भारतीय हिमालय क्षेत्र में प्लास्टिक अपशिष्ट संकट | 05 Mar 2024

यह एडिटोरियल 04/03/2024 को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित “Mountains of plastic are choking the Himalayan States” लेख पर आधारित है। इसमें भारतीय हिमालयी क्षेत्र (IHR) में अवैज्ञानिक प्लास्टिक निपटान के हानिकारक प्रभावों की पड़ताल की गई है, जिससे वहाँ मृदा एवं जल प्रदूषण की स्थिति बनी है और जैव विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इसमें इन मुद्दों के शमन के लिये समाधान भी प्रस्तावित किये गए हैं।

प्रिलिम्स के लिये:

एकल उपयोग प्लास्टिक, माइक्रोप्लास्टिक, प्लास्टिक माइक्रोफाइबर, प्लैंकटन, ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक, सर्कुलर इकोनॉमी, प्लास्टिक खाने वाले बैक्टीरिया, विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR), प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016, प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन (संशोधन) नियम, 2022

मेन्स के लिये:

वर्ष 2040 तक प्लास्टिक प्रदूषण को समाप्त करना, पर्यावरण प्रदूषण एवं क्षरण।

उच्चतम पर्वत शिखरों से लेकर गहनतम समुद्री खाइयों तक, प्लास्टिक सर्वव्यापी स्थिति रखता है। इसे मानव फेफड़ों और प्लेसेंटा के अंदर भी पाया गया है। अनुचित तरीके से निपटाए गए प्लास्टिक के बड़े टुकड़ों के क्षरण एवं विखंडन से प्लास्टिक के सूक्ष्म कणों या ‘माइक्रोप्लास्टिक’ (Microplastics) का निर्माण होता है। हिमालय के पहाड़ों, नदियों, झीलों और जलधाराओं में माइक्रोप्लास्टिक का जमाव एवं संचय पाया गया है।

भारतीय हिमालय क्षेत्र (Indian Himalayan Region- IHR) उपमहाद्वीप में जल का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है, जो भारत की कई प्रमुख नदियों को जल प्रदान करता है। इसमें सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी प्रणालियाँ शामिल हैं। अवैज्ञानिक प्लास्टिक निपटान से IHR में मृदा एवं जल प्रदूषण हो रहा है और क्षेत्र की जैव विविधता पर असर पड़ रहा है। इसका ताज़े जल के स्रोतों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है, जिन पर अनुप्रवाह क्षेत्र के समुदाय निर्भर हैं।

भारतीय हिमालय क्षेत्र (IHR):

  • यह भारत के उस पर्वतीय क्षेत्र को संदर्भित करता है जो देश के भीतर संपूर्ण हिमालय शृंखला को दायरे में लेता है। यह भारत के उत्तर-पश्चिमी भाग में जम्मू-कश्मीर से लेकर भूटान, नेपाल और तिब्बत (चीन) जैसे देशों के सीमावर्त्ती पूर्वोत्तर राज्यों तक विस्तृत है।
  • IHR में 11 राज्य (हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड , सिक्किम, सभी पूर्वोत्तर राज्य और पश्चिम बंगाल) और 2 केंद्रशासित प्रदेश (जम्मू-कश्मीर और लद्दाख) शामिल हैं।

IHR में बढ़ते प्लास्टिक प्रदूषण के हालिया संकेतक क्या हैं?

  • SDC की रिपोर्ट:
    • सोशल डेवलपमेंट फॉर कम्युनिटीज़ (SDC) फाउंडेशन (देहरादून) की एक हालिया रिपोर्ट, जिसमें प्लास्टिक अपशिष्ट में दबते उत्तराखंड के शहरों की दुर्दशा को उजागर किया गया है, इस संकट की ओर गंभीर ध्यान आकर्षित करता है।
  • NGT के निष्कर्ष:
    • नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने पर्यटकों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों द्वारा पर्यावरण के प्रति संवेदनशील क्षेत्रों में अपशिष्ट निपटान के संबंध में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC), केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) तथा हिमाचल प्रदेश राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को नोटिस जारी किया।
      • इससे पर्यटकों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों द्वारा बिना किसी रोक-टोक के अपशिष्ट निपटान का मामला सुर्खियों में आया है।
  • रामसर स्थल दीपोर बील (Deepor Beel) का अवलोकन:
    • असम में दीपोर बील रामसर स्थल पर ग्रेटर एडजुटेंट स्टॉर्क या गरुड़ आर्द्रभूमि में मछली के बजाय भराव-क्षेत्र (लैंडफिल) में प्लास्टिक अपशिष्ट खाते देखे गए हैं। मणिपुर में नंबुल सहित विभिन्न नदियों में बढ़ते प्रदूषण की व्यापक रूप से रिपोर्टिंग की गई है।
  • हिमालयन क्लीन अप (वर्ष 2018-21) के ऑडिट परिणाम:
    • ‘इंटीग्रेटेड माउंटेन इनिशिएटिव’ (Integrated Mountain Initiative) और ‘ज़ीरो वेस्ट हिमालयाज़’ (Zero Waste Himalayas) द्वारा आयोजित हिमालयन क्लीन अप (Himalayan Clean up) तथा राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद (National Productivity Council- NPC) के अपशिष्ट एवं ब्रांड ऑडिट द्वारा से पता चलता है कि IHR में प्लास्टिक अपशिष्ट, विशेष रूप से गैर-पुनर्चक्रण योग्य (non-recyclables) अपशिष्ट, की वृद्धि हो रही है।
      • हिमालयन क्लीन अप (2022) अपशिष्ट ऑडिट परिणामों से पता चला कि अपशिष्टों का 92.7% प्लास्टिक था, जिसमें 72% अपशिष्ट गैर-पुनर्चक्रण योग्य प्लास्टिक था।

भारत में प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन से संबंधित चिंताएँ क्या हैं?

  • अति उच्च कुप्रबंधित अपशिष्ट सूचकांक (Mismanaged Waste Index- MWI):
    • भारत ने वर्ष 2023 में 6 जनवरी को ‘प्लास्टिक ओवरशूट डे’ (plastic overshoot day) की स्थिति प्राप्त कर ली, जो विशेष रूप से इसलिये चौंकाने वाला रहा क्योंकि CPCB के विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (Extended Producer Responsibility- EPR) पोर्टल का दावा है कि प्लास्टिक अपशिष्ट से निपटने के लिये एक प्रणालीगत क्षमता मौजूद है। भारत विश्व में (केन्या, नाइजीरिया और मोज़ाम्बिक के बाद) 98.55% के स्तर साथ उच्चतम MWI में से एक रखता है, जो अपशिष्ट प्रबंधन क्षमता एवं प्लास्टिक की खपत में अंतर को प्रकट करता है।
  • अति निम्न अपशिष्ट पुनर्चक्रण दर (Waste Recycling Rate):
    • भारत सरकार का दावा है कि वह 60% प्लास्टिक अपशिष्ट का पुनर्चक्रण करती है। ‘सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट’ (CSE) द्वारा CPCB डेटा का उपयोग कर किये गए सांख्यिकीय विश्लेषण में पाया गया कि भारत अपने प्लास्टिक अपशिष्ट के केवल 12% का पुनर्चक्रण (मैकेनिकल रीसाइक्लिंग के माध्यम से) कर रहा है।
      • इस अपशिष्ट के लगभग 20% भाग का एंड-ऑफ-लाइफ समाधानों- जैसे कि सह-भस्मीकरण (co-incineration), प्लास्टिक से ईंधन निर्माण और सड़क निर्माण के लिये उपयोग किया जाता है। इसका अर्थ यह है कि हम अपने प्लास्टिक अपशिष्ट के 20% का दहन कर रहे हैं लेकिन इसे पुनर्चक्रण कह रहे हैं, जबकि 68% प्लास्टिक अपशिष्ट गणना से बाहर है।
  • पहाड़ों की आवश्यकताओं को चिह्नित करने का अभाव:
    • ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम (SWM) 2016, प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन (PWM) नियम 2016 और EPR 2022 भारत के लिये प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन हेतु नियामक ढाँचे का गठन करते हैं।
    • SWM द्वारा पहाड़ी क्षेत्रों की विशेष आवश्यकताओं को चिह्नित किया जाता है, लेकिन स्थानीय निकायों और उत्पादकों, आयातकों एवं ब्रांड मालिकों (Producers, Importers and Brand Owners- PIBOs) दोनों के लिये अधिदेश बनाते समय इसे ध्यान में नहीं रखा जाता है, जबकि PWM और EPR तो पहाड़ों की विशेष आवश्यकताओं को चिह्नित तक नहीं करते हैं।
  • भराव-क्षेत्र (लैंडफिल) से निक्षालन:
    • अपशिष्ट पृथक्करण (Waste segregation) बस कागज पर मौजूद है, निकट अवलोकन से लैंडफिल मिश्रित अपशिष्ट से भरे हुए दिखाई देते हैं। मिश्रित अपशिष्ट से होने वाला निक्षालन (Leachate) मृदा एवं भूजल प्रदूषण का कारण बनता है, जबकि ऐसे मिश्रित अपशिष्ट कचरे से निकलने वाली गैस वायु प्रदूषण का कारण बनती है। पुनर्चक्रण-योग्य प्लास्टिक अपशिष्ट की भारी मात्रा लैंडफिल में पड़ी रहती है।

IHR में बढ़ते प्लास्टिक प्रदूषण के पीछे के विभिन्न कारण क्या हैं?

  • अपशिष्ट संग्रहण की अकुशल अवसंरचना:
    • नीति आयोग और विश्व बैंक की विभिन्न रिपोर्ट का अनुमान है कि IHR वर्तमान में प्रति वर्ष पाँच से आठ मिलियन मीट्रिक टन से अधिक अपशिष्ट उत्पन्न करता है। वर्ष 2010 के बाद से उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में 400 मिलियन से अधिक पर्यटकों का आगमन हुआ और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के मामले में ये सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले राज्यों में शामिल हैं।
      • अकुशल अपशिष्ट संग्रहण और अवसंरचना के कारण 60% से अधिक अपशिष्ट गंगा, यमुना एवं सतलज जैसी प्रमुख नदियों में फेंक दिये जाते हैं, उन्हें जला दिया जाता है या नदी अनुप्रवाह में बहा दिया जाता है।
      • अपशिष्ट के निपटान का स्थानीय वनस्पतियों एवं जीवों की 30,000 से अधिक प्रजातियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है, जिनमें से कुछ दुर्लभ हैं और विलुप्त होने के कगार पर हैं।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में उपभोग पैटर्न में बदलाव:
    • हाल के दशकों में टिकाऊ एवं उपभोग्य वस्तुएँ (durables and consumables)—विशेष रूप से बहुस्तरीय प्लास्टिक पैकेजिंग में उपलब्ध फास्ट-मूविंग उपभोक्ता वस्तुएँ (FMCGs), हिमालय क्षेत्र के अधिकांश ग्रामों तक पहुँच गई हैं। कपड़े, लकड़ी, पत्ते, बाँस और अन्य स्थानीय सामग्रियों से बने घरेलू उत्पाद बड़े पैमाने पर सस्ते प्लास्टिक उत्पादों से प्रतिस्थापित होते जा रहे हैं।
      • उदाहरण के लिये, उत्तरकाशी में गोविंद वन्यजीव अभयारण्य (एक हिम तेंदुआ संरक्षण क्षेत्र) के अंदर बसी आबादी और हर वर्ष वहाँ आने वाले हज़ारों पर्यटक प्रति माह 15 मीट्रिक टन से अधिक शुष्क अपशिष्ट उत्पन्न करते हैं, जिन्हें या तो जंगल/नदी/पहाड़ में डंप कर दिया जाता है या उन्हें जलाया जाता है। 
  • पर्यटकों की भारी आमद और एकल-उपयोग उत्पाद:
    • सड़क, ट्रेन और हवाई मार्ग से यात्रा के विकल्पों की वृद्धि के साथ हिमालयी राज्यों में पर्यटकों का आगमन तेज़ी से बढ़ रहा है। इसके अतिरिक्त, वे अधिक सुदूर ग्रामीण स्थलों और ट्रैकिंग मार्गों पर जाने लगे हैं। उनके शहरी उपभोग पैटर्न स्थानीय निवासियों को प्रेरित करते हैं कि वे पर्यटन, खाद्य एवं आतिथ्य क्षेत्रों द्वारा उत्पन्न बड़ी मांग को पूरा करने के लिये पैकेज्ड FMCGs, पॉलीइथाइलीन टेरेफ्थेलेट (PET) बोतलें और एकल-उपयोग प्लास्टिक की खरीद-बिक्री से संलग्न हों। इससे पर्यटन क्षेत्रों में और उसके आसपास बड़े पैमाने पर कूड़ा-कचरा फैलाने, उनकी डंपिंग और उनके दहन की स्थिति बनी है।
  • लॉजिस्टिक्स आदि के लिये दुर्गम क्षेत्र:
    • दुर्गम हिमालयी इलाके दैनिक परिचालन की लागत को बढ़ाते हैं, परिवहन लॉजिस्टिक्स को जटिल बनाते हैं और निकटतम रीसाइक्लिंग कारख़ानों तक पहुँच को कठिन बनाते हैं। IHR में सूखे अपशिष्ट प्रसंस्करण (सामग्री पुनर्प्राप्ति सुविधाओं) और गीले अपशिष्ट प्रसंस्करण (खाद या बायोगैस इकाइयों) की कमी है। निर्दिष्ट अनौपचारिक डंपिंग पॉइंट आमतौर पर नदी तट के आसपास होते हैं ताकि मानसून के दौरान अपशिष्ट बह सके।
  • विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) की पहुँच का अभाव:
    • भले ही पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2016 के तहत EPR अधिदेश के एक हिस्से के रूप में FMCG ब्रांडों के लिये अपने प्लास्टिक अपशिष्ट के लिये रिवर्स लॉजिस्टिक्स (reverse logistics) की स्थापना एवं समर्थन को अनिवार्य बनाया है, लेकिन अधिकांश ब्रांड संग्रह की उच्च लागत के कारण पहाड़ी क्षेत्र में रिवर्स लॉजिस्टिक्स में निवेश नहीं करते हैं। 
      • इसके अलावा, इन ग्रामों में उपलब्ध कई उत्पाद स्थानीय ब्रांडों द्वारा उत्पादित किये जाते हैं, जिनके पास रिवर्स लॉजिस्टिक्स में निवेश करने की क्षमता नहीं है। पर्यटक अपने साथ अधिक लोकप्रिय ब्रांडों के उत्पाद लेकर आते हैं और जो अपशिष्ट वे छोड़ जाते हैं, उसका संग्रहण या पुनर्चक्रण नहीं किया जाता है।
  • नीति प्रवर्तन और अभिसरण का अभाव:
    • IHR में अपशिष्ट संग्रह व्यवस्थित नहीं है और अपशिष्ट को तुरंत या तो निर्दिष्ट स्थलों पर फेंक दिया जाता है (जहाँ पर्यावरणीय मंज़ूरी नहीं होती है) या सीधे नदी अनुप्रवाह में बहा दिया जाता है। अनौपचारिक कचरा बीनने वाले और स्क्रैप डीलर सामग्री पुनर्प्राप्ति में प्रमुख भूमिका निभाते हैं, लेकिन वे केवल पीईटी प्लास्टिक, धातु, कार्डबोर्ड एवं काँच जैसी उच्च मूल्य वाली सामग्री में ही रुचि रखते हैं।
      • इसके अतिरिक्त, इस तरह का कचरा उठाव शहरी एवं पर्यटन क्षेत्रों तक ही सीमित है। स्थानीय और अस्थायी आबादी द्वारा तेज़ी से बढ़ते अपशिष्ट उत्पादन का प्रबंधन कर सकने के लिये अधिकांश ग्राम पंचायतें एवं ग्राम या प्रखंड विकास पदाधिकारी पर्याप्त साधनों का अभाव रखते हैं।
  • सरकारी विभागों के बीच अप्रभावी सहयोग :
    • विभिन्न सरकारी विभागों के बीच प्रभावी सहयोग की कमी एक बड़ी चुनौती है। उदाहरण के लिये, पेयजल और स्वच्छता विभाग ‘स्वच्छ भारत मिशन- ग्रामीण’ की निगरानी करता है, जो प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन इकाई के निर्माण के लिये प्रति प्रखंड 16 लाख रुपए प्रदान करता है। इन निधियों का सर्वोत्तम उपयोग सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी पंचायती राज विभाग को सौंपी गई है।
      • हालाँकि, स्वजल (SWAJAL) की भूमिका इकाई के निर्माण तक ही सीमित है और इस बारे में अनिश्चितता है कि इसके संचालन का प्रबंधन कौन करेगा। ग्राम प्रधान इन अनुदानों का उपयोग रोज़मर्रा के कार्यों के लिये करने में संकोच रखते हैं क्योंकि ऐसी गतिविधियों के लिये इसके पूरा होने के प्रमाण (जियोटैगिंग के माध्यम से) की आवश्यकता होती है, जो नियमित कार्यों के लिये संभव नहीं है।
  • सामाजिक कलंक और अनौपचारिक आजीविका:
    • आजीविका के साधन के रूप में कचरा बीनने से एक सामाजिक कलंक जुड़ा हुआ है। अधिकांश शहरी क्षेत्रों में अनौपचारिक प्रवासी श्रमिक अपशिष्ट संग्रहण एवं पृथक्करण के कार्य में संलग्न होते हैं। हालाँकि, ग्रामीण क्षेत्र इन प्रवासी श्रमिकों को आकर्षित नहीं करते हैं, जिससे संकट और बढ़ जाता है जो युद्ध स्तर पर तत्काल निवारण की आवश्यकता रखता है।
  • अपर्याप्त वित्तपोषण क्षमता:
    • ध्यान देने योग्य एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारक यह है कि ‘स्वच्छ भारत मिशन- ग्रामीण’ के दिशानिर्देशों के तहत केंद्र सरकार द्वारा ग्राम पंचायतों को प्रदान की जाने वाली प्रति व्यक्ति राशि अधिक जनसंख्या घनत्व वाले मैदानी क्षेत्र के गाँवों की तुलना में पहाड़ी क्षेत्रों में व्यापक रूप से फैली आबादी और दुर्गम इलाके के खर्च को पूरा करने के लिये अपर्याप्त है। 

IHR में संकट के शमन के लिये किन क़दमों की आवश्यकता हैं?

  • पर्याप्त निवेश सुनिश्चित करना:
    • समस्या की प्रणालीगत प्रकृति का अर्थ यह है कि इसके लिये किसी एक संस्था या हितधारक को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। निश्चित रूप से, IHR में अपशिष्ट प्रबंधन समस्या को हल करने की तत्काल आवश्यकता है, लेकिन इस दिशा में मौजूदा प्रयास मुद्दे के पैमाने के अनुरूप नहीं हैं।
      • समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने में महत्त्वपूर्ण वैश्विक निवेश से प्रेरणा ग्रहण करते हुए, यह उपयुक्त समय है कि हम वृहत हिमालय की रक्षा के लिये भी आवश्यक संसाधनों का निवेश करें।
  • ग्रामीण निवासियों के साथ समन्वय:
    • अपशिष्ट प्रदूषण के कारण होने वाली पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के अलावा, ग्राम पंचायतों, ग्राम विकास अधिकारियों और राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन जैसी राष्ट्रीय संस्थाओं को इस कलंक को दूर करने के लिये ग्रामीण निवासियों के साथ समन्वयन एवं कार्य करना चाहिये तथा उनके लिये अपशिष्ट संग्रहण संचालन, सामग्री पुनर्प्राप्ति और वैकल्पिक उत्पादों के लिये बाज़ार संपर्क के विषय में आजीविका के अवसर पैदा करने के प्रयासों का समर्थन करना चाहिये। 
  • KGGTF के सहयोग से विश्व बैंक का अध्ययन:
    • विश्व बैंक ने कोरियन ग्रीन ग्रोथ ट्रस्ट फंड (KGGTF) के सहयोग से डेटा अंतराल को दूर करने और भारत, नेपाल एवं पाकिस्तान के पर्वतीय क्षेत्रों में वर्तमान प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन (PWM) स्थिति का विश्लेषण करने के लिये एक क्षेत्रीय अध्ययन आयोजित किया।
      • अध्ययन की एक प्रमुख अनुशंसा एक व्यवस्थित एवं चरणबद्ध दृष्टिकोण अपनाना है जो भारत, नेपाल और पाकिस्तान के पर्वतीय क्षेत्रों में PWM सेवाओं में सुधार पर लक्षित हो।
        • वह दृष्टिकोण सबसे उपयुक्त होगा जिसमें चरणबद्ध तरीके से कार्य किया जाता है, क्योंकि SWM से संबंधित कई ऐसी गतिविधियाँ हैं जो एक साथ की जाती हैं।
        • एक बहु-स्तरीय प्रक्रिया यह सुनिश्चित करती है कि सरकार और अन्य भागीदार अपशिष्ट प्रबंधन चक्र में सभी गतिशील भागों का प्रबंधन करने में सक्षम हैं, जिसमें संस्थागत क्षमता, नीति निर्माण एवं प्रवर्तन, अपशिष्ट उत्पादकों के व्यवहार को प्रभावित करना और प्रौद्योगिकियों में सुधार करना शामिल है।
  • राज्य विशिष्ट पहलों को अपनाने की आवश्यकता:
    • IHR के राज्य भी इस संकट के शमन के लिये विधि निर्माण सहित विभिन्न पहलें कर रहे हैं, जिन्हें अन्य राज्यों द्वारा भी अपनाये जाने की आवश्यकता है।
      • हिमाचल प्रदेश और सिक्किम में प्लास्टिक के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने वाले विशेष राज्य कानून लागू किये गए हैं।
        • हिमाचल प्रदेश में वर्ष 2019 से गैर-पुनर्चक्रण योग्य और एकल-उपयोग प्लास्टिक अपशिष्ट के लिये एक पुनर्खरीद या ‘बाय बैक’ नीति (buy back policy) अपनाई गई है।
        • सिक्किम ने जनवरी 2022 से पैकेज्ड मिनरल वाटर के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है और इस दिशा में एक मज़बूत नियामक प्रणाली रखता है।
        • मिज़ोरम नियामक मोर्चे पर पर्याप्त सक्रिय रहा है जहाँ आइज़ोल नगर निगम ने वर्ष 2019 में PWM के तहत उपनियम बनाए।
        • त्रिपुरा ने नीति में बदलाव किये हैं, नगरपालिका उपनियम बनाए हैं और एकल उपयोग प्लास्टिक के उन्मूलन के लिये एक राज्य-स्तरीय कार्यबल स्थापित किये हैं।
  • विभिन्न प्रकार के प्लास्टिकों का पृथक्करण:
    • SWM/PWM/EPR के सामूहिक अधिदेश के तहत स्रोत पर अपशिष्ट पृथक्करण की आवश्यकता होती है। वैज्ञानिक एवं संवहनीय तरीके से प्लास्टिक अपशिष्ट के निपटान की किसी भी रणनीति के लिये न केवल प्लास्टिक का अन्य अपशिष्टों से बल्कि विभिन्न प्रकार के प्लास्टिकों का पृथक्करण एक पूर्व-शर्त है।
      • अपशिष्ट का पृथक्करण और इस प्रयास में लोगों की भागीदारी के साथ ही सतत जनजागरूकता अभियान अनिवार्य शर्त है।
  • स्थानीय निकायों को शक्तियाँ हस्तांतरित करना:
    • SWM, PWM और EPR के तहत अपशिष्ट प्रबंधन (उनके संग्रहण से लेकर वैज्ञानिक निपटान तक) करना स्थानीय निकायों का कर्तव्य है। वे प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली की स्थापना और संचालन के लिये PIBOs से मदद ले सकते हैं, जैसा EPR के तहत निर्दिष्ट है। स्थानीय निकाय देश में अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली की धुरी हैं, लेकिन उन्हें अभी भी शक्ति का आनुपातिक हस्तांतरण नहीं किया गया है। 
      • IHR में PIBO द्वारा अर्जित EPR प्रमाणपत्र का मूल्य (संसाधित प्रति टन प्लास्टिक अपशिष्ट के लिये) देश के शेष हिस्सों में अर्जित प्रमाणपत्र से अधिक हो सकता है।
  • पारंपरिक संस्थानों को शामिल करना:
    • IHR के संबंध में पारंपरिक संस्थानों को स्थानीय निकायों की परिभाषा में शामिल करने की आवश्यकता है (जैसा पूर्वोत्तर के कई राज्यों में प्रचलित है)। यह ध्यान रखना महत्त्वपूर्ण है कि स्वच्छ भारत मिशन (SBM) और पंद्रहवें वित्त आयोग के तहत इन पारंपरिक संस्थानों को धन आवंटित किया गया था।
    • कुछ ही राज्यों ने मॉडल उप-कानून बनाए हैं और कुछ ही स्थानीय निकायों ने अधिदेश को क्रियान्वित करने के लिये स्वयं उप-कानून बनाए हैं। स्थानीय निकायों और PIBOs के बीच सहयोग सुनिश्चित करने के अधिदेश के संबंध में स्पष्टता का अभाव है।
  • समृद्ध जैव विविधता को अपशिष्ट प्रबंधन के साथ एकीकृत करना:
    • उचित संसाधन आवंटन और समर्थन की आवश्यकता है जो पर्वतीय अपशिष्ट प्रबंधन की विशिष्ट भौगोलिक चुनौतियों को ध्यान में रखने के अलावा IHR की समृद्ध जैव विविधता, पारिस्थितिक संवेदनशीलता एवं भंगुरता को ध्यान में रखे और इसे प्रतिबिंबित करे।
  • डेटा अंतराल को दूर करना:
    • भारतीय हिमालयी क्षेत्र के राज्यों में उत्पन्न अपशिष्ट की मात्रा एवं गुणवत्ता के संदर्भ में डेटा अंतराल को दूर किया जाना चाहिये। SBM जैसे पहले से मौजूद कार्यक्रमों में अभिसरण, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम 2005 और वित्त आयोग के अनुदान का उपयोग बुनियादी ढाँचे के निर्माण, रखरखाव एवं परिचालन के क्रियान्वयन के लिये किया जा सकता है।
  • त्वरित आधार पर संसाधन वृद्धि:
    • परोपकारी योगदान और कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व निधि के प्रणालीगत प्रबंधन के लिये स्थापित ‘स्वच्छ भारत कोष ट्रस्ट’ का उपयोग संसाधन वृद्धि (Resource augmentation) के लिये भी किया जा सकता है।
    • कायाकल्प और शहरी परिवर्तन के लिये अटल मिशन (AMRUT) और स्मार्ट सिटी योजना जिसके तहत भारतीय हिमालयी क्षेत्र के कई शहरों का चयन किया गया है, वैज्ञानिक अपशिष्ट प्रबंधन और भारतीय हिमालयी क्षेत्र के शहरों को प्लास्टिक मुक्त बनाने के मुद्दे पर भी अभिसरण में कार्य कर सकते हैं। 

प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन से संबंधित विभिन्न पहलें कौन-सी हैं?

निष्कर्ष:

उच्चतम पर्वत शिखरों से लेकर गहनतम समुद्री खाइयों तक और यहाँ तक कि मानव शरीर के अंदर भी प्लास्टिक की सर्वव्यापी उपस्थिति कार्रवाई की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती है। प्लास्टिक के अनुपयुक्त निपटान से माइक्रोप्लास्टिक का निर्माण होता है जो भारतीय उपमहाद्वीप के हिमालय पर्वतमाला और नदियों, झीलों, जलधाराओं में पाए जा रहे हैं। बेहतर डेटा संग्रह और संसाधन आवंटन, विशेष रूप से पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में, की प्रबल आवश्यकता है। सफल अपशिष्ट पृथक्करण एवं प्रबंधन के लिये सार्वजनिक शिक्षा और सामुदायिक भागीदारी महत्त्वपूर्ण है। पर्वतीय क्षेत्रों में उच्च मूल्य युक्त EPR प्रमाणपत्रों की संभावना को देखते हुए स्थानीय निकायों और उत्पादकों के बीच सहयोग भी आवश्यक है।

अभ्यास प्रश्न: ताज़े जल के स्रोतों और जैव विविधता पर प्लास्टिक अपशिष्ट के प्रभाव को देखते हुए भारतीय हिमालय क्षेत्र किस प्रकार इसका प्रभावी ढंग से प्रबंधन कर सकता है? मौजूदा नीतियों और चुनौतियों के संदर्भ में चर्चा कीजिये।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न   

प्रश्न. पर्यावरण में मुक्त हो जाने वाली सूक्ष्म कणिकाओं (माइक्रोबीड्स) के विषय में अत्यधिक चिंता क्यों है? (2019) 

(a) ये समुद्री पारितंत्रों के लिये हानिकारक मानी जाती हैं।
(b) ये बच्चों में त्वचा कैंसर का कारण मानी जाती हैं।
(c) ये इतनी छोटी होती हैं कि सिंचित क्षेत्रों में फसल पादपों द्वारा अवशोषित हो जाती हैं।
(d) अक्सर इनका इस्तेमाल खाद्य पदार्थों में मिलावट के लिये किया जाता है।

उत्तर: (a) 


प्रश्न. भारत में निम्नलिखित में से किसमें एक महत्त्वपूर्ण विशेषता के रूप में 'विस्तारित उत्पादक दायित्त्व' आरंभ किया गया था? (2019) 

(a) जैव चिकित्सा अपशिष्ट (प्रबंधन और हस्तन) नियम, 1998
(b) पुनर्चक्रित प्लास्टिक (विनिर्माण और उपयोग) नियम, 1999
(c) ई-वेस्ट (प्रबंधन और हस्तन) नियम, 2011
(d) खाद्य सुरक्षा और मानक विनियम, 2011

उत्तर: (c) 


प्रश्न. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एन.जी.टी) किस प्रकार केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सी.पी.सी.बी) से भिन्न है? (2018)

  1. एन.जी.टी का गठन एक अधिनियम द्वारा किया गया है, जबकि सी.पी.सी.बी का गठन सरकार के कार्यपालक आदेश से किया गया है।
  2.  एन.जी.टी पर्यावरणीय न्याय उपलब्ध करता है तथा उच्चतर न्यायालयों में मुकदमों के भार को कम करने में सहायता करता है, जबकि सी.पी.सी.बी झरनों तथा कुँओं की सफाई को प्रोत्साहित करता है, तथा देश में वायु की गुणवत्ता में सुधार लाने का लक्ष्य रखता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (b)