भारत का व्यापार विविधीकरण प्रयास | 06 Feb 2026

यह लेख 03/02/2026 को द हिंदू में प्रकाशित “Lower US tariffs help India, but diversification remains essential” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। इस लेख में अमेरिकी टैरिफ में राहत से भारत को होने वाले तात्कालिक लाभों को रेखांकित किया गया है तथा साथ ही नीतिगत अनिश्चितताओं के परिप्रेक्ष्य में निर्यात विविधीकरण और घरेलू आर्थिक सुदृढ़ीकरण की अनिवार्यता पर ज़ोर दिया गया है।

प्रिलिम्स के लिये: भारत-अमेरिका व्यापार समझौता 2026, केंद्रीय बजट 2026-27, खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड (KABIL)यूरोपियन यूनियन, मुक्त व्यापार समझौता, भारत-मध्य पूर्व-यूरोप गलियारा, खाड़ी सहयोग परिषद, भारत-ओमान CEPA, कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM) 

मेन्स के लिये: भारत को अपने व्यापारिक बाज़ार में विविधता लाने के लिये प्रेरित करने वाले प्रमुख कारक, भारत के बाज़ार विविधीकरण उपाय से जुड़े प्रमुख मुद्दे।

भारत को अमेरिका से टैरिफ में उल्लेखनीय राहत प्राप्त हुई है, जिसके अंतर्गत पारस्परिक शुल्क 25% से घटाकर 18% कर दिया गया है तथा रूसी तेल आयात पर आरोपित अतिरिक्त 25% दंडात्मक शुल्क समाप्त कर दिया गया है। इससे निर्यातकों और पूंजी बाज़ारों को तात्कालिक लाभ अवश्य मिला है, किंतु यह व्यवस्था ऐसे समय पर हुई है जब भारत पहले से ही अपने निर्यात गंतव्यों में विविधीकरण तथा यूरोपियन यूनियन जैसे भागीदारों के साथ व्यापार समझौतों को सुदृढ़ करने की दिशा में सक्रिय प्रयास कर रहा था। अतः भारत के लिए अमेरिकी व्यापार रियायतों पर अत्यधिक निर्भर रहने के स्थान पर वैकल्पिक बाज़ारों को सशक्त बनाने और घरेलू स्तर पर आत्मनिर्भरता बढ़ाना जारी रखना चाहिये।

भारत को अपने व्यापारिक बाज़ार में विविधीकरण हेतु प्रेरित करने वाले प्रमुख कारक क्या हैं?

  • व्यापार का शस्त्रीकरण और अमेरिकी अनिश्चितता: इसका प्रमुख कारण यह बोध करता है कि अमेरिकी बाज़ार अब 'स्थिर आधार' नहीं रहा, बल्कि एक ऐसा भू-राजनीतिक साधन बन गया है जिसे मनमाने रूप से प्रतिबंधित किया जा सकता है। 
  • हालिया टैरिफ घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया कि राजनीतिक गठबंधन (जैसे क्वाड) आर्थिक सुरक्षा की सुनिश्चितता प्रदान नहीं करते, जिसके परिणामस्वरूप भारत को अपने निर्यात हितों को 'सुरक्षित' करने की दिशा में विवश होना पड़ा है। 
    • उदाहरण के लिये, भारत का अमेरिका को माल निर्यात दिसंबर 2025 में पिछले वर्ष की तुलना में 1.83% घटकर 6.88 बिलियन डॉलर रह गया, जो उच्च टैरिफ के कारण हुआ (हालाँकि हाल ही में इसमें कुछ कमी आई है)।
  • 'महत्त्वपूर्ण खनिज' सुरक्षा की अनिवार्यता: विविधीकरण अब 'आपूर्ति पक्ष' से प्रेरित हो रहा है अर्थात चीन पर निर्भरता के बिना भारत के घरेलू PLI पारितंत्र (ईवी, सेमीकंडक्टर) को संचालित करने हेतु लिथियम, कोबाल्ट और दुर्लभ पृथ्वी तत्त्वों की शीघ्र उपलब्धता सुनिश्चित करना अनिवार्य हो गया है। 
    • इसके फलस्वरूप, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के खनिज-समृद्ध देशों की ओर विदेश नीति उन्मुख हुई है, जहाँ वे मात्र 'निर्यात गंतव्य' न रहकर रणनीतिक 'संसाधन साझेदार' के रूप में उभर रहे हैं।
    • केंद्रीय बजट 2026-27 में ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में दुर्लभ पृथ्वी स्थायी चुंबकों (REPM) के खनन, प्रसंस्करण, अनुसंधान और विनिर्माण के लिये समर्पित गलियारों की घोषणा की गई, जिससे चीनी प्रसंस्करण पर निर्भरता समाप्त करने का मार्ग प्रशस्त हुआ।
      • इसके अतिरिक्त अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी रणनीति को क्रियान्वित करने हेतु, भारत ने नालको, HCL और MECIL को मिला कर KABIL (खानिज बिदेश इंडिया लिमिटेड) नामक एक संयुक्त उद्यम की स्थापना की, जिसे महत्त्वपूर्ण खनिजों की पहचान, अन्वेषण और अधिग्रहण का कार्य सौंपा गया है।
  • दक्षिण के 'विकास लाभ' को प्राप्त करना: रणनीतिक रूप से, भारत उस दिशा में आगे बढ़ रहा है जहाँ भविष्य में उपभोग की संभावना है, यह समझते हुए कि पश्चिमी बाज़ार जनसांख्यिकीय रूप से स्थिर है जबकि ग्लोबल साउथ में उपभोग बढ़ रहा है।
    • किफायती वस्तुओं (फार्मा, दोपहिया वाहन) के साथ इन 'युवा-बहुल' अर्थव्यवस्थाओं में शुरुआती प्रभुत्व स्थापित करके, भारत प्रभावी रूप से अगले 20 वर्षों की निर्यात मांग को सुनिश्चित कर रहा है।
    • UNCTAD की व्यापार और विकास रिपोर्ट 2025 के अनुसार, भारत व्यापार साझेदार विविधीकरण में अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, ग्लोबल साउथ में तीसरे स्थान पर है और वैश्विक उत्तर की सभी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में उच्च व्यापार विविधता स्कोर दर्ज करता है।
  • 'हरित ऊर्जा' निर्यात की अनिवार्यता: वैश्विक हरित ऊर्जा केंद्र बनने की भारत की महत्त्वाकांक्षा ऊर्जा-समृद्ध अमेरिका (जिसके पास अपनी सस्ती शेल/IRA सब्सिडी है) से हटकर पूर्वी एशिया और यूरोप की ऊर्जा-आयात करने वाली अर्थव्यवस्थाओं की ओर संरचनात्मक बदलाव को अनिवार्य करती है।
    • नवीकरणीय ऊर्जा की लागत में मिलने वाले लाभ का पूरा उपयोग करने हेतु, भारत जापान, दक्षिण कोरिया और जर्मनी जैसे महत्त्वपूर्ण बाज़ारों में अपनी पकड़ सक्रिय रूप से मज़बूत कर रहा है।
      • उदाहरण के लिये, वित्त वर्ष 2022 और 2024 के बीच भारत के सौर फोटोवोल्टिक उत्पादों के निर्यात में 23 गुना से अधिक की वृद्धि हुई है।

भारत अपने व्यापारिक बाज़ारों में विविधता कैसे ला रहा है?

  • पश्चिमी बाज़ारों में रणनीतिक पकड़: भारत यूरोप और ब्रिटेन की उच्च-मूल्य वाली उपभोग अर्थव्यवस्थाओं में दीर्घकालिक, शुल्क-मुक्त पहुँच सुनिश्चित करके अमेरिकी नीति की अस्थिरता के प्रति आक्रामक रूप से रक्षा कर रहा है। 
    • यह ' मल्टीपल-एंकर' रणनीति यह सुनिश्चित करती है कि अमेरिकी टैरिफ में उतार-चढ़ाव होने पर भी, भारतीय निर्यातकों के पास कपड़ा और चमड़े जैसे उच्च मार्जिन वाले सामानों के लिये वैकल्पिक प्रीमियम बाज़ार मौजूद हों।
      • उदाहरण के लिये, जनवरी 2026 में, भारत और यूरोपियन यूनियन ने एक व्यापक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के लिये बातचीत पूरी की, जिसमें भारत के निर्यात व्यापार का 99% हिस्सा शामिल है।
  • PLI के माध्यम से मूल्य शृंखला में उच्च वृद्धि: यह विविधीकरण केवल भौगोलिक नहीं बल्कि संरचनात्मक भी है, जो उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजना के माध्यम से निर्यात बास्केट को कच्चे माल से उच्च-मूल्य वाले तैयार इलेक्ट्रॉनिक्स और प्रभावी इंजीनियरिंग की ओर स्थानांतरित करता है।
    • वैश्विक मूल्य शृंखलाओं (GVC) में 'प्लस वन' भागीदार के रूप में भारत अपने निर्यात को अधिक स्थिर और साधारण मूल्य/टैरिफ झटकों के प्रति कम संवेदनशील बनाता है।
      • उदाहरण के लिये, भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात वर्ष 2025 में ₹4 लाख करोड़ तक पहुँच गया और 2026 में चार सेमीकंडक्टर संयंत्रों के उत्पादन शुरू होने के साथ इसमें और वृद्धि होने की संभावना है।
  • 'ग्लोबल साउथ' का भौगोलिक केंद्रीकरण: पश्चिम बाज़ारों में संतृप्ति को देखते हुए, नई दिल्ली मध्य-तकनीकी विनिर्माण और जेनेरिक दवा निर्यात को अवशोषित करने के लिये अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और मध्य एशिया में सक्रिय रूप से बाज़ार विकसित कर रही है।
    • यह रणनीति तेज़ी से विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को लक्षित करती है, जहाँ भारतीय उत्पाद महंगे पश्चिमी विकल्पों की तुलना में 'मूल्य के हिसाब से बेहतर' प्रतिस्पर्द्धी लाभ प्रदान करते हैं।
    • उदाहरण के लिये, भारतीय कंपनियां पहले से ही अफ्रीका को होने वाले दवा निर्यात का लगभग 20% हिस्सा रखती हैं, जो इस क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका को उजागर करता है।
      • 43 देशों वाले लैटिन अमेरिकी और कैरेबियन क्षेत्र के साथ भारत का कुल व्यापार वित्त वर्ष 2023-24 के दौरान 35.73 अरब अमेरिकी डॉलर रहा, जिसमें 14.50 अरब अमेरिकी डॉलर का निर्यात शामिल था।
      • इसके अलावा, हाल ही में भारत और खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) ने नई दिल्ली में एक मुक्त व्यापार समझौते के लिये संदर्भ शर्तों पर हस्ताक्षर किये हैं।
  • मुद्रा संबंधी कूटनीति और डॉलर का दुरुपयोग: अमेरिकी डॉलर के भू-राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल और विनिमय दर की अस्थिरता से अपने व्यापार को बचाने के लिये, भारत रुपये के व्यापार निपटान तंत्र और डिजिटल भुगतान संबंधों को क्रियान्वित कर रहा है। 
    • यह वित्तीय ढाँचा प्रतिबंधों से प्रभावित या विदेशी मुद्रा की कमी से जूझ रहे देशों के साथ व्यापार जारी रखने की अनुमति देता है, जिससे अमेरिका द्वारा द्वितीयक प्रतिबंध लगाए बिना व्यापार जारी रह सकता है।
      • उदाहरण के लिये, वर्ष 2023 में, भारत ने संयुक्त अरब अमीरात से खरीदे गए कच्चे तेल के लिये पहली बार रुपये में भुगतान किया, जिससे भारतीय मुद्रा के अंतर्राष्ट्रीयकरण का मार्ग प्रशस्त हुआ।
      • इसके अलावा, सिंगापुर के साथ यूपीआई-पे नाउ के लिंक अब वास्तविक समय में सीमा पार व्यापार निपटान की प्रक्रिया करते हैं।
  • ऊर्जा और लॉजिस्टिक्स कॉरिडोर कूटनीति: भारत, भारत-मध्य पूर्व-यूरोप गलियारे (IMEC) जैसे व्यापारिक गलियारों को विकसित करके और विविध स्रोतों (जैसे कतर से LNG) से ऊर्जा प्राप्त करके अपनी लॉजिस्टिक्स संबंधी कमज़ोरियों को कम कर रहा है। 
    • इससे केवल स्वेज नहर या अस्थिर शिपिंग लेन पर निर्भर रहने से जुड़े 'पारगमन जोखिम' में कमी आती है, जिससे निर्यातकों के लिये आपूर्ति शृंखला की निरंतरता सुनिश्चित होती है।
      • उदाहरण के लिये, भारत-ओमान CEPA खाड़ी क्षेत्र में भारत की लॉजिस्टिक्स उपस्थिति का आधार है। 
      • इसके अलावा, वित्त वर्ष 2025-26 में लॉजिस्टिक्स लागत घटकर GDP का 7.97% हो गई। यह पहले बताए गए 13-14% आँकड़ों से काफी कम है।
  • निवेश-प्रथम व्यापार मॉडल (EFTA): पारंपरिक टैरिफ-के-बदले-टैरिफ समझौतों से आगे बढ़ते हुए, भारत प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और दीर्घकालिक पूंजी को सुरक्षित करने के लिये EFTA देशों के साथ TEPA जैसे 'निवेश-लिंक्ड' व्यापार समझौतों में अग्रणी भूमिका निभा रहा है।
    • यह रणनीति बड़े पैमाने पर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को आकर्षित करके वस्तुओं के निर्यात में होने वाली अस्थिरता के प्रति संवेदनशीलता को कम करती है, जिससे वैश्विक निर्यात बाज़ारों के लिये घरेलू औद्योगिक क्षमता का निर्माण होता है।
    • उदाहरण के लिये, TEPA समझौते के तहत, 15 वर्षों की अवधि में भारत में 100 अरब डॉलर का निवेश करने की प्रतिबद्धता है।

भारत के बाज़ार विविधीकरण प्रयास से जुड़ी प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?

  • गैर-टैरिफ अवरोधों की ‘ग्रीन वॉल’: यूरोपियन यूनियन जैसे उच्च-मूल्य वाले पश्चिमी बाज़ारों में विविधीकरण का प्रयास कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM) और वनों की कटाई विनियमन (EUDR) जैसे 'हरित संरक्षणवाद' उपायों से असंगत है। 
    • ये कठोर अनुपालन मानक भारत के MSME-प्रधान निर्यात आधार को असमान रूप से प्रभावित करते हैं, जिससे लागत मध्यस्थता के कमज़ोर होने का खतरा उत्पन्न होता है, जिस पर भारतीय निर्यातक वियतनाम या बांग्लादेश के साथ प्रतिस्पर्द्धा करने के लिये निर्भर करते हैं।
    • हालाँकि हालिया भारत–यूरोपियन यूनियन मुक्त व्यापार समझौते में ‘कार्बन सीमा समायोजन तंत्र’ के संदर्भ में ‘सर्वाधिक अनुकूल राष्ट्र’ से जुड़ा प्रावधान शामिल किया गया है, जिसके तहत यूरोपियन यूनियन द्वारा भविष्य में अन्य भागीदारों को दी जाने वाली किसी भी छूट या लचीलेपन का लाभ भारत को भी मिलना चाहिये, परंतु इसका क्रियान्वयन अभी अनिश्चित बना हुआ है।
  • 'आयात-निर्भर निर्यात' का जाल: इलेक्ट्रॉनिक्स तथा इंजीनियरिंग उत्पादों के निर्यात की ओर संक्रमण संरचनात्मक रूप से कमज़ोर है क्योंकि यह गहन घटक-विनिर्माण के बजाय मुख्यतः संयोजन गतिविधियों पर आधारित है।
    • यह 'सतही' विविधीकरण एक विरोधाभासी भेद्यता उत्पन्न करता है: अमेरिका या यूरोपियन यूनियन को निर्यात बढ़ाने से चीन से घटक आयात में स्वतः ही वृद्धि होती है, जिससे राजनीतिक पृथक्करण के प्रयासों के बावजूद बीजिंग के साथ व्यापार घाटा और गहन हो जाता है।
    • उदाहरण के लिये, भारत के मोबाइल फोन विनिर्माण क्षेत्र में घरेलू मूल्यवर्द्धन (DVA) मात्र 23% है। इसके विपरीत, पिछले 15 वर्षों में भारत के औद्योगिक उत्पाद आयात में चीन की हिस्सेदारी 21% से बढ़कर 30% हो गई है, जिससे महत्त्वपूर्ण आपूर्ति शृंखलाओं में 'संप्रभु जोखिम' उत्पन्न हो गया है।
  • मूल्य-संवेदनशील बाज़ारों में लॉजिस्टिक्स की अक्षमता: जहाँ एक ओर भारत अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के 'ग्लोबल साउथ' बाज़ारों में हिस्सेदारी बढ़ाने का प्रयास कर रहा है, वहीं इसकी उच्च लॉजिस्टिक्स लागत इसे चीन के परिपक्व बेल्ट एंड रोड बुनियादी ढाँचे के मुकाबले प्रतिस्पर्द्धात्मक रूप से कमज़ोर बनाती हैं।
    • निर्बाध कनेक्टिविटी के अभाव में, भारतीय वस्तुओं को मार्जिन में गिरावट का सामना करना पड़ता है, जिससे इन मूल्य-संवेदनशील क्षेत्रों में स्थापित चीनी आपूर्तिकर्त्ताओं को विस्थापित करना मुश्किल हो जाता है।
    • इसके अलावा, चीन का अवसंरचना और ऋण-आधारित प्रभाव पूर्वी अफ्रीका में भारत के बाज़ार-उन्मुख, साझेदारी-केंद्रित निवेशों के विपरीत है।
  • असममित मुक्त व्यापार समझौते (FTA) का उपयोग और घाटा: त्वरित मुक्त व्यापार समझौतों (UAE, ऑस्ट्रेलिया, यूरोपियन यूनियन) पर हस्ताक्षर करने की रणनीति को 'उपयोग अंतर' का सामना करना पड़ता है, जहाँ भारतीय निर्यातकों को जटिल मूल नियमों (ROO) के अनुपालन में कठिनाई होती है, जबकि भागीदार देश आसानी से तैयार माल को निर्यात कर देते हैं। 
    • यह विषमता प्रायः समझौते के बाद व्यापार घाटे को बढ़ा देती है, क्योंकि भारतीय विनिर्माण में भागीदार देशों की क्षमताओं की तुलना में शुल्क-मुक्त अभिगम्यता का पूरी तरह से लाभ उठाने के लिये पर्याप्त पैमाना नहीं है।
    • भारत में मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) का उपयोग लगभग 25% पर बहुत कम बना हुआ है, जबकि विकसित देशों में यह आमतौर पर 70-80% के बीच रहता है।
  • क्षेत्रीय मूल्य शृंखलाओं (RCEP) से अलगाव: आलोचकों का तर्क है कि घरेलू डेयरी और कृषि के संरक्षण के लिये RCEP से बाहर रहकर भारत ने वैश्विक उच्च-संयोजन विनिर्माण नेटवर्क से स्वयं को अलग कर लिया
    • इस बहिष्करण के कारण भारतीय निर्यातकों को ऐसे शुल्क चुकाने पड़ते हैं जो वियतनाम जैसे प्रतिस्पर्द्धी नहीं चुकाते, जिससे बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भारत को दरकिनार कर अंतिम असेंबली पूर्वी एशियाई बाज़ार में कर सकती हैं।
      • उदाहरण के लिये, वियतनाम का कपड़ा और परिधान उद्योग एक मज़बूत पुनरुद्धार पथ पर है, जिसके निर्यात राजस्व वर्ष 2025 में 46 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया
  • नीतिगत अस्थिरता और 'विश्वसनीयता जोखिम': घरेलू मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिये भारत द्वारा आवश्यक वस्तुओं (चावल, प्याज) पर हाल ही में लगाए गए आकस्मिक निर्यात प्रतिबंधों ने 'ग्लोबल साउथ' देशों के लिये एक विश्वसनीय भागीदार के रूप में इसकी प्रतिष्ठा को काफी क्षति पहुँचाई है।
    • ऐसी ‘चालू-बंद’ नीति अस्थिरता अफ्रीकी और खाड़ी देशों के आयातकों को थाईलैंड या ब्राज़ील जैसे पूर्वानुमेय प्रतिस्पर्धियों के साथ दीर्घकालिक अनुबंध करने के लिये प्रेरित करती है, जिससे भारत का भौगोलिक लाभ कम हो जाता है।

टैरिफ संबंधी अनिश्चितताओं के बीच सतत विविधीकरण सुनिश्चित करने के लिये भारत कौन-से उपाय अपना सकता है?

  • पारस्परिक मान्यता को संस्थागत रूप देना: पश्चिमी गैर-टैरिफ बाधाओं पर निष्क्रिय रूप से प्रतिक्रिया करने के बजाए, भारत को अपने भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) प्रमाणन के लिये 'पारस्परिक मान्यता समझौतों' (MRA) को सक्रिय रूप से आगे बढ़ाना चाहिये, विशेष रूप से ग्लोबल साउथ के भागीदारों के साथ। 
    • अफ्रीका और ASEAN के साथ नियामक ढाँचों में सामंजस्य स्थापित करके, भारत एक 'मानक-संरेखित' व्यापार ब्लॉक बना सकता है जो अनुपालन लागत को कम करता है तथा निर्यातकों को मनमानी गुणवत्ता अस्वीकृति से बचाता है, जिससे प्रभावी रूप से 'मेड इन इंडिया' वस्तुओं के लिये एक ऐसा अनुकूल वातावरण तैयार होता है जिसमें पश्चिमी प्रतिद्वंद्वी आसानी से प्रवेश नहीं कर सकते।
  • विनिर्माण निर्यात का 'सेवाकरण': भौतिक वस्तुओं पर लगने वाले शुल्कों की अस्थिरता से निपटने के लिये नीति को यह प्रोत्साहित करना चाहिये कि उच्च लाभांश देने वाली सेवाओं— जैसे दूरस्थ तकनीकी परीक्षण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित पूर्वानुमानात्मक अनुरक्षण तथा सॉफ्टवेयर एकीकरण को हार्डवेयर निर्यातों में अंतर्निहित किया जाये।
    • यह 'प्रोडक्ट-एज़-ए-सर्विस' (PaaS) अर्थात उत्पाद-के-रूप-में-सेवा मॉडल ग्राहकों की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता बढ़ाता है, मानक वस्तुओं पर लगने वाले शुल्कों से आंशिक रूप से बचाव करता है तथा भारत की सॉफ्टवेयर-क्षमता का उपयोग करते हुए ऐसा हाइब्रिड मूल्य प्रस्ताव निर्मित करता है जिसे वियतनाम या बांग्लादेश जैसे कम लागत वाले विनिर्माण प्रतिस्पर्द्धी संरचनात्मक रूप से दोहरा नहीं सकते।
  • डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) के माध्यम से निर्यात का लोकतंत्रीकरण: सरकार को MSME के लिये निर्बाध, स्वचालित सीमा शुल्क निकासी और प्री-शिपमेंट क्रेडिट प्रदान करने के लिये भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ एकीकृत करके 'ई-कॉमर्स एक्सपोर्ट हब' (ECEH) को तेज़ी से चालू करना चाहिये। 
    • इससे लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिये वैश्विक बाज़ारों तक प्रत्यक्ष पहुँच की बाधाएँ कम ('डायरेक्ट-टू-ग्लोबल') होंगी तथा निर्यात जोखिम कुछ बड़े औद्योगिक समूहों पर केंद्रित रहने के बजाय हज़ारों सूक्ष्म विक्रेताओं में वितरित होगा, जिससे एक ‘समुत्थानशील वितरित निर्यात तंत्र’ विकसित होगा।
  • PLI 2.0 में रणनीतिक 'बैकवर्ड इंटीग्रेशन': उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन योजना के आगामी चरणों में केवल अंतिम संयोजन को प्रोत्साहन देने के स्थान पर विशेष रसायनों, औद्योगिक वेफरों तथा सूक्ष्म-परिशुद्ध उप-अवयवों जैसे ‘ऊर्ध्वप्रवाही मध्यवर्ती घटकों’ के घरेलू उत्पादन को व्यापक अनुदान प्रदान किया जाना चाहिये।
    • यह ‘गहन स्थानीयकरण’ रणनीति ही चीन के साथ बने ‘आयात-निर्यात जाल’ को तोड़ने का प्रभावी माध्यम है, जिससे प्रत्येक निर्यात-वृद्धि वास्तविक घरेलू मूल्य-वर्द्धन और प्रौद्योगिकीय संप्रभुता में परिवर्तित हो सके, न कि केवल पारगमनात्मक व्यापार में।
  • अग्रसक्रिय ‘कार्बन इनसेटिंग’ रूपरेखा: यूरोपियन यूनियन द्वारा प्रस्तावित कार्बन सीमा समायोजन तंत्र से उत्पन्न चुनौतियों का निराकरण करने हेतु भारत को एक सुदृढ़ और वैश्विक रूप से मान्यता-प्राप्त घरेलू कार्बन व्यापार प्रणाली विकसित करनी चाहिये, जिससे निर्यातक अपने कार्बन व्यय को देश के भीतर ही समायोजित कर सकें।
    • यह प्रमाणित करके कि कार्बन टैक्स का भुगतान पहले ही घरेलू स्तर पर किया जा चुका है (और इसे हरित परिवर्तनों में पुनर्निवेश किया गया है), निर्यातक विदेशों में छूट का दावा कर सकते हैं, जबकि देश के अपने ऊर्जा परिवर्तन को वित्तपोषित करते हैं, जिससे अनुपालन के बोझ को 'हरित प्रतिस्पर्द्धात्मक लाभ' में परिवर्तित किया जा जाता है।
  • 'मिनीलैटरल' सप्लाई चेन कॉरिडोर बनाना: व्यापक, धीमी गति से चलने वाले FTA से आगे बढ़ते हुए, भारत को सप्लाई चेन इम्युनिटी सुनिश्चित करने के लिये विशिष्ट, क्षेत्र-केंद्रित 'मिनीलैटरल' समझौते (जैसे: ऑस्ट्रेलिया के साथ क्रिटिकल मिनरल्स पार्टनरशिप) बनाने चाहिये।
    • ऐसे लक्षित गलियारे ‘कुशलता की तुलना में लचीलापन’ को प्राथमिकता देंगे तथा प्रमुख रणनीतिक उद्योगों को भू-राजनीतिक आघातों या व्यापार युद्धों से संरक्षित रखते हुए ‘विश्वसनीय भूगोल’ के अंतर्गत संचालित होने में सक्षम बनाएँगे।

निष्कर्ष: 

भारत का व्यापार विविधीकरण एकल बाज़ार पर निर्भरता से आगे बढ़कर बहु-बाजार निर्भरता, मूल्य संवर्द्धन और नए भौगोलिक क्षेत्रों के माध्यम से आर्थिक सुदृढ़ता अर्जित करने की रणनीतिक दिशा को रेखांकित करता है। यद्यपि शुल्क में राहत और मुक्त व्यापार समझौते अल्पकालिक लाभ प्रदान करते हैं, लेकिन नीतिगत अस्थिरता, गैर-शुल्क बाधाएँ एवं सीमित स्थानीयकरण जैसी संरचनात्मक चुनौतियाँ बनी रहती हैं। सतत विविधीकरण घरेलू स्तर पर गहन मूल्यवर्द्धन और सुरक्षित आपूर्ति शृंखलाओं पर निर्भर करेगा। अंततः, भारत का लक्ष्य अस्थायी व्यापार रियायतों पर निर्भरता नहीं, बल्कि रणनीतिक स्वायत्तता सुनिश्चित करना होना चाहिये। 

दृष्टि मेन्स का प्रश्न:

भारत द्वारा अपने व्यापारिक बाज़ारों में विविधीकरण की रणनीति के पीछे के तर्क का विश्लेषण कीजिये। साथ ही, भारत के लिये सतत और सुदृढ़ व्यापार विविधीकरण सुनिश्चित करने हेतु आवश्यक प्रमुख कारकों, संबंधित चुनौतियों तथा उपायों पर चर्चा कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न 1. भारत अपने व्यापारिक बाज़ारों में सक्रिय रूप से विविधता क्यों ला रहा है? 
भारत अस्थिर बाज़ारों जैसे अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता कम करने, व्यापारिक उपकरणों के इस्तेमाल से बचाव करने, महत्त्वपूर्ण खनिज आपूर्ति सुरक्षित करने और ग्लोबल साऊथ में उच्च विकास दर वाली मांग का लाभ उठाने के लिये ऐसा कर रहा है।

प्रश्न 2. हाल के व्यापार समझौते भारत की विविधीकरण रणनीति का समर्थन कैसे करते हैं? 
यूरोपियन यूनियन, GCC, EFTA (TEPA) तथा अन्य देशों के साथ संपन्न मुक्त व्यापार समझौते वैकल्पिक बाज़ारों तक पहुँच, निवेश प्रवाह एवं प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को सुदृढ़ करते हैं, जिससे किसी एक व्यापारिक भागीदार पर निर्भरता घटती है और टैरिफ संबंधी झटकों के प्रति संवेदनशीलता कम होती है।

प्रश्न 3. भारत की व्यापार रणनीति में महत्त्वपूर्ण खनिजों की क्या भूमिका है? 
लिथियम, कोबाल्ट तथा दुर्लभ खनिजों की सुनिश्चित उपलब्धता भारत की इलेक्ट्रिक वाहन, सेमीकंडक्टर एवं हरित ऊर्जा संबंधी महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिये अनिवार्य है; इसी कारण अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के खनिज-समृद्ध क्षेत्रों के साथ रणनीतिक साझेदारियों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है।

प्रश्न 4. व्यापारिक बाज़ारों में विविधता लाने में भारत को किन प्रमुख चुनौतियों का सामना करना पड़ता है? 
प्रमुख चुनौतियों में गैर-टैरिफ बाधाएँ जैसे कि CBAM, कम घरेलू मूल्यवर्द्धन, उच्च रसद लागत, FTA का कम उपयोग और निर्यात विश्वसनीयता को प्रभावित करने वाली नीतिगत अनिश्चितता शामिल हैं।

प्रश्न 5. भारत द्वारा सतत व्यापार विविधीकरण सुनिश्चित करने हेतु कौन-से उपाय किये जा सकते हैं? 
भारत को स्थानीय विनिर्माण को बढ़ावा देना होगा, साझेदारों के साथ मानकों को संरेखित करना होगा, निर्यात में सेवाओं को शामिल करना होगा, डिजिटल व्यापार अवसंरचना का लाभ उठाना होगा और अनुकूलित, विश्वसनीय आपूर्ति-शृंखला गलियारे बनाने होंगे।

 

UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ) 

प्रिलिम्स:

प्रश्न 1. रुपये की परिवर्तनीयता से क्या तात्पर्य है? (2015)

(a) रुपये के नोटों के बदले सोना प्राप्त करना
(b) रुपये के मूल्य को बाज़ार की शक्तियों द्वारा निर्धारित होने देना
(c) रुपये को अन्य मुद्राओं में और अन्य मुद्राओं को रुपये में परिवर्तित करने की स्वतंत्र रूप से अनुज्ञा प्रदान करना
(d) भारत में मुद्राओं के लिये अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार विकसित करना

उत्तर: (c)


प्रश्न 2 . निरपेक्ष तथा प्रति व्यक्ति वास्तविक GNP में वृद्धि आर्थिक विकास की ऊँची स्तर का संकेत नहीं करती, यदि: (2018)

(a) औद्योगिक उत्पादन कृषि उत्पादन के साथ-साथ बढ़ने में विफल रह जाता है।
(b) कृषि उत्पादन औद्योगिक उत्पादन के साथ-साथ बढ़ने में विफल रह जाता है।
(c) निर्धनता और बेरोज़गारी में वृद्धि होती है।
(d) निर्यात की अपेक्षा आयात तेज़ी से बढ़ता है।

उत्तर: C


प्रश्न 3. 'बंद अर्थव्यवस्था' वह अर्थव्यवस्था है जिसमें: (2011) 

(a) मुद्रा पूर्णतः नियंत्रित होती है 
(b) घाटे की वित्त व्यवस्था होती है 
(c) केवल निर्यात होता है 
(d) न तो निर्यात होता है, न ही आयात होता है  

उत्तर: (d) 


मेन्स

प्रश्न 1. विश्व व्यापार में संरक्षणवाद और मुद्रा चालबाज़ियों की हालिया परिघटनाएँ भारत की समष्टि-आर्थिक स्थिरता को किस प्रकार प्रभावित करेंगी? (2018)

 प्रश्न 2, शीत युद्ध के बाद के अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य के संदर्भ में भारत की 'लुक ईस्ट पॉलिसी' के आर्थिक और रणनीतिक आयामों का मूल्यांकन कीजिये। (2016)