जनसांख्यिकीय शीत और भारत का संकुचित जनसांख्यिकीय लाभांश | 22 Jan 2026

प्रिलिम्स के लिये: जनसांख्यिकीय शीत , कुल प्रजनन दर, केयर इकॉनमी, सिल्वर इकॉनमी

मेन्स के लिये: जनसांख्यिकीय संक्रमण और इसके आर्थिक प्रभाव, जनसांख्यिकीय लाभांश बनाम जनसांख्यिकीय बोझ

स्रोत: द हिंदू 

चर्चा में क्यों? 

वर्ष 2025 में चीन की जनसंख्या लगातार चौथे वर्ष घटकर 3.39 मिलियन की कमी के साथ 1.405 बिलियन रह गई, जहाँ जन्म दर 7.92 मिलियन के ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुँच गई। यह एक गहराते जनसांख्यिकीय संकट का संकेत है।

  • इससे भारत को महत्त्वपूर्ण सीख मिलती है, जो सबसे अधिक आबादी वाला देश होने के बावज़ूद अपनी कुल प्रजनन दर में अनुमान से तेज़ गिरावट का सामना कर रहा है।

सारांश

  • चीन का जनसांख्यिकीय शीत निरंतर निम्न प्रजनन दर और समाज के वृद्ध होने से उत्पन्न जोखिमों को उजागर करता है, जो भारत के लिये समय रहते सीख प्रदान करता है। भारत में कुल प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर से नीचे आ गई है, साथ ही जनसांख्यिकीय लाभांश की समयावधि तीव्रता से संकुचित हो रही है।
  • भारत अब भी अपनी युवा जनसंख्या की संभावनाओं को आर्थिक शक्ति में परिवर्तित कर सकता है—अगर वह रोज़गार के अवसर में वृद्धि, भविष्य-उन्मुख कौशल प्रशिक्षण, महिलाओं की कार्यक्षेत्र में भागीदारी, श्रमिक आवागमन की सुविधा और वृद्धावस्था की तैयारी पर ध्यान केंद्रित करे।

जनसांख्यिकीय शीत क्या है?

  • जनसांख्यिकीय शीत एक गंभीर और दीर्घकालिक जनसंख्या कमी को दर्शाता है। यह स्थिति लगातार कम जन्म दर (प्रतिस्थापन स्तर ~2.1 बच्चे प्रति महिला से नीचे) और उसके बाद होने वाली जनसंख्या की आयु में वृद्धि के कारण उत्पन्न होती है। इसके परिणामस्वरूप कार्यबल का संकुचन, वृद्ध आबादी की  निर्भरता में वृद्धि और सामाजिक व्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ता है।
  • चीन में जनसांख्यिकीय शीत के कारण:
    • लिगेसी ऑफ वन-चाइल्ड पॉलिसी (वर्ष 1980-2015): इस पॉलिसी ने बच्चों को जन्म देने वाली उम्र की महिलाओं की संख्या में भारी कमी कर दी।
      • हालाँकि चीन ने "टू-चाइल्ड" (2016) और "थ्री-चाइल्ड" (2021) पॉलिसी को अपनाया, परिवार छोटा रखने की सामाजिक आदत अब गहराई से जड़ें जमा चुकी हैं।
    • जीवनयापन की उच्च लागत: "थ्री माउंटेन" (शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और आवास) चीनी शहरों में बच्चों को पालना बेहद महंगा बना देते हैं।
    • बदलती सामाजिक मानसिकता: चीन की युवा पीढ़ी (जेनरेशन ज़ी) तेज़ी से "तांग पिंग" (लेट जाने/उदासीनता) के विकल्प को अपना रही है। वे शादी और बच्चों को जन्म देने के सामाजिक दबाव को खारिज करके कम तनाव वाले जीवन को प्राथमिकता दे रहे हैं।
      • शादी के पंजीकरण में भारी गिरावट आई है, जिसका सीधा प्रभाव जन्म दर पर पड़ता है, क्योंकि चीन में सांस्कृतिक और कानूनी रूप से विवाहेतर जन्म लेना कठिन बना हुआ है।

जनसांख्यिकीय शीत के प्रभाव

  • उलटा जनसंख्या पिरामिड: कम जन्म दर, बढ़ती वृद्ध आबादी, संकुचित कार्यबल और बढ़ता आश्रित अनुपात जनसांख्यिकीय शीत को और गहन बनाते हैं।
    • बढ़ता वित्तीय दबाव: कम कर्मचारियों द्वारा बढ़ती वृद्ध आबादी का समर्थन करने से पेंशन, स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक सुरक्षा प्रणालियों पर दबाव बढ़ता है। 
    • स्वास्थ्य सेवा और वृद्धावस्था सहायता पर सरकारी खर्च बढ़ता है, जबकि कर राजस्व स्थिर रहता है या घटता है।
  • आर्थिक मंदी: कम उपभोग, घटता नवाचार और कमज़ोर उत्पादकता वृद्धि अर्थव्यवस्था को दीर्घकालिक ठहराव में फँसा सकती है।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताएँ: छोटी युवा आबादी से सैन्य भर्ती और दीर्घकालिक रणनीतिक क्षमता प्रभावित हो सकती है।
  • सामाजिक तनाव: वृद्ध होते समाज को अकेलापन, पीढ़ीगत असमानता और सामुदायिक व पारिवारिक सहायता प्रणालियों को बनाए रखने में बढ़ती चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

कुल प्रजनन दर और प्रतिस्थापन स्तर

  • कुल प्रजनन दर (TFR): यह एक महिला द्वारा अपने प्रजनन काल (15-49 वर्ष) में जन्म देने वाले बच्चों की औसत संख्या को दर्शाती है, जो कि आयु-विशिष्ट प्रजनन दरों पर आधारित है।
  • प्रतिस्थापन स्तर: 2.1 की कुल प्रजनन दर को ‘प्रतिस्थापन स्तर’ माना जाता है, जिसका अर्थ है कि इस दर पर प्रत्येक पीढ़ी अपनी जगह अगली पीढ़ी का स्थान लेती है, बिना जनसंख्या में उल्लेखनीय वृद्धि या कमी के।

भारत की जनसांख्यिकीय स्थिति क्या है?

  • प्रतिस्थापन स्तर से कम कुल प्रजनन दर: प्रतिदर्श पंजीकरण प्रणाली (SRS) सांख्यिकीय रिपोर्ट 2023 के अनुसार, भारत की कुल प्रजनन दर राष्ट्रीय स्तर से घटकर 1.9 हो गई है। ग्रामीण भारत में यह दर सर्वप्रथम 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर तक पहुँची है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह और कम होकर 1.5 दर्ज की गई है।
    • राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (2019-21) के अनुसार, भारत की कुल प्रजनन दर प्रति महिला 2.0 बच्चों तक पहुँच गई है, जो 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर से नीचे है।
    • इसका अर्थ है कि एक पीढ़ी अपने स्थान पर आने के लिये पर्याप्त बच्चों को जन्म  नहीं दे पा रही हैं, जिससे अंततः जनसंख्या स्थिरीकरण और फिर कमी (अनुमानित वर्ष 2060-70 के आसपास) होने की संभावना है।
  • उत्तर-दक्षिण विभाजन:
    • दक्षिण भारत (केरल, तमिलनाडु): इन राज्यों की कुल प्रजनन दर (TFR) विकसित देशों के समान (1.6–1.7) है, जो मुख्य रूप से समय पर और प्रभावी जनसंख्या नियंत्रण उपायों के कारण है। अब ये चीन की तरह वृद्ध होती जनसंख्या की समस्या का सामना कर रहे हैं।
    • उत्तरी भारत (बिहार, उत्तर प्रदेश): इन राज्यों की कुल प्रजनन दर (TFR) अभी भी अधिक है (2.4 से ऊपर) और ये भारत की युवा कार्यशक्ति का अधिकांश हिस्सा प्रदान करते हैं।
      • उत्तरी से दक्षिणी भारत की ओर प्रवास श्रम की कमी को पूरा करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
  • जनसांख्यिकीय लाभ का सीमित अवसर: भारत में "युवा संख्या में वृद्धि" है, जिसकी मध्य आयु 28.4 वर्ष (जबकि चीन में यह लगभग 40 वर्ष) है।
    • हालाँकि यह अवसर अल्पकालिक है। कार्य-योग्य आबादी का उच्चतम स्तर 2041 तक पहुँचने का अनुमान है, जबकि वृद्ध जनसंख्या (60 वर्ष से ऊपर) आज 149 मिलियन (10.5%) से बढ़कर 2050 तक 347 मिलियन (20.8%) हो जाएगी।
    • अगर भारत तेज़ी से कौशल विकास और रोज़गार सृजन नहीं करता, तो उसका जनसांख्यिकीय लाभ जनसांख्यिकीय शीत में बदल सकता है।

भारत में जनसंख्या नीति और उपाय

भारत वह पहला देश था जिसने 1952 में राष्ट्रीय परिवार नियोजन कार्यक्रम की शुरुआत की। तब से इसकी रणनीति क्लिनिक-आधारित लक्ष्यों वाले मॉडल से विकसित होकर एक स्वैच्छिक, अधिकार-आधारित मॉडल में बदल गई है, जो बलपूर्वक उपायों के बजाय प्रजनन स्वास्थ्य, महिला सशक्तीकरण और सूचित विकल्पों पर केंद्रित है।

  • नीतिगत ढाँचा:
    • राष्ट्रीय जनसंख्या नीति, 2000: यह जनसंख्या स्थिरीकरण के लिये ढाँचा प्रदान करती है, जिसमें अप्रयुक्त गर्भनिरोधक आवश्यकताओं को पूरा करना, प्रजनन दर को कम करना, प्रतिस्थापन स्तर की कुल प्रजनन दर (TFR 2.1) हासिल करना (जो वर्ष 2020–21 में राष्ट्रीय स्तर पर प्राप्त हो गई) और वर्ष 2045 तक स्थिर जनसंख्या का लक्ष्य शामिल है।
    • राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017: प्रजनन, मातृत्व, नवजात, बाल और किशोर स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के माध्यम से जनसंख्या लक्ष्यों को मज़बूत करती है।
  • मुख्य उपाय:
    • मिशन परिवार विकास: यह उच्च प्रजनन दर वाले ज़िलों पर केंद्रित है और परिवार नियोजन सेवाओं की पहुँच को बेहतर बनाने का लक्ष्य रखता है।
    • स्थिरीकरण स्वीकारकर्त्ताओं हेतु मुआवज़ा योजना: यह स्थिरीकरण कराने वाले लाभार्थियों को वेतन हानि के लिये मुआवज़ा प्रदान करती है।
    • घर-घर सेवा: आशा कार्यकर्त्ता गर्भनिरोधक उपकरण सीधे घर-घर पहुँचाती हैं। 
    • जागरूकता अभियान: इसमें विश्व जनसंख्या दिवस और पखवाड़ा तथा नसबंदी पखवाड़ा जैसे कार्यक्रम शामिल हैं।
    • परिवार नियोजन लॉजिस्टिक्स प्रबंधन सूचना प्रणाली (FP-LMIS): यह सभी स्तरों की स्वास्थ्य सुविधाओं तक परिवार नियोजन सामग्री की अंतिम छोर (लास्ट-माइल) उपलब्धता सुनिश्चित करती है।

भारत के जनसांख्यिकीय दोधारी तलवार के सामने क्या चुनौतियाँ हैं?

  • रोज़गारहीन वृद्धि का विरोधाभास: भारत का सबसे बड़ा जनसांख्यिकीय जोखिम GDP वृद्धि और रोज़गार लोच (प्रति इकाई वृद्धि पर सृजित होने वाली नौकरियों की संख्या) के बीच बढ़ते अंतर में निहित है।
    • सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था होने के बावजूद रोज़गार सृजन पीछे रहा है। PLFS 2024–25 के अनुसार, कुल बेरोज़गारी लगभग 4.9% पर स्थिर है, लेकिन युवा बेरोज़गारी (15–29 वर्ष) अब भी 10–15% के बीच बनी हुई है।
    • शिक्षित लेकिन बेरोज़गार युवाओं का बड़ा समूह सामाजिक अशांति, लोकलुभावन राजनीति और आरक्षण के विस्तार की मांग को बढ़ावा दे सकता है, जिससे सामाजिक और राजनीतिक स्थिरता कमज़ोर हो सकती है।
  • डिग्री–कौशल असंगति: भारत हर वर्ष लाखों स्नातक तैयार करता है, लेकिन उनमें से कई में उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप कौशल की कमी होती है।
    • इंडिया स्किल्स रिपोर्ट, 2025 के अनुसार, स्नातकों की रोज़गार-योग्यता लगभग 55% है, जिसका अर्थ है कि करीब 45% स्नातकों में अब भी आधुनिक अर्थव्यवस्था के लिये आवश्यक विशिष्ट कौशल, जैसे– कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), डेटा एनालिटिक्स और उन्नत विनिर्माण का अभाव है।
    • कई विश्वविद्यालयों के पुराने पाठ्यक्रमों के चलते यह विरोधाभासी स्थिति उत्पन्न हो गई है कि उद्योगों को कुशल प्रतिभा नहीं मिलती, जबकि स्नातक रोज़गार के अवसरों से वंचित रह जाते हैं।
  • चौथी औद्योगिक क्रांति का खतरा: भारत ऐसे समय अपने जनसांख्यिकीय शिखर में प्रवेश कर रहा है, जब AI और स्वचालन कम-कौशल आधारित नौकरियों को तेज़ी से प्रभावित कर रहे हैं।
    • पारंपरिक विकास मार्ग, जिसमें कृषि से कम-स्तरीय विनिर्माण और फिर सेवा क्षेत्र की ओर बढ़ना शामिल था, अब कमज़ोर पड़ रहा है, क्योंकि AI और रोबोटिक्स सस्ते श्रम का विकल्प बनते जा रहे हैं।
    • भारत अब चीन की तरह 1990 के दशक में अपनाए गए “सस्ते श्रम” मॉडल पर भरोसा नहीं कर सकता, क्योंकि AI के प्रभाव से लुइस टर्निंग पॉइंट अर्थात अतिरिक्त ग्रामीण श्रम की उपलब्धता तेज़ी से सिमट रही है।
      • अगर भारत के युवाओं को केवल कम-कौशल वाले BPO या असेंबली कार्यों के लिये प्रशिक्षित किया गया, तो वे रोज़गार मिलने से पहले ही अप्रयुक्त या अप्रचलित हो जाने का जोखिम झेल सकते हैं।
  • “दो भारत” की चुनौती: उत्तर और दक्षिण में कुल प्रजनन दर (TFR) का अंतर राज्यों के बीच प्रवासन को बढ़ाएगा, लेकिन पोर्टेबल सामाजिक सुरक्षा और समान श्रम संरक्षण की कमी प्रवासी श्रमिकों के बहिष्कार, क्षेत्रीय तनाव और “भूमिपुत्र” जैसी राजनीति का जोखिम उत्पन्न करती है।
  • महिला श्रम भागीदारी कम होना: भारत का जनसांख्यिकीय लाभ महिलाओं को शामिल किये बिना पूरा नहीं हो सकता।
    • हालाँकि महिला श्रम बल भागीदारी (FLFP) 23.3% से बढ़कर 41.7% (2017–24) हो गई है, यह फिर भी चीन (~60%) और वियतनाम (~70%) के स्तर से काफी कम है।
    • देखभाल अर्थव्यवस्था का बोझ, सुरक्षा संबंधी चिंताएँ और लचीले सफेद-कॉलर नौकरियों की कमी कई महिलाओं को कार्यबल से बाहर कर देती हैं, जिससे U-आकार की श्रम भागीदारी की बाधा और आर्थिक वृद्धि की संभावनाएँ सीमित होती हैं।
  • असंगठित ‘सिल्वर इकॉनमी’: भारत की वृद्ध जनसंख्या तेज़ी से बढ़ रही है, 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के समूह की संख्या वर्ष 2036 तक लगभग 230 मिलियन (दोगुनी) होने की संभावना है, जिससे वृद्धावस्था निर्भरता अनुपात में तीव्र वृद्धि होगी।  
    • समर्थन अनुपात 1997 में 14:1 से गिरकर 2023 में 10:1 हो गया तथा वर्ष 2050 तक यह 4.6:1 और 2100 तक 1.9:1 तक गिरने का अनुमान है, जो जापान जैसी वृद्ध होती अर्थव्यवस्थाओं के स्तर के निकट है।
    • वरिष्ठ नागरिकों की खपत वर्ष 2050 तक 8% से बढ़कर 15% होने की संभावना है। कमज़ोर पेंशन, सीमित स्वास्थ्य सेवा और संयुक्त परिवारों का क्षय यदि वर्तमान जनसांख्यिक अवसर के दौरान संपत्ति नहीं बनाई गई, तो यह गंभीर वित्तीय और सामाजिक दबाव उत्पन्न कर सकता है।

भारत को अपनी ‘जनसांख्यिक संभावना’ को ‘आर्थिक शक्ति’ में बदलने के लिये कौन-से कदम उठाने चाहिये?

  • इंडस्ट्री 4.0 के लिये कौशल विकास: सेक्टर स्किल काउंसिल्स की स्थापना करना, जो वास्तविक समय के उद्योग आवश्यकताओं (जैसे– ड्रोन तकनीक, ग्रीन हाइड्रोजन, एआई) के आधार पर शैक्षिक पाठ्यक्रम निर्धारित करना, ताकि स्नातक ‘डे-वन रेडी’ हों।
    • डिजिटल प्लेटफॉर्म (जैसे– SWAYAM) के माध्यम से कार्यबल को एआई युग में कौशल के तीव्र अप्रचलन के साथ अनुकूलित होने में सहायता करना।
  • ‘मेक इन इंडिया’ को विश्व स्तर पर ले जाना: हालाँकि आईटी भारत की ताकत है, यह लाखों ग्रामीण युवाओं को रोज़गार नहीं दे सकता। ध्यान श्रम-प्रधान विनिर्माण (जैसे– वस्त्र, चमड़ा, जूते, खाद्य प्रसंस्करण) की ओर स्थानांतरित करना चाहिये, जैसा वियतनाम/बांग्लादेश मॉडल में देखा जाता है।
    • उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं को इस तरह समायोजित किया जाना चाहिये कि वे उन उद्योगों को अधिक लाभ प्रदान करें, जो केवल पूंजी-प्रधान उत्पादन के बजाय अधिक रोज़गार सृजन करते हैं।
  • महिला-नेतृत्व विकास: ‘केयर इकॉनमी’ (जैसे– क्रेच, आंगनवाड़ी, वरिष्ठ नागरिक देखभाल) में भारी निवेश करना। इससे महिलाओं के लिये लाखों नौकरियाँ सृजित होंगी और कुशल महिलाएँ औपचारिक कार्यबल में शामिल हो सकेंगी।
  • उत्तर-दक्षिण विभाजन को पाटना: राष्ट्रीय प्रवासन नीति विकसित करना ताकि सामाजिक सुरक्षा की सुवाह्यता (पोर्टेबिलिटी) सुनिश्चित हो सके। ‘वन नेशन, वन राशन कार्ड’ और पोर्टेबल स्वास्थ्य लाभ (आयुष्मान भारत) को तेज़ करना, ताकि उत्तर से आए प्रवासी दक्षिण में बहिष्कृत न हों।
  • ‘सिल्वर इकॉनमी’ के लिये तैयारी: नीतिगत ढाँचा तैयार करना ताकि सेवानिवृत्त लेकिन सक्षम वरिष्ठ नागरिकों को मेंटरशिप या कंसल्टेंसी भूमिकाओं में, उनके अनुभव का उपयोग करते हुए (‘सेकंड इनिंग्स’), पुनः रोज़गार दिया जा सके
  • ग्लोबल स्किल कॉरिडोर: जापान, जर्मनी, रूस जैसी वृद्ध होती अर्थव्यवस्थाओं के साथ माइग्रेशन और मोबिलिटी पार्टनरशिप एग्रीमेंट्स (MMPA) को तेज़ी से हस्ताक्षरित करना, ताकि प्रशिक्षित भारतीय केयरगिवर्स और नर्सों को आधिकारिक रूप से नियुक्त किये जा सके और भारत को ‘विश्व का मानव संसाधन राजधानी’ (HR Capital of the World) बनाया जा सके।

निष्कर्ष

आगामी 25 वर्ष, अर्थात ‘अमृत काल’, भारत के लिये ‘करो या मरो’ (मेक या ब्रेक) के क्षण हैं। समय तय करेगा कि भारत पूर्वी एशियाई टाइगर्स की विकास कहानी की नकल करता है या ‘मिडिल इनकम ट्रैप’ में फँस जाता है। सफलता जनसंख्या के आकार में नहीं, बल्कि मानव संसाधन की गुणवत्ता में निहित है। जैसा कहावत है, “जनसांख्यिकी अवसर प्रदान करती है, लेकिन नीतियाँ लाभ देती हैं।”

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न: “जनसांख्यिकी ही नियति है, लेकिन यह कोई गारंटी नहीं है।” भारत ‘मिडिल-इनकम ट्रैप’ से कैसे बच सकता है और अपनी ‘युवा जनसंख्या’ को एक सतत भू-राजनीतिक बढ़त में कैसे परिवर्तित कर सकता है?

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. जनसांख्यिकीय शीत से क्या तात्पर्य है?
जनसांख्यिकीय शीत का अर्थ है प्रतिस्थापन स्तर से नीचे बनी रहने वाली कम प्रजनन दर के कारण दीर्घकालिक जनसंख्या में गिरावट, जिससे जनसंख्या का वृद्ध होना, श्रम की कमी और आश्रितता अनुपात में वृद्धि होती है।

2. चीन में जनसांख्यिकीय शीत क्यों देखा जा रहा है?
चीन में इसका प्रमुख कारण वन-चाइल्ड नीति की विरासत, जीवन-यापन की बढ़ती लागत, विवाह दर में गिरावट, तथा ‘टैंग पिंग’ जैसी बदलती सामाजिक प्रवृत्तियाँ हैं।

3. भारत की वर्तमान कुल प्रजनन दर (TFR) क्या है?
भारत की राष्ट्रीय TFR घटकर 1.9 (SRS 2023) हो गई है, जो प्रतिस्थापन स्तर से नीचे है। ग्रामीण भारत में यह 2.1 और शहरी भारत में 1.5 है।

4. भारत के जनसांख्यिक लाभांश को दोधारी तलवार क्यों माना जाता है?
यद्यपि भारत के पास बड़ी युवा संख्या है, लेकिन रोज़गारविहीन वृद्धि, कौशल असंतुलन, एआई-प्रेरित व्यवधान तथा महिलाओं की कम कार्यबल भागीदारी इस लाभांश को जनसांख्यिक बोझ में बदलने का जोखिम उत्पन्न करती है।

5. भारत की जनसांख्यिक क्षमता को आर्थिक शक्ति में बदलने के लिये कौन-से प्रमुख कदम आवश्यक हैं?
भारत को इंडस्ट्री 4.0 से संबंधित कौशल विकास, श्रम-प्रधान विनिर्माण, महिला-नेतृत्व विकास, प्रवासन सुवाह्यता, सिल्वर इकॉनमी की तैयारी तथा ग्लोबल स्किल कॉरिडोर पर विशेष ध्यान देना होगा।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रश्न 1. ''महिलाओं को सशक्त बनाना जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने की कुंजी है।'' चर्चा कीजिये। (2019)

प्रश्न 2. भारत में वृद्ध जनसमूह पर वैश्वीकरण के प्रभाव का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिये। (2013) 

प्रश्न 3. जनसंख्या शिक्षा के प्रमुख उद्देश्यों की विवेचना करते हुए भारत में इन्हें प्राप्त करने के उपायों पर विस्तृत प्रकाश डालिये। (2021)