भारत–अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते में कृषि सुरक्षा प्रावधान
चर्चा में क्यों?
भारत और अमेरिका ने एक संयुक्त वक्तव्य जारी कर अंतरिम व्यापार समझौते की रूपरेखा की घोषणा की है, यह घोषणा अमेरिका द्वारा भारतीय वस्तुओं पर पारस्परिक शुल्क घटाकर 18% करने के निर्णय के बाद की गई।
- इसे पूर्ण द्विपक्षीय व्यापार समझौते की प्रस्तावना के रूप में देखा जा रहा है। यह रूपरेखा भारत को 30 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के अमेरिकी बाज़ार तक वरीयतापूर्ण पहुँच प्रदान करती है। इसका उद्देश्य द्विपक्षीय व्यापार का विस्तार करना है, साथ ही भारतीय किसानों और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है, भले ही इसके तहत भारत के पशु आहार बाज़ार को सीमित रूप से अमेरिका के लिये खोला गया हो।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते (2026) की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?
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भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते के तहत भारतीय किसान कैसे सुरक्षित हैं?
- वर्जित वस्तुएँ: कृषि व्यापार में भारत अमेरिका के साथ 1.3 अरब अमेरिकी डॉलर का व्यापार अधिशेष बनाए हुए है, जहाँ वर्ष 2024 में भारत का निर्यात 3.4 अरब डॉलर और आयात 2.1 अरब डॉलर रहा।
- अमेरिका 1.36 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य के भारतीय निर्यात पर कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लगाएगा।
- इसके अतिरिक्त एक सख्त “नेगेटिव लिस्ट” बनाए रखी गई है। इसके तहत अमेरिका को निम्नलिखित संवेदनशील कृषि उत्पादों पर कोई भी शुल्क रियायत नहीं दी गई है, जिनमें शामिल हैं:
- माँस, पोल्ट्री और डेयरी उत्पाद
- मुख्य अनाज (गेहूँ, चावल, मक्का, मोटे अनाज/मिलेट्स)
- फल और सब्ज़ियाँ (केला, स्ट्रॉबेरी, चेरी, साइट्रस फल, हरी मटर)
- अन्य वस्तुएँ, जैसे– सोयाबीन, चीनी, तिलहन, एथेनॉल और तंबाकू
- GM प्रतिबंध जारी: भारत ने आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) उत्पादों के लिये अपने बाज़ार खोलने से स्पष्ट रूप से इनकार किया है और विशेष रूप से अमेरिकी GM मक्का और सोयाबीन के प्रवेश को रोका है।
- भारतीय किसानों को बढ़ावा: भारत ने कई क्षेत्रों के लिये अमेरिकी बाज़ार में शुल्क-मुक्त प्रवेश सुनिश्चित किया है, जहाँ अनेक मामलों में शुल्क 50% से घटकर 0% हो गया है।
- कृषि निर्यात: भारतीय मसालों, चाय, कॉफी, काजू, ब्राज़ील नट्स और नारियल (तेल व कोपरा सहित) को शून्य शुल्क के साथ अमेरिकी बाज़ार तक पहुँच प्रदान की गई है।
- फल एवं सब्ज़ियाँ: आम, अमरूद, पपीता, एवोकाडो, केला तथा मशरूम के निर्यात को शुल्क उन्मूलन से लाभ प्राप्त होगा।
- प्रसंस्कृत वस्तुएँ: कुछ प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ और जौ जैसे चुनिंदा अनाज भी शून्य शुल्क (ड्यूटी‑फ्री) के तहत आयात किये जाएंगे, जिससे भारत में निर्यात‑पूर्व मूल्य संवर्द्धन को प्रोत्साहन मिलेगा।
- पशु आहार का बाज़ार: भारत में मक्का और सोयाबीन का घरेलू उत्पादन, पोल्ट्री और पशुधन क्षेत्रों से बढ़ती मांग के अनुरूप नहीं रह पाया है। इस परिप्रेक्ष्य में, यह समझौता GM अनाजों पर प्रतिबंध को बनाए रखते हुए पशु आहार के आयात के लिये कुछ विशिष्ट अवसर प्रदान करता है।
- इस समझौते से संयुक्त राज्य अमेरिका भारत को ज्वार (लाल ज्वार) का निर्यात कर सकता है। इसे भारतीय पोल्ट्री उद्योग के लिये मक्का का एक महत्त्वपूर्ण गैर-जीएम विकल्प माना जा रहा है।
- डिस्टिलर्स ड्राइड ग्रेंस विद सॉल्युबल (DDGS): यह एथेनॉल उत्पादन का एक उप-उत्पाद है। यद्यपि यह GM मक्का से प्राप्त हो सकता है, भारत इसे केवल प्रसंस्कृत पशु आहार आगतों के रूप में ही अनुमति दे रहा है।
- यह पशुधन और पोल्ट्री के लिये प्रोटीन की आवश्यकताओं को पूरा करता है, बिना GM अनाजों के प्रवेश का मार्ग प्रशस्त किये।
संरक्षण संबंधी सुदृढ़ उपायों के साथ संतुलित बाज़ार का उदारीकरण
- जिन वस्तुओं के लिये बाज़ार खोला गया, उनके संदर्भ में भारत ने डंपिंग को रोकने हेतु प्रभावी उपाय अपनाए हैं—
- टैरिफ दर कोटा (TRQ): सेब और बादाम जैसी वस्तुओं पर लागू, जिनमें केवल निर्धारित मात्रा तक ही कम शुल्क दरों पर आयात की अनुमति होगी।
- चरणबद्ध कार्यान्वयन: कुछ शुल्कों में धीरे-धीरे कटौती की जाएगी (अधिकतम 10 वर्षों की अवधि पर), ताकि घरेलू उद्योगों को समायोजन का पर्याप्त समय मिल सके।
- न्यूनतम आयात मूल्य (MIP): वाइन और स्पिरिट पर लागू, जिससे केवल उच्च-मूल्य के प्रीमियम उत्पादों का ही आयात सुनिश्चित हो तथा घरेलू जन-उपभोग आधारित उद्योग को संरक्षण प्राप्त हो।
भारत का पशु आहार बाज़ार
- वर्तमान उत्पादन: संयुक्त राज्य कृषि विभाग (USDA) के अनुसार, वर्ष 2025–26 में भारत का वार्षिक मक्का उत्पादन लगभग 43 मिलियन टन (mt) रहने का अनुमान है, जिसमें से लगभग 24 मिलियन टन विशेष रूप से पशु आहार उपयोग हेतु निर्धारित है। वहीं सोयाबीन उत्पादन लगभग 12.5 मिलियन टन के स्तर पर है।
- संयुक्त पशु आहार उद्योग: कुल संयुक्त पशु आहार उत्पादन लगभग 60 मिलियन टन आँका गया है, जिसमें 40 मिलियन टन पोल्ट्री, 18 मिलियन टन पशुधन तथा 2 मिलियन टन एक्वा/झींगा आहार शामिल है।
- घरेलू DDGS आपूर्ति: भारत में अनाज-आधारित एथेनॉल डिस्टिलरी वर्तमान में पशु आहार उद्योग को 3 मिलियन टन से अधिक DDGS की आपूर्ति कर रही हैं, जिसका अनुमान वर्ष 2025–26 में बढ़कर 4.2 मिलियन टन तक पहुँचना है।
- उपज संबंधी चुनौतियाँ: घरेलू उत्पादन निम्न उपज की समस्या से जूझ रहा है। मक्का की औसत उपज लगभग 3.75 टन प्रति हेक्टेयर है (जबकि अमेरिका में यह 11.25 टन प्रति हेक्टेयर है), सोयाबीन की उपज 1 टन प्रति हेक्टेयर से भी कम है (जबकि अमेरिका में लगभग 3.4 टन प्रति हेक्टेयर)।
मांग संचालक
- संचालक: बढ़ती आय, शहरीकरण, वर्ष 2050 तक 1.5 अरब तक पहुँचने की अपेक्षित जनसंख्या, प्रोटीन (दूध, अंडे, माँस) की ओर आहारिक बदलाव ला रही है, जिससे पशु आहार की मांग बढ़ रही है।
- उपभोग प्रक्षेपण (USDA रिपोर्ट):
- मक्का: मध्यम वृद्धि परिदृश्य में 34.7 मिलियन टन (2022-23) से 93 मिलियन टन (2050) तक अथवा तीव्र वृद्धि परिदृश्य में 200.2 मिलियन टन तक।
- सोयाबीन मील: मध्यम वृद्धि परिदृश्य में 6.2 मिलियन टन (2022-23) से 28.3 मिलियन टन (2050) तक अथवा तीव्र वृद्धि परिदृश्य में 68.3 मिलियन टन तक।
- आहार संरचना: मक्का एक महत्त्वपूर्ण घटक है, जो ब्रोयलर आहार का 55-65%, एग-लेयर आहार का 50-60% तथा पशु आहार का 15-20% है।
अमेरिका की भूमिका
- भारत की उत्पादन क्षमता मांग के अनुरूप नहीं बढ़ पाने के कारण अमेरिका इस कमी को पूरा करने में सक्षम है। अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) का अनुमान है कि तीव्र विकास परिदृश्यों के अनुसार वर्ष 2040 तक भारत को लगभग 46 मिलियन टन मक्का और 19 मिलियन टन सोयाबीन मील का आयात करना पड़ सकता है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न: भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौता किस प्रकार निर्यात संवर्द्धन और घरेलू किसानों की सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करता है? |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौता महत्त्वपूर्ण क्यों है?
यह भारतीय वस्तुओं पर अमेरिकी टैरिफ को घटाकर 18% करता है, भारत को अमेरिकी बाज़ार में तरजीही पहुँच देता है और एक पूर्ण द्विपक्षीय व्यापार समझौते की दिशा तैयार करता है।
2. समझौते के तहत भारतीय किसानों की सुरक्षा कैसे की गई है?
अनाज, दुग्ध उत्पाद, माँस, दलहन, तिलहन, फल, इथेनॉल और तंबाकू जैसे संवेदनशील उत्पादों को बिना किसी टैरिफ रियायत के सख्त नकारात्मक सूची में रखा गया है।
3. किन कृषि निर्यातों को अमेरिका में शून्य-शुल्क (Zero-Duty) प्रवेश मिलेगा?
मसाले, चाय, कॉफी, काजू, नारियल, आम, अमरूद, पपीता, मशरूम और जौ जैसे उत्पादों को शून्य-शुल्क पहुँच प्रदान की गई है।
4. क्या यह समझौता भारत में GM फसलों के आयात की अनुमति देता है?
नहीं, GM मक्का और GM सोयाबीन पर प्रतिबंध बना रहेगा; केवल गैर-GM ज्वार और DDGS जैसे प्रसंस्कृत पशु-आहार इनपुट्स की अनुमति दी गई है।
5. इस समझौते में पशु-आहार बाज़ार क्यों महत्त्वपूर्ण है?
आय में वृद्धि और आहार संबंधी बदलावों के कारण पोल्ट्री और पशुधन चारे की मांग तेज़ी से बढ़ी है, जो घरेलू उत्पादन से आगे निकल गई है; इसलिये नियंत्रित आयात की आवश्यकता उत्पन्न हुई है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
मेन्स
प्रश्न. 'भारत और यूनाइटेड स्टेट्स के बीच संबंधों में खटास के प्रवेश का कारण वाशिंगटन का अपनी वैश्विक रणनीति में अभी तक भी भारत के लिये किसी ऐसे स्थान की खोज करने में विफलता है, जो भारत के आत्म-समादर और महत्त्वाकांक्षा को संतुष्ट कर सके।' उपयुक्त उदाहरणों के साथ स्पष्ट कीजिये।
किंबर्ले प्रोसेस 2026 में भारत की अध्यक्षता
प्रिलिम्स के लिये: हीरा, किंबर्ले प्रोसेस, कृष्णा, महानदी, पन्ना, लैब ग्रोन डायमंड्स
मेन्स के लिये: भारत का हीरा उद्योग एवं वैश्विक मूल्य शृंखलाएँ
चर्चा में क्यों?
भारत ने वर्ष 2026 के लिये किंबर्ले प्रोसेस (Kimberley Process- KP) की अध्यक्षता ग्रहण की है, जो कि विश्व स्तर पर डायमंड गवर्नेंस के क्षेत्र में भारत की बढ़ती भूमिका और प्रतिनिधित्व को रेखांकित करता है। हीरा उद्योग के लिये महत्त्वपूर्ण वर्तमान भू-राजनीतिक स्थितियों में प्राप्त यह दायित्व भारत को न केवल वैश्विक दक्षिण की अभिव्यक्ति के रूप में सुदृढ़ करता है, बल्कि उसे वैश्विक हीरा मूल्य शृंखला के एक केंद्रीय धुरी के रूप में स्थापित करने का अवसर भी प्रदान करता है, ताकि वह सार्थक एवं समावेशी सुधारों को आगे बढ़ा सके।
किंबर्ले प्रोसेस क्या है?
- परिचय: किंबर्ले प्रोसेस (KP) एक अंतर्राष्ट्रीय मंच है, जिसकी शुरुआत वर्ष 2000 में दक्षिणी अफ्रीकी देशों द्वारा अपरिष्कृत हीरों के व्यापार को विनियमित करने के उद्देश्य से की गई थी। इसका प्रमुख लक्ष्य कॉन्फ्लिक्ट डायमंड्स के प्रवाह को रोकना तथा अपरिष्कृत हीरों के वैध व्यापार की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।.
- कॉन्फ्लिक्ट डायमंड्स वे अपरिष्कृत हीरे होते हैं, जिनका उपयोग विद्रोही समूहों या उनके सहयोगियों द्वारा वैध सरकारों को कमज़ोर करने के उद्देश्य से सशस्त्र संघर्षों के वित्तपोषण के लिये किया जाता है।
- किंबर्ले प्रोसेस न तो कोई औपचारिक अंतर्राष्ट्रीय संगठन है और न ही कोई विधिक रूप से बाध्यकारी संधि। इसका कोई स्थायी कार्यालय या कर्मचारी नहीं है। यह सहभागी देशों द्वारा भार-वितरण के आधार पर किये गए योगदानों के माध्यम से कार्य करता है, जिसमें उद्योग और नागरिक समाज का भी सहयोग रहता है।
- किंबर्ले प्रोसेस के नियमों का कार्यान्वयन अंतर्राष्ट्रीय विधिक दायित्वों के माध्यम से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विधानों के द्वारा किया जाता है।
- प्रतिभागी देश: वर्तमान में किंबर्ले प्रोसेस के 60 प्रतिभागी हैं, जो 86 देशों का प्रतिनिधित्व करते हैं। किंबर्ले प्रोसेस के सदस्य वैश्विक अपरिष्कृत हीरा उत्पादन का लगभग 99.8% हिस्सा नियंत्रित करते हैं।
- किंबर्ले प्रोसेस सर्टिफिकेशन स्कीम (KPCS): वर्ष 2003 में प्रारंभ की गई KPCS अपरिष्कृत हीरों के व्यापार को नियंत्रित करने वाले नियमों और प्रक्रियाओं को परिभाषित करती है।
- KPCS के अंतर्गत प्रत्येक प्रतिभागी देश को न्यूनतम मानकों (Minimum Requirements) का पालन करना अनिवार्य होता है।
- KPCS के अनुसार, अंतर्राष्ट्रीय सीमा पार करने वाले प्रत्येक अपरिष्कृत हीरों की खेप (Consignment) के साथ दखल-रोधी (Tamper-resistant) किंबर्ले प्रोसेस सर्टिफिकेशन होना आवश्यक है।
- अपरिष्कृत हीरों का व्यापार केवल उन्हीं किंबर्ले प्रोसेस के प्रमाणित सदस्य देशों के बीच अनुमत है, जो इस योजना के न्यूनतम मानकों का पालन करते हैं।
- प्रतिभागी देश पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिये अपने हीरा उत्पादन और व्यापार से संबंधित समय पर तथा सटीक सांख्यिकीय आँकड़े साझा करने के लिये कानूनी रूप से बाध्य होते हैं।
- भारत किंबर्ले प्रोसेस सर्टिफिकेशन स्कीम (KPCS) के संस्थापक सदस्यों में से एक है।
- यह सुनिश्चित करने के लिये कि केवल वैध एवं ‘कॉन्फ्लिक्ट-फ्री’ हीरे ही आपूर्ति शृंखला में प्रवेश करें, इसके प्रवर्तन की ज़िम्मेदारी प्रत्येक भागीदार देश स्वयं निभाता है।
भारत में हीरे
- भारत में हीरे के स्रोत: भारत में हीरा खनन का इतिहास ईसा पूर्व 5वीं शताब्दी तक जाता है, हालाँकि 16वीं–17वीं शताब्दी के दौरान बड़े पैमाने पर खनन और व्यापार का उत्थान देखने को मिला।
- इस काल का सजीव वर्णन फ्राँसीसी यात्री एवं व्यापारी जीन बैपटिस्ट टैवर्नियर (Jean-Baptiste Tavernier) ने किया है, जिनके विवरण वर्तमान तेलंगाना स्थित गोलकुंडा को एक ऐतिहासिक वैश्विक हीरा व्यापार केंद्र के रूप में रेखांकित करते हैं।
- 19वीं शताब्दी तक हीरे मुख्यतः नदी की बजरी और कांग्लोमरेट शैलों से प्राप्त किये जाते थे, विशेष रूप से कृष्णा, महानदी और पन्ना पेटियों से।
- मध्य प्रदेश स्थित पन्ना की हीरा पेटी में स्थित मझगवाँ खदान भारत की एकमात्र वाणिज्यिक रूप से संचालित हीरा खदान है। पन्ना ज़िले के हीरों को उनकी विशिष्ट उत्पत्ति और गुणवत्ता को मान्यता देते हुए भौगोलिक संकेतक (GI) टैग प्रदान किया गया है।
- बाज़ार में प्रभुत्व: यद्यपि भारत प्रमुख हीरा उत्पादक नहीं है, फिर भी यह अपरिष्कृत हीरों का एक प्रमुख आयातक है, जो मुख्यतः संयुक्त अरब अमीरात, बेल्जियम और रूस से आयात करता है।
- वर्ष 2024 तक, इंडस्ट्रियल एक्सटेंशन ब्यूरो (iNDEXT) के अनुसार, विश्व के लगभग 90% हीरों का प्रसंस्करण भारत में किया जाता है, जो मूल्य के आधार पर वैश्विक कारोबार का लगभग 75% है। यह उद्योग मुख्यतः सूरत और मुंबई में केंद्रित है।
- प्रयोगशाला में निर्मित हीरे (LGD): वर्ष 2023 में भारत ने 30 लाख से अधिक प्रयोगशाला में निर्मित हीरों का उत्पादन किया, जो वैश्विक कुल उत्पादन की तुलना में 15% अधिक है।
- LGD का निर्माण केमिकल वेपर डिपॉज़िशन (CVD) अथवा हाई-प्रेशर हाई-टेंपरेचर (HPHT) प्रक्रियाओं के माध्यम से किया जाता है, जिनमें पृथ्वी जैसी परिस्थितियों की पुनर्रचना की जाती है। इन नियंत्रित प्रयोगशालाओं में कार्बन का क्रिस्टलीकरण कर हीरे का निर्माण होता है।
- LGD हेतु सरकारी समर्थन: केंद्रीय बजट वित्त वर्ष 24 में IIT मद्रास में एक प्रयोगशाला-निर्मित हीरा अनुसंधान केंद्र की स्थापना हेतु ₹242 करोड़ की पाँच-वर्षीय सीड ग्रांट की घोषणा की गई।
- इसके अतिरिक्त केंद्रीय बजट वित्त वर्ष 26 में आयातित कार्बन सीड्स पर सीमा शुल्क समाप्त कर दिया गया, जिससे उत्पादन लागत में कमी आई और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता में वृद्धि हुई।
- यह क्षेत्र 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की अनुमति भी देता है, जिससे विदेशी निवेश को प्रोत्साहन मिलता है। साथ ही, स्पष्ट विनियामक ढाँचे और समर्पित प्रमाणन प्रणालियाँ विकसित की जा रही हैं, ताकि उपभोक्ता विश्वास को सुदृढ़ किया जा सके और भारत को केवल एक परिष्कृत केंद्र नहीं, बल्कि LGD के वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित किया जा सके।
- रणनीतिक लाभ: भारत संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, संयुक्त अरब अमीरात और हांगकांग जैसे प्रमुख बाज़ारों में परिष्कृत हीरे एवं LGD का निर्यात करता है।
- मूल्य शृंखला के केंद्र में स्थित होने के कारण भारत को प्रशासनिक एवं शासकीय मानदंडों को प्रभावित करने की विशिष्ट रणनीतिक क्षमता प्राप्त होती है।
किंबर्ले प्रोसेस के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ एवं आलोचनाएँ क्या हैं?
- सीमित परिभाषा: वर्तमान में “कॉन्फ्लिक्ट डायमंड्स” की परिभाषा केवल उन हीरों तक सीमित है, जिनका उपयोग विद्रोही समूहों द्वारा संघर्ष के वित्तपोषण हेतु किया जाता है।
- यह सरकारों द्वारा विदेशों में होने वाले युद्धों के वित्तपोषण या मानवाधिकार उल्लंघनों में प्रयुक्त हीरों जैसे महत्त्वपूर्ण पहलुओं की उपेक्षा करती है।
- “मिश्रित उत्पत्ति” के माध्यम से मनी लॉन्ड्रिंग की गुंजाइश: व्यापारिक केंद्रों में विभिन्न स्रोतों से आए हीरों को आपस में मिला दिया जाता है और पुनः “उत्पत्ति: मिश्रित” के रूप में प्रमाणित कर दिया जाता है। इससे अनुरेखणीयता समाप्त हो जाती है तथा कॉन्फ्लिक्ट डायमंड्स को पुनः वैध आपूर्ति शृंखलाओं में प्रवेश का अवसर मिल जाता है।
- वीटो पावर: सहमति-आधारित निर्णय प्रोसेस के कारण कोई एक देश भी रक्त हीरों की पहचान को अवरुद्ध कर सकता है या सुधारों को रोक सकता है। इससे प्रणाली प्रायः पंगु अवस्था में चली जाती है और इसके विकास तथा अनुकूलन की क्षमता स्थिर हो जाती है।
- स्थायी संस्थागत संरचना का अभाव: किसी स्थायी सचिवालय या कर्मचारी के न होने के कारण निगरानी, निरंतरता और संकट प्रबंधन क्षमता कमज़ोर होती है।
- अप्रभावी निषेध: सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक के मामले (2013 में प्रतिबंधित, 2024 में पुनः शामिल) से यह स्पष्ट होता है कि कमज़ोर समर्थन उपायों के कारण तस्करी बढ़ी और हिंसा जारी रही।
- जहाँ खनन समुदायों की सुरक्षा को लेकर सहमति है, वहीं राज्य से संबंधित हिंसा को सँभालने के तरीकों पर असहमति यह दर्शाती है कि किंबर्ले प्रोसेस का अधिकार क्षेत्र अधिक समावेशी और यथार्थपरक होना चाहिये।
- केवल अपरिष्कृत हीरों तक अधिकार क्षेत्र की सीमा: किंबर्ले प्रोसेस केवल अपरिष्कृत हीरों (Rough Diamonds) पर लागू होता है। यहाँ तक कि अल्पतम पॉलिशिंग हीरों को किंबर्ले प्रोसेस की निगरानी से बाहर कर देती है, जिससे सरलता से नियमों से बचाव संभव हो जाता है।
- लैब-जेनरेटेड डायमंड्स (LGD): कॉन्फ्लिक्ट डायमंड्स और खनन में मानवाधिकार उल्लंघनों को लेकर बढ़ती नैतिक चिंताओं के कारण उपभोक्ता LGD (लैब-जेनरेटेड डायमंड्स) की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे प्राकृतिक हीरों की मांग में कमी और हीरों पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं को नुकसान होने का खतरा है।
किंबर्ले प्रोसेस में सुधार हेतु अध्यक्ष के रूप में भारत कौन-कौन से उपाय कर सकता है?
- एजेंडा का विस्तार: भारत किंबर्ले प्रोसेस के दायरे का विस्तार करने के लिये तकनीकी कार्यकारी समूह बनाने का प्रस्ताव रख सकता है, ताकि सिर्फ विद्रोही समूहों तक सीमित न रहकर हिंसा और मानवाधिकार जोखिमों का मूल्यांकन किया जा सके तथा “कॉन्फ्लिक्ट डायमंड्स” की परिभाषा को संशोधित करने से पूर्व व्यापक सहमति बनाई जा सके।
- तकनीकी आधुनिकीकरण: अपनी IT शक्ति का लाभ उठाते हुए भारत ब्लॉकचेन-आधारित प्रमाणन को बढ़ावा दे सकता है।
- प्रत्येक हीरे के शिपमेंट के लिये एक डिजिटल और अपरिवर्तनीय लेजर धोखाधड़ी को काफी हद तक कम करेगा और ट्रेसबिलिटी (निगरानी एवं पहचान) में सुधार लाएगा।
- संस्थागत सुधार: भारत स्वतंत्र तृतीय-पक्ष ऑडिट और विस्तृत व्यापार आँकड़ों का पूर्ण सार्वजनिक प्रकाशन करने का समर्थन कर सकता है, ताकि पारदर्शिता बढ़ाई जा सके।
- क्षमता निर्माण: भारत अफ्रीकी देशों का समर्थन करने के लिये क्षेत्रीय तकनीकी केंद्र स्थापित कर सकता है, जो IT सहायता, फोरेंसिक क्षमता और प्रमाणन सहायता प्रदान करें, जिससे अनुपालन दंडात्मक नहीं बल्कि सहयोगात्मक बने।
- सतत विकास: भारत सुधारों को आगे बढ़ाकर यह सुनिश्चित कर सकता है कि हीरे से होने वाली आय प्रत्यक्ष रूप से खनन समुदायों के स्वास्थ्य, शिक्षा और स्थानीय अवसंरचना के विकास में लगाई जाए, न कि इन क्षेत्रों को छोड़कर कहीं और जाए।
- इस प्रकार का दृष्टिकोण किंबर्ले प्रोसेस को सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के साथ संगत बनाता है, विशेष रूप से गरीबी निवारण और सम्मानजनक रोज़गार के क्षेत्र में।
निष्कर्ष
वर्ष 2026 के अध्यक्ष के रूप में भारत के पास किंबर्ले प्रोसेस को संघर्ष-रोकथाम के एक संकीर्ण साधन से बदलकर नैतिक हीरा शासन के एक विश्वसनीय ढाँचे में बदलने का अवसर है। डिजिटल ट्रेसेबिलिटी को अफ्रीकी खनन आजीविका पर केंद्रित जन-हितैषी दृष्टिकोण के साथ जोड़कर, भारत ग्लोबल साउथ का नेतृत्व कर सकता है और हीरों को संघर्ष के बजाय सतत विकास का संवाहक बना सकता है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. भारत की किंबर्ले प्रोसेस की अध्यक्षता उस समय आई है जब वैश्विक हीरा शासन में संरचनात्मक संकट व्याप्त है। चुनौतियों और सुधार के अवसरों का मूल्यांकन कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. किंबर्ले प्रोसेस (KP) क्या है?
किंबर्ले प्रोसेस एक अंतर्राष्ट्रीय प्रमाणन योजना है, जिसे वर्ष 2003 में शुरू किया गया था, ताकि कॉन्फ्लिक्ट डायमंड्स के व्यापार को रोका जा सके और अपरिष्कृत हीरों के सीमा-पार व्यापार को नियंत्रित किया जा सके।
2. भारत की 2026 में किंबर्ले प्रोसेस अध्यक्षता क्यों महत्त्वपूर्ण है?
भारत हीरों का केंद्रीय प्रसंस्करण केंद्र होने के साथ-साथ वैश्विक दक्षिण का प्रमुख प्रतिनिधि है, जो इसे वैश्विक हीरा शासन में सुधार की दिशा में रणनीतिक लाभ देता है।
3. किंबर्ले प्रोसेस की मुख्य आलोचनाएँ क्या हैं?
किंबर्ले प्रोसेस में कॉन्फ्लिक्ट डायमंड्स की संकीर्ण परिभाषा, सहमति-आधारित वीटो से पक्षपात, कमज़ोर ट्रेसबिलिटी और केवल अपरिष्कृत हीरों पर लागू होना जैसी आलोचनाएँ हैं।
4. लैब-जेनरेटेड डायमंड्स (LGDs) से किंबर्ले प्रोसेस ढाँचे को क्या चुनौती मिलती है?
कॉन्फ्लिक्ट डायमंड्स से जुड़ी नैतिक चिंताएँ उपभोक्ताओं को लैब-जेनरेटेड डायमंड्स की ओर आकर्षित कर रही हैं, जिससे प्राकृतिक हीरों की मांग घट रही है और शासन में कमज़ोरियाँ उजागर हो रही हैं।
5. भारत किंबर्ले प्रोसेस अध्यक्ष के रूप में कौन-से सुधार आगे बढ़ा सकता है?
भारत ब्लॉकचेन-आधारित ट्रेसबिलिटी को बढ़ावा दे सकता है, कॉन्फ्लिक्ट डायमंड्स की परिभाषा का विस्तार कर सकता है, ऑडिट को सुदृढ़ कर सकता है, अफ्रीकी उत्पादकों का समर्थन कर सकता है और किंबर्ले प्रोसेस को सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के साथ संगत बना सकता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. निम्नलिखित में से किस विदेशी यात्री ने भारत के हीरों और हीरे की खदानों के बारे में विस्तार से चर्चा की? (2018)
(a) फ़्रैंकोइस बर्नियर
(b) जीन बैपटिस्ट टेवर्नियर
(c) जीन डी थेवेनॉट
(d) अब्बे बार्थेलेमी कैरे
उत्तर: (b)
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