भारत की समुद्री रणनीति | 14 Jan 2026
प्रिलिम्स के लिये: हिंद महासागर, चोल शासक, इंडो-पैसिफिक, ब्लू इकोनॉमी, सागर विज़न, बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव
भारत की समुद्री रणनीति और नौसेना सिद्धांत का विकास, हिंद महासागर क्षेत्र में एक प्रमुख सुरक्षा प्रदाता के रूप में भारत की भूमिका, समुद्री भारत विज़न 2030
चर्चा में क्यों?
द रूटलेज हैंडबुक ऑफ मैरीटाइम इंडिया से प्राप्त दृष्टिकोण के बाद भारत की विकसित हो रही समुद्री रणनीति ने तीव्रता के साथ ध्यान केंद्रित किया है, जो भारत के समुद्री विकास का व्यापक विश्लेषण प्रदान करती है।
सारांश
- भारत की समुद्री रणनीति ऐतिहासिक रूप से भू-केंद्रित दृष्टिकोण से विकसित होकर एक व्यापक नियम-आधारित दृष्टिकोण में तब्दील हो गई है, जो सभ्यतागत समुद्री परंपराओं और सागर, महासागर एवं हिंद-प्रशांत महासागर पहल जैसी आधुनिक पहलों पर आधारित है, ताकि भारत को एक सुरक्षा प्रदाता और समुद्री केंद्र के रूप में स्थापित किया जा सके।
- भारत को, चीन की समुद्री सीमा क्षेत्र (IOR) में बढ़ती उपस्थिति, क्षमता अंतराल, जलवायु जोखिम और अधोजलीय क्षेत्र की कमज़ोरियों से उत्पन्न चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
- कानूनी एकीकरण, समुद्री प्रौद्योगिकी, क्षेत्रीय नियम, जलवायु-लचीले बुनियादी ढाँचे और मानव पूंजी का सुदृढ़ीकरण भारत के समुद्री भविष्य और प्रमुख शक्ति बनने की आकांक्षाओं को सुरक्षित करने की कुंजी है।
भारत की समुद्री रणनीति का विकास कैसे हुआ है?
- भारत का प्रारंभिक समुद्री अभिविन्यास: भारत का रणनीतिक भूगोल उत्तर में हिमालय और दक्षिण में हिंद महासागर से परिभाषित है, जो महाद्वीपीय और समुद्री दोनों क्षेत्रों में अवसर उत्पन्न करता है।
- ऐतिहासिक रूप से, जहाँ आक्रमण ज़मीनी मार्गों से हुए, वहीं भारत ने व्यापार, संस्कृति और नौवहन के माध्यम से समुद्र की ओर अपना प्रभुत्व बढ़ाया।
- प्राचीन और मध्यकालीन समुद्री नेटवर्क ने भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया, अरब देशों और पूर्वी अफ्रीका से जोड़ा।
- चोल शासकों तथा मराठा शासकों ने संगठित नौसैन्य शक्ति, विदेशी अभियानों और समुद्री राजनीति का प्रदर्शन किया।
- चोल शासकों को नॉटिकल टाइगर्स के रूप में वर्णित किया जाता है, जो संगठित नौसैन्य शक्ति और विदेशी अभियानों का प्रतीक है।
- इस प्रारंभिक अनुभव ने हिंद महासागर को खतरे के बजाय एक अवसर के रूप में स्थापित किया।
- औपनिवेशिक और स्वतंत्रता के बाद का प्रारंभिक काल: ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने भारतीय समुद्री शक्ति को साम्राज्यवादी हितों के अधीन कर दिया, जिससे स्वदेशी नौसैन्य परंपराएँ नष्ट हो गईं।
- स्वतंत्रता के बाद, से ही भारत को महाद्वीपीय सुरक्षा का दृष्टिकोण विरासत में प्राप्त हुआ है, जो विभाजन और पाकिस्तान के साथ शत्रुता, वर्ष 1962 के युद्ध तथा निरंतर सीमावर्ती और आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों से आकार ग्रहण करता रहा।
- परिणामस्वरूप, प्रारंभिक रणनीतिक चेतावनियों के बावज़ूद समुद्री मुद्दे प्रथम की बजाय दूसरे स्थान पर रहे।
- हालाँकि जवाहरलाल नेहरू ने चेतावनी दी कि हिंद महासागर पर नियंत्रण भारत के व्यापार और स्वतंत्रता को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है, हालाँकि नीतिगत ध्यान मुख्य रूप से भू-केंद्रित ही बना रहा।
- समुद्री पुनर्संरेखण: वर्ष 1980 के दशक के मध्य में एक रणनीतिक बदलाव देखने को मिला। समुद्री मार्गों से होने वाले व्यापार और ऊर्जा आयात पर बढ़ती निर्भरता, नौसैनिक आधुनिकीकरण तथा ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ बेहतर होते संबंधों के चलते भारत ने समुद्रों को केवल रक्षात्मक बफर नहीं, बल्कि रणनीतिक राजमार्ग के रूप में देखना शुरू किया।
- आर्थिक उदारीकरण ने वैश्विक समुद्री आपूर्ति शृंखलाओं के साथ एकीकरण को गहरा किया, हालाँकि समुद्री दृष्टिकोण हिंद महासागर से इंडो-पैसिफिक तक विस्तृत हुआ, जिससे जापान, फ्राँस, ऑस्ट्रेलिया और आसियान के साथ अभिसरण सक्षम हुआ और नियम-आधारित व्यवस्था को मज़बूती मिली।
- 2000 के दशक के प्रारंभ में, अरब सागर में भारतीय नौसेना की विस्तारित पहुँच और समुद्री डकैती-रोधी अभियानों ने भारत को एक नेट सुरक्षा प्रदाता के रूप में स्थापित किया। इस दौरान समुद्री कूटनीति, संयुक्त सैन्य अभ्यास और मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (HADR) भारत के प्रभाव के प्रमुख उपकरण बनकर उभरे।
- भारत की समुद्री रणनीति अब पारंपरिक रक्षा-केंद्रित दृष्टिकोण से आगे बढ़कर पड़ोसी देशों में क्षमता-निर्माण के साथ समुद्री सुरक्षा को एकीकृत करती है तथा ब्लू इकॉनमी, अंडरवॉटर डोमेन अवेयरनेस, समुद्री प्रौद्योगिकियों, जलवायु अनुकूलन और तटीय सुरक्षा जैसे बहुआयामी क्षेत्रों को समाहित करती है। इस व्यापक दृष्टिकोण में महासागरों को रणनीतिक, आर्थिक एवं पारिस्थितिक परिसंपत्तियों के रूप में परिकल्पित किया गया है।
- कानूनी आधार और विनियामक आधुनिकीकरण: भारत ने औपनिवेशिक काल के कानूनों का स्थान लेकर मर्चेंट शिपिंग अधिनियम, 2025, समुद्र द्वारा माल परिवहन अधिनियम, 2025 तथा भारतीय बंदरगाह अधिनियम, 2025 के माध्यम से अपने समुद्री शासन का आधुनिकीकरण किया है।
- ये सुधार भारतीय कानूनों को वैश्विक सम्मेलनों (Global Conventions) के अनुरूप बनाते हैं, सुरक्षा और पर्यावरणीय मानकों को सुदृढ़ करते हैं तथा नियम-आधारित विनियामक ढाँचे के माध्यम से ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस में सुधार करते हैं।
- नीतिगत दृष्टि: मैरीटाइम इंडिया विज़न, 2030 और मैरीटाइम अमृत काल विज़न, 2047 के माध्यम से भारत की समुद्री दृष्टि का उद्देश्य भारत को एक वैश्विक समुद्री केंद्र (Global Maritime Hub) के रूप में परिवर्तित करना है।
- भारत की समुद्री रणनीति SAGAR विज़न द्वारा निर्देशित है, जो हिंद महासागर को साझा क्षेत्र के रूप में देखती है जो सामूहिक सुरक्षा और विकास पर आधारित है, विशेषकर ग्लोबल साउथ के लिये।
- इस दृष्टिकोण का वैश्विक विस्तार MAHASAGAR विज़न के माध्यम से किया गया है, जिसमें समुद्री सुरक्षा को विकास और स्थिरता के साथ एकीकृत किया गया है।
- संस्थागत तैयारी: इसे इंडो-पैसिफिक ओशंस इनिशिएटिव के माध्यम से सुदृढ़ किया गया है, जो भारत के रणनीतिक उद्देश्यों को व्यापक इंडो-पैसिफिक क्षेत्र तक विस्तारित करता है।
- ASEAN, IORA और BIMSTEC के साथ सहयोग, जिसे इन्फॉर्मेशन फ्यूज़न सेंटर-इंडियन ओशन रीज़न द्वारा समर्थन प्राप्त है, एक सहकारी और नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था को मज़बूत करता है।
भारत की समुद्री रणनीति के समक्ष क्या चुनौतियाँ हैं?
- चीन का IOR में प्रवेश: बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत दोहरे उपयोग वाले बंदरगाहों (ग्वादर, हंबनटोटा, कयॉकफ्यू) और पनडुब्बियों की तैनाती के माध्यम से हिंद महासागर क्षेत्र में चीन के व्यवस्थित विस्तार ने क्षेत्र में शक्ति संतुलन को परिवर्तित किया है।
- भारत को जहाज़ निर्माण क्षमता, रक्षा-औद्योगिक पैमाना और लॉजिस्टिक्स पहुँच में संरचनात्मक असमानता का सामना करना पड़ता है। चुनौती यह है कि दबाव का निरोध किया जाए बिना किसी अस्थिर सुरक्षा दुविधा या शून्य-योग नौसैनिक प्रतिस्पर्द्धा को उत्पन्न किये।
- पड़ोसी क्षेत्र में अप्रभावी समुद्री शासन: दक्षिण एशियाई तटीय राज्यों में अप्रभावी संस्थाएँ, भ्रष्टाचार और अभिजात वर्ग का वर्चस्व बाहरी रणनीतिक प्रभुत्व को सक्षम बनाते हैं।
- श्रीलंका के हंबनटोटा अनुभव यह दर्शाते हैं कि सिद्धांत या विचारधारा नहीं, बल्कि शासन में कमियाँ चीन के साथ संरेखण को प्रेरित करती हैं।
- भारत के लिये समय पर, वित्तीय रूप से प्रतिस्पर्द्धी और संस्थागत रूप से विश्वसनीय विकल्प प्रदान करना कठिन है, जिससे यह अपने नज़दीकी पड़ोसी क्षेत्र में समुद्री शासन मानकों को आकार देने में सीमित रहता है।
- क्षमता अंतर और बल प्रक्षेपण की सीमाएँ: भारतीय नौसेना हॉर्मुज जलडमरूमध्य से मलक्का जलडमरूमध्य तक विस्तृत क्षेत्र में कार्य करती है, लेकिन स्वदेशी जहाज़ निर्माण में विलंब, पनडुब्बियों की कमी और इंजन, सेंसर व कॉम्बैट सिस्टम के आयात पर निर्भरता के कारण लगातार चुनौतियों का सामना करती है।
- राजकोषीय सीमाएँ प्लेटफॉर्म-केंद्रित आधुनिकीकरण से नेटवर्क-केंद्रित समुद्री प्रभुत्व की ओर संक्रमण को और जटिल बना देती हैं।
- इंडो-पैसिफिक की महत्त्वाकांक्षा और साझेदार अस्थिरता: एक समय में वैश्विक रणनीतिक विमर्श का केंद्र रहे इंडो-पैसिफिक ने यूक्रेन, गाज़ा और लाल सागर में संघर्षों तथा चीन के प्रति अमेरिकी जोखिम की बदलती धारणा के कारण गति खो दी है।
- भारत को अब क्वाड सहयोग को बिना किसी औपचारिक गठबंधन के संचालित करना है, जिसमें रणनीतिक स्वायत्तता, साझेदारों की अपेक्षाएँ और ब्लॉक-राजनीति से बचाव का संतुलन बनाना शामिल है, जिससे सतत समुद्री समन्वय और अधिक जटिल हो गया है।
- आर्थिक जोखिम और चोक-पॉइंट भेद्यता: हॉर्मुज और बाब एल-मंडेब के माध्यम से समुद्री ऊर्जा मार्गों पर भारत की निर्भरता इसे क्षेत्रीय अस्थिरता, समुद्री डकैती और समुद्री आतंकवाद से उत्पन्न होने वाले व्यवधानों के प्रति संवेदनशील बनाती है।
- जलमग्न क्षेत्र में तकनीकी कमी: समुद्री प्रतिस्पर्द्धा की अगली सीमा सतह के नीचे स्थित है।
- अंडरवॉटर डोमेन अवेयरनेस (UDA), समुद्रतल निगरानी, स्वायत्त पनडुब्बी प्रणालियों और साइबर-समुद्री एकीकरण में भारत की कमी, विवादित हिंद महासागर क्षेत्र में उसकी निवारक क्षमता तथा स्थितिजन्य जागरूकता को कमज़ोर करने का जोखिम उत्पन्न करती है।
- बल गुणक के रूप में जलवायु परिवर्तन: समुद्र-स्तर में वृद्धि, चरम मौसम की घटनाएँ और तटीय कटाव अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह जैसे द्वीपीय क्षेत्रों तथा महत्त्वपूर्ण नौसैनिक अवसंरचना के लिये गंभीर जोखिम उत्पन्न कर रहे हैं।
- साथ ही हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में जलवायु-प्रेरित मानवीय संकट भारत को आपदा प्रतिक्रिया और स्थिरीकरण की भूमिकाओं में लगातार अधिक शामिल करेंगे, जिससे पारंपरिक सुरक्षा अभियानों से परे नौसैनिक संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा।
भारत की समुद्री रणनीति को मज़बूत बनाने हेतु क्या कदम उठाए जा सकते हैं?
वैधानिक एकीकरण: समुद्री सुरक्षा रणनीति (2015), सागरमाला और ब्लू इकॉनमी नीति को समन्वित करते हुए एक समेकित राष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा ढाँचा स्थापित किया जाए, जिसमें नौसेना, तटरक्षक बल, बंदरगाहों और तटीय राज्यों की स्पष्ट कानूनी भूमिकाएँ निर्धारित हों।
अंडरवॉटर डोमेन अवेयरनेस: नौसेना–इसरो–वैज्ञानिक संस्थानों के एकीकरण के माध्यम से UDA को एक राष्ट्रीय मिशन के रूप में क्रियान्वित किया जाए, ताकि समुद्रतल के केबलों, अपतटीय परिसंपत्तियों और विशेष आर्थिक क्षेत्रों (EEZ) की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
क्षेत्रीय नियम-निर्माण: हिंद महासागर के तटीय देशों को संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून अभिसमय (UNCLOS)- अनुरूप समुद्री कानूनों, तटरक्षक विधानों और EEZ शासन को लागू करने में सहायता प्रदान की जाए, ताकि सहयोग को दीर्घकालिक रणनीतिक समन्वय में बदला जा सके।
जलवायु–सुरक्षा अभिसरण: बंदरगाहों, नौसैनिक अड्डों और द्वीपीय क्षेत्रों को जलवायु-संवेदनशील महत्त्वपूर्ण अवसंरचना के रूप में मानते हुए समुद्री सुरक्षा योजना को राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC) और तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) मानकों के साथ संरेखित किया जाए।
समुद्री कूटनीति के लिये मानव पूंजी: दीर्घकालिक समुद्री नेतृत्व के लिये आवश्यक नागरिक और सैन्य विशेषज्ञता विकसित करने हेतु महासागर विज्ञान, हाइड्रोग्राफी, समुद्री साइबर विशेषज्ञता और रणनीतिक अध्ययन में निवेश किया जाए।
निष्कर्ष
भारत का समुद्री दृष्टिकोण अब कोई वैकल्पिक या गौण विषय नहीं है, समुद्र अब राष्ट्रीय सुरक्षा, व्यापार और ऊर्जा प्रवाह, जलवायु प्रतिरोध क्षमता और क्षेत्रीय नेतृत्व को आकार देने में निर्णायक भूमिका निभाता है। महासागर भारत के रणनीतिक, आर्थिक और पर्यावरणीय हितों के केंद्र में हैं और एक महाशक्ति के रूप में भारत का उदय उतना ही समुद्री क्षेत्र में उसकी सक्रिय भागीदारी पर निर्भर करेगा जितना कि स्थलीय घटनाओं पर।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. भारत की समुद्री रणनीति का विकास भूमि-केंद्रित दृष्टिकोण से लेकर हिंद-प्रशांत पर केंद्रित दृष्टिकोण तक कैसे हुआ, इसका विश्लेषण कीजिये? |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. भारत की समुद्री रणनीति में SAGAR क्या है?
SAGAR (क्षेत्र में सभी के लिये सुरक्षा और विकास) हिंद महासागर को साझा संपदा के रूप में देखता है तथा विशेष रूप से ग्लोबल साउथ के लिये सामूहिक सुरक्षा, क्षमता निर्माण एवं विकास पर केंद्रित है।
2. महासागर विज़न क्या है?
महासागर SAGAR को वैश्विक स्तर पर विस्तारित करता है, समुद्री सुरक्षा, विकास और स्थिरता को हिंद महासागर से परे एकीकृत करता है तथा भारत की व्यापक नेतृत्व महत्त्वाकांक्षाओं को दर्शाता है।
3. भारत के लिये अंडरवाटर डोमेन अवेयरनेस (UDA) क्यों आवश्यक है?
अंडरवॉटर डोमेन अवेयरनेस (UDA) पनडुब्बियों की निगरानी, समुद्रतल के केबलों और अपतटीय परिसंपत्तियों की सुरक्षा तथा विवादित हिंद महासागर क्षेत्रों में समुद्री निवारक क्षमता सुनिश्चित करने के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
4. आज भारत को किन बड़ी समुद्री चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है?
मुख्य चुनौतियों में चीन का हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में विस्तार, नौसैनिक क्षमता में कमी, चोक-पॉइंट की कमज़ोरियाँ, पड़ोसी देशों में कमज़ोर समुद्री शासन और जलवायु परिवर्तन से संबंधित सुरक्षा जोखिम शामिल हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. 'क्षेत्रीय सहयोग के लिये इंडियन ओशन रिम एसोसिएशन फॉर रीजनल को-ऑपरेशन' (IOR-ARC) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2015)
- इसकी स्थापना हाल ही में घटित समुद्री डकैती की घटनाओं और तेल अधिप्लाव (आयल स्पिल्स) की दुर्घटनाओं के प्रतिक्रियास्वरूप की गई है।
- यह एक ऐसी मैत्री है जो केवल समुद्री सुरक्षा हेतु है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (d)
मेन्स
प्रश्न. भारत में समुद्री सुरक्षा चुनौतियाँ क्या हैं? समुद्री सुरक्षा में सुधार के लिये की गई संगठनात्मक, तकनीकी और प्रक्रियात्मक पहलों की विवेचना कीजिये। (2022)