घरेलू स्थिरता की सीमाएँ | 24 Jan 2026
प्रिलिम्स के लिये: केंद्रीय बजट, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI), विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI), उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI)
मेन्स के लिये: भारत में घरेलू बचत और ऋण के रुझान, भारत के विकास मॉडल में निजी उपभोग की भूमिका, राजकोषीय समेकन बनाम कल्याणकारी व्यय
चर्चा में क्यों?
केंद्रीय बजट 2026 के समीप आते ही भारत के समष्टि आर्थिक संकेतक वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच समग्र स्थिरता और अपेक्षाकृत मज़बूती को दर्शाते हैं।
- हालाँकि भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट (2025) और वार्षिक रिपोर्ट 2024–25 के गहन विश्लेषण से पता चलता है कि घरेलू परिवार कम बचत कर रहे हैं, अधिक उधार ले रहे हैं, और पहले राज्य द्वारा साझा किये जाने वाले आर्थिक जोखिमों को अब बढ़ते हुए स्वयं सहन कर रहे हैं।
सारांश
- संगठित बजट 2026 के पहले स्थिर मैक्रो संकेतकों के बावजूद, RBI के आँकड़े बताते हैं कि घरेलू बचत घट रही है और अस्थिर हो रही है, ऋण बढ़ रहा है एवं उपभोग बनाए रखने के लिये परिवार अधिक क्रेडिट पर निर्भर हो रहे हैं, जिससे आर्थिक जोखिम राज्य से घरानों की ओर स्थानांतरित हो रहा है।
- ऋण-आधारित उपभोग और बढ़ता हुआ असुरक्षित क्रेडिट वित्तीय स्थिरता को खतरे में डालते हैं, असमानता को बढ़ाते हैं, बैंकों पर दबाव डालते हैं तथा भारत के जनसांख्यिकीय लाभ को कमज़ोर करते हैं, जो वास्तविक आय, बचत एवं सामाजिक सुरक्षा नेटवर्क को मज़बूत करने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
घरेलू स्थिरता को लेकर क्या चिंताएँ हैं?
- घरेलू बचत में गिरावट और अस्थिरता: शुद्ध वित्तीय बचत 2024-25 की अंतिम तिमाही में GDP का 7.6% तक पहुँच गई, लेकिन इससे पहले की तिमाही में यह लगभग GDP का 3-4% रह गई थी।
- इस तरह की अस्थिरता घरेलू आय, स्वास्थ्य या रोज़गार में आ रहे चुनौतियों को सहने की क्षमता को कमज़ोर कर देती है।
- घरेलू ऋण में वृद्धि: घरेलू ऋण 2021 में लगभग GDP का 36% था, जो मार्च 2025 तक बढ़कर 41.3% हो गया।
- RBI की वार्षिक रिपोर्ट 2024–25 के अनुसार, वास्तविक आय का विकास असमान बना हुआ है; आय में बढ़ोतरी मुख्य रूप से औपचारिक क्षेत्रों तक सीमित है, जबकि अनौपचारिक और स्वरोज़गार श्रमिकों की आय स्थिर नहीं है या अस्थिर बनी रहती है, जिससे लगातार बचत करना कठिन हो जाता है।
- ऋण-आधारित उपभोग: कमज़ोर आय वृद्धि के बावजूद स्थिर उपभोग यह दर्शाता है कि परिवारों की क्रेडिट पर निर्भरता बढ़ रही है।
- निजी उपभोग GDP में लगभग 60% का योगदान देता है। ऋण-समर्थित उपभोग पर निर्भरता आर्थिक तनाव के दौरान अचानक खर्च में कटौती का जोखिम बढ़ा देती है।
- ऋण-आधारित उपभोग मंदी के दौरान सीमित समायोजन की सुविधा प्रदान करता है और ब्याज दरों में बदलाव के प्रति संवेदनशीलता बढ़ा देता है।
- वित्तीय दायित्वों की तीव्र वृद्धि: जबकि सकल घरेलू वित्तीय संपत्ति GDP का 106.6% थी, मार्च 2025 तक दायित्व बढ़कर GDP का 41.3% हो गया। दायित्वों के तेज़ी से बढ़ने से शुद्ध वित्तीय बचत में कमी का कारण समझा जा सकता है।
- असुरक्षित खुदरा ऋण में बढ़ता जोखिम: असुरक्षित व्यक्तिगत ऋणों और क्रेडिट कार्डों में तीव्र वृद्धि से घरेलू वित्तीय संवेदनशीलता बढ़ रही है, क्योंकि इन ऋणों पर ब्याज दरें अधिक होती हैं तथा संकट की परिस्थितियों में पुनर्भुगतान की क्षमता सीमित रहता है।
- जैसे‑जैसे नई बचत का बड़ा हिस्सा नई उधारी से संतुलित हो रहा है, वैसे‑वैसे परिवारों की बेरोज़गारी, महँगाई या अचानक आने वाले चिकित्सकीय व्यय जैसे आघातों से निपटने की क्षमता कम होती जा रही है।
- राजकोषीय समेकन द्वारा घरेलू परिवारों को जोखिम हस्तांतरण: 2024–25 के बजट से पता चलता है कि केंद्र और राज्य सरकारें राजस्व व्यय को सीमित करते हुए पूंजीगत खर्च को प्राथमिकता दे रही हैं। लगभग 30–32% राज्यीय राजस्व वेतन, पेंशन और ब्याज के भुगतान में ही बंधा होने के कारण आय‑सहायता जैसी योजनाओं के लिये वित्तीय गुंजाइश कम हो गई है।
- यह निवेश‑प्रेरित रणनीति मध्यम अवधि में विकास को तो बढ़ावा देती है, लेकिन अल्पकालिक आय में आने वाले नुकसान हेतु कम सहयोग प्रदान कर पाती है, जिससे आर्थिक जोखिम सरकारों से हटकर परिवारों पर आ जाता है।
अस्थिर घरेलू बचत के निहितार्थ क्या हैं?
- मैक्रोइकॉनॉमिक निहितार्थ:
- "बचत-निवेश" अंतर: घरेलू बचत में गिरावट सरकार और निजी क्षेत्र को विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) एवं बाह्य ऋण पर अधिक निर्भर होने के लिये बाध्य करती है। हालाँकि FPI की वर्ष 2025 में रिकॉर्ड ₹1.66 लाख करोड़ की वापसी के साथ भारत से आक्रामक निकासी के कारण, यह निर्भरता बाहरी आघातों और वित्तीय तनाव के प्रति सुभेद्यता को बढ़ाती है।
- इससे वैश्विक "आघातों" (जैसे- फेड दर में वृद्धि) के प्रति भारत की संवेदनशीलता बढ़ती है और चालू खाता घाटा (CAD) असंतुलित हो जाता है।
- राजकोषीय घाटे का क्राउडिंग आउट: घरेलू बचत कम होने पर, सरकार को कम ब्याज दरों पर अपने राजकोषीय घाटे के वित्तपोषण में कठिनाई हो सकती है।
- इससे राज्य के लिये ऋण की लागत बढ़ सकती है, जिससे निजी निवेश "क्राउडिंग आउट" देखने को मिलता है।
- "बचत-निवेश" अंतर: घरेलू बचत में गिरावट सरकार और निजी क्षेत्र को विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) एवं बाह्य ऋण पर अधिक निर्भर होने के लिये बाध्य करती है। हालाँकि FPI की वर्ष 2025 में रिकॉर्ड ₹1.66 लाख करोड़ की वापसी के साथ भारत से आक्रामक निकासी के कारण, यह निर्भरता बाहरी आघातों और वित्तीय तनाव के प्रति सुभेद्यता को बढ़ाती है।
- वित्तीय प्रणालीगत निहितार्थ:
- बैंक वित्तपोषण गुणवत्ता का ह्रास: पारंपरिक रूप से, बैंक कम लागत वाले, स्थिर घरेलू जमा पर निर्भर थे।
- वित्तीयकरण की ओर बढ़ता रुझान (घरेलू परिवारों का म्यूचुअल फंड/इक्विटी में पैसा लगाना) बैंकों को महँगे थोक (expensive wholesale) वित्तपोषण का उपयोग करने के लिये मज़बूर करता है, जो अधिक अस्थिर है और बैंक मार्जिन (NIM) को कम करता है।
- परिसंपत्ति गुणवत्ता: वर्तमान ऋण का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा असुरक्षित खुदरा ऋण (व्यक्तिगत ऋण, क्रेडिट कार्ड) है।
- ये "फर्स्ट-लॉस" असेट हैं; यदि अर्थव्यवस्था मंद होती है, इस वर्ग में होने वाले डिफॉल्ट का भार बिना किसी गारंटी के सीधे बैंकों की बैलेंस शीट पर आता है।
- बाज़ार अस्थिरता जोखिम: जब अधिक परिवार बैंक जमा जैसे सुरक्षा-कवच के बिना ही सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) के माध्यम से शेयर बाज़ार में प्रवेश करते हैं, तो लंबे समय तक चलने वाली बाज़ार गिरावट की स्थिति में घबराहट में निकासी का जोखिम बढ़ जाता है। इससे एक नकारात्मक चक्र बन सकता है, जो न केवल इक्विटी बाज़ार को अस्थिर करता है बल्कि घरेलू संपत्ति को भी गंभीर रूप से प्रभावित करता है।
- बैंक वित्तपोषण गुणवत्ता का ह्रास: पारंपरिक रूप से, बैंक कम लागत वाले, स्थिर घरेलू जमा पर निर्भर थे।
- सामाजिक-आर्थिक निहितार्थ:
- जनसांख्यिकीय लाभांश को खतरा: यदि घरेलू आय का एक बड़ा भाग किस्तों (EMI) में चला जाता है, तो "मानव पूंजी" (बच्चों के लिये गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और पोषण) में निवेश प्रायः पीछे रह जाता है, जो भारत की दीर्घकालिक उत्पादकता को कमज़ोर करता है।
- बढ़ती असमानता: "K-आकार" की स्थिरता प्रवृत्ति दर्शाती है कि उच्च आय वाले घरों की संपत्ति शेयर बाज़ारों के माध्यम से बढ़ रही है, निम्न-आय वर्ग सर्वाइव करने के लिये ऋण ले रहे हैं।
- यह धन अंतर को बढाता है और सामाजिक तनाव का कारण बन सकता है।
घरेलू बचत में सुधार के लिये क्या कदम आवश्यक हैं?
- मुद्रास्फीति लक्ष्यों का पुनर्संतुलन: सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) को उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) की टोकरी की समीक्षा करनी चाहिये, ताकि शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती लागत का बेहतर प्रतिबिंब मिल सके। इससे यह सुनिश्चित होगा कि मौद्रिक नीति मध्य वर्ग की क्रय-शक्ति की प्रभावी रूप से रक्षा कर सके।
- वित्तीय बचत को प्रोत्साहन: पारंपरिक दीर्घकालिक बचत साधनों — जैसे सार्वजनिक भविष्य निधि (PPF) या दीर्घावधि बैंक जमाओं — पर कर संबंधी प्रोत्साहनों को बढ़ाया जाना चाहिये, ताकि उच्च जोखिम वाले सट्टा बाज़ारों की ओर अत्यधिक झुकाव को हतोत्साहित किया जा सके।
- वास्तविक वेतन वृद्धि पर ध्यान: नीति का केंद्र उच्च गुणवत्ता वाले, औपचारिक क्षेत्र के रोज़गार सृजन की ओर स्थानांतरित होना चाहिये।
- उत्पादन आधारित पहल (PLI) संबंधी योजनाओं के माध्यम से विनिर्माण क्षेत्र को सुदृढ़ करने से स्थिर आय-वृद्धि संभव होगी, जो ऋण वृद्धि की तुलना में तीव्र हो सके।
- सामाजिक सुरक्षा जाल को मज़बूत करना: सस्ती सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं और बीमा कवरेज — जैसे आयुष्मान भारत —के विस्तार से स्वास्थ्य संकट के समय परिवारों द्वारा बड़े पैमाने पर नकद संचित करने या ऋण लेने की “एहतियाती” आवश्यकता कम की जा सकती है।
- वित्तीय साक्षरता और विनियमन: RBI को “मैक्रो-प्रूडेंशियल उपायों” पर अपनी सक्रिय नीति जारी रखनी चाहिये—जैसे असुरक्षित ऋणों पर जोखिम भार बढ़ाना—ताकि परिवार स्थायी ऋण के दबाव में आने से बच सकें।
निष्कर्ष
ऐसी आर्थिक स्थिरता, जो मांग बनाए रखने के लिये परिवारों के बढ़ते ऋण पर निर्भर हो, दीर्घकाल में आत्मनिर्भर नहीं हो सकती। जैसे-जैसे केंद्रीय बजट 2026 की घोषणा निकट आ रही है, प्रमुख राजकोषीय चुनौती घरेलू बजट-गणना में संतुलन बहाल करना है, ताकि भारत की विकास-गाथा समावेशी और सुदृढ़ दोनों बनी रह सके।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. घरेलू बचत में कमी भारत में मैक्रोइकोनॉमिक स्टेबिलिटी और एक्सटर्नल सेक्टर की सस्टेनेबिलिटी को कैसे प्रभावित करती है? |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भारत में घरेलू बचत को अस्थिर क्यों माना जाता है?
शुद्ध वित्तीय बचत अस्थिर हो गई है, कुछ तिमाहियों में यह GDP के 3-4% तक गिर गई है, जिससे परिवारों की आय और रोज़गार के आघातों को सहन करने की क्षमता कमज़ोर हो गई है।
मध्यम ऋण-से-GDP स्तरों के बावजूद बढ़ता घरेलू ऋण चिंता का विषय क्यों है?
ऋण वृद्धि असमान आय में वृद्धि और असुरक्षित क्रेडिट से प्रेरित है, जिससे पुनर्भुगतान ब्याज दर में बढ़ोतरी एवं आर्थिक मंदी के प्रति संवेदनशील हो जाता है।
ऋण-वित्तपोषित उपभोग भारत के विकास मॉडल को कैसे प्रभावित करता है?
निजी उपभोग GDP का लगभग 60% है, इसलिये क्रेडिट पर निर्भरता तनाव की अवधि के दौरान आकस्मिक मांग में कमी का जोखिम बढ़ाती है।
असुरक्षित खुदरा ऋण बैंकों के लिये क्या जोखिम उत्पन्न करता है?
बिना ज़मानत वाले ऋण ऊँची ब्याज दर वाले और फर्स्ट‑लॉस असेट होते हैं, जो आर्थिक मंदी के समय प्रत्यक्ष रूप से बैंकों की बैलेंस शीट पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं।
मेन्स प्रश्न
प्रश्न. भारत की संभाव्य संवृद्धि के अनेक कारको में बचत दर, सर्वाधिक प्रभावी है। क्या आप इससे सहमत हैं ? संवृद्धि संभाव्यता के अन्य कौन-से कारक उपलब्ध हैं ? (2017)