डेली न्यूज़ (17 Sep, 2020)



स्टार्टअप पर संसदीय समिति की रिपोर्ट

प्रिलिम्स के लिये: 

स्टार्टअप यूनिकॉर्न, वैकल्पिक निवेश कोष, सामूहिक निधि

मेन्स के लिये:

भारतीय कंपनियों में विदेशी निवेश की भूमिका, स्टार्टअप में निवेश को बढ़ावा देने हेतु सरकार के प्रयास  

चर्चा में क्यों?

हाल ही में वित्तीय मामलों पर संसद की स्थायी समिति ने ‘स्टार्टअप’ से संबंधित एक रिपोर्ट संसद के समक्ष प्रस्तुत की है।

प्रमुख बिंदु:

  • समिति ने देश में स्टार्टअप तंत्र के संदर्भ में ‘फाइनेंसिंग ऑफ द स्टार्टअप इकोसिस्टम’ (Financing the Startup Ecosystem) नामक रिपोर्ट प्रस्तुत की है। 
  • समिति के अनुसार, भारत की स्टार्टअप कंपनियों को चीन और अमेरिका जैसे देशों पर अपनी निर्भरता को कम करना चाहिये।
    • गौरतलब है कि अगस्त माह में जारी ‘हुरुन ग्‍लोबल यूनिकॉर्न्‍स 2020’ (Hurun Global Unicorns 2020) में शामिल किये गए 21 स्टार्टअप यूनिकॉर्न (Startup Unicorns) में से 11 कंपनियों को अलीबाबा, टेनसेंट और डीएसटी ग्लोबल जैसे चीनी निवेशकों से फंड प्राप्त हुआ था। 
    • स्टार्टअप यूनिकॉर्न, वे स्टार्ट-अप होते हैं जिनका मूल्य 1 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक होता है।

सुझाव:  

  • समिति के अनुसार, ‘भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक’ (Small Industries Development Bank of India- SIDBI) के फंड ऑफ फंड्स पहल का विस्तार किया जाना चाहिये और निवेश को बढ़ावा देने के लिये इसका उपयोग किया जाना चाहिये।
  • स्टार्टअप के पूंजी स्रोतों का विस्तार करने के लिये कंपनियों और सीमित देयता भागीदारी (Limited Liability Partnerships- LLPs) को बिना ‘गैर-वित्तीय बैंकिंग कंपनी’ (NBFC) घोषित किये स्टार्टअप में निवेश की अनुमति दी जानी चाहिये।
  • विदेशी विकास वित्त संस्थानों को स्थानीय परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनियों के साथ मिलकर फंड संरचना या प्रत्यक्ष उद्यम पूंजी/निजी इक्विटी फंड स्थापित करने के लिये (विशेष रूप से सामाजिक प्रभाव, स्वास्थ्य देखभाल और स्टार्ट-अप क्षेत्रों में) प्रोत्साहित किया जा सकता है।
  • बैंकों को श्रेणी-III के वैकल्पिक निवेश कोष (Alternative Investment Fund-AIF) में निवेश की अनुमति दी जानी चाहिये।
  • देश के बड़े वित्तीय संस्थानों को भी अपने निवेश योग्य अधिशेष के कुछ हिस्से को घरेलू निधियों में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिये, जिससे स्टार्टअप में निवेश हेतु अतिरिक्त पूंजी की व्यवस्था हो सकेगी। 

कर छूट: 

  • COVID-19 महामारी के दौरान स्टार्टअप में निवेश को बढ़ावा देने के लिये समिति ने केंद्र सरकार को कम-से-कम अगले दो वर्षों के लिये स्टार्टअप में कलेक्टिव इन्वेस्टमेंट व्हीकल (Collective Investment Vehicles- CIVs) जैसे- एंजल फंड, AIF और LLPs के द्वारा किये गए निवेश पर सभी दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ (Long Term Capital Gains) कर को समाप्त करने का सुझाव दिया है।
    • सामूहिक निवेश वाहन या कलेक्टिव इन्वेस्टमेंट व्हीकल (Collective Investment Vehicles- CIVs)  ऐसी इकाई होती है जो निवेशकों को सीधे परिभूतियों को खरीदने के स्थान पर सामूहिक निधि (Pool Fund) में कई निवेशकों को सामूहिक रूप से निवेश की सुविधा प्रदान करता है।
    •  CIVs को आमतौर पर एक फंड प्रबंधन कंपनी द्वारा प्रबंधित किया जाता है। 
  • समिति के अनुसार, दो वर्षों की छूट के पश्चात CIVs पर प्रतिभूति लेनदेन कर (Securities Transaction Tax- STT) लागू किया जा सकता है।

लाभ: 

  • समिति की सिफारिशों को अपनाने से  स्टार्टअप कंपनियों में निवेश को बढ़ावा देने में सहायता प्राप्त होगी।
  • वर्तमान में COVID-19 की महामारी के कारण अर्थव्यवस्था में आई गिरावट के बीच स्टार्टअप रोज़गार और बाज़ार में मांग को बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

‘भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक’

(Small Industries Development Bank of India- SIDBI):

  • भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (SIDBI) एक संविधिक निकाय है, इसकी स्थापना 2 अप्रैल, 1990 को की गई थी।
  • SIDBI,  यह सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) क्षेत्र के संवर्द्धन, वित्तपोषण और विकास के साथ-साथ समान गतिविधियों से जुड़े संस्थानों के कार्यों के समन्वय के लिये प्रमुख वित्तीय संस्थान के रूप में कार्य करता है। 
  • SIDBI का मुख्यालय लखनऊ (उत्तर प्रदेश) में स्थित है। 

पूंजीगत लाभ कर (Capital Gains Tax): 

  • किसी ‘पूंजीगत परिसंपत्ति’ की बिक्री से हमें जो भी लाभ प्राप्त होता है उसे ‘पूंजीगत लाभ’ कहा जाता है। आयकर अधिनियम, 1961 के अनुसार, इस लाभ को ‘आय’ के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। अतः संपत्ति हस्तांतरित करने वाले व्यक्ति को अपने द्वारा कमाए गए लाभ पर आय के रूप में कर देना होता है जिसे ‘पूंजीगत लाभ कर’ कहा जाता है।
  • पूंजीगत लाभ कर दो प्रकार के होते हैं-
    1. दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ कर:  यह कर उन संपत्तियों की बिक्री से प्राप्त लाभ पर लगाया जाता है जिन्हें एक वर्ष से अधिक समय तक रखा गया हो।
    2. अल्पकालिक पूंजीगत लाभ कर: यह कर उन संपत्तियों की बिक्री से प्राप्त लाभ पर लगाया जाता है जिन्हें एक वर्ष या उससे कम समय तक रखा गया हो।

प्रतिभूति लेन-देन कर

(Securities Transaction Tax-STT): 

  • यह कर भारत के स्टॉक एक्सचेंजों में सूचीबद्ध प्रतिभूतियों की खरीद और बिक्री के समय लगाया जाता है।
  • क्रेता और विक्रेता दोनों को STT के रूप में शेयर मूल्य का 0.1% भुगतान करना होता है।

स्रोत: द इंडियन एक्सप्रेस


ऋण पुनर्गठन योजना में संतुलन की आवश्यकता: RBI गवर्नर

प्रिलिम्स के लिये

के.वी. कामथ समिति, ऋण पुनर्गठन योजना

मेन्स के लिये

महामारी के प्रभाव से निपटने हेतु केंद्रीय बैंक और केंद्र सरकार के उपाय

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारतीय रिज़र्व बैंक (Reserve Bank of India-RBI) के गवर्नर शक्तिकांत दास ने कोरोना वायरस (COVID-19) महामारी से संबंधित तनाव से निपटने के लिये एक संतुलित ऋण पुनर्गठन योजना का आह्वान किया है।

प्रमुख बिंदु

  • एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए गवर्नर शक्तिकांत दास ने महामारी के कारण उत्पन्न हुए तनाव से निपटने के लिये ऋण पुनर्गठन योजना में किसी भी प्रकार की छूट देने से इनकार करते हुए कहा कि इस योजना को जमाकर्त्ताओं और उधारकर्त्ताओं के हितों को संतुलित करने के उद्देश्य से संरचित किया गया है।
  • शक्तिकांत दास के अनुसार, देश में करोड़ों की संख्या में ऐसे छोटे, बड़े, मध्यम और सेवानिवृत्त तमाम तरह के जमाकर्त्ता हैं, जिनके लिये बैंकों में जमा की गई राशि काफी महत्त्वपूर्ण है, जबकि देश भर में उधारकर्त्ताओं की संख्या तुलनात्मक रूप से काफी कम है।
  • ध्यातव्य है कि देश का केंद्रीय बैंक उदार नीति अपनाकर वर्ष 2014 के बाद ऋण पुनर्गठन के कारण बैंकों की गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NPA) में हुई अचानक वृद्धि को पुनः दोहराना नहीं चाहता है। वर्ष 2008-09 के वैश्विक वित्तीय संकट के मद्देनज़र भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा अपनाई गई अत्यधिक उदार नीति के कारण ही 2014-15 के बाद खराब ऋणों में काफी वृद्धि हुई है। 

पृष्ठभूमि

  • भारतीय रिज़र्व बैंक ने अपनी हालिया मौद्रिक नीति रिपोर्ट में कोरोना वायरस (COVID-19) से प्रभावित कंपनियों को राहत देने के लिये कई कदम उठाए थे। इसमें आम लोगों, बड़े निगमों, और सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यमों (MSME) की आय और बैलेंस शीट पर बढ़ते तनाव को कम करने के लिये ऋणदाताओं को उन्हें गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों के रूप में वर्गीकृत किये बिना ऋण के एकमुश्त पुनर्गठन की अनुमति दी थी। 
    • ध्यातव्य है कि बड़ी संख्या में अच्छा प्रदर्शन करने वाली कंपनियाँ तनाव का सामना कर रही हैं, क्योंकि उनका नकदी प्रवाह, उनके ऋण बोझ की तुलना में काफी कम हो रहा है।
  • इसके पश्चात् भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने COVID-19 से प्रभावित ऋणों के पुनर्गठन पर के. वी. कामथ की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया।
    • इस समिति को कॉर्पोरेट ऋणों के एकमुश्त पुनर्गठन के लिये मापदंडों की सिफारिश करने का कार्य सौंपा गया था।
    • इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में कुल 26 क्षेत्रों में ऋण के पुनर्गठन के लिये 5 वित्तीय अनुपातों और क्षेत्र-विशिष्ट सीमाएँ निर्धारित की थीं।
    • इसमें यह भी निर्दिष्ट किया गया था कि पुनर्गठित ऋण कार्यकाल को दो वर्षों से आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है।

ऋण पुनर्गठन का अर्थ

  • ऋण पुनर्गठन में मौजूदा ऋण की शर्तों को बदलना और उन्हें उधारकर्त्ताओं के लिये अधिक अनुकूल बनाना है। उदाहरण के लिये एक ऋणदाता ब्याज़ दर या मासिक भुगतान को कम करने के लिये ऋण का पुनर्गठन कर सकता है। 
  • ऋण पुनर्गठन का विकल्प सामन्यतः ऐसी स्थिति में चुना जाता है जब उधारकर्त्ता ऋण की  पुरानी शर्तों के तहत ब्याज़ अथवा मासिक भुगतान करने में असमर्थ होता है। 

संबंधित मुद्दे

  • भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा निर्धारित पुनर्गठन की योजना की आलोचना मुख्य तौर पर के. वी. कामथ समिति द्वारा निर्धारित 26 क्षेत्रों को लेकर की जा रही है। आलोचकों के अनुसार, इन 26 क्षेत्रों के अलावा भी कई अन्य क्षेत्र हैं जो इस महामारी के कारण तनाव में हैं और उन्हें ऋण पुनर्गठन की आवश्यक है।
    • 26 क्षेत्रों में ऑटोमोबाइल, बिजली, पर्यटन, सीमेंट, रसायन, रत्न और आभूषण, लॉजिस्टिक्स, खनन, विनिर्माण, रियल एस्टेट और शिपिंग आदि शामिल हैं।
  • इसके अलावा नियमों के अनुसार, पुनर्गठित ऋण कार्यकाल को दो वर्षों से आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है, वहीं कई जानकारों का मानना है कि आर्थिक सुधार के लिये दो वर्ष की अवधि भी बहुत कम है और इसे बढ़ाने की मांग की जा रही है।
    • ध्यातव्य है कि जहाँ एक ओर देश की GDP में लगातार संकुचन दर्ज किया जा रहा है, वहीं दूसरी और सरकार के राजस्व को भी भारी नुकसान का सामना करना पड़ रहा है, जिससे किसी दूसरे आर्थिक पैकेज की संभावना भी काफी कम है।

आगे की राह

  • भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा घोषित ऋण पुनर्गठन योजना से कोरोना वायरस (COVID-19) महामारी के कारण आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रही कंपनियों को बड़ी राहत मिलेगी। 
  • हालाँकि ऋण पुनर्गठन को एक अस्थायी समाधान के तौर पर देखा जाना चाहिये, क्योंकि लंबे समय तक इसे जारी रखने से मुद्रास्फीति में वृद्धि, मुद्रा संकट और वित्तीय अस्थिरता हो सकती है।
  • साथ ही नियामकों को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि कंपनियों द्वारा ऋण पुनर्गठन के प्रावधानों का दुरुपयोग न किया जाए। 

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


COVID-19 के नियंत्रण में श्रृंखला अंतराल की भूमिका

प्रिलिम्स के लिये:

श्रृंखला अंतराल, मूल प्रजनन अनुपात, R- नॉट

 मेन्स के लिये: 

COVID-19 के प्रसार को रोकने के प्रयास 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में ‘साइंस’ पत्रिका में प्रकाशित एक शोध में चीन द्वारा COVID-19 के प्रसार को रोकने के लिये चीन की श्रृंखला अंतराल या सीरियल इंटरवल (Serial Interval) के प्रबंधन की क्षमता को उत्तरदायी बताया गया है।

प्रमुख बिंदु: 

  • आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, वर्तमान में चीन में COVID-19 संक्रमण के कुल मामलों की संख्या 90,219 है, जबकि इस महामारी के कारण चीन में हुई कुल मृत्यु का आँकड़ा 4,735 है।
  • एक रिपोर्ट के अनुसार, चीन में पिछले 30 दिनों में COVID-19 के स्थानीय संक्रमण से जुड़ा एक भी मामला नहीं दर्ज किया गया है और चीन में मास्क की अनिवार्यता और अन्य प्रतिबंधों में काफी छूट दे दी गई है।

क्या है श्रृंखला अंतराल या सीरियल इंटरवल ?

  • एक श्रृंखला अंतराल से आशय COVID-19 के प्राथमिक मामले (संक्रमित व्यक्ति) में  लक्षण की शुरुआत और प्राथमिक मामले के संपर्क में आए किसी दूसरे  व्यक्ति में लक्षणों की शुरुआत के बीच की अवधि से है।
  • सरल शब्दों में कहें तो श्रृंखला अंतराल किन्हीं दो व्यक्तियों A और B में COVID-19 लक्षणों के शुरुआत के बीच की अवधि है, जहाँ व्यक्ति B को यह संक्रमण व्यक्ति A के संपर्क में आने के कारण हुआ हो।
  • इस शब्द का प्रयोग पहली बार ब्रिटिश चिकित्सक ‘विलियम पिकल्स’ (William Pickles) द्वारा किया गया था, जिन्होंने वर्ष 1942-45 के दौरान यूनाइटेड किंगडम में हेपेटाइटिस महामारी के मामले में इसे संचरण अंतराल या ट्रांसमिशन इंटरवल के रूप में संदर्भित किया था।
  • आगे चलकर ब्रिटिश चिकित्सक ‘आर.ई. होप सिंपसन’ (RE Hope Simpson)  ने इसके लिये श्रृंखला अंतराल शब्द का प्रयोग किया और इसे लगातार दो संक्रमणों की शुरुआत के बीच होने वाले अंतराल के रूप में परिभाषित किया।

श्रृंखला अंतराल का महत्त्व: 

  • शोधकर्त्ताओं के अनुसार, श्रृंखला अंतराल महामारी विज्ञान के अन्य मापदंडों जैसे-ऊष्मायन अवधि (किसी व्यक्ति के वायरस और लक्षण की शुरुआत के बीच का समय) और प्रजनन दर/R-नाॅट या R0 (संक्रमित व्यक्ति से संक्रमित होने वाले लोगों की संख्या) आदि पर भी निर्भर करता है।
  • श्रृंखला अंतराल, आबादी में बढ़ते प्रतिरक्षा स्तर और भविष्य में संक्रमण प्रसार की तीव्रता का अनुमान लगाने के साथ संक्रमण नियंत्रण के प्रयासों की प्रभावशीलता का आकलन करने में भी सहायता करता है।
  • अतः जितनी जल्दी COVID-19 संक्रमित व्यक्ति की पहचान कर उसे अलग या आइसोलेट किया जाता है, श्रृंखला अंतराल उतना ही छोटा हो जाता है और इस प्रकार संक्रमण के प्रसार की संभावनाओं को कम किया जा सकता है। 
  • श्रृंखला अंतराल के प्रबंधन के लिये कांटैक्ट ट्रेसिंग (Contact Tracing), क्वारंटीन (Quarantine)  आदि प्रयासों को अपनाया जाना चाहिये।

COVID-19 नियंत्रण में श्रृंखला अंतराल की भूमिका: 

  • इस अध्ययन के दौरान शोधकर्त्ताओं ने पाया कि जनवरी और फरवरी के बीच वुहान (चीन) में COVID-19 का श्रृंखला अंतराल 7.8 दिन से घटकर 2.6 दिन हो गया था।
  • शोधकर्त्ताओं के अनुसार, किसी व्यक्ति में लक्षणों का पता चलने के एक दिन के अंदर उसके संपर्क में आए सभी लोगों को क्वारंटीन करने से COVID-19 के प्रसार को 60% तक कम करने में सहायता प्राप्त हुई।
  • चीन में कांटैक्ट ट्रेसिंग और क्वारंटीन पर विशेष ज़ोर दिया गया जिससे COVID-19 के प्रसार की संभावनाओं को कम किया गया, इसके साथ ही शहरों के अंदर और दो शहरों के बीच यातायात को पूरी तरह स्थगित करने तथा अन्य शहरों में सोशल डिस्टैंसिंग (Social Distancing) के अन्य प्रयासों से श्रृंखला अंतराल को कम किया जा सका।
  • इसी प्रकार सियोल (दक्षिण कोरिया) में किये गए अध्ययन के आधार पर प्रकाशित एक शोध के अनुसार, दक्षिण कोरिया में COVID-19 संक्रमण का श्रृंखला अंतराल लगभग 3.63 दिन था।
  • दक्षिण कोरिया में भी संक्रमण के श्रृंखला अंतराल के कम करने के लिये देश में संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आए लोगों की पहचान करने के प्रयासों को महत्त्वपूर्ण बताया गया।

भारत सरकार के प्रयास:

  • COVID-19 के प्रसार को रोकने के लिये भारत सरकार द्वारा 24 मार्च, 2020 को पहली बार 21 दिनों के देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा की गई। 
  • COVID-19 से संभावित संक्रमित व्यक्तियों की पहचान हेतु केंद्र सरकार द्वारा आरोग्य सेतु (Aarogya Setu) एप लॉन्च किया गया।  
  • COVID-19 महामारी और लॉकडाउन के कारण उत्पन्न हुई आर्थिक चुनौतियों से निपटने हेतु  सरकार द्वारा देश के विभिन्न क्षेत्र के लिये ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत  राहत पैकेज की घोषणा की गई आदि।   

निष्कर्ष:

वर्तमान में COVID-19 के नियंत्रण हेतु किसी प्रमाणिक वैक्सीन की अनुलब्धता में संक्रमित लोगों की पहचान कर कांटैक्ट ट्रेसिंग (Contact Tracing) और क्वारंटीन (Quarantine) जैसे प्रयासों के माध्यम से ही इस महामारी के प्रसार को कम किया जा सकता है। हालाँकि देश की अर्थव्यवस्था में आई गिरावट को देखते हुए आवश्यक दैनिक गतिविधियों (जैसे-यातायात, व्यवसाय आदि) को बंद करना बहुत कठिन होगा। गौरतलब है कि वर्तमान में भारत में प्रतिदिन COVID-19 संक्रमण का आँकड़ा 80 हज़ार से अधिक तक पहुँच गया है, ऐसे में चिकित्सीय प्रणाली को मज़बूत करने के साथ लोगों को COVID-19 के लक्षणों और क्वारंटीन तथा सोशल डिस्टैंसिंग आदि के लाभ के बारे में जागरूक किया जाना चाहिये। साथ ही लोगों को भी इस महामारी के नियंत्रण में अपना सहयोग देना चाहिये।  

स्रोत: द इंडियन एक्सप्रेस


ऑस्टियोआर्थराइटिस और डायबिटिक फुट अल्सर

प्रिलिम्स के लिये  

ऑस्टियोआर्थराइटिस, डायबिटिक फुट अल्सर  

मेन्स के लिये 

परियोजना के उद्देश्य एवं महत्ता

चर्चा में क्यों ? 

ऑस्टियोआर्थराइटिस (Osteoarthritis) और डायबिटिक फुट अल्सर (Diabetic Foot Ulcer)  जैसी नैदानिक (Clinical) ​​स्थितियों की  आवश्यकता पूर्ति करने वाले उपकरणों के सह-विकास के लिये केरल स्थित एक वैज्ञानिक संस्था और मोहाली स्थित एक निजी निर्माता कंपनी साथ मिलकर काम कर रहे हैं। इससे ऑर्थोटिक उपकरणों के विकास को बढ़ावा मिल सकता है।

प्रमुख बिंदु

ऑस्टियोआर्थराइटिस (Osteoarthritis)

  • ऑस्टियोआर्थराइटिस जोड़ों में दर्द और जकड़न पैदा करने वाला रोग है, जो जोड़ों की हड्डियों के मध्य स्थित आर्टिकुलर कार्टिलेज़ को नुकसान पहुँचाता है।
  • आर्टिकुलर कार्टिलेज हड्डियों के मध्य मुलायम कुशन की तरह काम करता है। धीरे-धीरे कार्टिलेज नष्ट होने पर जोड़ों के मूवमेंट के समय हड्डियाँ परस्पर टकराने लगती हैं।
  • वैसे तो यह किसी भी जॉइंट को नुकसान पहुँचा सकता है, लेकिन घुटने के जॉइंट से संबंधित रोगी सबसे अधिक पाए जाते हैं।

डायबिटिक फुट अल्सर

  • मधुमेह रोग से ग्रसित व्यक्ति में पैर का अल्सर हो जाता है जिसके  कारण त्वचा के ऊतक  नष्ट हो जाते हैं और उसके नीचे की परतें दिखाई देने लगती हैं। यह पैरों की हड्डियों को प्रभावित करता है। 
  • मोटापे और विटामिन-डी की कमी, दोनों समस्याओं के एक साथ होने पर डायबिटिक फुट अल्सर होने का खतरा और भी बढ़ जाता है।
  • भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के तहत राष्ट्रीय महत्त्व के संस्थान श्री चित्रा तिरुनल इंस्टीट्यूट फॉर मेडिकल साइंसेज़ एंड टेक्नोलॉजी (Sree Chitra Tirunal Institute for Medical Sciences and Technology-SCTIMST), त्रिवेंद्रम, केरल ने ऑर्थोटिक्स एवं पुनर्वास संबंधी अनुसंधान एवं विकास (R&D) इकाई स्थापित करने के लिये टाइनोर ऑर्थोटिक्स प्राइवेट लिमिटेड (Tynor Arthritis Private Limited- Tynor), मोहाली के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये हैं।
  • टाइनोर उच्च गुणवत्तापूर्ण एवं सस्ते ऑर्थोपेडिक उपकरणों का निर्माण एवं निर्यात करता है। अब यह SCTIMST के साथ मिलकर ऑर्थोटिक्स एवं पुनर्वास के क्षेत्र में संयुक्त अनुसंधान कार्यक्रमों को बढ़ावा देगा। टाइनोर ने डायबिटिक फुट अल्सर एवं ऑस्टियोआर्थराइटिस के मरीज़ों में दो ऑफ-लोडिंग उपकरणों के अनुसंधान एवं विकास  के लिये SCTIMST का वित्त पोषण किया है। एक वर्ष के लिये तैयार की गई इस परियोजना के अंतर्गत टाइनोर 27 लाख रूपए का योगदान करेगा।

परियोजना के उद्देश्य एवं महत्ता

  • इस संस्थान-उद्योग सहयोग का मुख्य उद्देश्य ऑस्टियोआर्थराइटिस और डायबिटिक फुट अल्सर जैसी नैदानिक ​​स्थितियों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिये ऑर्थोज़ का एक क्लस्टर विकसित करना है। 
  • एशिया–प्रशांत क्षेत्र में वृद्धों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। जनसंख्या का यह भाग मधुमेह के प्रति अधिक सुभेद्य हैं। इस कारण डायबिटिक फुट अल्सर के वैश्विक चिकित्सीय बाज़ार में अत्यधिक वृद्धि होने का अनुमान है। वर्ष 2019-2025 अवधि के दौरान 6.6% की यौगिक वार्षिक वृद्धि दर (Compound Annual Growth Rate-CAGR) के साथ डायबिटिक फुट अल्सर और प्रेशर अल्सर के वैश्विक बाज़ार के वर्ष 2025 तक 5,265 मिलियन डॉलर तक पहुँच जाने का अनुमान है, जो काफी चिंताजानक है।

  • ऑस्टियोआर्थराइटिस, घुटने की आर्थोपेडिक सर्जरी और एथलेटिक्स में खेल संबंधी चोटों की बढ़ती संख्या के कारण ‘नी ब्रेसिज़’ (Knee Braces) के वैश्विक बाज़ार में काफी वृद्धि हुई है। नी ब्रेसिज़ के वैश्विक बाजार का आकार वर्ष 2018 में 1.5 बिलियन डॉलर अनुमानित था। वर्तमान में इसकी CAGR 4.3% होने की उम्मीद है। ऑस्टियोआर्थराइटिस के बढ़ते बोझ, लक्षित जनसंख्या में वृद्धि, लागत प्रभावी तकनीक और आसानी से पहने जा सकने वाले ब्रेसिज़ की उपलब्धता संबंधित बाज़ार के विकास को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक हैं।

  • SCTIMST ने पिछले 30 या उससे अधिक वर्षों में जैव-चिकित्सा उपकरणों के क्षेत्र में व्यापक पैमाने पर अनुसंधान एवं विकास का कार्य कर इस क्षेत्र में खुद को अग्रणी के तौर पर स्थापित किया है। 
  • टाइनोर ने ऑर्थोपेडिक उपकरणों और फुटकेयर उत्पादों के क्षेत्र में भारत का पहला अनुसंधान एवं विकास केंद्र स्थापित करने की योजना बनाई है। इस केंद्र को टोरनाडो (Tynor Ortho Research and Appliance Development Organisation-TORNADO) नाम दिया गया है। इसका उद्देश्य एक टोरनाडो जैसी तीव्र गति से प्रौद्योगिकी एवं नवाचार आधारित हलचल पैदा करना है। 

निष्कर्ष: इस संस्थान-उद्योग सहयोग से स्वदेशी उपकरणों के विकास करने और एक ऑर्थोटिक्स एवं पुनर्वास संबंधी अनुसंधान एवं विकास इकाई स्थापित करने से भारत सरकार के उच्च प्राथमिकता वाले 'आत्मनिर्भर भारत' के लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद मिलेगी।  

स्रोत: पीआईबी 


भारत में स्पूतनिक वी की आपूर्ति पर समझौता

प्रिलिम्स के लिये:   

केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन, COVID-19, स्पूतनिक-वी

मेन्स के लिये:

COVID-19 वैक्सीन का निर्माण, वैक्सीन निर्माण में भारत की भूमिका 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में रूस के संप्रभु धन कोष ‘रूस प्रत्यक्ष निवेश कोष’ (Russia Direct Investment Fund- RDIF) द्वारा भारत को स्पूतनिक-वी (Sputnik V) वैक्सीन की 10 करोड़ खुराक की आपूर्ति के लिये हैदराबाद स्थित ‘डॉ. रेड्डीज़ लेबोरेट्रीज़’ (Dr. Reddy’s Laboratories) के साथ एक समझौता किया गया है।

प्रमुख बिंदु:

  • स्पूतनिक-वी वैक्सीन का विकास रूस के ‘गामलेया राष्ट्रीय महामारी विज्ञान और सूक्ष्म जीव विज्ञान अनुसंधान संस्थान’ (Gamaleya National Research Institute of Epidemiology and Microbiology) द्वारा किया गया है।
  • 11 अगस्त, 2020 को रूस के स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा इस वैक्सीन के पंजीकरण के बाद यह COVID-19 के नियंत्रण हेतु मनुष्यों को दिये जाने के लिये किसी सरकार द्वारा प्रमाणित पहली वैक्सीन बन गई।
  • यह वैक्सीन एडिनोवायरल वेक्टर प्लेटफॉर्म पर आधारित है। 
  • गौरतलब है कि इस वैक्सीन का नाम सोवियत संघ द्वारा लॉन्च किये गए प्रथम कृत्रिम पृथ्वी उपग्रह (Artificial Earth Satellite) स्पुतनिक-I (Sputnik-I) के नाम पर रखा गया है।

RDIF और डॉ. रेड्डीज़ लेबोरेट्रीज़ का समझौता: 

  • डॉ. रेड्डीज़ लेबोरेट्रीज़ द्वारा भारत में इस वैक्सीन के प्रयोग हेतु नियामकीय अनुमति प्राप्त करने के लिये चरण-3 के परीक्षण की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
  • इस समझौते के तहत डॉ. रेड्डीज लेबोरेट्रीज़ को इस दवा की पहली 10 करोड़ खुराक खरीदने का अधिकार होगा, हालाँकि अभी तक इस वैक्सीन के मूल्य के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है। 
  • ध्यातव्य है कि इस समझौते के अंतर्गत वैक्सीन को भारत में निर्मित करने की बात नहीं शामिल की गई है।
  • RDIF के अनुसार, वर्ष 2020 की समाप्ति तक भारत में इस वैक्सीन की आपूर्ति प्रारंभ हो सकती है, हालाँकि यह वैक्सीन के सफल परीक्षण और भारत में इसकी नियमाकीय अनुमति पर भी निर्भर करेगा।  

COVID-19 वैक्सीन निर्माण के अन्य प्रयास:  

  • RDIF द्वारा भारत में इस वैक्सीन के निर्माण हेतु कई भारतीय कंपनियों से भी बातचीत की जा रही है 
  • हाल ही में ब्रिटिश कंपनी एस्ट्राजेनेका और पुणे स्थित ‘सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया’ (Serum Institute of India- SII) द्वारा भी COVID-19 वैक्सीन निर्माण के लिये एक समझौता किया गया है।
  • इस समझौते के तहत SII द्वारा COVID-19  वैक्सीन की 10 करोड़ खुराक का निर्माण किया जाएगा। 
  • इसके अतिरिक्त भारत की कुछ अन्य कंपनियों (जैसे-भारत बायोटेक, बायोलॉजिकल ई, अरबिंदो फार्मा और इंडियन इम्यूनोलॉजिकल) द्वारा भी COVID-19 वैक्सीन निर्माण हेतु अलग-अलग संस्थानों के साथ समझौते किये गए हैं।

भारत में आवश्यक नियामकीय अनुमति:  

  • भारत में किसी भी वैक्सीन के प्रयोग की अनुमति केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (Central Drugs Standard Control Organisation- CDSCO) द्वारा दी जाती है।
  • आमतौर पर भारत से बाहर विकसित किसी भी वैक्सीन के लिये भारतीय लोगों पर चरण-2 और चरण-3  का परीक्षण करना अनिवार्य होता है। अंतिम चरण या लेट फेज़ ट्रायल ( Late-Phase Trial) के परीक्षण इसलिए आवश्यक होते हैं क्योंकि वैक्सीन का प्रभाव विभिन्न जनसंख्या समूहों पर भिन्न हो सकता है।
  • हालाँकि वर्तमान परिस्थिति को देखते हुए CDSCO को बगैर लेट फेज़ ट्रायल के भी वैक्सीन के प्रयोग हेतु आपातकालीन अनुमति देने का अधिकार है।
  • स्पूतनिक वी से जुड़ी चिंताएँ:
  •  इस वैक्सीन के बारे में प्रकाशित डेटा की कमी और इसके तीव्र विकास को लेकर विशेषज्ञों ने इस वैक्सीन की सुरक्षा और प्रभावकारिता पर चिंता व्यक्त की है।
  • कुछ विशेषज्ञों के अनुसार, रूस द्वारा वैक्सीन की सुरक्षा से ज्यादा इसे शीघ्र ही जारी करने पर विशेष ध्यान दिया गया है।
  • गौरतलब है कि रूस द्वारा अभी तक इस वैक्सीन के नैदानिक ​​परीक्षणों के चरण I और चरण II के परिणामों को सार्वजनिक किया गया  है, जिसमें इस वैक्सीन में बिना किसी प्रतिकूल प्रभाव के 100%  स्थिर प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया के प्रदर्शन की बात कही गई है।
    • इस वैक्सीन के पंजीकरण के बाद का नैदानिक परीक्षण अभी 40,000 स्वयंसेवकों पर चल रहा है।

भारत के लिये अवसर:

  • एक बड़े घरेलू बाज़ार के साथ वैश्विक स्तर पर वैक्सीन निर्माण में भारत का महत्त्वपूर्ण स्थान है
  • वित्तीय वर्ष 2019-20 में भारत से कुल 878.64 मिलियन अमेरिकी डॉलर की वैक्सीन का निर्यात किया गया जो देश के कुल फार्मा निर्यात ( 55.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर) का 4.27% था।

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization-WHO) की लगभग 70% वैक्सीन और खसरे (Measles) के 90% टीकों का निर्माण भारत में होता है। 

  • अतः यदि इस वैक्सीन के नैदानिक परीक्षण का अंतिम चरण सफल रहता है तो इस वैक्सीन के निर्माण के माध्यम से भारत COVID-19 से निपटने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकेगा। 

स्रोत: द हिंदू


वर्ष 2050 तक वन्यजीवों की पुनर्बहाली

प्रिलिम्स के लिये 

विश्व वन्यजीव कोष (WWF), जैव-विविधता पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCBD)

 मेन्स के लिये 

जैव-विविधता के संरक्षण के लिये उठाए जा सकने वाले कदम 

चर्चा में क्यों? 

विश्व वन्यजीव कोष (World Wildlife Fund-WWF) की एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 50 वर्षों में वन्यजीवों की आबादी में दो-तिहाई से अधिक की कमी आई है। वैश्विक स्तर पर नदियों और झीलों में जीवों की तीव्र कमी दर्ज की गई है। ताजे जल में निवास करने वाले वन्यजीवों की संख्या में वर्ष 1970 के पश्चात् से 84 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। 

प्रमुख बिंदु  

  • ‘जैव-विविधता पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन’ (United Nations Convention on Biological Diversity-UNCBD) में स्थलीय वन्यजीवों में हो रही कमी की वैश्विक प्रवृत्तियों को कम करने और वर्ष 2050 या उससे पूर्व इसे पुनर्बहाल करने के लक्ष्य निर्धारित किये गए हैं।
  • प्राचीन वन भूमि से लेकर वर्तमान कृषि भूमि/चरागाहों तक भूमि उपयोग में परिवर्तन ने वैश्विक स्तर पर स्थलीय पारिस्थितिक तंत्र में जैव विविधता के लिये सबसे बड़ा खतरा उत्पन्न किया  है। 
  • मानव समाजों के विकास और समृद्धि में वृद्धि को बनाए रखते हुए 21 वीं सदी के दौरान जैव विविधता को संरक्षित और पुनर्बहाल करना एक बड़ी चुनौती है।  
  • प्रकृति और मानव के स्वास्थ्य सहज रूप से परस्पर संबंधित हैं। COVID-19 जैसी संक्रामक महामारी के उद्भव को वनों और परिस्थितिक तंत्र के विनाश से जोड़कर देखा जा रहा है। स्वस्थ पारिस्थितिक तंत्र वर्तमान वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं और समाजों का आधार है।  
  • अधिक संख्या में प्रजातियों के विलुप्त होने से सभ्यताओं के लिये आवश्यक जीवन समर्थन प्रणालियों (Life Support Systems) के समक्ष खतरा उत्पन्न होने लगता है। विश्व आर्थिक मंच (World Economic Forum-WEF) द्वारा विश्व के समक्ष नौ बड़े खतरों को चिन्हित किया गया है, जिनमें से छः प्रकृति के विनाश से संबंधित हैं।

Historical

उठाए जा सकने वाले कदम 

  • संपूर्ण विश्व स्तर पर सरकारों द्वारा जैव-विविधता के संरक्षण के लिये वैश्विक हॉटस्पॉट्स में बड़े पैमाने पर संरक्षण क्षेत्रों को स्थापित करने की आवश्यकता है। दुर्लभ प्रजातियों की उपस्थिति वाले छोटे द्वीपों को संरक्षित किया जाना चाहिये।
  • वन्यजीवों के निवास करने और स्वतंत्र रूप से विचरण करने वाले इन संरक्षण क्षेत्रों को संपूर्ण विश्व की कम से कम 40% भूमि पर विस्तृत किये जाने की आवश्यकता है, जिससे विभिन्न वन्यजीव प्रजातियों और संपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र में हो रही गिरावट को रोककर वक्र को मोड़ा (Bending the Curve) जा सके। 
  • इन संरक्षण क्षेत्रों के भौगोलिक विस्तार से अधिक महत्त्वपूर्ण इनकी भौगोलिक अवस्थिति और इनको प्रबंधित करने का तरीका है। अतः इन पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिये। 
  • ऐसे स्थान जहाँ प्रजातियों के आवास विलुप्त होने के कगार पर हैं, वहाँ वन्यजीवों के आवासों की पुनर्बहाली और संरक्षण के प्रयासों को लक्षित करने की आवश्यकता है। आगामी 30 वर्ष पृथ्वी पर जैव विविधता के लिये महत्त्वपूर्ण होंगे।
  • वर्तमान खाद्य प्रणालियों को परिवर्तित किये जाने की आवश्यकता है। कम कृषि भूमि पर अधिक उत्पादन करने का प्रयास किया जाना चाहिये। यदि प्रत्येक किसान कृषि में उपलब्ध सर्वोत्तम साधनों का उपयोग करे तो खाद्य उत्पादन के लिये कृषि भूमि के कुल क्षेत्रफल का केवल आधा भाग ही आवश्यक होगा। 
  • परिवहन और खाद्य प्रसंस्करण के दौरान उत्पन्न होने वाले अपशिष्ट की मात्रा को कम करके भी बहुत सी अन्य अक्षमताओं की समस्याओं को हल किया जा सकता है।
  • अवनायित भूमि की पुनर्बहाली के साथ-साथ बड़े पैमाने पर भोजन की बर्बादी को कम करके भी मानव समाज इस प्रयास में मदद कर सकता है।  
  • वर्ष 2050 तक विश्व की 8% भूमि को प्राकृतिक रूप में पुनः परिवर्तित किया जा सकता है। शेष भूमि का उपयोग करने के लिये उचित योजना बनाए जाने की आवश्यकता है, ताकि खाद्य उत्पादन और अन्य उपयोगों को वन संधाधनों के संरक्षण के साथ संतुलित किया जा सके।
  • ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिये भी बड़े पैमाने पर प्रयास किये जाने चाहिये क्योंकि इस शताब्दी में जलवायु परिवर्तन द्वारा संपूर्ण विश्व स्तर पर वन्य जीवन को सर्वाधिक बुरी तरीके से प्रभावित करने की संभावना है। मानव के भूमि के साथ संबंधों को परिवर्तित करने और  प्रदूषण में कमी लाने वाले नीतिगत उपायों को अपनाया जाना चाहिये। 

जैव-विविधता पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन

  • जैव-विविधता पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन वर्ष 1992 में रियो-डी-जनेरियो में पृथ्वी शिखर सम्मेलन के दौरान अपनाई गई एक बहुपक्षीय संधि है। यह सतत् विकास के संबंध में एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ है, जो संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ( The United Nations Environment Programme-UNEP) के अंतर्गत आता है।
  • जैव विविधता पर सम्मेलन (CBD) 29 दिसंबर, 1993 को लागू हुआ। इसके 3 मुख्य उद्देश्य हैं:
    •  जैव विविधता का संरक्षण।
    •  जैव- विविधता के घटकों का सतत् उपयोग।  
    • आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग से होने वाले लाभों का उचित और न्यायसंगत साझाकरण। 

आगे की राह

  • रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया है कि खाद्य प्रणालियों में परिवर्तन और भूमि उपयोग नियोजन जैव विविधता के संरक्षण और पुनर्बहाली में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। संरक्षण के उपर्युक्त उपाय भूमि का न केवल पुनः प्राकृतिक रूप में परिवर्तन करने में सक्षम हैं, बल्कि ये जलवायु परिवर्तन की गति को धीमा करने, जल संसाधनों पर दबाव कम करने और  नाइट्रोजन प्रदूषण को सीमित कर मानव स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के क्रम में भी महत्त्वपूर्ण हैं। 

विश्व वन्यजीव कोष

(World Wildlife Fund for Nature-WWF)

  • WWF का गठन वर्ष 1961 में हुआ था तथा यह पर्यावरण के संरक्षण, अनुसंधान एवं रख-रखाव संबंधी विषयों पर कार्य करता है।
  • इसका उद्देश्य पृथ्वी पर पर्यावरण के अवनयन को रोकना और एक ऐसे भविष्य का निर्माण करना है जिसमें मनुष्य प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित कर सके।
  • WWF द्वारा लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट (Living Planet Report), लिविंग प्लैनेट इंडेक्स (Living Planet Index) तथा इकोलॉजिकल फुटप्रिंट कैलकुलेशन (Ecological Footprint Calculation) प्रकाशित की जाती है।
  • इसका मुख्यालय ग्लैंड (स्विट्ज़रलैंड) में है।

 स्रोत: डाउन टू अर्थ


योशीहिदे सुगा: जापान के नए प्रधानमंत्री

प्रिलिम्स के लिये: 

भारतीय संविधान का अनुच्छेद-21, मेनका गांधी बनाम भारत संघ, ‘एक्वीज़ीशन एंड क्रॉस-सर्विसिंग एग्रीमेंट

मेन्स के लिये:

जापान के नए प्रधानमंत्री एवं भारत-जापान संबंध 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में जापान ने योशीहिदे सुगा (Yoshihide Suga) को अपना नया प्रधानमंत्री चुना। वह जापान की सत्तारूढ़ लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (Liberal Democratic Party- LDP) से संबंधित हैं। 

प्रमुख बिंदु:

  • मुख्य चुनौतियाँ:
    • जापान के नए प्रधानमंत्री को COVID-19 महामारी से निपटना होगा, जापानी अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण करना होगा और वर्ष 2021 में टोक्यो में होने वाले ओलंपिक खेलों की योजना भी बनानी होगी। 
  • जापान की राजनीतिक प्रणाली: 
    • जापान में एक बहुदलीय, द्विसदनीय, संसदीय, प्रतिनिधि लोकतांत्रिक संवैधानिक राजतंत्र (Representative Democratic Constitutional Monarchy) है।
    • संविधान: जापान ने संविधान की सर्वोच्चता के साथ एकात्मक मॉडल को अपनाया है।
      • जापान का संविधान, जापान का मौलिक कानून है जिसे 3 मई, 1947 को अधिनियमित किया गया था।
      • यह भारत के अलावा दुनिया में मौलिक कर्त्तव्यों वाले बहुत कम लोकतांत्रिक देशों (Democratic Constitutions) में से एक है।
  • जापान की शासन प्रणाली में एक विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका शामिल हैं। 
    • जापान का सम्राट राज्य का प्रमुख होता है और प्रधानमंत्री, सरकार एवं मंत्रिमंडल का प्रमुख होता है। सम्राट के पास नाममात्र के औपचारिक अधिकार होते है। 
    • विधायिका को ‘नेशनल डाइट’ (National Diet) के रूप में जाना जाता है। इसके सदस्य प्रत्यक्ष रूप से लोगों द्वारा चुने जाते हैं।
    • नेशनल डाइट में दो सदन- प्रतिनिधियों का उच्च सदन (Upper House of Representatives) एवं पार्षदों/सभासदों का निचला सदन (Lower House of Councillors) होते हैं।
    • प्रधानमंत्री को ‘नेशनल डाइट’ द्वारा नामित किया जाता है किंतु केवल जापानी सम्राट को ही प्रधानमंत्री नियुक्त करने का अधिकार है।
  • भारतीय संविधान में जापानी संविधान से ली गई विशेषताएँ:
    • भारतीय संविधान में ‘विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ (Procedure established by Law) को जापान के संविधान से लिया गया है।
      • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 कहता है कि “किसी भी व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अतिरिक्त उसके जीवन और वैयक्तिक स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है”।
      • यह अमेरिकी संविधान में निहित 'कानून की उचित प्रक्रिया' (Due process of law) की अभिव्यक्ति से भिन्न है जो न केवल यह जाँचता है कि क्या कानून किसी व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित करता है बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि यह कानून उचित एवं न्यायपूर्ण है कि नहीं।
  • हालाँकि वर्ष 1978 में, मेनका गांधी बनाम भारत संघ के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के संरक्षण को विधायी कार्यवाही तक बढ़ाते हुए निर्णय दिया कि किसी प्रक्रिया को निर्धारित करने वाला कानून उचित, निष्पक्ष एवं तर्कसंगत होना चाहिये।
    • इसी मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन का अर्थ मात्र एक जीव के अस्तित्व से कहीं अधिक है। मानवीय गरिमा के साथ जीना तथा वे सब पहलू जो जीवन को अर्थपूर्ण, पूर्ण तथा जीने योग्य बनाते हैं, इसमें शामिल हैं।
  • भारत-जापान संबंधों में हालिया विकास:
    • हाल ही में भारत और जापान ने एक लाॅजिस्टिक समझौते (Logistics Agreement) पर हस्ताक्षर किये हैं जो दोनों पक्षों के सशस्त्र बलों को सेवाओं एवं आपूर्ति में निकटता से समन्वय करने की अनुमति देगा। 
      • इस समझौते को ‘एक्वीज़ीशन एंड क्रॉस-सर्विसिंग एग्रीमेंट’ (Acquisition and Cross-Servicing Agreement- ACSA) के रूप में जाना जाता है।
    • हाल ही में भारतीय और जापानी युद्धपोतों ने हिंद महासागर में नौसेना अभ्यास किया।
      • भारत और जापान के रक्षा बलों ने द्विपक्षीय अभ्यासों की एक श्रृंखला का आयोजन किया है। इसके तहत दोनों देशों की वायु सेनाओं के द्वारा “शिन्यु मैत्री” (Shinyuu Maitri) और थल सेनाओं द्वारा ‘धर्म गार्जियन’ (DHARMA GUARDIAN) नामक संयुक्त सैन्य अभ्यास का आयोजन किया जाता है। 
      • दोनों देश संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ मालाबार अभ्यास में भी भाग लेते हैं।
  • जापान, भारत एवं ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर चीन की आक्रामक राजनीतिक एवं सैन्य व्यवहार के मद्देनज़र चीन पर अपनी निर्भरता को कम करने के लिये एक त्रिपक्षीय ‘सप्लाई चैन रेज़ीलिएंस इनीशिएटिव’ (Supply Chain Resilience Initiative-SCRI) शुरू करने पर विचार कर रहा है।
    • अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के संदर्भ में ‘सप्लाई चैन रेज़ीलिएंस’ (Supply Chain Resilience) एक ऐसा दृष्टिकोण है जो किसी देश को यह सुनिश्चित करने में मदद करता है कि वह अपनी संपूर्ण आपूर्ति के लिये किसी एक देश पर निर्भर होने के बजाय अपने आपूर्ति के जोखिम का विस्तार अलग-अलग आपूर्तिकर्त्ता देशों तक करे।
  • भारत के राष्ट्रपति ने वर्ष 2019 में जापान का दौरा किया था। भारत के राष्ट्रपति की यह यात्रा 29 वर्षों के अंतराल के बाद जापान की पहली राष्ट्रपति यात्रा थी।

स्रोत: द हिंदू


जिबूती आचार संहिता और समुद्री डकैती

प्रिलिम्स के लिये

जिबूती आचार संहिता और जेद्दा संशोधन

मेन्स के लिये

जिबूती आचार संहिता में शामिल होने के निहितार्थ और भारत की इंडो-पैसिफिक नीति

चर्चा में क्यों?

हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा बढ़ाने के उद्देश्य से भारत जिबूती आचार संहिता (Djibouti Code of Conduct-DCOC) में बतौर पर्यवेक्षक (Observer) शामिल हुआ है।

प्रमुख बिंदु

  • इस संबंध में विदेश मंत्रालय द्वारा जारी आधिकारिक बयान में कहा गया है कि ‘जिबूती आचार संहिता (DCOC) में एक पर्यवेक्षक के रूप में शामिल होकर भारत इसके सदस्य देशों के साथ मिलकर हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा बढ़ाने में योगदान देने के लिये तत्पर है।

भारत के लिये इसके निहितार्थ

  • यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब भारत अपनी इंडो-पैसिफिक नीति के तहत हिंद महासागर और इसके आस-पास के क्षेत्रों में अपनी भूमिका को और मज़बूत करने की कोशिश कर रहा है।
  • भारत ने जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ पारस्परिक सैन्य लॉजिस्टिक्स समर्थन समझौतों पर हस्ताक्षर किये हैं, ताकि इन देशों की नौसेनाओं के साथ अंतर-संचालनीयता को बढ़ावा दिया जा सके।
  • अगस्त 2017 में जिबूती में अपना पहला विदेशी सैन्य अड्डा बनाने के पश्चात् से ही चीन हिंद महासागर क्षेत्र में तीव्र विस्तार की रणनीति अपना रहा है, ऐसे में चीन की इस विस्तारवादी रणनीति की पृष्ठभूमि में भारत के लिये इस प्रकार के समझौते और कदम काफी महत्त्वपूर्ण हैं।

जिबूती आचार संहिता (DCOC)

  • जिबूती आचार संहिता (DCOC) को पश्चिमी हिंद महासागर और अदन की खाड़ी में समुद्री चोरी और सशस्त्र डकैती को रोकने के विषय से संबंधित एक आचार संहिता एक रूप में जाना जाता है।
  • पश्चिमी हिंद महासागर क्षेत्र, अदन की खाड़ी और लाल सागर में समुद्री जहाज़ों पर होने वाली चोरी और सशस्त्र डकैती का मुकाबला करने के लिये जिबूती आचार संहिता (DCOC) को 29 जनवरी 2009 को अपनाया गया था। 
  • इस संहिता पर हस्ताक्षर करने वाले देशों ने मुख्य तौर पर निम्नलिखित क्षेत्रों में सहयोग करने पर सहमति व्यक्त की है:
    • उन लोगों की जाँच करना और गिरफ्तारी करना जिन पर समुद्री जहाज़ों पर चोरी करने अथवा समुद्री डकैती करने का संदेह है, इसमें किसी अन्य व्यक्ति को इस कृत्य के लिये उकसाने वाले और इस कार्य को सुविधाजनक बनाने वाले लोग भी शामिल हैं। 
    • संदिग्ध जहाज़ों को रोकना और उस पर मौजूद सामान को ज़ब्त करना। 
    • समुद्री चोरी और डकैती से प्रभावित जहाज़ों, व्यक्तियों और संपत्तियों को बचाना और उनकी उचित देखभाल करना तथा साथ ही समुद्री चोरी और डकैती जैसे कृत्यों में बंदी बनाए गए मल्लाहों, मछुआरों, जहाज़ पर नियुक्त कर्मचारियों और यात्रियों आदि का प्रत्यावासन (Repatriation) करना।
  • इसके अलावा यह संहिता मुख्यतः चार स्तंभों यथा- (1) समुद्री डकैती को रोकने के संबंध में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय प्रशिक्षण (2) राष्ट्रीय कानून को मज़बूत करना (3) सूचना साझाकरण और समुद्री डोमेन जागरूकता (4) समुद्री डकैती के विरुद्ध क्षमता निर्माण, के  तहत संचार, समन्वय और सहयोग के लिये एक रूपरेखा प्रस्तुत करती  है।

जेद्दा संशोधन

  • वर्ष 2017 में सऊदी अरब के जेद्दा में आयोजित ‘जिबूती आचार संहिता’ के लिये हस्ताक्षरकर्त्ताओं की एक उच्च-स्तरीय बैठक ने एक संशोधित आचार संहिता को अपनाया है, जिसे जिबूती आचार संहिता में जेद्दा संशोधन के रूप में जाना जाता है।
  • जेद्दा संशोधन ‘ब्लू इकोनॉमी’ (Blue Economy) की महत्त्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार करता है जिसमें शिपिंग, फिशरीज़ और टूरिज़्म में सतत् आर्थिक विकास, खाद्य सुरक्षा, रोज़गार, समृद्धि और स्थिरता का समर्थन करना शामिल है। 

समुद्री डकैती की समस्या

  • समुद्री डकैती से अभिप्राय किसी जहाज़, व्यक्ति या संपत्ति के विरुद्ध निजी प्रयोजनों के लिये की गई हिंसात्मक कार्यवाही से होता है।
  • समुद्री क्षेत्रों में व्यापारी जहाज़ों में होने वाली चोरी और समुद्री डकैती की समस्या विश्व शिपिंग क्षेत्र के लिये एक महत्त्वपूर्ण खतरा है।
  • कोलाराडो स्थित वन अर्थ फाउंडेशन (One Earth Foundation) की रिपोर्ट के अनुसार, समुद्री डकैती की वजह से दुनियाभर के देशों को प्रतिवर्ष 7 से 12 अरब डॉलर का व्यय करना पड़ता है। 
  • इसमें डकैतियों के लिये दी जाने वाली फिरौती, जहाज़ों का रास्ता बदलने के कारण हुआ खर्च, समुद्री लुटेरों से लड़ने के लिये कई देशों की तरफ से नौसेना की तैनाती और कई संगठनों के बजट इस अतिरिक्त व्यय में शामिल हैं।

स्रोत: द हिंदू