रुपये के अंतर्राष्ट्रीयकरण के लिये भारत के प्रयास | 14 Apr 2026
यह एडिटोरियल 04/04/2026 को द हिंदू बिज़नेस लाइन में प्रकाशित “Time to push for rupee internationalisation” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह एडिटोरियल रुपये के अंतर्राष्ट्रीयकरण की बहुआयामी रणनीति का विश्लेषण प्रस्तुत करता है तथा डॉलर की अस्थिरता एवं भू-राजनीतिक प्रतिबंधों से भारत को आंशिक सुरक्षा प्रदान करने की इसकी क्षमता का परीक्षण करता है। यह मौद्रिक स्वायत्तता की हानि और घरेलू वित्तीय बाज़ारों को सुदृढ़ करने की आवश्यकता जैसे संरचनात्मक जोखिमों के संदर्भ में डॉलर-मुक्ति के रणनीतिक लाभों का तुलनात्मक मूल्यांकन भी करता है।
प्रिलिम्स के लिये: विशेष रुपी वोस्ट्रो खाता, पूंजी खाता परिवर्तनीयता, विशेष आहरण अधिकार, मुद्रा विनिमय समझौता।
मेन्स के लिये: रुपये का अंतर्राष्ट्रीयकरण, रुपये के अंतर्राष्ट्रीयकरण के प्रमुख लाभ, रुपये के अंतर्राष्ट्रीयकरण से जुड़े प्रमुख मुद्दे।
भारतीय रुपया के अमेरिकी डॉलर के सापेक्ष लगभग 95 रुपये के स्तर के निकट पहुँचने के साथ ही बाह्य असुरक्षा को लेकर चिंताओं ने इसके वैश्वीकरण को गति प्रदान की है। वहीं, वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार में अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी घटकर लगभग 57-58% हो गई है, जो डॉलर के प्रभाव में धीरे-धीरे कमी का संकेत है। इस संदर्भ में, भारत द्वारा रुपया-आधारित व्यापार निपटान तंत्र का क्रियान्वयन एक महत्त्वपूर्ण पहल के रूप में उभर रहा है। इस बदलते वैश्विक मौद्रिक परिदृश्य में, मुद्रा स्थिरता बढ़ाने, बाहरी जोखिमों को कम करने और भारत की वैश्विक आर्थिक उपस्थिति को मज़बूत करने के लिये रुपये का अंतर्राष्ट्रीयकरण एक रणनीतिक आवश्यकता के रूप में उभर रहा है।
रुपये का अंतर्राष्ट्रीयकरण क्या है?
- परिचय: भारतीय रुपया (INR) का अंतर्राष्ट्रीयकरण भारत की व्यापक आर्थिक रणनीति में एक महत्त्वपूर्ण संरचनात्मक परिवर्तन का द्योतक है, जो मुद्रा को विशुद्ध रूप से घरेलू विनिमय माध्यम से बदलकर वैश्विक स्तर पर व्यापार बिलिंग, निवेश और आरक्षित निधि धारण के लिये उपयोग किये जाने वाले माध्यम में परिवर्तित करता है।
- मूल रूप से, मुद्रा का अंतर्राष्ट्रीयकरण किसी मुद्रा के राष्ट्रीय सीमाओं से परे उसके उपयोग का स्वाभाविक या नीति-प्रेरित विस्तार है। यह प्रक्रिया आमतौर पर तीन क्रमिक चरणों में संपन्न होती है:
- चालू खाता (व्यापारिक बिलिंग): सीमा-पार व्यापार (आयात-निर्यात) का निपटान अमेरिकी डॉलर (USD) जैसी मध्यवर्ती मुद्रा के स्थान पर भारतीय रुपये (INR) में करना।
- पूंजी खाता (निवेश): गैर-निवासियों को भारतीय रुपये में नामित वित्तीय परिसंपत्तियों और देनदारियों (स्टॉक, बॉण्ड, ऋण) को रखने की अनुमति देता है।
- आरक्षित परिसंपत्ति (केंद्रीय बैंकिंग): विदेशी केंद्रीय बैंकों द्वारा अपने आधिकारिक विदेशी मुद्रा भंडार के एक भाग के रूप में भारतीय रुपये (INR) को धारण करना।
- मूल रूप से, मुद्रा का अंतर्राष्ट्रीयकरण किसी मुद्रा के राष्ट्रीय सीमाओं से परे उसके उपयोग का स्वाभाविक या नीति-प्रेरित विस्तार है। यह प्रक्रिया आमतौर पर तीन क्रमिक चरणों में संपन्न होती है:
- प्रमुख तंत्र और विकास: इसे साकार करने के लिये, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) और सरकार ने कई तंत्रों की शुरुआत की है:
- वोस्ट्रो खाते: वोस्ट्रो खाता एक ऐसा खाता है जिसे कोई विदेशी बैंक भारत में व्यापार और वित्तीय लेनदेन को सुविधाजनक बनाने के लिये भारतीय रुपये में किसी भारतीय बैंक के साथ रखता है।
- भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा शुरू किया गया विशेष रुपी वोस्ट्रो खाता, (SRVA) एक विशेष प्रकार का खाता है जिसका उपयोग विशेष रूप से भारतीय रुपये में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार करने के लिये किया जाता है।
- यह विदेशी संस्थाओं को भारतीय निर्यात के लिये रुपये में भुगतान करने और अधिशेष का उपयोग सरकारी प्रतिभूतियों जैसे निवेशों के लिये करने की अनुमति देता है, जिससे रुपये के अंतर्राष्ट्रीयकरण को बढ़ावा मिलता है।
- वोस्ट्रो खाते: वोस्ट्रो खाता एक ऐसा खाता है जिसे कोई विदेशी बैंक भारत में व्यापार और वित्तीय लेनदेन को सुविधाजनक बनाने के लिये भारतीय रुपये में किसी भारतीय बैंक के साथ रखता है।
- द्विपक्षीय समझौते: भारत साझेदार देशों के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते करता है ताकि स्थानीय मुद्राओं (जिसमें भारतीय रुपये भी शामिल हैं) में व्यापार किया जा सके और अमेरिकी डॉलर जैसी तीसरी मुद्राओं पर निर्भरता कम हो सके।
- उदाहरण के लिये, भारत ने संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के साथ स्थानीय मुद्राओं (रुपये और दिरहम) में व्यापार करने के लिये समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किये हैं, जिससे डॉलर पर निर्भरता को कम किया जा सके।
- मसाला बॉण्ड: ये रुपये में जारी किये गए बॉण्ड होते हैं जिन्हें भारतीय संस्थाएँ विदेशी बाज़ारों में जारी करती हैं,जिससे मुद्रा जोखिम का स्थानांतरण उधारकर्त्ता से निवेशक की ओर हो जाता है।
रुपये के अंतर्राष्ट्रीयकरण के प्रमुख लाभ क्या हैं?
- विनिमय दर अस्थिरता में कमी: रुपये का अंतर्राष्ट्रीयकरण स्वाभाविक रूप से डॉलर-आधारित मध्यस्थता को कम करते हुए घरेलू आयातकों को वैश्विक मुद्रा झटकों से आंशिक सुरक्षा प्रदान करता है।
- यह परिचालनात्मक पृथक्करण व्यापक आर्थिक स्थिरता को बनाए रखने में सहायक होता है तथा आयातित मुद्रास्फीति को नियंत्रित कर दीर्घकालिक राजकोषीय सुदृढ़ीकरण प्रयासों को प्रत्यक्ष समर्थन प्रदान करता है।
- भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने रुपये के अंतर्राष्ट्रीयकरण को प्रोत्साहित करने हेतु विशेष रुपी वोस्ट्रो खात (SRVA) संबंधी प्रावधानों को उदार बनाया है, जिसके अंतर्गत बैंकों को अब SRVA खोलने के लिये पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता नहीं रहेगी, जिससे रुपया-आधारित व्यापार करने को गति मिलेगी।
- विदेशी मुद्रा भंडार प्रबंधन का अनुकूलन: सीमा-पार लेनदेन में भारतीय रुपये के बढ़ते उपयोग से डॉलर-मूल्यवर्गित भंडार बनाए रखने पर संरचनात्मक निर्भरता में क्रमिक कमी आती है।
- हार्ड करेंसी की इस आवश्यकता में कमी से राष्ट्रीय पूंजी मुक्त होती है, जिससे केंद्रीय बैंक को इसे घरेलू विकास एवं प्रौद्योगिकीय उन्नयन की दिशा में नियोजित करने की रणनीतिक लचीलापन प्राप्त होता है।
- उदाहरण के लिये, द इकोनॉमिक टाइम्स द्वारा प्रकाशित अनुमानों के अनुसार, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में रुपये के अधिक उपयोग से डॉलर में होने वाले आयात पर निर्भरता कम करके और विनिमय दर लागत को घटाकर 30-36 अरब डॉलर की दीर्घकालिक विदेशी मुद्रा बचत हो सकती है।
- रणनीतिक द्विपक्षीय गलियारों का सुदृढ़ीकरण: स्थानीय मुद्रा निपटान (LCS), तृतीय-पक्ष मुद्रा निर्भरता को समाप्त कर रणनीतिक अभिसरण तथा द्विपक्षीय व्यापार संबंधों को अधिक गहन एवं स्थायी बनाता है।
- यह वित्तीय कूटनीति भारत के भू-राजनीतिक प्रभाव को सुदृढ़ करते हुए लेन-देन आधारित व्यापार को गहन आर्थिक साझेदारियों में रूपांतरित करती है।
- LCS ढाँचे ने ऐतिहासिक उपलब्धियों को संभव बनाया है, जैसे इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन तथा अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी (ADNOC) के मध्य प्रथम रुपये-दिरहम आधारित कच्चे तेल का व्यापार।
- भारत–UAE द्विपक्षीय व्यापार के 100 अरब डॉलर से अधिक स्तर तक पहुँचने के साथ, यह तंत्र महत्त्वपूर्ण ऊर्जा आपूर्ति शृंखलाओं को सुरक्षित करते हुए वास्तविक समय में व्यापार को तीव्र करता है।
- वित्तीय प्रणालियों के शस्त्रीकरण से संरक्षण: वैश्विक स्तर पर रूपये की स्वीकृति एकतरफा वित्तीय प्रतिबंधों तथा SWIFT जैसे पश्चिमी संदेश प्लेटफार्मों के शस्त्रीकरण के विरुद्ध एक सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करती है।
- यह महत्त्वपूर्ण आयातों की निर्बाध निरंतरता सुनिश्चित कर खंडित वैश्विक व्यवस्था में भारत की आंतरिक सुरक्षा एवं रणनीतिक स्वायत्तता को सुदृढ़ करती है।
- परंपरागत भुगतान तंत्र के बाधित होने की स्थिति में, SRVA ढाँचे ने डॉलर-आधारित प्रतिबंधों को दरकिनार करते हुए रुपये में रूस से तेल आयात को निर्बाध बनाए रखा।
- फरवरी 2025 तक RBI द्वारा 30 देशों के 123 कॉरेस्पोंडेंट बैंकों को कुल 156 विशेष रुपी वोस्ट्रो खाते (SRVA) खोलने की स्वीकृति प्रदान की जा चुकी थी, जो रुपये की भू-राजनीतिक रूप से तटस्थ निपटान माध्यम के रूप में व्यवहार्यता को प्रमाणित करता है।
- वैश्विक वस्तु मूल्य निर्धारण का लोकतंत्रीकरण: भारतीय रुपये के उपयोग को प्रोत्साहित करना दीर्घकाल से स्थापित पेट्रोडॉलर एकाधिकार को चुनौती देते हुए आवश्यक वैश्विक वस्तुओं के लिये बहुध्रुवीय मूल्य निर्धारण तंत्र को बढ़ावा देता है।
- इस परिवर्तन से ग्लोबल साउथ के उभरते देशों को अमेरिकी मौद्रिक नीति पर निर्भर रहने के स्थान पर अपनी घरेलू आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप व्यापारिक शर्तों के निर्धारण की क्षमता प्राप्त होती है।
- विस्तारित BRICS+ ब्लॉक द्वारा डॉलर-मुक्ति के प्रयासों के बीच,कुंवरजी वेल्थ रिपोर्ट के अनुमानों के अनुसार, इस ब्लॉक के भीतर लगभग 50% व्यापार डॉलर से पृथक हो चुका है, जबकि रूस–चीन जैसे द्विपक्षीय मार्गों पर स्थानीय मुद्रा निपटान का स्तर 90% तक पहुँच गया है।
- निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना: घरेलू मुद्रा में बिलिंग से स्थानीय निर्माताओं के लिये मुद्रा रूपांतरण शुल्क तथा हेजिंग प्रीमियम समाप्त हो जाते हैं, जिससे लागत में प्रत्यक्ष कमी आती है।
- लागत में यह प्रत्यक्ष कमी भारतीय वस्तुओं की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को काफी हद तक बढ़ाती है, जो आत्मनिर्भर भारत के आत्मनिर्भरता लक्ष्यों के अनुरूप है।
- भारत के यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) और UAE के इंस्टेंट पेमेंट प्लेटफॉर्म का सीमा पार एकीकरण स्थानीय निर्यातकों के लिये एक सहज और कम लागत वाला वित्तीय आधार प्रदान करता है।
- इसके अतिरिक्त, वर्ष 2025 में RBI ने अधिकृत डीलर बैंकों को भूटान, नेपाल एवं श्रीलंका को भारतीय रुपये में ऋण प्रदान करने की अनुमति दी, जिससे सीमा-पार लेनदेन को सुगम बनाने के साथ-साथ भारतीय निर्यातों की क्षेत्रीय मांग को प्रोत्साहित किया जा सके।
- घरेलू वित्तीय बाज़ारों का सुदृढ़ीकरण: एक वैश्वीकृत मुद्रा स्वाभाविक रूप से सुदृढ़ निवेश मार्गों की मांग उत्पन्न करती है, जिससे घरेलू पूंजी बाज़ारों की परिपक्वता तथा तरलता में वृद्धि होती है।
- घरेलू ऋण साधनों को विदेशी संस्थाओं के लिये खोलने से स्थायी विदेशी पूंजी आकर्षित होती है, जिससे बड़े पैमाने पर घरेलू अवसंरचना परियोजनाओं के वित्तपोषण की लागत कम हो जाती है।
- भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के वर्ष 2025 के एक महत्त्वपूर्ण निर्देश के अनुसार, अब अनिवासियों को सरकारी प्रतिभूतियों तथा ट्रेजरी बिलों में अपनी अधिशेष राशि का निवेश करने की अनुमति प्रदान कर दी गई है।
- इसके परिणामस्वरूप, SRVA केवल एक व्यापार निपटान साधन न रहकर संप्रभु गारंटी द्वारा समर्थित एक सक्रिय एवं प्रतिफल-उत्पन्न निवेश चैनल में रूपांतरित हो गया है, जिससे रुपये की वित्तीय आकर्षण क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
रुपये के अंतर्राष्ट्रीयकरण को बढ़ावा देने में भारत के समक्ष कौन-कौन सी चुनौतियाँ हैं?
- ट्रिफिन दुविधा और घरेलू असंतुलन: वैश्विक आरक्षित मुद्रा का दर्जा प्राप्त करने से घरेलू मूल्य स्थिरता बनाए रखने तथा रुपये की वैश्विक तरलता मांग को पूरा करने के बीच एक संरचनात्मक द्वंद्व उत्पन्न होता है।
- विश्व को पर्याप्त मुद्रा आपूर्ति सुनिश्चित करने हेतु भारत को निरंतर व्यापार घाटा वहन करने की स्थिति में आना पड़ सकता है, जिससे दीर्घकालिक राजकोषीय सुदृढ़ीकरण तथा निर्यात-आधारित विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है।
- वर्ष 2026 के प्रारंभ तक अस्थिर ऊर्जा मूल्यों के कारण व्यापार घाटे में वृद्धि इस जोखिम को रेखांकित करती है कि वैश्विक INR मांग मौजूदा आंतरिक असंतुलनों को और गहरा कर सकती है।
- मौद्रिक नीति स्वायत्तता पर प्रतिबंध: जैसे-जैसे भारतीय रुपया (INR) का अंतर्राष्ट्रीय प्रचलन एवं लेन-देन बढ़ता है, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के लिये असंभव ट्रिनिटी (Impossible Trinity) अर्थात स्थिर विनिमय दर, पूंजी की मुक्त गतिशीलता तथा स्वतंत्र मौद्रिक नीति, को एक साथ संतुलित करने की क्षमता पर दबाव बढ़ता है।
- वर्ष 2026 में पश्चिमी एशिया में बढ़ते तनाव के बीच रुपये में तीव्र अस्थिरता परिलक्षित हुई, जिसमें यह लगभग ₹89.85 से गिरकर ₹95 के स्तर तक पहुँच गया।
- इसके परिणामस्वरूप RBI को कड़े नियंत्रणात्मक उपाय लागू करने पड़े, जिनमें बैंकों की डॉलर संबंधी स्थितियों पर सीमा निर्धारण भी सम्मिलित था।
- इस प्रकार के आवर्ती हस्तक्षेप रुपये की संरचनात्मक सीमाओं तथा सीमित वैश्विक मांग को उजागर करते हैं, जो इसके अंतर्राष्ट्रीयकरण के मार्ग में एक प्रमुख चुनौती के रूप में विद्यमान हैं।
- विनिमय दर में अस्थिरता में वृद्धि: अंतर्राष्ट्रीयकरण मुद्रा को विदेशी बाज़ारों और सट्टेबाज व्यापारियों की मनमानी के प्रति संवेदनशील बना देता है, जिससे विनिमय दर में उतार-चढ़ाव की आवृत्ति और तीव्रता संभावित रूप से बढ़ जाती है।
- यह अस्थिरता छोटे और मध्यम निर्यातकों को हानि पहुँचा सकती है, जिनके पास अचानक मुद्रा में होने वाले उतार-चढ़ाव से निपटने के लिये बड़े निगमों द्वारा उपयोग किये जाने वाले परिष्कृत हेजिंग उपकरण नहीं होते हैं।
- वर्ष 2025 में भारतीय रुपये में तीन वर्षों में सबसे तीव्र वार्षिक गिरावट (4.7%) देखी गई, जो यह दर्शाता है कि मज़बूत घरेलू बुनियादी तत्त्वों के बावजूद वैश्विक जोखिम से बचने की प्रवृत्ति तीव्र अवमूल्यन का कारण बन सकती है।
- व्यापार घाटा एवं ‘वोस्ट्रो’ संचय जाल: एक प्रमुख चुनौती ‘फँसी हुई तरलता’ की समस्या है, जहाँ व्यापार अधिशेष वाले साझेदार व्यावहारिक उपयोग या पुनर्निवेश क्षमता से अधिक INR संचय कर लेते हैं।
- उदाहरण के लिये, भारत के साथ असंतुलित व्यापारिक संबंध रूस को हर महीने लगभग 1 अरब डॉलर के रुपये-मूल्य वाले परिसंपत्तियों का संचय करने के लिये प्रेरित कर रहे हैं, जिनका अधिकांश भाग निष्क्रिय बना हुआ है।
- यदि साझेदार इन रुपया शेषों का प्रभावी उपयोग नहीं कर पाते, तो वे अधिक सशक्त मुद्राओं में निपटान की मांग कर सकते हैं, जिससे अंतर्राष्ट्रीयकरण की प्रक्रिया बाधित हो सकती है।
- अपूर्ण पूंजी खाता परिवर्तनीयता: पूंजी खाते पर INR केवल आंशिक रूप से परिवर्तनीय है, जिसका अर्थ है कि निवेश के लिये देश में बड़ी धनराशियों के आवागमन पर अभी भी महत्त्वपूर्ण प्रतिबंध बने हुए हैं।
- वास्तविक अंतर्राष्ट्रीयकरण के लिये पूर्ण परिवर्तनीयता आवश्यक है, किंतु इसे अत्यधिक तीव्रता से लागू करने पर वैश्विक वित्तीय संकटों के दौरान भारी पूँजी पलायन हो सकता है, जिससे राष्ट्रीय आर्थिक सुरक्षा को खतरा उत्पन्न हो सकता है।
- अपर्याप्त गहनता और चलनिधि वाले बॉण्ड बाज़ार: किसी मुद्रा को वैश्विक आरक्षित परिसंपत्ति होने के लिये, उसे एक गहन, तरल और पारदर्शी सॉवरेन बॉण्ड बाज़ार द्वारा समर्थित होना चाहिये जहाँ विदेशी केंद्रीय बैंक अपने धन को सुरक्षित रूप से पार्क कर सकें।
- वर्तमान में, भारत के बॉण्ड बाज़ार में अमेरिका या यूरोपीय संघ जितनी गहराई नहीं है, जिससे बड़े अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों के लिये कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव उत्पन्न किये बिना निवेश करना एवं निवेश से बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है।
- वैश्विक बॉण्ड सूचकांकों में शामिल होने से समय के साथ 25 अरब डॉलर का निवेश आने की उम्मीद है, लेकिन यह एक शीर्ष स्तरीय वैश्विक मुद्रा के लिये आवश्यक चलनिधि का एक छोटा सा हिस्सा ही है।
- निरंतर ‘नोटबंदी भय’ और विश्वास की कमी: पिछली घरेलू नीतिगत झटकों, जैसे कि वर्ष 2016 की नोटबंदी और वर्ष 2023 में ₹2,000 के नोट की वापसी, ने नेपाल और भूटान जैसे पड़ोसी क्षेत्रों में भारतीय रुपये पर एक स्थायी 'विश्वास कर' छोड़ दिया है।
- अचानक मुद्रा के अमान्य होने से कई मुद्राधारकों के पास अनुपयोगी नकदी और सीमित विनिमय क्षमता रह गई, जिससे रुपये के प्रचलन पर निर्भर स्थानीय अर्थव्यवस्थाएँ बाधित हो गईं।
- इससे नीतिगत अनिश्चितता की धारणा बनती है, जिससे रुपये में विश्वास कम होता है और इसके अंतर्राष्ट्रीयकरण की महत्त्वाकांक्षाओं में एक प्रमुख बाधा उत्पन्न होती है।
- भू-राजनीतिक प्रतिक्रिया और 'प्रतिबंध संबंधी घर्षण': डॉलर के उपयोग को कम करने के लिये सक्रिय रूप से दबाव डालने से पश्चिमी वित्तीय शक्तियों के साथ राजनयिक मतभेद उत्पन्न हो सकता है, जिससे मुख्यधारा के वित्तीय अधोसंरचना से अपवर्जन या 'द्वितीयक' दबाव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
- इस स्थिति से निपटने के लिये एक नाजुक संतुलन बनाए रखना आवश्यक है ताकि भारतीय मुद्रा सूचकांक (INR) की ओर बढ़ने को पश्चिमी विरोधी भू-राजनीतिक चुनौती के बजाय 'जोखिम कम करने' के रूप में देखा जा सके।
- वर्ष 2026 तक, भारत एक ओर BRICS+ की स्थानीय मुद्रा पहलों में अपनी भागीदारी बनाए हुए है, वहीं दूसरी ओर वह अमेरिकी डॉलर-प्रधान अंतर्राष्ट्रीय भुगतान प्रणाली पर भी अत्यधिक निर्भर बना हुआ है।
रुपये के संतुलित और सुदृढ़ अंतर्राष्ट्रीयकरण को सुनिश्चित करने के लिये भारत को कौन-से उपाय अपनाने चाहिये?
- चरणबद्ध पूंजी खाता उदारीकरण: भारत को पूंजी खाता परिवर्तनीयता के लिये 'ग्लाइड पाथ' दृष्टिकोण अपनाना चाहिये, जिसके तहत व्यापक आर्थिक स्थिरता के अनुरूप पूंजी के बहिर्वाह और अंतर्वाह पर लगे प्रतिबंधों को धीरे-धीरे कम किया जाए।
- इसमें एक ऐसी अनुक्रमिक रणनीति शामिल है जिसमें आकस्मिक 'हॉट मनी' के उलट-फेर को रोकने के लिये अप्रतिबंधित सीमा पार पूंजी प्रवाह की अनुमति देने से पहले चालू खाते की सुदृढ़ता और राजकोषीय अनुशासन स्थापित किया जाता है।
- सॉवरेन और कॉर्पोरेट बॉण्ड बाज़ारों को मज़बूत बनाना: विदेशी निवेशकों को रुपये के अधिशेष को सुरक्षित और स्थिर तरीके से रखने के लिये एक उच्च तरलता वाला, पारदर्शी घरेलू ऋण बाज़ार विकसित करना आवश्यक है।
- दीर्घकालिक मुद्रास्फीति-अनुक्रमित बॉण्ड और हरित प्रतिभूतियों जैसे विभिन्न प्रकार के साधनों के माध्यम से बाज़ार की गहनता को बढ़ाने से यह सुनिश्चित होता है कि विदेशी रुपये की होल्डिंग्स को उपज को विकृत किये बिना उत्पादक घरेलू निवेशों में सुगमता से पुनर्चक्रित किया जा सकता है।
- क्षेत्रीय मुद्रा विनिमय ढाँचों को सुदृढ़ बनाना: BRICS और SAARC ढाँचों के माध्यम से 'क्षेत्रीयकरण' को प्राथमिकता देने से निकटवर्ती पड़ोसियों के साथ रुपये के उपयोग का परीक्षण करने के लिये एक नियंत्रित वातावरण बनता है।
- दक्षिण एशिया के भीतर मज़बूत द्विपक्षीय स्वैप लाइनें और स्थानीय मुद्रा निपटान तंत्र स्थापित करके, RBI वैश्विक, उच्च अस्थिरता वाले व्यापार गलियारों तक विस्तार करने से पहले एक छोटे, अधिक पूर्वानुमानित पारिस्थितिकी तंत्र में तरलता के उतार-चढ़ाव का प्रबंधन कर सकता है।
- डिजिटल रुपी (CBDC) अवसंरचना का विस्तार: थोक सीमा पार लेनदेन के लिये सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) की सक्रिय तैनाती से निपटान जोखिम और लेन-देन लागत को कम किया जा सकता है।
- ब्लॉकचेन आधारित डिजिटल रुपया वास्तविक काल में पता लगाने की क्षमता और प्रोग्राम करने योग्य 'स्मार्ट अनुबंध' प्रदान करता है, जिससे RBI को पारंपरिक बैंकिंग प्रणालियों की तकनीकी बाधाओं को दरकिनार करते हुए उच्च सटीकता के साथ विदेशी चलनिधि प्रवाह की निगरानी करने की अनुमति मिलती है।
- 'रुपये वोस्ट्रो' पुनर्निवेश मानदंडों का संस्थागतकरण: अधिशेष वाले देशों द्वारा सामना की जाने वाली ‘अवरुद्ध चलनिधि’ की समस्या के समाधान हेतु भारत को विदेशी संस्थाओं के लिये रुपये की शेष राशि को दीर्घकालिक अवसंरचना तथा इक्विटी बाज़ारों में पुनर्निवेशित करने के संस्थागत मार्ग विकसित करने चाहिये।
- स्पेशल रुपी वोस्ट्रो अकाउंट्स (SRVA) में व्यापार अधिशेष को संप्रभु समर्थित विकास निधियों में परिवर्तित करने का मानकीकरण यह सुनिश्चित करता है कि अतिरिक्त रुपयों का उपयोग सट्टेबाजी वाले मुद्रा व्यापार के बजाय राष्ट्र निर्माण के लिये किया जाए।
- समन्वित मुद्रास्फीति और ब्याज दर प्रबंधन: प्रमुख वैश्विक मुद्राओं की तुलना में 'कम और स्थिर' मुद्रास्फीति अंतर बनाए रखना रुपये की दीर्घकालिक क्रय शक्ति और मूल्य के भंडार के रूप में इसकी आकर्षण क्षमता को संरक्षित करने के लिये महत्त्वपूर्ण है।
- RBI को मुद्रास्फीति को लक्षित करने के अपने जनादेश और विनिमय दर प्रबंधन के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिये, यह सुनिश्चित करते हुए कि मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के उद्देश्य से की गई घरेलू ब्याज दरों में वृद्धि अनजाने में अस्थिर, प्रतिफल-चाहने वाले पूंजी प्रवाह को ट्रिगर न करे।
- वैश्विक वित्तीय संदेश अंतर-संचालनीयता को बढ़ाना: भारत को संयुक्त अरब अमीरात और सिंगापुर के साथ-साथ अधिक अंतर्राष्ट्रीय समकक्षों के साथ अपने एकीकृत भुगतान इंटरफेस (UPI) और घरेलू संदेश प्रणालियों (SFMS) को एकीकृत करना जारी रखना चाहिये।
- एक विकेंद्रीकृत, बहुध्रुवीय वित्तीय संदेश आर्किटेक्चर का निर्माण यह सुनिश्चित करता है कि भू-राजनीतिक तनाव के दौरान भी रुपये के लेन-देन चालू रहें, जिससे पश्चिमी-प्रभुत्व वाले SWIFT सिस्टम पर अत्यधिक निर्भरता से जुड़े 'प्रतिबंध संघर्ष' को कम किया जा सके।
- मज़बूत मैक्रोप्रूडेंशियल और निगरानी ढाँचे: अस्थायी पूंजी प्रवाह प्रबंधन उपायों या अप्रतिपूरित आरक्षित आवश्यकताओं जैसे 'घर्षण-आधारित' मैक्रोप्रूडेंशियल टूल्स को लागू करने से वैश्विक अस्थिरता की चरम अवधि के दौरान एक सुरक्षा मिलती है।
- ऑफशोर NDF (नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड) बाज़ारों की उन्नत रीयल-टाइम मॉनिटरिंग से RBI को सट्टेबाजी के खिलाफ सक्रिय रूप से हस्तक्षेप करने में सहायता मिलती है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि ऑफशोर रुपये की कीमत घरेलू बुनियादी बातों से बहुत अधिक दिक्परिवर्तित न हो।
निष्कर्ष:
रुपये का अंतर्राष्ट्रीयकरण अब कोई दूरस्थ आकांक्षा नहीं रह गई है, बल्कि भारत के लिये एक रणनीतिक आवश्यकता बन गया है ताकि वह खंडित वैश्विक व्यवस्था में संतुलन बनाए रख सके और मुद्रा अस्थिरता को कम कर सके। यद्यपि पूँजी खाते की परिवर्तनीयता और ‘ट्रिफ़िन दुविधा’ जैसी संरचनात्मक चुनौतियाँ विद्यमान हैं, तथापि डिजिटल अवसंरचना और गहन ऋण बाज़ारों को सम्मिलित करने वाला एक संतुलित दृष्टिकोण अत्यंत निर्णायक सिद्ध होगा। अंततः, रुपये का वैश्विक उत्थान भारत की व्यापक आर्थिक स्थिरता बनाए रखने और डॉलर के विश्वसनीय, भू-राजनीतिक रूप से तटस्थ विकल्प के रूप में अपनी क्षमता पर निर्भर करेगा।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न “रुपये का अंतर्राष्ट्रीयकरण एक द्वैध प्रभाव वाली प्रक्रिया है जो रणनीतिक स्वायत्तता तो प्रदान करती है लेकिन घरेलू मौद्रिक प्रबंधन को जटिल बना देती है।” हाल के वैश्विक डॉलर-विरोधी रुझानों के संदर्भ में इस कथन का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs):
1. रुपये के अंतर्राष्ट्रीयकरण का प्रमुख उद्देश्य क्या है?
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में बिलिंग, सीमा-पार निवेशों तथा विदेशी केंद्रीय बैंकों द्वारा आरक्षित मुद्रा के रूप में रुपये के उपयोग को सक्षम बनाना।
2. अंतर्राष्ट्रीयकरण भारत को वैश्विक आघातों से किस प्रकार सुरक्षा प्रदान करता है?
यह अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता को कम करता है, जिससे अमेरिकी मौद्रिक नीति में परिवर्तन से उत्पन्न आयातित मुद्रास्फीति और अस्थिरता को नियंत्रित किया जा सकता है।
3. ‘विशेष रुपया वोस्ट्रो खाता’ क्या है?
यह एक ऐसा बैंक खाता होता है, जिसे कोई विदेशी बैंक किसी भारतीय बैंक में रुपये में संचालित करता है और जिसका उपयोग स्थानीय मुद्रा में व्यापार निपटान के लिये किया जाता है।
4. क्या भारत में पूर्ण पूँजी खाते की परिवर्तनीयता है?
नहीं, वर्तमान में भारत में चालू खाते की पूर्ण परिवर्तनीयता है, जबकि आकस्मिक रूप से पूँजी बहिर्गमन को रोकने के लिये पूँजी खाते की केवल आंशिक परिवर्तनीयता लागू है।
5. ‘ट्रिफ़िन दुविधा’ क्या है?
यह एक ऐसी विरोधाभासी स्थिति है, जिसमें वह देश जिसकी मुद्रा वैश्विक आरक्षित मुद्रा के रूप में प्रयुक्त होती है, उसे विश्व को चलनिधि उपलब्ध कराने के लिये लगातार व्यापार घाटा चलाना पड़ता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ)
प्रिलिम्स:
प्रश्न 1.रुपये की परिवर्तनीयता से क्या तात्पर्य है? (2015)
(a) रुपये के नोटों के बदले सोना प्राप्त कर सकना
(b) रुपये के मूल्य को बाज़ार की शक्तियों द्वारा निर्धारित होने देना
(c) रुपये को अन्य मुद्राओं में और अन्य मुद्राओं को रुपये में परिवर्तित करने की स्वतंत्र रूप से अनुज्ञा प्रदान करना
(d) भारत में मुद्राओं के लिये अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार विकसित करना
उत्तर: (c)