नदी बेसिन प्रबंधन योजना | 18 Apr 2026
चर्चा में क्यों?
नदी बेसिन प्रबंधन योजना को 16वें वित्त आयोग की अवधि (2026–27 से 2030–31) तक बढ़ा दिया गया है, जो भारत के जल संसाधनों के एकीकृत और सतत प्रबंधन (विशेष रूप से बेसिन स्तर पर) पर बल को दर्शाता है।
नदी बेसिन प्रबंधन (RBM) योजना क्या है?
- परिचय: RBM योजना एक केंद्रीय क्षेत्रक पहल है, जिसका संचालन जलशक्ति मंत्रालय (जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण विभाग) द्वारा किया जाता है।
- इसका मुख्य लक्ष्य नदी बेसिन स्तर पर सतही जल और भूजल के एकीकृत नियोजन, सतत उपयोग और संरक्षण को सुनिश्चित करना है।
- इस योजना के तहत जल संसाधनों को अलग-अलग देखने के बजाय, पूरे नदी बेसिन (जिसमें नदियाँ, उनकी सहायक नदियाँ, झीलें और भूजल शामिल हैं) को एकीकृत एवं परस्पर प्रणाली के रूप में संदर्भित किया गया है।
- संस्थागत ढाँचा: नदी बेसिन प्रबंधन (RBM) योजना के दो प्रमुख घटक हैं— ब्रह्मपुत्र बोर्ड, जल संसाधन विकास अन्वेषण योजना (IWRDS), जो केंद्रीय जल आयोग (CWC) एवं राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी (NWDA) के माध्यम से क्रियान्वित है।
- ब्रह्मपुत्र बोर्ड: यह उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में नदी बेसिन योजना, बाढ़ नियंत्रण, अपरदन प्रबंधन, जल निकासी के विकास और जल संसाधनों के सतत प्रबंधन पर केंद्रित है।
- केंद्रीय जल आयोग (CWC): यह दूरस्थ क्षेत्रों में जल संसाधन परियोजनाओं के लिये सर्वेक्षण एवं जाँच के साथ विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करता है।
- राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण (NWDA): यह राष्ट्रीय स्तर पर जल नियोजन का कार्य करता है, विशेष रूप से नदियों को परस्पर जोड़ने के कार्यक्रम (ILR) हेतु व्यवहार्यता प्रतिवेदनों की तैयारी करता है।
- भौगोलिक प्राथमिकता: यह सामरिक रूप से जल-समृद्ध किंतु अल्पविकसित क्षेत्रों को लक्षित करती है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा, जल सुरक्षा, सीमापार प्रबंधन, बाढ़ नियंत्रण तथा पारिस्थितिक स्थिरता की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
- प्रमुख लक्षित क्षेत्रों में ब्रह्मपुत्र, बराक, तीस्ता और सिंधु बेसिन शामिल हैं, जिनमें उत्तर-पूर्वी राज्यों, जम्मू और कश्मीर और लद्दाख को अत्यधिक प्राथमिकता दी गई है।
- मुख्य उद्देश्य::
- बाढ़ एवं अपरदन प्रबंधन: भौतिक संरक्षण उपायों का कार्यान्वयन, जैसे असम के माजुली द्वीप को तीव्र नदी धाराओं से सुरक्षित करना।
- परियोजना विकास: सिंचाई क्षमता के विस्तार तथा हिमालयी नदियों में जलविद्युत उत्पादन क्षमता के दोहन हेतु विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन (DPRs) तैयार करना।
- प्रौद्योगिकी एकीकरण: स्थलाकृतिक एवं जलवैज्ञानिक नियोजन में सूक्ष्म सटीकता सुनिश्चित करने हेतु भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS), LiDAR तथा ड्रोन सर्वेक्षण जैसे आधुनिक मानचित्रण एवं सर्वेक्षण उपकरणों का उपयोग करना।
- सामुदायिक एकीकरण: पर्वतीय क्षेत्रों में जनजातीय एवं ग्रामीण समुदायों के मध्य स्प्रिंगशेड प्रबंधन जैसी स्थानीय पद्धतियों को प्रोत्साहन देना।
नदी बेसिन
- परिचय: नदी बेसिन वह स्थलीय क्षेत्र है, जिसका अपवाह किसी नदी तथा उसकी सहायक नदियों द्वारा किया जाता है। इसके प्रमुख घटकों में सहायक नदियाँ (वे छोटी धाराएँ जो मुख्य नदी में मिलती हैं), संगम (वह स्थान जहाँ नदियाँ परस्पर मिलती हैं), जल-विभाजक (उच्च भू-भागीय सीमा जो विभिन्न बेसिनों को पृथक् करती है), उद्गम (नदी का प्रारंभिक स्रोत) तथा मुहाना (वह स्थान जहाँ नदी समुद्र, झील अथवा महासागर में जाकर मिलती है) सम्मिलित हैं।
- भारत में जल संसाधनों के नियोजन एवं विकास हेतु नदी बेसिन को मूलभूत जलवैज्ञानिक इकाई माना जाता है।
- भारत के नदी बेसिन : भारत की अपवाह प्रणाली को 20 नदी बेसिन समूहों में वर्गीकृत किया गया है, जिनमें 12 प्रमुख तथा 8 संयुक्त नदी बेसिन सम्मिलित हैं।
- 20,000 वर्ग किमी. से अधिक अपवाह क्षेत्र वाले प्रमुख नदी बेसिनों में सिंधु, गंगा–ब्रह्मपुत्र–मेघना, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, महानदी, पेन्नार, ब्राह्मणी–वैतरणी, साबरमती, माही, नर्मदा तथा ताप्ती सम्मिलित हैं।
- गंगा–ब्रह्मपुत्र–मेघना बेसिन सर्वाधिक विशाल है, जिसका जलग्रहण क्षेत्र लगभग 11.0 लाख वर्ग किमी. है, जो प्रमुख नदियों के कुल जलग्रहण क्षेत्रफल का 43% से अधिक है।
- मध्यम नदी बेसिनों का जलग्रहण क्षेत्र 2,000 से 20,000 वर्ग किमी. के बीच होता है, जबकि लघु बेसिन 2,000 वर्ग किमी. से कम क्षेत्रफल वाले होते हैं।
- 8 समेकित (कॉम्पोज़िट) बेसिन छोटे-छोटे नदी समूहों को मिलाकर बनाए गए हैं, जैसे—सुवर्णरेखा समूह, प्रमुख बेसिनों के बीच पूर्व की ओर बहने वाली नदियाँ, कच्छ और सौराष्ट्र की पश्चिम की ओर बहने वाली नदियाँ (जिसमें लूनी शामिल है), तापी से कन्याकुमारी तक की तटीय नदियाँ तथा राजस्थान के अंतर्देशीय जल निकासी क्षेत्र।
- विशेष रूप से, सभी प्रमुख नदी बेसिन और कई मध्यम बेसिन अंतर-राज्यीय प्रकृति के हैं, जो मिलकर भारत के लगभग 81% भौगोलिक क्षेत्र में फैले हुए हैं।
- 20,000 वर्ग किमी. से अधिक अपवाह क्षेत्र वाले प्रमुख नदी बेसिनों में सिंधु, गंगा–ब्रह्मपुत्र–मेघना, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, महानदी, पेन्नार, ब्राह्मणी–वैतरणी, साबरमती, माही, नर्मदा तथा ताप्ती सम्मिलित हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. नदी बेसिन प्रबंधन (RBM) योजना क्या है?
यह एक केंद्रीय क्षेत्र की योजना है जिसका उद्देश्य नदी बेसिन स्तर पर सतही और भूजल संसाधनों की एकीकृत योजना और सतत प्रबंधन करना है।
2. RBM योजना को कौन-सी संस्थाएँ लागू करती हैं?
इसे ब्रह्मपुत्र बोर्ड, केंद्रीय जल आयोग (CWC) और राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी (NWDA) के माध्यम से लागू किया जाता है।
3. RBM के तहत प्राथमिकता वाले नदी बेसिन कौन-से हैं?
मुख्य बेसिनों में ब्रह्मपुत्र, बराक, तीस्ता और सिंधु शामिल हैं, जिनमें विशेष रूप से पूर्वोत्तर और हिमालयी क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
4. RBM योजना के तहत NWDA की क्या भूमिका है?
NWDA नदियों को आपस में जोड़ने (ILR), व्यवहार्यता अध्ययन और अंतर-बेसिन जल हस्तांतरण की योजना बनाने का कार्य सँभालता है।
5. RBM योजना का क्या महत्त्व है?
यह जल सुरक्षा, बाढ़ नियंत्रण, पारिस्थितिक स्थिरता और क्षेत्रीय विकास को सुदृढ़ करती है, विशेष रूप से संवेदनशील और सीमावर्ती क्षेत्रों में।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रारंभिक परीक्षा:
प्रश्न. सिंधु नदी प्रणाली के संदर्भ में निम्नलिखित चार नदियों में से तीन उनमें से एक में मिलती हैं, जो अंततः सीधे सिंधु में मिलती हैं। निम्नलिखित में से कौन-सी ऐसी नदी है जो सीधे सिंधु से मिलती है?
(a) चिनाब
(b) झेलम
(c) रावी
(d) सतलज
उत्तर: (d)
मेन्स:
प्रश्न: नमामि गंगे और राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) कार्यक्रमों पर और इससे पूर्व की योजनाओं से मिश्रित परिणामों के कारणों पर चर्चा कीजिये। गंगा नदी के परिरक्षण में कौन-सी प्रमात्रा छलांगे, क्रमिक योगदानों की अपेक्षा ज़्यादा सहायक हो सकती हैं? (2015)

