भारत में प्रधानमंत्री के कार्यकाल पर चर्चा | 09 Apr 2026
प्रिलिम्स के लिये: प्रधानमंत्री, लोकसभा, दसवीं अनुसूची, अविश्वास प्रस्ताव, राष्ट्रपति
मेन्स के लिये: कार्यपालिका की जवाबदेही से संबंधित संवैधानिक प्रावधान, दल-बदल विरोधी कानून (दसवीं अनुसूची) की भूमिका और प्रभाव
चर्चा में क्यों?
भारत में निर्वाचित प्रधानमंत्रियों के दीर्घकालीन कार्यकाल का विषय इस पद के लिये कार्यकाल सीमा लागू करने की चर्चा को फिर से सक्रिय कर रहा है।
सारांश
- प्रधानमंत्री के कार्यकाल को सीमित करने पर बहस फिर से इसलिये उभर आई है क्योंकि लंबे समय तक सत्ता में बने रहने और शक्ति के केंद्रीकरण को लेकर चिंताएँ बढ़ी हैं।
- संविधान में किसी निश्चित कार्यकाल सीमा का प्रावधान नहीं है यह संसदीय जवाबदेही पर निर्भर करता है, जो कि दल-बदल विरोधी कानून के कारण कमज़ोर हुई है।
- लोकतांत्रिक नियंत्रण और जवाबदेही को बहाल करने के लिये दल-बदल विरोधी कानून में सुधार तथा संसदीय निगरानी तंत्र को और मज़बूत करने जैसे सुधार आवश्यक हैं।
संविधान में प्रधानमंत्री के कार्यकाल के संबंध में क्या कहा गया है?
- प्रधानमंत्री का कार्यकाल: भारत का संविधान प्रधानमंत्री के लिये कोई निश्चित कार्यकाल सीमा निर्धारित नहीं करता है।
- प्रधानमंत्री तब तक पद पर बने रहते हैं जब तक उन्हें लोकसभा का विश्वास प्राप्त होता है और वे चुनावी समर्थन प्राप्त करने में सक्षम होते हैं। कार्यकाल की संख्या पर कोई प्रतिबंध नहीं है, जिससे कोई व्यक्ति लगातार कई कार्यकाल तक सेवा कर सकता है।
- संविधान सभा का तर्क: संविधान सभा की स्थिति को डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने नवंबर 1948 में संविधान का प्रारूप प्रस्तुत करते समय अपने भाषण में स्पष्ट किया था।
- अंबेडकर ने कार्यपालिका की ज़िम्मेदारी के ‘दैनिक मूल्यांकन’ (अविश्वास प्रस्ताव, प्रश्नों और स्थगन प्रस्तावों के माध्यम से) और ‘आवधिक मूल्यांकन’ (चुनावों के माध्यम से) के बीच अंतर किया।
- उन्होंने तर्क दिया कि दैनिक संसदीय जवाबदेही निश्चित कार्यकाल सीमाओं की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी नियंत्रण है।
- यह मॉडल वेस्टमिंस्टर प्रैक्टिस का अनुसरण करता है, जहाँ किसी भी प्रधानमंत्री पर कार्यकाल सीमा लागू नहीं होती, लेकिन उसे विधायिका या अपनी ही पार्टी के कॉकस द्वारा हटाया जा सकता है।
- मूल आधार यह था कि संसदीय विश्वास कार्यपालिका की शक्ति पर एक सतत और निरंतर नियंत्रण के रूप में कार्य करता है।
- सीमाएँ:
- दल-बदल विरोधी कानून: 52वें संवैधानिक संशोधन (1985) के माध्यम से दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) को लागू किया गया। इस कानून के तहत कोई भी विधायक/सांसद जो पार्टी व्हिप के विरुद्ध मतदान करता है, जिसमें विश्वास प्रस्ताव भी शामिल है, उसे सदन की सदस्यता से अयोग्य घोषित किया जा सकता है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने किहोतो होलोहन बनाम ज़ाचिल्हू (1992) में इसकी संवैधानिक वैधता को बनाए रखा और इसे जनादेश की रक्षा के रूप में प्रस्तुत किया।
- हालाँकि, इससे यह प्रभावी रूप से कार्यपालिका की शक्ति पर नियंत्रण के रूप में अविश्वास प्रस्ताव को निष्प्रभावी बना देता है, जब भी सत्तारूढ़ दल के पास कार्यशील बहुमत होता है।
- भारतीय दलों में आंतरिक नेतृत्व चुनौतियों के लिये संस्थागत तंत्र का अभाव है, जबकि ब्रिटेन की कंज़र्वेटिव पार्टी के सांसद अपने ही नेता को हटा सकते हैं।
- जिस तंत्र पर अंबेडकर ने कार्यकाल सीमाओं के विकल्प के रूप में विश्वास किया था, वह दल-बदल विरोधी कानून और दलों के आंतरिक दलीय लोकतंत्र के अभाव के कारण दोहरे रूप से निष्प्रभावी हो गया है।
- राज्यसभा से संबंधित कमी: संविधान प्रधानमंत्री को किसी भी सदन का सदस्य होने की अनुमति देता है।
- इसके अतिरिक्त, वर्ष 2003 में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन कर राज्यसभा सदस्यों के लिये निवास (डोमिसाइल) की शर्त को समाप्त कर दिया गया, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने कुलदीप नैयर बनाम भारत संघ (2006) में वैध ठहराया।
- यह एक नेता को अपने गृह राज्य में प्रत्यक्ष जन चुनाव से बचने, राज्यसभा के माध्यम से किसी सुरक्षित राज्य से नामित होने और फिर भी सर्वोच्च कार्यपालिका पद धारण करने की अनुमति देता है, जिससे वे प्रत्यक्ष चुनावी जवाबदेही से कुछ हद तक दूर हो सकते हैं।
प्रधानमंत्री के पद पर कार्यकाल की सीमाएँ लागू करने के संबंध में क्या तर्क हैं?
कार्यकाल की सीमा के पक्ष में तर्क
- “राष्ट्रपति” मिसाल: भारत का संविधान के अनुच्छेद 57 के अनुसार, जो व्यक्ति राष्ट्रपति पद पर है या रह चुका है, वह पुनः इस पद के लिये निर्वाचित होने के योग्य होता है और कार्यकाल की संख्या पर कोई विशेष सीमा निर्धारित नहीं है।
- हालाँकि कई लोकतंत्रों (जैसे– संयुक्त राज्य अमेरिका) में तथा भारत में परंपरा के अनुसार, राष्ट्रपति सामान्यतः दो कार्यकाल (भारत में अब तक किसी भी राष्ट्रपति ने दो से अधिक कार्यकाल नहीं निभाया है) तक ही सीमित रहते हैं।
- समर्थकों का तर्क है कि एक औपचारिक राष्ट्राध्यक्ष के कार्यकाल को सख्ती से सीमित करना तर्कसंगत नहीं है, जबकि वास्तविक कार्यकारी शक्ति रखने वाले पद के कार्यकाल पर कोई सीमा नहीं होती।
- वैश्विक उदाहरण: अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नेल्सन मंडेला एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण हैं, उन्होंने केवल एक पाँच-वर्षीय कार्यकाल के बाद स्वेच्छा से पद छोड़ दिया और सत्ता से चिपके रहने का विकल्प नहीं चुना।
- मेक्सिको में राष्ट्रपति को सख्ती से केवल एक छह-वर्षीय कार्यकाल तक सीमित किया गया है। ये उदाहरण दर्शाते हैं कि कार्यकाल सीमाएँ लागू करना न केवल संभव है, बल्कि लोकतंत्र के लिये लाभकारी भी है।
- शक्ति के केंद्रीकरण की रोकथाम: लंबे समय तक सत्ता में बने रहने से निर्णय-निर्माण प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में केंद्रित हो सकता है, जिससे मंत्रिमंडल की चर्चाएँ और सामूहिक ज़िम्मेदारी कमज़ोर पड़ जाती हैं।
- जैसा कि कहा जाता है, जब सत्ता किसी एक नेता के हाथों में केंद्रित होती है, तो वह 'व्यक्ति-पूजा' को जन्म देती है; लेकिन जब सत्ता संस्थाओं के बीच विभाजित होती है, तो वह लोकतंत्र को बनाए रखती है।
- समय के साथ लंबे समय तक पद पर बने रहने वाले नेता स्वतंत्र संस्थाओं को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे 'अंकुश और संतुलन' की व्यवस्था कमज़ोर हो जाती है। वे सरकारी तंत्र, वित्त तथा मीडिया पर भी कड़ा नियंत्रण हासिल कर सकते हैं, जिससे राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा असमान हो जाती है। ऐसे में 'कार्यकाल की सीमा' एक समान अवसर बनाए रखने एवं लोकतंत्र की रक्षा करने में मदद करती है।
- नए नेतृत्व को प्रोत्साहन: कार्यकाल सीमाएँ राजनीतिक ठहराव को रोकती हैं। ये राजनीतिक दलों को निरंतर नए नेताओं को तैयार करने के लिये प्रेरित करती हैं, जिससे नए प्रतिभाशाली व्यक्तियों और आधुनिक विचारों का प्रवाह बना रहता है तथा किसी एक ‘व्यक्ति-पूजा’ पर अत्यधिक निर्भरता से बचा जा सकता है।
- कमज़ोर संसदीय नियंत्रण की भरपाई: सैद्धांतिक रूप से संसद किसी भी समय प्रधानमंत्री को हटा सकती है, लेकिन व्यवहार में (विशेषकर भारत में) दल-बदल विरोधी कानून के कारण—जो अपनी पार्टी के विरुद्ध मतदान करने वाले सांसदों को अयोग्य ठहराता है—विधायकों की निष्ठा पार्टी के प्रति बँधी रहती है।
- यदि संसद प्रभावी रूप से कार्यपालिका को चुनौती देने में सक्षम नहीं रह जाती, तो कार्यकाल की सीमाएँ एक आवश्यक सुरक्षा-उपाय के रूप में कार्य करती हैं।
- जवाबदेही और प्रदर्शन को प्रोत्साहन: यह जानते हुए कि उनका कार्यकाल सीमित है, नेता ठोस परिणाम देने और निर्धारित समय-सीमा में अपनी विरासत बनाने पर अधिक ध्यान देते हैं, बजाय इसके कि वे लगातार राजनीतिक अस्तित्व तथा अगले चुनाव को प्राथमिकता दें।
कार्यकाल-सीमाओं के विरुद्ध तर्क
- मतदाता विकल्पों की सीमा: यह मतदाताओं को उस नेता को पुनः चुनने से वंचित कर देता है, जिसके कार्य से वे संतुष्ट हैं।
- प्रभावी और अनुभवी नेताओं को अच्छे शासन के बावजूद पद छोड़ने के लिये बाध्य होना पड़ सकता है।
- संसदीय प्रणाली के लिये उपयुक्त नहीं: प्रधानमंत्री केवल तब तक पद पर रहते हैं जब तक उन्हें संसद में बहुमत का समर्थन प्राप्त होता है, इसलिये निश्चित कार्यकाल सीमाएँ कम प्रासंगिक हो जाती हैं।
- दीर्घकालिक नीतियों में बाधा: अर्थव्यवस्था और अवसंरचना जैसे क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण सुधारों के लिये निरंतरता आवश्यक होती है, जिसे कार्यकाल की सीमाएँ बाधित कर सकती हैं।
- ‘लैम-डक’ चरण का निर्माण: अंतिम कार्यकाल में नेता की प्रभावशीलता कम हो सकती है, क्योंकि ध्यान धीरे-धीरे उनके उत्तराधिकारी की ओर स्थानांतरित होने लगता है।
- प्रतिनिधि नेतृत्व का जोखिम: कार्यकाल-सीमित नेता अपने वफादार लेकिन कमज़ोर उत्तराधिकारी नियुक्त कर अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव बनाए रख सकते हैं, जिससे कार्यकाल सीमा का मूल उद्देश्य ही कमज़ोर पड़ जाता है।
- अनियंत्रित/अनिर्वाचित पात्रों के पास सत्ता का स्थानांतरण: कमज़ोर या तेज़ी से बदलते नेतृत्व के कारण वास्तविक नीतिगत प्रभाव नौकरशाहों, सलाहकारों या पार्टी के संभ्रांत वर्ग के पास चला जाता है, जो सीधे तौर पर मतदाताओं के प्रति जवाबदेह नहीं होते हैं।
- संवैधानिक रूप से लागू करना कठिन: कार्यकाल सीमाएँ लागू करने के लिये व्यापक और जटिल संवैधानिक संशोधनों की आवश्यकता होगी, जिससे बड़े पैमाने पर बहसें शुरू हो सकती हैं तथा संस्थागत स्तर पर अनपेक्षित परिणाम भी उत्पन्न हो सकते हैं।
प्रधानमंत्री कार्यालय में जवाबदेही को सुदृढ़ करने हेतु किन सुधारों की आवश्यकता है?
- दल-बदल विरोधी कानून में संशोधन: संविधान सभा की मूल परिकल्पना को पुनर्स्थापित करने के लिये सबसे स्वाभाविक सुधार यह होगा कि ‘अविश्वास प्रस्तावों’ पर मतदान को दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के दायरे से बाहर रखा जाए।
- सांसदों को अपनी अंतरात्मा और अपने निर्वाचन क्षेत्र के हितों के आधार पर ‘मुक्त मतदान’ की अनुमति दी जानी चाहिये, जैसा कि दिनेश गोस्वामी समिति ने 1990 में अनुशंसा की थी। इससे सरकार के पतन का जोखिम उठाए बिना विधायिका की कार्यपालिका को जवाबदेह बनाने की क्षमता बहाल हो सकेगी।
- औपचारिक कार्यकाल सीमा लागू करना: एक अधिक महत्त्वाकांक्षी सुधार यह होगा कि प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के लिये लगातार कार्यकालों की सीमा निर्धारित की जाए, साथ ही एक ‘कूलिंग-ऑफ’ अवधि का प्रावधान रखा जाए, जिसके बाद ही पुनः पद पर वापसी संभव हो सके।
- यह सुधार राज्य स्तर पर भी उतना ही आवश्यक है, जहाँ कई मुख्यमंत्रियों ने भी लंबे, कई दशकों तक बिना किसी नियंत्रण के सत्ता का प्रयोग किया है।
- 'शैडो कैबिनेट' को संस्थागत बनाना: वेस्टमिंस्टर मॉडल से प्रेरणा लेते हुए, भारत को एक शैडो कैबिनेट को औपचारिक रूप देना चाहिये।
- यह कानूनी रूप से विपक्षी नेताओं को मान्यता देता है, जो विशिष्ट मंत्रालयों की "शैडो" रखते हैं, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि इनके पास लगातार प्रश्न उठाने और प्रधानमंत्री के मंत्रिमंडल के लिये नीतिगत विकल्प प्रस्तुत करने तथा जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिये संसाधन और जनादेश हो।
- संसद में प्रधानमंत्री की अनिवार्य उपस्थिति: प्रधानमंत्री की नियमित, अनिवार्य उपस्थिति को संस्थागत बनाना, जैसे कि एक समर्पित "प्रधानमंत्री का प्रश्नकाल" (यूके के समान), जो प्रत्यक्ष, बिना स्क्रिप्ट के जवाबदेही सुनिश्चित करता है।
- एक सेवानिवृत्ति मानदंड शुरू करना: कार्यकारी राजनीतिक पद धारण करने के लिये एक अनिवार्य सेवानिवृत्ति आयु (जैसे– 70-75 वर्ष) करना ताकि नेतृत्व में पीढ़ीगत बदलावों को व्यवस्थित रूप से सुनिश्चित किया जा सके और आजीवन कार्यकाल को रोका जा सके।
निष्कर्ष
भारत की संवैधानिक संरचना निश्चित कार्यकाल की सीमाओं के बजाय निरंतर संसदीय जवाबदेही पर निर्भर थी। हालाँकि दल-बदल विरोधी कानून जैसे परिवर्तनों ने इस तंत्र को कमज़ोर कर दिया है। अब बहस केवल एक नेता के कार्यकाल के बारे में नहीं है, बल्कि इस बारे में है कि क्या भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली अभी भी उन आत्म-सुधार सुरक्षा उपायों को बरकरार रखती है जिनकी परिकल्पना इसके निर्माताओं ने की थी।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. दल-बदल विरोधी कानून ने भारत में विधायिका और कार्यपालिका के बीच संतुलन को किस प्रकार परिवर्तित किया है, चर्चा कीजिये? |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. प्रधानमंत्री के कार्यकाल के संदर्भ में संविधान क्या कहता है?
भारत का संविधान कोई निश्चित कार्यकाल की सीमा नहीं बताता है; प्रधानमंत्री तब तक पद पर बने रहते हैं जब तक उन्हें लोकसभा का विश्वास प्राप्त होता है।
2. दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) क्या है?
इसे 52वें संवैधानिक संशोधन (1985) द्वारा पेश किया गया, यह उन विधायकों को अयोग्य ठहराता है जो पार्टी व्हिप के खिलाफ वोट करते हैं।
3. बी.आर. अंबेडकर का कार्यकाल सीमाओं पर क्या तर्क था?
उन्होंने निश्चित कार्यकाल सीमाओं पर दैनिक संसदीय जवाबदेही पर बल दिया, इसे कार्यपालिका की शक्ति पर एक मज़बूत नियंत्रण माना।
4. इस संदर्भ में दल-बदल विरोधी कानून की आलोचना क्यों की जाती है?
यह सांसदों को स्वतंत्र रूप से वोट करने से रोकता है, अविश्वास प्रस्तावों को कमज़ोर करता है और विधायी निगरानी को कम करता है।
5. शैडो कैबिनेट क्या है?
एक प्रणाली जहाँ विपक्षी नेता सरकारी मंत्रालयों पर नज़र रखते हैं और उनकी आलोचना करते हैं, जिससे जवाबदेही और नीतिगत बहस में वृद्धि होती है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स:
प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2022)
- भारत का संविधान मंत्रियों को चार श्रेणियों, अर्थात् कैबिनेट मंत्री, स्वतंत्र प्रभार वाले राज्यमंत्री, राज्यमंत्री और उपमंत्री में वर्गीकृत करता है।
- संघ सरकार में मंत्रियों की कुल संख्या, प्रधानमंत्री को मिलाकर, लोकसभा के कुल सदस्यों के 15% से अधिक नहीं होनी चाहिये।
उपर्युक्त कथनों में कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1, न ही 2
उत्तर: B
प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2019)
- भारत के संविधान के 44वें संशोधन द्वारा लाए गए एक अनुच्छेद ने प्रधानमंत्री के निर्वाचन को न्यायिक पुनर्विलोकन के परे कर दिया।
- भारत के संविधान के 99वें संशोधन को भारत के उच्चतम न्यायालय ने अभिखंडित कर दिया क्योंकि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अतिक्रमण करता था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/है?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1, न ही 2
उत्तर: B
प्रश्न. भारत के संविधान की निम्नलिखित में से कौन-सी एक अनुसूची में दल-बदल विरोध विषयक उपबंध है? (2014)
(a) दूसरी अनुसूची
(b) पाँचवीं अनुसूची
(c) आठवीं अनुसूची
(d) दसवीं अनुसूची
उत्तर: (d)
मेन्स:
प्रश्न. आपकी दृष्टि में, भारत में कार्यपालिका की जवाबदेही को निश्चित करने में संसद कहाँ तक समर्थ है? (2021)
प्रश्न. कुछ वर्षों से सांसदों की व्यक्तिगत भूमिका में कमी आई है जिसके फलस्वरूप नीतिगत मामलों में स्वस्थ रचनात्मक बहस प्रायः देखने को नहीं मिलती। दल परिवर्तन विरोधी कानून, जो भिन्न उद्देश्य से बनाया गया था, को कहाँ तक इसके लिये उत्तरदायी माना जा सकता है? (2013)