भारत के सतत शहरी विकास हेतु रणनीतिक रूपरेखा | 05 Mar 2026

यह एडिटोरियल 02/03/2026 को द बिज़नेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित India's cities need bureaucrat-CEOs who do more than maintain order शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह संपादकीय 16वें वित्त आयोग के ऐतिहासिक राजकोषीय प्रोत्साहन और केंद्रीय बजट के अर्बन चैलेंज फंड का नगरपालिका सुधार के उत्प्रेरक के रूप में विश्लेषण करता है।

प्रिलिम्स के लिये: 16वाँ वित्त आयोग, पीएम-ईबस सेवा, अर्बन चैलेंज फंड, AMRUT 2.0, PM SVANidhi 

मेन्स के लिये: शहरी शासन में प्रमुख विकास, शहरी शासन से जुड़े प्रमुख मुद्दे, आवश्यक उपाय।

भारत में तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण के दौरान भारत का शहरी शासन पुनः नीतिगत ध्यान का केंद्र बन रहा है। 16वें वित्त आयोग ने स्थानीय निकायों के लिये 5 वर्षों में लगभग 8 ट्रिलियन रुपये की सिफारिश की है, जिसमें से लगभग 41% शहरों के लिये निर्धारित है, जो नगरपालिकाओं के लिये मज़बूत वित्तीय प्रोत्साहन का संकेत देता है। इसके पूरक के रूप में केंद्रीय बजट ने शहरी अवसंरचना हेतु बाज़ार-आधारित वित्तपोषण को बढ़ावा देने के लिये 1 ट्रिलियन रुपये के अर्बन चैलेंज फंड की घोषणा की है। सामूहिक रूप से ये उपाय संस्थागत क्षमता को सुदृढ़ करने तथा भारतीय शहरों को सतत विकास के प्रेरक इंजन में रूपांतरित करने का अवसर प्रदान करते हैं।

भारत में शहरी शासन के क्षेत्र में वर्तमान में क्या-क्या विकास हो रहे हैं? 

  • नगरपालिका वित्त और बाज़ार आधारित विकेंद्रीकरण: अधोसंरचना की गंभीर कमी से निपटने के लिये, भारतीय शहर अनुदान पर निर्भरता से बाज़ार आधारित वित्तपोषण तंत्र की ओर बढ़ रहे हैं, जिससे आवश्यक राजकोषीय अनुशासन को बढ़ावा मिल रहा है। यह परिवर्तन प्रदर्शन-आधारित ढाँचों द्वारा सक्रिय रूप से प्रेरित हैं, जिनके तहत संघीय निधियों तक पहुँच के लिये मज़बूत क्रेडिट रेटिंग और लेखापरीक्षित नगरपालिका लेखांकन की आवश्यकता होती है। 
    • उदाहरण के लिये, 16वें वित्त आयोग ने स्थानीय निकायों के लिये लगभग 8 ट्रिलियन रुपये आवंटित किये, जिसमें विशेष रूप से 41% राशि शहरों के लिये निर्धारित की गई थी और इसके लिये सख्त लेखापरीक्षा शर्तें लागू की गई थीं। 
    • इसी के साथ, हाल ही में घोषित 1 ट्रिलियन रुपये के अर्बन चैलेंज फंड के तहत शहरों को अपनी पूंजी का 50% हिस्सा ग्रीन म्युनिसिपल बॉण्ड जैसे बाज़ार साधनों के माध्यम से जुटाने की आवश्यकता है।
  • डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और स्मार्ट प्रशासन: शहरी प्रशासन तेज़ी से पृथक, मैनुअल संचालन से एकीकृत, डेटा-संचालित शासन की ओर अग्रसर हो रहा है, जिसके लिये केंद्रीकृत डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को तैनात किया जा रहा है। यातायात, अपशिष्ट प्रबंधन और सार्वजनिक सुरक्षा के लिये रियल टाइम एनालिसिस का लाभ उठाकर, प्रशासक शहरी संसाधन आवंटन एवं सक्रिय सेवा प्रदाय को अभूतपूर्व रूप से अनुकूलित कर रहे हैं। 
    • यह तकनीकी एकीकरण प्रशासनिक बाधाओं को कम करता है, जिससे एक पारदर्शी, पूर्वानुमानित और अत्यधिक प्रतिक्रियाशील नागरिक प्रबंधन प्रणाली का निर्माण होता है। 
    • वर्तमान में, विकसित हो रहे स्मार्ट सिटी ढाँचे के तहत देशभर में 100 से अधिक एकीकृत कमांड और नियंत्रण केंद्र (ICCC) कार्यरत हैं। आँकड़ों से पता चलता है कि इन डिजिटल केंद्रों ने व्यापक GIS मैपिंग के माध्यम से आपातकालीन प्रतिक्रिया समय को काफी कम कर दिया है और संपत्ति कर संग्रह में उल्लेखनीय वृद्धि की है।
  • जलवायु-अनुकूल शहरी नियोजन: जैसे-जैसे चरम मौसमी घटनाएँ बढ़ रही हैं, शहरी प्रशासन ने जलवायु अनुकूलन को सीधे मास्टर प्लानिंग और नगरपालिका ज़ोनिंग कानूनों में शामिल करने की दिशा में मौलिक रूप से परिवर्तन किया है। नीति निर्माता पारंपरिक, कंक्रीट-प्रधान इंजीनियरिंग दृष्टिकोणों के बजाय 'स्पंज सिटी' डिज़ाइन जैसे विकेंद्रीकृत, प्रकृति-आधारित पारिस्थितिक समाधानों को प्राथमिकता दे रहे हैं।  
    • इस पारिस्थितिक चेतना को मुख्यधारा में लाने से सार्वजनिक संपत्तियों की दीर्घकालिक सुरक्षा सुनिश्चित होती है और मौसमी शहरी आपदाओं के कारण होने वाली गंभीर आर्थिक बाधाओं को कम किया जा सकता है। 
    • उदाहरण के लिये, हाल के राष्ट्रीय बजटों में पीएम-ईबस सेवा को भारी मात्रा में पूंजी दी गई है, जिसका लक्ष्य उत्सर्जन को कम करने के लिये टियर-2 और टियर-3 शहरों में 10,000 इलेक्ट्रिक बसों की तैनाती करना है।
    • इसके अलावा, मुंबई जैसे तटीय महानगरों ने हाल ही में आर्द्रभूमि सुधार और प्रकृति-आधारित बाढ़ शमन परियोजनाओं के लिये विशेष रूप से 2,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि जुटाई है।
  • संस्थागत नेतृत्व और क्षमता निर्माण: दीर्घकालिक क्रियान्वयन गतिरोध को दूर करने के लिये, शासन मॉडल नगरपालिका नेतृत्व को पेशेवर बना रहे हैं, जहाँ पारंपरिक प्रशासकों से सक्रिय तथा विकासोन्मुख CEO की तरह कार्य करने की अपेक्षा की जा रही है। यह संस्थागत परिवर्तन केवल प्रशासनिक व्यवस्था बनाए रखने के बजाय विशिष्ट क्षमता निर्माण, विशेषज्ञता के एकीकरण और परिणाम-आधारित प्रबंधन पर केंद्रित है।
    • सशक्त नागरिक नेतृत्व को अब प्रत्यक्ष रूप से सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) को सक्रिय रूप से आगे बढ़ाने का दायित्व दिया गया है, ताकि प्रतिस्पर्द्धी और स्थानीय आर्थिक विकास को प्रोत्साहित किया जा सके।
    • इसी को ध्यान में रखते हुए, क्षमता निर्माण आयोग के हालिया प्रयासों के तहत नगर निगम के अधिकारियों को उन्नत सार्वजनिक वित्त और जटिल परियोजना प्रबंधन में व्यापक रूप से प्रशिक्षित किया गया है। उदाहरण के लिये, 1.75 लाख से अधिक स्थानीय निकाय (ULB) अधिकारियों को iGOT कर्मयोगी भारत प्लेटफॉर्म पर शामिल किया गया है।
    • साथ ही ईज़ ऑफ लिविंग इंडेक्स जैसे राष्ट्रीय ढाँचे इन प्रशासकों के प्रदर्शन मूल्यांकन को आकलन योग्य नागरिक परिणामों एवं स्वच्छता मापदंडों से सीधे जोड़ते जा रहे हैं।
  • सार्वजनिक परिवहन आधारित विकास (TOD) और स्थानिक नियोजन: अनियंत्रित शहरी विस्तार से निपटने के लिये, नगर योजनाकार भूमि उपयोग को उच्च क्षमता वाले सार्वजनिक परिवहन गलियारों के साथ समन्वित करने हेतु सार्वजनिक परिवहन आधारित विकास (TOD) को तेज़ी से अपना रहे हैं। यह प्रतिमान परिवर्तन उच्च घनत्व वाले, मिश्रित उपयोग वाले क्षेत्रों को प्रोत्साहित करता है, जिससे यात्रियों की निजी वाहनों पर निर्भरता कम होती है और समग्र कार्बन उत्सर्जन में कमी आती है। 
    • इन ट्रांज़िट कॉरिडोर के साथ लैंड वैल्यू कैप्चर का मुद्रीकरण करके, नगरपालिकाएँ अत्यधिक पूंजी-गहन जन परिवहन अवसंरचना को स्थायी रूप से क्रॉस-सब्सिडी प्रदान कर सकती हैं। 
    • राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र परिवहन निगम (NCRTC) दिल्ली-मेरठ RRTS कॉरिडोर के संचालित खंडों के साथ-साथ किराया-रहित राजस्व उत्पन्न करने के लिये TOD नीतियों का सक्रिय रूप से लाभ उठा रहा है।   
    • इसके अलावा, आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के हालिया आँकड़ों से पता चलता है कि वर्ष 2023 से 14 प्रमुख भारतीय शहरों ने औपचारिक रूप से TOD ढाँचे को अपनी वैधानिक मास्टर योजनाओं में एकीकृत कर लिया है।
  • ठोस अपशिष्ट प्रबंधन में चक्रीय अर्थव्यवस्था: शहरी प्रशासन नगरपालिका ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के लिये पारंपरिक लैंडफिल डंपिंग से विकेंद्रीकृत, चक्रीय अर्थव्यवस्था मॉडल की ओर तेज़ी से अग्रसर हो रहा है। नगरपालिकाएँ अपशिष्ट को आर्थिक रूप से व्यवहार्य उप-उत्पादों में परिवर्तित करने के लिये स्रोत-वार पृथक्करण के कड़े नियम लागू कर रही हैं और स्थानीय स्तर पर बायोमेथेनेशन एवं सामग्री पुनर्प्राप्ति सुविधाएँ स्थापित कर रही हैं। 
    • यह स्थानीय दृष्टिकोण लॉजिस्टिक्स संबंधी लागतों को काफी हद तक कम करता है, साथ ही जहरीले अपशिष्ट के ढेर में लगने वाली आग से जुड़े गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरणीय संकटों को भी कम करता है।
    • स्वच्छ भारत मिशन-शहरी 2.0 के तहत, केंद्र सरकार ने विशेष व्यवहार्यता अंतर निधि आवंटित करके देश भर में 2,400 से अधिक पुराने अपशिष्ट स्थलों के सुधार को अनिवार्य कर दिया है।
    • इंदौर और पुणे जैसे शहर इस परिवर्तन में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं, जो सामूहिक रूप से अपने दैनिक नगरपालिका ठोस अपशिष्ट के 90% से अधिक को बायो-CNG और खाद में संसाधित करते हैं, जिससे सालाना करोड़ों रुपये का नगरपालिका राजस्व उत्पन्न होता है।
  • अनौपचारिक शहरी अर्थव्यवस्था का एकीकरण: प्रगतिशील शहरी शासन व्यवस्था अनौपचारिक क्षेत्र की दंडात्मक पुलिसिंग से हटकर औपचारिक आर्थिक एकीकरण और सामाजिक सुरक्षा की ओर सक्रिय रूप से अग्रसर हो रही है। शहरी आपूर्ति शृंखला के महत्त्वपूर्ण घटकों के रूप में स्ट्रीट वेंडर्स और गिग वर्कर्स को मान्यता देते हुए, प्रशासक समर्पित वेंडिंग ज़ोन स्थापित कर रहे हैं और संस्थागत सूक्ष्म ऋण तक सीधी पहुँच को सुगम बना रहे हैं। 
    • यह समावेशी दृष्टिकोण असुरक्षित शहरी आजीविकाओं को स्थिर करता है तथा अनियंत्रित सार्वजनिक स्थलों से उत्पन्न सामाजिक-आर्थिक तनाव को कम करता है।
    • PM SVANidhi योजना के माध्यम से नगर निगम अधिकारियों ने वर्ष 2026 की शुरुआत तक 68 लाख से अधिक शहरी स्ट्रीट वेंडरों को बिना किसी गारंटी के कार्यशील पूंजी ऋण वितरित करने की सुविधा प्रदान की है। 
    • इसके अतिरिक्त, अहमदाबाद जैसे शहरों में डिजिटलीकृत टाउन वेंडिंग कमेटियाँ, पहले से उपेक्षित हज़ारों सूक्ष्म उद्यमियों को सुरक्षित और औपचारिक कार्यकाल प्रदान करने के लिये बायोमेट्रिक मैपिंग का उपयोग कर रही हैं।
  • चक्रीय जल अर्थव्यवस्थाएँ और जलभंडार पुनर्जीवन: शहरी जल संकट से निपटने के लिये, नगर निकाय रैखिक जल दोहन मॉडल को छोड़कर स्थानीय स्तर पर चक्रीय जल अर्थव्यवस्थाओं को अपना रहे हैं। शासन रणनीतियों में अब दोहरी पाइपिंग प्रणालियों का एकीकरण, अपशिष्ट जल का व्यापक पुनर्चक्रण और भूजल पुनर्भरण के लिये ऐतिहासिक शहरी झीलों का पारिस्थितिक पुनर्स्थापन अनिवार्य है। 
    • यह प्रतिमान सुनिश्चित करता है कि शहर दूरस्थ नदी प्रणालियों के पर्यावरण के लिये हानिकारक और महॅंगे मोड़ पर निरंतर निर्भर रहने के बजाय आंतरिक जल समुत्थानशीलता विकसित करें। 
    • AMRUT ​​2.0 ढाँचे के तहत, सरकार ने विशेष रूप से 100% कार्यात्मक जल नल कवरेज और सभी शहरी अपशिष्ट जल के 20% के अनिवार्य पुनर्चक्रण को लक्षित करते हुए महत्त्वपूर्ण पूंजी आवंटित की है। 
    • उदाहरण के लिये, बंगलूरू ने हाल ही में सख्त नगरपालिका उपनियम लागू किये हैं, जिनके तहत बड़े आवासीय परिसरों को अपने 100% ग्रेवाटर का उपचार और पुन: उपयोग करना अनिवार्य है, जिससे उन सूक्ष्म क्षेत्रों में ताजे जल पर निर्भरता में लगभग 25-30% की सफलतापूर्वक कमी आई है।

भारत में शहरी शासन से जुड़े प्रमुख मुद्दे क्या हैं?

  • वित्तीय संकट और राजस्व स्वायत्तता: सबसे बड़ी बाधा शहरी स्थानीय निकायों (ULB) का दीर्घकालिक वित्तीय 'असंतुलन' है, जो स्थिर, स्व-उत्पादित राजस्व के बजाय अस्थिर अंतर-सरकारी अंतरणों पर अत्यधिक निर्भर हैं। वित्तीय स्वायत्तता की यह कमी शहरों को दीर्घकालिक अधोसंरचनाओं की योजना बनाने से रोकती है तथा रख-रखाव में विलंब और सेवा प्रदाय में विफलताओं के एक निरंतर चक्र को जन्म देती है। 
    • बाज़ार आधारित वित्तपोषण की ओर संक्रमण आवश्यक है, किंतु अनेक नगरपालिकाओं के पास निजी पूंजी आकर्षित करने के लिये अपेक्षित ऋण-विश्वसनीयता नहीं होती। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के आँकड़ों से पता चलता है कि नगरपालिकाओं का राजस्व (स्वयं के स्रोतों और अंतरणों सहित) सकल घरेलू उत्पाद के 0.7% और 1.1% के बीच रहा है। यह ब्राज़ील (~7%) या दक्षिण अफ्रीका (~6%) जैसे समकक्ष देशों की तुलना में काफी कम है।
  • प्रशासनिक प्राधिकार का विखंडन: शहरी शासन व्यवस्था 'कई एजेंसियों' की समस्या से ग्रस्त है, जहाँ अर्द्ध-सरकारी निकायों, विकास प्राधिकरणों और निर्वाचित शहरी स्थानीय निकायों के अधिकार क्षेत्र आपस में ओवरलैप होते हैं, जिससे जवाबदेही में गंभीर कमी आती है। यह विखंडन सुनिश्चित करता है कि शहर के समग्र विकास के लिये कोई एक इकाई जिम्मेदार नहीं है, जिसके परिणामस्वरूप परिवहन, आवास और जल के लिये योजना बनाने में असंगति उत्पन्न होती है। 
    • ऐसी संरचनात्मक संस्थागत बाधाएँ परियोजनाओं के क्रियान्वयन में विलंब उत्पन्न करती हैं और लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित महापौरों की शक्ति को क्षीण करती हैं, क्योंकि प्रायः उनके पास वास्तविक कार्यकारी अधिकार नहीं होते।
    • वर्ष 2026 की हालिया रिपोर्टों से पता चलता है कि बंगलुरु और दिल्ली जैसे महानगरों में, एक ही सड़क खंड का प्रबंधन पाँच अलग-अलग एजेंसियाँ ​​कर सकती हैं। परिणामस्वरूप, आर्थिक सर्वेक्षण 2026 ने इस 'संस्थागत संरचना' को भारत की 7% संभावित GDP वृद्धि के लिये एक प्रमुख बाधा के रूप में चिन्हित किया है।
  • पेशेवर योजना क्षमता की भारी कमी: भारत शहरी नियोजन विशेषज्ञता के क्षेत्र में एक गंभीर संकट का सामना कर रहा है, जहाँ तेज़ी से जटिल होते महानगरीय परिवेशों के प्रबंधन के लिये योग्य नगर योजनाकारों और तकनीकी कर्मचारियों की भारी कमी है। पेशेवर 'प्रशासनिक-प्रमुखों' और तकनीकी कर्मचारियों के अभाव में, शहर पुराने मास्टर प्लान पर निर्भर हैं जो आधुनिक वास्तविकताओं जैसे कि गिग इकॉनमी या हाई-स्पीड ट्रांज़िट को ध्यान में नहीं रखते हैं। 
    • इस क्षमता की कमी के कारण प्रोजेक्ट डिज़ाइन में खामियाँ, भूमि उपयोग के अक्षम तरीके और नगरपालिका बॉण्ड जैसे परिष्कृत वित्तीय साधनों का लाभ उठाने में असमर्थता उत्पन्न होती है। NITI आयोग के आँकड़ों से पता चलता है कि भारत में प्रति 75,000 नागरिकों पर केवल एक शहरी योजनाकार है, जबकि ब्रिटेन में प्रति 5,000 नागरिकों पर एक है।
  • जलवायु संबंधी भेद्यता और अनुकूलन की कमी: जैसे-जैसे चरम मौसमी घटनाएँ 'सामान्य' बनती जा रही हैं, भारतीय शहरी शासन हीट वेव तथा वर्षा-जनित शहरी बाढ़ जैसे जलवायु जोखिमों को विधिक निर्माण मानकों एवं जल निकासी योजनाओं में समाहित करने में संघर्ष कर रहा है। अधिकांश शहर सक्रिय और लचीली योजना मॉडल के बजाय प्रतिक्रियात्मक आपदा प्रबंधन मॉडल पर काम करते हैं, जिससे खरबों डॉलर की संपत्ति को नुकसान का खतरा बना रहता है। 
    • जलवायु-अनुकूल शासन व्यवस्था की इस कमी के कारण भारी आर्थिक नुकसान और सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट उत्पन्न होते हैं, जिनका सबसे अधिक प्रभाव शहरी गरीबों पर पड़ता है। विश्व बैंक की वर्ष 2025 की रिपोर्ट का अनुमान है कि भारतीय शहरों में भारी बारिश से होने वाली बाढ़ से संबंधित नुकसान वर्ष 2030 तक प्रति वर्ष 5 अरब डॉलर तक पहुँच सकता है। 
    • इसके अलावा, 'नगरीय उष्मा द्वीप' प्रभाव के कारण मुंबई और चेन्नई जैसे शहरों में अब आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में औसत तापमान 3-4 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया जा रहा है।
  • अनियंत्रित भूमि उपयोग और फ्लोर स्पेस इंडेक्स (FSI) विनियम: कम फ्लोर स्पेस इंडेक्स (FSI) सीमा वाली प्रतिबंधात्मक और अप्रचलित भूमि उपयोग नीतियाँ भारतीय शहरों को ऊर्ध्वाधर के बजाय क्षैतिज रूप से विस्तार करने के लिये विवश करती हैं, जिससे अधोसंरचना की लागत एवं आवास की कीमतें बढ़ जाती हैं। भूमि की यह कृत्रिम कमी श्रमिकों को दूरस्थ परि-शहरी क्षेत्रों में बसने के लिये विवश करती है, जिससे लंबी यात्राएँ, अधिक उत्सर्जन और अनौपचारिक बस्तियों का विस्तार होता है।
    • शासन व्यवस्था की विफलता, ज़ोनिंग कानूनों का आधुनिकीकरण करने में असमर्थता, वैश्विक मानकों के अनुरूप उत्पादकता और जीवन स्तर के लिये आवश्यक कुशल सघनता को बाधित करती है। 
    • आर्थिक सर्वेक्षण 2026 का तर्क है कि कम FSI प्रोत्साहन शहरी विस्तार को बढ़ावा देते हैं, जिससे प्रति आवास इकाई बुनियादी सेवाएँ प्रदान करने की लागत बढ़ जाती है।
      • आँकड़ों से पता चलता है कि तर्कहीन भूमि नियमों ने आवास की कमी के उस बैकलॉग में योगदान दिया है जिसके लिये वर्ष 2070 तक 144 मिलियन नए घरों की आवश्यकता होगी।
  • गैर-राजस्व जल और स्वच्छता का संकट: बड़े पैमाने पर रिसाव, चोरी और चक्रीय जल अर्थव्यवस्था की कमी के कारण शहरी जल प्रशासन स्थिरता प्राप्त करने में विफल रहा है तथा अधिकांश शहर बुनियादी परिचालन लागतों की वसूली करने में भी असमर्थ हैं। 
    • जल आपूर्ति और सीवेज के खंडित प्रबंधन के कारण स्थानीय जल निकाय दूषित हो जाते हैं, जिससे शहरों को सैकड़ों किलोमीटर दूर से पानी पंप करने के लिये विवश होना पड़ता है, जिसमें ऊर्जा की लागत बहुत अधिक होती है। 
    • उपयोगकर्त्ता-भुगतान मॉडल और चौबीसों घंटे जल आपूर्ति प्रणालियों की ओर संक्रमण के बिना, शहर 'डे ज़ीरो' जल संकट के प्रति संवेदनशील बने रहेंगे। AMRUT 2.0 ढाँचे के तहत, वर्तमान आँकड़ों से पता चलता है कि प्रमुख शहरों में शहरी जल का लगभग 40% 'गैर-राजस्व जल' (रिसाव या चोरी के कारण बर्बाद) के रूप में नष्ट हो जाता है, जो रिसाव या चोरी के कारण खो जाता है।
      • इसके अलावा, अनुमान बताते हैं कि वर्ष 2030 तक, व्यापक पुनर्चक्रण सुधारों के बिना, भारत के 40% शहरों को तीव्र जल संकट का सामना करना पड़ेगा।
  • 'अदृश्य' अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का शासन: शहरी शासन की एक महत्त्वपूर्ण विफलता अनौपचारिक क्षेत्र (जिसमें सड़क विक्रेता और अस्थायी कर्मचारी शामिल हैं) को औपचारिक शहरी नियोजन एवं सामाजिक सुरक्षा संजाल से परे रखना है। 
    • ये श्रमिक शहरी अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करते हैं, लेकिन इन्हें प्रायः आवश्यक हितधारक मानने के बजाय 'अतिक्रमणकारी' समझा जाता है, जिससे निरंतर अंतर्विरोध और आजीविका का नुकसान होता है। डिजिटल ID और समर्पित विक्रय क्षेत्रों के माध्यम से इस क्षेत्र को औपचारिक रूप देना समावेशी विकास के लिये महत्त्वपूर्ण है, फिर भी नगरपालिका स्तर पर इसका कार्यान्वयन धीमा बना हुआ है। 
    • वर्ष 2026 की शुरुआत तक, PM SVANidhi योजना ने 68 लाख से अधिक विक्रेताओं को सूक्ष्म ऋण प्रदान किया है, फिर भी अधिकांश के पास स्थायी कार्यकाल नहीं है। इसके अतिरिक्त, ई-श्रम पोर्टल पर पंजीकृत 31 करोड़ से अधिक असंगठित श्रमिकों को अभी भी नगरपालिका कल्याण सेवाओं की लास्ट-माइल डिलीवरी में कमी का सामना करना पड़ रहा है।
  • अपशिष्ट निपटान की समस्या और प्रसंस्करण में कमियाँ: स्वच्छ भारत मिशन के बावजूद, शहरी प्रशासन अपशिष्ट निपटान के विशाल ढेरों से जूझ रहा है, जो भूजल को प्रदूषित करते हैं तथा बार-बार लैंडफिल में आग लगने का कारण बनते हैं। अपशिष्ट के स्रोत पर अपर्याप्त पृथक्करण और अपशिष्ट-से-ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के अंगीकरण की धीमी गति के कारण दैनिक अपशिष्ट उत्पादन एवं प्रसंस्करण क्षमता के बीच का अंतर बहुत अधिक बना हुआ है।
    • नगरपालिकाएँ औद्योगिक और खतरनाक अपशिष्ट के प्रबंधन में भी कठिनाई का सामना करती हैं, क्योंकि यह प्रायः घरेलू अपशिष्ट के साथ मिश्रित हो जाता है, जिससे चक्रीय अर्थव्यवस्था की दिशा में संक्रमण जटिल हो जाता है।
    • वर्ष 2026 के मौजूदा आँकड़ों से पता चलता है कि पंजाब जैसे राज्यों में अभी भी 41 लाख मीट्रिक टन का पुराना अपशिष्ट है जिसका निपटान किया जाना बाकी है। 
    • राष्ट्रीय स्तर पर, हालाँकि इंदौर जैसे प्रमुख शहरों में प्रसंस्करण दर में लगभग 90% तक सुधार हुआ है, फिर भी पूरे भारत में 1000 से अधिक पुराने अपशिष्ट स्थल अभी भी एक सक्रिय पर्यावरणीय खतरा बने हुए हैं।

भारत में शहरी शासन को मज़बूत करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?

  • 'सिटी CEO' प्रशासनिक मॉडल की ओर संक्रमण: पारंपरिक प्रशासनिक की जड़ता को दूर करने के लिये, शहरी स्थानीय निकायों (ULB) को कम से कम 5 वर्ष के निश्चित कार्यकाल वाले सशक्त नगर आयुक्तों की नियुक्ति करके एक कॉर्पोरेट-शैली की नेतृत्व संरचना अपनानी होगी। यह 'सिटी CEO' मॉडल केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने से हटकर प्रदर्शन-आधारित मापदंडों, आर्थिक प्रतिस्पर्द्धा और उच्च-स्तरीय अधोसंरचना परियोजनाओं के निर्माण पर ध्यान केंद्रित करता है।
    • शहर प्रबंधन को लगातार होने वाले राजनीतिक फेर-बदल से अलग करके, प्रशासक दीर्घकालिक रणनीतिक योजनाओं को क्रियान्वित कर सकते हैं और निजी निवेशकों के साथ स्थिर साझेदारी को बढ़ावा दे सकते हैं। संस्थागत पेशेवरता का यह विकास निष्क्रिय नगरपालिकाओं को गतिशील, विकासोन्मुखी शहरी निगमों में बदलने के लिये आवश्यक है।
  • लैंड वैल्यू कैप्चर (LVC) वित्तपोषण का एकीकरण: नगरपालिकाओं को सार्वजनिक अवसंरचना निवेशों से उत्पन्न पूंजीगत लाभों को आंतरिक बनाने के लिये लैंड वैल्यू कैप्चर (LVC) तंत्र को लागू करके स्थिर संपत्ति कर व्यवस्थाओं से आगे बढ़ना होगा। 
    • राज्य द्वारा ट्रांज़िट कॉरिडोर या पार्क बनाने से निजी भूमि के मूल्य में होने वाली वृद्धि की भरपाई सुधार शुल्क, प्रभाव शुल्क या अतिरिक्त फ्लोर स्पेस इंडेक्स (FSI) की बिक्री के माध्यम से आंशिक रूप से की जानी चाहिये। इससे एक आत्मनिर्भर 'सकारात्मक चक्र' बनता है, जिसमें शहरी विकास केंद्रीय अनुदानों पर अत्यधिक निर्भरता के बिना सीधे अपने विस्तार और रख-रखाव के लिये वित्तपोषण करता है। 
    • LVC 'लाभ-आधारित' कराधान की दिशा में एक परिष्कृत बदलाव का प्रतिनिधित्व करता है, जो यह सुनिश्चित करता है कि शहरी धन सृजन को सामूहिक नागरिक संवर्द्धन के लिये पुनर्वितरित किया जाए।
  • 'स्पंज सिटी' और ब्लू-ग्रीन ज़ोनिंग का संस्थागतकरण: शहरी प्रशासन को वर्षाजन्य बाढ़ और अत्यधिक ऊष्मा द्वीपों के बढ़ते खतरों को कम करने के लिये वैधानिक मास्टर प्लान में 'ब्लू-ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर' के एकीकरण को अनिवार्य बनाना चाहिये। इसमें संरक्षित 'इको-ज़ोन' का निर्धारण शामिल है जो पारगम्य फुटपाथों, बायोस्वेल तथा स्थानीय जलभंडारों एवं परस्पर जुड़े आर्द्रभूमि प्रणालियों के अनिवार्य पुनर्स्थापन को प्राथमिकता देते हैं। 
    • उच्च रख-रखाव लागत वाली कंक्रीट इंजीनियरिंग से हटकर प्रकृति-आधारित 'स्पंज सिटी' डिज़ाइन के अंगीकरण से नगरपालिकाएँ प्राकृतिक रूप से वर्षा जल का प्रबंधन कर सकती हैं तथा मौसमी आपदाओं के विनाशकारी आर्थिक नुकसान को कम कर सकती हैं। यह पारिस्थितिक मुख्यधारा-स्थापन शहरी जल प्रबंधन को केवल जल-निकासी की समस्या से बदलकर एक महत्त्वपूर्ण संसाधन-संवर्द्धन रणनीति में परिवर्तित कर देता है।
  • एकीकृत डिजिटल ट्विन फ्रेमवर्क का कार्यान्वयन: नगरों को यातायात, उपयोगिताओं के भार और आपातकालीन प्रतिक्रिया पर नीतिगत निर्णयों के प्रभाव का अनुकरण तथा अनुकूलन करने के लिये शहरी परिवेश के व्यापक आभासी त्रि-आयामी प्रतिरूप विकसित करने चाहिये। यह डिजिटल सार्वजनिक आधारभूत संरचना 'पूर्वानुमानात्मक शासन' को संभव बनाती है, जिससे प्रशासक वास्तविक काल में आधारभूत संरचना की बाधाओं और उपयोगिता रिसावों की पहचान कर सकते हैं, इससे पहले कि वे व्यापक विफलताओं में परिवर्तित हों।
    • GIS-मैप किये गए परिसंपत्ति प्रबंधन को इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) सेंसर के साथ एकीकृत करके, शहर एक पारदर्शी, डेटा-संचालित पारिस्थितिकी तंत्र बन जाता है। 
    • यह तकनीकी प्रगति अनुमान-आधारित निर्णयों के स्थान पर सटीकता स्थापित करती है तथा समन्वित और उत्तरदायी नागरिक सेवाओं के माध्यम से 'जीवन की सुगमता' को अत्यधिक सुदृढ़ करती है।
  • क्षेत्रीय सभाओं को उप-स्थानीय शासन का अंतरण: महानगरों में लोकतांत्रिक कमी को दूर करने के लिये, शासन को वार्ड स्तर से आगे बढ़कर क्षेत्रीय सभाओं या मोहल्ले-स्तरीय समितियों को समर्पित सूक्ष्म बजट के साथ विकेंद्रीकृत किया जाना चाहिये। यह अति-स्थानीय अंतरण नागरिकों को सहभागी बजट निर्धारण में प्रत्यक्ष रूप से भाग लेने का अधिकार देता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि सड़क प्रकाश व्यवस्था, अपशिष्ट संग्रहण एवं पार्क रख-रखाव जैसे स्थानीय मुद्दों का सूक्ष्म स्तर पर समाधान किया जाए। 
    • स्थानीय कल्याण संघों (RWA) और स्थानीय हितधारकों की भूमिका को औपचारिक रूप देने से नगरपालिका तंत्र अधिक जवाबदेह एवं सामाजिक रूप से अधिक सुदृढ़ हो जाता है। यह ज़मीनी स्तर का दृष्टिकोण नागरिक स्वामित्व को बढ़ावा देता है तथा यह सुनिश्चित करता है कि शहरी नियोजन विभिन्न पड़ोसों के वास्तविक जीवन अनुभवों को प्रतिबिंबित करे।
  • नगरपालिका उपनियमों में चक्रीय अर्थव्यवस्था को मुख्यधारा में लाना: शहरी शासन को 'अपशिष्ट प्रबंधन' से 'संसाधन पुनर्प्राप्ति' की ओर विकसित होना चाहिये, जिसके लिये चक्रीय अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों को नगरपालिका उपनियमों एवं खरीद नीतियों में सीधे शामिल करना आवश्यक है। इसमें स्रोत पर ही 100% अपशिष्ट पृथक्करण को अनिवार्य करना तथा बायो-मीथेनेशन और प्लास्टिक-से-ईंधन संयंत्रों के लिये व्यवहार्यता अंतर निधि के माध्यम से 'अपशिष्ट-से-धन' उद्योग को प्रोत्साहन देना शामिल है। 
    • वार्ड स्तर पर सामग्री पुनर्प्राप्ति सुविधाएँ (MRF) स्थापित करके, शहर लॉजिस्टिक्स संबंधी खर्चों और लैंडफिल पर निर्भरता को काफी हद तक कम कर सकते हैं, साथ ही पुनर्चक्रित उप-उत्पादों से गैर-कर राजस्व भी उत्पन्न कर सकते हैं। यह प्रतिमान परिवर्तन नगरपालिका ठोस अपशिष्ट को एक बोझिल पर्यावरणीय दायित्व के बजाय स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिये एक मूल्यवान संसाधन के रूप में देखता है।
  • नगरपालिका कैडर का व्यवसायीकरण: शहरी स्थानीय निकायों (ULB) में मौजूद तकनीकी क्षमता की दीर्घकालिक कमी को शहरी नियोजन, नगरपालिका वित्त और पर्यावरण इंजीनियरिंग में विशेषज्ञता रखने वाले एक विशेष 'समर्पित नगरपालिका सेवा' कैडर का गठन करके दूर किया जाना चाहिये।
    • सामान्य प्रशासन से हटकर, शहरों को ऐसे पार्श्व प्रवेश कार्यक्रमों की आवश्यकता है जो निजी क्षेत्र से उच्च-स्तरीय पेशेवरों को लाकर जटिल सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) परियोजनाओं का प्रबंधन कर सकें। राष्ट्रीय क्षमता निर्माण ढाँचों के माध्यम से निरंतर कौशल विकास यह सुनिश्चित करता है कि नगरपालिका कार्यबल कार्बन-तटस्थ योजना और डिजिटल सेवा वितरण जैसी आधुनिक चुनौतियों से निपटने के लिये सुसज्जित हो। 
    • तकनीकी रूप से कुशल कर्मचारियों का समूह ही परिष्कृत शहरी परिवर्तन को गति देने के लिये आवश्यक 'मानव-पूंजी' का इंजन है।
  • जलवायु-संबंधी नगरपालिका बॉण्ड बाज़ार का विकास: बड़े पैमाने पर निजी पूंजी जुटाने के लिये, शहरों को सतत अवसंरचना परियोजनाओं के लिये जलवायु-प्रतिरोधी 'ग्रीन म्युनिसिपल बॉण्ड' जारी करने हेतु कठोर क्रेडिट रेटिंग प्रक्रियाओं से गुजरना होगा। ऑडिट किये गए खातों और राजस्व स्रोतों को सुरक्षित करके नगरपालिकाओं की बैलेंस शीट को मज़बूत करने से शहरी स्थानीय निकाय (ULB) घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय ऋण बाज़ारों तक स्वतंत्र रूप से पहुँच बना सकते हैं। 
    • यह वित्तीय परिपक्वता पारदर्शिता और वित्तीय अनुशासन की संस्कृति को प्रोत्साहित करती है, क्योंकि नगरों को संस्थागत निवेशकों के समक्ष अपनी 'ऋण-योग्यता' सिद्ध करनी होती है। 
    • 'अनुदान-निर्भरता' से 'ऋण-क्षमता' की ओर संक्रमण नगरों को जन परिवहन और विलवणीकरण संयंत्र जैसी विशाल परियोजनाओं को संघीय वित्तीय चक्रों की प्रतीक्षा किये बिना क्रियान्वित करने में सक्षम बनाता है।

निष्कर्ष: 

16वें वित्त आयोग के राजकोषीय प्रोत्साहनों और अर्बन चैलेंज फंड का एकीकरण भारत के महानगरीय विकास के लिये एक महत्त्वपूर्ण मोड़ है। हालाँकि, वित्तीय व्यय और रहने योग्य शहरों के बीच के अंतराल को न्यूनतम करने के लिये पारंपरिक प्रशासनिक नियंत्रण से हटकर पेशेवर, डेटा-आधारित 'सिटी-CEO' नेतृत्व की ओर एक मौलिक संकरण की आवश्यकता है। जलवायु-अनुकूल योजना को बाज़ार-आधारित राजकोषीय अनुशासन के साथ समेकित करके, भारत अंततः अपने शहरी केंद्रों को प्रशासनिक बोझ से राष्ट्रीय समृद्धि के संधारणीय, आत्मनिर्भर इंजनों में रूपांतरित कर सकता है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न

भारतीय शहरों में 'कार्यान्वयन गतिरोध' उत्पन्न करने वाली संरचनात्मक और प्रशासनिक बाधाओं का अभिनिर्धारण कीजिये। खंडित शासन व्यवस्था से एकीकृत शहरी नेतृत्व मॉडल की ओर संक्रमण के लिये बहुआयामी शासन सुधारों का सुझाव दीजिये। 

 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. 'अर्बन चैलेंज फंड' क्या है?

₹1 ट्रिलियन का एक बजटीय कोष, जिसे इस प्रकार तैयार किया गया है कि नगर निकायों को अपनी कुल पूंजी का 75% निजी स्रोतों से जुटाने की शर्त के माध्यम से बाज़ार-आधारित वित्तपोषण को प्रोत्साहित किया जा सके।

2.  लैंड वैल्यू कैप्चर (LVC) क्या है? 

एक वित्तपोषण विधि जिसमें सरकार सार्वजनिक अवसंरचना परियोजनाओं द्वारा उत्पन्न भूमि मूल्य में वृद्धि के एक हिस्से की वसूली करती है।

3. 'गैर-राजस्व जल' को परिभाषित कीजिये।

वह जल जो उत्पादित और शोधन के पश्चात भी उपभोक्ता तक पहुँचने से पहले ही रिसाव, चोरी या मीटरिंग की त्रुटियों के कारण नष्ट हो जाता है।

4. शासन में 'डिजिटल प्रतिरूप नगर' क्या होते हैं?

ये नगरों के आभासी त्रि-आयामी प्रतिरूप होते हैं, जिनका उपयोग तात्कालिक आँकड़ों के माध्यम से यातायात, उपयोगिताओं और आपदा-प्रतिक्रिया का अनुकरण तथा अनुकूलन करने के लिये किया जाता है।

5. 'सिटी CEO' मॉडल क्या है? 

एक ऐसी शासन संरचना जो नगर निगम आयुक्तों को निश्चित कार्यकाल और प्रदर्शन-आधारित लक्ष्यों के साथ आर्थिक विकास को गति देने के लिये सशक्त बनाती है।

 

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रिलिम्स 

प्रश्न 1. संविधान (73वाँ संशोधन) अधिनियम, 1992, जिसका उद्देश्य देश में पंचायती राज संस्थाओं को बढ़ावा देना है, निम्नलिखित में से किसका प्रावधान करता है? (2011)

  1. ज़िला योजना समितियों का गठन 
  2. राज्य निर्वाचन आयोगों द्वारा सभी पंचायत चुनावों का संचालन    
  3. राज्य वित्त आयोगों की स्थापना  

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1   

(b) केवल 1 और 2  

(c) केवल 2 और 3   

(d) 1, 2 और 3  

उत्तर: (c)


मेन्स

प्रश्न 1. क्या कमज़ोर और पिछड़े समुदायों के लिये आवश्यक सामाजिक संसाधनों को सुरक्षित करने के द्वारा, उनकी उन्नति के लिये सरकारी योजनाएँ, शहरी अर्थव्यवस्थाओं में व्यवसायों की स्थापना करने में उनको बहिष्कृत कर देती हैं? (2014)

प्रश्न 2. तेरहवें वित्त आयोग की अनुशंसाओं की विवेचना कीजिये जो स्थानीय शासन की वित्त-व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिये पिछले आयोगों से भिन्न हैं। (2013)