भारत निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता | 25 Feb 2026

प्रिलिम्स के लिये: मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC), मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें एवं कार्यकाल) अधिनियम, 2023, अनूप बरनवाल केस, निर्वाचन आयोग, लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता (LoP), भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI), गोस्वामी समिति, विधि आयोग

मेन्स के लिये: भारत में संवैधानिक निकायों की स्वतंत्रता और निष्पक्षता, अनुच्छेद 324 तथा स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों के लिये संवैधानिक संरक्षण, भारत में निर्वाचन सुधार।  

स्रोत: द हिंदू 

चर्चा में क्यों?

भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की स्वतंत्रता मतदाता सूची के पुनरीक्षण जिसमें बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) तथा लगभग 65 लाख मतदाताओं के कथित विलोपन को लेकर उठी चिंताओं के बाद जाँच के दायरे में आ गई है।

  • विपक्षी गठबंधन द्वारा मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) को हटाने के लिये प्रस्ताव लाए जाने से ECI की निष्पक्षता तथा अनुच्छेद 326 के अंतर्गत वयस्क मताधिकार के संरक्षण पर पुनः ध्यान केंद्रित हुआ है।

सारांश

  • भारत निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता संवैधानिक प्रावधानों द्वारा संरक्षित है, किंतु नियुक्तियों, मतदाता सूची पुनरीक्षण, वित्तीय स्वायत्तता तथा प्रवर्तन शक्तियों से जुड़ी चिंताओं ने इसकी निष्पक्षता और प्रभावशीलता पर प्रश्न उजागर किये हैं।
  • संतुलित चयन प्रक्रिया, समान कार्यकाल सुरक्षा, प्रौद्योगिकीय पारदर्शिता तथा अधिक संस्थागत स्वायत्तता जैसे सुदृढ़ सुधार स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने और जनविश्वास बनाए रखने के लिये आवश्यक हैं।

भारत निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता को लेकर क्या चिंताएँ हैं?

  • नियुक्ति प्रक्रिया पर चर्चा: ऐतिहासिक रूप से संविधान में मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और निर्वाचन आयुक्तों (EC) की नियुक्ति के लिये कोई विशिष्ट विधायी प्रक्रिया निर्धारित नहीं की गई थी, जिससे यह कार्य कार्यपालिका पर निर्भर रहा (राष्ट्रपति, मंत्रिपरिषद की सलाह पर)।
  • हटाने की प्रक्रिया में त्रुटियाँ: जहाँ एक ओर मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) को पद से हटाने के विरुद्ध वही संरक्षण प्राप्त है जो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को प्राप्त होता है (संसद द्वारा महाभियोग), वहीं अन्य दो निर्वाचन आयुक्तों (EC) को राष्ट्रपति द्वारा केवल मुख्य निर्वाचन आयुक्त की अनुशंसा पर हटाया जा सकता है।
    • यह असमानता एक पदानुक्रमिक स्थिति उत्पन्न करती है तथा अन्य निर्वाचन आयुक्तों को संभावित रूप से संवेदनशील बना देती है, जिससे वे मुख्य निर्वाचन आयुक्त अथवा कार्यपालिका के साथ सामंजस्य स्थापित करने के दबाव का अनुभव कर सकते हैं।
  • वित्तीय स्वायत्तता: भारत निर्वाचन आयोग का बजट भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) या भारत के सर्वोच्च न्यायालय की तरह भारत की संचित निधि पर ‘भारित’ नहीं होता।
    • इसके बजाय यह ‘वोटेड व्यय’ है अर्थात इसके लिये संसद की स्वीकृति आवश्यक होती है, जिससे सैद्धांतिक रूप से भारत निर्वाचन आयोग की वित्तीय स्वतंत्रता उस समय की सरकार पर निर्भर हो जाती है।
  • आदर्श आचार संहिता (MCC) का प्रवर्तन: आदर्श आचार संहिता को विधिक आधार प्राप्त नहीं है, जिसके कारण यह आशंका व्यक्त की जाती है कि घृणास्पद भाषण अथवा चुनावी उल्लंघनों के मामलों में उच्च-प्रोफाइल वाले राजनीतिक व्यक्तियों के विरुद्ध कार्यवाही करते समय निर्वाचन आयोग ‘अप्रभावी’ या चयनात्मक अभिवृत्ति अपनाता है।
  • सेवानिवृत्ति उपरांत नियुक्तियाँ: संविधान सेवानिवृत्त मुख्य निर्वाचन आयुक्त या निर्वाचन आयुक्तों को सरकार द्वारा किसी अन्य पद पर नियुक्ति से वंचित नहीं करता।
    • इससे संभावित ‘हितों का टकराव’ उत्पन्न हो सकता है, क्योंकि सेवानिवृत्ति उपरांत पदों (जैसे- राज्यपाल का पद या आयोगों की सदस्यता) की संभावना उनके कार्यकाल के दौरान निष्पक्षता को प्रभावित कर सकती है।
  • मतदाता सूची की अखंडता और ‘मत चोरी’: मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) ‘मत चोरी’ के आरोपों का केंद्र बिंदु बन गया है। बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में लाखों मतदाताओं के संभावित विलोपन के संबंध में आरोप सामने आए हैं।
    • विपक्षी दलों का आरोप है कि इस प्रकार की कटौतियाँ/विलोपन अल्पसंख्यक समुदायों और उनके समर्थकों को असमान रूप से निशाना बनाती हैं।
    • ECI द्वारा SIR के प्रयोग को लेकर यह आलोचना की गई है कि “विदेशियों की पहचान” के नाम पर यह धर्म-आधारित चयनात्मक मताधिकार से वंचित करने की प्रक्रिया बनती जा रही है।
    • यह चिंता जताई गई है कि घर-घर सत्यापन के दौरान बूथ लेवल अधिकारियों (BLOs) को दिया गया व्यापक विवेकाधिकार और उस पर सीमित निगरानी मनमाने ढंग से मतदाताओं के नाम हटाए जाने का कारण बन सकता है तथा चुनावी निष्पक्षता को कमज़ोर कर सकता है।
  • प्रौद्योगिकी और पारदर्शिता पर बहस: भारत निर्वाचन आयोग ने राज्य निर्वाचन अधिकारियों को निर्देश दिया है कि यदि 45 दिनों के भीतर कोई न्यायिक चुनौती दायर नहीं होती, तो CCTV, वेबकास्टिंग और चुनावी वीडियो फुटेज नष्ट कर दी जाए। इस निर्णय ने पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर गंभीर चिंताएँ उत्पन्न की हैं।
    • चुनावों के बाद विश्वसनीय ऑडिट सुनिश्चित करने और जन विश्वास को मज़बूत करने के लिये संरक्षण अवधि को बढ़ाकर कम-से-कम 180 दिन करने की मांग लगातार बढ़ रही है।
    • इसी समय हाल के राज्य चुनावों में AI-जनित सामग्री और डीपफेक्स के बढ़ते प्रसार ने भारत निर्वाचन आयोग की इस क्षमता को चुनौती दी है कि वह किसी प्रकार के पक्षपात या राजनीतिक नैरेटिव को बढ़ावा देने की धारणा के बिना निष्पक्ष तथा संतुलित ढंग से दुष्प्रचार पर अंकुश लगा सके।

संवैधानिक जनादेश और सुरक्षा उपाय जो ECI की स्वतंत्रता सुनिश्चित करते हैं

  • निर्वाचन प्राधिकरण का निहितीकरण: अनुच्छेद 324(1) के तहत संसद, राज्य विधानमंडलों तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के लिये निर्वाचक नामावलियों की तैयारी और निर्वाचन के संचालन का अधीक्षण, निर्देशन तथा नियंत्रण भारत निर्वाचन आयोग में निहित है।
    • यह केंद्रीकृत अधिकार पूरी निर्वाचन प्रक्रिया के प्रबंधन में स्वायत्तता सुनिश्चित करता है।
  • संरचना और नियुक्ति: अनुच्छेद 324(2) के अनुसार, भारत निर्वाचन आयोग में मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और अन्य निर्वाचन आयुक्त (ECs) शामिल होते हैं, जिनकी संख्या राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित की जाती है।
    • राष्ट्रपति द्वारा की गई उनकी नियुक्ति, जो संसदीय कानून के अधीन होती है, इस निकाय को संवैधानिक मान्यता प्रदान करती है और साथ ही वैधानिक नियंत्रण की व्यवस्था भी सुनिश्चित करती है।
  • अध्यक्ष के रूप में मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) की भूमिका: अनुच्छेद 324(3) के अनुसार, जब अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की जाती है, तो मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) भारत का निर्वाचन आयोग के अध्यक्ष के रूप में कार्य करते हैं।
    • यह व्यवस्था प्रशासनिक नेतृत्व सुनिश्चित करती है साथ ही सामूहिक निर्णय-निर्माण संरचना को भी बनाए रखती है।
  • क्षेत्रीय आयुक्तों की नियुक्ति: अनुच्छेद 324(4) के अंतर्गत राष्ट्रपति, भारत निर्वाचन आयोग से परामर्श करके, चुनावों के दौरान सहायता के लिये क्षेत्रीय आयुक्तों की नियुक्ति कर सकते हैं।
    • इससे आयोग की स्वायत्तता को कम किये बिना उसकी परिचालन क्षमता मज़बूत होती है।
  • कार्यकाल की सुरक्षा और हटाने से संबंधित संरक्षण: अनुच्छेद 324(5) निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिये महत्त्वपूर्ण सुरक्षा प्रावधान प्रदान करता है, ताकि निर्वाचन आयुक्त अपने दायित्वों का निर्वहन बिना दबाव या भय के कर सकें।
    • मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) को केवल उसी प्रक्रिया और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिन पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है।
    • नियुक्ति के बाद CEC की सेवा-शर्तों में उसके प्रतिकूल कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता।
    • ये प्रावधान भारत के निर्वाचन आयोग को कार्यपालिका के मनमाने हस्तक्षेप से सुरक्षा प्रदान करते हैं, जिससे इसकी स्वायत्तता, स्वतंत्रता और निष्पक्षता सुनिश्चित होती है।
  • प्रशासनिक सहयोग: अनुच्छेद 324(6) के अनुसार, राष्ट्रपति या राज्यपाल निर्वाचन आयोग के अनुरोध पर उसे आवश्यक कर्मचारी और संसाधन उपलब्ध कराएंगे, जिससे भारत निर्वाचन आयोग अपने कार्यों का प्रभावी रूप से निर्वहन कर सके।

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ECI की स्वतंत्रता के संबंध में प्रमुख न्यायालयीन निर्णय क्या हैं?

  • इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण (1975): सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान की आधारभूत संरचना का हिस्सा हैं। इसका अर्थ है कि निर्वाचन की निष्पक्षता से समझौता नहीं किया जा सकता और लोकतंत्र की रक्षा में निर्वाचन आयोग (ECI) की केंद्रीय भूमिका को सुदृढ़ किया गया।
  • मोहिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य निर्वाचन आयुक्त (1978): सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग (ECI) को पूर्ण अधिकार प्रदान करता है, ताकि वह उन क्षेत्रों में भी कार्रवाई कर सके जहाँ कानून मौन है और इस प्रकार स्वतंत्र तथा निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित किये जा सकें। इससे चुनाव आयोग की कार्यात्मक स्वायत्तता (functional autonomy) मज़बूत हुई।
  • ए.सी. जोस बनाम शिवन पिल्लई (1984): सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि निर्वाचन आयोग (ECI) मौजूदा कानूनों को अधिभूत (override) नहीं कर सकता
  • इससे अनुच्छेद 324 के अधिकार केवल कानून में मौजूद अंतराल को पूरा करने तक सीमित रहते हैं और निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता कानून के शासन (Rule of Law) के भीतर सुनिश्चित होती है।
  • टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ (1995): सर्वोच्च न्यायालय ने बहु-सदस्यीय निर्वाचन आयोग की वैधता को बनाए रखा और कहा कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ‘समानों में प्रथम’ है, अन्य आयुक्तों से उच्च नहीं। इस निर्णय ने सामूहिक निर्णय-निर्माण को बढ़ावा दिया और शक्ति का केंद्रीकरण रोकने में मदद की।
  • विनीत नारायण बनाम भारत संघ (1997): सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) 'स्वत: संज्ञान' (Suo Motu) अन्य निर्वाचन आयुक्तों को हटाने की सिफारिश नहीं कर सकता
  • इससे आयुक्तों के कार्यकाल की सुरक्षा होती है और संस्थागत स्वतंत्रता की रक्षा सुनिश्चित होती है।
  • मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति एक समिति के माध्यम से की जानी चाहिये, जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल हों, ताकि नियुक्तियों में कार्यपालिका का प्रभुत्व कम किया जा सके।

ECI की स्वतंत्रता के लिये मुख्य समिति/आयोग की सिफारिशें

  • दिनेश गोस्वामी समिति (1990): इस समिति ने एक वैधानिक चयन समिति की सिफारिश की तथा आदर्श आचार संहिता को कानूनी रूप से प्रवर्तनीय बनाने का सुझाव दिया, ताकि इसके चयनात्मक अनुप्रयोग को रोका जा सके।
  • इंद्रजीत गुप्ता समिति (1998): इस समिति ने "धन बल" को कम करने के लिये चुनावों के राज्य वित्तपोषण का समर्थन किया, जिस पर भारत निर्वाचन आयोग प्रायः प्रभावी रूप से निगरानी करने में संघर्ष करता है।
  • द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (ARC) (2005): प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में एक कॉलेजियम का सुझाव दिया, जिसमें लोकसभा अध्यक्ष, नेता प्रतिपक्ष, कानून मंत्री और राज्यसभा के उपसभापति सदस्य के रूप में शामिल हों।
  • विधि आयोग (255वीं रिपोर्ट) (2015): इस रिपोर्ट ने प्रस्तावित किया कि तीनों आयुक्तों (मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्तों) को पद से हटाने के विरुद्ध समान संवैधानिक संरक्षण प्राप्त हो, जिससे वह पदानुक्रम समाप्त हो जो चुनाव आयुक्तों को संवेदनशील बनाता है और कार्यकाल की समान संवैधानिक सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
    • साथ ही, प्रशासनिक स्वायत्तता को सुदृढ़ करने हेतु भारत निर्वाचन आयोग के लिये एक स्थायी, स्वतंत्र सचिवालय की स्थापना का प्रस्ताव दिया।

भारत निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता को सुदृढ़ करने के लिये कौन-से उपाय किये जा सकते हैं?

  • कार्यकाल की सुरक्षा में समानता: संविधान में संशोधन किया जाना, ताकि चुनाव आयुक्तों को हटाने के विरुद्ध वही संरक्षण प्रदान किया जा सके जो वर्तमान में मुख्य चुनाव आयुक्त को गारंटीकृत है। 
    • उन्हें केवल एक कठोर संसदीय महाभियोग प्रक्रिया के माध्यम से हटाया जाना चाहिये, जिससे वे कार्यपालिका के दबाव से स्वतंत्र रहें।
  • नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार: कार्यपालिका के वर्तमान प्रभुत्व को कम करने के लिये मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की समीक्षा की जानी चाहिये ताकि एक संतुलित, न्यूट्रल सिलेक्शन कॉलेजियम बहाल किया जा सके। 
    • भारत के मुख्य न्यायाधीश को पुनः शामिल करना या समिति के भीतर सर्वसम्मति अनिवार्य करना वर्तमान कार्यपालिका प्रभुत्व को कम कर सकता है।
  • अवमानना शक्तियाँ प्रदान करना: अवमानना न्यायालय अधिनियम, 1971 में संशोधन करके भारत निर्वाचन आयोग को उन लोगों को दंडित करने का अधिकार प्रदान करना, जो इसके विरुद्ध निराधार, दुर्भावनापूर्ण आरोप लगाते हैं, इसकी संस्थागत विश्वसनीयता और अधिकार को बनाए रखने में सहायता करेगा।
  • वित्तीय एवं प्रशासनिक स्वायत्तता: पूर्ण वित्तीय स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के लिये भारत निर्वाचन आयोग का बजट सीधे भारत की संचित निधि पर "भारित" किया जाना चाहिये।
  • अनिवार्य कूलिंग-ऑफ अवधि: भविष्य के राजनीतिक संरक्षण के प्रलोभन को समाप्त करने के लिये सेवानिवृत्त होने वाले मुख्य चुनाव आयुक्तों और अन्य चुनाव आयुक्तों के लिये सेवानिवृत्ति के बाद सरकारी नियुक्तियों (जैसे– राज्यपाल पद) पर एक अनिवार्य कूलिंग-ऑफ अवधि या पूर्ण संवैधानिक प्रतिबंध लगाया जाना चाहिये।
  • मतदाता सूची संशोधन में पारदर्शिता: मनमाने ढंग से मतदाता विलोपन को रोकने के लिये, विशेष सारांश संशोधन अभ्यासों में पारदर्शी डेटा ऑडिट, अनुपूरक सूचियों का नियमित प्रकाशन और मज़बूत शिकायत निवारण तंत्र शामिल होने चाहिये।
    • लोकतंत्र की बुनियाद के रूप में चुनावों में विश्वास बनाए रखने के लिये पारदर्शिता बनाए रखना और हितधारकों की चिंताओं का समाधान करना आवश्यक है।
  • प्रौद्योगिकी संबंधी सुरक्षा उपाय: इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का मतदाता-सत्यापन योग्य पेपर ऑडिट ट्रेल के साथ सांख्यिकीय रूप से महत्त्वपूर्ण क्रॉस-सत्यापन अनिवार्य करना, विशेष रूप से डेटा विसंगतियों के मामलों में, चुनावी तंत्र में पूर्ण जनता का विश्वास बहाल करने और बनाए रखने के लिये महत्त्वपूर्ण है।

निष्कर्ष

भारत निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने व लोकतंत्र में जनता के विश्वास को बनाए रखने के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। हालाँकि संवैधानिक सुरक्षा उपाय मौजूद हैं, लेकिन नियुक्तियों और मतदाता सूची प्रबंधन में उभरती चुनौतियाँ तत्काल सुधारों की मांग करती हैं। भारत की लोकतांत्रिक अखंडता की रक्षा के लिये संस्थागत स्वायत्तता और पारदर्शिता को मज़बूत करना महत्त्वपूर्ण होगा।

दृष्टि मेंस प्रश्न:

प्रश्न. "निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता भारत के लोकतांत्रिक ढाँचे के लिये प्रमुख है।" इसकी स्वायत्तता के लिये संवैधानिक सुरक्षा उपायों और उभरती चुनौतियों का परीक्षण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. कौन-सा संवैधानिक उपबंध भारत निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है?
अनुच्छेद 324 चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण भारत निर्वाचन आयोग में निहित करता है और कार्यकाल की सुरक्षा तथा निष्कासन प्रक्रियाओं जैसे सुरक्षा उपाय प्रदान करता है।

2. मुख्य चुनाव आयुक्त की निष्कासन प्रक्रिया को सुरक्षा उपाय क्यों माना जाता है?
मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के समान प्रक्रिया के माध्यम से पदच्युत किया जा सकता है, जो मनमानी कार्यपालिका कार्रवाई को रोकता है।

3. वर्ष 2023 के नियुक्ति कानून को लेकर क्या विवाद है?
कानून ने चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश के स्थान पर एक केंद्रीय मंत्री को शामिल कर दिया, जिससे कार्यपालिका के प्रभुत्व की चिंताएँ उत्पन्न हुईं।

4. आदर्श आचार संहिता को कमज़ोर क्यों माना जाता है?
इसमें वैधानिक समर्थन का अभाव है, जो घृणास्पद भाषण और कदाचार जैसे उल्लंघनों के लिये दंड लागू करने की भारत निर्वाचन आयोग की क्षमता को सीमित करता है।

5. प्रौद्योगिकी चुनावी पारदर्शिता को कैसे सुदृढ़ कर सकती है?
CCTV फुटेज का संरक्षण, डिजिटल लॉग और मतदाता-सत्यापन योग्य पेपर ऑडिट ट्रेल के साथ इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का क्रॉस-सत्यापन जैसे उपाय लेखापरीक्षा क्षमता और जनता के विश्वास को बढ़ा सकते हैं।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न

प्रिलिम्स

प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2017) 

  1. भारत का निर्वाचन आयोग पाँच सदस्यीय निकाय है।
  2. संघ का गृह मंत्रालय आम चुनाव और उप-चुनावों दोनों के लिये उप-चुनाव तय करता है। 
  3. निर्वाचन आयोग मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के विभाजन/विलय से संबंधित विवाद निपटाता है। 

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? 

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 2

(c) केवल 2 और 3

(d) केवल 3

उत्तर: (d)  


मेंस

प्रश्न. आदर्श आचार संहिता के विकास के आलोक में भारत के चुनाव आयोग की भूमिका पर चर्चा कीजिये। (2022)