अंतर्राष्ट्रीय बांध सुरक्षा सम्मेलन (ICDS) 2026
चर्चा में क्यों?
बंगलूरू में अंतर्राष्ट्रीय बांध सुरक्षा सम्मेलन (ICDS) 2026 सफलतापूर्वक संपन्न हुआ, जो भारत के बांध सुरक्षा पारिस्थितिक तंत्र को सुदृढ़ करने के लिये एक महत्त्वपूर्ण मंच के रूप में कार्य करता है।
ICDS 2026 के मुख्य बिंदु क्या हैं?
- बांध सुरक्षा ढाँचा: सम्मेलन ने भारत के बांधों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये बांध सुरक्षा अधिनियम, 2021 और बांध पुनर्वास और सुधार परियोजना (DRIP) के कार्यान्वयन पर बल दिया।
- अवसाद प्रबंधन: जलाशयों में अवसाद के जमाव को जल सुरक्षा के लिये एक बड़े खतरे के रूप में पहचाना गया, जो जलग्रहण क्षेत्र के उपचार और रिमोट सेंसिंग जैसे निवारक उपायों की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
- विशेषज्ञों ने भारत के बांध पोर्टफोलियो में सुरक्षा उपायों को प्राथमिकता देने के लिये 'जोखिम स्क्रीनिंग' और 'डैम ब्रेक असिसमेंट' जैसे उपकरणों की सिफारिश की।
- बाढ़ प्रबंधन: बाढ़ और सूखे के प्रबंधन के लिये 'डायनेमिक रूल कर्व्स' और रियल टाइम डेटा शेयरिंग का उपयोग करते हुए पूर्वानुमान-आधारित और बेसिन-स्तर पर समन्वित जलाशय संचालन के महत्त्व पर बल दिया गया।
- आपातकालीन तैयारी: सम्मेलन ने सामुदायिक तैयारी और संस्थागत प्रतिक्रिया को बढ़ाने के लिये आपातकालीन कार्ययोजनाओं (EAP), फ्लडप्लेन ज़ोनिंग और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को सुदृढ़ करने पर बल दिया।
अंतर्राष्ट्रीय बांध सुरक्षा सम्मेलन (ICDS) 2026
- ICDS 2026, DRIP के चरण II एवं III के तहत आयोजित शृंखला का दूसरा कार्यक्रम है, जिसका पहला आयोजन वर्ष 2023 में जयपुर में हुआ था।
- इसका आयोजन संयुक्त रूप से कर्नाटक सरकार, जल शक्ति मंत्रालय, केंद्रीय जल आयोग (CWC), IISc बंगलूरू और विश्व बैंक द्वारा किया गया था।
बांध पुनर्वास और सुधार परियोजना क्या है?
- DRIP: यह जल शक्ति मंत्रालय की एक प्रमुख पहल है, जिसे भारत में बांधों की संरचनात्मक सुरक्षा और परिचालन दक्षता बढ़ाने के लिये डिज़ाइन किया गया है।
- विश्व बैंक और एशियाई अवसंरचना निवेश बैंक (AIIB) द्वारा वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। DRIP के प्रत्येक चरण को 500 मिलियन अमेरिकी डॉलर की बाहरी सहायता प्राप्त होती है।
- आवश्यकता: भारत बड़े बांधों की संख्या में (चीन और अमेरिका के बाद) विश्व में तीसरे स्थान पर है, जिसके पास 6628 बांधों का पोर्टफोलियो है (निर्दिष्ट बांधों के राष्ट्रीय रजिस्टर, 2025)।
- इस पुरानी अवसंरचना की सुरक्षा और परिचालन दक्षता सुनिश्चित करना जल सुरक्षा के लिये महत्त्वपूर्ण है, जिससे DRIP आवश्यक हो जाता है।
- उद्देश्य:
- सुरक्षा सुधार: चयनित मौजूदा बांधों और उनसे जुड़े उपकरणों की सुरक्षा तथा संचालन क्षमता को सतत तरीके से सुधारना।
- संस्थागत सशक्तीकरण: प्रतिभागी राज्यों और केंद्रीय स्तर पर बांध सुरक्षा संस्थागत व्यवस्था को मजबूत करना।
- राजस्व सृजन: बांधों के सतत संचालन और रखरखाव के लिये असंगत/सहायक राजस्व सृजन के अवसरों का अन्वेषण करना।
- वित्तपोषण पैटर्न: इस योजना का वित्तपोषण इस प्रकार है: विशेष श्रेणी वाले राज्य– 80:20, सामान्य श्रेणी वाले राज्य– 70:30, केंद्रीय एजेंसियाँ– 50:50।
- इस योजना में विशेष श्रेणी वाले राज्यों (मणिपुर, मेघालय और उत्तराखंड) के लिये ऋण राशि का 90% केंद्रीय अनुदान देने की भी व्यवस्था है।
- चरण:
- चरण I (2012–21): 7 राज्यों में 223 बांधों के लिये पुनर्वास कार्य सफलतापूर्वक पूरा किया गया, जिससे बुनियादी सुरक्षा प्रोटोकॉल और दिशानिर्देश स्थापित हुए।
- चरण II एवं III (2021–31): वर्तमान में चल रहे ये चरण 19 राज्यों में 736 बांधों को लक्षित करते हैं, जिसमें जलवायु सहनशीलता, उन्नत निगरानी और सतत राजस्व सृजन पर विशेष ज़ोर दिया जा रहा है।
बांध सुरक्षा अधिनियम, 2021
- यह अधिनियम बड़े बांधों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और बांध विफलता आपदाओं को रोकने के लिये निरीक्षण, निगरानी, संचालन और रखरखाव का एक व्यापक ढाँचा स्थापित करता है।
- बांध सुरक्षा अधिनियम, 2021 चार स्तरों की संस्थागत व्यवस्था का प्रावधान करता है: केंद्रीय स्तर पर राष्ट्रीय बांध सुरक्षा समिति (NCDS) और राष्ट्रीय बांध सुरक्षा प्राधिकरण (NDSA) की स्थापना, राज्य स्तर पर राज्य बांध सुरक्षा समिति तथा राज्य बांध सुरक्षा संगठन की स्थापना।
- अधिनियम के तहत, बांधों के स्वामी बांधों के सुरक्षित निर्माण, संचालन और रखरखाव के लिये ज़िम्मेदार हैं। उन्हें नियमित निरीक्षण हेतु बांध सुरक्षा इकाइयाँ स्थापित करनी होंगी, विशेष रूप से मानसून एवं आपदाओं के दौरान। इसके अलावा आपातकालीन कार्ययोजना, जोखिम मूल्यांकन एवं विशेषज्ञ सुरक्षा मूल्यांकन तैयार करना आवश्यक है ताकि बांधों की विफलताओं को रोका जा सके।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. बांध पुनर्वास और सुधार परियोजना (DRIP) का उद्देश्य क्या है?
DRIP का उद्देश्य भारत में बांधों की संरचनात्मक सुरक्षा, संचालन की दक्षता और संस्थागत क्षमता को बढ़ाना है, जिसे विश्व बैंक और AIIB के सहयोग से लागू किया जा रहा है।
2. भारत के लिये जलाशय तलछट क्यों चिंता का विषय है?
तलछट से जलाशय की भंडारण क्षमता घटती है, बांध की दक्षता कमज़ोर होती है और दीर्घकालिक जल सुरक्षा तथा बाढ़ नियंत्रण पर खतरा उत्पन्न होता है।
3. बांध सुरक्षा अधिनियम, 2021 के तहत कौन-सा संस्थागत ढाँचा स्थापित किया गया है?
इसमें राष्ट्रीय बांध सुरक्षा प्राधिकरण और केंद्रीय स्तर पर राष्ट्रीय समिति, साथ ही राज्य बांध सुरक्षा संगठन तथा राज्य समितियाँ स्थापित की गई हैं।
4. ICDS 2026 भारत में बांध सुरक्षा में कैसे योगदान देता है?
यह तलछट प्रबंधन, बाढ़ पूर्वानुमान, जोखिम मूल्यांकन और आपातकालीन तैयारी में सर्वोत्तम प्रथाओं को बढ़ावा देता है, जिससे बांध सुरक्षा मज़बूत होती है।
5. भारत की जल सुरक्षा के लिये DRIP क्यों महत्त्वपूर्ण है?
6,600 से अधिक बड़े बांधों के साथ DRIP यह सुनिश्चित करता है कि पुराने बुनियादी ढाँचे का सुरक्षित संचालन और जलवायु सहनशीलता बनी रहे, जो सिंचाई, विद्युत और पीने के पानी के लिये महत्त्वपूर्ण है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)
प्रिलिम्स
प्रश्न. निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिये: (2022)
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जलाशय |
राज्य |
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1. घाटप्रभा |
तेलंगाना |
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2. गांधी सागर |
मध्य प्रदेश |
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3. इंदिरा सागर |
आंध्र प्रदेश |
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4. मैथोन |
छत्तीसगढ़ |
उपर्युक्त में से कितने युग्म सही सुमेलित नहीं हैं?
- केवल एक युग्म
- केवल दो युग्म
- केवल तीन युग्म
- सभी चारों युग्म
उत्तर: C
प्रश्न. टिहरी जलविद्युत परिसर निम्नलिखित में से किस नदी पर स्थित है? (2008)
(a) अलकनंदा
(b) भागीरथी
(c) धौलीगंगा
(d) मंदाकिनी
उत्तर: (b)
मेन्स
प्रश्न. मान लीजिये कि भारत सरकार एक ऐसी पर्वतीय घाटी में एक बांध का निर्माण करने की सोच रही है, जो जंगलों से घिरी है और यहाँ नृजातीय समुदाय रहते हैं। अप्रत्याशित आकस्मिकताओं से निपटने के लिये सरकार को कौन-सी तर्कसंगत नीति का सहारा लेना चाहिये? (2018)
ओल चिकी लिपि
भारत के राष्ट्रपति ने नई दिल्ली में संस्कृति मंत्रालय द्वारा आयोजित ओल चिकी लिपि के शताब्दी समारोह का उद्घाटन किया, जो इस लिपि के 100 वर्ष पूर्ण होने तथा संथाल पहचान के संरक्षण में इसकी निर्णायक भूमिका को चिह्नित करता है।
- इस अवसर पर लिपि के 100 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में एक स्मारक सिक्का तथा डाक टिकट भी जारी किये गए।
- आविष्कार एवं इतिहास: ओल चिकी लिपि का आविष्कार पंडित रघुनाथ मुर्मू द्वारा वर्ष 1925 में संथाली भाषा के लिये एक विशिष्ट एवं स्वदेशी लिपि उपलब्ध कराने के उद्देश्य से किया गया था। इससे पूर्व संथाली भाषा को रोमन, देवनागरी,ओडिया अथवा बंगाली लिपियों में लिखा जाता था।
- ओडिशा के मयूरभंज ज़िले के पंडित रघुनाथ मुर्मू ने ओल चिकी में पहली पुस्तक हाई सेरेना (1936) की रचना की तथा बिदु-चंदन जैसी कृतियों के माध्यम से संथाली संस्कृति का सजीव चित्रण किया।
- भाषिक संरचना: यह लिपि 30 वर्णों से निर्मित है तथा पूर्णतः ध्वन्यात्मक सिद्धांत पर आधारित है, अर्थात प्रत्येक चिह्न किसी विशिष्ट ध्वनि का प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व करता है।
- ओल चिकी लिपि संथाली भाषा (जो ऑस्ट्रो-एशियाटिक भाषा परिवार से संबंधित है) में निहित ग्लॉटल स्टॉप तथा विशिष्ट स्वर-पैटर्न का सटीक निरूपण करती है।
- भौगोलिक विस्तार: यह झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, बिहार और असम में संथालीभाषियों के लिये प्रमुख अभिव्यक्ति का माध्यम है।
- संवैधानिक दर्जा: ओल चिकी लिपि में लिखी जाने वाली संथाली भाषा को वर्ष 2003 में 92वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया।
- लोकतांत्रिक पहुँच: भाषायी न्याय की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम के रूप में दिसंबर 2025 में भारतीय संविधान का संथाली भाषा में ओल चिकी लिपि के माध्यम से अनुवाद किया गया।
कश्मीर में यूरेशियन ओटर
सिंध नहर के तट पर यूरेशियन ओटर को देखा गया है, इस प्रजाति के अचानक दिखने से कश्मीर घाटी में इसका पहला फोटोग्राफिक साक्ष्य मिला है, हालाँकि इसे कभी घाटी के कुछ भागों में स्थानीय रूप से विलुप्त माना जाता था।
यूरेशियन ओटर
- परिचय: यूरेशियन ओटर (लुट्रा-लुट्रा), जिसे यूरोपीय या सामान्य ऊदबिलाव के नाम से भी जाना जाता है, लुट्रा वंश एवं मस्टेलिडी कुल (नेवला कुल) से संबंधित है।
- शारीरिक संरचना: इनका शरीर सुव्यवस्थित होता है, पैर जालीदार होते हैं और जल में तैरने के लिये एक शक्तिशाली पूँछ होती है। जल में शिकार का पता लगाने के लिये इनमें मूँछें (वाइब्रिस्सी) होती हैं। इनमें नर प्रजाति आमतौर पर मादा प्रजाति से बड़ी होती है।
- आहार: ये मुख्यतः माँसाहारी होते हैं, जिनके आहार में लगभग 80% मछलियाँ (जैसे– ईल, सैल्मोनिड्स) शामिल हैं। ये उभयचर, क्रस्टेशियन, जल पक्षी, छोटे स्तनधारी, सरीसृप, कीट और अंडे भी खाते हैं।
- व्यवहार: ये सामान्यतः एकांतप्रिय, स्थानिक होते हैं तथा अधिकतर रात्रिचर (निशाचर) या गोधूलि (संध्याचर) के समय सक्रिय रहते हैं। ये जल निकायों के निकट बिल बनाते हैं, जिन्हें होल्ट कहा जाता है।
- पारिस्थितिकीय महत्त्व: मीठे जल के पारिस्थितिक तंत्र के महत्त्वपूर्ण शिकारी के रूप में ओटर/ऊदबिलाव एक प्रमुख प्रजाति और जलीय स्वास्थ्य का जैव-संकेतक है। इसकी उपस्थिति स्वच्छ जल, स्थिर शिकार आबादी और कार्यात्मक नदी तटीय आवासों का संकेत देती है।
- संरक्षण की स्थिति:
- IUCN: संकटापन्न
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972: अनुसूची II
- CITES: परिशिष्ट I
- भारत में ओटर/ऊदबिलाव की अन्य प्रजातियाँ: भारत में ओटर की 3 प्रजातियाँ पाई जाती हैं। यूरेशियन ओटर (हिमालय, पूर्वोत्तर भारत और पश्चिमी घाट में पाया जाता है) के अतिरिक्त, अन्य दो प्रजातियाँ स्मूथ-कोटेड ओटर (संपूर्ण भारत में पाया जाता है) और छोटे-पंजे वाला ओटर (हिमालय और दक्षिण भारत में पाया जाता है) हैं।
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और पढ़ें: स्मूथ कोटेड ओटर |
पीएम राहत योजना
सेवा तीर्थ में स्थानांतरण के बाद अपने पहले प्रमुख निर्णय में केंद्र सरकार ने पीएम राहत (सड़क दुर्घटना पीड़ित अस्पताल भर्ती एवं सुनिश्चित उपचार) योजना का शुभारंभ किया।
पीएम राहत योजना
- परिचय: यह सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की एक पहल है, जिसका उद्देश्य सड़क दुर्घटना पीड़ितों को तत्काल कैशलेस उपचार उपलब्ध कराना है।
- समयबद्ध उपचार पर ज़ोर: यह योजना समय पर चिकित्सकीय देखभाल सुनिश्चित करने पर केंद्रित है, क्योंकि लगभग 50% सड़क दुर्घटना मृत्यु को रोका जा सकता है यदि पीड़ितों को गोल्डन ऑवर (गंभीर चोट के बाद का पहला घंटा) के भीतर अस्पताल में उपचार मिल जाए।
- कैशलेस उपचार एवं कवरेज: किसी भी सड़क (जैसे– राष्ट्रीय राजमार्ग, राज्य सड़कें एवं शहरी मार्ग) पर दुर्घटनाग्रस्त पीड़ितों को पहले 7 दिनों के लिये प्रति व्यक्ति ₹1.5 लाख तक का कैशलेस उपचार प्रदान किया जाएगा।
- पुलिस प्रमाणीकरण के अधीन, गैर-जीवन-घातक मामलों में 24 घंटे तक तथा जीवन-घातक मामलों में 48 घंटे तक स्थिरीकरण उपचार की गारंटी प्रदान की जाती है।
- कार्यान्वयन एवं पहुँच: यह एक प्रौद्योगिकी-आधारित ढाँचे के माध्यम से संचालित होती है, जो दुर्घटना की सूचना से लेकर दावे के निपटान तक एक निर्बाध डिजिटल संपर्क स्थापित करता है, जिसमें निम्नलिखित का समेकन किया गया है:
- सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय का इलेक्ट्रॉनिक विस्तृत दुर्घटना प्रतिवेदन (eDAR) प्लेटफॉर्म।
- राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण का ट्रांज़ैक्शन मैनेजमेंट सिस्टम (TMS 2.0)।
- वित्तपोषण तंत्र: अस्पतालों को भुगतान मोटर वाहन दुर्घटना कोष (MVAF) के माध्यम से किया जाएगा। यदि दोषी वाहन बीमित है, तो राशि का वहन सामान्य बीमा कंपनियों के अंशदान से किया जाएगा। वहीं, बिना बीमा वाले तथा हिट-एंड-रन मामलों में व्यय भारत सरकार के बजटीय प्रावधान से पूरा किया जाएगा।
- आपातकालीन प्रतिक्रिया एकीकरण: यह योजना इमरजेंसी रिस्पॉन्स सपोर्ट सिस्टम (ERSS) डायल 112 के साथ एकीकृत है, जिसके माध्यम से कोई भी व्यक्ति (पीड़ित या गुड समैरिटन) एंबुलेंस सेवा का अनुरोध कर सकता है तथा निकटतम नामित अस्पताल का पता लगा सकता है।
- शिकायत निवारण: पीड़ितों की शिकायतों के समाधान हेतु ज़िला स्तरीय जवाबदेही सुनिश्चित की गई है। इसके लिये ज़िला सड़क सुरक्षा समिति (जिसकी अध्यक्षता ज़िला कलेक्टर/ज़िला मजिस्ट्रेट/उपायुक्त द्वारा की जाती है) द्वारा नामित एक शिकायत निवारण अधिकारी नियुक्त किया जाता है।
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भारत-थाईलैंड वायु सैन्य अभ्यास
भारतीय वायु सेना (IAF) ने भारतीय महासागर क्षेत्र (IOR) में रॉयल थाई एयर फोर्स (RTAF) के साथ इन-सिटु अभ्यास किया, जो भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी 2014 के तहत रणनीतिक साझेदारी को विस्तारित करता है।
- अभ्यास का अवलोकन: IAF ने अभ्यास में Su-30MKI मल्टीरोल लड़ाकू विमान, IL-78 मिड-एयर ईंधन भरने वाले टैंकर और एयरबोर्न वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम (AWACS) विमान शामिल किये। वहीं RTAF ने अपने SAAB ग्रिपेन जेट्स के साथ भाग लिया।
- इन-सिटु अभ्यास: IAF ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के हवाई अड्डों से अपना संचालन किया जबकि थाई ग्रिपेन विमानों का संचालन थाईलैंड के हवाई अड्डों से हुआ।
- उद्देश्य: इसका उद्देश्य IAF की दक्षता और मित्र विदेशी देश (FFC) के साथ अंतर-संचालन क्षमता को भारतीय महासागर क्षेत्र (IOR) में प्रदर्शित करना था, साथ ही अंडमान और निकोबार कमांड (ANC) को एक अग्रणी हब के रूप में उसकी रणनीतिक महत्ता को रेखांकित करना था।
- महत्त्व: यह सैन्य अभ्यास भारत और थाईलैंड के बीच “एक्ट ईस्ट” साझेदारी की गहराई को दर्शाता है, जो अब एयरोस्पेस क्षेत्र तक विस्तारित हो रही है।
- यह थाईलैंड की “एक्ट वेस्ट” पॉलिसी 2016 द्वारा भी समर्थित है, जो भारत की क्षेत्रीय पहुँच के साथ सामंजस्य स्थापित करती है और दोनों देशों की सामुद्रिक निकटता पर आधारित है।
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सैन्य अभ्यास वज्र घाट
भारतीय सेना ने जैसलमेर के पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज में सैन्य अभ्यास वज्र घाट आयोजित किया, जिसमें K9 वज्र सेल्फ-प्रोपेल्ड आर्टिलरी गन सिस्टम की रेगिस्तान युद्ध परिस्थितियों में संचालन तत्परता और युद्ध क्षमता का प्रदर्शन किया गया।
- उद्देश्य: इसका मुख्य लक्ष्य युद्धक्षेत्र में रक्षात्मक क्षमता और संचालन दक्षता को बढ़ाने के लिये परिष्कृत रणनीति, तकनीक और प्रक्रियाओं (TTP) का परीक्षण कर मान्यता प्रदान करना था।
- अभ्यास का नेतृत्व व्हाइट टाइगर डिवीज़न ने किया। इसने थार रेगिस्तान के कठोर भूभाग में भारी तोपखाना तैनात करने की सेना की क्षमता को प्रदर्शित किया।
- परिणाम: अभ्यास के दौरान परिष्कृत TTP के मान्यकरण से पश्चिमी क्षेत्र में सेना की युद्धक स्थिति और तैयारियों को मज़बूत करने की उम्मीद है।
- K9 वज्र: यह एक ट्रैक्ड सेल्फ-प्रोपेल्ड हॉवित्ज़र है, जिसे दक्षिण कोरिया के K9 थंडर से विकसित किया गया है, जो दक्षिण कोरियाई सेना की रीढ़ की हड्डी माना जाता है।
- K9 वज्र को दीर्घ-श्रेणी की सटीक आग के लिये डिज़ाइन किया गया है। यह भारतीय और उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (NATO) मानक गोला-बारूद के अनुकूल है और इसमें सुरक्षा के लिये ऑल-वेल्डेड स्टील कवच लगा है।
- इस प्रणाली को डिफेंस प्रोक्योरमेंट प्रोसिज़र की ‘बाय ग्लोबल’ श्रेणी के तहत खरीदा गया।
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