अवैध आप्रवासियों के लिये नवीन निर्वासन नीति | 20 Apr 2026

प्रिलिम्स के लिये: विदेशी विषेयक अधिकरण, आप्रवास ब्यूरो, असम समझौता, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर, मुक्त आवाजाही व्यवस्था

मेन्स के लिये: अवैध आप्रवासन और सीमा प्रबंधन, हिरासत और निर्वासन में मानवाधिकार संबंधी चिंताएँ

स्रोत: द हिंदू 

चर्चा में क्यों?

केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) ने अवैध आप्रवासियों, विशेष रूप से बांग्लादेश और म्याँमार, की पहचान और निर्वासन में तेज़ी लाने के लिये एक नवीन व्यापक निर्वासन नीति तैयार की है।

सारांश

  • नवीन निर्वासन नीति संस्थागत तंत्रों के माध्यम से अवैध आप्रवासियों की त्वरित पहचान करने और उसके निष्कासन करने पर केंद्रित है, लेकिन पहचान संबंधी मुद्दों, राजनयिक बाधाओं और मानवाधिकार संबंधी  चिंताओं जैसी चुनौतियों का सामना करती है।
  • आव्रजन और विदेशी अधिनियम, 2025 भारत के आव्रजन कानूनों को समेकित करता है, विदेशियों की निगरानी को मज़बूत करता है और आप्रवास ब्यूरो को वैधानिक समर्थन सहित कठोर दंड एवं प्रवर्तन तंत्र पेश करता है।

नवीन निर्वासन नीति की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?

  • ज़िला-स्तरीय विशेष कार्यबल: राज्यों को अवैध आप्रवासियों का पता लगाने, पहचान करने और निर्वासित करने के लिये प्रत्येक ज़िले में एक विशेष कार्यबल स्थापित करना होगा।
    • उन्हें लापता या अपने वीज़ा पर अधिक समय तक रहने वाले विदेशियों पर एक मासिक स्थिति रिपोर्ट प्रस्तुत करना आवश्यक है।
  • सत्यापन के लिये समय-सीमा: संदिग्ध बांग्लादेशी या म्याँमारी नागरिकों, विशेष रूप से यदि वे किसी अन्य राज्य में निवास का दावा करते हैं, के पूर्व इतिहास को सत्यापित करने के लिये 90 दिनों की सीमा निर्धारित की गई है।
  • हिरासत केंद्रों/शिविरों का संचालन: राज्य बाध्य हैं कि वे होल्डिंग सेंटर स्थापित करें, जो निर्वासन का इंतजार कर रहे अवैध आप्रवासियों की गतिविधियों को सीमित करने के लिये 10 फीट ऊँची काँटेदार तारों से घिरी बाउंड्रीवाल से सुसज्जित हों।
    • इन केंद्रों को जेलों से नहीं चलाया जाना चाहिये। यदि सरकारी भूमि उपलब्ध नहीं है तो निजी भवनों को किराए पर लिया जा सकता है।
    • पुरुषों और महिलाओं के लिये अलग-अलग परिसर, खुले स्थान, LPG कनेक्शन, चिकित्सालय और एंबुलेंस जैसी बुनियादी सुविधाएँ सुनिश्चित की जानी चाहिये।
    • एक ही परिवार के सदस्यों को अलग नहीं किया जाना चाहिये और उन्हें एक साथ रखा जाना चाहिये।
  • विदेशी विषेयक अधिकरणों में आवेदन: हिरासत केंद्रों के लिये दिशानिर्देश उन लोगों पर भी लागू होते हैं जिन्हें विदेशी विषेयक अधिकरणों (FT) द्वारा विदेशी घोषित किया गया है, जो असम के लिये यूनिक  हैं।
  • दस्तावेज़ रद्द करना और ब्लैकलिस्टिंग: आप्रवासियों द्वारा अवैध रूप से प्राप्त दस्तावेज़ों (जैसे– आधार, पैन कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस) को रद्द करने के लिये एक निर्दिष्ट पोर्टल पर अपलोड किया जाना चाहिये। 
    • निर्वासित व्यक्तियों को भविष्य में प्रवेश से रोकने के लिये आप्रवास ब्यूरो द्वारा "ब्लैकलिस्ट" किया जाएगा।
  • विदेशियों की पहचान हेतु पोर्टल (FIP): पकड़े गए अवैध आप्रवासियों के बायोमेट्रिक (फिंगर मार्क और फेस इमेज) और जनसांख्यिकीय विवरण को कैप्चर करने के लिये एक समर्पित पोर्टल लॉन्च किया गया है।
  • सीमा अवरोधन प्रोटोकॉल: भूमि या समुद्री सीमा पार करते हुए पकड़े गए लोगों को बायोमेट्रिक कैप्चर के बाद तुरंत वापस भेज दिया जाएगा।
    • अनजाने में सीमा पार करने वालों को, यदि पूछताछ के बाद निर्दोष पाया जाता है, तो उन्हें हिरासत में लेने के बजाय संबंधित देशों के सीमा रक्षक बलों को सौंपा जा सकता है।

नवीन निर्वासन नीति की क्या आवश्यकता है?

  • भारत में अवैध आप्रवासन का ऐतिहासिक संदर्भ: भारत में अवैध आप्रवासन समय के साथ विकसित हुआ है, जो विभाजन (1947) के दौरान पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) से बड़े पैमाने पर आंदोलनों से प्रारंभ हुआ, उसके बाद वर्ष 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान प्रमुख प्रवाह देखा गया।
    • जनसांख्यिकीय परिवर्तन संबंधी चिंताओं ने असम आंदोलन और असम समझौते (1985) को जन्म दिया, जिसने अवैध आप्रवासियों की पहचान के लिये 24 मार्च, 1971 को कट-ऑफ डेट के रूप में निर्धारित किया।
    • 1990 के दशक से बांग्लादेश और म्याँमार के साथ सुभेद्य सीमाओं, आर्थिक असमानताओं, पर्यावरणीय तनाव और राजनीतिक अस्थिरता के साथ आप्रवासन जारी रहा है, जबकि नेपाल के साथ खुली सीमाएँ निगरानी को जटिल बनाती हैं।
    • हाल के वर्षों में, यह मुद्दा सुरक्षा, पहचान की राजनीति और संसाधन दबावों से जुड़ गया है, जिससे सीमा पर बाड़ लगाना, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) बहस और निर्वासन अभियानों जैसे कठोर उपायों को बढ़ावा मिला है।

आवश्यकता

  • आंतरिक सुरक्षा अनिवार्यताएँ: निर्वासन के लिये दबाव हाल की राष्ट्रीय सुरक्षा घटनाओं की पृष्ठभूमि में आता है, जिसमें पहलगाम आतंकी हमला (अप्रैल 2025) और उसके बाद के सैन्य अभियान (ऑपरेशन सिंदूर, मई 2025) शामिल हैं, जिसने घरेलू सुरक्षा प्रोटोकॉल पर ध्यान केंद्रित किया।
  • पड़ोस में भू-राजनीतिक अस्थिरता: अगस्त 2024 में बांग्लादेश में शासन परिवर्तन के कारण गृह मंत्रालय ने उन व्यक्तियों को सक्रिय रूप से ट्रैक करने का निर्देश दिया जो अवैध रूप से भारत में प्रवेश कर सकते थे और नकली दस्तावेज़ों पर रह रहे थे।
  • संसाधन संकट और जनसांख्यिकीय चिंताएँ: अनियमित अवैध आप्रवासन से स्थानीय संसाधनों में कमी आती है, सीमावर्ती राज्यों की जनसांख्यिकीय प्रोफाइल में बदलाव आता है और सामाजिक-आर्थिक संघर्षों के बढ़ने की संभावना होती है (जैसा कि ऐतिहासिक रूप से असम आंदोलन के दौरान देखा गया था)।

भारत में विदेशियों से संबंधित कानूनी ढाँचा क्या है?

  • आप्रवासन एवं विदेशी अधिनियम, 2025: यह भारत के आप्रवासन ढाँचे को समेकित करता है, चार पुराने कानूनों—पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम, 1920, विदेशियों का रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1939, विदेशियों विषियक अधिनियम, 1946 और आप्रवासन (वाहक दायित्व) अधिनियम, 2000—को प्रतिस्थापित करता है तथा अधिक सख्त नियामक एवं प्रवर्तन उपायों को प्रस्तुत करता है।
    • यह अधिनियम होटलों, शैक्षणिक संस्थानों और स्वास्थ्य सुविधाओं द्वारा विदेशी नागरिकों की अनिवार्य रिपोर्टिंग का प्रावधान करता है, साथ ही एयरलाइंस तथा शिपिंग कंपनियों को अग्रिम यात्री और चालक दल का डेटा साझा करने की भी आवश्यकता होती है।
    • इसके अतिरिक्त यह केंद्र सरकार को सुरक्षा के आधार पर विदेशियों द्वारा उपयोग किये जाने वाले परिसरों को विनियमित करने या बंद करने का अधिकार देता है तथा अवैध आप्रवासियों की पहचान, हिरासत और निर्वासन के लिये आप्रवास ब्यूरो को वैधानिक आधार प्रदान करता है।
  • सीमा-विशिष्ट समझौते: पड़ोसी देशों के आधार पर आवाजाही के नियम काफी भिन्न होते हैं। भारत का नेपाल के साथ मुक्त सीमा समझौता है और म्याँमार के साथ मुक्त आवाजाही व्यवस्था (FMR) लागू है, जो पारंपरिक रूप से लोगों को सीमा के दोनों ओर 10 किमी. तक आने-जाने की अनुमति देता है।
  • संवैधानिक शक्तियों का प्रत्यायोजन: संविधान के अनुच्छेद 258(1) के तहत केंद्र सरकार ने अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों की पहचान करने और उन्हें निर्वासित करने की शक्ति राज्य सरकारों तथा केंद्रशासित प्रदेशों के प्रशासन को सौंप दी है।
  • शरणार्थी स्थिति की सीमाएँ: 2021 में म्याँमार में सैन्य तख्तापलट के बाद हज़ारों चिन (Chin) शरणार्थी मिज़ोरम में आए। हालाँकि गृह मंत्रालय (MHA) ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकारें ‘शरणार्थी’ का दर्जा प्रदान नहीं कर सकतीं, क्योंकि भारत 1951 के संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी सम्मेलन या उसके 1967 प्रोटोकॉल का हस्ताक्षरकर्त्ता नहीं है।
  • संवैधानिक शक्तियों का प्रत्यायोजन: संविधान के अनुच्छेद 258(1) के तहत केंद्र सरकार ने अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों की पहचान करने और उन्हें निर्वासित करने की शक्ति राज्य सरकारों और केंद्रशासित प्रदेशों के प्रशासन को सौंप दी है।
  • विदेशी (न्यायाधिकरण) आदेश, 1964: यह सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में ज़िला मजिस्ट्रेटों को यह अधिकार देता है कि वे यह कानूनी रूप से निर्धारित करने के लिये न्यायाधिकरण स्थापित करें कि भारत में रह रहा कोई व्यक्ति विदेशी है या नहीं।

  निर्वासन और पुशबैक नीति

  • निर्वासन: यह एक औपचारिक कानूनी प्रक्रिया है, जिसमें अवैध प्रवेश करने या बिना वैध दस्तावेज़ों के भारत में रह रहे विदेशी नागरिक को कानूनी रूप से हिरासत में लेकर गिरफ्तार किया जाता है।
  • व्यक्ति के मामले को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाना आवश्यक होता है। निर्वासन तभी किया जाता है जब सभी कानूनी प्रक्रियाएँ (दोषसिद्धि सहित) पूरी हो जाएँ और संबंधित व्यक्ति की पहचान की पुष्टि उसके मूल देश द्वारा आधिकारिक रूप से कर दी जाए।
  • शक्तियों का प्रत्यायोजन: नागरिकता और विदेशी मामलों का विषय संघ सूची के अंतर्गत आता है, फिर भी गृह मंत्रालय (MHA) विदेशी नागरिकों को निर्वासित करने की शक्ति राज्य सरकारों को सौंपता है, क्योंकि इस विशेष कार्य के लिये केंद्र सरकार के पास समर्पित संघीय पुलिस बल नहीं है।
  • पुशबैक: यह एक अनौपचारिक प्रक्रिया है, जिसके लिये कोई स्पष्ट नियम निर्धारित नहीं होते। इसमें सीमा सुरक्षा बल अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर किसी विदेशी को पकड़कर अपने विवेक के आधार पर उसे गिरफ्तार कर भारतीय कानूनी प्रणाली के सामने प्रस्तुत करने के बजाय सीधे सीमा पार वापस भेज देते हैं।
  • भारत की पुशबैक नीति उचित प्रक्रिया, कानूनी वैधता और मानवीय दायित्वों को लेकर गंभीर चिंताएँ उत्पन्न करती है, क्योंकि इसे अक्सर बिना द्विपक्षीय परामर्श के लागू किया जाता है। यह नॉन-रिफाउलमेंट जैसे सिद्धांतों का भी उल्लंघन करती है।

नई निर्वासन नीति से जुड़ी चुनौतियाँ क्या हैं?

  • पहचान की दुविधा: लाखों भारतीय, विशेषकर जो 1980 के दशक के मध्य से पहले जन्मे हैं या निकृष्ट परिस्थितियों में रहते हैं, उनके पास मानक जन्म प्रमाण-पत्र नहीं हैं।
    • इस अस्पष्टता के कारण पहचान अभियानों के दौरान निर्दोष नागरिकों को अनावश्यक उत्पीड़न या हिरासत का सामना करना पड़ सकता है।
  • निर्वासन में कूटनीतिक बाधाएँ: निर्वासन एक द्विपक्षीय प्रक्रिया है, जिसमें मूल देश (जैसे– बांग्लादेश या म्याँमार) का संबंधित व्यक्तियों को अपने नागरिक के रूप में आधिकारिक रूप से स्वीकार करना आवश्यक होता है।
    • यदि मूल देश नागरिकता से इनकार कर देता है, तो संबंधित व्यक्ति राज्यविहीन होने के जोखिम में पड़ जाते हैं और अनिश्चित काल तक निरुद्ध केंद्रों में फँसे रह सकते हैं।
  • मानवाधिकार संबंधी चिंताएँ: यद्यपि नीति के तहत मूलभूत सुविधाएँ प्रदान करने का प्रावधान है, फिर भी निरुद्ध केंद्रों में ऐतिहासिक रूप से खराब जीवन स्थितियों के आरोप लगते रहे हैं।
    • व्यक्तियों, जिनमें बच्चे और महिलाएँ भी शामिल हैं, को लंबी अवधि तक हिरासत में रखना नैतिक और मानवाधिकार संबंधी चिंताएँ उत्पन्न करता है।
    • भारत के मज़बूत वैश्विक रिकॉर्ड और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (2026–28) में सातवें कार्यकाल के लिये उसके निर्वाचन के बावजूद, ऐसे कदम उसकी अंतर्राष्ट्रीय छवि और विश्वसनीयता को कमज़ोर करने का जोखिम पैदा करते हैं।
  • राज्य मशीनरी पर भार: ज़िला पुलिस और स्थानीय प्रशासन, जो पहले से ही कानून-व्यवस्था के कार्यों में व्यस्त हैं, कड़ी 90-दिवसीय समय-सीमा के भीतर राष्ट्रीयता सत्यापन के लिये आवश्यक क्षमता और प्रशिक्षण का अभाव रखते हैं।
    • इससे देरी का जोखिम उत्पन्न होता है, मामलों के लंबित रहने की संख्या बढ़ती है, भ्रष्टाचार के रास्ते खुलते हैं और महिलाओं तथा अन्य कमज़ोर वर्गों पर इसका असमान प्रभाव पड़ता है।

निर्वासन नीति को और सुदृढ़ करने के लिये कौन-से उपाय किये जा सकते हैं?

  • सुदृढ़ एवं मानवीय सत्यापन: सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिये कि सत्यापन प्रक्रिया अत्यंत पारदर्शी हो और वैध भारतीय नागरिकों के उत्पीड़न को रोकने के लिये बहु-स्रोत डेटा पर आधारित हो।
  • सक्रिय कूटनीतिक सहभागिता: भारत को पड़ोसी देशों के साथ सक्रिय रूप से कूटनीतिक स्तर पर जुड़कर निर्वासित नागरिकों की सुगम और समयबद्ध स्वीकृति के लिये एक सुव्यवस्थित मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) स्थापित करनी चाहिये।
  • अंतर्राष्ट्रीय मानकों का पालन: यद्यपि राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि है, फिर भी होल्डिंग केंद्रों में अवैध आप्रवासियों के साथ व्यवहार अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुरूप होना चाहिये तथा संवेदनशील समूहों के लिये मनोवैज्ञानिक और चिकित्सकीय देखभाल सुनिश्चित की जानी चाहिये।
  • सीमा अवसंरचना को सुदृढ़ करना: अंतिम समाधान स्रोत पर ही अवैध घुसपैठ को रोकने में निहित है। व्यापक एकीकृत सीमा प्रबंधन प्रणाली (CIBMS) के कार्यान्वयन और संवेदनशील क्षेत्रों में स्मार्ट फेंसिंग लगाने से अनधिकृत प्रवेश में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।
  • दस्तावेज़ीकरण और सत्यापन को सुदृढ़ करना: दस्तावेज़ीकरण प्रक्रिया को अधिक कड़ा बनाया जाना चाहिये, जिसमें आधार और मतदाता पहचान-पत्र जैसे पहचान दस्तावेज़ों के लिये सशक्त सत्यापन तंत्र शामिल हों। साथ ही, उन्नत पुलिस जाँच और सुदृढ़ स्थानीय खुफिया इकाइयों (LIU) को सुदृढ़ किया जाए तथा दुरुपयोग को रोकने के लिये जन-जागरूकता भी बढ़ाई जाए।

निष्कर्ष


गृह मंत्रालय (MHA) की निर्वासन नीति सीमा सुरक्षा को मज़बूत करती है और अवैध आप्रवासन के विरुद्ध कार्रवाई को सुव्यवस्थित बनाती है। इसकी सफलता निष्पक्ष कार्यान्वयन, पारदर्शिता और पड़ोसी देशों के साथ सहयोग पर निर्भर करेगी, साथ ही यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक होगा कि मानवाधिकारों और वास्तविक नागरिकों की सुरक्षा बनी रहे।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न: ‘कठोर आप्रवास कानून राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ करते हैं, लेकिन मानवाधिकारों को प्रभावित कर सकते हैं।’ भारत के आप्रवास और विदेशियों विषयक अधिनियम, 2025 के संदर्भ में समालोचनात्मक परीक्षण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. आप्रवास और विदेशियों विषयक अधिनियम, 2025 क्या है?
यह एक समेकित विधिक ढाँचा है, जो चार पुराने कानूनों का स्थान लेता है और भारत में विदेशियों के प्रवेश, निवास और निर्वासन को कठोर प्रवर्तन प्रावधानों के साथ विनियमित करने का उद्देश्य रखता है। 

2. इस अधिनियम के तहत आप्रवास ब्यूरो की क्या भूमिका है?
इसे वैधानिक आधार दिया गया है, जिसके तहत यह अवैध आप्रवासियों की पहचान, हिरासत, ब्लैकलिस्टिंग और निर्वासन कर सकता है। 

3. निर्वासन और पुशबैक में क्या अंतर है?
निर्वासन एक औपचारिक कानूनी प्रक्रिया है, जो विधिसम्मत प्रक्रिया के बाद की जाती है; जबकि पुशबैक एक अनौपचारिक सीमा-कार्रवाई है, जिसमें कानूनी कार्यवाही शामिल नहीं होती। 

4. निर्वासन नीति के अंतर्गत होल्डिंग सेंटर क्या हैं?
ये निर्धारित सुविधाएँ हैं, जहाँ अवैध आप्रवासियों को निर्वासन पूर्ण होने तक मूलभूत सुविधाओं के साथ हिरासत में रखा जाता है। 

5. अवैध आप्रवासियों के निर्वासन में प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
पहचान संबंधी समस्याएँ, मूल देश के सहयोग का अभाव, मानवाधिकार संबंधी चिंताएँ तथा राज्यों पर प्रशासनिक भार।


UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रिलिम्स 

प्रश्न. निम्नलिखित युम्मों पर विचार कीजिये: (2016)

क्र.सं.

समाचारों में कभी-कभी उल्लिखित समुदाय

किसके मामले में

कुर्द 

बांग्लादेश

मधेसी

नेपाल 

रोहिंग्या

म्याँमार

उपर्युक्त में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित है/हैं?

(a) 1 और 2

(b) केवल 2

(c) 2 और 3

(d) केवल 3

उत्तर: (c) 


मेन्स 

प्रश्न. “शरणार्थियों को उस देश में वापस नहीं लौटाया जाना चाहिये जहाँ उन्हें उत्पीड़न अथवा मानवाधिकारों के उल्लंघन का सामना करना पड़ेगा।” खुले समाज और लोकतांत्रिक होने का दावा करने वाले किसी राष्ट्र के द्वारा नैतिक आयाम के उल्लंघन के संदर्भ में इस कथन का परीक्षण कीजिये। (2021)

प्रश्न. बड़ी परियोजनाओं के नियोजन के समय मानव बस्तियों का पुनर्वास एक महत्त्वपूर्ण पारिस्थितिक संघात है, जिस पर सदैव विवाद होता है। विकास की बड़ी परियोजनाओं के प्रस्ताव के समय इस संघात को कम करने के लिये सुझाए गए उपायों पर चर्चा कीजिये। (2016)

प्रश्न. पिछले चार दशकों में भारत के अंदर और बाहर श्रम प्रवास के रुझानों में बदलाव पर चर्चा कीजिये। (2015)