भारत-अज़रबैजान संबंध | 07 Apr 2026
प्रिलिम्स के लिये: ऑपरेशन सिंदूर, अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा, कैस्पियन बेसिन, नागोर्नो-काराबाख
मेन्स के लिये: भारत की “ डी-हाइफेनेशन” कूटनीति (पश्चिम एशिया और काकेशस क्षेत्र), भारत की मध्य एशिया नीति और यूरेशियन भू-राजनीति।
चर्चा में क्यों?
भारत के ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद एक वर्ष तक चले कूटनीतिक तनाव के पश्चात अज़रबैजान ने संबंधों को पुनः सामान्य करने की शुरुआत की है। दोनों देशों के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच विदेश कार्यालय परामर्श के छठे दौर की बैठक हुई, जो वर्ष 2022 के बाद पहली उच्च-स्तरीय बैठक है। यह कदम भारत की मध्य एशिया नीति के लिये इस संबंध पुनर्स्थापन के रणनीतिक महत्त्व को रेखांकित करता है।
- दोनों देशों ने पारस्परिक हित के विभिन्न क्षेत्रों को शामिल करते हुए द्विपक्षीय संबंधों की वर्तमान स्थिति की विस्तृत समीक्षा की। बैठक में व्यापार, प्रौद्योगिकी, पर्यटन, औषधि, ऊर्जा, संस्कृति, जन-से-जन संपर्क और सीमा पार आतंकवाद के विरुद्ध सहयोग जैसे मुद्दों पर चर्चा की गई।
सारांश
- भारत और अज़रबैजान ने हालिया तनाव के बाद कूटनीतिक संबंधों को पुनः स्थापित करने की पहल की है, जिसमें व्यापार, ऊर्जा, संपर्क (कनेक्टिविटी) और आतंकवाद-रोधी सहयोग में विस्तार पर ध्यान केंद्रित किया गया है। यह कदम भारत की मध्य एशिया नीति के लिये महत्त्वपूर्ण प्रभाव रखता है।
- यह पुनर्स्थापन रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे को सुदृढ़ करने, ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने और क्षेत्रीय भू-राजनीतिक चुनौतियों से निपटने में मदद करता है। हालाँकि इसके सामने आर्मेनिया के साथ संबंध, चीन का प्रभाव और कश्मीर मुद्दे पर मतभेद जैसी चुनौतियाँ भी मौजूद हैं।
भारत की मध्य एशिया नीति के लिये इस 'रीसेट' का रणनीतिक महत्त्व क्या है?
- अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे का विस्तार: अज़रबैजान INSTC के पश्चिमी मार्ग पर सबसे महत्त्वपूर्ण नोड है।
- भारत से आने वाला माल ईरान के बंदरगाह बंदर अब्बास या चाबहार बंदरगाह तक पहुँचता है। इसके बाद यह रेल/सड़क मार्ग से ईरान के भीतर होते हुए ईरान–अज़रबैजान सीमा स्थित अस्तारा तक पहुँचता है और वहाँ से अज़रबैजान के रास्ते रूस तथा यूरोप तक आगे बढ़ता है।
- अज़रबैजान के माध्यम से सुचारु पारगमन सुनिश्चित करके भारत मध्य एशिया और यूरेशिया तक एक विश्वसनीय स्थलीय मार्ग प्राप्त करता है, जो पूरी तरह पाकिस्तान को बाइपास करता है और उसके द्वारा नई दिल्ली को दिये जाने वाले पारगमन अधिकारों से इनकार की भौगोलिक बाधा को दूर करता है।
- पाकिस्तान-तुर्की-अज़रबैजान त्रिपक्षीय गठबंधन: पाकिस्तान, तुर्की और अज़रबैजान ने इस्लामी एकजुटता और पारस्परिक रक्षा के आधार पर एक त्रिपक्षीय रणनीतिक गठबंधन को औपचारिक रूप देने का प्रयास किया है, जिसमें नागोर्नो-काराबाख जैसे मुद्दों पर बकू के प्रति पाकिस्तान का समर्थन भी शामिल है।
- पाकिस्तान ने इसका उपयोग मध्य एशिया में भारत-विरोधी कथानक (नैरेटिव) को आगे बढ़ाने के लिये करने का प्रयास किया है। बकू के साथ व्यावहारिक रूप से संबंधों को पुनः स्थापित करके भारत अज़रबैजान के रणनीतिक प्रभाव क्षेत्र पर पाकिस्तान के एकाधिकार को रोकता है।
- ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करना: अज़रबैजान और मध्य एशियाई गणराज्य (कज़ाखस्तान, तुर्कमेनिस्तान) हाइड्रोकार्बन-समृद्ध कैस्पियन बेसिन को साझा करते हैं।
- यदि भारत भविष्य में ट्रांस-कैस्पियन पाइपलाइनों के माध्यम से स्वैप समझौतों के माध्यम द्वारा तुर्कमेन गैस या कज़ाख तेल को भारतीय बाज़ारों तक लाना चाहता है, तो बाकू के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।
- क्षेत्रीय सुरक्षा: ‘सीमा-पार आतंकवाद’ के मुद्दे को संबोधित करके भारत अपनी सुरक्षा चिंताओं को व्यापक क्षेत्रीय ढाँचों के साथ समन्वित कर रहा है, जिसमें SCO की क्षेत्रीय आतंकवाद-रोधी संरचना (RATS) भी शामिल है।
- संघर्षों का डी-हाइफेनेशन: भारत अपने संबंधों को डी-हाइफनेट करके कूटनीतिक परिपक्वता का प्रदर्शन कर रहा है। वह आर्मेनिया और अज़रबैजान के साथ अलग-अलग द्विपक्षीय रूप से व्यवहार करता है, जो मध्य पूर्व (इज़रायल-अरब देशों) में अपनाई गई उसकी रणनीति के अनुरूप है। परिणामस्वरूप, मध्य एशियाई देशों को एक निष्पक्ष, गैर-विघटनकारी और विश्वसनीय साझेदार के रूप में भारत की विश्वसनीयता का आश्वासन मिलता है।
भारत और अज़रबैजान के बीच कूटनीतिक तनाव
- ऑपरेशन सिंदूर पर असहमति: अज़रबैजान ने पाकिस्तान पर भारत की कार्रवाइयों की आलोचना की, जो आतंकवाद और सुरक्षा चिंताओं पर दोनों देशों के भिन्न दृष्टिकोण को दर्शाता है।
- विपरीत गठबंधन: अज़रबैजान की पाकिस्तान के साथ निकट साझेदारी आर्मेनिया के साथ भारत के रक्षा संबंधों के विपरीत है; नागोर्नो-काराबाख संघर्ष को लेकर अज़रबैजान और आर्मेनिया के बीच दृढ़ शत्रुता इस स्थिति को और जटिल बनाती है, जिससे परस्पर विरोधी भू-राजनीतिक हित उत्पन्न होते हैं।
- SCO सदस्यता को लेकर तनाव: सितंबर 2025 में अज़रबैजान के राष्ट्रपति ने भारत पर यह आरोप लगाया कि उसने प्रतिशोधस्वरूप अज़रबैजान के शंघाई सहयोग संगठन (SCO) में शामिल होने की प्रक्रिया को अवरुद्ध किया, जो बहुपक्षीय मंचों पर बढ़ते अविश्वास का संकेत देता है।
भारत-अज़रबैजान द्विपक्षीय संबंध कैसे हैं?
- ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत: भारत और अज़रबैजान के सभ्यतागत संबंध सिल्क रूट के समय से जुड़े हैं। इसका प्रमुख उदाहरण बाकू के पास स्थित 18वीं सदी का ‘अतेशगाह’ अग्नि मंदिर है, जिसमें देवनागरी और गुरुमुखी लिपि में अभिलेख आज भी मौजूद हैं।
- कूटनीतिक मील के पत्थर: सोवियत संघ के विघटन के बाद भारत ने दिसंबर 1991 में अज़रबैजान की स्वतंत्रता को आधिकारिक मान्यता दी।
- उच्च-स्तरीय राजनीतिक समन्वय अक्सर बहुपक्षीय मंचों पर होता है, विशेष रूप से गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) और वॉयस ऑफ ग्लोबल साउथ समिट (VoGSS) में।
- रणनीतिक सहभागिताएँ: बाकू वैश्विक कूटनीति का एक प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है, जहाँ नवंबर 2024 में आयोजित 29वें संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (COP29) और नवंबर 2025 में आयोजित विश्व दूरसंचार विकास सम्मेलन (WTDC-25) सहित प्रमुख शिखर सम्मेलनों के लिये भारतीय प्रतिनिधिमंडलों ने भाग लिया है।
- ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक व्यापार: जहाँ द्विपक्षीय व्यापार 2022 में 1.88 अरब अमेरिकी डॉलर के उच्चतम स्तर पर पहुँचा था, वहीं वर्ष 2025 में यह 401 मिलियन अमेरिकी डॉलर रहा, जिसमें मुख्यतः भारत द्वारा कच्चे तेल का आयात प्रमुख रहा।
- भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिये महत्त्वपूर्ण रूप से ONGC विदेश लिमिटेड (OVL) ने इस क्षेत्र में 1.2 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक का भारी निवेश किया है और अज़ेरी-चिराग-गुनाशली (ACG) तेल एवं गैस क्षेत्रों तथा रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण बाकू-त्बिलिसी-जेहान (BTC) पाइपलाइन में उल्लेखनीय हिस्सेदारी रखता है।
- क्षमता निर्माण एवं शिक्षा: भारत भारतीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग (ITEC) कार्यक्रम के माध्यम से अज़रबैजान के संस्थागत क्षमता निर्माण में सक्रिय रूप से योगदान देता है।
- जन-से-जन संपर्क: भारत एक प्रमुख पर्यटन स्रोत बाज़ार के रूप में उभरा है और वर्ष 2025 में अज़रबैजान आने वाले पर्यटकों के स्रोत देशों में चौथे स्थान पर रहा।
- इसके अतिरिक्त, लगभग 1,000 लोगों का सक्रिय भारतीय प्रवासी समुदाय, जिसमें पेशेवर और छात्र शामिल हैं, द्विपक्षीय सद्भाव को बढ़ावा देने में सहायक है।
भारत-अज़रबैजान द्विपक्षीय संबंधों में क्या चुनौतियाँ हैं?
- आर्मेनिया कारक: आर्मेनिया और अज़रबैजान के बीच अनसुलझा तनाव अचानक व्यापार मार्गों को बाधित कर सकता है। भारत ने आर्मेनिया के साथ अपने रक्षा संबंधों को काफी दृढ़ किया है और वह सैन्य उपकरणों (जैसे– पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लांचर और स्वाति वेपन-लोकेटिंग रडार) का एक प्रमुख आपूर्तिकर्त्ता बन गया है।
- अज़रबैजान ने अपने क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी को "हथियारबंद" करने के लिये नई दिल्ली की खुलकर आलोचना की है, जिससे गंभीर राजनयिक तनाव उत्पन्न हो गया है।
- बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI): चीन ने BRI के तहत विशाल अवसंरचना ऋणों के माध्यम से मध्य एशिया और काॅकेशस में स्वयं स्थापित कर लिया है। चीन की व्यापक वित्तीय शक्ति की तुलना में भारत की कनेक्टिविटी परियोजनाएँ धीमे क्रियान्वयन से गुज़र रही हैं।
- रूस और ईरान पर पश्चिमी प्रतिबंध INSTC की वित्तीय और तार्किक व्यवहार्यता को जटिल बनाते हैं, जिससे अज़रबैजान के मार्ग और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है, हालाँकि इन्हें वित्तीय रूप से नेविगेट करना मुश्किल हो जाता है।
- कश्मीर और आतंकवाद पर मतभेद: इस्लामिक सहयोग संगठन के सदस्य के रूप में अज़रबैजान ने प्रायः कश्मीर पर पाकिस्तान के रुख के साथ तालमेल बिठाया है और सीमा-पार आतंकवाद पर भारत की चिंताओं का दृढ़ता से समर्थन नहीं किया है।
- आर्थिक असंतुलन और सीमित विविधीकरण: द्विपक्षीय व्यापार कच्चे तेल के आयात की ओर भारी रूप से झुका हुआ है, जिसमें फार्मा, IT और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में न्यूनतम जुड़ाव है, जिसके परिणामस्वरूप निरंतर व्यापार असंतुलन बना हुआ है।
भारत-अज़रबैजान द्विपक्षीय संबंधों को कौन-से उपाय सुदृढ़ कर सकते हैं?
- सख्त "डी-हाइफेनेशन" पॉलिसी: भारत को स्पष्ट रूप से संवाद करना चाहिये कि दक्षिण काॅकेशस में उसके संबंध एक-दूसरे से स्वतंत्र हैं।
- जिस प्रकार भारत ने इज़रायल और फिलिस्तीन या ईरान और सऊदी अरब के साथ अपने संबंधों को सफलतापूर्वक डी-हाइफेनेट किया, उसे यह सुनिश्चित करना चाहिये कि आर्मेनिया के साथ उसकी रक्षा साझेदारी का अर्थ अज़रबैजान के प्रति राजनयिक शत्रुता नहीं है।
- चाबहार को मिडल कॉरिडोर के साथ एकीकृत करना: भारत को चाबहार बंदरगाह संचालन को अज़रबैजान के माध्यम से ट्रांस-कैस्पियन अंतर्राष्ट्रीय परिवहन मार्ग (मध्य गलियारे) से जोड़ने के लिये आक्रामक रूप से आगे बढ़ना चाहिये, जिससे मुंबई से मध्य एशिया तक एक निर्बाध मल्टी-मॉडल नेटवर्क बन सके।
- आर्थिक विविधीकरण: तेल से इतर, भारत को अज़रबैजान और मध्य एशियाई देशों (CARs) में अपनी आर्थिक उपस्थिति को गहरा करने के लिये आईटी (IT), फार्मास्यूटिकल्स और डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी अवसंरचना (DPI) में अपने सामर्थ्य का लाभ उठाना चाहिये। इससे ऐसी निर्भरताएँ उत्पन्न होंगी जिनकी बराबरी पाकिस्तान नहीं कर सकता।
- संस्थागत संवाद: भारत को अज़रबैजान, कज़ाखस्तान और तुर्कमेनिस्तान के साथ कैस्पियन क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा, व्यापार और ऊर्जा पर सामूहिक रूप से जुड़ने के लिये भारत-मध्य एशिया शिखर सम्मेलन के समान एक "कैस्पियन-इंडिया डायलॉग" प्रारूप का प्रस्ताव करना चाहिये।
निष्कर्ष
अज़रबैजान के साथ भारत का पुनर्संबंध ऊर्जा सुरक्षा और मध्य एशिया तक पहुँच के लिये महत्त्वपूर्ण है, जिसमें अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। भारत को आर्मेनिया के साथ संबंधों को संतुलित रखते हुए अज़रबैजान के साथ आर्थिक संबंधों को सुदृढ़ करना चाहिये।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. अज़रबैजान केवल एक दक्षिण काॅकेशस राज्य ही नहीं है, बल्कि भारत की 'कनेक्ट सेंट्रल एशिया' नीति का रणनीतिक केंद्र है। चर्चा कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. भारत के लिये INSTC का क्या महत्त्व है?
अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए मध्य एशिया और यूरोप के लिये एक छोटा, लागत प्रभावी व्यापार मार्ग प्रदान करता है।
2. अज़रबैजान भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिये क्यों महत्त्वपूर्ण है?
यह हाइड्रोकार्बन-समृद्ध कैस्पियन क्षेत्र का हिस्सा है, जिसमें ONGC विदेश लिमिटेड का प्रमुख तेल क्षेत्रों और पाइपलाइनों में निवेश है।
3. भारत और अज़रबैजान के बीच हालिया राजनयिक तनाव का क्या कारण है?
ऑपरेशन सिंदूर पर मतभेद, विरोधी गठबंधन (पाकिस्तान बनाम आर्मेनिया) और शंघाई सहयोग संगठन जैसे मंचों में तनाव।
4. भारत की 'डी-हाइफेनेशन' पॉलिसी क्या है?
इसका अर्थ है द्विपक्षीय संबंधों को जोड़े बगैर देशों (जैसे– आर्मेनिया और अज़रबैजान) से स्वतंत्र रूप से जुड़ना।
5. भारत-अज़रबैजान व्यापार में प्रमुख चुनौती क्या है?
कच्चे तेल के आयात पर अत्यधिक निर्भरता, जिससे सीमित विविधीकरण और व्यापार असंतुलन होता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
मेन्स
प्रश्न. मध्य एशियाई गणराज्यों (CAR) के साथ भारत के विकसित होते राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक संबंधों का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिये तथा क्षेत्रीय और वैश्विक भू-राजनीति में उनके बढ़ते महत्त्व पर प्रकाश डालिये। (2024)