डेली न्यूज़ (15 Jan, 2026)



गति शक्ति कार्गो टर्मिनल और भारत का लॉजिस्टिक्स परिवर्तन

प्रिलिम्स के लिये: गति शक्ति कार्गो टर्मिनल, पीएम गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान, वर्ल्ड बैंक, लॉजिस्टिक्स प्रदर्शन सूचकांक, डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर

मेन्स के लिये: भारत की आर्थिक वृद्धि में लॉजिस्टिक्स अवसंरचना की भूमिका, पीएम गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान और समेकित अवसंरचना योजना।

स्रोत: पीआईबी

चर्चा में क्यों? 

गति शक्ति कार्गो टर्मिनल (GCTs) भारत में लॉजिस्टिक्स लागत को GDP के 7.97% तक घटाने में एक केंद्रीय चालक के रूप में उभरे हैं, जो एक समेकित, कुशल और मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक्स पारिस्थितिक तंत्र बनाने में पीएम गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान के प्रभाव को दर्शाता है।

सारांश

  • पीएम गति शक्ति और लॉजिस्टिक्स सुधारों के समर्थन से गति शक्ति कार्गो टर्मिनल (GCTs) ने मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी, रेल आधारित फ्रेट और सप्लाई-चेन दक्षता को बढ़ाकर भारत में लॉजिस्टिक्स लागत को GDP के 7.97% तक घटाने में मदद की है।
  • उन्नति के बावजूद, सड़क प्रभुत्व, अंतिम मील की कमी, क्षमता की सीमाएँ और स्थिरता की चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं, जिन्हें निरंतर अवसंरचना निवेश, डिजिटल अपनाने और हरित लॉजिस्टिक्स उपायों के माध्यम से संबोधित करने की आवश्यकता है।

गति शक्ति कार्गो टर्मिनल (GCTs) क्या हैं?

  • परिचय: GCTs आधुनिक मल्टी-मॉडल रेलवे कार्गो हब हैं, जिन्हें रेलवे मंत्रालय की GCT नीति, 2021 के तहत विकसित किया गया है और इन्हें रेल को सड़क, बंदरगाह और हवाई अड्डों के साथ एकीकृत करने के लिये डिज़ाइन किया गया है।
  • GCTs की आवश्यकता: पहले भारत में माल परिवहन विभिन्न परिवहन माध्यमों में फैला हुआ था और इनके बीच सहज कनेक्टिविटी नहीं थी, जिससे हैंडलिंग में अक्षमता, लंबा टर्नअराउंड समय, उच्च लॉजिस्टिक्स लागत, भीड़भाड़ तथा अधिक उत्सर्जन जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती थीं।
    • GCTs इस अंतर को दूर करते हैं, लॉजिस्टिक्स शृंखला में रणनीतिक नोड के रूप में कार्य करते हुए विभिन्न परिवहन माध्यमों को जोड़ते हैं और माल हैंडलिंग समय, लागत और पर्यावरणीय प्रभाव को महत्त्वपूर्ण रूप से कम करते हैं।
  • संचालनात्मक विशेषताएँ: इंजन-ऑन-लोड (EOL) सिस्टम ट्रेन को लोडिंग या अनलोडिंग के तुरंत बाद प्रस्थान करने में सक्षम बनाता है।
  • GCTs, यांत्रिक लोडिंग सिस्टम, साइलो और आधुनिक कार्गो-हैंडलिंग अवसंरचना के साथ समन्वित होकर, डिटेंशन टाइम को काफी कम करते हैं और रेलवे संपत्तियों का इष्टतम उपयोग सुनिश्चित करते हैं।
  • स्थिरता और लागत दक्षता: रेल परिवहन सड़क परिवहन की तुलना में अधिक स्वच्छ और लागत-कुशल है, जिसमें लागत आधे से भी कम और कार्बन उत्सर्जन लगभग 90% कम होता है।
    • वर्ष 2014 से, माल को रेल पर स्थानांतरित करने से 2,672 मिलियन टन कार्गो परिवाहित हुआ और 143.3 मिलियन टन CO₂ की बचत हुई, जिससे भारत के डीकार्बनाइज़ेशन लक्ष्यों को समर्थन मिला।
  • लॉजिस्टिक्स वृद्धि को संचालित करने वाले प्रमुख GCTs: मनेसर (हरियाणा) GCT, भारत का सबसे बड़ा ऑटोमोबाइल टर्मिनल, वार्षिक 4.5 लाख वाहनों को सँभाल सकता है और यह हरियाणा ऑर्बिटल रेल कॉरिडोर से संबंधित है।
    • उत्तर-पूर्व में, असम के मोइनारबंद और सिनमारा टर्मिनल पेट्रोलियम, अनाज, उर्वरक और कंटेनरों के संचालन के माध्यम से क्षेत्रीय व्यापार को सशक्त बनाते हैं, जबकि और अधिक टर्मिनल निर्माणाधीन हैं।
    • गुजरात का नया संजली GCT, जो वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के पास निजी भूमि पर बनाया गया है, उच्च गति और हरित लॉजिस्टिक्स की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम का प्रतिनिधित्व करता है।
  • GCTs के तहत प्रगति: भारतीय रेलवे ने 306 GCTs को मंज़ूरी दी है, जिनकी कुल क्षमता 192 मिलियन टन प्रति वर्ष है, इनमें से 118 पहले ही चालू हो चुके हैं।
    • GCTs से प्राप्त फ्रेट राजस्व वर्ष 2022–23 और 2024–25 के बीच चार गुना बढ़कर 12,608 करोड़ रुपये तक पहुँच गया।

गति शक्ति मल्टी‑मॉडल कार्गो टर्मिनल (GCT) पॉलिसी, 2021

  • इस नीति का उद्देश्य आधुनिक कार्गो टर्मिनलों के विकास में तेज़ी लाना, निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित करना और भारत की माल परिवहन व्यवस्था को सुदृढ़ करना है, ताकि बुनियादी ढाँचे की वृद्धि को औद्योगिक मांग के अनुरूप रखते हुए भारत को ग्लोबल लॉजिस्टिक्स हब के रूप में स्थापित किया जा सके।
  • यह नीति लागत में छूट, माल के भाड़े में रियायत, रेलवे द्वारा समर्थित अवसंरचना तथा रेल भूमि विकास प्राधिकरण (RLDA) के तहत उपलब्ध अधिशेष भूमि के वाणिज्यिक उपयोग की सुविधा प्रदान करती है, जिससे एक सुगम और एकीकृत मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक नेटवर्क तैयार करने में मदद मिलती है।

भारत का लॉजिस्टिक्स परिदृश्य

  • भारत वर्तमान में विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जो उसके लॉजिस्टिक की आवश्यकता और जटिलता के स्तर को और सुदृढ़ करता है। लॉजिस्टिक क्षेत्र देश की आर्थिक संरचना का एक महत्त्वपूर्ण आधार बन चुका है।
  • लॉजिस्टिक क्षेत्र भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 13–14% का योगदान देता है, जिससे लगभग 22 मिलियन से अधिक लोगों की आजीविका चलती है।
    • यह ‘मेक इन इंडिया’ पहल की रीढ़ की हड्डी की तरह कार्य करता है, क्योंकि यह विनिर्माण विस्तार और ग्लोबल वैल्यू चेन (value chain) में एकीकरण को सक्षम बनाता है।
  • विश्व बैंक के लॉजिस्टिक्स परफॉर्मेंस इंडेक्स (2023) में भारत की रैंकिंग सुधरकर 38 तक पहुँच गई है, जिसके लिये वर्ष 2030 तक शीर्ष 25 देशों में स्थान बनाने का लक्ष्य रखा गया है।
  • अंतर्देशीय जलमार्गों से माल ढुलाई 2024–25 में 145.5 मिलियन टन तक पहुँच गई, जो मल्टीमॉडल परिवहन के बढ़ते उपयोग को दर्शाती है।
    • संचालित राष्ट्रीय जलमार्गों की संख्या 24 से बढ़कर 29 हो गई है, जिससे कम लागत और हरित (ग्रीन) लॉजिस्टिक जैसे विकल्पों का विस्तार हुआ है।
  • लॉजिस्टिक क्षेत्र लगभग 22 मिलियन से अधिक लोगों को रोज़गार प्रदान करता है, इसके आगामी वर्षों में लाखों नए रोज़गार सृजित करने की संभावना है।

भारत की लॉजिस्टिक से संबंधित प्रमुख पहलें

  • राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति (NLP), 2022: राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति, 2022 का उद्देश्य GDP के अनुपात में लॉजिस्टिक लागत को कम करना, दक्षता बढ़ाना और एक निर्बाध, एकीकृत लॉजिस्टिक ईकोसिस्टम का निर्माण करना है। यह व्यापार सुगमता बढ़ाने के लिये डिजिटल प्लेटफॉर्मों के माध्यम से लॉजिस्टिक संबंधी सेवाओं के सरलीकरण और एकीकरण पर बल देती है।
  • PM गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान (2021): अक्तूबर 2021 में शुरू किया गया यह मास्टर प्लान सभी परिवहन साधनों को एक इंटीग्रेटेड नेटवर्क में जोड़ने के लिये बनाया गया है। इसके अंतर्गत 57 मंत्रालयों और 36 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों को लगभग 1,700 डेटा लेयर्स के साथ एक मंच पर लाकर समन्वित अवसंरचना योजना को बढ़ावा दिया जाता है।
  • डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC): रेल मंत्रालय वर्तमान में दो डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC) का विकास कर रहा है — ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (EDFC) (लुधियाना से सोन नगर, 1337 किमी.) और वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (WDFC) (जवाहरलाल नेहरू पोर्ट टर्मिनल से दादरी, 1506 किमी.)। 
    • इन्हें उच्च क्षमता, ऊर्जा‑कुशल माल परिवहन, यात्री मार्गों पर वाहनों की भीड़ को कम करने और लॉजिस्टिक की लागत को कम करने के लिये विकसित किया जा रहा है।
  • मल्टी‑मॉडल लॉजिस्टिक्स पार्क (MMLP): भारतमाला परियोजना के तहत विकसित किये जा रहे MMLP बड़े एकीकृत केंद्र हैं, जो सड़क, रेल, वायु और वेयरहाउसिंग सुविधाओं को एक स्थान पर समाहित करते हैं। इनका लक्ष्य माल भाड़ा लागत को कम करना, वाहनों की भीड़ कम करना और आपूर्ति शृंखला की दक्षता में सुधार करना है।
  • लॉजिस्टिक डेटा बैंक (LDB): LDB एक डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जो वास्तविक समय में EXIM कार्गो (आयात‑निर्यात कंटेनर) की ट्रैकिंग करता है, जिससे आपूर्ति शृंखला में पारदर्शिता, पूर्वानुमेयता और दक्षता बढ़ती है। 
    • अक्तूबर 2024 तक यह 7.5 करोड़ से अधिक EXIM कंटेनरों को ट्रैक कर चुका है।
  • यूनिफाइड लॉजिस्टिक्स इंटरफेस प्लेटफॉर्म (ULIP): यह एकीकृत डिजिटल इंटरफेस है, जो विभिन्न मंत्रालयों से प्राप्त डेटा को जोड़कर एक ही मंच पर उपलब्ध कराता है। इसके माध्यम से शिपमेंट ट्रैकिंग, अनुमानित आगमन समय (ETA) और बेहतर इन्वेंटरी प्रबंधन संभव हो पाता है।
  • ई‑वे बिल सिस्टम: 50,000 रुपये से अधिक मूल्य के माल के लिये प्रयोग होने वाला यह पेपरलेस सिस्टम अंतर‑राज्यीय माल के आवागमन को सरल बनाता है। यह अनुपालन में सुधार के साथ‑साथ समय और लागत की बचत भी सुनिश्चित करता है।
  • गति शक्ति विश्वविद्यालय (GSV): यह भारत का पहला विश्वविद्यालय है, जो परिवहन और लॉजिस्टिक संबंधी शिक्षा को समर्पित है। इसका उद्देश्य लॉजिस्टिक क्षेत्र के लिये कुशल मानव संसाधन तैयार करना है।
  • LEADS (लॉजिस्टिक्स ईज़ एक्रॉस डिफरेंट स्टेट्स): LEADS एक वार्षिक सूचकांक है, जो विभिन्न राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के लॉजिस्टिक परफॉर्मेंस का आकलन करता है। इसके आधार पर नीतिगत सुधारों और निवेश संबंधी प्राथमिकताओं को तय किया जाता है।

भारत के लॉजिस्टिक क्षेत्र की प्रमुख चुनौतियाँ

  • उच्च लॉजिस्टिक लागत: विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में भारत की लॉजिस्टिक लागत वर्ष 2023-24 में GDP का लगभग 7.97% अनुमानित है, जिससे भारतीय निर्यात की प्रतिस्पर्द्धात्मकता कम होती है।
    • उच्च माल ढुलाई लागत का टेक्सटाइल और ऑटो कंपोनेंट्स जैसे क्षेत्रों पर प्रभाव पड़ता है, जिससे विदेशों में मूल्य प्रतिस्पर्द्धा कम हो जाती है।
  • सड़क‑प्रधान परिवहन और जाम: भारत परिवहन के लिये मुख्य रूप से सड़क परिवहन (माल ढुलाई का 60-65%) पर निर्भर है, जो रेल की तुलना में कम कुशल है।
    • राष्ट्रीय राजमार्गों पर प्रायः वाहनों की भीड़, खराब रखरखाव और निरंतर टोल में विलंब की समस्या रहती है, जिससे टर्नअराउंड (Turnaround) समय धीमा हो जाता है।
  • रेल क्षमता की कमी: यद्यपि रेल के माध्यम से माल परिवहन सस्ता पड़ता है, लेकिन मालगाड़ियों की कम क्षमता और यात्रियों के यातायात को प्राथमिकता दिये जाने के कारण यह प्रभावित होता है।
    • रेलवे साइडिंग्स तक ‘अंतिम मील’ कनेक्टिविटी की कमी अक्सर व्यवसायों को सड़क मार्ग पर लौटने के लिये विवश कर देती है।
  • पोर्ट अक्षमताएँ: हालाँकि टर्नअराउंड समय में सुधार हुआ है, भारतीय बंदरगाह वैश्विक प्रतिस्पर्द्धियों की तुलना में अभी भी ड्राफ्ट गहराई (Mega-ships को सँभालने की क्षमता) और निकासी गति (Evacuation Speed) में पिछड़े हैं, जिससे उच्च डिटेंशन और डिमरेज/विलंब शुल्क लगता है।
  • अनुपालन बोझ: GST (वस्तु एवं सेवा कर) की सफलता के बावजूद, अंतर्राज्यीय माल परिवहन में राज्यों के अलग-अलग दस्तावेज़ीकरण नियम और ‘चेकपोस्ट’ पर सख्त प्रवृत्ति अभी भी गति को प्रभावित करती है।
  • खंडित संरचना: यह क्षेत्र अत्यधिक खंडित है, जिसमें करोड़ों छोटे फ्लीट ऑपरेटर हैं जिनके पास पाँच से कम ट्रक हैं।
    • इससे उद्योग में मूल्य, गुणवत्ता और अनुपालन को समान रूप से लागू करना कठिन हो जाता है।
  • प्रौद्योगिकी और डिजिटलीकरण की कमियाँ: ULIP और LDB जैसे प्लेटफॉर्म मौजूद हैं, लेकिन छोटे खिलाड़ी इनका असमान रूप से उपयोग कर रहे हैं।
    • छोटे परिवहनकर्त्ता अभी भी ई-वे बिल के बावजूद मैनुअल दस्तावेज़ीकरण पर निर्भर हैं।
  • पर्यावरणीय स्थिरता की चुनौती: सड़क-प्रधान माल ढुलाई उच्च उत्सर्जन उत्पन्न करती है। वर्तमान में, सड़क परिवहन भारत के ऊर्जा-संबंधी CO₂ उत्सर्जन का 12% ज़िम्मेदार है और यह शहरी वायु प्रदूषण में भी प्रमुख योगदान देता है।

कौन-से उपाय भारत के लॉजिस्टिक्स सेक्टर को मज़बूत कर सकते हैं?

  • अवसंरचना विकास में तेज़ी: DFC और मल्टीमॉडल परियोजनाओं को तेज़ी से लागू करना; सभी प्रमुख लॉजिस्टिक्स संपत्तियों के लिये PM गति शक्ति शैली की निगरानी अपनाना।
    • उदाहरण: मुंबई ट्रांस हार्बर लिंक (2024) ने JNPT तक पहुँच में सुधार किया और ट्रांज़िट समय घटाया।
  • अंतिम मील कनेक्टिविटी सुधार: पोर्ट्स, औद्योगिक हब और आर्थिक गलियारों से जुड़े मार्गों को प्राथमिकता देना, ताकि विलंब और लागत कम हो सके।
  • नियामक प्रक्रिया को सरल बनाना: पूरे देश में सिंगल-विंडो क्लियरेंस लागू करना; फेसलेस कस्टम असेसमेंट का विस्तार करना और सभी अनुमोदनों को डिजिटाइज़ करने के लिये e-SANCHIT का निर्माण करना।
  • प्रौद्योगिकी अपनाने को बढ़ावा देना: AI, IoT, ब्लॉकचेन में निवेश को कर लाभ के माध्यम से प्रोत्साहित करना; ULIP कवरेज का विस्तार करना; लॉजिस्टिक्स स्टार्टअप्स को डेटा एक्सेस और पायलट्स के साथ समर्थन प्रदान करना।
  • कुशलता बढ़ाना: प्रशिक्षण को उद्योग की आवश्यकताओं के अनुसार संरेखित करना; विशेषीकृत संस्थानों का विस्तार करना; अंतिम मील प्रशिक्षण के लिये ई-कॉमर्स कंपनियों के साथ साझेदारी करना; एक राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स प्रमाणन लॉन्च करना।
  • वेयरहाउसिंग शृंखलाओं का उन्नयन: एक राष्ट्रीय वेयरहाउसिंग ग्रिड बनाना; ग्रेड-A वेयरहाउस और कोल्ड स्टोरेज को प्रोत्साहन देना; गुणवत्ता मानकों को अनिवार्य बनाना।
  • हरित लॉजिस्टिक्स को बढ़ावा देना: लॉजिस्टिक्स-विशिष्ट कार्बन क्रेडिट्स पेश करना; ग्रीन टेक्नोलॉजी में निवेश पर कर लाभ देना; ग्रीन फ्रेट कॉरिडोर विकसित करना; एक ग्रीन लॉजिस्टिक्स प्रमाणन लागू करना।

निष्कर्ष

गति शक्ति कार्गो टर्मिनल्स लॉजिस्टिक्स लागत को कम कर रहे हैं, मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी को सुदृढ़ कर रहे हैं और ग्रीन फ्रेट मूवमेंट को बढ़ावा दे रहे हैं। PM गति शक्ति और डिजिटल सुधारों के साथ ये भारत में वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी लॉजिस्टिक्स ईकोसिस्टम की नींव स्थापित कर रहे हैं।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. ‘गति शक्ति कार्गो टर्मिनल्स भारत के फ्रेट लॉजिस्टिक्स में एक दृष्टिकोणात्मक बदलाव का प्रतिनिधित्व करते हैं।’ लॉजिस्टिक्स लागत को कम करने और सतत विकास को बढ़ावा देने में इनकी भूमिका की समीक्षा कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. गति शक्ति कार्गो टर्मिनल्स (GCT) क्या हैं?
GCT नीति, 2021 के तहत विकसित आधुनिक मल्टी-मॉडल रेलवे कार्गो हब, जो रेल को सड़क, पोर्ट और हवाई अड्डों के साथ जोड़कर तेज़ माल परिवहन सुनिश्चित करते हैं।

2. भारत के लॉजिस्टिक्स सेक्टर के लिये GCT क्यों महत्त्वपूर्ण हैं?
ये ट्रांज़िट समय, लॉजिस्टिक्स लागत, जाम और उत्सर्जन को कम करते हैं, क्योंकि ये खंडित माल संचालन की जगह एकीकृत हब प्रदान करते हैं।

3. GCT सतत विकास में कैसे योगदान देते हैं?
माल परिवहन को रेल पर स्थानांतरित करके, जो सड़क की तुलना में लगभग 90% कम CO₂ उत्सर्जन करता है, ये भारत के डीकार्बोनाइज़ेशन लक्ष्यों में सहायता करते हैं।

4. लॉजिस्टिक्स सुधारों में PM गति शक्ति की क्या भूमिका है?
यह सभी मंत्रालयों और राज्यों में एकल डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से समन्वित, मल्टी-मॉडल इंफ्रास्ट्रक्चर प्लानिंग सुदृढ़ बनाता है।

5. भारत के लॉजिस्टिक्स सेक्टर को अभी किन प्रमुख चुनौतियों का सामना है?
सड़क प्रधानता, अंतिम-मील कनेक्टिविटी की कमियाँ, रेलवे क्षमता की सीमाएँ, खंडित ऑपरेटर, असमान डिजिटल अपनाने  तथा पर्यावरणीय चिंताएँ।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

मेन्स:

प्रश्न. गति शक्ति योजना को संयोजकता के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये सरकार और निजी क्षेत्र के मध्य सतर्क समन्वय की आवश्यकता है। विवेचना कीजिये। (2022)


भारत के डेयरी क्षेत्र का डिजिटल रूपांतरण

प्रिलिम्स के लिये: राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB), पशु आधार, आधारभूत पशुपालन सांख्यिकी, श्वेत क्रांति, ऑपरेशन फ्लड, अमूल, श्वेत क्रांति 2.0, कुपोषण, लंपी स्किन डिज़ीज़, मीथेन, स्वच्छता एवं पादप-स्वास्थ्य उपाय (SPS)

मेन्स के लिये: भारत के डेयरी क्षेत्र के डिजिटलीकरण के लिये उठाए गए कदम, भारत में डेयरी क्षेत्र की स्थिति, भारत के डेयरी उद्योग के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ तथा आगे की राह।

स्रोत: पीआईबी

चर्चा में क्यों?

राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) ने एकीकृत प्लेटफॉर्म और नवोन्मेषी उपकरणों को लागू करके भारत के डेयरी क्षेत्र के डिजिटल रूपांतरण का नेतृत्व किया है, जिससे दक्षता, पारदर्शिता, ट्रेसिबिलिटी (नज़र रखने की क्षमता) तथा किसानों के कल्याण में सुधार हुआ है।

भारत के डेयरी सेक्टर को डिजिटल बनाने हेतु क्या कदम उठाए गए हैं?

  • राष्ट्रीय डिजिटल पशुधन डेटाबेस: राष्ट्रीय डिजिटल पशुधन मिशन (NDLM) के अंतर्गत ‘भारत पशुधन’ नामक एकीकृत इकोसिस्टम तंत्र की स्थापना की गई है। इसके तहत सभी पशुओं को एक विशिष्ट 12-अंकीय ‘पशु आधार प्रदान किया जाता है। अब तक 35.68 करोड़ से अधिक टैग जारी किये जा चुके हैं, जो पशुओं के स्वास्थ्य और उत्पादकता से जुड़े लेन-देन के लिये विशिष्ट कोड (Primary Key) के रूप में कार्य करते हैं।
  • स्वचालित दूध संग्रह प्रणाली (AMCS): यह दैनिक दूध संग्रह को डिजिटाइज़ करती है, जिसमें मात्रा, गुणवत्ता और फैट कंटेंट दर्ज किया जाता है, किसानों को भुगतान स्वचालित करती है और किसानों को रियल-टाइम SMS अलर्ट तथा सहकारी समितियों को डेटा इनसाइट्स प्रदान करती है। 26,000 से अधिक डेयरी सहकारी समितियों को कवर करते हुए यह 12 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में 17.3 लाख दूध उत्पादकों को लाभ पहुँचाती है।
  • NDDB डेयरी ERP (NDERP): यह व्यापक एंटरप्राइज़ रिसोर्स प्लानिंग (ERP) प्लेटफॉर्म डेयरी संचालन के लिये वित्त, इन्वेंटरी, बिक्री, निर्माण, मानव संसाधन और पेरोल को कवर करता है और इसे वेब और मोबाइल ऐप (mINDERP) के माध्यम से एक्सेस किया जा सकता है। AMCS के साथ एकीकृत यह गाय से लेकर उपभोक्ता तक एक संपूर्ण डिजिटल समाधान प्रदान करता है, जिसमें उत्पादन में सामंजस्य (Mass-Balancing) शामिल है ताकि प्रसंस्करण में होने वाले नुकसान को कम किया जा सके।
  • पशु उत्पादकता एवं स्वास्थ्य सूचना नेटवर्क (INAPH): यह नेटवर्क प्रजनन, पोषण और स्वास्थ्य सेवाओं का रियल-टाइम डेटा सीधे किसानों के द्वार तक एकत्र करता है, जिससे पशुधन विकास कार्यक्रमों की निगरानी और मूल्यांकन संभव हो पाता है।
  • सीमेन स्टेशन प्रबंधन प्रणाली (SSMS): यह प्रणाली संपूर्ण बैल की लाइफसाइकिल, सीमेन प्रोडक्शन, क्वालिटी कंट्रोल, बायोसिक्योरिटी एवं फार्म/चारे के प्रबंधन को सँभालती है, साथ ही फ्रोज़न सीमेन डोज़ (FSD) के वितरण का भी प्रबंधन करती है। इसे इन्फॉर्मेशन नेटवर्क फॉर सीमेन प्रोडक्शन एंड रिसोर्स मैनेजमेंट (INSPRM) और INAPH से जोड़ा गया है ताकि रियल-टाइम डेटा साझा करना, ट्रेसिबिलिटी (नज़र रखने की क्षमता) तथा 38 सीमेन स्टेशनों में मानकीकृत संचालन सुनिश्चित हो सके।
  • इंटरनेट-आधारित डेयरी सूचना प्रणाली (i-DIS): यह एक केंद्रीकृत डिजिटल मंच है, जो दूध संघों, महासंघों और अन्य संबद्ध इकाइयों के बीच डेटा संग्रह, साझा करने और विश्लेषण को व्यवस्थित रूप से सक्षम बनाता है। यह प्रणाली खरीद, बिक्री, उत्पादन, वितरण और तकनीकी इनपुट आपूर्ति जैसी गतिविधियों को ट्रैक करती है, जिससे राष्ट्रीय सहकारी डेयरी उद्योग का एक समग्र डेटाबेस तैयार किया जा सके।
  • मिल्क रूट ऑप्टिमाइज़ेशन (GIS के माध्यम से): यह एक मुफ्त, वेब-आधारित डायनेमिक GIS टूल है, जो दूध संग्रह और वितरण के लिये मार्ग योजना और अनुकूलन प्रदान करता है। इसके माध्यम से परिवहन दूरी, ईंधन लागत एवं समय में कमी आती है, जिससे सहकारी समितियों के लिये संचालनात्मक दक्षता में सुधार होता है।

भारत में डेयरी क्षेत्र की स्थिति क्या है?

  • वैश्विक स्थिति: भारत 1998 से लगातार विश्व का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश बना हुआ है (इसके बाद अमेरिका और पाकिस्तान का स्थान है) तथा यह वैश्विक दूध उत्पादन का लगभग 25% योगदान देता है।
    • कुल दूध उत्पादन वर्ष 2024-25 में 247.87 मिलियन टन पहुँच गया, जो वर्ष 2023-24 के 239.30 मिलियन टन की तुलना में 3.58% की वृद्धि है।
    • भारत दूध निर्यात में 49वें स्थान पर है। न्यूज़ीलैंड विश्व का सबसे बड़ा दूध और डेयरी उत्पादों का निर्यातक है, जबकि चीन वैश्विक स्तर पर डेयरी सामान का सबसे बड़ा आयातक है।
  • प्रति व्यक्ति उपलब्धता: वर्ष 2014-15 के 319 ग्राम/दिन से बढ़कर वर्ष 2024-25 में 485 ग्राम/दिन हो गई है, जो पोषण सुरक्षा और डेयरी उत्पादकता में सुधार को दर्शाती है।
  • शीर्ष दूध उत्पादक राज्य: आधारभूत पशुपालन सांख्यिकी, 2025 के अनुसार, शीर्ष दूध उत्पादक राज्य हैं: उत्तर प्रदेश (15.66%), राजस्थान (14.82%), मध्य प्रदेश (9.12%), गुजरात (7.78%) और महाराष्ट्र (6.71%)। ये पाँचों राज्य संपूर्ण भारत के दूध उत्पादन में 54.09% का योगदान करते हैं।
  • पशु वर्ग अनुसार वृद्धि: सभी प्रमुख वर्गों में उत्पादन में वृद्धि हुई है, जिसमें विदेशी/संकर गायों में सबसे अधिक 4.97% की वृद्धि हुई, इसके बाद देशी/अज्ञात जाति की गायों में 3.51% और भैंसों में 2.45% की वृद्धि दर्ज की गई।
  • मवेशी श्रेणी के अनुसार वृद्धि: सभी प्रमुख श्रेणियों में उत्पादन में वृद्धि दर्ज की गई, जिसमें विदेशी/क्रॉसब्रेड गायों में सबसे अधिक 4.97% की वृद्धि हुई, इसके बाद स्वदेशी/गैर-वर्णित गायों में 3.51% और भैंसों में 2.45% की वृद्धि देखी गई।
  • कृषि GDP में डेयरी का योगदान: दूध समूह (दूध, घी, मक्खन और लस्सी) का हिस्सा 2022–23 में कृषि, पशुपालन, वानिकी और मत्स्य से प्राप्त कुल उत्पादन मूल्य का लगभग 40% रहा।

श्वेत क्रांति और ऑपरेशन फ्लड

  • परिचय: श्वेत क्रांति भारत में दुग्ध उत्पादन में हुई अभूतपूर्व वृद्धि को दर्शाती है और यह ऑपरेशन फ्लड के समानार्थी है, जो विश्व का सबसे बड़ा डेयरी विकास कार्यक्रम रहा है।
  • कार्यान्वयन एवं उद्देश्य: यह योजना तीन चरणों (1970–1980, 1981–1985 और 1985–1996) में लागू की गई, जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय स्तर पर दुग्ध उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाना और ग्रामीण उत्पादकों को 700 से अधिक शहरी केंद्रों से जोड़ने वाला राष्ट्रीय दुग्ध ग्रिड विकसित करना था।
    • इस कार्यक्रम का एक प्रमुख लक्ष्य किसानों को उचित मूल्य सुनिश्चित करने हेतु मध्यस्थों की भूमिका को समाप्त करना और अमूल के सफल आनंद मॉडल पर आधारित सहकारी समितियों के माध्यम से डेयरी अवसंरचना का आधुनिकीकरण करना था।
  • सामाजिक–आर्थिक प्रभाव: इस पहल ने भारत को दुग्ध की कमी और आयात-निर्भर देश से विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक बना दिया, जिसने वर्ष 1998 में संयुक्त राज्य अमेरिका को पीछे छोड़ दिया। इसने ग्रामीण आजीविकाओं में उल्लेखनीय सुधार किया, लाखों छोटे और सीमांत किसानों (जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएँ शामिल हैं) को सशक्त बनाया और एक सतत सहकारी पारिस्थितिक तंत्र का निर्माण किया।

श्वेत क्रांति 2.0

  • श्वेत क्रांति 2.0 श्वेत क्रांति की विरासत को आगे बढ़ाने वाली एक आधुनिक पहल है, जिसे 19 सितंबर, 2024 को सहकारिता मंत्रालय द्वारा आरंभ किया गया। इसका उद्देश्य दुग्ध क्षेत्र में उत्पादकता में वृद्धि, महिला सशक्तीकरण तथा पोषण सुरक्षा और कुपोषण की चुनौती से प्रभावी ढंग से निपटना है, ताकि दुग्ध सहकारी तंत्र को वर्तमान आवश्यकताओं के अनुरूप सुदृढ़ बनाया जा सके।
  • मुख्य लक्ष्य एवं उद्देश्य: श्वेत क्रांति 2.0 के प्रमुख उद्देश्यों में दुग्ध सहकारिताओं द्वारा दैनिक दूध संग्रहण को लगभग 50% तक बढ़ाना (660 लाख किग्रा./दिन से बढ़ाकर 2028–29 तक 1,007 लाख किग्रा./दिन करना), अविकसित/अवच्छादित गाँवों में सहकारी नेटवर्क का विस्तार तथा आनुवंशिक सुधार, भ्रूण प्रत्यारोपण (Embryo Transfer) और इन-विट्रो फर्टिलाइज़ेशन (IVF) प्रौद्योगिकी के माध्यम से पशुधन उत्पादकता में वृद्धि शामिल है।

भारत के डेयरी उद्योग के सामने मुख्य चुनौतियाँ क्या हैं?

  • जलवायु एवं पर्यावरणीय संवेदनशीलताएँ: दुग्ध उत्पादन में गंभीर गिरावट देखी जा रही है—विशेषकर उत्तरी राज्यों में 10–30% तक दूध की पैदावार घट गई है, जिससे राष्ट्रीय दुग्ध उत्पादन के लगभग 30% हिस्से पर खतरा उत्पन्न हो गया है। यह प्रवृत्ति बढ़ती हीटवेव से जुड़ी है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के अनुसार वर्ष 2024 अब तक का सबसे गर्म वर्ष रहा, जिसमें वैश्विक औसत तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर से 1.55°C अधिक दर्ज किया गया।
    • गाँठदार त्वचा रोग (LSD) जैसे रोगों के प्रकोप के कारण 2022–23 में दुग्ध उत्पादन में लगभग 10% की गिरावट दर्ज की गई। वहीं मैस्टाइटिस रोग के चलते देश को हर वर्ष लगभग ₹14,000 करोड़ का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है, जो दुग्ध क्षेत्र की उत्पादकता और किसानों की आय पर गंभीर प्रभाव डालता है।
  • आर्थिक व्यवहार्यता और बढ़ती लागत: पिछले 30 वर्षों में पशु आहार की कीमतों में 246% वृद्धि हुई है, जो प्रमुख घटकों (जैसे– ऑयलसीड केक) की बढ़ती लागत के कारण है और इसने किसानों के फायदे को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। बढ़ती लागत के कारण मांग में कमी का खतरा उत्पन्न हो रहा है, क्योंकि दूध अब प्रमुख खाद्य व्यय वस्तु बन गया है, जिसकी लागत ग्रामीण भारत में लगभग ₹314/महीना और शहरी भारत में लगभग ₹466/महीना है।
  • संरचनात्मक और उत्पादकता संबंधी घाटे: औसत दूध उत्पादन विदेशी/क्रॉसब्रेड पशुओं में 8.55 किग्रा./दिन और स्वदेशी पशुओं में 3.44 किग्रा./दिन है, जिसमें क्षेत्रीय असमानताएँ भी स्पष्ट हैं, जैसे– पंजाब में 13.49 किग्रा./दिन बनाम पश्चिम बंगाल में 6.30 किग्रा./दिन। इसके अलावा, 70% से अधिक विपणन योग्य दूध असंगठित क्षेत्र द्वारा सँभाला जाता है, जिससे गुणवत्ता नियंत्रण में कमी, अपर्याप्त शीत शृंखला और सीमित क्रेडिट सुविधा जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
  • प्रजनन और आनुवंशिक स्थिरता की चिंताएँ: क्रॉसब्रीडिंग पर अत्यधिक निर्भरता—देश में औसत 30% जबकि केरल में 96% तक—स्वदेशी नस्लों के क्षरण का खतरा पैदा करती है, जो जैव विविधता और रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिये महत्त्वपूर्ण हैं। सेक्स-सॉर्टेड सीमेन का उपयोग, जिसका लक्ष्य 90% मादा बछड़े प्राप्त करना है, अप्रयुक्त मादा पशुओं के निपटान को लेकर भी चिंताएँ उत्पन्न करता है और यह समस्या एंटी-स्लॉटर कानून के कारण और जटिल हो जाती है।
  • पर्यावरणीय प्रभाव: पशुपालन मानवजनित मीथेन उत्सर्जन में लगभग 32% योगदान देता है, जो जलवायु संकट के दृष्टिकोण से एक महत्त्वपूर्ण चुनौती है।

भारत के डेयरी उद्योग को कैसे सुधारा जा सकता है?

  • आनुवंशिक सुधार और प्रजनन प्रौद्योगिकियाँ: उच्च दुग्ध उत्पादक देशी नस्लों, जैसे– कांकरेज और गिर से अधिक संख्या में बछियों के जन्म के लिये सेक्स‑सॉर्टेड (SS) सीमेन का उपयोग किया जाना चाहिये, जिससे भविष्य में दुग्ध देने वाली गायों की आबादी बढ़ाई जा सके।
    • उच्च आनुवंशिक गुण वाली एक गाय से प्रतिवर्ष लगभग 12 बछड़े प्राप्त करने के लिये एंब्रियो  ट्रांसफर (ET) तकनीक को अपनाया जा सकता है, जबकि इन‑विट्रो फर्टिलाइज़ेशन (IVF) के विस्तार से एक दाता गाय से प्रतिवर्ष 33-35 बछड़े प्राप्त किये जा सकते हैं, जिससे उत्कृष्ट आनुवंशिकी का तेज़ी से विस्तार होगा।
  • पोषण संबंधी सुधार और पर्यावरणीय प्रभाव में कमी: आसानी से पचने वाली चारा फसलों, जैसे– दलहनी चारे और अनाज‑आधारित चारे को बढ़ावा दिया जाना चाहिये और ऐसे स्पेशल फीड एडिटिव्स का उपयोग करना चाहिये जो जठर में किण्वन की अवधि को कम करके और मीथेन उत्पादक सूक्ष्मजीवों को रोककर मीथेन उत्सर्जन कम करने में सहायक हों।
    • इसके अतिरिक्त गुजरात में अमूल जैसे टोटल मिक्स्ड रेशन (TMR) प्लांट का विस्तार किया जाना, ताकि मक्का, ज्वार और ओट ग्रास से रेडी-टू-ईट, न्यूट्रीएंट‑रिच चारा मिश्रण उत्पादित किये जा सकें और उत्सर्जित मीथेन से बायोगैस उत्पादन के लिये एकीकृत चक्रीय अर्थव्यवस्था का विकास हो।
  • डिजिटल एवं प्रिसिजन प्रौद्योगिकी: मास्टिटिस जैसे रोगों की शीघ्र पहचान के लिये IoT कॉलर और AI‑आधारित थन स्कैनर लगाए जाने चाहिये, हालाँकि स्वचालित मिल्किंग मशीनें संदूषण और श्रम लागत को कम करती हैं। 12-अंकों वाले पशु‑पहचान नंबरों के साथ भारत पशुधन डेटाबेस को पूरी तरह लागू किया जाना चाहिये, ताकि प्रत्येक पशु के स्वास्थ्य, प्रजनन और दुग्ध‑गुणवत्ता की निगरानी हो सके।
  • अवसंरचना एवं बाज़ार पहुँच को सुदृढ़ करना: ग्रामीण स्तर पर सौर ऊर्जा से चलने वाली दुग्ध शीतलन इकाइयों की स्थापना से औपचारिक दुग्ध प्रसंस्करण में वृद्धि होगी और उसकी बर्बादी कम होगी, हालाँकि संग्रह केंद्रों को गुणवत्ता‑जाँच उपकरणों से सुसज्जित करना और उन्नत सैनिटरी एवं फाइटोसैनिटरी (SPS) मानकों को अपनाना प्रीमियम वैश्विक बाज़ारों तक पहुँच के लिये आवश्यक है।

निष्कर्ष

श्वेत क्रांति की सहकारी विरासत पर निर्मित भारत का डेयरी क्षेत्र एक तकनीक-संचालित, किसान-केंद्रित पारिस्थितिक तंत्र में बदल रहा है। डिजिटल प्लेटफॉर्मों, आनुवंशिक प्रौद्योगिकियों और सतत प्रथाओं का पूरी तरह से लाभ उठाकर भारत यह सुनिश्चित कर सकता है कि उसका वैश्विक नेतृत्व लचीले विकास, किसानों की अधिक न्यायसंगत आय और सभी के लिये बेहतर पोषण सुरक्षा में परिवर्तित हो।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. भारत के डेयरी क्षेत्र में दक्षता और पारदर्शिता सुधारने में डिजिटल प्रौद्योगिकियों की भूमिका की जाँच कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. भारत पशुधन क्या है?
भारत पशुधन NDLM के अंतर्गत भारत का एकीकृत डिजिटल पशुधन पारिस्थितिक तंत्र है, जो पशुओं के स्वास्थ्य, प्रजनन और उत्पादकता की निगरानी के लिये 12-अंकों वाला पशु आधार ID जारी करता है।

2. भारत में दुग्ध उत्पादन करने वाले शीर्ष राज्य कौन-से हैं?
उत्तर प्रदेश (15.66%), राजस्थान (14.82%), मध्य प्रदेश (9.12%), गुजरात (7.78%) और महाराष्ट्र (6.71%) सामूहिक रूप से राष्ट्रीय दुग्ध उत्पादन में 54.09% का योगदान करते हैं।

3. डेयरी क्षेत्र ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में किस प्रकार योगदान देता है?
पशुधन मीथेन का एक प्रमुख स्रोत है, जो आँतों में होने वाले किण्वन और गोबर प्रबंधन के माध्यम से भारत में मानवजनित मीथेन उत्सर्जन का लगभग 32% हिस्सा है।



UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  

मेन्स

प्रश्न. एकीकृत कृषि प्रणाली (IFS) किस सीमा तक कृषि उत्पादन को संधारित करने में सहायक है? (2019) 

प्रश्न. भारत में स्वतंत्रता के बाद कृषि में आई विभिन्न प्रकार की क्रांतियों को स्पष्ट कीजिये। इन क्रांतियों ने भारत में गरीबी उन्मूलन और खाद्य सुरक्षा में किस प्रकार सहायता प्रदान की है? (2017)

प्रश्न. ग्रामीण क्षेत्रों में कृषीतर रोज़गार और आय का प्रबंध करने में पशुधन पालन की बड़ी संभाव्यता है। भारत में इस क्षेत्रक की प्रोन्नति करने के उपयुक्त उपाय सुझाते हुए चर्चा कीजिये। (2015)