अवसंरचना और लॉजिस्टिक्स – भारत की प्रतिस्पर्द्धात्मक वृद्धि के प्रेरक बल | 11 Feb 2026

यह लेख 01/02/2026 को द हिंदू के बिजनेस लाइन में प्रकाशित “Driving mobility through infrastructure and green growth” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख इस बात का विश्लेषण करता है कि बजट 2026 की बुनियादी ढाँचे पर आधारित, हरित और गतिशीलता केंद्रित रणनीति किस प्रकार भारत की लॉजिस्टिक दक्षता, औद्योगिक प्रतिस्पर्द्धा और दीर्घकालिक विकास पथ को नया आकार दे रही है।

प्रिलिम्स के लिये: पीएम गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान, यूनिफाइड लॉजिस्टिक्स इंटरफेस प्लेटफॉर्म, इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट, गति शक्ति कार्गो टर्मिनल, बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम

मेन्स के लिये: अवसंरचना और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में प्रमुख घटनाक्रम, प्रमुख मुद्दे और आवश्यक उपाय।

वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के परिवेश में भी भारत तीव्र विकास मार्ग पर अग्रसर है और इसी परिप्रेक्ष्य में केंद्रीय बजट 2026 अवसंरचना तथा गतिशीलता-आधारित विकास की ओर एक स्पष्ट नीतिगत संकेत को दर्शाता है। सार्वजनिक पूंजीगत व्यय, विनिर्माण क्षमता के सुदृढ़ीकरण और हरित विकास को बढ़ावा देकर, यह बजट वृहद आर्थिक स्थिरता को वास्तविक क्षेत्र की गति में परिवर्तित करने का प्रयास करता है। अवसंरचना को अब केवल राजकोषीय प्रोत्साहन के साधन के रूप में नहीं, बल्कि लॉजिस्टिक्स दक्षता, क्षेत्रीय समेकन और रोज़गार सृजन के बहुगुणक के रूप में देखा जा रहा है। इस संदर्भ में, गतिशीलता औद्योगिक विस्तार, शहरीकरण और सतत विकास को जोड़ने वाले एक रणनीतिक उत्प्रेरक के रूप में उभरती है।

भारत में अवसंरचना और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में नवीनतम घटनाक्रम क्या हैं?

  • लॉजिस्टिक्स नीति के लाभ और लागत में कमी: पहली बार, समन्वित नीतिगत हस्तक्षेपों ने ठोस परिणाम दिये हैं, जिससे उच्च लॉजिस्टिक्स लागत की संरचनात्मक बाधा दूर हुई है, जिसने ऐतिहासिक रूप से भारतीय निर्यात को बाधित किया था। 
  • रणनीतिक रेलवे आधुनिकीकरण और हाई-स्पीड कॉरिडोर: नेटवर्क विस्तार से हटकर अब उच्च दक्षता के लिये यात्री और माल ढुलाई यातायात को अलग करने के उद्देश्य से उच्च घनत्व वाली तीव्र कनेक्टिविटी पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है।
    • यह द्वि-आयामी दृष्टिकोण मौजूदा मार्गों पर भीड़ घटाने के साथ आर्थिक केंद्रों हेतु समर्पित उच्च-गति मूल्य शृंखलाएँ निर्मित करता है।
    • बजट 2026-27 में दिल्ली-वाराणसी (3 घंटे 50 मिनट) और मुंबई-पुणे (48 मिनट) सहित 7 नए हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर प्रस्तावित किये गए हैं, जिनका उद्देश्य यात्रा के समय को 60-70% तक कम करना है।
  • हरित अवसंरचना एवं ऊर्जा संक्रमण में तीव्रता: सरकार अवसंरचना एवं गतिशीलता में स्थिरता का समावेशन करते हुए नेट-ज़ीरो 2070 लक्ष्य के अनुरूप 'ग्रे' परियोजनाओं से 'हरित' अनुकूलित प्रणालियों की ओर संक्रमण कर रही है। 
    • यह हरित विकास रणनीति औद्योगिक परिसंपत्तियों के दीर्घकालिक कार्बन जोखिम को कम करती है।
    • कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन एवं स्टोरेज (CCUS) हेतु 20,000 करोड़ रुपये का प्रावधान तथा वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा परिचालन का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
    • पीएम सूर्य घर योजना का आवंटन बढ़ाकर 22,000 करोड़ रुपये (वित्त वर्ष 2027) किया गया है, जिससे 1 करोड़ परिवारों तक विकेंद्रीकृत विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके।
      • साथ ही, वित्त वर्ष 2022 से 2025 की शुरुआत के बीच सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशनों की संख्या लगभग 5,000 से बढ़कर 26,000 से अधिक हो गई है।
  • बंदरगाह आधारित विकास और अंतर्देशीय जलमार्ग: महंगे सड़क परिवहन की हिस्सेदारी को कम करने और कार्बन फुटप्रिंट को घटाने के लिये तटीय शिपिंग और अंतर्देशीय जलमार्गों की ओर निर्णायक संक्रमण हो रहा है।
    • इस रणनीति का उद्देश्य भारत की तटरेखा और नदी प्रणालियों को सस्ते, वैकल्पिक माल ढुलाई मार्गों के रूप में सक्रिय करना है।
    • बजट 2026 में 20 नए राष्ट्रीय जलमार्गों के संचालन का प्रस्ताव रखा गया है तथा माल परिवहन को सड़क से जलमार्गों पर स्थानांतरित करने हेतु एक तटीय माल ढुलाई प्रोत्साहन योजना आरंभ की गई है।
    • इसके साथ ही, वाराणसी और पटना में नए जहाज़ मरम्मत आधारित प्राणाली विकसित की जा रही है।
  • सड़क अवसंरचना - पहुँच-नियंत्रित दक्षता: NHAI की रणनीति साधारण लेन विस्तार से आगे बढ़कर पहुँच-नियंत्रित आर्थिक गलियारों के निर्माण पर केंद्रित हो गई है, जो माल ढुलाई के लिये उच्च गति वाली धमनियों के रूप में कार्य करते हैं। 
    • अब प्राथमिकता 'रिंग रोड' और बाईपास पर केंद्रित है ताकि शहरी यातायात को लंबी दूरी की माल ढुलाई से अलग किया जा सके।
      • उदाहरण के लिये, MoRTH (वित्त वर्ष 2027) को ₹3.09 लाख करोड़ आवंटित किये गए, जिसका लक्ष्य 2025-26 में 10,000 किलोमीटर राजमार्गों का निर्माण करना है।
    • दिल्ली -मुंबई एक्सप्रेसवे, जो अब प्रमुख हिस्सों में पूरी तरह से चालू है, मुंबई और दिल्ली के बीच यात्रा के समय को 24 घंटे से घटाकर 12 घंटे कर देगा, जिससे शीघ्र खराब होने वाली वस्तुओं का परिवहन अधिक कुशल हो सकेगा।
  • लॉजिस्टिक्स में डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI): भारत अवसंरचना के वित्तीयकरण और डिजिटलीकरण को एक साथ आगे बढ़ाते हुए, परियोजना जोखिम घटाने और निजी पूंजी आकर्षित करने हेतु DPI का रणनीतिक उपयोग कर रहा है।
    • इसके माध्यम से एक पारदर्शी डेटा लेयर निर्मित होती है, जो वास्तविक समय निगरानी को सक्षम बनाती है और अवसंरचना विकासकर्त्ताओं तक ऋण के तीव्र प्रवाह को सुनिश्चित करती है।
    • ONDC पर 'लॉजिस्टिक्स ऐज़ अ सर्विस' के एकीकरण ने क्लोज्ड-लूप आपूर्ति शृंखलाओं के एकाधिकार को तोड़ा है, जिससे MSME को पे-पर-यूज़ आधार पर एंटरप्राइज़-ग्रेड डिलीवरी नेटवर्क (जैसे Delhivery या Dunzo) तक पहुँच संभव हुई है।
    • पीएम गति शक्ति प्लेटफॉर्म अब 57 मंत्रालयों के अंतर्गत फैली 1,700 से अधिक डेटा लेयर्स को समाहित करता है, जिसके परिणामस्वरूप NHAI जैसी एजेंसियों के लिये परियोजना नियोजन की अवधि महीनों से घटकर कुछ सप्ताह रह गई है।
  • नागरिक उड्डयन – वैश्विक MRO और सीप्लेन हब की ओर संक्रमण: सरकार पारंपरिक हवाई अड्डा निर्माण से आगे बढ़कर एक समग्र 'डिज़ाइन-टू-मेंटेनेंस' तंत्र विकसित कर रही है, ताकि विदेशी विमानों की सर्विसिंग पर होने वाले भारी विदेशी मुद्रा व्यय को कम किया जा सके।
    • कर-संबंधी अवरोधों को हटाकर, भारत स्वयं को दक्षिण एशिया तथा उससे आगे के क्षेत्रों के लिये प्रमुख विमानन सेवा केंद्र के रूप में स्थापित कर रहा है।
    • बजट 2026-27 में विमान पुर्जों और MRO के लिये कच्चे माल पर शून्य आधार सीमा शुल्क की घोषणा की गई है, जिससे वर्ष 2031 तक यात्रियों की अनुमानित वृद्धि (665 मिलियन तक) को समर्थन मिलेगा।
    • एयर इंडिया और इंडिगो द्वारा बंगलूरू में बड़े पैमाने पर नागरिक MRO (मॉर्गेज ऑन रॉ) सुविधाएँ विकसित की जा रही हैं, जिनका उद्देश्य घरेलू स्तर पर वाइड-बॉडी विमानों की सर्विसिंग क्षमता का निर्माण करना है।
  • ऊर्जा भंडारण – बैटरी अवसंरचना में दस गुना विस्तार: लक्षित 500 गीगावाट नवीकरणीय ग्रिड की अंतरालिक प्रकृति से निपटने के लिये विशाल भंडारण क्षमताओं को जोड़कर अवसंरचना को भविष्य-सुरक्षित बनाया जा रहा है।
    • उत्पादन से स्थिरीकरण की ओर यह संक्रमण सुनिश्चित करता है कि औद्योगिक लॉजिस्टिक्स को 24×7 हरित ऊर्जा की उपलब्धता हो, जो वैश्विक ESG मानकों के अनुरूपता हेतु आवश्यक है।
    • भारत में बैटरी ऊर्जा भंडारण क्षमता वर्ष 2026 तक दस गुना बढ़कर 5 गीगावाट-घंटा तक पहुँचने की संभावना है, जिसे 30 गीगावाट-घंटा के स्टैंडअलोन BESS हेतु 5,400 करोड़ रुपये के व्यवहार्यता अंतर वित्त पोषण (VGF) द्वारा समर्थित किया गया है।
      • साथ ही, क्षेत्रीय औद्योगिक ग्रिड को सुदृढ़ करने के लिये अदानी समूह गुजरात में विश्व की सबसे बड़ी एकल-स्थान BASS परियोजनाओं (3,530 मेगावाट-घंटा) में से एक को चालू कर रहा है।
  • सेमीकंडक्टर लॉजिस्टिक्स – ‘सिलिकॉन कॉरिडोर’ का निर्माण: इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) 2.0 की शुरुआत उच्च-मूल्य एवं लॉजिस्टिक्स अवसंरचना की ओर अग्रसर होने का संकेत देती है, जहाँ कार्गो आकार में सूक्ष्म किंतु मूल्य में अत्यधिक होता है।
    • इसके लिये निर्बाध एवं उच्च गुणवत्ता वाली ऊर्जा तथा जल आपूर्ति से युक्त विशेष ‘क्लीन-रूम’ औद्योगिक पार्कों की आवश्यकता होती है, जो पारंपरिक भारी उद्योग क्षेत्रों से भिन्न हैं।
    • उदाहरण के लिये, बजट 2026-27 में इलेक्ट्रॉनिक्स घटक विनिर्माण हेतु 40,000 करोड़ रुपये आवंटित किये गए तथा पूर्ण-स्टैक स्वदेशी IP और आपूर्ति शृंखला अनुकूलन के विकास के लिये ISM 2.0 लागू किया गया।
      • इसके अतिरिक्त, वर्ष 2025 के अंत तक छह राज्यों में लगभग 1.60 लाख करोड़ रुपये के निवेश वाली दस प्रमुख परियोजनाओं (सिलिकॉन फैब्स और ATMP इकाइयों सहित) को स्वीकृति दी जा चुकी थी।
  • शहरी परिवहन—मेट्रो से आगे 'सिटी इकोनॉमिक रीजन': शहरी नियोजन पृथक नगर परियोजनाओं से आगे बढ़कर उच्च-गति परिवहन से जुड़े क्षेत्रीय क्लस्टरों की ओर उन्मुख हो रहा है, जिससे टियर-1 शहरों का 'श्रम पूल' टियर-2/3 उप क्षेत्रों तक विस्तृत होता है।
    • यह 'वितरित शहरीकरण' महानगरों की अवसंरचना पर भौतिक दबाव घटाते हुए आर्थिक वृद्धि को भौगोलिक रूप से बढ़ाता है।
    • वर्तमान में 24 शहरों में लगभग 1,036 किमी मेट्रो और RRTS लाइनें परिचालित हैं।
    • दिल्ली मेट्रो फेज-IV में टनल बोरिंग मशीनों की सफलता और लखनऊ मेट्रो फेज-1B की स्वीकृति गैर-राजधानी महानगरों में निरंतर गति को दर्शाती है।

भारत के अवसंरचना और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र से जुड़े प्रमुख मुद्दे क्या हैं? 

  • परिवहन व्यवस्था में असंतुलन और कार्बन सघनता: भारत की लॉजिस्टिक्स व्यवस्था गंभीर रूप से असंतुलित है, क्योंकि भारत के 71% माल का परिवहन सड़क मार्ग से होता है, जबकि यह रेल या जलमार्ग की तुलना में काफी अधिक महंगा और कार्बन सघन है। 
    • ट्रक परिवहन पर यह अत्यधिक निर्भरता आपूर्ति शृंखलाओं को ईंधन की कीमतों में अस्थिरता और चालकों की कमी के प्रति संवेदनशील बनाती है, जिससे एक 'उच्च-घर्षण' लॉजिस्टिक्स वातावरण निर्मित होता है जो रेल को प्राथमिकता देने वाले वैश्विक समकक्षों की तुलना में निर्यात प्रतिस्पर्द्धात्मकता को कम करता है।
    • उदाहरण के लिये, DFC के चालू होने के बावजूद रेल की हिस्सेदारी लगभग 27-28% (2024) पर स्थिर रही। 
      • इसके अलावा, सड़क मार्ग से माल ढुलाई की लागत ₹3.78/टन-किमी है, जबकि रेल मार्ग से यह ₹1.96/टन-किमी है (NCAER 2025 रिपोर्ट)।
  • भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में कनेक्टिविटी की बाधाएँ: बंदरगाह दक्षता में सुधार के बावजूद, बंदरगाहों से औद्योगिक समूहों तक की 'लास्ट-माइल' कनेक्टिविटी सबसे कमजोर कड़ी बनी हुई है, जिससे 'दक्षता द्वीप' प्रभाव उत्पन्न हो रहा है।
    • अंतर्देशीय कंटेनर डिपो (ICD) में लंबी रुकावट और औद्योगिक क्षेत्रों की खराब सड़क सतह के कारण जहाज़ों के टर्नअराउंड समय में हुई प्रगति व्यर्थ हो जाती है, जिससे इन्वेंट्री का भार बढ़ता है और डिटेंशन चार्जेस लगते हैं। 
    • हालाँकि टर्नअराउंड समय में सुधार होकर लगभग 22 घंटे हो गया है, लेकिन अंतर्देशीय ठहराव समय काफी अधिक बना हुआ है, जिसका मुख्य कारण लगातार सड़क जाम है (जवाहरलाल नेहरू बंदरगाह प्राधिकरण डेटा, 2025)।
  • भूमि अधिग्रहण और परियोजना विलंब: भूमि अधिग्रहण की जटिलता सबसे बड़ा संरचनात्मक बाधा है, जिससे लागत में वृद्धि होती है और राजमार्गों और रेलवे जैसी रैखिक परियोजनाओं में निजी पूंजी निवेश करने से हिचकती है। 
    • डिजिटलीकृत भूमि स्वामित्व दस्तावेज़ों की कमी और लंबित मुकदमे 'रिस्क प्रीमियम' उत्पन्न करते हैं, जिससे ग्रीनफील्ड परियोजनाएँ निजी विकासकों के लिये वित्तीय रूप से असंगत बन जाती हैं। 
      • उदाहरण के लिये, ₹150 करोड़ से अधिक की 35% स्थगित केंद्रीय परियोजनाएँ केवल भूमि अधिग्रहण कारणों से रुकी हुई हैं (PRAGATI समीक्षा 2024-25)।
  • रेल फ्रीट बास्केट कठोरता: भारतीय रेलवे को वस्तु संकेंद्रण के जोखिम का सामना करना पड़ता है, क्योंकि यह कोयला और लौह अयस्क जैसी थोक वस्तुओं पर बहुत अधिक निर्भर है, जबकि उच्च मूल्य वाले FMCG और औद्योगिक माल को सड़कों के माध्यम से ले जाया जाता है। 
    • ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता के कारण राजस्व ऊर्जा परिवर्तनों के प्रति संवेदनशील हो जाता है और आधुनिक 'जस्ट-इन-टाइम' विनिर्माण आपूर्ति शृंखलाओं के लिये आवश्यक लॉजिस्टिक्स संबंधी लचीलेपन को सीमित कर देता है।
    • वर्ष 2025-26 के लिये 1,702.5 मीट्रिक टन का महत्त्वाकांक्षी माल ढुलाई लक्ष्य निर्धारित करने के बावजूद, रेलवे ने वर्ष 2024-25 में पिछले वर्ष की तुलना में केवल 1.68% की वृद्धि दर्ज की, जो माल ढुलाई विस्तार में मामूली और धीमी गति को दर्शाता है।
      • इससे यह चिंता उत्पन्न होती है कि लक्ष्य-आधारित अनुमान संरचनात्मक मांग वृद्धि, लॉजिस्टिक्स प्रतिस्पर्द्धा और व्यापक आर्थिक परिस्थितियों से पीछे रह सकते हैं, जिससे क्रमिक लाभ विकास की सफलता के बजाय नीतिगत चुनौती बन सकते हैं।
  • भंडारण की गुणवत्ता और मानकीकरण में अंतर: वैश्विक सुरक्षा और स्वचालन मानकों के अनुरूप ग्रेड-A भंडारण की गंभीर कमी के कारण निर्माताओं को असंगठित और अक्षम गोदामों में काम करना पड़ता है।
    • इस विखंडन से इन्वेंट्री रखने की लागत और बर्बादी बढ़ती है, विशेषकर कोल्ड चेन में, जिससे उच्च-तकनीकी इन्वेंट्री प्रबंधन प्रणालियों का निर्बाध एकीकरण बाधित होता है।
    • इसके कारण, भारत में अनुमानित वार्षिक पश्च-फसल हानि ₹92,651 करोड़ (2024-25) है।
  • डिजिटल विखंडन और MSME बहिष्कार: यूनिफाइड लॉजिस्टिक्स इंटरफेस प्लेटफॉर्म (ULIP) बड़े खिलाड़ियों को एकीकृत कर चुका है, लेकिन असंगठित ट्रकिंग क्षेत्र (75% फ्लीट मालिकों के पास 5 या उससे कम ट्रक हैं) डिजिटल रूप से बहिष्कृत बना हुआ है।
    • यह डिजिटल विभाजन डेटा ब्लैक होल बनाता है, जहाँ वास्तविक समय ट्रैकिंग उपलब्ध नहीं होती, जिससे रिटर्न लोड की एंड-टू-एंड दृश्यता और अनुकूलन बाधित होता है और खाली रन दरें उच्च बनी रहती हैं।
  • नागरिक उड्डयन में प्रणालीगत सुरक्षा विफलता: यह क्षेत्र ‘विचलन के सामान्यीकरण’ से जूझ रहा है, जहाँ एयरलाइंस तकनीकी दोषों को अनदेखा कर समयबद्ध शेड्यूल बनाए रखती हैं। 'डिफर्ड मेंटेनेंस' संस्कृति के कारण छोटे तकनीकी दोष गंभीर विफलता बिंदुओं में बदल जाते हैं। 
    • उदाहरण के लिये, हाल ही में हुए एक ऑडिट में 377 विमानों (ऑडिट किये गए बेड़े के लगभग 50%) में बार-बार होने वाली तकनीकी खराबी पाई गई।
  • शहरी लॉजिस्टिक्स और भीड़: क्विक कॉमर्स (10-मिनट डिलीवरी) का तेज़ी से विस्तार सख्त शहरी अवसंरचना के साथ संघर्ष कर रहा है, इसके परिणामस्वरूप लास्ट-माइल डिलीवरी अनौपचारिक और अव्यवस्थित पैटर्न में बदल जाती है, जिससे भीड़भाड़, प्रदूषण और डिलीवरी लागत बढ़ती है, जबकि नगरपालिका नियम माइक्रो-फुलफिलमेंट सेंटर मॉडल के अनुकूल होने में संघर्ष कर रहे हैं।
    • टॉमटॉम ट्रैफिक इंडेक्स 2025 के अनुसार, भारत के प्रमुख शहरों में व्यस्त समय के दौरान गति में गिरावट देखी गई है; उदाहरण के लिये, बंगलूरू में गति वर्ष 2024 में 14.9 किमी/घंटा से घटकर 2025 में 13.9 किमी/घंटा हो गई।
  • एयर कार्गो अवसंरचना की कमी: भारत की वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स केंद्र बनने की महत्त्वाकांक्षा गैर-महानगरीय हवाई अड्डों पर अपर्याप्त हवाई माल प्रसंस्करण क्षमता के कारण बाधित हो रही है।
    • समर्पित फ्रेटर बे की कमी और समय-संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक घटकों (सेमीकंडक्टर) के लिये धीमी सीमा शुल्क निकासी निर्यातकों को सिंगापुर या दुबई जैसे महंगे केंद्रों के माध्यम से माल भेजने के लिये मजबूर करती है।
    • वर्तमान में, भारत के 80% हवाई माल की ढुलाई यात्री विमानों के 'बेली' (यात्री विमानों के नीचे वाले हिस्से, जहाँ यात्रियों का सामान रखा जाता है) में की जाती है, जिससे यह क्षेत्र यात्री उड़ान समय-सारणी के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाता है और बड़े आकार के या विशेष औद्योगिक माल को संभालने की इसकी क्षमता सीमित हो जाती है।
  • ग्रीन लॉजिस्टिक्स की व्यवहार्यता में अंतर: इलेक्ट्रिक/हाइड्रोजन ट्रकों और डीज़ल ट्रकों के बीच स्वामित्व की कुल लागत (TCO) में भारी अंतर के कारण ग्रीन लॉजिस्टिक्स की ओर संक्रमण रुका हुआ है।
    • राजमार्गों पर सघन चार्जिंग नेटवर्क और हेवी इलेक्ट्रिक व्हीकल्स के लिये व्यवहार्य वित्तपोषण के बिना, लंबी दूरी की माल ढुलाई में स्थिरता परिचालन वास्तविकता नहीं बल्कि एक कॉर्पोरेट जुमला बन गई है।
    • उदाहरण के लिये , भारी वाणिज्यिक वाहनों में इलेक्ट्रिक ट्रकों की पैठ 2025 में 1% से कम है और डीज़ल ट्रक परिवहन उत्सर्जन में लगभग 60% योगदान करते हैं (IEA इंडिया रिपोर्ट 2024)।
  • निजी निवेश जोखिम से बचाव: अवसंरचना में निजी क्षेत्र की भागीदारी (Private GFCF) सुस्त बनी हुई है, जिससे सरकार को सकल बजटीय सहायता (GBS) के माध्यम से भारी भार उठाना पड़ रहा है।
    • निजी क्षेत्र की हिचकिचाहट रुकी हुई परियोजनाओं और कठोर रियायत समझौतों के पिछले अनुभवों से उत्पन्न हुई है, जिससे वित्त पोषण अंतर उत्पन्न होता है और राज्य की पूंजीगत व्यय की गति वित्तीय रूप से बाधित होती है।

भारत में अवसंरचना और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र को मज़बूत करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है? 

  • भविष्यसूचक अवसंरचना नियोजन के लिये 'गति शक्ति' को संस्थागत रूप देना: भारत को प्रधानमंत्री गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान का उपयोग करते हुए स्थिर मानचित्रण से आगे बढ़कर गतिशील, भविष्यसूचक नियोजन की ओर बढ़ने की आवश्यकता है।
    • औद्योगिक माँग का अगले 5–10 वर्षों के लिये पूर्वानुमान करने वाली कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित चरणों को समेकित करके अवरोध उत्पन्न होने से पहले ही अवसंरचना का निर्माण किया जा सकता है, न कि समस्या उत्पन्न होने के बाद प्रतिक्रियात्मक रूप से।
    • इसके लिये यह अनिवार्य किया जाना चाहिये कि भविष्य की सभी संपर्क परियोजनाएँ — सड़क, रेल अथवा ऑप्टिकल फाइबर ‘गति शक्ति तनाव-परीक्षण’ से होकर गुजरें, ताकि वे आर्थिक क्लस्टरों के अनुरूप हों तथा पारिस्थितिक विघटन को न्यूनतम रखें।
  • समर्पित मालवाहक गलियारों के माध्यम से रेल परिवहन की ओर सक्रीय मॉडल-परिवर्तन:भारत सड़कों पर बहुत अधिक निर्भर है, इसे संतुलित करने के लिये, भारत को पूर्वी और पश्चिमी DFC को केवल पटरियों के रूप में नहीं, बल्कि आर्थिक रीढ़ के रूप में प्राथमिकता दिये जाने की आवश्यकता है। 
    • यहाँ महत्त्वपूर्ण उपाय 'लास्ट-माइल रेल फीडर' विकसित करना है जो निजी औद्योगिक पार्कों को राष्ट्रीय राजमार्गों को छुए बिना सीधे डीएफसी नेटवर्क से जोड़ते हैं। 
    • इसके लिये एक उदारीकृत 'निजी साइडिंग नीति' की आवश्यकता है, जहाँ निजी भागीदार न्यूनतम प्रशासनिक हस्तक्षेप के साथ अल्प दूरी के रेल लिंक का निर्माण और संचालन कर सकें।
  • 'यूनिफाइड लॉजिस्टिक्स इंटरफेस प्लेटफॉर्म' (ULIP) 2.0 को लागू करना: यद्यपि ULIP वर्तमान में डेटा को एकीकृत करता है, अगला कदम भुगतान और अनुपालन को स्वचालित करने के लिये ब्लॉकचेन द्वारा संचालित अंतर-संचालनीय स्मार्ट अनुबंध हैं।
    • भारत को एक ऐसे 'सिंगल विंडो लॉजिस्टिक्स ई-मार्केटप्लेस' की आवश्यकता है, जहाँ कोई निर्माता एक क्लिक में ट्रक, ट्रेन स्लॉट और गोदाम की जगह बुक कर सके, साथ ही तत्काल सीमा शुल्क निकासी भी प्राप्त कर सके। 
  • 'हब-एंड-स्पोक' मल्टी-मोडल लॉजिस्टिक्स पार्कों (MMLP) का संचालन: शहरी भीड़भाड़ की समस्या को हल करने के लिये, हमें एक सख्त 'प्लग-एंड-प्ले' भूमि अधिग्रहण मॉडल को अपनाकर नियोजित MMLP के चालू होने की प्रक्रिया को त्वरित करने की आवश्यकता है। 
    • ये पार्क बड़े शहरों के बाहर विशाल समेकन केंद्रों के रूप में काम करने चाहिये, जहाँ भारी ट्रक शहर में प्रवेश के लिये छोटे इलेक्ट्रिक वाहनों के बेड़े में माल उतार सकें। 
    • यहाँ उपाय यह है कि विशेष रूप से उन निजी डेवलपर्स को 'व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण' की पेशकश की जानी चाहिये जो इन पार्कों के भीतर स्वचालित छँटाई और शीत भंडारण सुविधाओं को समेकित करते हैं।
  • 'ग्रीन फ्रेट कॉरिडोर' और EV समेकन के माध्यम से कार्बन उत्सर्जन में कमी: कुछ विशिष्ट उच्च-मात्रा वाले मार्गों (जैसे: दिल्ली-मुंबई या चेन्नई-बंगलुरु) को 'ग्रीन फ्रेट कॉरिडोर' के रूप में घोषित किया जाना चाहिये, जहाँ इलेक्ट्रिक या हाइड्रोजन-संचालित ट्रकों के लिये टोल में छूट दी जाती है।  
    • साथ ही, सरकार को यह अनिवार्य करना चाहिये कि टियर-1 शहरों में 'लास्ट-माइल डिलीवरी' फ्लीट का एक निश्चित प्रतिशत एक निर्धारित समय सीमा के भीतर इलेक्ट्रिक वाहनों में रूपांतरित हो जाए।
    • इससे OEM के लिये भारी इलेक्ट्रिक लॉजिस्टिक्स वाहनों में निवेश करने के लिये एक गारंटीकृत बाज़ार तैयार होता है, जिससे इस क्षेत्र के कार्बन फुटप्रिंट में कमी आती है।
  • ‘परिसंपत्ति मुद्रीकरण’ तथा अवसंरचना निवेश न्यासों (इन्वेंटरी इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट– InvIT) के माध्यम से पूँजी की उपलब्धता: राजकोषीय विचलन के बिना इन वृहत परियोजनाओं को वित्तपोषित करने के लिये, हमें परिचालन गोदामों, रेलवे स्टेडियमों और बंदरगाह टर्मिनलों को शामिल करने के लिये इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (इन्वेंटरी ट्रस्ट) मॉडल का सक्रिय रूप से विस्तार किया जाना चाहिये। 
    • स्थिर संपत्तियों के 'संचालन के अधिकार' को वैश्विक पेंशन फंडों को बेचकर, सरकार पूंजी को नए ग्रीनफील्ड परियोजनाओं के निर्माण में पुनर्चक्रित कर सकती है। 
    • इससे पूर्ण हो चुकी अवसंरचना भविष्य के विकास के लिये वित्तपोषण का स्रोत बन जाती है।
  • 'ब्लू इकोनॉमी' प्रोत्साहनों के साथ तटीय नौवहन का पुनरोद्धार: भारत की दीर्घ तटरेखा का पर्याप्त उपयोग नहीं हो पा रहा है। घरेलू माल परिवहन हेतु छोटे पत्तनों को प्रोत्साहित करने के लिये ‘तटीय बर्थ योजना’ लागू की जानी चाहिये, न कि केवल निर्यात–आयात व्यापार (EXIM) पर निर्भरता रखी जाये।
    • एक महत्त्वपूर्ण उपाय यह है कि विशेषीकृत पोतों (जैसे वाहन-वहन पोत) के लिये ‘कैबोटेज छूट’ प्रदान की जानी चाहिये तथा जल परिवहन को रेल से सस्ता बनाने हेतु ‘प्रथम और अंतिम समुद्री बिंदु’ पर सब्सिडी दी जाये।
    • इससे रेलवे नेटवर्क पर दबाव कम होता है और ईंधन आयात पर समग्र निर्भरता घटती है।
  • शून्य-सहिष्णुता नियामक संरचना के माध्यम से विमानन सुरक्षा का सुदृढ़ीकरण: विमानन क्षेत्र में प्रतिक्रियात्मक पर्यवेक्षण के स्थान पर जोखिम-आधारित, अग्रसक्रिय निगरानी व्यवस्था स्थापित कर ‘विचलन के सामान्यीकरण’ की प्रवृत्ति को समाप्त किया जाना चाहिये।
    • इसके लिये महत्त्वपूर्ण प्रणालियों के लिये शून्य-स्थगित दोष नीति को संस्थागत रूप देने की आवश्यकता है, जहाँ बार-बार होने वाली खराबी स्वचालित रूप से अनिवार्य ग्राउंडिंग और तृतीय पक्ष के तकनीकी ऑडिट को ट्रिगर करती है, न कि एयरलाइन-स्तर के विवेक पर निर्भर करती है।
    • इसके अलावा, DGCA को एक रियल-टाइम एयरक्राफ्ट हेल्थ मॉनिटरिंग ग्रिड को चालू करना चाहिये, जिसमें पूर्वानुमानात्मक विश्लेषण तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित दोष-प्रवृत्ति पहचान को एकीकृत किया जाये, ताकि प्रणालीगत जोखिम बनने से पहले ही असामान्य पैटर्न चिन्हित किये जा सकें।
  • 'लॉजिस्टिक्स 4.0' के लिये कार्यबल को कुशल बनाना: आधुनिक प्रौद्योगिकी के संचालन हेतु कुशल श्रमशक्ति की कमी को दूर करने के लिये ड्रोन ऑपरेशन, वेयरहाउस रोबोटिक्स और डेटा एनालिटिक्स पर केंद्रित ‘राष्ट्रीय लॉजिस्टिक कौशल मिशन’ प्रारंभ किया जाना चाहिये।
    • इसमें प्रमुख पत्तनों और MMLP (मल्टीपल माइनॉरिटी ट्रांसपोर्टेशन) पार्कों में 'उत्कृष्टता केंद्र' स्थापित करना शामिल है, जहाँ गिग वर्कर्स (ट्रक ड्राइवर, डिलीवरी पार्टनर) को उन्नत कौशल प्रदान कर प्रमाणित किया जाना चाहिये।
    • इस कार्यबल को औपचारिक रूप देने से उच्च उत्पादकता सुनिश्चित होती है तथा इस क्षेत्र में व्याप्त उच्च दुर्घटना और कर्मचारियों के पलायन दर में कमी आती है।

निष्कर्ष: 

भारत के अवसंरचना और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में हो रहे परिवर्तन से लागत-आधारित तथा खंडित नेटवर्क से हटकर एकीकृत, हरित और प्रौद्योगिकी-आधारित प्रणालियों की ओर संरचनात्मक परिवर्तन हो रहा है। बजट 2026 ने पूंजीगत व्यय, डिजिटलीकरण और स्थिरता के माध्यम से इस प्रक्रिया को गति प्रदान की है,किंतु भूमि उपलब्धता, परिवहन माध्यमों के संतुलन और निजी निवेश से जुड़ी कई चुनौतियाँ अभी बनी हुई हैं। मुख्य चुनौती भौतिक संपत्तियों को उत्पादकता बढ़ाने वाले आर्थिक गलियारों में परिवर्तित करने की है। भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मक स्थिति को सुदृढ़ रखने हेतु शासन सुधार, हरित वित्त और बहुआयामी एकीकरण को समाहित करते हुए समन्वित प्रयास आवश्यक हैं।

दृष्टि मेन्स प्रश्न

अवसंरचना-आधारित विकास भारत की आर्थिक नीति का केंद्रीय स्तंभ बनकर उभरा है। हाल ही में हुए लॉजिस्टिक्स और परिवहन सुधारों से इस परिवर्तन को किस प्रकार समर्थन मिलता है, इसका विश्लेषण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1. पीएम गति शक्ति क्या है?
एकीकृत अवसंरचना नियोजन के लिये एक डिजिटल राष्ट्रीय मास्टर प्लान।

प्रश्न 2. डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर क्यों महत्त्वपूर्ण हैं?
ये माल ढुलाई को यात्री यातायात से अलग करते हैं, जिससे लॉजिस्टिक दक्षता बढ़ती है।

प्रश्न 3. ULIP क्या है?
एक एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म जो विभिन्न मंत्रालयों के लॉजिस्टिक्स डेटा को एकीकृत करता है।

प्रश्न 4. भारत के लिये मोडल शिफ्ट क्यों महत्त्वपूर्ण है?
सड़क मार्ग पर आधारित माल ढुलाई से लागत और कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि होती है।

प्रश्न 5. ग्रीन लॉजिस्टिक्स क्या है?
रेल, जलमार्ग, इलेक्ट्रिक वाहनों और स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग करके कम कार्बन उत्सर्जन वाला परिवहन।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ) 

प्रिलिम्स:

प्रश्न: 'राष्ट्रीय निवेश और बुनियादी ढाँचा कोष' के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (2017)

  1. यह नीति आयोग का अंग है। 
  2. वर्तमान में इसके पास 4,00,000 करोड़ रुपए का कोष है।

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (d)


प्रश्न 2, भारत में, ‘पब्लिक की इंफ्रास्ट्रक्चर’’ (Public Key Infrastructure) पदबंध किसके प्रसंग में प्रयुक्त किया जाता है? (2020)

(a) डिजिटल सुरक्षा आधारभूत संरचना

(b) खाद्य सुरक्षा आधारभूत संरचना

(c) स्वास्थ्य देखभाल और शिक्षा आधारभूत संरचना

(d) दूरसंचार और परिवहन आधारभूत संरचना

उत्तर: (a)

मेन्स

प्रश्न. “तीव्रतर एवं समावेशी आर्थिक संवृद्धि के लिये आधारिक अवसंरचना में निवेश आवश्यक है।” भारतीय अनुभव के परिप्रेक्ष्य में विवेचना कीजिये। (250 शब्द)