
प्रश्न 1. निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिये: (2020)
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शिखर |
पर्वत |
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1. नामचा बरवा |
गढ़वाल हिमालय |
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2. नंदा देवी |
कुमाऊँ हिमालय |
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3. नोकरेक |
सिक्किम हिमालय |
उपर्युक्त युग्मों में कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?
(a) 1 और 2
(b) केवल 2
(c) 1 और 3
(d) केवल 3
उत्तर: (b)
प्रश्न 2. यदि आप हिमालय से होकर यात्रा करते हैं, तो आपको वहाँ निम्नलिखित में से किस पादप/किन पादपों को प्राकृतिक रूप में उगते हुए दिखने की संभावना है? (2014)
- बांज
- बुरुंश
- चंदन
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (a)
प्रश्न 3. जब आप हिमालय की यात्रा करेंगे, तो आप निम्नलिखित को देखेंगे: (2012)
- गहरे खड्ड
- U धुमाव वाले नदी-मार्ग
- समानांतर पर्वत श्रेणियाँ
- भूस्खलन के लिये उत्तरदायी तीव्र ढाल प्रवणता
उपर्युक्त में से कौन-से हिमालय के तरुण वलित पर्वत (नवीन मोड़दार पर्वत) के साक्ष्य कहे जा सकते हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 1, 2 और 4
(c) केवल 3 और 4
(d) 1, 2, 3 ओर 4
उत्तर: (d)
मेन्स
प्रश्न 1. हिमालयी क्षेत्र तथा पश्चिमी घाटों में भूस्खलन के विभिन्न कारणों का अंतर स्पष्ट कीजिये। (2021)
प्रश्न 2. हिमालय के हिमनदों के पिघलने का भारत के जल-संसाधनों पर किस प्रकार दूरगामी प्रभाव होगा? (2020)
प्रश्न 3. “हिमालय भूस्खलनों के प्रति अत्यधिक प्रवण है।” कारणों की विवेचना कीजिये तथा अल्पीकरण के उपयुक्त उपाय सुझाइये। (2016)
