पूंजीगत वस्तु क्षेत्र | 11 Feb 2026

प्रिलिम्स के लिये: पूंजीगत वस्तुएँ, सार्वजनिक पूंजीगत व्यय, औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP), उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन योजना (PLI), कस्टम ड्यूटी, लिथियम-आयन बैटरी

मेन्स के लिये: औद्योगिक वृद्धि में पूंजीगत वस्तुओं की भूमिका, अवसंरचना-प्रधान विकास, सार्वजनिक निवेश और निजी निवेश को आकर्षित करना, औद्योगिक नीति और ऊर्जा संक्रमण

स्रोत: पीआईबी 

चर्चा में क्यों?

केंद्रीय बजट 2026-27 में पूंजीगत वस्तु क्षेत्र को सशक्त करने हेतु उच्च सार्वजनिक पूंजीगत व्यय, लक्षित विनिर्माण योजनाएँ तथा कर और कस्टम ड्यूटी में प्रोत्साहन की घोषणा की गई।

सारांश

  • केंद्रीय बजट 2026-27 पूंजीगत वस्तु क्षेत्र को अवसंरचना निर्माण और विनिर्माण वृद्धि का मुख्य प्रेरक मानता है।
  • सार्वजनिक पूंजीगत व्यय ₹12.2 लाख करोड़ तक बढ़ाया गया है, जिससे निवेश-प्रधान आर्थिक विस्तार को प्रबलता प्राप्त होती है।
  • नई विनिर्माण योजनाएँ और वित्तीय प्रोत्साहन घरेलू क्षमता निर्माण, आयात पर निर्भरता कम करने और दीर्घकालिक औद्योगिक प्रतिस्पर्द्धात्मकता को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से हैं।

केंद्रीय बजट 2026-27 में पूंजीगत वस्तु क्षेत्र सशक्त बनाने हेतु प्रमुख घोषणाएँ क्या हैं? 

  • सार्वजनिक पूंजीगत व्यय: केंद्रीय बजट 2026-27 में अवसंरचना-प्रधान विकास को तेज़ करने के लिये सार्वजनिक पूंजीगत व्यय ₹12.2 लाख करोड़ तक बढ़ाया गया है।
    • सरकारी पूंजीगत व्यय FY 18 से FY 26 (बजट अनुमान) तक 4.2 गुना बढ़ा है, जो सार्वजनिक निवेश पर सतत नीति फोकस को दर्शाता है।
    • उच्च सार्वजनिक पूंजीगत व्यय से निजी निवेश को आकर्षित करने और विभिन्न क्षेत्रों में उत्पादक क्षमता बढ़ने की आशा है।
  • विनिर्माण क्षमता संवर्द्धन: बजट में उच्च-सटीक विनिर्माण को समर्थन देने के लिये केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उद्यमों (CPSE) द्वारा हाई-टेक टूल रूम स्थापित करने का प्रस्ताव है।
    • ये सुविधाएँ डिजिटली सक्षम डिज़ाइन, परीक्षण और विनिर्माण सेवाएँ कम लागत पर प्रदान करेंगी।
    • उन्नत निर्माण मशीनरी के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के लिये निर्माण और अवसंरचना उपकरण संवर्द्धन योजना (Scheme for Enhancement of Construction and Infrastructure Equipment) भी शुरू की गई है।
  • कंटेनर विनिर्माण योजना: बजट में पाँच वर्षों में लागू होने वाली ₹10,000 करोड़ की कंटेनर विनिर्माण योजना की घोषणा की गई है।
    • यह योजना भारत में वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी कंटेनर विनिर्माण पारिस्थितिक तंत्र विकसित करने का लक्ष्य रखती है।
    • इससे लॉजिस्टिक्स अवसंरचना सुदृढ़ होगी और निर्यात वृद्धि को भी समर्थन मिलेगा।
  • टोल विनिर्माण और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को समर्थन: बजट में बंधित क्षेत्रों (Bonded Zones) में कार्यरत टोल निर्माताओं (Toll Manufacturers) को पूंजीगत वस्तुएँ और उपकरण आपूर्ति करने वाले गैर-निवासी संस्थाओं (Non-Resident Entities) को पाँच वर्षों तक आयकर छूट प्रदान की गई है।
    • बंधित क्षेत्रों में इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण का समर्थन करने वाले विदेशी आपूर्तिकर्त्ताओं (Foreign Suppliers) को अतिरिक्त कर छूट भी दी गई है।
    • इन उपायों का उद्देश्य पूंजी निवेश लागत को कम करना तथा वर्ष 2030–31 तक भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को बढ़ावा देना है।
  • ऊर्जा संक्रमण एवं महत्त्वपूर्ण खनिज: बजट ने बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों के लिये लिथियम-आयन सेल के विनिर्माण हेतु प्रयुक्त पूंजीगत वस्तुओं पर सीमा शुल्क छूट का विस्तार किया है।
    • यह भारत में महत्त्वपूर्ण खनिजों के प्रसंस्करण के लिये आवश्यक पूंजीगत वस्तुओं पर भी सीमा शुल्क में छूट प्रदान करता है।
    • ये उपाय घरेलू मूल्य शृंखलाओं को सुदृढ़ करने तथा ऊर्जा सुरक्षा एवं ऊर्जा संक्रमण लक्ष्यों का समर्थन करने के लिये अभिप्रेत हैं।

पूंजीगत वस्तुएँ/कैपिटल गुड्स 

  • पूंजीगत वस्तुओं में संयंत्र, मशीनरी एवं उपकरण शामिल होते हैं, जिनका उपयोग उत्पादन या सेवा प्रदायगी हेतु किया जाता है, जिसमें आधुनिकीकरण, प्रौद्योगिकी उन्नयन तथा क्षमता विस्तार सम्मिलित है। 
  • इनका उपयोग विनिर्माण, अवसंरचना, कृषि, खनन, संबद्ध गतिविधियों तथा सेवा क्षेत्र में किया जाता है।

पूंजीगत वस्तुओं का महत्त्व

  • उच्च आर्थिक गुणक प्रभाव: सार्वजनिक पूंजीगत व्यय अर्थव्यवस्था में सशक्त प्रसार के प्रभाव को उत्पन्न करता है; विभिन्न अध्ययनों के अनुसार इसका गुणक प्रभाव लगभग 2.5 से 3.5 गुना तक अनुमानित है।
  • विनिर्माण की आधारशिला: पूंजीगत वस्तुएँ ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, वस्त्र एवं भारी उद्योग जैसे क्षेत्रों के लिये मशीनरी का आधारभूत ढाँचा प्रदान करती हैं।
  • प्रौद्योगिकी उन्नयन का उत्प्रेरक: यह क्षेत्र स्वचालन, रोबोटिक्स, कृत्रिम बुद्धिमत्ता एवं इंटरनेट ऑफ थिंग्स जैसी उन्नत प्रौद्योगिकियों के व्यापक औद्योगिक ईकोसिस्टम में प्रसार को सक्षम बनाता है।
  • सामरिक भूमिका: पूंजीगत वस्तुएँ नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियों, इलेक्ट्रिक वेहिकल की बैटरियों तथा महत्त्वपूर्ण खनिज प्रसंस्करण के लिये अनिवार्य हैं।
  • रोज़गार और स्किल डेवलपमेंट इंजन: पूंजीगत वस्तु विनिर्माण कौशल-प्रधान होता है, जो अभियांत्रिकी, निर्माण-कार्य तथा तकनीकी व्यवसायों में व्यापक रोज़गार सृजन करता है।

पूंजीगत वस्तु संबंधी पहलें

  • मेक इन इंडिया: आयात निर्भरता कम करने एवं औद्योगिक आत्मनिर्भरता को सुदृढ़ करने हेतु पूंजीगत वस्तुओं के घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देना।
  • राष्ट्रीय पूंजीगत वस्तु नीति, 2016: पूंजीगत वस्तुओं के उत्पादन, निर्यात एवं प्रौद्योगिकीय गहनता को बढ़ाने हेतु एक व्यापक रोडमैप प्रदान करना।
  • पूंजीगत वस्तु योजना: चरण-I साझा सुविधाओं के माध्यम से कौशल अंतराल, प्रौद्योगिकी विकास तथा उद्योग-शिक्षा जगत के सहयोग पर केंद्रित।
    • चरण-II में स्वदेशी प्रौद्योगिकी विकास, कौशल प्रशिक्षण, परीक्षण एवं उद्योग भागीदारी को बढ़ाते हुए चरण-I के दायरे का विस्तार किया गया है।
  • उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाएँ: PLI योजनाएँ ऑटोमोबाइल, बैटरी एवं इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे प्रमुख क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर विनिर्माण को प्रोत्साहित करके उन्नत पूंजीगत वस्तुओं की मांग को बढ़ाती हैं।

पूंजीगत वस्तुओं के समक्ष क्या चुनौतियाँ हैं?

  • विपरीत शुल्क संरचना: कच्चे माल पर तैयार पूंजीगत वस्तुओं की तुलना में उच्च आयात शुल्क घरेलू उत्पादन लागत को बढ़ा देता है, जिससे स्थानीय मूल्यवर्द्धन हतोत्साहित होता है तथा आयात स्वदेशी विनिर्माण की तुलना में अधिक प्रतिस्पर्द्धी बन जाता है।
  • प्रौद्योगिकी अंतर और कम अनुसंधान एवं विकास (R&D) निवेश: सीमित घरेलू तकनीकी क्षमता तथा कम R&D व्यय उच्च-सटीक विनिर्माण को बाधित करते हैं, जिससे उन्नत घटकों पर आयात की निर्भरता बढ़ती है और मूल्य शृंखला में ऊपर बढ़ने में रोक लगती है।
  • उच्च लॉजिस्टिक्स और अवसंरचना लागत: परिवहन और बंदरगाहों में बढ़ती रसद लागत और अक्षमताएँ डिलीवरी की समय-सीमा और परिचालन व्यय को बढ़ा देती हैं, जिससे वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता कम हो जाती है—विशेष रूप से भारी और बड़े आकार के पूंजीगत सामानों के लिये।
  • खंडित उद्योग संरचना: सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) की प्रधानता बड़े पैमाने की अर्थव्यवस्था, किफायती वित्त तक पहुँच और वैश्विक बाज़ारों के लिये आवश्यक उन्नत परीक्षण प्रमाणन तथा प्रौद्योगिकी उन्नयन में निवेश करने की क्षमता को सीमित करती है।
  • सरकारी पूंजीगत व्यय पर निर्भरता: इस क्षेत्र की वृद्धि सार्वजनिक पूंजीगत व्यय चक्रों से गहराई से जुड़ी हुई है, जो इसे राजकोषीय सख्ती के प्रति संवेदनशील बनाती है।

पूंजीगत वस्तु क्षेत्र को मज़बूत करने हेतु आवश्यक उपाय कौन-कौन से हैं?

  • हाई-टेक टूल रूम और साझा अवसंरचना का विस्तार: सरकार को डिजिटल रूप से सक्षम 'हाई-टेक टूल रूम' और 'कॉमन इंजीनियरिंग फैसिलिटी सेंटर्स' को मज़बूत और विस्तारित करना चाहिये, ताकि MSMEs को उच्च-सटीकता वाली 'मदर मशीनरी' (प्रमुख मशीनरी) तक पहुँच प्राप्त हो सके। इससे विनिर्माण गुणवत्ता, सटीकता और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता में वृद्धि होगी।"
  • उन्नत मशीनरी के स्वदेशी विनिर्माण को बढ़ावा: तकनीकी रूप से उन्नत अवसंरचना और निर्माण उपकरणों, जैसे– टनल-बोरिंग मशीन (TBM) और भारी औद्योगिक प्रणालियों के घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिये लक्षित योजनाओं की आवश्यकता है, जिससे आयात पर निर्भरता कम हो सके।
  • पूंजी की लागत में कमी: निर्माताओं पर शुरुआती पूंजीगत बोझ को कम करने और उन्नत वैश्विक तकनीक के अधिग्रहण को सुविधाजनक बनाने के लिये वित्तीय प्रोत्साहन, कर छूट और ऋण तक आसान पहुँच प्रदान की जानी चाहिये।
  • अनुसंधान एवं विकास और उद्योग-अकादमिक सहयोग को सुदृढ़ करना: आयात-विकल्प तकनीकों को विकसित करने, कौशल विकास को बढ़ावा देने तथा तकनीकी आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिये 'उत्कृष्टता केंद्रों'  व नवाचार केंद्रों में अधिक निवेश आवश्यक है।
  • सुदृढ़ रसद (लॉजिस्टिक्स) का विकास: रसद अवसंरचना में सुधार और घरेलू कंटेनर विनिर्माण को बढ़ावा देने से परिवहन लागत कम होगी, आपूर्ति शृंखला (सप्लाई चेन) का लचीलापन बढ़ेगा तथा इस क्षेत्र की समग्र लागत प्रतिस्पर्द्धात्मकता में सुधार होगा।

निष्कर्ष

केंद्रीय बजट 2026-27 निवेश-आधारित विकास रणनीति के एक प्रमुख स्तंभ के रूप में पूंजीगत वस्तु क्षेत्र को और सुदृढ़ करता है। निरंतर सार्वजनिक पूंजीगत व्यय, विनिर्माण प्रोत्साहन तथा ऊर्जा संक्रमण के लिये समर्थन इस क्षेत्र को दीर्घकालिक औद्योगिक और बुनियादी ढाँचा विकास को गति देने के लिये तैयार करते हैं।

दृष्टि मेन्स प्रश्न

"पूंजीगत वस्तु क्षेत्र भारत में अवसंरचना निर्माण और निवेश-प्रेरित वृद्धि के लिये केंद्रीय है।" टिप्पणी कीजिये।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

मेन्स:

प्रश्न. पूंजी बजट तथा राजस्व बजट के मध्य अंतर स्पष्ट कीजिये। इन दोनों बजटों के संघटकों को समझाइये। (2021)

प्रश्न. उत्तर-उदारीकरण अवधि के दौरान, बजट निर्माण के संदर्भ में, लोक व्यय प्रबंधन भारत सरकार के समक्ष एक चुनौती है। इसको स्पष्ट कीजिये। (2019)