डेली न्यूज़ (06 Feb, 2026)



केंद्रीय बजट 2026-27 में रक्षा क्षेत्र

प्रिलिम्स के लिये: केंद्रीय बजट 2026-27, ऑपरेशन सिंदूर, सीमा सड़क संगठन, भूतपूर्व सैनिक अंशदायी स्वास्थ्य योजना, पेंशन प्रशासन रक्षा प्रणाली

मेन्स के लिये: रक्षा बजट और राष्ट्रीय सुरक्षा की तैयारी, रक्षा में पूंजीगत बनाम राजस्व व्यय, रक्षा विनिर्माण में आत्मनिर्भर भारत

स्रोत: पीआईबी 

चर्चा में क्यों? 

केंद्रीय बजट 2026-27 में रक्षा मंत्रालय को 7.85 लाख करोड़ रुपये आवंटित किये गए हैं, जो सभी मंत्रालयों में सबसे बड़ा बजटीय प्रावधान है, जिससे सैन्य आधुनिकीकरण, स्वदेशी रक्षा विनिर्माण और पूर्व सैनिकों के कल्याण को लेकर भारत की रणनीतिक प्राथमिकताएँ स्पष्ट होती हैं।

  • यह बजट 'ऑपरेशन सिंदूर' के बाद आया है, जिसने वास्तविक परिस्थितियों में भारत की युद्धक तत्परता का परीक्षण किया था और यह राष्ट्रीय सुरक्षा को आत्मनिर्भरता के भारत के दीर्घकालिक विज़न के केंद्र में रखता है।

सारांश

  • केंद्रीय बजट 2026–27 हालिया सैन्य अभियानों से प्राप्त परिचालन अनुभवों को ध्यान में रखते हुए आधुनिकीकरण, स्वदेशी रक्षा उत्पादन, रक्षा अनुसंधान एवं विकास (R&D) तथा पूर्व सैनिकों के कल्याण को प्राथमिकता देकर भारत की रक्षा क्षमता को सुदृढ़ करता है।
  • हालाँकि उच्च राजस्व व्यय, धीमी खरीद प्रक्रिया, आयात पर निर्भरता और दो मोर्चों पर खतरे जैसी संरचनात्मक चुनौतियाँ रक्षा क्षेत्र में बढ़ते आवंटन के क्रांतिकारी प्रभाव को सीमित कर रही हैं।

केंद्रीय बजट 2026–27 किस प्रकार रक्षा आधुनिकीकरण और आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहित करता है?

  • आधुनिकीकरण को बढ़ावा: केंद्रीय बजट 2026–27 में रक्षा आधुनिकीकरण पर विशेष बल दिया गया है, जिसके परिणामस्वरूप सशस्त्र बलों के लिये पूंजीगत आवंटन ₹2.19 लाख करोड़ से अधिक हो गया है।
    • बजट का अधिकांश हिस्सा पूंजीगत अधिग्रहण पर केंद्रित है, जो नई पीढ़ी के विमानों, उन्नत हथियारों, नौसैनिक प्लेटफॉर्म, पनडुब्बियों और मानवरहित प्रणालियों (ड्रोन आदि) को शामिल करने की क्षमता प्रदान करता है।
    • सीमा सड़क संगठन के लिये बढ़ाया गया आवंटन सुरंगों, पुलों और हवाई पट्टियों जैसी रणनीतिक अवसंरचना के आधुनिकीकरण एवं सुदृढ़ीकरण में सहायता मिलेगी।
    • ऑप्टिकल फाइबर-आधारित रक्षा संचार नेटवर्क में निवेश 'नेटवर्क-केंद्रित' और 'संयुक्त संचालन' का समर्थन करता है, जो तकनीक-संचालित सेना की ओर बढ़ते बदलाव को दर्शाता है।
  • स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा: केंद्रीय बजट 2026–27 स्वदेशी निर्माण को प्राथमिकता देकर और आयात पर निर्भरता कम करके रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत अभियान को मज़बूती प्रदान करता है। घरेलू रक्षा उद्योगों से खरीद के लिये ₹1.39 लाख करोड़ निर्धारित किये गए हैं, जिसमें कुल पूंजीगत अधिग्रहण बजट का लगभग 75% भाग घरेलू रक्षा उद्योगों के लिये आरक्षित किया गया है।
    • हवाई जहाज़ के रखरखाव, मरम्मत और ओवरहाल के लिये आयातित कच्चे माल पर कस्टम शुल्क छूट घरेलू क्षमताओं को और मज़बूत करती है।
    • कुल मिलाकर, इन पहलों का उद्देश्य रक्षा औद्योगिक पारिस्थितिक तंत्र को सुदृढ़ करना, निवेश को प्रोत्साहित करना और उच्च दक्षता वाले रोज़गार सृजित करना है।
  • अनुसंधान, विकास और नवाचार: केंद्रीय बजट 2026-27 रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के आवंटन में पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 8.5% की वृद्धि करके रक्षा अनुसंधान, विकास एवं नवाचार को मज़बूती प्रदान करता है।
    • इस वृद्धि का एक प्रमुख हिस्सा पूंजीगत व्यय के लिये आरक्षित है, जो नियमित खर्च के बजाय क्षमता निर्माण पर ध्यान केंद्रित करने को रेखांकित करता है।
    • बजट में रक्षा अनुसंधान कोष का एक बड़ा हिस्सा उद्योग, स्टार्टअप और शैक्षणिक संस्थानों के लिये खोलकर सहयोगात्मक अनुसंधान एवं विकास को मज़बूत करता है, साथ ही 'उत्कृष्टता केंद्रों' का विस्तार करता है और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की प्रक्रिया को तेज़ करता है।
  • भूतपूर्व सैनिकों के लिये बेहतर स्वास्थ्य सेवा और पेंशन सहायता: भूतपूर्व सैनिक अंशदायी स्वास्थ्य योजना (ECHS) को 12,100 करोड़ रुपये प्राप्त हुए हैं, जो पिछले वर्ष की तुलना में 45.49% की वृद्धि दर्शाता है। यह राशि भूतपूर्व सैनिकों और उनके आश्रितों के चिकित्सा उपचार में सहायता प्रदान करेगी।  
    • रक्षा पेंशन आवंटन में 6.56% की वृद्धि की गई है, जिससे पेंशन प्रशासन प्रणाली रक्षा (SPARSH) और अन्य अधिकृत पेंशन चैनलों के माध्यम से 34 लाख से अधिक पेंशनभोगियों को समय पर मासिक भुगतान सुनिश्चित किया जा सकेगा।

अधिक धनराशि आवंटन के बावजूद भारत के रक्षा आधुनिकीकरण में प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?

  • राजस्व व्यय: आधुनिकीकरण में सबसे महत्त्वपूर्ण बाधा उच्च ‘राजस्व’ व्यय (वेतन और पेंशन) है।
    • सत्र 2025-26 में रक्षा पर अनुमानित व्यय का 50% हिस्सा वेतन और पेंशन पर खर्च हुआ है। परिणामस्वरूप, पूंजीगत व्यय (आधुनिकीकरण) के लिये उपलब्ध बजट का हिस्सा हाल के वर्षों में 30% से कम रहा है, जिससे आधुनिकीकरण सीमित हो गया है।
  • सापेक्ष व्यय में गिरावट: वर्षों से कुल रक्षा आवंटन सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 2% बना हुआ है। 
    • यह स्तर रक्षा पर स्थायी संसदीय समिति (2018) द्वारा अनुशंसित 3% GDP मानक से काफी कम है, जिससे प्रतिद्वंद्वी देशों को भारत की वित्तीय प्रतिबद्धता के संकेत को लेकर गलत धारणा बन सकती है।
  • मुद्रा अवमूल्यन: चूँकि अधिकांश रक्षा खरीद का लेनदेन डॉलर में होता है, इसलिये रुपये के अवमूल्यन से आवंटित धनराशि की वास्तविक क्रय शक्ति में काफी कमी आती है।
  • प्रतिबद्ध देनदारियाँ: पूंजी बजट का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा ‘प्रतिबद्ध देनदारियों’ (पिछले वर्षों में हस्ताक्षरित अनुबंधों के भुगतान) के लिये दिया जाता है। यहाँ कमी होने पर संविदात्मक दायित्वों के निर्वहन में चूक हो सकती है।
  • आयात पर निर्भरता: स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत यूक्रेन के बाद दूसरा सबसे बड़ा रक्षा-उपकरण आयातक देश है।
    • आधुनिकीकरण पर होने वाला काफी खर्च विदेशी स्रोतों से होता है। विदेशी आपूर्तिकर्त्ताओं पर निर्भरता आपात स्थितियों/युद्धों के दौरान असुरक्षा की स्थिति उत्पन्न करती है।
    • यद्यपि आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने हेतु आयात-निषेध सूचियाँ लागू की गई हैं, परंतु कई बार घरेलू विकल्प पूरी तरह विकसित होने से पहले ही विदेशी विकल्पों पर रोक लग जाने से तात्कालिक क्षमता-अंतराल उत्पन्न हो जाता है।
  • घरेलू उत्पादन में गुणवत्ता संबंधी मुद्दे: वर्ष 2022 में, भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक (CAG) ने आयुध कारखानों में गुणवत्ता संबंधी मुद्दों (दोषपूर्ण गोला-बारूद के कारण दुर्घटनाएँ) और DRDO की 178 परियोजनाओं में से 119 में विलंब को उजागर किया है।
  • महत्त्वपूर्ण सैन्य उपकरणों की कमी: वित्तीय और प्रक्रियात्मक विलंब के कारण परिचालन तत्परता में स्पष्ट कमियाँ आ गई हैं।
    • सेना में लगभग 15% उपकरण नई पीढ़ी के हैं, जबकि लक्ष्य 30% का है। उच्च तुंगता क्षेत्रों में तैनात सैनिकों के लिये स्नो-गॉगल्स और बूट जैसे मूलभूत उपकरणों की भी कमी की सूचना मिली है।
    • वायुसेना में लड़ाकू स्क्वाड्रनों की स्वीकृत क्षमता 42 है, जबकि वर्तमान में केवल 31 सक्रिय स्क्वाड्रन उपलब्ध हैं। पुराने मिग विमानों के बेड़े को तत्काल प्रतिस्थापन के बिना चरणबद्ध तरीके से हटाना हवाई प्रभुत्व के लिये खतरा उत्पन्न करता है।
  • रक्षा व्यय में असमानता: चीन का रक्षा व्यय भारत की तुलना में कहीं अधिक है, जिससे उसे अधिक तकनीकी और सैन्य क्षमता प्राप्त होती है। 
    • यद्यपि भारत का रक्षा व्यय पाकिस्तान से अधिक है, परंतु द्वि-सीमांत संघर्ष की तैयारी के कारण भारत को स्थल और समुद्री दोनों मोर्चों पर संसाधन विभाजित करने पड़ते हैं, जिससे समग्र रक्षा क्षमता पर दबाव बढ़ता है।
  • रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP), 2020 की चुनौतियाँ: प्रोजेक्ट 75(I) का सौदा रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP), 2020 के बाद भी लगभग 6 वर्षों में अनुबंध चरण तक ही पहुँच सका, जबकि संपूर्ण प्रक्रिया-चक्र लगभग 20 वर्षों का रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित युद्ध के वर्तमान युग में इतनी लंबी अधिग्रहण प्रक्रिया को ‘व्यावहारिक रूप से अप्रासंगिक’ माना जाता है।

भारत की रक्षा तैयारियों को सुदृढ़ करने हेतु कौन-से उपाय आवश्यक हैं?

  • वित्तीय पुनर्संरचना: 15वें वित्त आयोग द्वारा अनुशंसित ‘रक्षा और आंतरिक सुरक्षा आधुनिकीकरण कोष’ (Modernisation Fund for Defence and Internal Security) को प्रभावी रूप से लागू करना।
    • यह नॉन-लैप्सेबल (अव्ययशील) कोष मंत्रालय को अप्रयुक्त पूंजीगत बजट को आगे बढ़ाने की अनुमति देगा, जिससे पनडुब्बियों या लड़ाकू विमानों जैसे बड़े अनुबंधों से संबंधित प्रतिबद्ध देनदारियों को प्रतिवर्ष नए आवंटन पर निर्भर किये बिना पूरा किया जा सके।
  • निजी क्षेत्र के अनुसंधान एवं विकास (R&D) को प्रोत्साहन: निजी क्षेत्र के साथ ‘खरीदार-विक्रेता’ संबंध से स्थानांतरित होकर ‘सह-विकास’ (co-development) मॉडल अपनाना।
    • सरकार को ‘मेक-I’ श्रेणी के अंतर्गत निजी क्षेत्र द्वारा विकसित R&D प्रोटोटाइपों को आक्रामक रूप से वित्तपोषित करना चाहिये।
    • यह परिवर्तन DRDO की एकाधिकारात्मक समय-सीमाओं पर निर्भरता को कम करता है, प्रतिस्पर्द्धी निजी औद्योगिक आधार को बढ़ावा देता है और भारत की रक्षा निर्यात गति के अनुरूप है (2023-24 में निर्यात ₹210 अरब तक पहुँचा, जबकि 2028-29 तक ₹500 अरब का लक्ष्य है)।
  • खरीद प्रक्रिया में तेज़ी (DAP में सुधार): रक्षा मंत्रालय द्वारा वर्ष 2025 को ‘सुधारों का वर्ष’ घोषित किये जाने के आधार पर रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करना आवश्यक है ताकि आधुनिकीकरण में तेज़ी आए और आत्मनिर्भरता को प्रबलता प्राप्त हो।
    • इसके लिये आवश्यकता की स्वीकृति (Acceptance of Necessity- AoN) प्रक्रिया में नौकरशाही स्तरों को कम करना होगा तथा जब स्वदेशी प्लेटफॉर्म में देरी हो, तब तात्कालिक क्षमता की कमी के लिये त्वरित (फास्ट-ट्रैक) और ओवर-द-काउंटर खरीद को सक्षम बनाना होगा, ताकि परिचालन तत्परता प्रभावित न हो।
  • नाट्यकरण/थिएटराइज़ेशन: एकीकृत थिएटर कमानों के गठन की प्रक्रिया में तेज़ी लाना। इससे संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित होगा, अभियानों में संयुक्तता आएगी और चीन तथा पाकिस्तान से उत्पन्न खतरों के प्रति एकीकृत दृष्टिकोण विकसित होगा।
  • यथार्थवादी स्वदेशीकरण: ऐसा संतुलित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है जिसमें आयात प्रतिबंधों को घरेलू उद्योगों की वास्तविक उत्पादन समय-सीमा के साथ सख्ती से समन्वित किया जाए। यदि कोई घरेलू परियोजना (जैसे– हल्का टैंक या ड्रोन) गुणवत्ता परीक्षणों में असफल हो जाती है, तो परिचालन तत्परता बनाए रखने हेतु अंतरिम आपातकालीन खरीद शक्तियों का बिना संकोच प्रयोग किया जाना चाहिये।

निष्कर्ष

केंद्रीय बजट 2026-27 एक आधुनिक, आत्मनिर्भर और नवाचार-प्रेरित रक्षा ईकोसिस्टम के निर्माण की दिशा में निर्णायक परिवर्तन को दर्शाता है। स्वदेशी विनिर्माण, अनुसंधान और रणनीतिक अवसंरचना में निरंतर निवेश के साथ-साथ पूर्व सैनिकों के लिये प्रबल समर्थन प्रदान करते हुए, यह बजट भारत की रक्षा तैयारी को दीर्घकालिक विकास लक्ष्यों और विकसित भारत @2047 के दृष्टिकोण के अनुरूप स्थापित करता है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न: बढ़े हुए पूंजीगत व्यय के बावजूद भारत के रक्षा आधुनिकीकरण को सीमित करने वाली संरचनात्मक बाधाओं पर चर्चा कीजिये।

प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)


1. केंद्रीय बजट 2026-27 रक्षा क्षेत्र के लिये महत्त्वपूर्ण क्यों है?
हालिया परिचालन अनुभव के बाद यह अब तक का सर्वाधिक रक्षा आवंटन प्रदान करता है, जिसमें आधुनिकीकरण, स्वदेशी विनिर्माण और पूर्व सैनिकों के कल्याण पर विशेष ध्यान दिया गया है।

2. बजट रक्षा आधुनिकीकरण को कैसे बढ़ावा देता है?
उन्नत प्लेटफॉर्म, रणनीतिक अवसंरचना और नेटवर्क-केंद्रित युद्ध क्षमताओं के लिये पूंजीगत आवंटन बढ़ाकर।

3. रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत को समर्थन देने वाले कौन-से उपाय हैं?
घरेलू खरीद को प्राथमिकता, भारतीय कंपनियों के लिये पूंजीगत अधिग्रहण आरक्षित करना तथा रक्षा विनिर्माण और MRO गतिविधियों के लिये प्रोत्साहन।

4. रक्षा आधुनिकीकरण की प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
उच्च राजस्व व्यय, धीमी खरीद प्रक्रियाएँ, आयात पर निर्भरता, मुद्रा अवमूल्यन और निरंतर क्षमता अंतराल।

5. रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP), 2020 की आलोचना क्यों की जाती है?
लंबी खरीद समय-सीमाओं, रणनीतिक परियोजनाओं में देरी और तीव्र तकनीकी परिवर्तनों के साथ समन्वय स्थापित न कर पाने के कारण।

 

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

मेन्स 

प्रश्न. रक्षा क्षेत्रक में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) को अब उदारीकृत करने की तैयारी है। भारत की रक्षा और अर्थव्यवस्था पर अल्पकाल और दीर्घकाल में इसके क्या प्रभाव अपेक्षित हैं?  (2014) 

प्रश्न. “भारत में बढ़ते हुए सीमापारीय आतंकी हमले और अनेक सदस्य राज्यों के आंतरिक मामलों में पाकिस्तान द्वारा बढ़ता हुआ हस्तक्षेप SAARC (दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन) के भविष्य के लिये सहायक नहीं है।” उपयुक्त उदाहरण के साथ स्पष्ट कीजिये। (2016)

प्रश्न. आतंकवादी हमलों के खिलाफ सशस्त्र कार्रवाई के संबंध में प्रायः 'हॉट परस्यूट' और 'सर्जिकल स्ट्राइक' शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसी कार्रवाइयों के रणनीतिक प्रभाव पर चर्चा करें। (2016) 


सोडियम-आयन बैटरी

प्रारंभिक परीक्षा के लिये: लिथियम-आयन प्रौद्योगिकी, इलेक्ट्रिक वेहिकल, महत्त्वपूर्ण खनिज, राष्ट्रीय महत्त्वपूर्ण खनिज मिशन

मुख्य परीक्षा के लिये: बैटरी प्रौद्योगिकी एवं भारत की ऊर्जा सुरक्षा, महत्त्वपूर्ण खनिज तथा रणनीतिक स्वायत्तता

स्रोत: द हिंदू 

चर्चा में क्यों? 

आधुनिक अवसंरचना का आधार बनती जा रही बैटरियों के संदर्भ में लिथियम-आयन प्रौद्योगिकी पर भारत की अत्यधिक निर्भरता उसे आपूर्ति संबंधी जोखिमों तथा आयात पर निर्भरता के प्रति संवेदनशील बनाती है। इस परिप्रेक्ष्य में सोडियम-आयन बैटरी (SiB) एक अधिक सुरक्षित एवं लचीले विकल्प के रूप में उभर रही है, जिसके चलते भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करने हेतु रणनीतिक परिवर्तन की आवश्यकता पर बल दिया जा रहा है।

सारांश

  • लिथियम-आयन बैटरियों पर भारत की अत्यधिक निर्भरता उसे आयात-निर्भरता तथा महत्त्वपूर्ण खनिज संबंधी जोखिमों के प्रति संवेदनशील बनाती है, जिससे सोडियम-आयन बैटरियाँ इलेक्ट्रिक वेहिकल, ग्रिड स्टोरेज तथा स्वच्छ ऊर्जा अनुप्रयोगों के लिये एक सुरक्षित, लागत-प्रभावी एवं सुरक्षित संसाधन के विकल्प के रूप में उभरती हैं।
  • हालाँकि, सोडियम-आयन बैटरियाँ सामरिक लाभ प्रदान करती हैं, किंतु भारत में इनके व्यापक विस्तार के लिये लक्षित नीतिगत समर्थन, आपूर्ति-शृंखला का विकास, विनिर्माण पारितंत्र का सुदृढ़ीकरण तथा प्रारंभिक बाज़ार परिनियोजन आवश्यक है।

सोडियम-आयन बैटरी क्या हैं?

  • परिचय: सोडियम-आयन बैटरी लिथियम-आयन बैटरियों का लागत-प्रभावी एवं सुरक्षित विकल्प हैं, जो ऊर्जा भंडारण के लिये प्रचुर मात्रा में उपलब्ध सोडियम संसाधनों (जैसे– समुद्री लवण) का उपयोग करती हैं।
    • ये त्वरित चार्जिंग, निम्न तापमान पर उत्कृष्ट प्रदर्शन तथा दीर्घ आयु प्रदान करती हैं, जिससे ये इलेक्ट्रिक वेहिकल (EV), ग्रिड स्टोरेज तथा सौर अनुप्रयोगों के लिये उपयुक्त बनती हैं।
  • लिथियम-आयन बैटरियों की तुलना में सोडियम-आयन बैटरियाँ:
    • ऊर्जा घनत्व: ऐतिहासिक रूप से सोडियम लिथियम की तुलना में भारी होने के कारण सोडियम-आयन बैटरियों की विशिष्ट ऊर्जा कम रही है। 
      • हालाँकि, आधुनिक स्तरीकृत संक्रमण-धातु ऑक्साइड कैथोड के उपयोग से सोडियम-आयन बैटरियों का ऊर्जा घनत्व अब लिथियम आयरन फॉस्फेट (LFP) बैटरियों के ऊर्जा घनत्व के क़रीब पहुँच रहा है।
    • सुरक्षा प्रोफाइल: सोडियम-आयन बैटरियाँ स्वभावतः अधिक सुरक्षित होती हैं। थर्मल रन-अवे की स्थिति में इनमें लिथियम-आयन सेल की तुलना में तापमान काफी कम रहता है।
    • परिवहन संबंधी लाभ: लिथियम-आयन बैटरियों के विपरीत, जिन्हें खतरनाक वस्तु माना जाता है और लगभग 30% चार्ज की अवस्था में ही परिवहन करना पड़ता है, सोडियम-आयन बैटरियों को बिना किसी क्षरण के शून्य वोल्ट पर संगृहीत एवं परिवहन किया जा सकता है। 
      • इससे परिवहन के दौरान अग्नि संबंधी जोखिम समाप्त होता है तथा लॉजिस्टिक लागत में कमी आती है।
  • भारत के लिये सोडियम-आयन बैटरियों का महत्त्व:
    • आयात निर्भरता में कमी: लिथियम-आयन बैटरियों की सफलता के पीछे कुछ संरचनात्मक चुनौतियाँ निहित हैं, क्योंकि ये लिथियम, कोबाल्ट, निकेल तथा ग्रेफाइट जैसे दुर्लभ महत्त्वपूर्ण खनिजों पर निर्भर करती हैं, जिसके परिणामस्वरूप भारत की आयात पर अत्यधिक निर्भरता है।
      • सोडियम का स्रोत सोडा ऐश जैसे प्रचुर मात्रा में उपलब्ध घरेलू संसाधन हैं, जो रणनीतिक स्वायत्तता की दिशा में एक सशक्त मार्ग प्रदान करते हैं।
      • SiB भारत को उन प्रमुख खनिजों से जुड़े वैश्विक भू-राजनीतिक जोखिम और मूल्य अस्थिरता से सुरक्षित रख सकते हैं, जो कुछ ही देशों (जैसे– चीन) द्वारा नियंत्रित हैं।
    • बड़े पैमाने पर बाज़ार के लिये लागत लाभ: सोडियम-आयन बैटरी में करंट कलेक्टर एल्यूमिनियम से बनाए जाते हैं, जिससे इनकी लागत कम होती है, वज़न हल्का होता है और सामग्री आसानी से उपलब्ध हो जाती है।
      • यह SiBs को भारत के मूल्य-संवेदनशील बाज़ारों के लिये उपयुक्त बनाता है, जैसे– इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहन, तिपहिया वाहन और ग्रिड ऊर्जा भंडारण।
    • अपनाने की सुविधा: चूँकि सोडियम-आयन बैटरी का निर्माण मौजूदा PLI-प्रोत्साहित बुनियादी ढाँचे का उपयोग करके (न्यूनतम बदलावों के साथ) किया जा सकता है, इसलिये भारत पूरी तरह से नया ईकोसिस्टम बनाए बिना उत्पादन को तेज़ी से बढ़ा सकता है।
      • लागत अनुमानों के अनुसार, 2030 के दशक के मध्य तक सोडियम-आयन बैटरी लिथियम-आयन बैटरी की तुलना में अधिक किफायती हो सकती हैं।
      • विश्व स्तर पर निर्माण क्षमता के तेज़ी से विस्तार के मद्देनज़र, भारत के लिये प्रतिस्पर्द्धा बनाए रखने और अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु शीघ्र एवं निर्णायक रूप से अपनाना आवश्यक है।

बैटरी निर्माण को मज़बूत करने हेतु भारत की पहल

  • उन्नत रसायन कोशिका बैटरी स्टोरेज के लिये उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन योजना (PLI): यह योजना उन्नत बैटरी सेल्स के घरेलू निर्माण को प्रोत्साहित करती है और तकनीकी अपनाने, अनुसंधान एवं विकास (R&D) तथा उत्पादन क्षमता के विस्तार को बढ़ावा देती है।
    • PLI योजना के तहत ACC के लिये 50 GWh घरेलू उत्पादन क्षमता का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें 40 GWh चार लाभार्थी कंपनियों को आवंटित किया गया है। लेकिन अब तक केवल लगभग 1 GWh ही चालू किया गया है और कोई प्रोत्साहन राशि प्राप्त नहीं हुई है, जो ज़मीन पर प्रगति की धीमी गति को दर्शाता है।
  • नेशनल क्रिटिकल मिनरल्स मिशन: यह मिशन खोज, खनन, प्रसंस्करण, पुनर्चक्रण और विदेशी संपत्तियों के माध्यम से महत्त्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति शृंखलाओं को सुरक्षित करता है।
  • खानिज विदेश इंडिया लिमिटेड के माध्यम से विदेशों में खनिज साझेदारी: विदेशों में लिथियम और अन्य महत्त्वपूर्ण खनिज संपत्तियों का अधिग्रहण तथा विकास।
  • बैटरी अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2022: बैटरी के संग्रह, पुनर्चक्रण और नवीनीकरण के लिये विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) को अनिवार्य करता है।

भारत में SiBs को बड़े पैमाने पर लागू करने में प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?

  • वज़न संबंधी बाधा: लिथियम-आयन बैटरियों की तुलना में अधिक वज़न के कारण यह उच्च रेंज और सीमित स्थान वाले अनुप्रयोगों, जैसे– कॉम्पैक्ट इलेक्ट्रिक वाहनों के लिये कम उपयुक्त है।
  • निर्माण संबंधी जटिलताएँ: सोडियम-आयन सेल्स नमी के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं, इसलिये इनके लिये डिपर वैक्यूम ड्राइंग और सख्त प्रक्रिया नियंत्रण की आवश्यकता होती है।
    • निर्माण के दौरान उच्च ऊर्जा खपत प्रारंभिक लागत बढ़ा सकती है, जब तक कि उन्नत तकनीकें पूरी तरह विकसित नहीं हो जातीं।
  • अल्पविकसित आपूर्ति शृंखला: भारत में सोडियम-विशिष्ट कैथोड, एनोड, इलेक्ट्रोलाइट और सेपरेटर के लिये पर्याप्त विकसित ईकोसिस्टम उपलब्ध नहीं है।
    • बैटरी-ग्रेड सामग्री के लिये प्रसंस्करण अवसंरचना अभी शुरुआती स्तर पर है और इसके लिये सेल असेंबली के अलावा अतिरिक्त निवेश की आवश्यकता होती है।
  • नीति और नियामक अंतराल: वर्तमान प्रोत्साहन योजनाएँ मुख्य रूप से लिथियम पर केंद्रित हैं और सोडियम-आयन बैटरी रसायनों के लिये स्पष्ट लक्ष्य या समर्थन नहीं दिया गया है।
    • समर्पित सुरक्षा मानकों और प्रमाणन मार्गों के अभाव के कारण वेहिकल की मंज़ूरी और उनके व्यावसायिक रोलआउट की गति धीमी हो जाती है।
  • बाज़ार में कम विश्वास: लिथियम-आयन की तुलना में वास्तविक परिस्थितियों में कम उपयोग के कारण मूल उपकरण निर्माता (OEMs) का विश्वास कम होता है।
    • पर्याप्त पायलट परियोजनाओं और प्रदर्शन की कमी बड़े पैमाने पर अपनाने में देरी करती है, विशेष रूप से इलेक्ट्रिक वेहिकल (EV) प्लेटफॉर्मों में।

 भारत में SiBs को व्यापक स्तर पर लागू करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?

  • फार्म-टू-बैटरी हार्ड कार्बन रणनीति: आयातित हार्ड कार्बन (जो SiBs में एनोड के रूप में उपयोग किया जाता है) के स्थान पर कृषि अपशिष्ट का उपयोग किया जाना चाहिये।
    • चावल उत्पादक क्षेत्रों (पंजाब, हरियाणा) और नारियल उत्पादक क्षेत्रों (केरल, तमिलनाडु) के पास उच्च तापमान वाले पायरोलिसिस इकाइयाँ स्थापित की जानी चाहिये। 
    • इससे पराली दहन से होने वाली प्रदूषण की समस्या कच्चे माल के समाधान में परिणत हो जाती है, जिससे एनोड के लिये बैटरी-ग्रेड हार्ड कार्बन की घरेलू आपूर्ति का सृजन होता है। 
  • मरुस्थल-केंद्रित विनिर्माण क्लस्टर: सोडियम-आयन कारखानों को राजस्थान या कच्छ जैसे शुष्क क्षेत्रों में स्थापित किया जाना चाहिये।
    • निम्न आर्द्रता के कारण ड्राई-रूम की ऊर्जा आवश्यकताएँ कम होंगी जिससे परिचालन लागत घटेगी तथा नमी संबंधी विनिर्माण चुनौतियाँ कम होंगी।
  • मानकीकरण के माध्यम से रणनीतिक बाज़ार प्रवेश: प्रारंभिक चरण में तिपहिया वाहनों और बसों के लिये सोडियम-आयन बैटरी पैक के आकार का मानकीकरण किया जाना चाहिये। ये सेगमेंट अपेक्षाकृत बड़े बैटरी पैक को समायोजित कर सकते हैं और दोपहिया वाहनों में विस्तार से पूर्व आवश्यक पैमाना उपलब्ध कराते हैं।
  • हाइब्रिड सोडियम-लिथियम बैटरी पैक: दैनिक उपयोग के लिये सोडियम-आयन और उच्च प्रदर्शन आवश्यकताओं के लिये लिथियम-आयन को संयोजित करने वाले द्वि-रसायन पैकों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।
  • रासायनिक उन्नयन हेतु प्रोत्साहन: घरेलू रासायनिक उद्योगों को औद्योगिक सोडा ऐश को बैटरी-ग्रेड सोडियम कार्बोनेट में उन्नत करने हेतु प्रोत्साहन दिया जाना चाहिये। इससे आपूर्ति शृंखला की महत्त्वपूर्ण कमियों को दूर किया जा सकेगा और आयात पर निर्भरता कम होगी।  

निष्कर्ष:

सोडियम-आयन बैटरियाँ भारत को आयात पर निर्भरता कम करने और ऊर्जा सुरक्षा को मज़बूत करने का एक व्यवहार्य मार्ग प्रदान करती हैं। लक्षित नीतिगत समर्थन और पारिस्थितिक तंत्र के विकास के साथ, ये लिथियम-आयन प्रौद्योगिकी की पूरक बन सकती हैं। दीर्घकालिक प्रतिस्पर्द्धात्मकता के लिये इनका शीघ्र अंगीकरण महत्त्वपूर्ण है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न: भारत में सोडियम-आयन बैटरी के व्यापक उत्पादन में आने वाली तकनीकी और पारिस्थितिक तंत्र संबंधी चुनौतियों पर चर्चा कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1. सोडियम-आयन बैटरी क्या हैं और ये भारत के लिये क्यों महत्त्वपूर्ण हैं? 
सोडियम-आयन बैटरियाँ लिथियम के स्थान पर प्रचुर उपलब्ध सोडियम का उपयोग करती हैं, जिससे आयात-निर्भरता घटती है और ऊर्जा सुरक्षा सुदृढ़ होती है। साथ ही ये अधिक सुरक्षित और तुलनात्मक रूप से किफायती ऊर्जा भंडारण समाधान प्रदान करती हैं।

प्रश्न 2. सोडियम-आयन बैटरी की तुलना लिथियम-आयन बैटरी से कैसे की जाती है? 
इनका ऊर्जा घनत्व अपेक्षाकृत कम होता है परंतु सुरक्षा अधिक होती है, सामग्री-जोखिम कम होता है, परिवहन अपेक्षाकृत सरल होता है तथा प्रदर्शन LFP श्रेणी की बैटरियों के तुल्य होता है।

प्रश्न 3. भारत में बैटरी निर्माण को कौन-सी सरकारी पहलें समर्थन देती हैं? 
प्रमुख पहलों में उन्नत रसायन विज्ञान सेल बैटरी भंडारण के लिये उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन योजना, राष्ट्रीय महत्त्वपूर्ण खनिज मिशन और बैटरी अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2022 शामिल हैं।

प्रश्न 4. भारत में सोडियम-आयन बैटरी के उत्पादन को बढ़ाने में मुख्य चुनौतियाँ क्या हैं? 
कम ऊर्जा घनत्व, नमी संवेदनशील विनिर्माण प्रक्रियाएँ, अपर्याप्त रूप से विकसित आपूर्ति-शृंखला, लिथियम-केंद्रित नीतिगत ढाँचा और सीमित बाज़ार विश्वास प्रमुख चुनौतियाँ हैं।

प्रश्न 5. भारत में सोडियम-आयन बैटरी को अपनाने में तेज़ी लाने के लिये कौन-से उपाय किये जा सकते हैं? 
कृषि अपशिष्ट का हार्ड कार्बन हेतु उपयोग, मरुस्थल-केंद्रित विनिर्माण क्लस्टर, हाइब्रिड बैटरी पैक, सार्वजनिक परिवहन के लिये मानकीकरण तथा रासायनिक उन्नयन हेतु प्रोत्साहन।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रश्न 1. विद्युत् वाहन बैटरियों के संदर्भ में निम्नलिखित तत्त्वों पर विचार कीजिये: (2025)

  1. कोबाल्ट
  2. ग्रेफाइट
  3. लिथियम
  4. निकेल 

उपर्युक्त में से कितने सामान्यतया बैटरी के कैथोड बनाने के लिये उपयुक्त होते हैं?

(a) केवल एक

(b) केवल दो

(c) केवल तीन

(d) सभी चार

उत्तर: (c)


प्रश्न 2. निम्नलिखित में से कौन-सा धातु युग्म क्रमशः सबसे हल्की धातु और सबसे भारी धातु को निरूपित करता है? (2008)

(a) लिथियम और पारा
(b) लिथियम और ऑस्मियम
(c) एल्यूमिनियम और ऑस्मियम
(d) एल्यूमिनियम और पारा

उत्तर: (b)