भारत-UAE विकास गलियारे की प्रगति | 19 Feb 2026

यह एडिटोरियल 16/02/2026 को द हिंदू में प्रकाशित ‘The UAE-India corridor is sparking a growth story’ शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख भारत-UAE संबंधों की उल्लेखनीय प्रगति को दर्शाता है, जिसमें साझेदारी ने CEPA के तहत ऊर्जा-केंद्रित सहयोग से आगे बढ़कर, निर्धारित समय से पाँच वर्ष पहले ही 100 अरब डॉलर के व्यापार का लक्ष्य पार कर लिया है।

प्रिलिम्स के लिये: भारत–UAE CEPA, स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR), हिंद महासागर क्षेत्र, भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC), ब्रिक्स की अध्यक्षता, I2U2 (भारत, इज़रायल, UAE, अमेरिका)

मेन्स के लिये: भारत-UAE संबंधों में प्रमुख समानता के क्षेत्र, भारत-UAE संबंधों में प्रमुख मतभेद के क्षेत्र।

भारत–संयुक्त अरब अमीरात आर्थिक साझेदारी ने तीव्र प्रगति के एक नए चरण में प्रवेश किया है और वर्ष 2022 के CEPA के अंतर्गत निर्धारित समय से पाँच वर्ष पूर्व ही 100 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार लक्ष्य को प्राप्त कर लिया है। प्रारंभ में ऊर्जा-केंद्रित सहयोग के रूप में विकसित यह संबंध अब उन्नत विनिर्माण, अवसंरचना, वित्त, प्रौद्योगिकी, नवीकरणीय ऊर्जा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता को समाहित करते हुए एक विविधीकृत आर्थिक गलियारे का रूप ले चुका है। व्यापक द्विपक्षीय निवेश, प्रवासी भारतीय समुदाय से गहन संबंध तथा CEPA और द्विपक्षीय निवेश संधि जैसे सुदृढ़ संस्थागत ढाँचे ने दीर्घकालिक रणनीतिक विश्वास को और सुदृढ़ किया है। यह गलियारा अब अफ्रीका और यूरेशिया के तृतीय बाज़ारों तक भी विस्तार कर रहा है, जो इसकी वैश्विक महत्त्वाकांक्षा को रेखांकित करता है। भारत के 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के रूप में उभरने की प्रक्रिया में, भारत–UAE संधि यह प्रतिपादित करती है कि किस प्रकार नीतिगत समन्वय, पूंजी प्रवाह और प्रभावी कार्यान्वयन क्षेत्रीय तथा वैश्विक आर्थिक संरचनाओं के पुनर्गठन में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

भारत-UAE संबंधों में प्रमुख समानता के क्षेत्र कौन-से हैं? 

  • आर्थिक कूटनीति और आपूर्ति शृंखला एकीकरण: भारत और UAE ने परंपरागत लेन-देन आधारित वस्तु व्यापार से आगे बढ़कर संस्थागत आर्थिक एकीकरण की दिशा अपनाई है, जिसका उद्देश्य दोनों अर्थव्यवस्थाओं को वैश्विक आपूर्ति शृंखला अस्थिरताओं से संरक्षित करना है। 
    • उदाहरणस्वरूप, CEPA के प्रभावी कार्यान्वयन से वित्त वर्ष 2024-25 में द्विपक्षीय व्यापार 100 अरब डॉलर के स्तर को पार कर सका, जिसके आधार पर जनवरी 2026 में वर्ष 2032 तक 200 अरब डॉलर का नया लक्ष्य निर्धारित किया गया। 
      • इसके अतिरिक्त, दोनों देशों के मध्य गैर-तेल व्यापार में गत वर्ष लगभग 20% की वृद्धि होकर यह 65 अरब डॉलर तक पहुँच गया, जो दर्शाता है कि यह साझेदारी अपने ऊर्जा संबंधों से कहीं आगे बढ़ चुकी है।
  • ऊर्जा सुरक्षा और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण: द्विपक्षीय ऊर्जा सहयोग अब केवल कच्चे तेल पर आधारित क्रेता–विक्रेता संबंध न रहकर ऊर्जा संक्रमण, रणनीतिक भंडारण तथा उन्नत परमाणु सहयोग को समाहित करने वाली व्यापक साझेदारी में रूपांतरित हो चुका है। 
    • जनवरी 2026 में संपन्न 10-वर्षीय समझौते के अंतर्गत UAE, वर्ष 2028 से प्रतिवर्ष 0.5 मिलियन टन LNG की आपूर्ति भारत को करेगा, जिससे स्पॉट बाज़ारों पर निर्भरता में उल्लेखनीय कमी आएगी। 
      • साथ ही वर्ष 2025 के शांति अधिनियम के पश्चात दोनों पक्ष स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) तथा हरित हाइड्रोजन मूल्य शृंखलाओं में संयुक्त निवेश की संभावनाओं का अन्वेषण कर रहे हैं।
  • अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी एवं डिजिटल अंतरनिर्भरता: डिजिटल क्षेत्र में सहयोग, उच्च स्तरीय तकनीकी अंतरनिर्भरता की ओर एक सुनियोजित संक्रमण का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें डेटा सॉवरेनिटी, सीमा-पार डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और संयुक्त एयरोस्पेस नवाचार को प्राथमिकता दी जाती है। 
    • भारत के विशाल IT प्रतिभा भंडार को UAE की संप्रभु संपदा और रणनीतिक दृष्टि के साथ संयोजित कर यह साझेदारी एक ऐसे प्रौद्योगिकीय पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण कर रही है, जो चौथी औद्योगिक क्रांति में नेतृत्वकारी भूमिका निभाने में सक्षम है।
    • C-DAC और G42 के बीच 2026 में हुए एक ऐतिहासिक समझौते के तहत भारत में एक विशाल सुपरकंप्यूटिंग क्लस्टर स्थापित किया जाएगा।
      • इसके अलावा, IN-SPACe और UAE अंतरिक्ष एजेंसी ने हाल ही में वाणिज्यिक प्रक्षेपण सुविधाओं को संयुक्त रूप से विकसित करने के लिये एक आशय-पत्र पर हस्ताक्षर किये हैं।
  • सामरिक रक्षा और समुद्री सुरक्षा: रक्षा सहयोग अब सीमित संयुक्त अभ्यासों से आगे बढ़कर एक सुदृढ़ सुरक्षा ढाँचे में रूपांतरित हो चुका है, जिसका उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में स्थिरता सुनिश्चित करना तथा उभरते अंतर्राष्ट्रीय खतरों का प्रतिकार करना है। 
    • दोनों देश रणनीतिक स्वायत्तता की समान आवश्यकता साझा करते हैं और क्षेत्रीय अस्थिरता, समुद्री डकैती तथा सीमा-पार आतंकवाद के विरुद्ध एक-दूसरे को अपरिहार्य भागीदार के रूप में देखते हैं। 
      • जनवरी 2026 की उच्च स्तरीय यात्रा का समापन एक औपचारिक रणनीतिक रक्षा साझेदारी हेतु महत्त्वपूर्ण आशय-पत्र पर हस्ताक्षर के साथ हुआ।
      • UAE स्थित काराकल (एज ग्रुप के अंतर्गत) तथा भारत की आईकॉम टेली लिमिटेड के संयुक्त उपक्रम द्वारा हैदराबाद में स्थापित लघु शस्त्र निर्माण इकाई भारत के रक्षा औद्योगिक परिदृश्य में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।
  • कनेक्टिविटी एवं अंतरमहाद्वीपीय गलियारे (IMEC): भारत और यूएई, भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) को समर्थन देकर क्षेत्रीय भूगोल को पुनर्परिभाषित कर रहे हैं और स्वयं को एक नवीन यूरेशियन व्यापार संरचना के केंद्रीय नोड के रूप में स्थापित कर रहे हैं। 
    • बंदरगाह संपर्क के संस्थानीकरण से एक नियम-आधारित एवं लचीली आपूर्ति शृंखला विकसित हो रही है, जो ग्लोबल साउथ को यूरोपीय उपभोक्ता बाज़ारों से स्थायी रूप से जोड़ती है। 
      • इसके अलावा, भारत-अफ्रीका सेतु पहल का उद्देश्य UAE को भारतीय उत्पादों, विशेष रूप से लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) के लिये अफ्रीकी बाज़ारों में प्रवेश करने के लिये एक रणनीतिक प्रवेश द्वार के रूप में स्थापित करना है।
  • वित्तीय संरचना और फिनटेक अंतरसंचालनीयता: द्विपक्षीय वित्तीय सहयोग अब निर्णायक रूप से डॉलर निर्भरता से हटकर संप्रभु फिनटेक एकीकरण की दिशा में अग्रसर है, जिससे सीमा-पार व्यापार एवं प्रेषण हेतु एक कम-लागत, निर्बाध पारिस्थितिकी तंत्र विकसित हो रहा है। 
    • दोनों देशों की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचनाओं के प्रत्यक्ष संयोजन से वास्तविक समय की वित्तीय अंतरसंचालनीयता का एक अग्रणी वैश्विक मानक स्थापित हुआ है। 
      • UPI–ANI प्लेटफॉर्म के एकीकरण तथा रुपे–जयवान कार्ड नेटवर्क के अंतर्संबंध ने प्रेषण गलियारे को संरचनात्मक रूप से सुव्यवस्थित किया है।
  • बहुपक्षवाद और बहुपक्षीय गठबंधन (ब्रिक्स+ और I2U2): रणनीतिक सहयोग द्विपक्षीय सीमाओं से परे, बहुपक्षीय ढाँचों में समन्वित नेतृत्व के रूप में प्रकट होता है, जिसका उद्देश्य वैश्विक शासन संरचनाओं में सुधार करना है। 
    • विस्तारित मंचों पर संयुक्त कूटनीतिक प्रभाव से भारत और यूएई ग्लोबल साउथ की आवाज़ को सशक्त करते हुए बहुध्रुवीयता तथा न्यायसंगत वित्तीय संस्थानों के पक्ष में दबाव बनाते हैं। 
    • जनवरी 2026 में भारत द्वारा आधिकारिक तौर पर ब्रिक्स की अध्यक्षता ग्रहण करने के साथ ही, संयुक्त अरब अमीरात, जो अब एक पूर्ण रूप से एकीकृत सदस्य है, ने नई दिल्ली के लचीलेपन और नवाचार के एजेंडे को व्यापक समर्थन देने की प्रतिबद्धता जताई। 
      • साथ ही I2U2 (भारत–इज़रायल–UAE–अमेरिका) समूह के अंतर्गत अंतर-क्षेत्रीय कृषि आपूर्ति शृंखलाओं को सुदृढ़ करने हेतु, UAE द्वारा भारत में जलवायु-स्मार्ट एकीकृत खाद्य पार्कों के विकास के लिये की गई 2 अरब डॉलर की प्रतिबद्धता को सक्रिय रूप से कार्यान्वित किया जा रहा है।
  • संप्रभु संपदा और संस्थागत निवेश: निवेश प्रवृत्तियाँ अब निष्क्रिय पोर्टफोलियो आवंटन से आगे बढ़कर भारत के बुनियादी ढाँचे तथा उच्च-प्रौद्योगिकी विनिर्माण क्षेत्रों में लक्षित, दीर्घकालिक संप्रभु संपदा निवेश में रूपांतरित हो गई हैं।
    • संयुक्त अरब अमीरात भारत की तीव्र आर्थिक संवृद्धि को अपने तेल-आधारित अधिशेष के विविधीकरण हेतु एक सुरक्षित एवं उच्च-प्रतिफल मंच के रूप में देखता है। 
    • जनवरी 2026 के द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री ने आगामी द्वितीय NIIF इंफ्रास्ट्रक्चर फंड में भाग लेने के लिये UAE के संप्रभु संपदा कोषों को सक्रिय रूप से आमंत्रित किया। 
      • इस संस्थागत ढाँचे को और सुदृढ़ करते हुए, यूएई ने गुजरात के धोलेरा विशेष निवेश क्षेत्र में व्यापक निवेश करने की प्रतिबद्धता भी व्यक्त की है।

भारत-UAE संबंधों में मतभेद के प्रमुख क्षेत्र कौन-से हैं?

  • संरचनात्मक व्यापार असंतुलन और CEPA का सीमित उपयोग: व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (CEPA) के क्रियान्वयन के बावजूद, एक स्थायी संरचनात्मक व्यापार असंतुलन विद्यमान है, जो आर्थिक गलियारे को विविध विनिर्माण की अपेक्षा ऊर्जा-आधारित निर्भरता की ओर उन्मुख बनाए रखता है।
    • यह प्रवृत्ति द्विपक्षीय व्यापार प्रवाह में अवरोध उत्पन्न करती है, जिसके परिणामस्वरूप नई दिल्ली को घरेलू उद्योगों को अप्रत्यक्ष डंपिंग से संरक्षण देने हेतु नियामक निगरानी को क्रमशः कठोर करना पड़ता है।
    • वित्त वर्ष 2024-25 में, कुल द्विपक्षीय व्यापार के 100 अरब डॉलर के स्तर को पार करने के बावजूद, कच्चे तेल पर निरंतर निर्भरता के कारण भारत का व्यापार घाटा 26.8 अरब डॉलर पर उच्च बना रहा।
      • इसके अतिरिक्त, UAE मार्ग से सोने और चाँदी के आयात में आकस्मिक वृद्धि ने CEPA के मूल नियमों के अनुपालन को सुनिश्चित करने हेतु भारतीय नियामक हस्तक्षेप को बार-बार आवश्यक बनाया है।
  • भू-राजनीतिक भेद्यता और IMEC का अवरोध: पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक अस्थिरता द्विपक्षीय कनेक्टिविटी आकांक्षाओं के लिये एक प्रमुख बाधा उत्पन्न करती है, जो भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) जैसी परस्पर पूरक मेगा-परियोजनाओं की व्यवहार्यता को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है।
    • परिणामस्वरूप, रणनीतिक स्वायत्तता के लिये नई दिल्ली की आवश्यकता प्रायः UAE के जटिल क्षेत्रीय संतुलन से असंगत होती है, विशेष रूप से इज़रायल-गाज़ा युद्ध और लाल सागर में समुद्री सुरक्षा के संबंध में।
      • गाज़ा में जारी संघर्ष के कारण वर्ष 2023 के उत्तरार्द्ध से IMEC नेटवर्क के UAE–इज़रायल खंड का संचालन प्रभावी रूप से बाधित रहा है, जिससे भौतिक अवसंरचना का एकीकरण रुक गया है।
      • इस परिचालन संबंधी विसंगति को उजागर करते हुए, भारत द्वारा वर्ष 2026 की शुरुआत तक लाल सागर में 40 युद्धपोतों की निरंतर तैनाती अमीराती नौसैनिक संपत्तियों से पूरी तरह स्वतंत्र रूप से कार्य करती रही है, जो वास्तविक सैन्य एकीकरण के बजाय समानांतर समन्वय की वास्तविकता को दर्शाती है।
  • प्रवासी श्रमिकों की कमज़ोरियाँ और 'अमीरातीकरण': संबंधों की जनसांख्यिकीय रीढ़— विशाल भारतीय प्रवासी कार्यबल प्रणालीगत श्रम असुरक्षाओं और संयुक्त अरब अमीरात की बदलती घरेलू रोज़गार नीतियों के कारण एक निहित कूटनीतिक दबाव-बिंदु बना हुआ है।
    • हालाँकि हालिया सुधारों ने कफाला प्रायोजन ढाँचे को आधुनिक बनाने का प्रयास किया है, लेकिन वेतन की चोरी, कार्यस्थल पर अपर्याप्त सुरक्षा एवं शोषणकारी अनुबंध शर्तों के लगातार मुद्दे प्रवासी श्रमिकों की भारी परेशानी का कारण बनते रहते हैं। 
    • साथ ही अबू धाबी द्वारा लागू सख्त 'एमिराटाइज़ेशन' कोटा भारतीय श्वेतपोश प्रवासी समुदाय के लिये दीर्घकालिक रोज़गार असुरक्षा उत्पन्न करते हैं, जो श्रम-आयात आधारित मॉडल से एक अधिक संरक्षणवादी घरेलू बाज़ार की ओर क्रमिक संक्रमण का संकेत देते हैं।
      • वर्ष 2026 की शुरुआत में भारतीय संसद को प्रस्तुत आधिकारिक आँकड़ों से पता चला कि UAE में MADAD पोर्टल पर 1,500 से अधिक पंजीकृत श्रम शिकायतें दर्ज की गईं, जिससे यह विदेशों से आने वाली संकटकालीन शिकायतों का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत बन गया। 
  • चीन का प्रभाव और प्रौद्योगिकी अंतरण की सीमाएँ: संयुक्त अरब अमीरात का चीन के साथ बढ़ता तकनीकी और वाणिज्यिक संबंध एक सूक्ष्म लेकिन महत्त्वपूर्ण रणनीतिक मतभेद उत्पन्न करता है, जो संवेदनशील प्रौद्योगिकी अंतरण एवं संयुक्त रक्षा विनिर्माण के संबंध में भारत की गणना को सीधे तौर पर जटिल बनाता है। 
    • जैसे-जैसे नई दिल्ली सुरक्षित, संप्रभु डिजिटल बुनियादी ढाँचे का निर्माण करने तथा बीजिंग के क्षेत्रीय प्रभाव को सीमित करने की कोशिश कर रही है, अबू धाबी की चीनी राज्य से जुड़ी संस्थाओं को अपने दूरसंचार और लॉजिस्टिक्स केंद्रों में एकीकृत करने की इच्छा एक गंभीर सुरक्षा दुविधा उत्पन्न करती है। 
    • खलीफा इकॉनोमिक ज़ोन अबू धाबी (KEZAD) में चीनी फर्मों द्वारा किये गए व्यापक निवेश और संयुक्त AI उद्यमों ने बहुपक्षीय I2U2 ढाँचे के भीतर आपूर्ति शृंखला सुरक्षा के संबंध में लगातार चिंताएँ उत्पन्न की हैं।
  • बहुपक्षीय विवाद एवं इस्लामिक सहयोग संगठन–पाकिस्तान समीकरण: यद्यपि द्विपक्षीय संबंध अभूतपूर्व ऊँचाइयों पर पहुँच चुके हैं, फिर भी इस्लामिक सहयोग संगठन में संयुक्त अरब अमीरात की भूमिका और पाकिस्तान के साथ उसके ऐतिहासिक संतुलन के कारण एक संरचनात्मक कूटनीतिक असंगति बनी हुई है।
    • इस स्थिति के कारण भारत को द्विपक्षीय सौहार्द को बहुपक्षीय मंचों पर होने वाली निंदा से अलग रखने के लिये निरंतर कूटनीतिक संसाधन व्यय करने पड़ते हैं, जिससे इस्लामिक समूहों के भीतर भारत-विरोधी वक्तव्यों को एकतरफा रूप से निष्प्रभावी करने की संयुक्त अरब अमीरात की सीमित इच्छा उजागर होती है।
      • इसके अतिरिक्त, सऊदी अरब के साथ पाकिस्तान का समवर्ती रक्षा समझौता यह सुनिश्चित करता है कि संयुक्त अरब अमीरात को एक सूक्ष्म क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखना पड़े, न कि भारत और पाकिस्तान के बीच पूर्ण पृथक्करण की नीति अपनानी पड़े।  

भारत संयुक्त अरब अमीरात के साथ अपने संबंधों को मज़बूत करने के लिये कौन-से उपाय अपना सकता है? 

  • सॉवरेन डेटा कॉरिडोर और डिजिटल दूतावासों का संचालन: भारत को महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय बुनियादी ढाँचे की रक्षा करने वाले पारस्परिक रूप से मान्यता प्राप्त, सॉवरेन डेटा कॉरिडोर स्थापित करने के लिये प्रस्तावित 'डिजिटल दूतावास' ढाँचे के संचालन में तेज़ी लानी चाहिये।
    • सख्त डेटा स्थानीयकरण मानकों और साझा साइबर सुरक्षा प्रोटोकॉल को संस्थागत रूप देकर, दोनों राष्ट्र संवेदनशील सीमावर्ती प्रौद्योगिकियों में अपने एकीकरण को सुरक्षित रूप से गहन कर सकते हैं।  
    • इसके लिये संयुक्त सुपरकंप्यूटिंग क्लस्टरों की त्वरित स्थापना आवश्यक है, जिसमें भारत की व्यापक कृत्रिम बुद्धिमत्ता अभियांत्रिकी प्रतिभा और संयुक्त अरब अमीरात के संप्रभु पूँजी पारिस्थितिकी तंत्र के बीच समन्वय का लाभ उठाया जा सके।
  • रक्षा-औद्योगिक सह-उत्पादन को संस्थागत रूप देना: रणनीतिक रक्षा साझेदारी को वास्तविक रूप देने के लिये भारत को केवल मानक अंतर-संचालनीय अभ्यासों तक सीमित रहने के बजाय गहन रक्षा-औद्योगिक सह-उत्पादन की ओर निर्णायक रूप से अग्रसर होने की आवश्यकता है
    • इसके लिये त्वरित और पारस्परिक प्रौद्योगिकी अंतरण ढाँचों की स्थापना आवश्यक है, जिससे संयुक्त अरब अमीरात स्थित उन्नत प्रौद्योगिकी समूह भारतीय रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों के साथ मिलकर गतिज प्लेटफॉर्मों का सह-विकास कर सकें।
    • नई दिल्ली को संयुक्त अरब अमीरात को अपनी व्यापक घरेलू रक्षा आपूर्ति शृंखलाओं में भी एकीकृत करना चाहिये, ताकि एमिरेट्स को संयुक्त रूप से निर्मित रक्षा उपकरणों के तृतीय देशों में निर्यात हेतु एक रणनीतिक मंच के रूप में उपयोग किया जा सके।
  • ग्लोबल साउथ में बहुपक्षीय भू-आर्थिक विस्तार: भारत को ग्लोबल साउथ में संरचनात्मक विकासात्मक परियोजनाओं को संयुक्त रूप से क्रियान्वित करने के लिये संयुक्त अरब अमीरात के व्यापक भू-आर्थिक प्रभाव का रणनीतिक रूप से लाभ उठाना चाहिये, जिससे द्विपक्षीय सीमाओं से परे जाकर एक बहुपक्षीय विकास मॉडल की ओर बढ़ा जा सके। 
    • नवप्रस्तावित 'भारत-अफ्रीका सेतु' जैसे ढाँचों को सक्रिय रूप से लागू करके, दोनों देश उभरते अफ्रीकी और यूरेशियन बाज़ारों पर प्रभुत्व स्थापित करने के लिये भारतीय विनिर्माण पैमाने एवं अमीराती लॉजिस्टिकल क्षमता का समन्वय कर सकते हैं। 
    • इस त्रिपक्षीय दृष्टिकोण के लिये जलवायु-सहिष्णु कृषि से लेकर सतत हरित ऊर्जा गलियारों तक के क्षेत्रों में भारत की परियोजना निष्पादन क्षमताओं के साथ UAE के संप्रभु धन कोषों के संरेखण की आवश्यकता है। 
  • निर्बाध वित्तीय प्रौद्योगिकी समन्वय और डॉलर-निर्भरता में कमी: अपने आर्थिक समझौतों की उपयोगिता को अधिकतम करने के लिये, भारत को तत्काल सीमा पार पूंजी प्रवाह को सुविधाजनक बनाने के लिये द्विपक्षीय फिनटेक संरचनाओं के पूर्ण, निर्बाध सामंजस्य को प्राथमिकता देनी चाहिये। 
    • स्थानीय मुद्रा निपटान प्रणाली के संरचनात्मक विस्तार के माध्यम से भारत द्विपक्षीय व्यापार में डॉलर-निर्भरता को प्रभावी ढंग से कम कर सकता है, जिससे दोनों अर्थव्यवस्थाएँ बाह्य मुद्रा अस्थिरता और एकपक्षीय वित्तीय प्रतिबंधों से काफी हद तक सुरक्षित रह सकें।
    • इसके अतिरिक्त, नई दिल्ली को अपने विशेषीकृत वित्तीय प्रौद्योगिकी शहरों में विनियामक ढाँचों को सुव्यवस्थित कर एमिरेट्स के संस्थागत निवेशकों के लिये अनुकूल और त्वरित निवेश मार्ग उपलब्ध कराने चाहिये।  
  • एकीकृत खाद्य सुरक्षा और कृषि प्रौद्योगिकी गलियारे: क्षेत्रीय आपूर्ति शृंखला की लगातार बनी रहने वाली कमज़ोरियों को संरचनात्मक रूप से हल करने के लिये, भारत और UAE को एक एकीकृत, जलवायु-अनुकूल खाद्य सुरक्षा गलियारे को चालू करना चाहिये। 
    • इसके लिये पारंपरिक थोक कृषि निर्यात से हटकर भारत के भीतर उन्न, AI-संचालित मेगा फूड पार्कों के सह-विकास की ओर संक्रमण करना आवश्यक हो जाता है, जो पूरी तरह से अमीराती संप्रभु निवेश द्वारा समर्थित हो। 
    • इसके अतिरिक्त, शुष्क जलवायु में खेती और विलवणीकरण के लिये संयुक्त कृषि प्रौद्योगिकी अनुसंधान में संसाधनों को एकत्रित करने से जल संकट एवं मृदा क्षरण के आसन्न वैश्विक संकटों से एक साथ निपटा जा सकेगा। 
  • महत्त्वपूर्ण खनिजों और उन्नत पदार्थों में रणनीतिक समन्वय: वैश्विक ऊर्जा परिवर्तन में प्रभुत्व हासिल करने के लिये, भारत और UAE को महत्त्वपूर्ण दुर्लभ मृदा खनिजों के अधिग्रहण एवं प्रसंस्करण के लिये एक एकीकृत संघ स्थापित करना चाहिये। 
    • इस रणनीतिक संसाधन अधिग्रहण को भारतीय विशेष आर्थिक क्षेत्रों के भीतर उन्नत धातुकर्म प्रसंस्करण केंद्रों और पदार्थ विज्ञान अनुसंधान केंद्रों के सह-विकास के साथ तुरंत जोड़ा जाना चाहिये।
    • इसके अलावा, अगली पीढ़ी के पदार्थ विज्ञान के लिये एक साझा बौद्धिक संपदा भंडार की स्थापना स्वदेशी सेमीकंडक्टर, एयरोस्पेस और बैटरी विनिर्माण में दोनों देशों की संयुक्त महत्त्वाकांक्षाओं को तीव्र गति प्रदान करेगी।

निष्कर्ष: 

भारत-UAE साझेदारी आज विश्वास और आर्थिक तालमेल पर आधारित व्यावहारिक, भविष्योन्मुखी कूटनीति का एक आदर्श उदाहरण है। यह दर्शाता है कि रणनीतिक संरेखण, नीतिगत स्थिरता और मानवीय संबंध द्विपक्षीय संबंधों को वैश्विक विकास गलियारे में किस प्रकार परिणत कर सकते हैं। रक्षा, प्रौद्योगिकी, ऊर्जा और तृतीय बाज़ारों में सहयोग का विस्तार करते हुए, यह संबंध लेन-देन संबंधी समन्वय से संरचनात्मक एकीकरण की ओर बढ़ रहा है। आने वाला चरण महत्त्वाकांक्षा की नहीं, बल्कि इस रणनीतिक अभिसरण की गहराई और दीर्घकालिक स्थायित्व की परीक्षा होगा।

दृष्टि मेन्स का प्रश्न: 

भारत-UAE साझेदारी ऊर्जा-केंद्रित संबंध से विकसित होकर एक व्यापक रणनीतिक और आर्थिक गलियारे में परिवर्तित हो गई है। इस परिवर्तन के प्रमुख प्रेरक तत्त्वों का विश्लेषण कीजिये तथा भारत की आर्थिक संवृद्धि, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा सहयोग और पश्चिम एशिया एवं अफ्रीका से संबंध मज़बूत करने के संदर्भ में इसके महत्त्व पर चर्चा कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न: 

प्रश्न 1. प्रश्न 1. CEPA के तहत भारत-UAE संबंध कैसे ऊर्जा-केंद्रित लेन-देन से व्यापक रणनीतिक और आर्थिक गलियारे में परिवर्तित हुए हैं? 
यह संबंध कच्चे तेल के व्यापार से आगे बढ़कर विनिर्माण, फिनटेक, रक्षा उत्पादन, एआई, लॉजिस्टिक्स और तृतीय-बाज़ार पहुँच में गहन एकीकरण की ओर अग्रसर हुआ है, जिसे CEPA, द्विपक्षीय निवेश संधि और रणनीतिक रक्षा ढाँचों के माध्यम से संस्थागत रूप दिया गया है।

प्रश्न 2. 21वीं सदी में भारत-UAE साझेदारी को संचालित करने वाले प्रमुख रणनीतिक अभिसरण क्या हैं? 
इसमें प्रमुख रूप से आपूर्ति शृंखला एकीकरण, स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना अंतरसंचालनीयता, IMEC कनेक्टिविटी, संप्रभु संपदा निवेश, रक्षा सह-उत्पादन और ब्रिक्स+ तथा I2U2 जैसे बहुपक्षीय मंचों में समन्वय शामिल हैं।

प्रश्न 3. भारत-UAE संबंधों को कौन-से संरचनात्मक अवरोध निरंतर प्रभावित कर रहे हैं? 
इसमें व्यापार असंतुलन, IMEC को प्रभावित करने वाली पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक अस्थिरता, अमीरातीकरण के तहत प्रवासी श्रमिकों की असुरक्षा, प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र में चीन का प्रभाव और OIC-पाकिस्तान समीकरण से जुड़ी बहुपक्षीय संवेदनशीलताएँ अंतर्निहित बाधाएँ बनी हुई हैं।

प्रश्न 4. भारत-UAE साझेदारी भारत के ग्लोबल साउथ और बहुध्रुवीय महत्त्वाकांक्षाओं के लिये रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण क्यों है? 
यह गलियारा अफ्रीका और यूरेशिया के प्रवेश द्वार के रूप में कार्य करता है, डॉलर-मुक्त वित्तीय संरचना को सुदृढ़ करता है, ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा सहयोग को बढ़ाता है तथा बहुपक्षीय मंचों में भारत के प्रभाव को सुदृढ़ कर बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को आकार देने में योगदान देता है।

प्रश्न 5. भारत-UAE साझेदारी को गहरा और भविष्य के लिये सुरक्षित बनाने के लिये भारत किन नीतिगत उपायों को अपना सकता है? 
भारत को रक्षा-औद्योगिक सह-उत्पादन को संस्थागत करना, सार्वभौमिक डिजिटल गलियारों का निर्माण, स्थानीय मुद्रा समायोजन तंत्र का विस्तार, खाद्य और महत्त्वपूर्ण खनिज मूल्य शृंखलाओं का सह-विकास और बुनियादी ढाँचे व उच्च-तकनीकी विनिर्माण विस्तार के लिये UAE की संप्रभु संपदा का लाभ उठाना चाहिये

 

UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ) 

प्रिलिम्स:

प्रश्न 1. निम्नलिखित में से कौन 'खाड़ी सहयोग परिषद' का सदस्य नहीं है? (2016)

(a) ईरान
(b) ओमान
(c) सऊदी अरब
(d) कुवैत

उत्तर: (a)


प्रश्न 2 . निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2008)

  1. अजमान UAE के सात अमीरातों में से एक है। 
  2. रास अल-खैमाह UAE में शामिल होने वाला अंतिम शेख-राज्य था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (c)


मेन्स 

प्रश्न. भारत की ऊर्जा सुरक्षा का प्रश्न भारत की आर्थिक प्रगति का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भाग है। पश्चिम एशियाई देशों के साथ भारत के ऊर्जा नीति सहयोग का विश्लेषण कीजिये। (2017)