अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस | 24 Feb 2026
प्रिलिम्स के लिये: अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस, UNESCO, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020, DIKSHA, PM eVIDYA, अनुच्छेद 29, भाषायी अल्पसंख्यकों के लिये एक विशेष अधिकारी, भारतीय सांकेतिक भाषा (ISL)।
मेन्स के लिये: अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के संबंध में मुख्य तथ्य, UNESCO SoER 2025 रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष, मातृभाषा पर आधारित शिक्षा की ज़रूरत, MTB-MLE को लागू करने में मुख्य चुनौतियाँ और आगे की राह।
चर्चा में क्यों?
21 फरवरी को विश्व भर में मनाए जा रहे अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के अवसर पर यूनेस्को की भारत के लिये सातवीं स्टेट ऑफ द एजुकेशन रिपोर्ट 2025 ‘भाषा मैटर्स: मातृभाषा एवं बहुभाषी शिक्षा’ ने भाषायी विविधता को गुणवत्तापूर्ण अधिगम की आधारशिला के रूप में पुनर्परिभाषित किया है।
सारांश
- यूनेस्को की SoER 2025 रिपोर्ट बताती है कि यद्यपि राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 मातृभाषा-आधारित शिक्षा का दृढ़ समर्थन करती है, फिर भी नीति और कक्षा-स्तरीय क्रियान्वयन के बीच बड़ा अंतर मौजूद है।
- एक गंभीर अधिगम संकट बना हुआ है क्योंकि लगभग 44% बालक विद्यालय में भाषा-असंगति (Language Mismatch) का सामना करते हैं, जो सशक्त MTB-MLE के प्रभावी कार्यान्वयन की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
- रिपोर्ट में त्वरित कार्रवाई का आह्वान किया गया है, जिसमें शिक्षक-प्रशिक्षण, DIKSHA जैसे डिजिटल अवसंरचना का उपयोग तथा MTB-MLE के लिये एक राष्ट्रीय मिशन की स्थापना शामिल है।
अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस
- परिचय: संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) ने वर्ष 1999 में 21 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस घोषित किया। वर्ष 2000 से इसे वैश्विक स्तर पर भाषायी एवं सांस्कृतिक विविधता तथा बहुभाषिकता को बढ़ावा देने के लिये मनाया जा रहा है।
- अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 2026 की थीम है "बहुभाषी शिक्षा पर युवाओं की आवाज़" (Youth Voices on Multilingual Education)।
- ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: यह दिवस 21 फरवरी, 1952 को ढाका (तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) में हुए बांग्ला भाषा आंदोलन के दौरान मातृभाषा बांग्ला को मान्यता दिलाने की मांग करते हुए शहीद हुए विद्यार्थियों के बलिदान की स्मृति में मनाया जाता है।
- उद्देश्य: विश्व भर में भाषायी विरासत, सांस्कृतिक विविधता और बौद्धिक परंपराओं का संरक्षण करना।
- भाषाओं के लुप्त होने का संकट: संयुक्त राष्ट्र के अनुसार लगभग हर दो सप्ताह में एक भाषा विलुप्त हो जाती है और उसके साथ एक संपूर्ण सांस्कृतिक तथा बौद्धिक धरोहर भी समाप्त हो जाती है। वैश्वीकरण तथा आर्थिक अवसरों के लिये विदेशी भाषाओं की बढ़ती प्रवृत्ति इस हानि को और तीव्र करती है।
यूनेस्को SoER 2025 रिपोर्ट क्या है?
परिचय
- यह दक्षिण एशिया हेतु यूनेस्को क्षेत्रीय कार्यालय द्वारा प्रकाशित एक वार्षिक प्रमुख (फ्लैगशिप) रिपोर्ट है, जो भारत की शिक्षा व्यवस्था के प्रमुख विषयों का साक्ष्य-आधारित विश्लेषण प्रस्तुत करती है। यह रिपोर्ट SDG-4 (गुणवत्तापूर्ण शिक्षा) तथा समावेशी अधिगम के प्रति यूनेस्को की प्रतिबद्धताओं के अनुरूप है।
- रिपोर्ट मातृभाषा-आधारित बहुभाषी शिक्षा (MTB-MLE) को सुदृढ़ करने के लिये त्वरित कदम उठाने का आह्वान करती है और समावेशी शिक्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाने हेतु एक व्यापक रोडमैप प्रस्तुत करती है।
मुख्य फोकस
- सुलभता, समावेशन और समानता: सभी शिक्षार्थियों विशेषकर जनजातीय बालक-बालिकाओं तथा दिव्यांग विद्यार्थियों की ऐसी भाषाओं के माध्यम से विद्यालयी शिक्षा में भागीदारी सुनिश्चित करना जिन्हें वे समझते हैं।
- संदर्भानुकूल एवं आजीवन अधिगम: विद्यालयी शिक्षा से लेकर शिक्षक-प्रशिक्षण तक प्रत्येक स्तर पर स्थानीय भाषाओं और सांस्कृतिक ज्ञान को समाहित करना।
- भाषायी विविधता का सम्मान: बच्चों की संपूर्ण भाषायी क्षमता को एक संसाधन के रूप में मान्यता देना तथा भारत की विविधता की समझ को बढ़ावा देना।
- सतत भविष्य के लिये कौशल: बहुभाषी अधिगम के माध्यम से संज्ञानात्मक अनुकूलनशीलता विकसित करना और अंग्रेज़ी सहित अन्य भाषाएँ सीखने के लिये दृढ़ आधार तैयार करना।
- संस्थानीकरण: सतत मातृभाषा-आधारित बहुभाषी शिक्षा (MTB-MLE) को समर्थन देने के लिये नीतियों, शिक्षक-शिक्षा और डिजिटल ईकोसिस्टम को सुदृढ़ करना।
मुख्य निष्कर्ष
- नीति समन्वय: मातृभाषा-आधारित बहुभाषी शिक्षा भारत के शिक्षा सुधारों में धीरे-धीरे हाशिये से केंद्र की ओर बढ़ रही है। अब इसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020 के लक्ष्यों तथा स्वदेशी भाषाओं के अंतर्राष्ट्रीय दशक (2022–2032) जैसी वैश्विक प्रतिबद्धताओं को प्राप्त करने के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है।
- वे मातृभाषा-आधारित शिक्षण, बहुभाषी शिक्षण पद्धति और सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील अधिगम का समर्थन करते हैं।
- राज्य-स्तरीय योजना प्रक्रियाधीन है: भाषा का व्यवस्थित मानचित्रण, जो शिक्षा के माध्यम के निर्णय, शिक्षकों की नियुक्ति और शिक्षण सामग्री के विकास के लिये अनिवार्य है, पूरे देश में विस्तार ले रहा है, लेकिन यह अभी सार्वभौमिक अभ्यास के रूप में नहीं अपनाया गया है।
- सशक्त समुदाय-प्रेरित अभ्यास: रिपोर्ट में ऐसे स्कूलों और समुदायों के प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत किये गए हैं, जहाँ स्थानीय ज्ञान तथा मौखिक परंपराओं पर आधारित शैक्षिक सामग्री का साझा निर्माण किया गया है। ये उदाहरण साओरा, कुई, गोंडी, संताली, खासी और मिज़ो जैसी भाषाओं में हैं। यह स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों के शैक्षिक मूल्य को दर्शाता है, हालाँकि ये प्रयास अभी भी स्थानीय स्तर तक सीमित हैं।
- उत्साहजनक ज़मीनी हकीकत: यह भारत में पहले से ही सक्रिय सफल मॉडलों को रेखांकित करता है:
- ओडिशा का आदिवासी कार्यक्रम: यह एक दीर्घकालिक बहुभाषी शिक्षा (MLE) कार्यक्रम है, जो 17 ज़िलों में 21 आदिवासी भाषाओं को कवर करता है और लगभग 90,000 बच्चों का समर्थन करता है।
- डिजिटल नवाचार: तेलंगाना में दीक्षा-सक्षम बहुभाषी संसाधनों और राष्ट्रीय पहलों, जैसे– PM ई-विद्या तथा AI4भारत का उपयोग यह दिखाता है कि तकनीक के माध्यम से स्थानीय भाषाओं में सामग्री बनाई जा सकती है एवं लुप्तप्राय भाषाओं का दस्तावेज़ीकरण किया जा सकता है।
- संस्थागत सहयोग में वृद्धि: कई प्रेरक पहलों से यह सिद्ध होता है कि मंत्रालयों, SCERTs, ट्राइबल रिसर्च इंस्टिट्यूट्स (TRIs), NGOs और तकनीकी साझेदारों के बीच सहयोग कितना मूल्यवान है। यह समन्वय अधिक संदर्भ-आधारित शिक्षण पद्धति के लिये अवसर पैदा कर रहा है।
भारत के लिये मातृभाषा पर आधारित शिक्षा क्यों आवश्यक है?
- शिक्षण संकट: 2022 की NCERT रिपोर्ट एक चौंकाने वाला आँकड़ा उजागर करती है: भारत में लगभग 44% बच्चे स्कूल में ऐसी भाषा के साथ प्रवेश करते हैं, जो उनके शिक्षा के माध्यम से अलग होती है।
- शिक्षण और संज्ञानात्मक लाभ: मातृभाषा में शिक्षण से संज्ञानात्मक बोझ कम होता है, जिससे गहरी समझ, मज़बूत मूलभूत साक्षरता, सुधरी हुई आलोचनात्मक सोच और बेहतर शैक्षणिक प्रदर्शन संभव होता है। इसके विपरीत प्रारंभिक गैर-मूल भाषा में शिक्षा कम परिणाम देती है।
- सांस्कृतिक संरक्षण: भाषा स्वदेशी और पारंपरिक ज्ञान की वाहक है। मातृभाषा में शिक्षा बच्चे की पहचान को मान्यता देकर आत्म-सम्मान बढ़ाती है और लुप्तप्राय भाषायी समुदायों में “भाषा मृत्यु” को रोकने में मदद करती है।
- सामाजिक समानता: यह "अंग्रेज़ी अभिजात वर्ग" (English Elite) एकाधिकार को तोड़कर एक बड़ा समानता लाने वाले कारक के रूप में कार्य करता है। हाशिये पर रहने वाले समूहों, जैसे– जनजातीय (आदिवासी) समुदायों के लिये, यह उस "तिहरे नुकसान" के चक्र को तोड़ती है जो स्कूल छोड़ने की उच्च दर का कारण बनता है।
- NEP 2020 के अनुरूप: नीति के अनुसार कम-से-कम कक्षा 5 तक और यदि संभव हो तो कक्षा 8 तक घर की भाषा में शिक्षण अनिवार्य है। यह औपनिवेशिक युग की मानसिकता से एक स्पष्ट बदलाव को दर्शाता है।
भाषा के लिये संवैधानिक ढाँचा और भारत का भाषायी परिदृश्य
संवैधानिक ढाँचा
- अनुच्छेद 29: अनुच्छेद 29 सभी नागरिकों को अपनी भाषा, लिपि या संस्कृति को संरक्षित करने का अधिकार प्रदान करता है और किसी भी नागरिक के साथ भाषा के आधार पर भेदभाव करने को निषिद्ध करता है।
- अनुच्छेद 120: यह संसदीय कार्यवाही को हिंदी या अंग्रेज़ी में संचालित करने का प्रावधान करता है, लेकिन सदस्यों को यह अधिकार भी प्रदान करता है कि यदि वे हिंदी या अंग्रेज़ी में पर्याप्त रूप से अपनी बात व्यक्त नहीं कर सकते, तो वे अपनी मातृभाषा में अभिव्यक्त कर सकते हैं।
- भाग XVII (अनुच्छेद 343-351): अनुच्छेद 343 से 351 केवल केंद्र और राज्यों में आधिकारिक भाषाओं से संबंधित हैं।
- अनुच्छेद 350A: यह प्रत्येक राज्य और स्थानीय प्राधिकरण के लिये अनिवार्य करता है कि वे भाषायी अल्पसंख्यक बच्चों को प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षण की पर्याप्त सुविधाएँ उपलब्ध कराएँ।
- अनुच्छेद 350B: यह राष्ट्रपति द्वारा भाषायी अल्पसंख्यकों के लिये विशेष अधिकारी नियुक्त करने की व्यवस्था करता है। यह अधिकारी भाषायी अल्पसंख्यकों के संरक्षण से संबंधित मामलों की जाँच करता है और राष्ट्रपति को रिपोर्ट प्रस्तुत करता है, जिसे राष्ट्रपति संसद तथा संबंधित राज्य सरकारों के समक्ष रख देते हैं।
- अष्टम अनुसूची: यह 22 आधिकारिक भाषाओं को मान्यता देती है, जिनमें असमिया, बंगाली, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी शामिल हैं। बाद में जो भाषाएँ जोड़ी गईं उनमें सिंधी (21वें संशोधन अधिनियम, 1967 के द्वारा), कोंकणी, मणिपुरी, नेपाली (71वें संशोधन अधिनियम, 1992 के द्वारा) और बोडो, डोगरी, मैथिली, संथाली (92वें संशोधन अधिनियम, 2003 के द्वारा) शामिल हैं।
भाषायी परिदृश्य
- अतुलनीय विविधता: भारत 1,369 मातृभाषाओं का घर है, जिनमें 121 ऐसी भाषाएँ हैं जिन्हें 10,000 से अधिक लोग बोलते हैं। 0.914 के 'भाषायी विविधता सूचकांक' के साथ, यह विश्व के सबसे विविध देशों में से एक है।
- भाषा परिवार: भाषाएँ चार प्रमुख परिवारों से संबंधित हैं, जैसे– इंडो-आर्यन (78%), द्रविड़ (20%), ऑस्ट्रो-एशियाटिक (1.2%) और तिब्बती-बर्मन (0.8%)।
- भाषाओं का संकट: लगभग 200 भाषाएँ संवेदनशील या लुप्तप्राय हैं, जो तिब्बती-बर्मन और ऑस्ट्रो-एशियाटिक भाषाओं को असमान रूप से प्रभावित कर रही हैं।
- दोहरा विभाजन: एक कठोर पदानुक्रम मौज़ूद है जहाँ अंग्रेज़ी शीर्ष पर है, उसके बाद प्रमुख क्षेत्रीय भाषाएँ हैं, जबकि स्वदेशी और जनजातीय भाषाएँ सबसे नीचे हैं, जो शिक्षा, शासन और डिजिटल क्षेत्रों से काफी हद तक पृथक् हैं।
भारत में MTB-MLE को लागू करने में प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
- भाषा का बेमेल होना: युवा शिक्षार्थी, विशेष रूप से जनजातीय क्षेत्रों में, प्रायः ऐसी भाषा में स्कूली शिक्षा शुरू करते हैं जो वे घर पर नहीं बोलते हैं। यह उनकी प्रारंभिक भागीदारी और समझ को बाधित करता है।
- सामग्री का अभाव: बच्चों की अपनी भाषाओं में पाठ्यपुस्तकों और शिक्षण सामग्रियों की उपलब्धता सीमित है, विशेष रूप से वहाँ जहाँ लिपियाँ अभी भी विकसित हो रही हैं।
- शिक्षकों की तैयारी: कई शिक्षक अब भी एकभाषी प्रथाओं पर ज़ोर देते हैं, क्योंकि बहुभाषी शिक्षाशास्त्र, 'ट्रांसलैंग्वेजिंग' और 'ट्रांसनॉलेजिंग' जैसे विषय प्रारंभिक और सेवाकालीन शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों में निरंतर रूप से शामिल नहीं हैं। इससे शिक्षक बहुभाषी पाठ-योजना तैयार करने के लिये तैयार नहीं रह पाते हैं।
- तीव्र परिवर्तन: मातृभाषा में मज़बूत नींव स्थापित होने से पहले ही क्षेत्रीय या वैश्विक भाषाओं की ओर जल्दी मुड़ जाना प्रायः शिक्षण प्रक्रिया को बाधित करता है।
- डिजिटल बहिष्कार: डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जनजातीय और अल्पसंख्यक भाषाओं का प्रतिनिधित्व बहुत कम है। पहुँच संबंधी सुविधाएँ असंगत हैं और दूरदराज़ के क्षेत्रों में कनेक्टिविटी का अंतर बना हुआ है।
- खंडित प्रयास: संस्थागत ज़िम्मेदारियाँ प्रायः बिखरी हुई हैं और समन्वित योजना का समर्थन करने के लिये भाषा-आधारित पृथक् डेटा का अभाव है।
वर्ष 2025 की UNESCO SoER रिपोर्ट की मुख्य सिफारिशें क्या हैं?
- एक राष्ट्रीय मिशन की स्थापना: संस्थागत समन्वय को सुदृढ़ करने, रणनीतिक नेतृत्व प्रदान करने और देश भर में इन सिफारिशों के स्थायी कार्यान्वयन की देखरेख के लिये MTB-MLE (मातृभाषा आधारित बहुभाषी शिक्षा) हेतु एक उच्च स्तरीय राष्ट्रीय मिशन का गठन करना।
- समावेशी भाषा प्रौद्योगिकियों में निवेश: कम चर्चित भाषाओं के लिये तकनीकी उपकरणों में निवेश करके डिजिटल विभाजन को कम करना, पहुँच संबंधी सुविधाओं (जैसे– भारतीय सांकेतिक भाषा (ISL) और ब्रेल) में सुधार करना और यह सुनिश्चित करना कि कनेक्टिविटी दूरदराज़ के क्षेत्रों तक पहुँचे।
- सतत और न्यायसंगत वित्तपोषण सुनिश्चित करना: शिक्षक प्रशिक्षण, सामग्री विकास और डिजिटल समावेशन सहित MTB-MLE के सभी पहलुओं के लिये दीर्घकालिक, पूर्वानुमानित और लक्षित वित्तपोषण की गारंटी प्रदान करता है।
- शिक्षक प्रणालियों को सुदृढ़ करना: बहुभाषी दक्षता को प्राथमिकता देने और उसका आकलन करने के लिये शिक्षक भर्ती, तैनाती और व्यावसायिक मानकों में सुधार करना।
- समावेशी, बहुभाषी शिक्षक सहायता संसाधन और शिक्षण सामग्री बनाने और प्रसारित करने के लिये DIKSHA जैसे प्लेटफॉर्मों का उपयोग करना।
- सामुदायिक भागीदारी को संस्थागत रूप देना: स्वदेशी ज्ञान, मौखिक परंपराओं और व्यापक सामुदायिक भागीदारी को विद्यालय के पाठ्यक्रम और दैनिक कार्यों में व्यवस्थित रूप से एकीकृत करने के लिये औपचारिक प्रणालियों और तंत्रों का निर्माण करना।
निष्कर्ष:
भारत की भाषायी विविधता एक शक्ति है, फिर भी स्कूलों में भाषा के असंगत होने के कारण सीखने का संकट बना हुआ है। यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020 के दृष्टिकोण को साकार करने के लिये केवल नीति-निर्माण से आगे बढ़कर कार्रवाई की आवश्यकता है। मातृभाषा-आधारित बहुभाषी शिक्षा (MTB-MLE) में निवेश करके इस कमी को दूर किया जा सकता है और समान शिक्षा सुनिश्चित की जा सकती है। इसके लिये शिक्षक प्रशिक्षण, डिजिटल समावेशन और सामुदायिक भागीदारी पर ध्यान देना महत्त्वपूर्ण है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न भारत में मातृभाषा आधारित बहुभाषी शिक्षा (MTB-MLE) को लागू करने में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है? इन चुनौतियों से निपटने के लिये उपयुक्त उपायों का सुझाव दीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न. अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस का क्या महत्त्व है?
यह दिवस प्रत्येक वर्ष 21 फरवरी को मनाया जाता है। वर्ष 1999 में यूनेस्को (UNESCO) ने भाषायी विविधता और बहुभाषावाद को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इसकी घोषणा की थी। यह दिन ढाका में वर्ष 1952 में हुए बांग्ला भाषा आंदोलन की याद में मनाया जाता है।
प्रश्न. भारत के लिये UNESCO की ‘स्टेट ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (SoER), 2025’ का मुख्य फोकस क्या है?
समान पहुँच, समानता, समावेशन और निरंतर सीखने के परिणामों को सुनिश्चित करने के लिये 2025 की ‘भाषा मैटर्स’ रिपोर्ट मातृभाषा-आधारित बहुभाषी शिक्षा (MTB-MLE) को संस्थागत रूप देने की सिफारिश करती है।
प्रश्न. भारत में मातृभाषा-आधारित बहुभाषी शिक्षा (MTB-MLE) क्यों महत्त्वपूर्ण है?
NCERT (2022) के आँकड़ों के अनुसार, लगभग 44% बच्चे ऐसी भाषा के साथ विद्यालयी शिक्षा आरंभ करते हैं जो शिक्षा के माध्यम से भिन्न होती है। इस भिन्नता के परिणामस्वरूप सीखने में अंतराल (learning gaps), कमज़ोर मूलभूत साक्षरता, संख्यात्मक ज्ञान (FLN) और स्कूल छोड़ने (ड्रॉपआउट) की अधिक संभावना उत्पन्न होती है।
प्रश्न. भारत में भाषायी अधिकारों को संरक्षण प्रदान करने वाले संवैधानिक प्रावधान कौन-से हैं?
मुख्य प्रावधानों में शामिल हैं—अनुच्छेद 29 (सांस्कृतिक अधिकार), अनुच्छेद 350A (प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा), अनुच्छेद 350B (भाषायी अल्पसंख्यकों के लिये विशेष अधिकारी), आठवीं अनुसूची (22 भाषाएँ)।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2021)
- यूनिसेफ द्वारा 21 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस घोषित किया गया।
- पाकिस्तान की संविधान सभा में यह मांग रखी गई कि राष्ट्रीय भाषाओं में बांग्ला को भी सम्मिलित किया जाए।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (b)
प्रश्न. भारत के संदर्भ में, 'हल्बी, हो और कुई' पद किससे संबंधित हैं? (2021)
(a) पश्चिमोत्तर भारत का नृत्य रूप
(b) वाद्ययंत्र
(c) प्रागैतिहासिक गुफा चित्रकला
(d) जनजातीय भाषाएँ
उत्तर: (d)
मेन्स:
प्रश्न. राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 धारणीय विकास लक्ष्य-4 (2030) के साथ अनुरूपता में है। उसका ध्येय भारत में शिक्षा प्रणाली की पुनःसंरचना और पुनःस्थापना है। इस कथन का समालोचनात्मक निरीक्षण कीजिये। (2020)
प्रश्न: क्या हम वैश्विक पहचान के लिये अपनी स्थानीय पहचान को खोते जा रहे हैं ? चर्चा कीजिये। (2019)