SC का दर्जा और धर्म संपरिवर्तन
प्रिलिम्स के लिये: भारत का सर्वोच्च न्यायालय, अनुच्छेद 341, अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 15, अनुच्छेद 25
मेन्स के लिये: अनुसूचित जाति दर्जे से संबंधित संवैधानिक प्रावधान (अनुच्छेद 341 और आदेश, 1950), भारत में धर्म और जाति का अंतर्संबंध, सकारात्मक कार्रवाई और आरक्षण नीतियाँ
चर्चा में क्यों?
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने चिंथाडा आनंद बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2026) में निर्णय दिया कि हिंदू, बौद्ध या सिख धर्म के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म का पालन करने वाले व्यक्ति को अनुसूचित जाति (SC) समुदाय का सदस्य नहीं माना जा सकता।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी अन्य धर्म (जैसे– ईसाई या इस्लाम) में परिवर्तन करने पर जन्म के बावजूद तुरंत और पूरी तरह से अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा समाप्त हो जाता है और यह प्रभाव धर्म परिवर्तन के क्षण से लागू होता है।
सारांश
- भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि SC (अनुसूचित जाति) का दर्जा केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म तक सीमित है और अन्य धर्म में परिवर्तन करने पर यह तुरंत समाप्त हो जाता है।
- यह विषय अभी भी विवादास्पद है, जिसमें समानता और सामाजिक न्याय के साथ-साथ संवैधानिक सीमाओं पर चर्चा की जाती है, जो डेटा-आधारित नीति सुधार की आवश्यकता को स्पष्ट करता है।
सर्वोच्च न्यायालय ने SC दर्जा और धर्म संपरिवर्तन पर क्या निर्णय दिया?
- सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के लिये सीमित है और किसी अन्य धर्म (जैसे– ईसाई या मुस्लिम) में परिवर्तन करने पर यह तुरंत और पूरी तरह समाप्त (Immediate and Complete Loss) हो जाता है।
- यह किसी भी जाति में जन्मे व्यक्ति के साथ होता है।
- "धर्म का पालन करने" की अवधारणा: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी धर्म को ‘पालन करना’ (Professing) का अर्थ है उसका सार्वजनिक रूप से अभ्यास करना।
- क्योंकि ईसाई और इस्लाम जैसे धर्म सिद्धांततः जाति व्यवस्था को मान्यता नहीं देते, एक व्यक्ति इन धर्मों का सार्वजनिक रूप से पालन करते हुए SC दर्जे का दावा करके कानूनी लाभ प्राप्त नहीं कर सकता। ये दोनों आपस में परस्पर असंगत हैं।
- कानूनी सुरक्षा का नुकसान: SC दर्जा खोने के परिणामस्वरूप धर्म संपरिवर्तन करने वाला व्यक्ति अनुसूचित जातियों के लिये बनाए गए विशेष कानूनों, जैसे– SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत सुरक्षा का दावा नहीं कर सकता।
- पुनः धर्म संपरिवर्तन के नियम: यदि कोई धर्म संपरिवर्तन करने वाला व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म में पुनः लौटकर अपना SC दर्जा वापस पाना चाहता है, तो उसे सख्त और निर्विवाद प्रमाण प्रस्तुत करना होगा।
- इसमें शामिल है: धर्म संपरिवर्तन किये गए धर्म का वास्तविक त्याग दिखाना, मूल जाति की प्रथाओं को अपनाना और मूल जाति समुदाय में स्पष्ट रूप से पुनः स्वीकार्यता प्राप्त करना।
- अनुसूचित जनजातियों (ST) के साथ अंतर: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने नोट किया कि संविधान (अनुसूचित जनजातियाँ) आदेश, 1950 के तहत ST दर्जे पर धर्म आधारित कोई प्रतिबंध नहीं है।
- एक ST व्यक्ति, जो ईसाई या मुस्लिम धर्म में परिवर्तित होता है, स्वतः अपनी जनजातीय स्थिति नहीं खोता, बशर्ते वह अपनी जनजातीय प्रथाएँ, पहचान बनाए रखे और समुदाय द्वारा स्वीकार किया जाए।
- यदि धर्म संपरिवर्तन के बाद पहचान और प्रथाएँ पूरी तरह समाप्त हो जाएँ, तो अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा अस्वीकार किया जा सकता है; लेकिन यदि ये पहचान और प्रथाएँ बनी रहती हैं, तो संबंधित लाभ जारी रह सकते हैं।
अनुसूचित जाति (SC) दर्जे से संबंधित न्यायिक निर्णय
- सी.एम. अरुमुगम बनाम एस. राजगोपाल (1976): सर्वोच्च न्यायालय ने जाति को सामाजिक मान्यता प्रदान की, लेकिन धर्म संपरिवर्तन के पश्चात SC दर्जे को बनाए रखने के लिये निरंतर भेदभाव और समुदाय द्वारा स्वीकार्यता का प्रमाण अनिवार्य माना।
- सूसाई बनाम भारत संघ (1985): सर्वोच्च न्यायालय ने दलित ईसाइयों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने से मना कर दिया, क्योंकि भेदभाव के समर्थन में पर्याप्त तथ्यात्मक साक्ष्य उपलब्ध नहीं थे।
- के.पी. मनु बनाम अध्यक्ष, स्क्रूटिनी कमेटी (2015): सर्वोच्च न्यायालय ने पुनः धर्म संपरिवर्तन के आधार पर SC दर्जे की बहाली की अनुमति प्रदान की, बशर्ते मूल जाति समुदाय द्वारा स्वीकार्यता और प्रमाण प्रस्तुत किया जाए।
भारत में अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा प्राप्त करने के लिये कानूनी रूप से कौन पात्र है?
- संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950: अनुसूचित जाति पात्रता संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के अनुच्छेद 3 द्वारा सख्ती से नियंत्रित होती है।
- इस आदेश के खंड 3 के तहत किसी व्यक्ति को अनुसूचित जाति के सदस्य के रूप में कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त करने के लिये सार्वजनिक रूप से हिंदू धर्म, सिख धर्म या बौद्ध धर्म का पालन (अभ्यास) करना होगा।
- मूल रूप से वर्ष 1950 के आदेश में केवल हिंदू धर्म को ही शामिल किया गया था।
- सिख धर्म को वर्ष 1956 में संसदीय संशोधन के माध्यम से शामिल किया गया था।
- बौद्ध धर्म को वर्ष 1990 में एक संशोधन के माध्यम से शामिल किया गया था।
- इस आदेश के खंड 3 के तहत किसी व्यक्ति को अनुसूचित जाति के सदस्य के रूप में कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त करने के लिये सार्वजनिक रूप से हिंदू धर्म, सिख धर्म या बौद्ध धर्म का पालन (अभ्यास) करना होगा।
- अपवाद: जिन व्यक्तियों का धर्म ईसाई, इस्लाम, यहूदी या पारसी है, उन्हें कानूनी रूप से अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा प्राप्त करने से रोक दिया गया है। यह प्रतिबंध उनकी पैतृक पृष्ठभूमि या ऐतिहासिक रूप से हुई हानि के बावजूद लागू होता है।
- संवैधानिक ढाँचा: संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत भारत के राष्ट्रपति को उन जातियों, नस्लों या जनजातियों को निर्दिष्ट करने का अधिकार है जिन्हें आधिकारिक तौर पर अनुसूचित जाति माना जाता है।
- एक बार प्रारंभिक राष्ट्रपति सूची प्रकाशित हो जाने के बाद केवल भारत की संसद के पास ही कानून के माध्यम से अनुसूचित जाति सूची में समुदायों को जोड़ने या हटाने का अधिकार है।
- राज्य और क्षेत्र की विशिष्टता: SC का दर्जा राज्य/केंद्रशासित प्रदेश की विशिष्टता पर आधारित है, यह कोई पूर्ण राष्ट्रीय पदनाम नहीं है।
- एक राज्य (जैसे– उत्तर प्रदेश) में अनुसूचित जाति के रूप में मान्यता प्राप्त समुदाय को दूसरे राज्य (जैसे– महाराष्ट्र) में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) या सामान्य श्रेणी में वर्गीकृत किया जा सकता है।
- वैधानिक लाभों का दावा करने के लिये किसी व्यक्ति के लिये यह आवश्यक है कि वह उस जाति से संबंधित हो जो उनके मूल राज्य या केंद्रशासित प्रदेश में आधिकारिक रूप से अधिसूचित हो।
अनुसूचित जाति की स्थिति से संबंधित आयोग
- काका कालेलकर आयोग (1955) और मंडल आयोग (1980): दोनों ने यह स्वीकार किया कि जाति आधारित भेदभाव गैर-हिंदू धर्मों तक फैला हुआ है, जिससे कुछ ईसाई और मुस्लिम समुदायों के लिये OBC आरक्षण का मार्ग प्रशस्त हुआ।
- रंगनाथ मिश्रा आयोग (2007) की सिफारिश: आयोग ने सुझाव दिया कि अनुसूचित जाति के दर्जे को धर्म-तटस्थ बनाया जाए, ठीक वैसे ही जैसे अनुसूचित जनजाति के दर्जे के लिये है, ताकि इसका धर्म से कोई संबंध न रहे।
- न्यायमूर्ति के.जी. बालकृष्णन आयोग (वर्तमान): केंद्र सरकार ने वर्ष 2022 में पूर्व मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालकृष्णन की अध्यक्षता में एक तीन सदस्यीय आयोग का गठन किया। इस आयोग को उन व्यक्तियों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने के संवेदनशील मामले की जाँच का कार्य सौंपा गया है, जो ऐतिहासिक रूप से अनुसूचित जाति से संबंधित थे, लेकिन हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और सिख धर्म को छोड़कर अन्य धर्मों में परिवर्तित हो गए हैं।
दलित ईसाइयों और मुसलमानों को SC का दर्जा देने के संबंध में क्या तर्क हैं?
| पक्ष में तर्क | विपक्ष में तर्क |
|
वैधानिक आयोगों की सिफारिशें: न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्रा आयोग (2007) ने दलित परिवर्तितों में गंभीर सामाजिक पिछड़ेपन को प्रमाणित किया और अनुसूचित जाति (SC) की स्थिति को धर्म से अलग करने की सिफारिश की। |
अद्वितीय ऐतिहासिक आधार: अनुसूचित जाति (SC) वर्ग का निर्माण विशेष रूप से 'अस्पृश्यता' की समस्या के समाधान के लिये किया गया था, जिसकी जड़ें मुख्यतः हिंदू वर्ण व्यवस्था में समाहित हैं। इस कारण, कुछ विरोधी मतों का तर्क है कि विदेशी मूल के धर्मों के लिये यह विशिष्ट ऐतिहासिक संदर्भ प्रासंगिक नहीं है। |
|
सकारात्मक भेदभाव में असंगति: अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की पहचान धर्म से स्वतंत्र होती है। केवल SC श्रेणी में धर्म-आधारित प्रतिबंध को मनमाना माना जाता है। आलोचकों के अनुसार SC दर्जे को धर्म से जोड़ना अनुच्छेद 14 (समता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (धर्म के आधार पर भेदभाव का निषेध) और अनुच्छेद 25 (धर्म की स्वतंत्रता) का उल्लंघन करता है। |
SC कोटा पर अतिरिक्त भार: लाखों दलित ईसाइयों और मुसलमानों को SC सूची में जोड़ने से निर्धारित कोटा पर अत्यधिक दबाव पड़ेगा, जिससे मौजूदा लाभार्थियों का हिस्सा कम हो सकता है। |
|
वंचना की अंतर्विभाजकता: धर्म परिवर्तन के बाद भी जातिगत भेदभाव जारी रहता है, साथ ही उन्हें अपने हिंदू समकक्षों की तरह सरकारी संरक्षण और आरक्षण का लाभ भी नहीं मिलता, जिससे दोहरी वंचना उत्पन्न होती है। |
पहचान में कठिनाई: इस्लाम और ईसाई धर्म आधिकारिक रूप से जाति को नहीं मानते, इसलिये इन धर्मों में अस्पृश्यता के ऐतिहासिक प्रमाण स्थापित करना प्रशासनिक रूप से कठिन होता है। |
आगे की राह
- अनुभवजन्य डेटा पर निर्भरता: इस जटिल मुद्दे का समाधान वस्तुनिष्ठ और समकालीन डेटा के आधार पर होना चाहिये, न कि वैचारिक दृष्टिकोणों पर।
- न्यायमूर्ति के.जी. बालकृष्णन आयोग के चल रहे अध्ययन के निष्कर्ष इस बात को वैज्ञानिक रूप से निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण होंगे कि क्या ईसाई और इस्लाम धर्म अपनाने वाले दलितों के बीच अस्पृश्यता की ऐतिहासिक अक्षमताएँ वास्तव में अभी भी बनी हुई हैं।
- पिछड़ेपन के ढाँचे का पुनर्मूल्यांकन: नीति-निर्माताओं द्वारा अनुसूचित जातियों (SCs) के मानदंडों को अनुसूचित जनजातियों (STs) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBCs) के मानदंडों के साथ संरेखित करने पर विचार किया जा सकता है, जो धर्मनिरपेक्ष हैं।
- यदि सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ापन ही सकारात्मक कार्यवाही का मुख्य मानक है, तो धर्मनिरपेक्ष मानदंडों की ओर संक्रमण संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) की भावना के अधिक अनुरूप हो सकता है।
- सार्वभौमिक भेदभाव-रोधी कानूनों को सुदृढ़ करना: चाहे दलित धर्मांतरितों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिया जाए या नहीं, राज्य को यह स्वीकार करना चाहिये कि जाति-आधारित भेदभाव एक सामाजिक वास्तविकता है।
- कमज़ोर व्यक्तियों की सुरक्षा के लिये, चाहे उनका धार्मिक जुड़ाव कुछ भी हो, सामान्य नागरिक अधिकार सुरक्षा और भेदभाव-विरोधी ढाँचों को मज़बूत करना अनिवार्य है।
निष्कर्ष
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि 1950 के राष्ट्रपति आदेश के तहत अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा कानूनी रूप से केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के अनुयायियों तक ही सीमित है। हालाँकि विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा आरक्षण और सुरक्षा को कम किये बिना समावेशी सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिये एक संतुलित तथा डेटा-संचालित विधायी दृष्टिकोण की आवश्यकता है।
|
दृष्टि मेन्स प्रश्न : प्रश्न. ‘भारत में अनुसूचित जाति के दर्जे का निर्धारण संवैधानिक प्रावधानों और सामाजिक वास्तविकताओं के बीच के तनाव को दर्शाता है।’ चर्चा कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. संविधान (अनुसूचित जातियाँ) आदेश, 1950 का भाग 3 क्या कहता है?
यह अनुसूचित जाति का दर्जा केवल हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को मानने वाले व्यक्तियों तक सीमित करता है, जबकि अन्य धर्मों के लोगों को इससे बाहर रखता है।
2. धार्मिक धर्मांतरण के बाद अनुसूचित जाति दर्जे का क्या होता है?
यह ईसाई धर्म या इस्लाम जैसे धर्मों में धर्म संपरिवर्तन के तुरंत बाद समाप्त हो जाता है, चाहे व्यक्ति का जन्म किसी भी स्थिति में हुआ हो।
3. क्या कोई व्यक्ति पुन: धर्म संपरिवर्तन के बाद SC का दर्जा वापस पा सकता है?
हाँ, लेकिन केवल मूल जाति के ठोस प्रमाण, वास्तविक पुनः धर्म संपरिवर्तन और समुदाय की स्वीकृति के सख्त प्रमाण के आधार पर ही।
4. धर्म के संदर्भ में ST दर्जा SC दर्जे से किस प्रकार भिन्न है?
अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा धर्मनिरपेक्ष होता है और यह जनजातीय पहचान तथा परंपराओं की निरंतरता पर आधारित होता है।
5. किस आयोग ने SC दर्जे को धर्म से अलग करने की सिफारिश की थी?
न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्र आयोग ने SC दर्जे को धर्मनिरपेक्ष बनाने की सिफारिश की।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. मौलिक अधिकारों की निम्नलिखित श्रेणियों में से कौन-सी एक भेदभाव के रूप में अस्पृश्यता के विरुद्ध सुरक्षा को शामिल करती है? (2020)
(a) शोषण के विरुद्ध अधिकार
(b) स्वतंत्रता का अधिकार
(c) संवैधानिक उपचार का अधिकार
(d) समानता का अधिकार
उत्तर: (d)
प्रश्न. यदि किसी विशिष्ट क्षेत्र को भारत के संविधान की पाँचवीं अनुसूची के अधीन लाया जाए, तो निम्नलिखित कथनों में कौन-सा एक, इसके परिणाम को सर्वोत्तम रूप से प्रतिबिंबित करता है? (2022)
(a) इससे जनजातीय लोगों की ज़मीनें गैर-जनजातीय लोगों को अंतरित करने पर रोक लगेगी।
(b) इससे उस क्षेत्र में एक स्थानीय स्वशासी निकाय का सृजन होगा।
(c) इससे वह क्षेत्र संघ राज्यक्षेत्र में बदल जाएगा।
(d) जिस राज्य के पास ऐसे क्षेत्र होंगे, उसे विशेष कोटि का राज्य घोषित किया जाएगा।
उत्तर: (a)
मेन्स
प्रश्न. क्या राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) धार्मिक अल्पसंख्यक संस्थानों में अनुसूचित जातियों के लिये संवैधानिक आरक्षण के क्रियान्वयन का प्रवर्तन करा सकता है? परीक्षण कीजिये। (2018)
प्रश्न: स्वतंत्रता के बाद अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के प्रति भेदभाव को दूर करने के लिये, राज्य द्वारा की गई दो मुख्य विधिक पहलें क्या हैं? (2017)
पंजाब-राजस्थान जल विवाद
प्रिलिम्स के लिये: अंतर्राष्ट्रीय जल विवाद, सिंचाई, जलविद्युत, सतलुज नदी, सिंधु जल संधि, 1960, सर्वोच्च न्यायालय, धान, गन्ना, अंतर्राष्ट्रीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956, अनुच्छेद 262, अनुच्छेद 21, अधिकरण, ड्रिप सिंचाई, मल्चिंग।
मेन्स के लिये: पंजाब-राजस्थान जल बँटवारा विवाद से संबंधित प्रमुख तथ्य, अंतर्राष्ट्रीय जल विवादों में वृद्धि के कारण, अंतर-राज्यीय जल विवादों से संबंधित समाधान एवं प्रावधान और आगे की राह।
चर्चा में क्यों?
पंजाब के मुख्यमंत्री ने एक औपनिवेशिक काल के राजकोषीय समझौते और राज्य के गंभीर भूजल संकट का हवाला देते हुए राजस्थान से 1.44 लाख करोड़ रुपये की मांग की है। यह मांग वर्ष 1960 से राज्य द्वारा उपयोग किये गए 18,000 क्यूसेक जल के लिये की गई है, जिसने एक पुराने अंतर-राज्यीय जल विवाद को फिर से चर्चा में ला दिया है।
सारांश
- भारत में बढ़ते जल संकट के संदर्भ में पंजाब और राजस्थान के बीच का यह विवाद 'रिपरियन प्रिंसिपल' और पुराने त्रिपक्षीय समझौतों के बीच एक गहरे टकराव को दर्शाता है।
- अनुच्छेद 262 जैसे संवैधानिक प्रावधान न्यायाधिकरणों के माध्यम से न्यायनिर्णयन की अपेक्षा करते हैं। हालाँकि, राजनीतिक और कृषि संबंधी मांगें अक्सर इस प्रक्रिया में बाधा डालती हैं, जिससे "संघर्षपूर्ण संघवाद" की स्थिति उत्पन्न होती है।
- भविष्य में इस समस्या का समाधान डिजिटल ट्विंस तकनीक और लाभ-साझाकरण मॉडल की ओर बदलाव में निहित है।
पंजाब-राजस्थान जल बँटवारा विवाद से संबंधित प्रमुख बिंदु क्या हैं?
- ऐतिहासिक आधार (1920 के दशक का समझौता): यह विवाद बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह और ब्रिटिश शासन के अधीन अविभाजित पंजाब के बीच सतलुज नदी से गंग (बीकानेर) नहरों के माध्यम से जल प्राप्त करने के लिये हुए एक वाणिज्यिक समझौते से संबंधित है। रॉयल्टी का भुगतान लगभग वर्ष 1960 तक जारी रहा।
- सिंधु जल संधि (1960) में बदलाव: सिंधु जल संधि, 1960 ने भारत को पूर्वी नदियों (सतलुज, ब्यास, रावी) पर "अप्रतिबंधित उपयोग" के लिये नियंत्रण प्रदान किया, जिससे आंतरिक पुनर्वितरण संभव हो सका।
- वर्ष 1960 के बाद जल बँटवारे को एक व्यावसायिक (भुगतान-आधारित) व्यवस्था के बजाय अंतर-राज्यीय आवंटन के रूप में देखा जाने लगा। परिणामस्वरूप, राजस्थान ने भुगतान करना बंद कर दिया।
- त्रिपक्षीय समझौता (1981): यह समझौता तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समर्थन से पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के बीच हस्ताक्षरित किया गया था।
- इसमें राजस्थान को 8.6 मिलियन एकड़ फीट (कुल 17.17 मिलियन एकड़ फीट में से) आवंटित किया गया था, जो कि सबसे बड़ा हिस्सा था। यह आवंटन इस तथ्य के बावजूद किया गया था कि राजस्थान एक गैर-तटीय राज्य है और इसने इंदिरा गांधी नहर के विस्तार का समर्थन किया।
- पंजाब समझौता समाप्ति अधिनियम, 2004: पंजाब ने जल बँटवारे के समझौतों को समाप्त करने के उद्देश्य से पंजाब समझौता समाप्ति अधिनियम, 2004 लागू किया, लेकिन इसने मौजूदा उपयोग की रक्षा की, जिससे यह सुनिश्चित हुआ कि राजस्थान को चल रही आपूर्ति बाधित न हो।
- वर्ष 2016 में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि कोई भी राज्य एकतरफा रूप से अंतर-राज्यीय समझौतों को समाप्त नहीं कर सकता है, जिससे प्रभावी रूप से पहले के कानूनी ढाँचे को बहाल कर दिया गया।
- पंजाब का नवीनतम नदी तट संबंधी दावा: पंजाब ने एक नया नदी तट संबंधी दावा पेश किया है, जिसमें नदी तट संबंधी सिद्धांत का उल्लेख किया गया है। इस सिद्धांत के अनुसार, जिन राज्यों से होकर नदियाँ प्रवाहित होती हैं, उन्हें जल पर प्राथमिक अधिकार प्राप्त होता है। इस दावे के तहत पंजाब का मानना है कि राजस्थान को सबसे बड़ा हिस्सा मिलना अनुचित है। इसका कारण यह है कि राजस्थान नदी तट से संबंधित राज्य नहीं है (यह रावी, ब्यास या सतलुज के बेसिन में नहीं आता है), खासकर वर्तमान जल संकट को देखते हुए।
अंतर-राज्यीय जल बँटवारे से संबंधित प्रावधान
- संवैधानिक प्रावधान:
- राज्य सूची (प्रविष्टि 17): जल मुख्यतः राज्य का विषय है। इसमें जल आपूर्ति, सिंचाई, नहरें, जल निकासी, तटबंध, जल भंडारण और जल विद्युत जैसी व्यवस्थाएँ शामिल हैं।
- संघ सूची (प्रविष्टि 56): केंद्र सरकार को अंतर-राज्यीय नदियों और नदी घाटियों के नियंत्रण तथा विकास का अधिकार है, जब संसद इसे जनहित में आवश्यक रूप में घोषित करे।
- समवर्ती सूची (प्रविष्टि 32): यह अंतर्देशीय जलमार्गों पर यांत्रिक जहाज़ों के संचालन, नौवहन और उनसे जुड़े मार्ग-नियमों से संबंधित है।
- अनुच्छेद 262: यह संसद को अंतर-राज्यीय नदी विवादों के समाधान का अधिकार देता है। साथ ही यह संसद को ऐसे मामलों में भारत का सर्वोच्च न्यायालय और अन्य न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र को सीमित या समाप्त करने की अनुमति भी प्रदान करता है।
- वैधानिक ढाँचा: अनुच्छेद 262 के अधिकार के तहत संसद ने अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद (ISWD) अधिनियम, 1956 पारित किया।
- यदि किसी राज्य सरकार को लगता है कि जल विवाद उत्पन्न हो गया है और इसे बातचीत के माध्यम से सुलझाया नहीं जा सकता, तो वह केंद्र सरकार से अनुरोध कर सकती है कि मामले को एक ट्रिब्यूनल (जिसे 2002 के संशोधन के अनुसार अनुरोध के एक वर्ष के भीतर गठित किया जाना चाहिये) को भेजा जाए।
- ट्रिब्यूनल का निर्णय (अवार्ड), एक बार आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित हो जाने पर, भारत के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश या डिक्री के समान प्रभाव रखता है।
- सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय:
- कर्नाटक राज्य बनाम तमिलनाडु राज्य (2018): इस ऐतिहासिक फैसले में सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने कर्नाटक के पानी छोड़ने के दायित्व को कम किया, बंगलुरु की पेयजल आवश्यकताओं को मान्यता दी और कावेरी नदी को एक ‘राष्ट्रीय संपत्ति’ घोषित किया।
- पंजाब जल समझौता निरस्तीकरण अधिनियम, 2004 (2016): यह एक राष्ट्रपति संदर्भ का मामला था, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने पंजाब के उस कानून को असंवैधानिक घोषित कर दिया, जिसने एकतरफा तरीके से सभी जल बँटवारा समझौतों को रद्द कर दिया था।
- तमिलनाडु राज्य बनाम केरल राज्य (2014): इस महत्त्वपूर्ण मामले में सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने केरल सिंचाई और जल संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2006 को रद्द कर दिया, जिसके माध्यम से केरल ने मुल्लापेरियार बांध के जल स्तर को सीमित करने की कोशिश की थी। न्यायालय ने फैसला सुनाया कि केरल ‘सुरक्षा कानून’ की आड़ में न्यायिक आदेश में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
- नर्मदा बचाओ आंदोलन बनाम भारत संघ (2000): यह मामला मुख्य रूप से सरदार सरोवर बांध के निर्माण और विस्थापितों के पुनर्वास (R&R) से संबंधित था। इसमें सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने स्पष्ट किया कि नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण (NWDT) का निर्णय अंतिम तथा बाध्यकारी है।
अंतर-राज्यीय जल विवादों के बढ़ने के क्या कारण हैं?
- जल की बढ़ती कमी: तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या और शहरीकरण के कारण जल की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। जैसे-जैसे प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता घटती जा रही है, राज्य अपने हिस्से के पानी को लेकर अधिक सतर्क और संरक्षणवादी हो रहे हैं, जिससे शून्य-योग (zero-sum) जैसी मानसिकता विकसित हो रही है।
- उदाहरण: भारत में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 1950 के लगभग 5,200 घन मीटर (जल-समृद्ध स्थिति) से घटकर वर्ष 2024 में लगभग 1,400–1,500 घन मीटर (जल-संकटग्रस्त स्थिति) तक पहुँच गई है। वर्ष 2050 तक इसके लगभग 1,191 घन मीटर तक गिरने का अनुमान है, जो 1,000 घन मीटर के जल-अभाव की खतरनाक सीमा के करीब है।
- कृषि गहनता: जल-गहन फसलों (जैसे– पंजाब में धान या महाराष्ट्र में गन्ना) की ओर बढ़ते रुझान ने भूजल के स्तर को गंभीर रूप से घटा दिया है। पंजाब में पानी की मांग अत्यधिक जल तनाव के कारण है, भारत में भूजल दोहन की दर पंजाब में सबसे अधिक (156.36%) है, जो राष्ट्रीय औसत (60.63%) से काफी ज़्यादा है।
- क्षेत्राधिकार संबंधी संघर्ष: जल मुख्य रूप से एक राज्य का विषय (राज्य सूची की प्रविष्टि 17) है, जबकि अंतर-राज्यीय नदियाँ केंद्र के कार्यक्षेत्र (संघ सूची की प्रविष्टि 56) में आती हैं। अधिकारों का यह विभाजन और राज्यों द्वारा अपनी स्वायत्तता पर अत्यधिक बल देना अक्सर ‘संघर्षपूर्ण संघवाद’ का कारण बनता है, जहाँ राज्य पूरे नदी बेसिन के सहकारी प्रबंधन के बजाय अपने निजी हितों को प्राथमिकता देते हैं।
- राजनीतीकरण और जल-राजनीति: जल के मुद्दे अक्सर चुनावी राजनीति, क्षेत्रीय पहचान तथा वोट-बैंक की गणनाओं में उलझ जाते हैं। राज्य अपनी घरेलू जनता को लुभाने के लिये कठोर रुख अपना सकते हैं या एकतरफा कार्रवाई कर सकते हैं, जिससे आपसी बातचीत से होने वाले समझौतों में देरी होती है।
- तटवर्ती बनाम गैर-तटवर्ती विवाद: ऊपरी तटवर्ती राज्य (जहाँ से नदी का उद्गम होता है) अक्सर अपने विकास के लिये पानी के उपयोग के प्राथमिक अधिकारों का दावा करते हैं। इसके विपरीत निचले तटवर्ती राज्य ऐतिहासिक उपयोग और अपनी आवश्यकताओं के आधार पर अधिकारों का दावा करते हैं। उदाहरणतः पंजाब तथा राजस्थान के बीच अंतर-राज्यीय जल विवाद इसका एक प्रमुख उदाहरण है।
- न्यायाधिकरणों की अक्षमता: 'अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956' के तहत गठित अधिकरणों की अक्सर अत्यधिक देरी के लिये आलोचना की जाती है। कावेरी जल विवाद जैसे कुछ मामले 30 वर्षों से अधिक समय तक चले हैं और इस लंबी अवधि में राजनीतिक तथा पर्यावरणीय स्थितियाँ पूरी तरह बदल जाती हैं, जिससे अंतिम ‘पुरस्कार’ को लागू करना अत्यंत कठिन हो जाता है।
अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के समाधान हेतु क्या उपाय किये जा सकते हैं?
- जल-वितरण के बजाय लाभ-साझाकरण की ओर परिवर्तन: पारंपरिक विवाद जल की मात्रा (कितने क्यूसेक पानी) के बँटवारे पर केंद्रित होते हैं। एक अधिक नवोन्मेषी दृष्टिकोण नदी से प्राप्त सामूहिक लाभों पर केंद्रित होता है।
- उदाहरणार्थ, राज्य अपने-अपने कृषि-जलवायु क्षेत्रों के अनुरूप फसलों में विशेषज्ञता विकसित कर परस्पर सहयोग कर सकते हैं। जल-अधिशेष वाले राज्य जल-अभाव वाले राज्यों के लिये जल-गहन फसलों का उत्पादन कर सकते हैं तथा इसके बदले संबंधित राज्य औद्योगिक या ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग प्रदान कर सकते हैं।
- नदी बेसिन के डिजिटल ट्विन: उपग्रह चित्रों (जैसे– RISAT) और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग कर पूरे नदी बेसिन का हाई-रिज़ॉल्यूशन 3D डिजिटल मॉडल तैयार किया जा सकता है। इसके माध्यम से “क्या हो यदि” (What-If) प्रकार के सिमुलेशन संभव होते हैं, जिनसे यह वस्तुनिष्ठ आकलन किया जा सकता है कि कोई नया बांध निर्माण या सूखे का वर्ष सभी तटीय राज्यों को किस प्रकार प्रभावित करेगा।
- संस्थागत एवं विधिक नवाचार: तदर्थ अधिकरणों से हटकर एक स्थायी एकल अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिकरण की ओर अग्रसर होना चाहिये, जिसमें विशेषज्ञ पीठें हों, जैसा कि अतंर्राज्यीय नदी जल विवाद (संशोधन) विधेयक, 2019 में प्रस्तावित है, ताकि संस्थागत स्मृति और कार्यवाही की गति सुनिश्चित की जा सके।
- किसी भी विधिक निर्णय से पहले तटस्थ विशेषज्ञों से युक्त DRC के माध्यम से ‘मध्यस्थता-प्रथम’ (मीडिएशन-फर्स्ट) दृष्टिकोण को अनिवार्य किया जाए। इससे विवाद की प्रतिद्वंद्वी प्रकृति कम होती है।
- मांग-पक्ष प्रबंधन एवं पारिस्थितिक अखंडता: प्रत्येक राज्य के लिये ‘जल बजट’ लागू किया जाए, जिसमें उन्हें यह सिद्ध करना होगा कि वे नदी में अधिक हिस्सेदारी मांगने से पहले कुशल तकनीकों (जैसे– ड्रिप सिंचाई या मल्चिंग) का उपयोग कर रहे हैं।
- नदी के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिये जल का एक अनिवार्य प्रतिशत नदी में ही बना रहना चाहिये, जिससे ‘बेसिन क्लोज़र’ की स्थिति को रोका जा सके, जहाँ पानी समुद्र तक नहीं पहुँच पाता।
- सहकारी संघवाद: संयुक्त परियोजनाओं के लिये द्विपक्षीय या बहु-राज्य समझौतों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये, जैसे– नहरों का लिंकिंग या साझा जल भंडारण ताकि संभावित विवादों को सहयोगात्मक अवसरों में परिवर्तित किया जा सके। उच्च प्रदर्शन करने वाले राज्यों को ‘ब्लू ग्रांट्स’ या अतिरिक्त केंद्रीय वित्तपोषण प्रदान किया जा सकता है।
निष्कर्ष
पंजाब-राजस्थान विवाद यह संकेत करता है कि जल-संकट से प्रभावित भारत में संघर्ष अब केवल ‘जल-साझाकरण’ तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह “जीवन-साझाकरण” का रूप ले चुका है। ऐसे विवादों का समाधान केवल ऐतिहासिक तटीय दावों पर आधारित होकर संभव नहीं है, इसके लिये बेसिन-स्तरीय प्रबंधन की आवश्यकता है, जिसमें सहकारी संघवाद और डिजिटल ट्विन जैसे तकनीकी साधनों का उपयोग करके पारिस्थितिक संतुलन और राष्ट्रीय जल सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
|
दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न: अंतर-राज्यीय जल विवादों के निदान हेतु संवैधानिक और कानूनी तंत्र पर चर्चा कीजिये। उनकी प्रभावशीलता का मूल्यांकन कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. पंजाब का राजस्थान के विरुद्ध जल विवाद में मूल कानूनी आधार क्या है?
पंजाब ने रिपेरियन (संगम) सिद्धांत और औपनिवेशिक युग के एक वाणिज्यिक समझौते का उल्लेख करते हुए यह तर्क प्रस्तुत किया है कि राजस्थान एक गैर-रिपेरियन राज्य होने के नाते, सतलज जल (Sutleut waters) से सबसे बड़ा आवंटन प्राप्त करने का स्वाभाविक अधिकार नहीं रखता।
2. जल विवादों से संबंधित कौन-सा संवैधानिक प्रावधान है?
अनुच्छेद 262 संसद को अंतर-राज्यीय जल विवादों का निपटारा करने का अधिकार प्रदान करता है और इस प्रकार उच्च न्यायालय की क्षेत्राधिकारता को समाप्त कर देता है।
3. रिपेरियन सिद्धांत क्या है?
यह उन राज्यों को नदी के जल पर प्राथमिक अधिकार देता है जिनके माध्यम से नदी प्राकृतिक रूप से प्रवाहित होती है।
4. अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 की भूमिका क्या है?
उत्तर: यह विवादों के निपटारे के लिये अधिकरण-आधारित न्याय सुनिश्चित करता है, जिनके पुरस्कारों का कानूनी रूप से बाध्यकारी प्रभाव होता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
मेन्स
प्रश्न. अंतर-राज्यीय जल विवादों का समाधान करने से संबंधित सांविधिक प्रक्रियाएँ समस्याओं को संबोधित करने व हल करने असफल रही हैं। क्या यह असफलता संरचनात्मक अथवा प्रक्रियात्मक अपर्याप्तता अथवा दोनों के कारण हुई है? चर्चा कीजिये। (2013)
