गहरे महासागरीय भागों में माइक्रोप्लास्टिक

प्रीलिम्स के लिये:

माइक्रोप्लास्टिक, थर्मोहैलाइन सर्कुलेशन

मेन्स के लिये:

थर्मोहैलाइन सर्कुलेशन एवं पर्यावरणीय प्रदूषण 

चर्चा में क्यों:

हाल ही में शोधकर्त्ताओं ने एक अध्ययन में सागरीय जैव विविधता के हॉटस्पॉट माने जाने वाले गहरे समुद्री क्षेत्रों में प्लास्टिक प्रदूषण के कारण 'माइक्रोप्लास्टिक हॉटस्पॉट' बनने की संभावना व्यक्त की है।

प्रमुख बिंदु:

  • माइक्रोप्लास्टिक को समुद्री सतह के लिये एक प्रमुख प्रदूषक माना जाता है, लेकिन समुद्र के गहरे भागों में इसके विसरण तथा संकेंद्रण को नियंत्रित करने वाली प्रक्रियाओं के संबंध में सटीक जानकारी का अभाव है।
  • शोधकर्त्ताओं द्वारा माइक्रोप्लास्टिक के स्थानिक वितरण एवं इसके गहरे समुद्र में अवतलन की प्रक्रिया तथा गहरे महासागरों के जैव विविधता हॉटस्पॉट पर इसके प्रभावों का अध्ययन किया गया है। 

माइक्रोप्लास्टिक (Microplastic):

  • माइक्रोप्लास्टिक्स पाँच मिलीमीटर से भी छोटे आकर के प्लास्टिक के टुकड़ें होते हैं। इसमें माइक्रोबीड्स भी (एक मिलीमीटर से कम आकार के ठोस प्लास्टिक कण) शामिल हैं जो सौंदर्य प्रसाधन, व्यक्तिगत देखभाल उत्पादों, औद्योगिक प्रक्रियाओं से उत्पन्न हो सकते हैं।
  • सौंदर्य प्रसाधन तथा व्यक्तिगत देखभाल उत्पादों के अलावा अधिकांश माइक्रोप्लास्टिक्स का निर्माण ऐसे प्लास्टिक, जिनका पुनर्नवीनीकरण नहीं किया जा सकता है, के सूर्य के तापन या अन्य भौतिक क्रियाओं के कारण टूटने से होता है।

शोध के प्रमुख निष्कर्ष:

  • ऐसा माना गया है की जिस प्रकार 'थर्मोहैलाइन सर्कुलेशन' (Thermohaline Circulations) अवसादों के समुद्र तल में जमाव में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है उसी प्रकार यह माइक्रोप्लास्टिक के वितरण को नियंत्रित करके माइक्रोप्लास्टिक हॉटस्पॉट का निर्माण कर सकता है।
  • थर्मोहैलाइन सर्कुलेशन से उत्पन्न धाराएँ गहरे सागरीय भागों में ऑक्सीजन तथा पोषक तत्वों की आपूर्ति करती हैं, इसलिये गहरे सागरीय भागों के 'जैव विविधता हॉटस्पॉट' के  'माइक्रोप्लास्टिक हॉटस्पॉट' में बदलने की संभावना है।
  • इन गहरे सागरीय भागों में पाए जाने बेंथोस अर्थात तलीय जीव माइक्रोप्लास्टिक से प्रभावित हो सकते हैं।

थर्मोहैलाइन सर्कुलेशन (Thermohaline Circulations):

  • महासागरीय धाराएँ सामान्यत: समुद्री सतह से 100 मीटर ऊँचाई तक चलने वाली वायु द्वारा उत्पन्न होती हैं। हालाँकि समुद्र के गहरे भागों में भी समुद्री धाराएँ पाई जाती हैं। 
  • सागरीय धाराओं को उनकी गहराई के आधार पर 2 वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है:
  • सतही धाराएँ (Surface Currents): 
    • ये धाराएँ महासागरीय सतह से 400 मीटर गहराई तक चलती हैं तथा महासागरों के संपूर्ण जल के लगभग 10% भाग का प्रतिनिधित्त्व करती हैं।
  • गहरी महासागरीय धाराएँ (Deep Ocean Currents): 
    • ये धाराएँ 90% समुद्री जल का वहन करती हैं। ये धाराएँ पानी के घनत्व में अंतर से उत्पन्न होती हैं, जिसे तापमान (Thermo) और लवणता (Haline) द्वारा नियंत्रित किया जाता है।
    • इस घनत्व में अंतर के कारण उत्पन्न होने वाली सागरीय धाराओं की प्रक्रिया को थर्मोहैलाइन सर्कुलेशन के रूप में जाना जाता है।
  • ध्रुवीय क्षेत्रों में सागरीय जल के शीतित होने पर हिम का निर्माण होता है जिससे इन क्षेत्रों में सागरीय जल की लवणता बढ़ जाती है। यह ध्यातव्य है कि जल के हिम में बदलने पर लवण अवशिष्ट के रूप में रह जाता है। 
  • सागरीय जल की लवणता बढ़ने पर जल का घनत्व भी बढ़ जाता है तथा सागरीय जल भारी होने के कारण अवतलित होने लगता है इससे ध्रुवीय क्षेत्र की ओर विषुवतीय सतही जल अपवाहित होने लगता है ताकि प्रतिसंतुलन बना रहे। इस प्रकार गहरे सागरीय भागों में समुद्री धाराएँ उत्पन्न हो जाती है।

Thermohaline-circulation

आगे की राह:

  • सिंगल यूज प्लास्टिक’ (Single Use Plastic) जैसे- प्लास्टिक की थैलियाँ, स्ट्रॉ, सोडा और पानी की बोतलें तथा अधिकांशतः खाद्य पैकेजिंग के लिये प्रयुक्त होने वाली प्लास्टिक के उपयोग में कमी को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है क्योंकि यह प्लास्टिक प्रदूषण का प्रमुख तथा खतरनाक स्रोत है।
  • प्लास्टिक के पुन: चक्रण को बढ़ावा देने वाली परियोजनाओं के लिये कर छूट, अनुसंधान, सार्वजनिक-निजी भागीदारी आदि को समर्थन देने की आवश्यकता है।
  • जैव-निम्नीकरणीय प्लास्टिक के निर्माण को, जैसे बैगास (गन्ने से रस निकालने के बाद का अवशेष) को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।

स्रोत: द हिंदू