भारत के डीप-टेक स्टैक का निर्माण | 05 Feb 2026
यह एडिटोरियल 02/01/2026 को द हिंदू बिज़नेस लाइन में प्रकाशित लेख ‘A budget for the deep tech ecosystem & the mitras building it’ शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख रणनीतिक नीति और अवसंरचनात्मक सहायता के माध्यम से पूर्ण-स्तरीय डीप-टेक इकोसिस्टम के निर्माण की दिशा में भारत के परिवर्तन पर प्रकाश डालता है। साथ ही इसमें डीप-टेक नवाचार को व्यापक स्तर पर ले जाने के लिये आवश्यक प्रमुख चुनौतियों और सुधारों का भी विश्लेषण किया गया है।
प्रिलिम्स के लिये: ADITI योजना, BioE3 नीति, राष्ट्रीय क्वांटम मिशन, IndiaAI मिशन
मेन्स के लिये: डीपटेक क्या है, डीपटेक इकोसिस्टम में वर्तमान विकास, प्रमुख मुद्दे और डीपटेक इकोसिस्टम को सुदृढ़ करने के लिये आवश्यक उपाय।
भारत का डीप-टेक इकोसिस्टम अब केवल अलग-थलग स्टार्टअप्स या सब्सिडी-आधारित नवाचार पर निर्भर नहीं है बल्कि समग्र (एंड-टू-एंड) तकनीकी क्षमता विकसित करने के एक सुनियोजित प्रयास से संचालित हो रहा है। फोकस केवल सॉफ्टवेयर-आधारित क्षमताओं से हटकर सेमीकंडक्टर, AI इंफ्रास्ट्रक्चर और उन्नत विनिर्माण जैसे रणनीतिक क्षेत्रों की ओर स्थानांतरित हो गया है जहाँ पैमाना, कौशल एवं आपूर्ति-शृंखला पूंजी जितने ही महत्त्वपूर्ण हैं। हालिया नीतिगत संकेत उपभोग-आधारित डिजिटलीकरण से हटकर उत्पादन-प्रेरित, क्षमता-केंद्रित वृद्धि की ओर संक्रमण को दर्शाते हैं। यह परिवर्तन डीप टेक को भारत के लिये एक आर्थिक साधन और रणनीतिक परिसंपत्ति— दोनों के रूप में स्थापित करता है।
डीप टेक क्या है?
- परिचय: डीप टेक से तात्पर्य उन प्रौद्योगिकियों से है जो मौलिक वैज्ञानिक अनुसंधान और उन्नत इंजीनियरिंग पर आधारित हैं, जिनका उद्देश्य क्रमिक या सुविधा-आधारित समाधानों को सक्षम करने के बजाय जटिल व बड़े पैमाने की समस्याओं को हल करना है।
- पारंपरिक डिजिटल स्टार्टअप के विपरीत, जो मुख्य रूप से बिज़नेस मॉडल इनोवेशन पर निर्भर करते हैं, डीप-टेक वेंचर्स आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर्स, बायोटेक्नोलॉजी, एडवांस्ड मैटेरियल्स, रोबोटिक्स, क्वांटम कंप्यूटिंग और क्लीन एनर्जी जैसे विषयों में हुई सफलताओं पर आधारित होते हैं।
- डीप टेक की मुख्य विशेषताएँ
- विज्ञान और अनुसंधान पर आधारित: डीप टेक मौलिक अनुसंधान एवं विकास पर आधारित है, जो प्रायः प्रयोगशालाओं, विश्वविद्यालयों या दीर्घकालिक औद्योगिक अनुसंधान से उभरता है।
- प्रगति केवल तीव्र बाज़ार परिवर्तनों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि भौतिकी, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, गणित एवं इंजीनियरिंग में हुई प्रगति पर भी निर्भर करती है।
- लंबी अवधि और उच्च जोखिम: विकास चक्र लंबे, पूंजी-प्रधान और अनिश्चित होते हैं। प्रतिफल तिमाही नहीं, बल्कि वर्षों में प्राप्त होते हैं, इसलिये दीर्घकालिक पूंजी (पेशेंट कैपिटल), राज्य समर्थन और मिशन-उन्मुख नीति महत्त्वपूर्ण हो जाती है।
- कठिन-से-नकल होने वाला प्रतिस्पर्द्धात्मक लाभ: डीप टेक बौद्धिक संपदा, निहित तकनीकी ज्ञान, विनिर्माण क्षमता और प्रणाली-स्तरीय एकीकरण के माध्यम से स्थायी प्रतिस्पर्द्धात्मक लाभ प्रदान करता है जबकि साधारण सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म अपेक्षाकृत आसानी से नकल किये जा सकते हैं।
- अवसंरचना और इकोसिस्टम पर निर्भरता: सफलता के लिये विशेषीकृत बुनियादी ढाँचे, फैब्स, क्लीन रूम, डेटा सेंटर, परीक्षण सुविधाओं के साथ-साथ कुशल मानव पूंजी एवं लचीली आपूर्ति शृंखलाओं की आवश्यकता होती है।
- विज्ञान और अनुसंधान पर आधारित: डीप टेक मौलिक अनुसंधान एवं विकास पर आधारित है, जो प्रायः प्रयोगशालाओं, विश्वविद्यालयों या दीर्घकालिक औद्योगिक अनुसंधान से उभरता है।
- डीप टेक से जुड़े प्रमुख क्षेत्र: डीप टेक कई उद्योगों में फैला हुआ है, लेकिन यह सबसे अधिक निम्नलिखित क्षेत्रों में प्रमुखता से पाया जाता है:
- उन्नत पदार्थ (Advanced Materials): नए पॉलिमर, नैनो-पदार्थ या बैटरी तकनीकों का विकास।
- जैव-प्रौद्योगिकी (Biotechnology): सिंथेटिक बायोलॉजी, जीनोमिक्स और औषधि-अन्वेषण।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence): उन्नत मशीन लर्निंग एल्गोरिद्म (सरल चैटबॉट से परे) और कंप्यूटर विज़न।
- रोबोटिक्स और ड्रोन: कृषि, विनिर्माण और लॉजिस्टिक्स के लिये स्वचालन।
- क्वांटम कंप्यूटिंग: पारंपरिक कंप्यूटरों से असंभव समस्याओं को हल करने वाले अगली पीढ़ी के प्रोसेसर।
- अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी (Space Tech): उपग्रह तकनीक, रॉकेट्री और अंतरिक्ष अन्वेषण से जुड़े उपकरण।
डीप टेक बनाम शैलो टेक
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विशेषता |
डीप टेक |
शैलो टेक |
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फोकस |
वैज्ञानिक नवाचार / मौलिक वैज्ञानिक खोज |
व्यापार मॉडल में नवाचार |
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तकनीकी जोखिम का स्वरूप |
मुख्यतः तकनीकी + पूँजीगत जोखिम (क्या यह बड़े पैमाने पर काम करेगा?) |
मुख्यतः बाज़ार + क्रियान्वयन का जोखिम (क्या उपभोक्ता इसे अपनायेंगे?) |
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तकनीकी जोखिम |
उच्च (क्या तकनीक वास्तव में काम करेगी?) |
अपेक्षाकृत कम |
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बाज़ार जोखिम |
अपेक्षाकृत कम |
उच्च (क्या लोग इसे खरीदेंगे/अपनायेंगे?) |
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बाज़ार में आने का समय |
दीर्घकालीन (वर्षों से दशकों तक) |
अल्पकालीन (महीनों से कुछ वर्षों तक) |
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बौद्धिक संपदा संरक्षण (IP Protection) |
उच्च (नकल करना कठिन) |
निम्न (आसानी से नकल की जा सकती है) |
भारत में डीप-टेक को नियंत्रित करने वाला नियामक ढाँचा क्या है?
- डेटा, डिजिटल और AI शासन
- डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023: व्यक्तिगत डेटा के संग्रह, प्रसंस्करण एवं सीमा पार प्रवाह को विनियमित करता है, जो AI, बिग डेटा और प्लेटफॉर्म-आधारित डीपटेक फर्मों को सीधे प्रभावित करता है।
- IndiaAI मिशन (नीतिगत ढाँचा): जिम्मेदार AI के लिये मानदंड निर्धारित करता है तथा वैश्विक मानकों के अनुरूप स्वदेशी AI मॉडल स्थापित करने का लक्ष्य रखता है, साथ ही अनूठी चुनौतियों और अवसरों का समाधान भी करता है।
- बौद्धिक संपदा एवं नवाचार संरक्षण
- पेटेंट अधिनियम, 1970: कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जैव प्रौद्योगिकी, अर्द्धचालक और सामग्री विज्ञान में गहन तकनीकी नवाचारों की सुरक्षा के लिये मूल ढाँचा।
- राष्ट्रीय बौद्धिक संपदा अधिकार नीति, 2016: पेटेंट कराने, व्यावसायीकरण और उद्योग-अकादमिक सहयोग को बढ़ावा देती है, जो डीपटेक के विस्तार के लिये महत्त्वपूर्ण है।
- स्टार्टअप, निवेश और पूंजी विनियम
- स्टार्टअप इंडिया पहल: डीपटेक स्टार्टअप्स के लिये नियामक छूट, कर प्रोत्साहन और त्वरित IP सहायता प्रदान करती है।
- सरकार ने DSIR के औद्योगिक अनुसंधान और विकास प्रोत्साहन कार्यक्रम के तहत मान्यता प्राप्त करने के लिये डीप-टेक स्टार्टअप्स के लिये तीन वर्ष के अस्तित्व की शर्त को हटा दिया है।
- भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) विनियम: वेंचर कैपिटल फंड, AIF तथा स्टार्टअप लिस्टिंग और एग्जिट के लिये उभरते ढाँचे को नियंत्रित करते हैं।
- राष्ट्रीय डीप टेक स्टार्टअप नीति (प्रारूप): यह वित्तपोषण, अनुसंधान एवं विकास, बौद्धिक संपदा और नियमों से संबंधित चुनौतियों का समाधान करके उच्च-तकनीकी नवाचार को बढ़ावा देने के लिये प्रस्तावित एक ढाँचा है, जिसका उद्देश्य कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर एवं अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बढ़ाना है।
- अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (ANRF): इसका उद्देश्य गणितीय विज्ञान, इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी, पर्यावरण और पृथ्वी विज्ञान, स्वास्थ्य और कृषि तथा मानविकी और सामाजिक विज्ञान के वैज्ञानिक एवं तकनीकी अंतर्संबंधों सहित प्राकृतिक विज्ञान के क्षेत्रों में अनुसंधान, नवाचार और उद्यमिता के लिये उच्च स्तरीय रणनीतिक दिशा-निर्देश प्रदान करना है।
- स्टार्टअप इंडिया पहल: डीपटेक स्टार्टअप्स के लिये नियामक छूट, कर प्रोत्साहन और त्वरित IP सहायता प्रदान करती है।
- सामरिक एवं राष्ट्रीय सुरक्षा विनियम
- दूरसंचार क्षेत्र पर राष्ट्रीय सुरक्षा निर्देश: यह दूरसंचार सेवा प्रदाताओं (TSP) को केवल 'विश्वसनीय स्रोतों' और उत्पादों से ही उपकरण खरीदने का आदेश देता है।
- प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति (प्रेस नोट्स): रक्षा प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष और दूरसंचार जैसे संवेदनशील डीपटेक क्षेत्रों में विदेशी निवेश का परिक्षण करती है।
- क्षेत्र-विशिष्ट डीपटेक फ्रेमवर्क
- भारतीय अंतरिक्ष नीति, 2023: अंतरिक्ष प्रक्षेपण, उपग्रह और संबंधित अनुप्रयोगों को निजी डीपटेक कंपनियों के लिये खोलती है।
- जैव प्रौद्योगिकी विनियम (DBT & CDSCO): जीनोमिक्स, जैव-विनिर्माण और स्वास्थ्य-तकनीक नवाचारों को नियंत्रित करते हैं।
- दूरसंचार अधिनियम, 2023: अगली पीढ़ी के नेटवर्क और उपग्रह संचार के लिये नियमों को अद्यतन करता है।
- उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाएँ: सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, उन्नत बैटरी और इलेक्ट्रिक वाहन की डीपटेक के लिये नियामक-सह-वित्तीय सहायता प्रदान करती हैं।
भारत के डीपटेक इकोसिस्टम में वर्तमान में क्या-क्या घटनाक्रम हो रहे हैं?
- सॉवरेन AI अवसंरचना और 'कंप्यूट-एक-सार्वजनिक-हित (कंप्यूट-एज़-ए-पब्लिक-गुड)': भारत ने कंप्यूटिंग शक्ति को महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक अवसंरचना के रूप में मानते हुए, निर्णायक रूप से 'AI उपभोक्ता' से 'AI निर्माता' बनने की ओर कदम बढ़ाया है।
- 'IndiaAI मिशन' स्टार्टअप्स के लिये पहुँच को प्रभावी ढंग से लोकतांत्रिक बनाता है, वैश्विक तकनीकी अग्रणियों के एकाधिकार को रोकता है तथा स्वदेशी लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स (LLM) के प्रशिक्षण को सक्षम बनाता है, जो भारत की भाषाई विविधता एवं अद्वितीय सांस्कृतिक डेटासेट को कैप्चर करते हैं, जिन्हें वैश्विक मॉडल प्रायः दर्शाने में विफल रहते हैं।
- देश की राष्ट्रीय कंप्यूटिंग क्षमता 34,000 GPU को पार कर गई है, जो स्टार्टअप्स को रियायती दरों पर उपलब्ध हैं।
- भारत में एक स्वतंत्र AI पारिस्थितिकी तंत्र बनाने और विदेशी API पर निर्भरता कम करने के लिये सर्वम-1 जैसे स्वदेशी मॉडल तैनात किये जा रहे हैं।
- सेमीकंडक्टर फैब्स का संचालन शुरू होना: भारत में सेमीकंडक्टर निर्माण की कहानी अब केवल ‘योजना’ से आगे बढ़कर ‘क्रियान्वयन’ के चरण में पहुँच चुकी है, जहाँ पहली वाणिज्यिक फैब्स उत्पादन के निकट हैं। इससे भारत वैश्विक चिप मूल्य-शृंखला से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ रहा है।
- यह बदलाव इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण में रणनीतिक भेद्यता को कम करता है तथा फैबलेस डिज़ाइन स्टार्टअप्स के लिये एक घरेलू 'मल्टीप्लायर इकोसिस्टम' बनाता है, जो अब ताइवान की TSMC में स्लॉट के लिये प्रतीक्षा करने के बजाय स्थानीय स्तर पर प्रोटोटाइप बना सकते हैं।
- धोलेरा स्थित टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स की निर्माण इकाई ने वर्ष 2025 के अंत में उपकरणों की स्थापना शुरू की और पहले वाणिज्यिक 28nm चिप्स के वर्ष 2026 के अंत तक तैयार होने की उम्मीद है।
- साथ ही, यह सुविधा भारतीय स्टार्टअप्स के लिये 'टेप-आउट' के लिये भी खोल दी गई है, जो 28nm-90nm रेंज के चिप्स को सपोर्ट करती है।
- अंतरिक्ष प्रक्षेपण सेवाओं का निजीकरण: भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के विनियमन में ढील और प्रौद्योगिकी अंतरण के कारण ISRO के एकाधिकार से सफलतापूर्वक एक व्यावसायिक रूप से जीवंत 'स्पेस 2.0' अर्थव्यवस्था में परिवर्तन कर लिया है।
- इससे निजी कंपनियों को आकर्षक वैश्विक प्रक्षेपण बाज़ार का एक हिस्सा हासिल करने का मौका मिला है, जो केवल उपग्रह निर्माण से आगे बढ़कर छोटे उपग्रह समूहों के लिये 'प्रवेश-ऑन-डिमांड' सेवाएँ प्रदान कर रही हैं।
- उदाहरण के लिये, स्काईरूट एयरोस्पेस ने विक्रम-1 यान के लिये अपना पहला कक्षीय मिशन वर्ष 2026 की शुरुआत में निर्धारित किया है।
- वर्तमान में, भारतीय अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का मूल्य लगभग 8.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर है, जो वैश्विक अंतरिक्ष बाज़ार में 2% हिस्सेदारी का गठन करता है, जिसमें अग्निकुल कॉसमॉस जैसी कंपनियाँ तेज़ी से तैनाती के लिये 3D-प्रिंटेड इंजनों का व्यावसायीकरण कर रही हैं।
- क्वांटम क्षमताओं का संस्थानीकरण: राष्ट्रीय क्वांटम मिशन (NQM) नीति-निर्माण चरण से आगे बढ़कर ‘थीमैटिक हब्स’ (टी-हब्स) की स्थापना तक पहुँच चुका है, जो सेक्शन-8 कंपनियों के रूप में कार्य कर रहे हैं।
- यह अनूठी संरचना शैक्षणिक संस्थानों को कॉर्पोरेट चपलता के साथ काम करने की अनुमति देती है, जिससे क्वांटम सेंसिंग एवं क्रिप्टोग्राफी में गहन तकनीकी विकास को बढ़ावा मिलता है, जो क्वांटम-डिक्रिप्शन खतरों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा को भविष्य के लिये सुरक्षित रखने के लिये महत्त्वपूर्ण हैं।
- वर्तमान में 4 T-हब्स पूर्णतः कार्यशील हैं और प्रौद्योगिकी विकास, मानव संसाधन विकास, उद्यमिता संवर्द्धन, उद्योग सहयोग तथा अंतर्राष्ट्रीय सहयोग जैसी गतिविधियों में संलग्न हैं।
- जैव-विनिर्माण और BioE3 प्रतिमान: BioE3 नीति (अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोज़गार के लिये जैव प्रौद्योगिकी) पेट्रोकेमिकल-आधारित उद्योगों को प्रतिस्थापित करने के लिये 'उच्च-प्रदर्शन जैव-विनिर्माण' की ओर एक रणनीतिक संक्रमण को दर्शाती है।
- 'बायोफाउंड्रीज़' की स्थापना करके, राज्य सिंथेटिक बायोलॉजी के लिये 'प्रयोगशाला-से-बाज़ार तक' की एक सुगम प्रणाली को सक्षम बना रहा है, जो बायो-प्लास्टिक एवं स्मार्ट प्रोटीन जैसे संधारणीय विकल्पों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, जो नेट-ज़ीरो संक्रमण के लिये महत्त्वपूर्ण हैं।
- नई दिल्ली स्थित ICGEB में एक केंद्रीकृत बायोफाउंड्री अब चालू हो गई है, जो स्टार्टअप्स को 'डिजाइन-बिल्ड-टेस्ट-लर्न' सेवाएँ प्रदान करती है।
- यह नीति 6 विषयगत क्षेत्रों का समर्थन करती है, जिससे जैव-अर्थव्यवस्था को वर्ष 2024 में 165.7 बिलियन डॉलर तक पहुँचने में सहायता मिलेगी, जिसका लक्ष्य वर्ष 2030 तक 300 बिलियन डॉलर तक पहुँचना है।
- रक्षा क्षेत्र में गहन प्रौद्योगिकी का स्वदेशीकरण: यह मानते हुए कि आधुनिक युद्ध केवल हार्डवेयर की मात्रा से नहीं बल्कि प्रौद्योगिकी से परिभाषित होता है, रक्षा मंत्रालय ने 'रणनीतिक स्वतंत्रता' के लिये सक्रिय अनुदान तंत्र शुरू किये हैं।
- ADITI योजना (iDEX के अंतर्गत) पर्याप्त रिस्क कैपिटल प्रदान करके रक्षा क्षेत्र के डीप-टेक स्टार्टअप्स के लिये 'वैली ऑफ डेथ' को पाटने का काम करती है।
- वर्ष 2023–26 के लिये 750 करोड़ रुपये की राशि आवंटित की गयी है, जिसके अंतर्गत प्रति स्टार्टअप 25 करोड़ रुपये तक का अनुदान दिया जा रहा है। QuBeats जैसी कंपनियों को भारतीय नौसेना के लिये जीपीएस-स्वतंत्र क्वांटम नेविगेशन प्रणालियों के विकास हेतु सहायता मिली है।
- ग्रीन हाइड्रोजन वैलीज़ और इलेक्ट्रोलाइज़र आत्मनिर्भरता: भारत ग्रीन हाइड्रोजन के वैश्विक निर्यात केंद्र के रूप में उभरने का प्रयास कर रहा है, जिसके लिये सबसे महत्त्वपूर्ण घटक इलेक्ट्रोलाइज़र का स्वदेशीकरण किया जा रहा है।
- सरकार 'हाइड्रोजन वैलीज़' के समूह बनाकर, डीप-टेक ऊर्जा स्टार्टअप्स के लिये मांग की निश्चितता (ऑफ-टेक एश्योरेंस) सुनिश्चित कर रही है, जिससे उन्हें पैमाने की अर्थव्यवस्थाएँ हासिल करने तथा सस्ते चीनी क्षारीय इलेक्ट्रोलाइजरों के साथ प्रतिस्पर्द्धा करने में सहायता मिल रही है।
- केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने 485 करोड़ रुपये के निवेश से चार 'हाइड्रोजन वैलीज़' की घोषणा की, जो संपूर्ण मूल्य शृंखला को दर्शाती हैं। GreenH (हरियाणा में PEM इलेक्ट्रोलाइज़र का निर्माण करने वाली कंपनी) जैसी कंपनियाँ राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के तहत स्थानीयकरण के इस प्रयास की सफलता का उदाहरण हैं।
- अनुसंधान RDI कोष: डीप टेक में 'फंडिंग विंटर' के लिये एक प्रमुख संरचनात्मक समाधान अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (ANRF) कोष का संचालन है।
- त्वरित रिटर्न की तलाश करने वाले आम वेंचर कैपिटल निवेश के विपरीत, यह सरकारी कोष 'दीर्घकालिक पूंजी (पेशेंट कैपिटल)' प्रदान करता है, जो पदार्थ विज्ञान और स्वच्छ ऊर्जा जैसे अनुसंधान एवं विकास-प्रधान क्षेत्रों के लिये आवश्यक है, जिससे निजी निवेशकों के लिये दीर्घकालिक नवाचार के जोखिम को कम किया जा सकता है।
- ₹1 लाख करोड़ के वित्तीय पूल वाली अनुसंधान, विकास एवं नवाचार (RDI) योजना वर्ष 2025 के उत्तरार्द्ध में क्रियाशील हुई।
- यह विशेष रूप से उभरते हुए क्षेत्रों को लक्षित करता है और उच्च तकनीकी जोखिम वाले लेकिन विशाल राष्ट्रीय रणनीतिक मूल्य वाले गहन तकनीकी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिये लंबी अवधि के, कम लागत वाले फंड प्रदान करता है।
भारत के डीपटेक इकोसिस्टम से जुड़े प्रमुख मुद्दे क्या हैं?
- विकास-चरण के वित्तपोषण में 'वैली ऑफ डेथ': प्रारंभिक चरण के अनुदान (जैसे iDEX) तो उपलब्ध हैं, परंतु सीरीज़ B+ स्तर के विकास-पूँजी में एक गंभीर 'मिसिंग मिडल' मौजूद है, जहाँ डीपटेक हार्डवेयर स्टार्टअप प्रायः विफल हो जाते हैं।
- घरेलू वेंचर कैपिटलिस्ट लंबे समय तक चलने वाले हार्डवेयर चक्रों (5-7 वर्ष) के प्रति जोखिम से बचने वाले कैपिटलिस्ट बने हुए हैं, वे फिनटेक/SaaS के त्वरित रिटर्न को प्राथमिकता देते हैं, जिससे प्रमुख भारतीय डीपटेक स्टार्टअप को दीर्घकालिक पूंजी (पेशेंट कैपिटल) तक पहुँच प्राप्त करने के लिये अपने मुख्यालय को अमेरिका या सिंगापुर में स्थानांतरित करने के लिये विवश होना पड़ता है।
- 1 लाख करोड़ रुपये के ANRF कोष के परिचालन में आने के बाद भी, डीप-टेक स्टार्टअप्स को वेंचर कैपिटल का अनुपातहीन रूप से कम हिस्सा मिलता है, जबकि हार्डवेयर स्टार्टअप्स को सॉफ्टवेयर-आधारित फर्मों की तुलना में लंबे एवं अधिक अनिश्चित विकास-चरण वित्तपोषण चक्रों का सामना करना पड़ता है।
- 'L1' खरीद प्रक्रिया का गतिरोध: डीपटेक का सबसे बड़ा संभावित ग्राहक (सरकार) अब भी 'न्यूनतम बोलीदाता' (L1) की पुरातन खरीद-प्रणाली में फँसी हुई है।
- नवाचारपूर्ण समाधानों को अपनाने के उद्देश्य के बावजूद प्रशासनिक तंत्र में 'गुणवत्ता-सह-लागत' (QCBS) के तकनीकी मूल्यांकन की क्षमता का अभाव है। फलस्वरूप अनेक श्रेष्ठ स्वदेशी डीपटेक उत्पाद केवल इसलिये अयोग्य ठहरा दिये जाते हैं क्योंकि वे बड़े पैमाने पर बने सस्ते, निम्न-गुणवत्ता वाले पारम्परिक विकल्पों या डम्प किये गये आयातों से मूल्य-प्रतिस्पर्द्धा नहीं कर पाते।
- दिसंबर 2025 की NASSCOM रिपोर्ट में यह उल्लेख किया गया है कि iDEX, BIRAC, या TDB जैसे सरकारी अनुदान प्राप्त करने के बाद अधिक संख्या में राजस्व-पूर्व स्टार्टअप परिचालन संबंधी कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं।
- इसे 'ग्रांट लिक्विडिटी ट्रैप' कहा जाता है, जहाँ स्वीकृत धनराशि हमेशा सबसे अधिक आवश्यकता के समय उपलब्ध नहीं होती है, जिससे मौजूदा राजस्व की कमी वाले स्टार्टअप की कार्यशील पूंजी सीमित हो जाती है।
- उदाहरण के लिये, iDEX ने 619 स्टार्टअप और MSME के साथ 430 अनुबंधों पर हस्ताक्षर किये थे। हालाँकि यह सक्रिय भागीदारी को दर्शाता है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं करता कि इनमें से कितने प्रारंभिक प्रोटोटाइप अनुसंधान एवं विकास अनुदानों के मुकाबले दीर्घकालिक वाणिज्यिक खरीद अनुबंधों में परिवर्तित हुए हैं।
- 'लैब-टू-लैण्ड' व्यावसायीकरण का अंतर: भारत 'प्रोडक्टाइज़ेशन घाटे' का सामना कर रहा है, जहाँ अकादमिक जगत में बौद्धिक संपदा साझाकरण के कठोर मानदंडों के कारण रिकॉर्ड तोड़ पेटेंट दाखिल करने के बावजूद वे व्यावसायिक उत्पादों में परिवर्तित नहीं हो पा रहे हैं।
- IIT और CSIR प्रयोगशालाओं में प्रोफेसरों एवं वैज्ञानिकों के पास कंपनियाँ शुरू करने के लिये प्रोत्साहन या कानूनी 'सेफ़ हार्बर' की कमी है, जिससे ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है जहाँ अभूतपूर्व शोध पत्रिकाओं तक ही सीमित रह जाता है, बजाय इसके कि वह बाज़ार में आर्थिक मूल्य उत्पन्न करे।
- हालाँकि वर्ष 2025 में भारत पेटेंट दाखिल करने के मामले में वैश्विक स्तर पर छठे स्थान पर था, लेकिन पेटेंट का व्यावसायिक उपयोग अमेरिका जैसे वैश्विक अग्रणियों की तुलना में काफी कम है।
- इसके अलावा, भारत में पेटेंट आवेदन के निपटारे में औसतन लगभग 58 महीने लगते हैं, जबकि चीन में लगभग 20 महीने और अमेरिका में 23 महीने लगते हैं।
- महत्त्वपूर्ण घटकों की आयात निर्भरता: 'मेक इन इंडिया' हार्डवेयर इकोसिस्टम भू-राजनीतिक आपूर्ति शृंखला के झटकों के प्रति गंभीर रूप से सुभेद्य है क्योंकि यह अभी भी सेंसर, सटीक मोटर और विशेष गैसों जैसे आयातित 'मध्यस्थों' पर निर्भर करता है।
- स्टार्टअप प्रायः 'घटक निर्माता' के बजाय केवल 'सिस्टम इंटीग्रेटर' होते हैं, जिसका अर्थ है कि चीन या ताइवान द्वारा लगाया गया एक भी व्यापार प्रतिबंध भारतीय ड्रोन या रोबोटिक्स के पूरे बेड़े को ठप कर सकता है।
- वर्तमान में, भारत अपने सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स घटकों का लगभग 90-95 प्रतिशत आयात करता है, जिसमें चीन, मलेशिया, ताइवान, थाईलैंड एवं सिंगापुर प्रमुख आपूर्तिकर्त्ता हैं।
- PhD प्रतिभा और अनुसंधान एवं विकास कौशल की कमी: सैद्धांतिक भौतिकी/गणित और इंजीनियरिंग अनुप्रयोग के बीच के अंतराल को समाप्त करने में सक्षम 'गहन विज्ञान' प्रतिभा की भारी कमी है।
- यद्यपि भारत लाखों कोडर तैयार करता है, लेकिन क्वांटम कंप्यूटिंग या AI एल्गोरिदम डिज़ाइन के लिये आवश्यक PhD स्तर की विशेषज्ञता वाले शोधकर्त्ता बहुत कम होते हैं, जिसके कारण स्टार्टअप्स को यूरोप या अमेरिका से महंगे टैलेंट को हायर करने के लिये विवश होना पड़ता है, जिससे उनकी लागत बढ़ जाती है।
- उदाहरण के लिये, स्टैनफोर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने वर्ष 2016 और 2024 के दौरान AI प्रतिभा सघनता में वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक 252% की वृद्धि दर्ज की।
- हालाँकि, समग्र AI प्रतिभा सघनता के मामले में यह अभी भी शीर्ष 15 देशों में शामिल नहीं है, इस सूची में इज़राइल और सिंगापुर का नेतृत्व है।
- परीक्षण अवसंरचना संबंधी अड़चनें: हार्डवेयर प्रोटोटाइप के लिये औद्योगिक-स्तरीय परीक्षण सुविधाएँ (विंड टनल, एनेकोइक चैम्बर, रेडिएशन हार्डनिंग लैब) प्रायः ISRO/DRDO जैसे सार्वजनिक उपक्रमों तक सीमित रहती हैं।
- स्टार्टअप्स को टेस्टिंग स्लॉट की प्रतीक्षा में कीमती महीने गँवाने पड़ते हैं, जिससे उनके 'इट्रेशन साइकल' धीमे हो जाते हैं तथा वे उन वैश्विक प्रतिस्पर्द्धियों के मुकाबले गैर-प्रतिस्पर्द्धी बन जाते हैं जिनके पास तीव्र फीडबैक लूप होते हैं।
- उदाहरण के लिये, व्यावहारिक रूप से हर निजी स्पेसटेक कंपनी (स्काईरूट, अग्निकुल, बेलाट्रिक्स) को ISRO की सुविधाओं तक पहुँच के लिये कतार में लगना पड़ता है, क्योंकि सीरीज़ A स्टार्टअप के लिये उनकी नकल करना आर्थिक रूप से असंभव है।
- 'ग्रे ज़ोन' में नियामक अनिश्चितता: विनियमन नवाचार से पीछे रह जाता है, जिससे स्पेस माइनिंग, जनरेटिव AI दायित्व या स्वायत्त बायो-मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में कानूनी 'ग्रे ज़ोन' उत्पन्न हो जाते हैं।
- स्पष्ट दायित्व ढाँचे की कमी (उदाहरण के लिये, 'यदि AI निदान से किसी मरीज की मृत्यु हो जाती है तो कौन जिम्मेदार होगा?') बड़े उद्यमों को डीपटेक समाधान अपनाने से रोकती है, जिससे स्टार्टअप के लिये B2B बाज़ार अवरुद्ध हो जाता है।
- उदाहरण के लिये, जहाँ भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 निजी कंपनियों (NGEs) को उपग्रह प्रक्षेपण करने की अनुमति देती है, वहीं लंबे समय से लंबित अंतरिक्ष गतिविधि विधेयक अभी तक कानून नहीं बन पाया है।
- इसी प्रकार, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 डॉक्टरों और अस्पतालों को लापरवाही के लिये उत्तरदायी ठहराता है।
- हालाँकि, यदि कोई स्वायत्त AI निदान उपकरण (उदाहरण के लिये, मधुमेह रेटिनोपैथी का पता लगाने के लिये) निदान करने में विफल रहता है, तो इसके लिये कानून स्पष्ट नहीं है— क्या डॉक्टर AI पर भरोसा करने के लिये लापरवाह है, या उत्पाद दोष के लिये सॉफ्टवेयर विक्रेता उत्तरदायी है?
- मूल्यांकन में विसंगति और बौद्धिक संपदा का संपार्श्विकीकरण: भारतीय वित्तीय संस्थानों में बौद्धिक संपदा या एल्गोरिदम जैसी 'अमूर्त संपत्तियों' का मूल्यांकन करने की मूलभूत क्षमता का अभाव है और वे ऋण वित्तपोषण के लिये पारंपरिक संपार्श्विक (भूमि/भवन) पर बल देते हैं।
- इससे डीपटेक के संस्थापकों को शुरुआती चरणों में उपकरण खरीदने के लिये इक्विटी को अत्यधिक रूप से कम करने के लिये विवश होना पड़ता है, जिससे सीरीज़-B तक पहुँचते-पहुँचते उनके पास 'कंपनी में हिस्सेदारी' बहुत कम रह जाती है, जो विडंबनापूर्ण रूप से भविष्य के निवेशकों को हतोत्साहित करती है।
- क्योंकि पेटेंट अमूर्त होते हैं, इसलिये बैंक प्रायः बैंक गारंटी देने के लिये सावधि जमा में एक महत्त्वपूर्ण नकद राशि की मांग करते हैं। इससे ऋण का लाभ लगभग समाप्त हो जाता है, क्योंकि स्टार्टअप के पास पहले से ही वह नकदी होनी चाहिये जिसे वे उधार लेने का प्रयास कर रहे हैं।
भारत के डीपटेक इकोसिस्टम को मज़बूत करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?
- सॉवरेन रिस्क-गारंटी के माध्यम से 'दीर्घकालिक पूंजी (पेशेंट कैपिटल)' को क्रियान्वित करना: हार्डवेयर स्टार्टअप की विफलता के 'वैली ऑफ डेथ' को समाप्त करने के लिये, सरकार को एक समर्पित 'सॉवरेन डीपटेक फंड-ऑफ-फंड्स' स्थापित करना चाहिये जो त्वरित निकास के बजाय दीर्घकालिक निवेश को प्राथमिकता देता है।
- सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इस फंड को निजी वेंचर कैपिटलिस्टों को 'फर्स्ट-लॉस डिफॉल्ट गारंटी' प्रदान करनी चाहिये, जिससे क्वांटम या स्पेस-टेक जैसे उच्च-विकास वाले क्षेत्रों में उनके प्रवेश के जोखिम को प्रभावी रूप से कम किया जा सके।
- यह तंत्र वित्तीय प्रतिमान को 'जोखिम से बचने' से 'जोखिम साझा करने' की ओर स्थानांतरित करता है, जिससे निजी संस्थागत पूंजी का प्रवाह उन परिसंपत्ति-प्रधान नवाचारों में उत्प्रेरित होता है, जिन्हें परिपक्व होने में 7-10 वर्ष लगते हैं।
- गुणवत्ता-सह-लागत (QCBS) सार्वजनिक खरीद को अनिवार्य बनाना: राज्य को एक निष्क्रिय नियामक से एक सक्रिय 'बाज़ार निर्माता' में परिवर्तित होना चाहिये।
- गुणवत्ता-सह-लागत आधारित चयन (QCBS) के सख्त ढाँचे को लागू करने से यह सुनिश्चित होता है कि स्वदेशी डीपटेक उत्पादों का मूल्यांकन केवल शुरुआती कीमत के बजाय प्रदर्शन और जीवनचक्र मूल्य के आधार पर किया जाता है।
- रक्षा और अवसंरचना परियोजनाओं में स्टार्टअप्स के लिये 'फर्स्ट बायर' कोटा आरक्षित करके, सरकार वैश्विक स्तर पर विस्तार के लिये आवश्यक महत्त्वपूर्ण राजस्व स्पष्टता और वाणिज्यिक सत्यापन प्रदान करती है।
- 'राष्ट्रीय परीक्षण ग्रिड' (लैब-एज़-ए-सर्विस) का निर्माण: स्टार्टअप्स पर पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) के बोझ को काफी हद तक कम करने के लिये, सभी सार्वजनिक अनुसंधान एवं विकास अवसंरचना (ISRO, DRDO, CSIR प्रयोगशालाएँ) को एक एकीकृत 'राष्ट्रीय परीक्षण ग्रिड' पर मैप किया जाना चाहिये।
- यह डिजिटल पोर्टल 'लैब-एज़-ए-सर्विस' मॉडल पर काम करेगा, जिससे निजी स्टार्टअप को 'पे-पर-यूज़' आधार पर विंड टनल, एनकोइक चैंबर या बायो-सेफ्टी लैब बुक करने की सुविधा मिलेगी।
- इन उच्च-मूल्य वाली एसेट्स तक पहुँच को लोकतांत्रिक बनाने से 'प्रोटोटाइप-टू-प्रोडक्शन' चक्र में तेज़ी आती है और स्टार्टअप्स को पहले से मौजूद महंगे इंफ्रास्ट्रक्चर की नकल करने से रोका जा सकता है।
- एकेडमिक स्पिन-ऑफ और IP मुद्रीकरण मानदंडों का उदारीकरण: विश्वविद्यालयों में निहित मूल्य को उजागर करने के लिये एक मानकीकृत 'प्रोफेसर-ऑफ-प्रैक्टिस' नीति की आवश्यकता है, जो संकाय सदस्यों को अपने अकादमिक पदों को छोड़े बिना कंपनियों की सह-स्थापना करने की अनुमति देती है।
- साथ ही, निष्क्रिय सार्वजनिक वित्त पोषित पेटेंटों के लिये एक बाज़ार के रूप में कार्य करने और लाइसेंसिंग समझौतों को सरल बनाने के लिये एक 'राष्ट्रीय IP एक्सचेंज' बनाया जाना चाहिये।
- इससे 'अनुवादात्मक अनुसंधान' की संस्कृति को बढ़ावा मिलता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि अभूतपूर्व वैज्ञानिक शोधपत्र सैद्धांतिक संपत्ति बने रहने के बजाय व्यावसायिक संस्थाओं में परिवर्तित हो जाएँ।
- विषयगत नियामक सैंडबॉक्स की स्थापना: जनरेटिव AI, अंतरिक्ष खनन या सिंथेटिक बायोलॉजी जैसी उभरती 'ग्रे ज़ोन' प्रौद्योगिकियों के लिये, सरकार को 'लाइव नियामक सैंडबॉक्स' अधिसूचित करना चाहिये।
- ये नियंत्रित वातावरण स्टार्टअप्स को पर्यवेक्षण के तहत वास्तविक ग्राहकों के साथ उत्पादों का परीक्षण करने के लिये अस्थायी कानूनी छूट प्रदान करते हैं, जिससे कठोर पारंपरिक कानूनों को दरकिनार किया जा सकता है।
- यह 'अनुकूली विनियमन' दृष्टिकोण नीति को प्रौद्योगिकी के साथ तालमेल स्थापित कर विकसित होने की अनुमति देता है, जिससे नवाचार के अवरोध को रोका जा सकता है, साथ ही दीर्घकालिक सुरक्षा दिशा-निर्देश तैयार करने के लिये डेटा भी क्रिएट होता है।
- गहन विज्ञान प्रतिभा और 'औद्योगिक PhD' फैलोशिप: विशिष्ट प्रतिभा की कमी को दूर करने के लिये 'औद्योगिक PhD फैलोशिप' शुरू करने की आवश्यकता है, जहाँ शोधकर्त्ता अपना समय विश्वविद्यालय प्रयोगशालाओं और डीपटेक स्टार्टअप अनुसंधान एवं विकास केंद्रों के बीच विभाजित करते हैं।
- सरकार को इन पदों के लिये धन उपलब्ध कराना चाहिये ताकि 'वैज्ञानिक संस्थापकों' की एक ऐसी शृंखला तैयार हो सके, जो सैद्धांतिक भौतिकी और इंजीनियरिंग अनुप्रयोग के बीच के अंतराल को समाप्त करने में सक्षम हो।
- यह पहल क्रायोजेनिक्स और फोटोनिक्स जैसे विशिष्ट क्षेत्रों में 'प्रतिभा' का सृजन करती है, जो वर्तमान में हार्डवेयर उद्यमों के विस्तार के लिये सबसे बड़ी परिचालन बाधा है।
- घटक-स्तरीय उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन (PLI): अंतिम असेंबली से आगे बढ़ते हुए PLI ढाँचे को सेंसर, प्रिसिशन एक्टुएटर्स और विशेष मिश्रधातुओं जैसे डीप-टेक घटकों के लिये 'घटक-आधारित प्रोत्साहन' (CLI) योजना में विस्तारित किया जाना चाहिये।
- इन महत्त्वपूर्ण मूलभूत घटकों के घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करने से भू-राजनीतिक आपूर्ति झटकों और व्यापार प्रतिबंधों से पारिस्थितिकी तंत्र सुरक्षित रहता है।
- यह रणनीति एक लचीली 'संप्रभु आपूर्ति शृंखला' का निर्माण करती है, यह सुनिश्चित करते हुए कि भारतीय स्टार्टअप केवल विदेशी कच्चे माल पर निर्भर सिस्टम इंटीग्रेटर न हों।
- बौद्धिक संपदा समर्थित वित्तपोषण और मूल्यांकन मानक: ऋण अंतर को दूर करने के लिये, वित्तीय नियामक को 'बौद्धिक संपदा समर्थित वित्तपोषण' के लिये मानकों को संहिताबद्ध करना चाहिये, जिससे बैंकों को पेटेंट और मालिकाना एल्गोरिदम को ऋण के लिये वैध संपार्श्विक के रूप में स्वीकार करने की अनुमति मिल सके।
- इसके लिये 'तकनीकी मूल्यांकनकर्त्ताओं' के एक दल को प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है, जो अमूर्त संपत्तियों की मौद्रिक क्षमता का सटीक आकलन कर सकें।
- IP को एक वैध आर्थिक परिसंपत्ति-वर्ग के रूप में मान्यता देने से उन स्टार्टअप्स के लिये ऋण पूँजी उपलब्ध होगी जो भौतिक रूप से ‘एसेट-लाइट’ हैं पर बौद्धिक संपदा के हिसाब से ‘एसेट-हेवी’ हैं जिससे अत्यधिक इक्विटी-डाइल्यूशन रोका जा सकेगा।
निष्कर्ष:
भारत की डीप-टेक यात्रा विखंडित नवाचार से आगे बढ़कर रणनीतिक क्षमता-निर्माण की दिशा में परिवर्तन को दर्शाती है, जहाँ तकनीक, प्रतिभा एवं अवसंरचना को बड़े पैमाने पर एकीकृत किया जा रहा है। हालाँकि यदि विकास-चरण की वित्तीय कमी, सरकारी खरीद की जटिल प्रक्रियाओं और व्यावसायीकरण में आने वाली बाधाओं का समाधान नहीं किया गया तो यह गति परिपक्वता तक पहुँचने से पहले ही थम सकती है। आगामी चरण में सरकार की भूमिका केवल अनुदान देने तक सीमित न रहकर बाज़ार-निर्माता और जोखिम-साझेदारी भागीदार के रूप में होनी चाहिये। यदि इसे प्रभावी ढंग से लागू किया गया तो डीप टेक भारत की आर्थिक मज़बूती, रणनीतिक स्वायत्तता और दीर्घकालिक वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता की मज़बूत आधारशिला बन सकता है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: “गहन प्रौद्योगिकी किसी देश की आर्थिक प्रतिस्पर्द्धात्मकता और रणनीतिक स्वायत्तता को तेज़ी से आकार दे रही है।” इस संदर्भ में भारत के गहन प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र का विश्लेषण कीजिये, जिसमें हाल की नीतिगत पहलों एवं उन संरचनात्मक बाधाओं पर प्रकाश डाला गया है जो इसके विस्तार को सीमित करती हैं। |
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1. डीप टेक क्या है?
विज्ञान आधारित, अनुसंधान एवं विकास पर केंद्रित प्रौद्योगिकी जो जटिल, बड़े पैमाने की समस्याओं का समाधान करती है।
प्रश्न 2. डीप टेक पारंपरिक स्टार्टअप से किस प्रकार भिन्न है?
इसका ध्यान क्षमता निर्माण पर केंद्रित है, न कि व्यावसायिक मॉडल या ऐप-आधारित नवाचार पर।
प्रश्न 3. भारत में डीप टेक को परिभाषित करने वाले क्षेत्र कौन-से हैं?
कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अर्द्धचालक, क्वांटम तकनीक, जैव प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, स्वच्छ ऊर्जा।
प्रश्न 4. डीप टेक में राज्य की क्या भूमिका है?
पारिस्थितिकी तंत्र निर्माता, बाज़ार निर्माता और जोखिम साझा करने वाला भागीदार।
प्रश्न 5. भारतीय डीप टेक स्टार्टअप्स के लिये सबसे बड़ी बाधा क्या है?
विकास के चरण (सीरीज़-B+) में दीर्घकालिक पूंजी (पेशेंट कैपिटल) और खरीद में सख्ती।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न 1. अटल नवप्रवर्तन (इनोवेशन) मिशन किसके अधीन स्थापित किया गया है? (2019)
(a) विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग
(b) श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय
(c) नीति (NITI) आयोग
(d) कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय
उत्तर: (c)
मेन्स
प्रश्न 1. कोविड-19 महामारी ने विश्वभर में अभूतपूर्व तबाही उत्पन्न की है। तथापि, इस संकट पर विजय पाने के लिये प्रौद्योगिकीय प्रगति का लाभ स्वेच्छा से लिया जा रहा है। इस महामारी के प्रबंधन के सहायतार्थ प्रौद्योगिकी की खोज़ किस प्रकार की गई, उसका एक विवरण दीजिये। (2020)