भारत का रक्षा ढाँचे का आधुनिकीकरण | 07 Feb 2026
यह लेख 04/02/2026 को द बिजनेस स्टैंडर्ड्स में प्रकाशित " Defence spending rises in Union Budget, but capability gains remain key” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख बजट 2026–27 में भारत के रक्षा व्यय में हुई वृद्धि का विश्लेषण करते हुए यह रेखांकित करता है कि वास्तविक सुरक्षा सुदृढ़ीकरण केवल अधिक बजटीय आवंटन पर नहीं, बल्कि कुशल क्रियान्वयन, अंतर-सेवा संयुक्तता तथा प्रभावी क्षमता निर्माण पर निर्भर करता है।
प्रिलिम्स के लिये: iDEX योजना, अग्निपथ योजना, परियोजना 17A, ऑपरेशन सिंदूर, एकीकृत वायु कमान और नियंत्रण प्रणाली (IACCS), हिंद महासागर क्षेत्र।
मेन्स के लिये: भारत के रक्षा क्षेत्र में वर्तमान प्रगति, प्रमुख मुद्दे और उपाय।
भारत का रक्षा क्षेत्र अब उस चरण में प्रवेश कर चुका है जहाँ केवल उच्च व्यय पर्याप्त नहीं है और क्षमता निर्माण ही वास्तविक मानदंड बन गया है। केंद्रीय बजट में रक्षा व्यय को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के लगभग 2% तक बढ़ाने का कदम, जो हाल की परिचालन वास्तविकताओं से प्रेरित है, एक रणनीतिक परिवर्तन को दर्शाता है। इसके बावजूद, मानव संसाधन की स्थायी लागत, अधिग्रहण में विलंब और औद्योगिक ग्रहणशीलता की सीमाएँ उपलब्ध परिणामों को चुनौती देती रहती हैं। अतः भारत की रक्षा तैयारियों का भविष्य इस बात पर निर्भर करता कि आवंटित संसाधनों को कितनी कुशलता एवं प्रभावशीलता से विश्वसनीय सैन्य क्षमता में परिवर्तित किया जाता है, न कि केवल बजट वृद्धि पर।
भारत के रक्षा क्षेत्र में प्रमुख घटनाक्रम क्या हैं?
- रक्षा आधुनिकीकरण हेतु बजट आवंटन: केंद्रीय बजट 2026-27 में राजस्व-केंद्रित व्यय से पूंजी-गहन आधुनिकीकरण की ओर स्पष्ट बदलाव दिखाई देता है, जिसमें रक्षा मंत्रालय को ₹7.85 लाख करोड़ आवंटित किये गए हैं।
- वित्त वर्ष 2025 के अनुमानों की तुलना में यह 15.19% वृद्धि अस्थिर उत्तरी सीमाओं पर लड़ाकू स्क्वाड्रनों और नौसैनिक प्लेटफार्मों में महत्त्वपूर्ण क्षमता अंतराल को पाटने के लिये मजबूत राजकोषीय प्रतिबद्धता दर्शाती है।
- इसके अलावा, पूंजीगत व्यय 2.19 लाख करोड़ रुपये (पिछले वर्ष की तुलना में 21.8% वृद्धि) है, जिसमें से 1.39 लाख करोड़ रुपये विशेष रूप से स्थानीय विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिये घरेलू खरीद हेतु निर्धारित किये गए हैं।
- ऑपरेशन सिंदूर के बाद रणनीतिक पुनर्व्यवस्थापन और त्रि-सेवा एकीकरण: मई 2025 में एकीकृत ऑपरेशन सिंदूर के बाद सशस्त्र बलों ने सैद्धांतिक नियमों से आगे बढ़कर युद्ध में प्रमाणित एकीकृत संचालन की ओर बढ़ते हुए, थिएटर कमांड संरचनाओं को गति दी है।
- इस ऑपरेशन ने ड्रोन युद्ध और पैदल सेना समन्वय में अंतर को उजागर किया, जिसके परिणामस्वरूप विशेषीकृत “रुद्र” इंटीग्रेटेड ब्रिगेड्स का तत्काल गठन किया गया ताकि निगरानी क्षमताओं का विकेंद्रीकरण किया जा सके।
- सेना ने समर्पित 'अशनी' ड्रोन इकाइयों को शामिल करने के लिये पैदल सेना बटालियनों का पुनर्गठन किया और निर्बाध हवाई-ज़मीनी समन्वय के लिये एकीकृत वायु कमान और नियंत्रण प्रणाली (IACCS) की स्थापना की।
- न्यूक्लियर त्रि-संपदा को सशक्त करना: भारत ने उन्नत समुद्री-आधारित साधनों और रेल-आधारित वितरण प्रणालियों के कमीशनिंग के साथ अपनी सेकंड-स्ट्राइक क्षमता को सुदृढ़ किया, जिससे पूर्व-सतर्क हमलों के खिलाफ उत्तरजीविता सुनिश्चित होती है।
- हिंद महासागर क्षेत्र में प्रतिद्वंद्वियों की बढ़ती समुद्री उपस्थिति को संतुलित करने के लिये परमाणु त्रय के तीसरे स्तंभ को तैनात करने पर ज़ोर दिया जा रहा है।
- वर्ष 2026 की शुरुआत में INS अरिदमन (तीसरी अरिहंत-श्रेणी की SSBN) की कमीशनिंग और अग्नि-प्राइम रेल-आधारित परीक्षण (सितंबर 2025) ने एक त्वरित प्रतिक्रिया और स्थायी निवारक बल की क्षमता प्रदर्शित की।
- हिंद महासागर क्षेत्र में प्रतिद्वंद्वियों की बढ़ती समुद्री उपस्थिति को संतुलित करने के लिये परमाणु त्रय के तीसरे स्तंभ को तैनात करने पर ज़ोर दिया जा रहा है।
- स्वदेशी लड़ाकू विमान प्रणाली: घरेलू विमानन क्षेत्र के विकास ने उत्पादन की दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रगति की है, जो भारतीय वायु सेना की घटती स्क्वाड्रन क्षमता को संतुलित करने के लिये आवश्यक है।
- अमेरिका-भारत GE F414 समझौता अंतिम चरण में है, जो तेजस Mk2 और AMCA जैसे भविष्य के प्लेटफॉर्मों के लिये पावरट्रेन सुनिश्चित करता है, रूसी प्रणोदन प्रणालियों पर निर्भरता कम करता है और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को सशक्त बनाता है।
- उदाहरण के लिये, हाल ही में, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने पुष्टि की है कि 5 तेजस Mk1A लड़ाकू जेट भारतीय वायु सेना को डिलीवरी के लिये पूरी तरह से तैयार हैं।
- नौसेना का स्वदेशीकरण और प्रोजेक्ट 17A स्टील्थ फ्रिगेट: भारतीय नौसेना विदेशी निर्भरता के बिना ब्लू-वॉटर क्षमता और ASW क्षमता बढ़ाने वाले स्टील्थ प्लेटफॉर्म विकसित कर रही है, जिससे "बिल्डर्स नेवी" क्षमता सक्रिय रूप से सुदृढ़ होती है।
- यह पहल स्टील्थ फ्रिगेट्स और P-75 सबमरीन प्रोग्राम के शीघ्र कमीशनिंग में स्पष्ट दिखती है, जो प्रमुख समुद्री संकुचन बिंदुओं पर प्रभुत्व सुनिश्चित करती है।
- जनवरी 2025 में INS वाग्शीर (छठी स्कॉर्पीन) की कमीशनिंग और INS तारागिरी जैसे प्रोजेक्ट 17A फ्रिगेट का शामिल होना वर्ष 2027 तक 170 से अधिक जहाज़ों के बेड़े के विस्तार को रेखांकित करता है।
- रक्षा सहयोग में रणनीतिक विविधीकरण: पारंपरिक संरेखण से हटकर, भारत ने जनवरी 2026 में यूरोपीय संघ (EU) के साथ ऐतिहासिक सुरक्षा समझौता किया, जो साइबर, अंतरिक्ष और समुद्री डोमेन में रक्षा सहयोग को विस्तारित करता है।
- यह विविधीकरण किसी एक ब्लॉक पर निर्भरता कम करता है और संवेदनशील घटकों जैसे सेंसर्स, चिप्स और समुद्री प्रोपल्शन के लिये यूरोपीय उच्च-तकनीकी बाज़ारों तक पहुँच खोलता है।
- यूरोपीय संघ और भारत के बीच वार्षिक सुरक्षा एवं रक्षा परामर्श भी होते हैं और उन्होंने जून 2025 में विदेश एवं सुरक्षा नीति पर एक रणनीतिक संवाद शुरू किया था।
- दोनों पक्ष समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, आतंकवाद विरोध और नॉन-प्रोलिफरेशन जैसे क्षेत्रों में विशेष संवाद जारी रखते हैं।
- वायु रक्षा को सुदृढ़ करना: मिशन सुदर्शन चक्र एक बहुस्तरीय, नेटवर्क-केंद्रित छत्र के रूप में कार्य करता है, जो कम लागत वाले आत्मघाती ड्रोन से लेकर उच्च-वेग वाले हाइपरसोनिक ग्लाइड वाहनों तक के हवाई खतरों को स्वायत्त रूप से प्राथमिकता देता है।
- एकीकृत वायु कमान और नियंत्रण प्रणाली (IACCS) को वास्तविक समय के उपग्रह डेटा के साथ एकीकृत करके, यह मिशन एक “किल-वेब” बनाता है, जो सुनिश्चित करता है कि किसी एक बिंदु की विफलता भी राष्ट्रीय हवाई क्षेत्र को खतरे में न डाले।
- वर्ष 2026 की शुरुआत तक, भारत ने तीन S-400 स्क्वाड्रन (जिनका नाम बदलकर सुदर्शन यूनिट कर दिया गया है) को परिचालन में ला दिया है।
- डीप-टेक आत्मनिर्भरता: सरकार ने पारंपरिक DPSU से आगे बढ़कर नवाचार को संरचनात्मक और संस्थागत रूप दिया है और iDEX (Innovations for Defence Excellence) ढाँचे एवं उच्च-मूल्य वाले ADTI अनुदान के माध्यम से “स्टार्टअप-टू-सोल्जर” को सशक्त बनाया है।
- इन वित्तीय प्रोत्साहनों को सख्त पॉजिटिव इंडिजिनाइजेशन लिस्ट (PIL) के साथ जोड़कर, भारत AI, क्वांटम और स्वायत्त प्रणालियों में गहन तकनीकी समाधानों के लिये घरेलू बाज़ार का निर्माण कर रहा है, जिन्हें पहले आयात किया जाता था।
- उदाहरण के लिये, 16 जुलाई 2024 को रक्षा मंत्रालय ने DPSU के लिये 346 वस्तुओं की 5वीं पॉजिटिव इंडिजिनाइजेशन लिस्ट(PIL) अधिसूचित की, जिसमें रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण लाइन रिप्लेसमेंट यूनिट शामिल हैं।
- इन वित्तीय प्रोत्साहनों को सख्त पॉजिटिव इंडिजिनाइजेशन लिस्ट (PIL) के साथ जोड़कर, भारत AI, क्वांटम और स्वायत्त प्रणालियों में गहन तकनीकी समाधानों के लिये घरेलू बाज़ार का निर्माण कर रहा है, जिन्हें पहले आयात किया जाता था।
- अंतरिक्ष और रक्षा का संयोजन: सामरिक अभियानों में अंतरिक्ष-आधारित खुफिया जानकारी के एकीकरण ने भारत के “सेंसर-टू-शूटर” चक्र को एक रैखिक प्रक्रिया से बहुआयामी “किल-वेब” में परिवर्तित कर दिया है, जो संपूर्ण स्थितिजन्य जागरूकता सुनिश्चित करता है।
- भारत सरकार ने उन्नत संचार उपग्रह GSAT-7B की खरीद के लिये ISRO की वाणिज्यिक शाखा न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) के साथ लगभग ₹3,000 करोड़ का समझौता किया है।
- GSAT-7B सेना को उच्च-थ्रूपुट और सुरक्षित संचार सेवाएँ प्रदान करेगा, जिसकी कुल परियोजना लागत ₹2,963 करोड़ अनुमानित है।
- यह सौदा रणनीतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय सेना के पास वर्तमान में वायु सेना और नौसेना की तरह कोई समर्पित संचार उपग्रह नहीं है। संभावना है कि यह उपग्रह वर्ष 2026 तक संचालित हो जाएगा।
- भारत सरकार ने उन्नत संचार उपग्रह GSAT-7B की खरीद के लिये ISRO की वाणिज्यिक शाखा न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) के साथ लगभग ₹3,000 करोड़ का समझौता किया है।
- रक्षा निर्यात और विनिर्माण गलियारों में वृद्धि: भारत का रक्षा औद्योगिक आधार आयात पर निर्भरता से मुक्त होकर निर्यातक बन गया है।
- प्रमुख उपलब्धियों में फिलीपींस को ब्रह्मोस मिसाइलों का निर्यात और आर्मेनिया को पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट सिस्टम का निर्यात शामिल है, जो भारत की तकनीकी परिपक्वता को प्रमाणित करता है।
- उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में विकसित हो रहे रक्षा औद्योगिक गलियारे (DIC) अब वृहद् उत्पादन कर रहे हैं, विदेशी निवेश आकर्षित कर रहे हैं और लघु एवं मध्यम उद्यमों को वैश्विक आपूर्ति शृंखला में एकीकृत कर रहे हैं।
- वित्त वर्ष 2025 में रक्षा निर्यात रिकॉर्ड ₹23,622 करोड़ तक पहुँच गया (12% वृद्धि)। इस विनिर्माण वृद्धि को बनाए रखने के लिये पूंजी बजट का 75% हिस्सा अब घरेलू उद्योग के लिये आरक्षित है।
भारत के रक्षा क्षेत्र से संबंधित प्रमुख मुद्दे क्या हैं?
- राजस्व-पूंजी अनुपात असंतुलन और पेंशन का भार: बजट 2026-27 में ₹7.85 लाख करोड़ के वृहद आवंटन के बावजूद, रक्षा बजट राजस्व व्यय, विशेष रूप से पेंशन और वेतन, से बुरी तरह प्रभावित है, जिससे महत्त्वपूर्ण आधुनिकीकरण के लिये सीमित राजकोषीय क्षमता बचती है।
- उदाहरण के लिये, अकेले पेंशन पर ही ₹1.71 लाख करोड़ खर्च हो जाते हैं, जबकि आधुनिकीकरण के लिये पूंजीगत व्यय ₹2.19 लाख करोड़ है, जिससे एक ऐसा अनुपात बना रहता है जो पिछले सौदों की प्रतिबद्ध देनदारियों को मुश्किल से पूरा करता है।
- इस सांरचनिक असंतुलन के कारण सशस्त्र बलों को “परिवर्तन” के बजाय “रखरखाव” को प्राथमिकता देनी पड़ती है, जिससे चीन के तीव्र सैन्य आधुनिकीकरण का मुकाबला करने के लिये आवश्यक नेक्स्ट-जेन प्लेटफॉर्म के अधिग्रहण में देरी होती है।
- लड़ाकू विमानों की कमी और हवाई अंतर: भारतीय भारतीय वायु सेना एक गंभीर क्षमता की कमी का सामना कर रही है, क्योंकि संभावित दो मोर्चों पर संघर्ष के खतरे का प्रभावी सामना करने के लियेआवश्यक 42 लड़ाकू विमान स्क्वाड्रन की तुलना में उसके पास केवल 29–31 स्क्वाड्रन ही हैं, जबकि चीन ने सीमा से 150 किलोमीटर से भी कम दूरी पर J-20 स्टील्थ लड़ाकू विमान तैनात कर दिये हैं।
- पुराने मिग-21 विमानों की सेवानिवृत्ति की दर, स्वदेशी तेजस Mk1A जेट के शामिल होने की दर से कहीं अधिक हो गई है, जिससे वायु रक्षा कमज़ोर हो गई है, विशेषकर तब जब 114 जेट्स के लिये मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA) सौदा प्रक्रियागत विलंब में फँसा हुआ है।
- रणनीतिक तकनीक में निरंतर आयात निर्भरता: हालाँकि “आत्मनिर्भर भारत” ने निम्न से मध्यम-तकनीकी विनिर्माण को बढ़ावा दिया है, किंतु भारत अभी भी जेट इंजन, समुद्री प्रणोदन और उन्नत सेंसर जैसी उच्च-मूल्य वाली रणनीतिक उप-प्रणालियों के लिये विदेशी OEM पर निर्भर है।
- यह निर्भरता एक कमज़ोरी उत्पन्न करती है, जहाँ आपूर्ति शृंखला में आने वाले झटके (जैसा कि GE F414 इंजनों में देरी) तेजस Mk2 और AMCA जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म की स्वदेशी उत्पादन लाइनों को प्रभावित कर सकते हैं।
- इसके अलावा, स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) के अनुसार, यूक्रेन युद्ध के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक देश है।
- क्षेत्रीय संघर्ष और एकीकृत थिएटर कमांड में विलंब: यह परिवर्तन आंतरिक प्रतिरोध और सैद्धांतिक मतभेदों का सामना कर रहा है, विशेषकर वायु शक्ति और लंबी दूरी की तोपखाने जैसी सीमित संपत्तियों के नियंत्रण में।
- शेकेतकर समिति (2016) ने त्रि-सेवा एकीकरण सुधार और संसाधन उपयोग को अनुकूलित करने के लिये पश्चिमी, उत्तरी और दक्षिणी नामक तीन एकीकृत थिएटर कमांड बनाने की सिफारिश की थी।
- एक सामान्य “संयुक्त युद्ध सिद्धांत” की कमी और वायु रक्षा कमान की संरचना पर असहमति ने जयपुर (पश्चिमी) और लखनऊ (उत्तरी) थिएटर कमांड के संचालन को रोक दिया है, जिससे वास्तविक संयुक्तता में बाधा उत्पन्न हो रही है।
- साथ ही, तिरुवनंतपुरम में मुख्यालय वाली समुद्री थिएटर कमांड की स्थापना भी विलंबित है।
- भारत की रक्षा नवाचार पारिस्थितिकी में संरचनात्मक बाधाएँ: चीन की तुलना में भारत का रक्षा अनुसंधान एवं विकास (R&D) व्यय असमान रूप से कम है, जिससे हाइपरसोनिक्स, AI और निर्देशित ऊर्जा हथियार जैसे उभरते क्षेत्रों में तकनीकी विषमता उत्पन्न होती है।
- DRDO का एकाधिकार और प्रशासन की सुस्ती चीन के “नागरिक-सैन्य संलयन” मॉडल के बिल्कुल विपरीत है, जिसने बीजिंग को परिचालन योग्य हाइपरसोनिक मिसाइलें तैनात करने की अनुमति दी है, जबकि भारत अभी भी परीक्षण चरण में है।
- नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने DRDO की उच्च प्राथमिकता वाली परियोजनाओं में गंभीर कमियों को उजागर किया है, जिसमें समय और लागत में वृद्धि, अनियमित समापन और ऐसे उदाहरण शामिल हैं जहाँ उद्देश्यों की पूर्ति न होने के बावजूद परियोजनाओं को सफल घोषित कर दिया गया था।
- समीक्षा की गईं 178 परियोजनाओं में से, 119 मूल समयसीमा से चूक गईं (16%–500% देरी) और 49 परियोजनाएँ निर्धारित अवधि से 100% से अधिक बढ़ गईं।
- मानव संसाधन प्रतिधारण संबंधी मुद्दे: अग्निपथ भर्ती मॉडल को तकनीकी विंग्स (नौसेना और वायु सेना) में 25% प्रतिधारण सीमा के कारण “कौशल रिक्तता” का सामना करना पड़ रहा है।
- पहली बैचों से प्रतिक्रिया बताती है कि 4-वर्षीय सेवा अवधि जटिल हथियार प्रणालियों में महारत हासिल करने के लिये अपर्याप्त है, जिससे परिचालन जोखिम और विशेष पैदल सेना रेजिमेंट्स में इकाई समन्वय की हानि होती है।
- इसके अलावा, आंतरिक सर्वेक्षणों से पता चलता है कि 72% अग्निवीर अनिश्चितता के कारण नौकरी के तनाव की शिकायत करते हैं।
- पहली बैचों से प्रतिक्रिया बताती है कि 4-वर्षीय सेवा अवधि जटिल हथियार प्रणालियों में महारत हासिल करने के लिये अपर्याप्त है, जिससे परिचालन जोखिम और विशेष पैदल सेना रेजिमेंट्स में इकाई समन्वय की हानि होती है।
- LAC पर अवसंरचना की विषमता: वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर भारत की सीमा अवसंरचना के लिये आवंटन में वृद्धि के बावजूद, यह तिब्बत में चीन के “दोहरे उपयोग” वाले गाँवों और हाई-स्पीड रेल नेटवर्क से अभी भी पिछड़ी हुई है।
- रसद संबंधी यह विषमता भारतीय सेना की सर्दियों के दौरान अग्रिम क्षेत्रों में भारी बख्तरबंद वाहन और तोपखाने को तेज़ी से जुटाने की क्षमता को सीमित करती है, जिससे PLA को स्पष्ट लामबंदी का लाभ मिलता है।
- उदाहरण के लिये, चीन भारत की तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र से लगी सीमाओं के किनारे 600 से अधिक शियाओकांग या “समृद्ध गाँव” का निर्माण कर रहा है।
- वहीं, सीमा सड़क संगठन (BRO) को पूर्वी लद्दाख में दौलत बेग ओल्डी (DBO) चौकी तक 130 किलोमीटर लंबी वैकल्पिक, हर मौसम में उपयोग होने वाली सड़क का निर्माण अभी पूरा करना बाकी है, जिसका उद्देश्य सुरक्षित और वर्ष भर आवागमन सुनिश्चित करना है।
- रसद संबंधी यह विषमता भारतीय सेना की सर्दियों के दौरान अग्रिम क्षेत्रों में भारी बख्तरबंद वाहन और तोपखाने को तेज़ी से जुटाने की क्षमता को सीमित करती है, जिससे PLA को स्पष्ट लामबंदी का लाभ मिलता है।
- साइबर और ग्रे-ज़ोन युद्ध के प्रति संवेदनशीलता: भारत की रक्षात्मक स्थिति काफी हद तक गतिज है, जिससे महत्त्वपूर्ण सैन्य नेटवर्क, साइबर जासूसी और कमान-और-नियंत्रण प्रणालियाँ गैर-गतिज “ग्रे-ज़ोन” हमलों के प्रति संवेदनशील हो जाती हैं।
- हाल ही में साइबर हमलों में वृद्धि और समर्पित आक्रामक साइबर सिद्धांत की कमी एक ऐसी कमज़ोरी को उजागर करती है, जिसका लाभ दुश्मन बिना गोली चलाए उठा सकते हैं।
- उदाहरण के लिये, अक्तूबर 2025 की एक रिपोर्ट में APT36 द्वारा भारत केBOSS Linux सिस्टम को निशाना बनाने का दावा किया गया है, जो पाकिस्तान की साइबर जासूसी गतिविधियों के बढ़ते स्तर को उजागर करती है और भारत के डिजिटल रक्षा ढाँचे को मज़बूत करने की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती है।
- हाल ही में साइबर हमलों में वृद्धि और समर्पित आक्रामक साइबर सिद्धांत की कमी एक ऐसी कमज़ोरी को उजागर करती है, जिसका लाभ दुश्मन बिना गोली चलाए उठा सकते हैं।
भारत के रक्षा क्षेत्र को मज़बूत करने हेतु किन उपायों की आवश्यकता है?
- R&D में "नागरिक-सैन्य संलयन" को संस्थागत रूप देना: भारत को रक्षा प्रयोगशालाओं, निजी अकादमिक संस्थानों और वाणिज्यिक उद्योगों के बीच की बाधाओं को दूर करने के लिये एक "राष्ट्रीय नागरिक-सैन्य संलयन ढाँचा" की ओर बढ़ना चाहिये, ताकि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसी दोहरे उपयोग वाली प्रौद्योगिकियों को सैन्य अनुप्रयोगों के लिये सहजता से अनुकूलित किया जा सके।
- इसके लिये अनुसंधान के आदान-प्रदान को लागू करने हेतु वैधानिक समर्थन की आवश्यकता है, जिससे सशस्त्र बलों को उभरते खतरों के लिये सुस्त, विशिष्ट सैन्य विकास मार्गों पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय तीव्र नागरिक नवाचार चक्रों का लाभ उठाने की अनुमति मिल सके।
- त्वरित अधिग्रहण प्रोटोकॉल को लागू करना: मंत्रालय को सॉफ्टवेयर-परिभाषित और असममित प्रौद्योगिकियों के लिये कठोर रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP) से त्वरित अधिग्रहण प्रोटोकॉल में परिवर्तन करना चाहिये, जिससे अंतिम परिचालन आवश्यकताओं की अग्रिम मांग के बजाय प्रोटोटाइप का तेज़ी से सर्पिल विकास संभव हो सके।
- इस बदलाव से सेवाओं को स्टार्टअप्स से “मिनिमम वायबल प्रोडक्ट्स” (MVP) प्राप्त करने और फील्ड फीडबैक के आधार पर उनमें सुधार करने की शक्ति मिलेगी, जिससे “सेंसर-टू-शूटर” समयसीमा का अंतर काफी कम हो जाएगा जो वर्तमान में स्वदेशी तैनाती को प्रभावित करता है।
- गैर-व्यपगत आधुनिकीकरण कोष का संचालन: सरकार को पूंजीगत अधिग्रहण बजट को वित्तीय वर्ष के अंत में समाप्त होने से बचाने के लिये "गैर-व्यपगत रक्षा आधुनिकीकरण कोष" (NLDMF) का संचालन करना चाहिये, जिससे विमानवाहक पोत और लड़ाकू विमानों के स्क्वाड्रन जैसी मेगा परियोजनाओं के लिये दीर्घकालिक रणनीतिक योजना बनाना संभव हो सके।
- यह वित्तीय संरचना घरेलू OEM और विदेशी भागीदारों को निश्चितता प्रदान करेगी, “खर्च करने की जल्दबाजी” की प्रवृत्ति को समाप्त करेगी और जटिल विनिर्माण जीवनचक्रों के अनुरूप बहु-वर्षीय भुगतान मील के पत्थर की अनुमति देगी।
- PSUs में “परफॉर्मेंस-लिंक्ड उत्तरदायित्व” लागू करना: DRDO और रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के लिये एक "प्रदर्शन-आधारित निगरानी तंत्र" को एक स्वतंत्र संसदीय निकाय द्वारा अनिवार्य किया जाना चाहिये ताकि परियोजना समय-सीमा पर कड़ी जवाबदेही लागू की जा सके, लागत में वृद्धि और देरी के लिये बजट में कटौती या प्रबंधन पुनर्गठन के साथ दंडित किया जा सके।
- उत्पादन को विकास से अलग करके और गैर-रणनीतिक विनिर्माण क्षेत्रों का निजीकरण करके, राज्य पूरी तरह से उच्च जोखिम वाली रणनीतिक प्रौद्योगिकियों पर ध्यान केंद्रित कर सकता है, जिससे उस एकाधिकार को तोड़ा जा सकता है जो वर्तमान में रक्षा औद्योगिक आधार की दक्षता को बाधित कर रहा है।
- लॉजिस्टिक कोड का एकीकरण: सेना, नौसेना और वायु सेना में कानूनी, रसद और प्रशिक्षण मानकों को एकीकृत करने वाली एक “संयुक्त सेवा प्रशासनिक संहिता” की स्थापना करके एकीकृत थिएटर कमांड (ITC) के एकीकरण में तेजी लाएँ, जो पुरातन एकल-सेवा अधिनियमों को प्रतिस्थापित करती है।
- इस उपाय में अनावश्यक आपूर्ति शृंखलाओं को समाप्त करने के लिये एक “संयुक्त लॉजिस्टिक्स बैकबोन” के निर्माण को प्राथमिकता दी जानी चाहिये, यह सुनिश्चित करते हुए कि अंतरसंचालनीयता केवल एक कमांड संरचना अवधारणा न रहकर, एक ज़मीनी स्तर की परिचालन वास्तविकता बन जाए जो संसाधन उपयोग को अनुकूलित करती है।
- “फॉरवर्ड डिफेंस” साइबर सिद्धांत को अंगीकार करना: भारत को एक समर्पित “ग्रे-ज़ोन युद्ध सिद्धांत” विकसित करने की आवश्यकता है, जो गैर-गतिज राज्यकला तथा उप-पारंपरिक खतरों का प्रतिकार करने हेतु एक केंद्रीकृत कमान संरचना के अंतर्गत आक्रामक साइबर क्षमताओं और संज्ञानात्मक युद्ध को संस्थागत रूप से एकीकृत करे।
- इसके लिये निष्क्रिय साइबर-रक्षा दृष्टिकोण से आगे बढ़कर “फॉरवर्ड डिफेंस” रणनीति अपनाना अनिवार्य होगा, जिससे रक्षा साइबर एजेंसी को ऐसे पूर्व-खाली अभियानों का अधिकार प्राप्त हो सके जो शत्रु नेटवर्कों को राष्ट्रीय महत्त्वपूर्ण अवसंरचना अथवा सैन्य कमान-शृंखला को क्षति पहुँचाने से पूर्व ही निष्क्रिय कर दें।
- रक्षा निर्यात को “राजनयिक राज्यकला” का उपकरण बनाना: रक्षा निर्यात को विदेश नीति के एक प्राथमिक साधन के रूप में स्थापित करने हेतु विदेश मंत्रालय के अंतर्गत एक समर्पित “रक्षा कूटनीति विंग” का गठन किया जाना चाहिये, जिसका दायित्व मित्र राष्ट्रों के लिये ऋण-रेखाओं (Lines of Credit) तथा दीर्घकालिक रखरखाव अनुबंधों को सुनिश्चित करना हो।
- इस रणनीतिक पुनर्संरेखण में हथियार प्रणालियों की बिक्री को प्रशिक्षण एवं संयुक्त सैन्य अभ्यासों के साथ संयोजित करना सम्मिलित होगा, जिससे हिंद महासागर क्षेत्र में “निर्भरता-आधारित नेटवर्क” का निर्माण होगा, जो भारत के भू-राजनीतिक हितों को साधने के साथ-साथ घरेलू रक्षा उद्योग को समर्थन प्रदान करेगा।
- पेशेवर सैन्य शिक्षा (PME) का संरचनात्मक आधुनिकीकरण: पेशेवर सैन्य शिक्षा (PME) पाठ्यक्रम का व्यापक पुनर्गठन आवश्यक है, ताकि इसमें अनिवार्य रूप से “तकनीकी राज्यकला” से संबंधित मॉड्यूल सम्मिलित किये जा सकें, जो अधिकारियों को स्वायत्त प्रणालियों, अंतरिक्ष युद्ध तथा अन्य विघटनकारी प्रौद्योगिकियों के रणनीतिक प्रबंधन में दक्ष बनाएँ।
- इस बौद्धिक आधुनिकीकरण को डेटा विज्ञान और क्रिप्टोग्राफी के विशेषज्ञों के लिये “पार्श्व प्रवेश व्यवस्था” से संबद्ध किया जाना चाहिये, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि कमान संरचना के पास आधुनिक, बहु-क्षेत्रीय युद्धक्षेत्रों में नेतृत्व करने हेतु अपेक्षित तकनीकी साक्षरता विद्यमान हो।
निष्कर्ष
भारत के रक्षा क्षेत्र में परिवर्तन अब केवल आवंटन राशि से नहीं, बल्कि क्षमता निर्माण की गति, सामंजस्य और गुणवत्ता पर निर्भर करता है। बजट 2026-27 में उच्च पूंजीगत व्यय और स्वदेशीकरण पहल के माध्यम से रणनीतिक उद्देश्यों का संकेत मिलता है, किंतु मानव संसाधन, प्रौद्योगिकी और संयुक्त प्रयासों में मौजूद संरचनात्मक बाधाएँ अभी भी अपेक्षित परिणामों को प्रभावित करती हैं। इस अंतर को पाटने के लिये संस्थागत सुधार, त्वरित खरीद प्रक्रिया और उभरते क्षेत्रों में गहन नागरिक-सैन्य एकीकरण आवश्यक है। तभी रक्षा व्यय तेज़ी से प्रतिस्पर्द्धी सुरक्षा परिवेश में विश्वसनीय निवारक क्षमता और सतत रणनीतिक स्वतंत्रता में परिणत हो सकता है।
|
दृष्टि मेन्स प्रश्न रक्षा व्यय में सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 2% तक की वृद्धि के बावजूद, भारत निरंतर क्षमता-संबंधी अंतरालों से जूझ रहा है। उच्च रक्षा व्यय को प्रभावी सैन्य क्षमता में परिवर्तित करने में बाधा डालने वाले संरचनात्मक और संस्थागत कारकों का विश्लेषण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1. वित्त वर्ष 2026-27 का रक्षा बजट महत्त्वपूर्ण क्यों माना जाता है?
क्योंकि इससे रक्षा व्यय लगभग GDP के 2% तक पहुँच गया है तथा इसमें पूंजीगत व्यय और आधुनिकीकरण पर स्पष्ट रूप से अधिक ज़ोर दिया गया है।
प्रश्न 2. किस परिचालन घटना ने वर्तमान रक्षा आवंटन की संरचना को प्रभावित किया है?
वर्ष 2025 में सम्पन्न ऑपरेशन सिंदूर, जिसने संयुक्त अभियानों, ड्रोन क्षमताओं तथा वायु रक्षा प्रणालियों में विद्यमान कमियों को उजागर किया।
प्रश्न 3. स्वदेशीकरण के उच्च लक्ष्यों को लेकर प्रमुख चिंता क्या है?
घरेलू रक्षा विनिर्माताओं की सीमित उत्पादन और ग्रहणशीलता तथा परियोजनाओं की धीमी डिलीवरी समय-सीमा।
प्रश्न 4. राजस्व-पूंजी असंतुलन एक समस्या क्यों बना हुआ है?
क्योंकि वेतन एवं पेंशन व्यय का बढ़ता बोझ भविष्योन्मुखी प्लेटफार्मों एवं प्रौद्योगिकियों हेतु उपलब्ध संसाधनों को संकुचित करता रहता है।
प्रश्न 5. बजट के आकार से इतर वास्तविक रक्षा क्षमता किन कारकों पर निर्भर करती है?
वास्तविक रक्षा क्षमता केवल उच्च बजटीय आवंटन पर नहीं, बल्कि कुशल क्रियान्वयन, समयबद्ध अधिग्रहण, त्रि-सेवात्मक संयुक्तता तथा तकनीकी आत्मनिर्भरता पर आधारित होती है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ)
प्रिलिम्स:
प्रश्न 1. मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने सहित दूरस्थ क्षेत्रों में स्थानीय जन-समुदाय के उत्थान के लिये सेना द्वारा संचालित अभियान (ऑपरेशन) को क्या कहा जाता है? (2024)
(a) ऑपरेशन संकल्प
(b) ऑपरेशन मैत्री
(c) ऑपरेशन सद्भावना
(d) ऑपरेशन मदद
उत्तर: C
मेन्स
प्रश्न 1. “भारत में बढ़ते हुए सीमापारीय आतंकी हमले और अनेक सदस्य-राज्यों के आंतरिक मामलों में पाकिस्तान द्वारा बढ़ता हुआ हस्तक्षेप सार्क (दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन) के भविष्य के लिये सहायक नहीं हैं।” उपयुक्त उदाहरणों के साथ स्पष्ट कीजिये। (2016) प्रश्न 2. 'उग्र अनुसरण' एवं 'शल्यक प्रहार' पदों का प्रयोग प्रायः आतंकी हमलों के विरुद्ध सैन्य कार्यवाही के लिये किया जाता है। इस प्रकार की कार्यवाहियों के युद्धनीतिक प्रभाव की विवेचना कीजिये। (2016)